Gulabkothari's Blog

November 11, 2009

नया युग

कि मां कहती है
लडका अच्छा है
मेरा मान करता है
मित्रता चाहता है
किंतु डरती हूं
मैं
आगे बढने से
जानती नहीं
कौन है वो
वह भी नहीं जानता
मैं कौन हूं-कैसी हूं
फिर भी अच्छा तो
लगता है।
पहले भी हो चुका
ऎसा ही
एक बार
अच्छा लगा था
एक प्यार।
मिलते थे
कई संदेश
प्यार भरे
किंतु बादल थे
बरसाती
छंट गए
बहुत जल्दी
शादी की चर्चा
उसे नहीं सुहाई
जब वह आया
मुझे मिलने
साथ उसके
एक और कन्या आई
कह रही थी
हम करने वाले हैं
शादी, जल्दी ही।
अपनी भूल
मैं चिंतित हो गई
उसके लिए
आज फिर
खडी हूं
उसी दोराहे पर,
जाना भी चाहती हूं
किसी की गोद में
मिलते भी हैं
प्यार करने वाले
किंतु,
एक प्रश्न
उठता है बार-बार,
क्या कभी भी
बन सकूंगी
किसी के बच्चे की
मां
क्या हो सकेगी
मेरी भी
छोटी-सी गृहस्थी
क्या होगा
कभी मेरा मन संतुष्ट
इस सदी के रिवाज
कुछ अलग हैं
आदमी
नहीं बदलता
अपनी जगह
और औरतें
लुढकती रहती हैं
इनके हाथों में।
यही कहानी है
विकासवाद की
समानता की
समृद्धि की।
औरत रूक जाती है
कहानी ठहर जाती है
अकेले जीने की जगह
मर जाने की
याद आती है।

गुलाब कोठारी

November 10, 2009

विष वृक्ष

महाराष्ट्र में एक विधायक को राष्ट्र भाषा में शपथ लेने के कारण पार्टी विशेष के विधायकों की आक्रामकता का शिकार होना पड़ा। पूरा सदन जैसे शिथिल होकर रह गया था। यह हमारे लोकतंत्र की पगड़ी उछालने जैसा ही मामला है। वह भी चुनौती देकर। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला नियम तो दुर्याधन और कंस के राज में भी था। महाराष्ट्र विधानसभा में आज जो कुछ दुर्घटना हुई, उस पर तो पूरे देशवासियों का खून उबल जाना चाहिए था। क्षेत्रवाद का यह स्वरूप किसी जातिवाद और आतंकवाद से कम तो नहीं कहा जा सकता। भाषा की इस संकीर्णता में और कटट्रवाद में कहां अन्तर रह जाता है?

राज ठाकरे ने जब यह घोषणा की कि जो भी विधायक मराठी में शपथ नहीं लेगा, उसे सदन में ही देख लिया जाएगा, उसे तब ही गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए था। इससे बड़ा देशद्रोह और क्या हो सकता है। जिन-जिन प्रदेशों ने क्षेत्रीयता और भाषावाद का सहारा लिया है, उनके सम्बन्ध शेष राष्ट्र के साथ स्वत: ही बदलते चले गए हैं। महाराष्ट्र में जब छठ की पूजा को लेकर बिहार/यूपी के लोगों के विरूद्ध अभियान चला था, तब भी शिवसेना प्रमुख की देश भर में थू-थू हुई थी। इस बार भी उनका अहंकार चुनाव से पूर्व चरम पर था, जब उन्होंने कहा था कि राज कौन होता है मराठी की बात करने वाला। मैं सबका बाप हूं। यही अहंकार राज ठाकरे को भी विरासत में मिला है। इसी के कांटे उसको चुभ भी रहे हैं।

ईश्वर ने उसे आगे बढ़ने का साहस दिया है। साथ चलने को टीम में भरोसे के साथी भी दिए हैं। फिर उसे समाज के हित में कार्य क्यों नहीं करना चाहिए। केवल मराठी का संघर्ष तो आगे चलकर घाटे का सौदा ही रहेगा। बाल ठाकरे इसके उदाहरण हैं। उनके पास धनबल, भुजबल, सत्ता क्या नहीं है। पर क्या महाराष्ट्र के बाहर देशवासी उनका उतना ही सम्मान करते हैं, जितना महाराष्ट्र में करते हैं।

प्रश्न यह है कि सदन में राज ठाकरे की पार्टी के विधायकों ने जब संविधान और लोकतंत्र का मखौल उड़ाते हुए अकेले विधायक पर आक्रमण कर दिया तब उन विधायकों को केवल चार साल के लिए निलम्बित करने का क्या औचित्य है? उनके लिए तो पूरे पांच साल के लिए सदन से निष्कासित किया जाना और जीवन में फिर कोई भी चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करना भी कम ही सजा होती। पुलिस में मामला भी दर्ज कराया जाता। चार साल का निलम्बन तो उनसे ज्यादा उनके चुनाव क्षेत्रों के मतदाताओं को दण्डित करना है, जिनकी अब सदन में आवाज ही नहीं रहेगी।

महाराष्ट्र की इस दुर्घटना ने एक मौका दिया है सच्चाई के लिए संघर्ष करने का। यह संघर्ष खतरों से खेलना ही है। लोकतंत्र को प्रतिष्ठित रखना है तो सामंती/ अपराधी तत्वों से संघर्ष करना ही पड़ेगा। बल्कि यह संकल्प तो अब हर प्रान्त के सदन और संसद के शपथ-पत्र में जुड़ जाना चाहिए कि- “मैं संकल्प करता हूं कि मेरी उपस्थिति में यदि सदन में कोई लोकतंत्र की मर्यादा तोड़ने का प्रयास करता है और सभापति भी कार्रवाई नहीं करता, तब मैं कानून की शरण लूंगा।”

महाराष्ट्र विधानसभा में भाषा के नाम पर आतंकित करना, मारपीट करना तो बलवे की परिभाषा में आता है। इसे किसी भी बहाने से, किसी भी समीकरण के बहाने ठण्डे बस्ते में नहीं डाला जाना चाहिए। यह अकेले महाराष्ट्र का नहीं देश का सवाल है। देशभर में इस दुर्घटना के विरोध में आवाजें उठनी चाहिएं। कैंसर प्रभावित अंग शरीर की शोभा नहीं बढ़ाता।

गुलाब कोठारी

October 13, 2009

फैसला तो करो!

भारत आज एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। उसे अपनी क्षमता सिद्ध करते हुए शिखर पर भी पहुंचना है और स्वाभिमान भी बनाए रखना है। सरकार चलाना और नेतृत्व देना एक बात नहीं है। सरकार में फाइलों के, नेताओं और अघिकारियों के पेट भरे जाते हैं। उस धन को हमारे यहां धूल कहा जाता है। नेतृत्व इसे ठोकर पर रखता हुआ कफन बांधकर निकलता है। अपने संकल्प के सहारे। आज संकल्पविहीनता की स्थिति है। कोई दूरगामी निर्णय होते ही नहीं। हमारे अघिकारियों को दौरे करने और हाथ मिलाने का बड़ा शौक है। भले ही पीछे से कोई छुरा मार दे। पिछले साठ साल में हमने केवल पड़ोसियों की शत्रुता कमाई है। देश के टुकड़े किए हैं।

हमारे देश में जो कुछ हो रहा है, धर्म और जाति के नाम पर देश खण्ड-खण्ड हो रहा है, देश के भीतर विषाक्त वातावरण फैल रहा है। जनता में जितनी त्राहि-त्राहि मच रही है, पड़ोसी देश जिस प्रकार मित्रता भुलाकर शत्रु बनते जा रहे हैं, निर्णय लेने के बजाए गम्भीर से गम्भीर मुददों को टाला जा रहा है, देश में अनिर्णय की स्थिति बढ़ती जा रही है, इन सबका एक ही कारण है – देश में कोई नेता नहीं है। किसी भी पार्टी ने देश को नेता नहीं दिया। सबकी नेतागिरी अपनी-अपनी पार्टी तक सिमटी हुई है। चाहे लालकृष्ण आडवाणी हो या सोनिया गांधी। ऎसे ही हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हो गए हैं। इनके आह्वान पर देशवासी किसी मुददे पर कोई पहल नहीं कर सकते। आज जनप्रतिनिघि स्वयं कार्यपालिका पर अघिक निर्भर करते हैं। कार्यपालिका टालमटोल करने के लिए जग प्रसिद्ध है। कुर्सी और नेतृत्व में अन्तर होता है। नेता सभी दलों से ऊपर होता है। उसके समक्ष केवल राष्ट्रहित होता है। इसी के लिए वह जीता है, मरता है। मैंने राहुल गांधी से भी यही कहा था कि उन्हें देश को नेतृत्व देना चाहिए। कांग्रेस को नहीं। कांग्रेस उनके लिए सीढ़ी का कार्य करे, तब कुछ बात बनेगी। वरना उनके साथ भी कांग्रेस का वही सम्बन्ध रहेगा जो पिछली पीढियों के साथ रह चुका है।

देश का दुर्भाग्य है कि विदेश सेवा के अघिकारी केवल यही सपना देखते रहते हैं कि उन्हें कहां का राजदूत बनाया जा रहा है। उन्हें देशहित में तपस्या करने की तैयारी दिखानी चाहिए। इन दिनों चीन और पाकिस्तान दोनों ही हमारे सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। दोनों ने ही आजादी के बाद से अब तक समय-समय पर हमारा दोहन ही किया है, हम मौन बने बैठे हैं। क्या मार्गदर्शन किया विदेश विभाग ने। वह इसी बात से प्रसन्न है कि पाकिस्तान से हमारे रेल और बस मार्ग जुड़ गए। कश्मीर के जरिए व्यापार के रास्ते खुल गए। चीन से हमारा व्यापार सन् 2010 तक 30 अरब अमरीकी डॉलर हो जाएगा। साथ में भले हमारी 30 हजार बीघा जमीन दबा ले। कोई नेता देश के प्रति संकल्पवान ही दिखाई नहीं देता। ढुलमुल नीतियां चल रही हैं। शत्रुता को भी झेल रहे हैं। वार्ताएं भी जारी हैं। एक भी नेता ने स्पष्ट नहीं किया वह देश के हित में क्या करना चाहता है, जिसमें सभी देशवासी सहयोग करें। बकरी रोए जान को, खटीक रोए खाल को। सबसे दयनीय स्थिति यह है कि हम रोज यह जानकारियां दे रहे हैं कि पाकिस्तान और चीन क्या कर रहा है, किन्तु देशवासियों को नहीं पता कि भारत क्या कर रहा है।

पिछले साठ साल में भारत की विदेश नीति के कारण आज सभी पड़ोसी देश शत्रु बन गए। शत्रु ही क्यों लगभग सभी चीन के साथ मित्रता का जामा पहन चुके हैं। आज चीन के पास भारत में प्रवेश के लिए भले ही एकमात्र पाकिस्तान हो, आने वाले समय में यह सभी पड़ोसी देश चीन के लिए भारत प्रवेश का मार्ग बन जाएंगे। क्या हम इसे उपलब्घि मान सकते हैं। इसको देखकर लग रहा है कि सरकार के निर्णयों की प्रतीक्षा किए बिना ही देशवासियों को कुछ निर्णय ले लेने चाहिए। देश की सम्प्रभुता के हित में। आज चीन ने जो कुछ हमारे साथ किया है, वह 1962 की ही पुनरावृत्ति है। सुरक्षा परिषद की सदस्यता के मुद्दे पर भी सबसे बड़ा विरोध चीन ही कर रहा है। एक धोखा पं. नेहरू खा चुके हैं फिर हम छाछ को फू ंककर क्यों नहीं पी रहे? हम जानते हैं कि वहां निर्णय लिए जाते हैं, हमारे यहां टाले जाते हैं। अत: हमें भी तुरंत प्रभाव से चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर देना चाहिए। किसी “स्वदेशी अपनाओ” या “भारत छोड़ो” नारे की आवश्यकता नहीं है। चीनी नागरिकों को भारत में प्रवेश करने से रोक देना चाहिए। चीनी सहयोग से चलने वाले उद्योगों को भी बन्द कर देने के लिए दबाव डालना चाहिए। यह तब तक जारी रहना चाहिए जब तक चीन हमारी जमीन छोड़कर वापस न लौट जाए।

गुलाब कोठारी

October 12, 2009

उलूक

उलूक यानी उल्लू, लक्ष्मी का वाहन। जो लक्ष्मी के साथ रहकर भी अंधेरे को प्रकाश मानकर विचरण करे, वही उल्लू। हम लक्ष्मी प्राप्ति के लिए पूजा-पाठ और अनुष्ठान करते हैं। कृष्ण कहते हैं कि ईश्वर जिससे रूष्ट होता है, उसे अथाह धन-सम्पदा, समृद्धि देता है। ताकि वह ईश्वर को याद ही नहीं करे। हम भी लक्ष्मी को पाकर ईश्वर को भूल जाना चाहते हैं। लक्ष्मी जिस पर सवारी करे, वही उल्लू। जीवन का यह कैसा विरोधाभास है। लक्ष्मी का त्यौहार भी अमावास की काली रात में। और हम इसी में ढूंढते हैं जीवन का प्रकाश।

उलूक शब्द का अर्थ करें- उ = उधर, लू = ले जाना, क = शक्तिपूर्वक। उधर का भावार्थ हुआ स्वयं से दूर। जो जबरदस्ती खींचकर स्वयं से, आत्म प्रकाश या ईश्वर से दूर ले जाता हो। आत्मा चेतना का नाम है, लक्ष्मी अर्थ (पदार्थ) या जड का नाम है। व्यक्ति एक ही दिशा में तो चल सकता है। या तो गति चेतन की ओर रह सकती है, या फिर जड की ओर। लक्ष्मी की ओर जाना ही जड की ओर, चेतना से दूर जाना है। और इसी के वाहक को उल्लू कहते हैं। इस मति का नाम ही उल्लू है। यह कोई पक्षी का नाम नहीं है। लक्ष्मी के प्रभाव में हमारी बुद्धि उल्लू जैसे कार्य करने लग जाती है। अज्ञान के अंधकार को जीवन का प्रकाश मानने लगती है। भौतिक सुखो की चकाचौंध में रमण करने लग जाती है। अहंकार उसमें आसुरी वृत्तियों का प्रवेश करता जाता है। जीवन को अंधकार में ले जाने का यह क्रम आगे से आगे बढता ही जाता है। तब निश्चित ही है कि लक्ष्मी का वाहन उल्लू होना वाजिब ही है।

लक्ष्मी का अंधेरे के साथ भी गहरा जुडाव है। लक्ष्मी विष्णु की पत्नी है। विष्णु क्षीर सागर में रहते हैं। यह परमेष्ठी लोक है, सोम लोक है। इसी में गौ लोक है। कृष्ण सोम वंशी हैं। काले हैं। सृष्टि का नियम है कि अग्नि में सोम की आहुति से यज्ञ चलता है। अत: सोम को अन्न का पर्यायवाची कहा गया है। सारी अर्थ सृष्टि सोम रूपा लक्ष्मी से उत्पन्न होती है। अग्नि सोम का भक्षण कर लेती है। सोम दिखाई नहीं पडता। जो कुछ दिखाई पडने वाला स्वरूप है, सम्पूर्ण सृष्टि में, वह अग्नि का ही प्रकट स्वरूप है। हमारा शरीर भी अग्नि रूप है। इसमें निरन्तर अन्न की आवश्यकता रहती है। तभी हमारी सृष्टि का भी संचालन होता है। दिन में सूर्य की तपन से सोम की कमी सम्पूर्ण जगत में व्याप्त होती रहती है। रात्रिकाल में आकाश द्वारा उसी सोम की वर्षा होती है। कमी को पूरा किया जाता है। सोम से निर्माण और पोषण भी। यही विष्णु का कार्य है। उसी को वेदों में यज्ञ पुरूष कहा गया है। सोम के बिना यज्ञ संभव ही नहीं है।

हमारा शरीर भी प्रकृति दत्त है। इसका निर्माण और पोषण भी सोम से होता है। दिन में खर्च हुआ सोम रात्रि को हमारी थकान भी दूर करता है। नई शक्ति देता है। इसी शक्ति को लक्ष्मी कहते हैं। जिसे हम अन्न कहते हैं, वह केवल हमारा भोजन ही नहीं है। हमारी सारी भोग्य सामग्री हमारा अन्न कहलाती है। हम सब एक-दूसरे का अन्न हैं। आप मेरे लिखे हुए को पढ रहे हो, मुझे भोग रहे हो। ये विचारों का अन्न है। इसी प्रकार मन का अन्न होता है। सारे अन्नों का निर्माण लक्ष्मी करती है। धन भी एक प्रकार का अन्न ही है।
परमेष्ठी लोक जिस प्रकार सोम लोक कहा गया है, वैसे ही पितर प्राणों का लोक भी यही है। सोम और पितर प्राण दोनों ही हमको चन्द्रमा से प्राप्त होते हैं। परमेष्ठी लोक हमारी सृष्टि का चन्द्रमा है। हमारी पृथ्वी का चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर लगाता रहता है। सोम और पितर प्राणों की आपूर्ति करता है।

रात्रिकाल में बरसने वाले सोम से ही औषध और अन्न पैदा होते हैं। पृथ्वी पर भी और अन्तरिक्ष में भी। फल पकने के बाद जिसका पेड/पौधा नष्ट हो जाए, उसे औषघि कहते हैं। जिसका पेड बच जाए, वह वनस्पति कहलाता है। इसी अन्न के जरिए पितर प्राणों की और सोम की आपूर्ति हमारे शरीर में भी होती है। अन्न से ही शुक्र का निर्माण होता है। अन्न से मन का निर्माण होता है। मन भी अन्न की ही श्रेणी में आता है। ये सारा ही लक्ष्मी का क्षेत्र है। सोम के सारे कार्य-कलाप रात्रि में ही होते हैं। दिन में सूर्य की उष्णता सोम को निर्बल बना देती है। जीवन में समृद्धि के साथ जो जडता का प्रवेश होता है, वह भी रात्रि में ही उसे प्रवृत्त करता है। मद्यपान-जुआ-मादक द्रव्य-यौनाचार आदि की सारी क्रियाएं अंधकार से ही जुडी होती हैं। रात्रि के अंधकार यही एक विश्ेाषता है। अंधकार से जुडे विषय जीवन में लाभकारी नहीं होते। जीवन के कृष्ण और शुक्ल पक्ष में से उल्लू को कृष्ण ही प्रिय होता है। उसमें कहीं कोई भेद दिखाई नहीं पडते। अच्छे-बुरे, छोटे-बडे सारे भेद अंधकार में समा जाते हैं। बिना विचारे, बिना भेद-ज्ञान के कार्य करने वाले को उल्लू ही कहेंगे।

उल्लू स्वभाव से भी क्रूर और अत्याचारी होता है। निर्दोष पक्षियों को यातना भी देता रहता है। धन मद में भी बहुत कुछ ऎसा ही करता है आदमी। उसे सब कुछ जायज भी लगता है और धन की ताकत से उसे एक गलतफहमी यह भी हो जाती है कि धन से वह सब कुछ खरीद सकता है। आदमी को धन से खरीद लेना आज आम बात हो गई। धीरे-धीरे ऎसे लोगों का समाज में उठना-बैठना भी कम हो जाता है। यह अलग बात है कि धन के जोर पर कुछ लोग सामाजिक पद हथिया लेते हैं। पर इनका सम्मान आम आदमी नहीं करता। उल्लू भले ही हमारी पूज्या लक्ष्मी का वाहन हो, इसका भी सम्मान कोई नहीं करता। हमारे यहां तो कहा जाता है कि जिस मकान पर उल्लू आकर नित्य बैठता है, वह मौत की सूचना देता है। उसे कोई अपने मकान पर बैठने तक नहीं देता। यदि मैं लक्ष्मी का वाहक बन गया तो मुझे भी बैठने देंगे या नहीं।

जीवन का लक्ष्मी के साथ यह व्यवहार कितना विरोधाभासी है। लक्ष्मी की पूजा करें, उसे आने के लिए प्रसन्न करें और उल्लू को आने से भी रोक दें। लक्ष्मी तो उस पर बैठकर ही आएगी। लक्ष्मी के आते ही घर जड पदार्थो से भरने लगेगा। न जाने हम कितनी वस्तुएं खरीदकर लाएंगे। घर को जड पदार्थो का श्मशान बना देंगे। दूसरों को दिखाकर फूले न समाएंगे। यही परिग्रह की शुरूआत है। जीवन में हिंसा का प्रवेश (भाव हिंसा का) यहीं से होता है। जीवन की चेतना के द्वार बन्द होने लगते हैं। एक मूच्र्छा-सी बुद्धि और मन पर छाने लगती है। भीतर का मार्ग पूरी तरह अवरूद्ध हो जाता है। व्यक्ति बाहर की ओर ही भागने लगता है। फिर वह कभी स्वयं के बारे में चिन्तन-मनन नहीं करेगा। अज्ञान के अंधकार में उल्लू की तरह, लक्ष्मी को बिठाए भटकता रहेगा। ईश्वर की ओर से उसके कर्मो की यही सजा है- जा, उल्लू हो जा!

गुलाब कोठारी

October 7, 2009

किसके साथ

पशुभाव है
कर्म
ज्ञान के बिना
ज्ञान भी
बन जाता है
विष
बिना उपयोग के।
पैदा किसने किया
अज्ञान को
कौन करता है
इसको विकसित
फिर भी होता है
बहुत बडा
ज्ञान से
असीम-अनंत।
सर्वाधिक त्रस्त
होते हैं ज्ञानी ही
अज्ञान से
ज्ञान के अहंकार से
दुत्कारते हैं
अपने ही कर्मोü को
आगे चलकर
साहस नहीं होता
स्वीकार करने का।
जैसे कि
मुझे पसंद आई
एक लडकी
प्यार हो गया
मन भी
तैयार हो गया
करने को शादी
लगने लगी
सबसे सुंदर
दुनिया भर में
भाती नहीं
कोई भी दूसरी
जवाब दे दिया
बुद्धि ने भी
हम मान गए।
मान गए
मां-बाप भी
दोनों के
वे तो
करते भी क्या
बस गया
घर हमारा
सुंदर-सा।
कुछ काल बाद
गूंजने लगी
किलकारियां
देर कहां लगती है
गुजर जाने में
अच्छे दिनों को,
और फिर
शुरू हो गए
विवाद-संवाद
नित नए तेवर
नित नए विषय
कभी पीहर
कभी ससुराल
कभी बच्चे
सूखने लगे कंठ
पछताने लगा मन।
सुना था
शादी के लaू
खाओ और पछताओ
नहीं खाओ
तो भी पछताओ।
पडने लगा भारी
हर दिन
कटती नहीं रातें
होने लगा
बीमार, शरीर भी
चिंतित हो उठे
परिजन-स्वजन
फिर एक दिन
तय कर लिया
अलग होना
दोनों ने।
लगा, मिल गया
मार्ग
सुखी रहने का।
पिताजी ने पूछा
विश्व सुंदरी
आज बन गई है
विष-कन्या
किसके साथ रहकर
वाह, रे ईश्वर
जड दिया
मेरे ही गाल पर
उठा,
लगा दिया सिंदूर
फिर से
पत्नी के भाल पर।

गुलाब कोठारी

October 5, 2009

षोडशी-2

षोडषी अथवा स्वीट सिक्सटीन की अवधारणा इसलिए महत्वपूर्ण है कि जन्म के बाद प्रतिवर्ष एक-एक कला का पूर्ण विकास होता है। सोलह वर्ष में सभी सोलह कलाएं पूर्ण विकास को प्राप्त कर लेती हैं। एक और तथ्य महžवपूर्ण है कि इस षोडषी पुरूष में तीन पुरूष रहते हैं- अव्यय, अक्षर और क्षर। इसमें अव्यय आलम्बन है, किसी कार्य-कारण भाव में नहीं आता। अक्षर निमित्त कारण है। अक्षर पुरूष स्वयं समष्टि रू प है। उसमें से व्यष्टि भाव में जीव और जड प्रादुर्भूत होते हैं। अत: अक्षर पुरूष ईश्वर कहलाता है। स्वयं अव्यक्त है, अदृश्य रहता है। ये अतिसूक्ष्म तत्व जब घनभाव में आता है तब यही व्यक्त होकर क्षर पुरूष कहलाता है। विश्व क्षर रू प है। इसको ये अक्षर गतिमान रखता है। क्षर पदार्थ के स्वरू प से जुडा हुआ समवायी कारण है।

जगत की सत्तारू प प्रतिष्ठा के प्रतिष्ठाता ब्रम्हा हैं। यज्ञादिष्ठाता विष्णु हैं। अग्नि स्थानीय ईंधन इन्द्र हैं। अग्नि का कार्य वस्तु को पैना करके उसके अवयवों को तोडकर तीखा बना देना है। सोम पदार्थ को स्निग्ध करता है। विरल अवयवों को संकोचन करके घन बनाता है। अव्यय की पांच कलाएं आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण और वाक् आमोद, प्रमोद, ज्ञान, विज्ञान, चेतना, शक्ति, प्राणों एवं वाणी के नियामक पंचकोश के रू प में स्थित रहती हैं।
पिप्पलाद ऋषि ने आत्मा को षोडषी कहा है यानी यह सोलह कलाओं वाली है। ये कलाएं हैं- प्राण, श्रद्धा, पृथ्वी, आप, अग्नि, वायु, आकाश, इन्द्रिय, मन, अन्न, अन्न से उत्पन्न वीर्य, तप, मंत्र, लोक, नाम और कर्म। जैसे रथ के चक्र की नाभि में चारों ओर अरे जुडी रहती हैं वैसे ही इस पुरूष में ये 16 कलाएं चारों ओर ठहरी हुई हैं। ये कलाएं आत्मा में उत्पन्न होकर उसी के चारों ओर फैली हुई, उसी आत्मा में लीन हो जाती हैं। जैसे कई नदियां समुद्र में लीन होकर अपना नाम-रू प खो देती हैं वैसे ही पुरूष में लीन होने पर इन सोलह कलाओं के नाम-रू प भी नष्ट हो जाते हैं। केवल यह शुद्ध आत्मा ही रह जाता है।

आधुनिक पश्चिमी वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शरीर में भी प्रमुखत: सोलह तत्व हैं- आक्सीजन, हाइड्रोजन (यद्रुजन यानी बहती हुई), नाइट्रोजन (नक्तद्रुजन या स्याही), कार्बन (अंगार या कोयला), सल्फर (गंधक), फास्फोरस (पस्पर्श), सोडियम, पोटेशियम, कैलशियम, मैग्नीशियम, लीथियम, फ्लोरीन, क्लोरीन, आयोडीन, सिलीकॉन (शिलाकण) और आयरन यानी लौह तत्व। शरीर में अस्थि, मांस, मज्जा, रक्त, त्वचा, वसा, शुक्र आदि पदार्थ इन्हीं 16 तत्वों के आवाप (कुछ मिलाना) और उद्वाप (कुछ निकालना) से बनते हैं।

आत्मा के दो भेद हैं- ईश्वर प्रजापति रू प और जीव प्रजापति रू प। षोडष कला युक्त जीव प्रजापति रू प आत्मा में 18 व्यावहारिक आत्मा होती हैं। इनमें तीन वर्ग अमृतात्मा, ब्रम्हात्मा और शुक्रात्मा हैं। अमृत वर्ग की चार, ब्ा्रह्म वर्ग की पांच और शुक्रवर्ग की 9 आत्मा समझनी चाहिए। अमृतात्मा में परात्पर विवर्त का भाव अभयात्मा कहलाता है। अव्यय का आलम्बनात्मा, अक्षर का नियन्तात्मा और क्षर का भाव परिणाम्यात्मा कहलाता है। ये पुरूष आत्मा अमृतमय हैं।

इसके आगे ब्रम्हा के विकास में आत्मा का विवर्त प्राण, आप, वाक्, अन्न और अन्नाद के रू प में होता है। आत्मा के भाव प्राण का शांतात्मा, आप का महानात्मा, वाक् का विज्ञानात्मा, अन्न का प्रज्ञानात्मा और अन्नाद का आत्म भाव प्राणात्मा कहलाता है।

तीसरे वर्ग शुक्रात्मा में शरीरात्मा साधारण अग्नि रू प में है। हंसात्मा वायुरू प में है। दिव्यात्मा इन्द्र है जो वैश्वानर कहलाता है, अग्नि है। चौथा दिव्यात्मा ही, इन्द्र ही तैजसात्मा वायुरू प में है। पांचवां प्राज्ञ इन्द्र कर्मात्मा के रू प में है। छठा चिदाभास ज्योतिर्मय है। सातवां चिदात्मा साक्षात है। यही इष्टदेव कहलाता है। यह चेतना ज्ञानमय तत्व है, उसी को विभूति कहते हैं, ब्ा्रह्म भाव में है। फिर आठ और नवां शुक्रात्मा है- श्री और ऊर्क यानी ऊर्जा। श्री विड् भाव में और उर्जा क्षत्र भाव है।

कर्मरू प आत्मा वासनामय है। इस 16 कलाओं वाले कर्म पुरूष के 16 गुण सुश्रुत शारारीक में बताए गए हैं। ये सोलह गुण हैं-सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, बुद्धि, मन, संकल्प, विचारणा, स्मृति, विज्ञान, अध्यवसाय और विषय की उपलब्धि।

एक ही तत्व का 16 स्वरूप में बदलने का कार्य माया के द्वारा निष्पन्न होता है। माया का यह योग तीन प्रकार का होता है। इन्हें योग, बन्ध और विभूति कहते हैं। जहां भी रस (ब्रम्हा) अथवा अमृत की प्रधानता होती है, उसे विभूति संसर्ग कहते हैं। कर्म की प्रधानता होने पर यह बन्ध माना जाता है। विभूति और बन्ध की समता को योग कहते हैं। जहां दो के संयोग से तीसरा नया पैदा होता है और दोनों पुराने नहीं रहते, इसी का नाम बन्ध है। जल और वायु के संयोग होने पर न जल रहता है, न ही वायु। फेन बन जाता है।

तृण रूप घास खाने से गाय के शरीर में दूध बनता है। तृण दूध के भाव में बन्ध जाते हैं। गाय के शरीर की जठरागिA ने उन तृणों को दूध रूप में परिणत कर दिया। यह अगिA का विभूति सम्बन्ध है। इसी प्रकार आत्मा भिन्न-भिन्न विधाओं में भोक्ता बनता है। जो भोग्य पदार्थ आत्मा के लिए उपलब्ध होते हैं, वे वृत्तिता संसर्ग से होते हैं। ये भी अमृत एवं मृत्यु रूप तीन प्रकार के आसक्ति, उदार और समवाय रूप होते हैं। ये एक-दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं। परिवर्तन भी स्वाभाविक ही होता है। ब्रह्म के साथ जुडते ही बल/माया में असाधारणता आ जाती है। वायु की भिन्न-भिन्न गतिभाव के बाद भी आकाश तो निर्लेप ही रहता है। तीनों वृत्तिता संसर्ग कर्म सम्बद्ध आत्मा में कर्म रूप माया बल के कारण प्रवृत्त होते हैं।

अपने निज रूपेण रस रूप आत्मा और बल रूप शक्ति का एक रूप ही है। उन दोनों में भेद व्यवहार, रस के विभूति, बंध, योग सम्बन्ध से तथा बल के उदार, समवाय, आसक्ति संसर्ग से होता है। इसी कारण समस्त पदार्थो में भेद पैदा होता है। यह कैसे पैदा होता है और अन्त में कहां चला जाता है, यह नहीं जाना जा सकता। जो दिखाई पडे और जाना न जा सके उसी को संसार में माया कहते हैं। कार्य रूप में अचानक दिखाई पडे और उसका कारण समझ में नहीं आए। माया भी माया, महामाया और योग माया रूप में कार्य करती है।

रस और बल के परस्पर सम्बन्ध में जहां रस की प्रधानता हो, वहां तीन पुरूष (अव्यय, अक्षर, क्षर) का प्रादुर्भाव होता है। जहां बल या शक्ति की प्रधानता हो, वहां प्रकृति का प्रादुर्भाव होता है। पुरूष में मन-प्राण-वाक् मुख्य तत्व होते हैं। शक्ति स्वरूप में सत-रज-तम मुख्य तत्व रहते हैं। इनसे ही महत्, अहंकार और तन्मात्राएं पैदा होती हैं। इनमें एक-एक पुरूष का एक-एक शक्ति से सम्बन्ध रहता है। रस के व्यापक धर्म ज्योति, विधृति (धारण करना) और प्रतिष्ठा हैं। बल प्रधान शक्ति के तीन रूप हैं-अशनाया (भूख), विक्षेप और आवरण। प्रवाह रूप बल जब स्थिर-सा बन जाए, तब वह आवरण हो जाता है।

शैव शास्त्रों में जो माया का वर्णन है वह भी समान संकेत ही करता है। परमेश्वर की शक्ति को यहां स्वातं˜य शक्ति कहा है। इसके स्पन्दन पांच रूपों में होते रहते हैं। चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ये ही परम ईश्वर के सर्वकतृüत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व, और व्यापकत्व कहलाते हैं। परमेश्वर (अनुत्तर तत्व) इसी शक्ति पंचक के सहारे सृष्टि, स्थिति, संहार पिधान और अनुग्रह रूप कार्य हर क्षण करता रहता है। यही शक्ति पंचक आगे चलकर विद्या, कला, राग, काल और नियति रूप में बदल जाता है। माया तत्व के साथ मिलकर आत्मा का षट् कंचुक रूप आन्तरिक आवरण बनाता है। मोक्ष होने तक यह भी जन्म-जन्मान्तरों में आत्मा का अंग बना ही रहता है। देह, प्राण, पांच ज्ञानेन्द्रियों, पांच कर्मेन्द्रियो को बहिरंग आवरण या स्थूल शरीर कहते हैं। इस शरीर की आकृति, प्रकृति और अहंकृति षोडशी पुरूष के स्वरूप पर निर्भर करती है। सम्पूर्ण जगत यूं तो षोडशी है, किन्तु कर्म भेद के कारण भिन्नता लिए रहता है।

गुलाब कोठारी

October 1, 2009

वेदना के नश्तर

लता मंगेशकर का नाम स्वयं में एवरेस्ट शिखर है। गायकी का पर्यायवाची बन गई हैं। करोडों लोग जिसकी प्रशंसा करते नहीं थकते और ईष्र्या करने वाले भी इतने ही होंगे। उनके साक्षात्कार की एक पंक्ति ने आत्मा को झकझोर दिया। ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’। जीवन के 80 वर्ष पार करके, सफलता की हिमालय जैसी ऊंचाइयो को नाप लेने के बाद, आज उनके मुंह से निकली यह पंक्तियां नश्तर से भी गहरी चुभने वाली हैं। आम नारी के ह्वदय की वेदना, उसकी पीडा को व्यक्त करने वाली हैं। इनमें छिपे 80 वर्ष के न जाने कितने अनुभव देश की सभ्यता और संस्कृति को चांटे मार रहे हैं। यह वक्तव्य इस बात का भी प्रमाण है कि साठ साल की आजादी के बाद हमने क्या हासिल किया। कन्या शिक्षा, नारी शक्ति योजनाएं, आरक्षण और न जाने क्या-क्या बहाने ढूंढे, नारी के नाम पर शोषण के। हमारे देश के कर्णधारों को इस बात से कुछ शर्म आएगी, पता नहीं। और जब इनकी यह कहानी है तो साधारण महिला तो नर्क में ही जी रही होगी। दरिन्दों के बीच। मुझे तो यह भी लग रहा है कि राजस्थान के सिर पर जो कन्या भ्रूण हत्या का टीका लगा हुआ है, लताजी का कथन इसी का साक्षी है। एक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है, दूसरी सामाजिक।<br /><br />कल ही समाचार पढा था कि आठ माह में राज्य में महिलाओं के प्रति अपराध 18.5 प्रतिशत बढे हैं। बलात्कार भी बढे हैं। लगता है कि कोई आदमी किसी औरत को हंसते हुए देखना ही नहीं चाहता। उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि औरत के साथ धरती भी रोती है। संस्कृति और सभ्यता भी रोती है। वह चाहेगी तब तक ही आदमी हंस पाएगा।<br /><br />गहराई से देखें तो इसका कारण भी स्वयं स्त्री ही है। विश्व भर में। वह लडके की तरह जीना चाहती है। पत्नी और मां बनने की सीख अब नहीं लेती। उसका प्रभुत्व घर में जिन कारणों से रहा करता था, लुप्त हो गया। कहते हैं कि शरीर की पकड नौ साल, दिमाग की पकड दो साल। उसके बाद सुख कहां<br /><br />लताजी की वेदना में सामाजिक चिन्तन पर भी बडा प्रहार है। जिस प्रकार के परिवेश से लताजी गुजरीं, जिस प्रकार विवाह के संघर्ष में असफल हुई, ईष्र्याजन्य आरोपों से सदा घिरती रहीं, तब लगता है कि सुख को न धन से, न ही पद से खरीदा जा सकता है। वे छोटे परिवार में भी सुख से रह सकेंगी, यदि अगले जन्म में लडका बन पाई। शक्ति पूजा करने वाले देश को इससे बडा कौन सा अभिशाप लग सकता है सौ करोड की आबादी के देश में आधी दुनिया देश को जीने लायक ही नहीं मान रही। अपमान, संघर्ष और अपमान! जबकि देश की राष्ट्रपति स्वयं एक महिला हैं।<br /><br />गुलाब कोठारी

भावनात्मक विकास

 समाज की इकाई है—परिवार और परिवार की इकाई है—व्यक्ति। व्यक्ति अच्छे होंगे तो परिवार भी अच्छा होगा। समाज भी अच्छा होगा और राष्ट्र भी उन्नत होगा। इसीलिए परिवार को बच्चे का पहला स्कूल कहते हैं। बच्चा परिवार के साथ-साथ अपनी धरती की संस्कृति से जुड़ता है। परिवार में ही जीवन संघर्षो का सामना करना सीखता है। उसका भावनात्मक विकास होता है। ये घटक ही आगे चलकर उसके व्यक्तित्व को समाज में स्थापित करते हैं। भावना और वासना, ये मन की दो महत्वपूर्ण अवस्थाएं हैं। ज्ञान के द्वारा मन में जमे हुए संस्कार को भावना कहते हैं तथा कर्म के द्वारा मन में जमे हुए संस्कार को वासना कहते हैं। वासना को रोकने का विधान है जबकि भावना को बढ़ाने का विधान है। बच्चा परिवार में पांच-छ: साल की उम्र से ही सीखना शुरू कर देता है। अनुभव तो उसे पहले ही होने लग जाते हैं। वह उनको अलग ढंग से अभिव्यक्त करता है। उसका आस-पास का वातावरण सीमित ही होता है और विषय भी। यह उसके निजी विकास का काल है। जब बच्चा कुछ समझने लायक होता है तो दादा-दादी, नाना-नानी उसे कहानियां सुनाना शुरू कर देते हैं। बच्चा बड़े चाव से सुनता है। इन कहानियों का आधार लालित्य और माधुर्य होता है। जिस भावनात्मक वातावरण और स्नेह के साथ ये कहानियां कही जाती हैं, यही इनका महत्वपूर्ण पहलू है। किन्तु, आज इसको ही सबसे कम महत्व दिया जाता है। जबकि बच्चों में भावनात्मक विकास का आधार इसी उपक्रम से तैयार किया जा सकता है और वह भी इसी कच्ची उम्र में। इसी आधार पर बालक आगे मिलने वाले ज्ञान को ग्रहण करता है और अपने संस्कार अर्जित करता है। जिस बच्चे के पास यह भावनात्मक आधार नहीं है, वह जीवन के संघर्ष नहीं झेल सकता। पढ़ाई में अच्छा हो सकता है, बड़ा व्यवसायी या अधिकारी भी बन सकता है, किन्तु भावनात्मक संस्कार का धरातल उसका निर्बल ही रहेगा। पूरा पाश्चात्य समाज इसका ज्वलन्त उदाहरण है। आज शिक्षा ने युवकों को नौकरी में धकेलकर संयुक्त परिवार को छिन्न-भिन्न कर दिया है। बच्चे से उसके दादा-दादी और नाना-नानी छीन लिए। अब इतना समय और किसी के पास नहीं है। स्कूल में इस प्रकार के विषयों का स्थान ही नहीं रहा। वहां तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ही आकलन के आधार रह गए। घर पर “होम वर्क” के आगे मानो शिक्षा ही समाप्त हो गई। बच्चों को छोटे से घर में खेलने के लिए न तो स्थान उपलब्ध है, न ही दूसरे बच्चे। ले-देकर आज टेलीविजन का प्रवेश एक अध्यापक की तरह हो गया है। इसी के आधार पर आप परिवार को पहला स्कूल कह सकते हैं। यही तय करता है कि बच्चा क्या सीखेगा? बड़ा घाटा तो बच्चे का आधारहीन होना है। भावनात्मक दृष्टि के बिना व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण इसलिए नहीं होता कि जहां उसकी दृष्टि जानी चाहिए वहां जाती ही नहीं, क्योंकि भावनात्मक संस्कार जम ही नहीं पाए हैं और न सिखाए गए हैं। अच्छी नौकरी अथवा कमाई का अर्थ अच्छा व्यक्तित्व कभी नहीं हो सकता। इसका एक अन्य प्रभाव भी पड़ता है। भावनाएं व्यक्ति को जीवन-संचालन की दृष्टि देती हैं। उसके पिछले जन्म के संस्कारों के कारण भी भावनाओं के कुछ अंश उस व्यक्ति में आते हैं। भावनात्मक विकास होने पर वह अपने अच्छे-बुरे संस्कारों का आकलन करके जीवन की दिशा तय करता है। बुरे गुणों का बहिष्कार करता है। अपने व्यक्तित्व में नया निखार पैदा करता है। समाज और राष्ट्र के लिए एक स्तम्भ के रूप में तैयार हो जाता है। इसके विपरीत, भावनात्मक विकास के बिना उसके विचारों में विशेष परिवर्तन नहीं आ पाता। अच्छे-बुरे सभी तरह के विचारों का पोषण उसमें समान रूप से होता है। बुरे विचार उसके मन को प्रभावित करते हैं और अन्तत: शरीर में रोग रूप में प्रस्फुटित होते हैं। शरीर का ग्रंथि-स्त्राव केवल वासनाओं से ही चलता है। बुरे संस्कार धीरे-धीरे ऎसे रसायन पैदा करते हैं कि कालान्तर में बड़ा रोग जड़ें जमा लेता है। जिस प्रकार क्रोध, चिन्ता आदि से रोग होते हैं, उसी प्रकार भावनात्मक निर्बलता और वासनात्मक प्रबलता भी बड़े रोगों का निमित बनती हैं।

April 24, 2009

सबसे पहले देश

विधानसभा चुनाव की खुमारी अभी उतरी नहीं थी, कि लोकसभा चुनाव धमक पडे। सारे कामकाज ठप हो गए। महंगाई चुनावी चन्दे की चादर ओढकर फूले नहीं समा रही। चुनाव की गर्मी सभाओं के साथ उठती है और सभा समाप्ति के साथ ही उड जाती है। बडी सभाओं में तो स्थानीय लोगों के बजाये बाहरी लोगों के भाव बढ रहे हैं। हालात कमोबेश राजस्थान जैसे ही हैं, कुछ अच्छे ही रहेंगे।
गत विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में भाजपा को पुन: सरकार बनाने का जनादेश मिला था। लोकसभा की भी 29 में से 24 सीटें भाजपा की झोली में थीं। शिखर पर बैठने वाले के लिए ऊपर जाना संभव नहीं होता। चलना है तो नीचे आना ही पडता है। देता भी वही है जिसके पास होता है। इसी सिद्धांत के अनुसार यदि कुछ देना पडा तो भाजपा को ही देना पडेगा। कांग्रेस के पास केवल चार सीटें हैं, तो देगी क्या! उसे तो मिलना ही है। यही संघर्ष है- कांग्रेस अधिक से अधिक लेने का प्रयास कर रही है और भाजपा टूट को रोकने का।
कांग्रेस की संगठन क्षमता विधानसभा चुनावों के मुकाबले कुछ सुधरी भी है। कमलनाथ अपने क्षेत्र में अटक गए। हार गए तो नेतागिरी उठने का डर है। अर्जुन सिंह, राहुल सिंह का प्रभाव उठ गया है। दिग्विजय सिंह को प्रचार के लिए प्रेरित किया जान पडता है। पहली बार 19 अप्रेल को बाहर निकले हैं। सुरेश पचौरी जरूर एक बार पूरे प्रदेश का दौरा कर चुके हैं। आलाकमान की कृपा दृष्टि इन पर ही दिखाई दे रही है। राहुल गांधी ने चुनाव घोषणा से पहले ही दौरा शुरू कर दिया था। इनके सामने टिकटों के आवंटन की नाराजगी अभी भी कई क्षेत्रों में दिखाई दे रही है।
भाजपा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर भी अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर निकलने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। उमा भारती तो लगता है राजनीति छोड गई हैं। कहीं उनका नाम लेवा ही नÊार नहीं आया। उनके कार्यकर्ता भी जहां से आए थे, वहीं लौट गए। उनके मतदाता भी नई जगह तलाश करेंगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पूरी तरह जोश में दिखाई दे रहे हैं और आशान्वित भी हैं कि अधिकांश सीटों को रोकने में सफल रहेंगे।
भाजपा को एक झटका यह भी लगा कि उसकी एक मंत्री रंजना बघेल ने गंगूबाई को चांटा मारकर नेताओं के मुंह एक बार तो बंद कर ही दिए थे। उधर जाटव समाज में कांग्रेस विधायक माखन सिंह की हत्या से ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना क्षेत्र में भी कुछ नुकसान हो सकता है। इस क्षेत्र पर ज्योतिरादित्य की भी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष इन सीटों को (कम से कम भिण्ड और मुरैना को) तो कांग्रेस भी झोली में मानकर ही चल रहे हैं।
इस बार चुनाव में दोनों ही पार्टियों के पास कोई मुद्दा उभरकर सामने नहीं आया। इससे चुनाव परिणाम व्यक्ति की सामथ्र्य पर अधिक निर्भर करेंगे। चुनाव के शुरू के दौर में कांग्रेस ठण्डी थी। राजकुमार पटेल का नामांकन रद्द होने के बाद तो मानो उसे लकवा ही मार गया था। यहां तक बातें होने लगी थीं कि सोच समझकर मुख्यमंत्री ने दिग्विजय सिंह के साथ समझौता करके पर्चा गलत ही भरवाया था। नहीं तो नौ बार चुनाव लड चुके पटेल इतनी बडी भूल कैसे करते! सुषमा स्वराज के सामने विदिशा में कांग्रेस प्रत्याशी नहीं होने से कार्यकर्ताओं में चुनौती का भाव ही समाप्त हो गया। वे वोट बढाने में लगे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता प्रयास कर रहे हैं कि भाजपा की जीत को कैसे छोटा किया जाए।
मध्यप्रदेश में मतदान का प्रतिशत भी लगातार घट रहा है। आज भी शाम को कुछ युवा मतदाता क्रिकेट देखेंगे। गर्मी के तेवर भी कुछ बाधा बन सकते हैं। लोगों को फिर भी अपने अधिकार का विवेक सम्मत प्रयोग अनिवार्य रूप से करना ही चाहिए। हमारे सामने विडम्बना ही है कि एक ओर चुनाव आयोग जातिवाद को नकार रहा है, वहीं दूसरी ओर आरक्षण का आधार भी जातिवाद को ही बना रखा है। इसे भी तोडना है।
मध्यप्रदेश में इस बार भी भाजपा आगे तो रहेगी ही, किन्तु महाकौशल और विंध्य में कुछ परिवर्तन की हवा बनी है। ये क्षेत्र ही कुछ बदलाव लाएंगे। इनमें भी अधिकांश सीटें तो भाजपा के पास ही हैं। इनमें कितनी टूटेंगी और कितनी रहेंगी आज पहले चरण में तय हो जाएगा।
गुलाब कोठारी

April 27, 2009

कन्या-2

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

सृष्टि में केवल माया काम करती है। ब्राह् तो निष्काम रहता है। इच्छा करता है, कर्म नहीं करता। नर-नारी में केवल शरीर की भिन्नता है। मन, बुद्धि और आत्मा का स्वरूप भिन्न नहीं है। दोनों ही माया के द्वारा संचालित होते हैं। किन्तु समाज व्यवस्था में केवल नारी ही गतिमान है। वही माता-पिता का घर छोडकर जाती है। नर अपना स्थान नहीं छोडता। वह केवल बीज संग्राहक के रूप में रहता है।

विस्तार की कामना मन में रखकर जीता है। माया भाव पुरूष में भी है, किन्तु बुद्धि के अहंकार से दबा रहता है। नर शुक्र में उसकी सात पीढियों के अंश रहते हैं। उनको आठवीं पीढी तक पहुंचाना चाहता है। किन्तु इस शुक्र से केवल शरीर का ही निर्माण होता है। इस शरीर में सात पीढियों के कुछ कर्माश भी रहते हैं, जिनको आनुवांशिक कहा जाता है। यह अंश जीव में नहीं होते। वह स्वतंत्र रूप से आकर शरीर में रहता है। इसके साथ पिछले जन्मों के संस्कार आते हैं। कर्म-फल आते हैं। नर-नारी में मूल अन्तर बुद्धि की उष्णता और मन की चंचलता एवं शीतलता का होता है। माया की गतिशीलता का होता है। जीवन का सारा संचालन माया करती है। संरक्षण, पोषण माया करती है। जो लडका मां-बाप की कभी सुनता ही नहीं, शादी के अगले दिन ही बदला-बदला नजर आने लगता है। यह केवल कन्या की ही शक्ति है कि वह अपने पुरूष का स्वरूप निर्माण कर सके। उसको बदल पाना पुरूष के वश की बात नहीं है। उसे हर हाल में जीना आता है। अपमान सहकर चुप रहना भी आता है।

समय आने पर उसका हिसाब करना भी आता है। वानप्रस्थ तक आते-आते सारा घर परिवार उसके नियंत्रण में आ जाता है। सारे महिषासुर और रक्तबीज मर चुके होते हैं। महिषासुर क्रोध सूचक है, अहंकार की वजह से बढता है। रक्त बीज लोभ सूचक है। यह कला पुरूष रूप में कहीं नहीं देखी जा सकती।
माया सृष्टि कर्ता है। अत: निर्माण कला में पारंगत होती है। जीवन की सूक्ष्मता और व्यवहार को समझती है। उसकी एक ही कमजोरी होती है, उसका संकुचन भाव। पुरूष विस्तारवादी होता है। अग्नि का स्वभाव ही फैलना है। स्त्री का निर्माण उसके प्रारब्ध और संस्कारों पर आधारित होता है। सम्पूर्ण निर्माण में उसका प्रेम-वात्सल्य भरा रहता है। जिसे निर्माण कला सिखाई गई हो, वह तो अपनी मर्जी की आत्मा को आकर्षित कर लेती है। वैसा ही जीव उसके घर में प्रवेश करता है। जीव के आ जाने पर उसे संस्कारित करना, यह समझ पाना कि किस शरीर को छोडकर आया है, उसके माया भाव की पराकाष्ठा है। फिर प्रसव पूर्व उसे श्रेष्ठ मानव बना देना, अभिमन्यु की तरह तैयार कर देना उसी के बूते का काम है।

वह घडा बनाती है, उसे पकाकर समाज को सौंपती है। उसके दायित्व का बडा अंश यहां पूरा हो जाता है। वह पशु रूप मानव के बजाए आत्म-भाव से परिपूर्ण मानव का निर्माण करती है। यही उसके जीवन का मूल लक्ष्य रहता है। उसे अपनी संतान की क्षमताओं की जानकारी रहती है। जो कन्या समर्पण भाव से आई थी, स्त्रैण भाव से सृष्टि का निमित्त बनने को तैयार हुई, उसी ने क्षुधा रूप माया की तरह प्रवेश किया, पुरूष के जीवन में। क्षुधा को तृप्त किया, छाया बनी, शक्तियों की वृद्धि की। होता यह है कि अहंकार के कारण तृप्ति का स्थान तृष्णा ले लेती है।

कन्या के शरीर में भी सात पीढियों के अंश रहते हैं, किन्तु मातृ पक्ष के। मां-नानी-पडनानी आदि के। अत: कन्या का आदान-प्रदान भी मां या बहन से अघिक रहता है। अच्छे परिवारों में हर पीढी की नारी का स्त्रेह और वात्सल्य एकत्र होकर कन्या में आता है। स्वत: ही वह देवी तुल्य हो जाती है। प्राण को देवता कहते हैं। यह कन्या देवी रूप होती है। सोम प्राणों की पितर और अग्नि प्राणों की देव संज्ञा है। गुण तो पुरूष में भी होते हैं, किन्तु उसका अहंकार बडा होता है।

विवाह से पूर्व कन्या भावी जीवन के सपने बुनने लग जाती है। लडका ऎसा नहीं करता। उसे कुछ बदलने की जरूरत नहीं लगती। कन्या का तो रूपान्तरण हो जाता है। पति को पूर्णता प्रदान करती है। सौम्या है, अग्नि में आहूत होती है। तभी सृष्टि यज्ञ चलता है। यह प्रकृति ही है कि अग्नि-धर्मा पुरूष का शुक्र सोम प्रधान होता है और सौम्या का रज अग्नि प्रधान। तभी अग्नि में सोम आहूत होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शरीर से जब अग्नि (वैश्वानर) निकल जाता है, तब शरीर ही ठण्डा (सोम) पड जाता है। अग्नि-सोम रूपी इस सृष्टि यज्ञ में सोम सदा काम आ जाता है। सोम के अनुरूप ही सृष्टि का विकास होता है। जो कुछ स्वरूप बनता है, अग्नि रूप ही होता है। इसीलिए भारतीय दर्शन में कन्या के देवी भाव को संरक्षित किया गया है। जीवन के अन्त में यही भाव पुरूष को स्त्रैण गुणों से ओत-प्रोत करने में सफल हो सकता है। इसी कारण पुरूष आप्त काम हो सकता है। स्त्रैण पुरूष ही मानवता की सेवा कर सकता है। भक्ति मार्ग पर आगे बढ सकता है। उसका अहंकार गल जाता है। इससे बडा कार्य जीवन में क्या हो सकता है।

इसी के लिए पूरी उम्र पत्नी तप और उपासना करती है। पति की आयु मांगती है। इससे उसे अपने प्रयासों के लिए कुछ समय और मिल जाता है। पति के रहते वह अपना कार्य पूरा कर जाना चाहती है। सुहागिन जाना चाहती है। हालांकि उसका माया भाव का सृष्टि कारक अंश गृहस्थाश्रम के साथ ही छूट जाता है। आगे जीवन को समेटने का काल होता है। यह उसका दूसरा रूप होता है। शरीर वही है, भाव बदल जाते हैं। पति को भी निर्माण छोडकर निर्वाण की ओर प्रेरित करती है। अब पति उसकी इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकता।

समय ने करवट बदली है। सदा ही परिवर्तनशील है। हम अपनी जिन्दगी जीना भूल रहे हैं। अपना विकास, अपने गुणों का विकास नहीं करते हैं। हम झूठी नकल में पड गए हैं। ईष्र्या और स्पर्द्धा प्रवेश कर गई है हमारे जीवन में। हम किसी और की तरह जीना चाहते हैं। आंख मूंदकर। प्रकृति ने तो हर एक को अद्धितीय बनाया है। कोई दो एक जैसे नहीं बनाए। तब हम नकल करके भी दूसरे जैसा नहीं बन सकते। हर एक में ईश्वर के अंश भिन्न हैं। क्यों नहीं हम उन्हीं को ढूंढकर, उनका विकास करें। नकल करने में हम अपने आप से दूर होते जाते हैं।

स्पर्द्धा में हम एक दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। चाहे स्कूल में नम्बर लाने हों, या फिर नौकरी की बात हो। हम अपनी ही शक्तियों का विकास करेंगे तो दूसरों से आगे निकल ही जाएंगे। हमारा ध्यान दूसरों से हटकर स्वयं पर आ जाएगा। नहीं तो हमें मनुष्य जीवन का लाभ नहीं मिल पाएगा।

इसका एक पहलू कन्या की आज की अवधारणा से ही समझा जा सकता है। मां-बाप गर्व से कहने लगे हैं कि हमारे घर में लडके और लडकी में अन्तर नहीं है। बहुत अच्छी बात है। लेकिन इस नकल में लडकी को अच्छी पत्नी, अच्छी माता बनना अब कोई नहीं सिखाता। लडकी की मां ने भी उसे अभिमन्यु की तरह से संस्कार नहीं दिए। जैसा जीव शरीर में आया, वैसा ही समाज को सौंप दिया। पश्चिम की नकल कर रहे हैं। वहां मानव शरीर में क्या संस्कारित मानव जी रहा है! अथवा शरीर को पशुवत् भोगा जा रहा है। आज कोई कन्या पूजन की बात नहीं कहता। किन्तु उसे ससम्मान संस्कारित तो करना पडेगा। वरना वह अपने कुल को क्या पहचान देगी! कैसे समाज का निर्माण होगा!

वैसे भी आज के बच्चे अपनी शैली में जी रहे हैं। संस्कार शब्द जीवन पर लागू ही नहीं होता। जो कुछ संस्कार टी.वी. या इण्टरनेट से मिल जाते अथवा मित्र मण्डली भर देती है, वही जीवन का स्वरूप होता है। इसमें बाच्चा अकेला रहना सीखता है। पढाई और कैरियर की मार से दबा रहता है। उसे स्वजन, परिजन अथवा समाज की चिन्ता होती ही नहीं है। घर पर भी कोई मिलने आ जाए तो स्वयं मां-बाप टाल देते हैं। तब समर्पण तो क्या, दूसरों के लिए जीना भी असंभव बात होगी। अपने पेट के आगे कौन चिन्तन करने वाला है!

बराबरी की अवधारणा का एक और विकृत रूप हमने पश्चिम से ओढना शुरू कर दिया। लडके-लडकियो में स्पर्द्धा का भाव बढ गया। अब लडकियों को अपने भावनात्मक पोषण के बजाए बौद्धिक स्तर को उठाने की चिन्ता लग गई है। लडकों की तरह उष्णता का और अहंकार का मार्ग पकडने लगी हैं। अब वह किसी के भी आगे झुकने को तैयार नहीं होने वाली। विवाह के बाद भी दो बनकर ही जीएंगे। एक बनकर जीने की संभावना पश्चिम से तो सिमट चुकी। हमारे यहां अभी शुरूआत है। जब नारी शरीर भी नर जैसा व्यवहार करेगा, तब विपरीत ध्रुव के आकर्षण का प्रश्न स्वत: ही समाप्त हो जाएगा। शरीर की पकड उम्र भर नहीं रहती। उनको दूर होना ही पडेगा। विधाता भी टाल नहीं सकता। उनके इस भविष्य की जिम्मेदारी उनकी नहीं, मां-बाप की है। आंख मूंदकर नकल करना हमारा बुढापा खराब ही करेगा। आज के इस वातावरण में कन्या के स्वरूप की, उसकी शिक्षा-दीक्षा की नए सिरे से व्याख्या होनी चाहिए। वही किसी देश की संस्कृति का निर्माण करती है। यथार्थ के प्रति यदि हम आंखें मूंद लेंगे तो भविष्य हम पर कोडे बरसाएगा। पश्चिम की तरह यहां भी कन्या भोग की वस्तु बनकर रह जाएगी, मानव समाज संवदेनाओं से शून्य हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

May 5, 2009

विवाह-1

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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जब भी सिद्धान्तों को जीवन में उतारने की बात आती है, तब व्यवहार के कुछ न कुछ नियम बनाए जाते हैं। समय के साथ इन नियमों में इतना परिवर्तन आ जाता है कि सिद्धान्त दिखाई भी नहीं पडते। तब हम इनको रूढि मानने लग जाते हैं। व्यवहार में सिद्धान्त से ज्यादा रूढियों का महत्व अधिक होता है। इसका सबसे ज्वलन्त उदाहरण विवाह है। विवाह में कितनी तरह के रीति-रिवाज देखे जा सकते हैं। विश्व भर में, हर समाज में विवाह एक आवश्यक सामाजिक परम्परा है। हर देश और समाज में इसके विभिन्न रूप बन गए। विवाह की परम्पराओं का महत्व इतना अधिक हो गया कि व्यक्ति गौण हो गया। हर लडके-लडकी को यह मालूम है कि बडे होकर विवाह करना है। लडकी जानती है कि उसे लडके के साथ रहना है। यह सोच भी रूपान्तरित इतना हो गया कि विवाह का मूल भी भूल गए। सिद्धान्त पक्ष की चर्चा ही नहीं होती। मैंने अनेक लडकियों से यह प्रश्न किया है कि तुम विवाह की तैयारी तो कर रही हो, जानती भी हो कि विवाह करना भी है और लडके के साथ जाना है, पीहर छोडना है, अकेले जाना है, जो अब तक सीखा, उसमें से बहुत कुछ छोडना है, कुछ नया सीखकर जीना है, जीवन से समझौता भी करना है, पर यह सारा क्यों करना है क्या सोचकर तुम विवाह कर रही हो जीवन की कौनसी सार्थकता प्राप्त करना चाहती हो क्या परम्परा मानकर ही विवाह की तैयारी होती है। सब को करना पडता है, मुझे भी करना है। इस प्रश्न पर हर एक के चेहरे पर गंभीरता आते देखा। किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं गया था।
दोनो तरफ से “अच्छा खानदान” देखा जाता है, किन्तु खानदान की परिभाषा आज केवल धन से आंकी जाती है। संस्कारों की मांग लुप्त हो गई। वैभव की चमक के आगे सब छोटा हो गया। विवाह को इतना नकारात्मक धरातल दे दिया कि व्यापारिक लेन-देन में बदलकर रह गया। जीवन की पवित्रता का स्वरूप ही खो गया। लडकों की बोलियां लगने लग गई जैसे बिकाऊ माल हो। उन्हें निर्जीव पदार्थ मान लिया गया। लडकी के गुण भी महžवहीन हो गए। यह भी कोई अर्थ नहीं रखता कि वह मां-बाप को छोडकर आएगी। तलाक हो गया तो उसे ही वापिस लौटना पडेगा। वही इस घर को स्वरूप देगी। संतान को भी संस्कारवान बनाएगी। लडके को पूर्णता देगी। लडका तो उसके बिना ही स्वयं को परिपूर्ण मानकर चलता है। समर्पण नहीं चाहिए उसे।
हम कुछ पीछे चलते हैं, जब समाज व्यवस्था ही नहीं थी। तब क्या संतान पैदा नहीं होती थी विवाह शब्द पैदा ही नहीं हुआ था। विवाह और सारे सामाजिक सम्बन्ध विकसित समाज व्यवस्था के साथ पैदा हुए। पहले केवल प्रकृति थी। नर था, नारी थी। इनके आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक स्वरूप थे। केवल प्रारब्ध को भोगकर चले जाते थे। अन्य पशुओं की तरह।
जीवन में जितने भी परिवर्तन दिखाई पडते हैं, उनका मूल कारण भाषा है। शब्दावली है। सारे जीवन व्यवहार भाषा पर टिके हैं। भाषा ने ही ज्ञान का स्वरूप धारण किया। पुराने ज्ञान के आधार पर नया ज्ञान विकसित होता गया। इसी के साथ समाज व्यवस्था बदलती चली गई। इसी व्यवस्था में से विवाह संस्था का जन्म हुआ। मानव मन की चंचलता और व्यवहार की स्वच्छंदता को मर्यादित करने का सूत्रपात हुआ। सृष्टि के नियमों को मानव जीवन में लागू करने के लिए अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित हुए। फिर भी कोई समाज प्रारब्ध को रोक पाने में समर्थ नहीं हो सका। पिछले कर्मो के फल तो हर मानव को भोगने ही पडते हैं। विवाह संस्था में इसके परिणाम स्वरूप अनेक व्यवधान भी बने रहते हैं। मानव तो शरीर के स्वरूप का नाम है। जीव का कोई नाम-रूप नहीं होता। समाज के नियम-कायदों को वह आसानी से नहीं समझ सकता। उसे मानव बनाने की प्रक्रिया लम्बी भी है और जटिल भी। आज की विकसित समाज व्यवस्था में, विशेषकर विकसित देशों में तो यह प्रक्रिया ही लुप्त हो गई। उनकी जीवन शैली फिर से आदि मानव की तरह स्वच्छंद हो गई है। मानव देह रह गया, भीतर जीने वाला मानव नहीं बन पाता। इने-गिने दिखाई पडते हैं। निजी जीवन को यदि नजदीक से देखा जाए, तो स्पष्ट चित्र दिखाई दे जाएगा। विकास, सुविधाएं और समृद्धि तो है, किन्तु निजी जीवन में सभी त्रस्त हैं। मानवीय संवेदनाएं भोग तक आकर ठहर गई हैं। सभी एक दूसरे का उपभोग करना चाहते हैं। उसके बाद साथ रहने को भी तैयार नहीं। जिस तेजी से मिलते हैं, उसी तेजी से अलग भी हो जाते हैं। साथी बदलते जाते हैं। हर बार जीवन को नए सिरे से शुरू करते हैं और आधे रास्ते चलकर बिछुड जाते हैं। कहीं कोई दर्द नहीं होता। न किसी को संतानों की चिन्ता होती है। चिडिया के बच्चे के पंख आते ही उड जाता है। मां-बाप स्वतंत्र हो जाते हैं। वहां केवल भोग संस्कृति होती है। मानव सम्पूर्ण विकास के बाद फिर उधर ही अग्रसर हो रहा है। जब कि केवल मानव ही कर्म कर सकता है। अपना भाग्य बदलने की क्षमता रखता है। समृद्धि भाग्य या कर्म का लक्ष्य नहीं है। साधन मात्र है।
इस भोग संस्कृति को योग में बदलने और भविष्य निर्माण से जोडने के लिए केवल एक सूत्र चाहिए संकल्प। इस संकल्प का नाम ही विवाह पड गया। बिना संकल्प के विवाह का स्वरूप टिक ही नहीं सकता। संकल्प भी नर और नारी दोनों का। पूरक बनने के लिए हो, स्पर्द्धा करने के लिए नहीं। इस संकल्प के कारण ही नर-नारी में पति-पत्नी के भाव जाग्रत होते हैं। संकल्प टूटते ही फिर से नर और नारी बन जाते हैं।
बिना संस्कार के संकल्प करना भी संभव नहीं होता। संकल्प की दिशा तो संस्कार ही तय कर सकते हैं। मात्र संतान पैदा करने के लिए संकल्प की आवश्यकता नहीं होती। समय के साथ इन संस्कारों के क्षेत्रों का विकास भी हुआ। ज्ञान का, विज्ञान का विकास भी हुआ। संस्कारों की भी विस्तार से व्याख्याएं होने लगीं। संस्कार तो सदा ज्ञान के साथ रहे। शुद्ध विज्ञान, हर काल में, हर रूप में भौतिक विश्व का अंग ही रहा। ज्ञान और विज्ञान आज पूरक न होकर विरोधाभासी बन गए। ज्ञान भीतर चलता है, विज्ञान बाहर। सृष्टि के नियम दोनों पर एक जैसे लागू होते हैं। फिर भी इतना विरोधाभास आश्चर्यजनक ही है।
गुलाब कोठारी

May 8, 2009

मत चूके चौहान

चुनाव का चिडियाघर आज बन्द हो जाएगा। सब अपनी-अपनी बोलियां बोलकर चले गए। झेलना तो हमको है। हमारी भाषा में किसी ने कोई भी बात नहीं कही। एक-दूसरे को ही सुना गए। उनको सत्ता चाहिए, फिर हमारी कोई जरू रत नहीं, अगले पांच वर्ष तक। हम तक दस पैसे पहुंचे या पांच ये भी जबानी जमा खर्च की बातें हैं। उनकी तो लडाई बडे हिस्से पर हाथ मारने की है। लोकतंत्र की धज्जियां उडाने में किसी ने कसर नहीं छोडी। मुद्दों पर किसी ने बात ही नहीं की। गरीबी और बेरोजगारी जैसे मुद्दे तो किसी को याद भी नहीं आए। विकास की बात तो बहुत दूर की है। आतंकवाद को तो जैसे भूल ही गए। हां, प्रचार अभियान में अचानक सभी पार्टियों को एक-दूसरे की झोली में काला धन भरा हुआ जरू र दिखाई देने लगा।
राजस्थान का चुनाव प्रचार मूल रू प में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे पर ही निर्भर रहा। दोनों ने ही अपनी पार्टियों का प्रतिनिधित्व किया। इसमें भी कांग्रेस ने वसुंधरा को झालावाड में अटका कर अपना रास्ता काफी साफ कर दिया। इसी प्रकार भाजपा ने जसवंत सिंह और उनके पुत्र को साथ-साथ टिकट देकर अपनी लाचारी भी प्रकट की। गहलोत का प्रचार अभियान 125-150 बैठकों तक पहुंच गया। लाभ तो मिलेगा ही।
इस बार जातिगत समीकरण भी कुछ तो ठण्डे पडे हैं। विधानसभा चुनावों जितनी चर्चा इस बार केवल मीणा वर्ग में ही रही। किरोडी लाल ने मीणाओं का साथ देकर कांग्रेस के नमोनारायण को जिताने का आह्वान भी किया, वहीं भाजपा के श्याम शर्मा का प्रचार करने कोटा पहुंच गए। इधर गैर मीणा समुदाय ने मीणा जाति के प्रत्याशी को वोट न देने का मंतव्य जता करके सारा समीकरण बिगाड दिया। इससे दौसा के दोनों ही मुख्य पार्टियों के प्रत्याशी सकते में आ गए। जो भी हो जातीय आधार तो समाप्त होना चाहिए। और वंशवाद भी। हालांकि राहुल गांधी ने कहा है कि परिवारवाद अलोकतांत्रिक है, फिर भी इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने देश में जितने सामंतों को सत्ता सौंपी है, वह तो इसके विपरीत ही है। बडे लोगों को करना चाहिए, कहने का काम तो छोटे लोग करते रहेंगे। आज दोनों ही दल देश को नेतृत्व देने की स्थिति में नहीं हैं। इसके बारे में पूरे प्रचार के दौरान किसी ने कुछ चिन्ता नहीं जताई। सरकारें भी तभी काम करती हैं, जब देश किसी नेता की आवाज के पीछे चलता है। इस चुनाव में भी कोई नेता उभरकर नहीं आया।
आज मतदान करना है। लोकतंत्र के उत्सव का दिन है। आज का संकल्प है कि हमें “मतदान” करके ही अन्य कार्य करने हैं। कोई भी छूट न जाए। राजस्थान वैसे ही देश में सदा से पीछे रहा है। औसत मतदान में। उसमें भी महिलाएं और भी पीछे हैं। पिछले चुनाव में भी महिलाएं पुरूष मतदाताओं से 11 प्रतिशत पीछे थीं। इस बार तो कुछ आगे निकलने की बात हो। युवा पीढी भी जुड गई है अब तो। और हां! मतदान भी करना है और विवेक पूर्वक भी करना है। प्रत्याशी जनता के बीच का हो, जमीन से जुडा हो, शिक्षित और अनुभवी हो। अपराधी प्रवृत्ति का तो बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। न ही किसी जाति के वोट मांगने वाला ही हो। उसे तो अन्य लोग सीधा नकार सकते हैं। आपका वोट इस देश का भविष्य बनाता है। फिर किसी पर दोष डालकर भी क्या मिल जाएगा। आपका प्रत्याशी किसके साथ मिलकर काम करेगा, यह भी समझना है। ईश्वर हम सबको सद्बुद्धि दे, चुनाव शान्तिपूर्वक सम्पन्न हों और देश विकास के पथ पर आगे बढ सके, यही प्रार्थना है।
गुलाब कोठारी

May 11, 2009

विवाह-2

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भारतीय दर्शन में विवाह संस्था को सृष्टि का मूल आधार भी माना है और प्रति सृष्टि (विलय या मोक्ष) का आधार भी माना है। हमारे अध्यात्म के चारों अंगों-शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा के लिए पुरूषार्थ की व्यवस्था दी है। मोक्ष आत्मा का विषय है। कामना (काम) मन का क्षेत्र है। अर्थ शरीर चलाने की आवश्यकता है और धर्म हमारी बुद्धि को प्रज्ञा रूप देने का कार्य करता है। ये सारे कार्य भी जीवन के भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रूपों में किए जाते हैं। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों ही आश्रम केवल गृहस्थाश्रम पर टिके रहते हैं। अत: जीवन का मूल केन्द्र भी गृहस्थाश्रम को ही माना है। उसी के अनुरूप विवाह संस्था का स्वरूप निर्माण हुआ है। हर समाज की इकाई यह गृहस्थ ही नजर आएंगे। समाज के लिए व्यक्तित्व निर्माण भी यहीं होता है। इसी से किसी भी राष्ट्र का स्वरूप बनता है।

इस दृष्टि से भारतीय दर्शन के कुछ सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक है कर्म और कर्मफल का सिद्धान्त। दूसरा है पुनर्जन्म का सिद्धान्त। तीसरी है मोक्ष की अवधारणा। व्यक्ति को प्रकृति का अंग और ईश्वर का अंश मानकर उसका निरूपण किया गया है। व्यक्ति को पिता, पितामह, प्रपिता आदि से जोडकर भी देखा गया है और माता, मातामह और प्रमाता आदि से भी। सृष्टि युगल तत्व के सिद्धान्त पर आगे बढती है, अत: इसे ही जीवन की पूर्णता का दर्जा प्राप्त है। विवाह का मूल कहा है। सम्पूर्ण पितृलोक और देवलोक की संस्थाएं इस पर टिकी हुई हैं। ब्रह्म और माया के स्वरूप को भी विवाह संस्था के माध्यम से ही समझने का मार्ग बताया गया है। यही कामना से आप्तकाम होने का मार्ग भी है। माया ही कामना या क्षुधा रूप होकर जीवन को आगे बढाने वाली शक्ति है। गृहस्थाश्रम माया के प्रवेश के साथ जुडता है और वानप्रस्थ के साथ इसके द्वार बन्द हो जाते हैं। भोग संस्कृति में व्यक्ति पूरी उम्र गृहस्थ रहता है। उसके पास काम-अर्थ के अतिरिक्त कोई चिंतन ही नहीं होता। वह पूरी उम्र जड शरीर से ही बंधा रहता है। चेतना की दिशा में उसकी यात्रा शुरू ही नहीं होती। जबकि जीवन का पहला सोपान ही चेतना को जाग्रत करना है। उसको संस्कारित करके मानवीय धरातल पर लाना होता है। तब आत्मा जीने लगता है-इस शरीर में।

विवाह नर-नारी के संकल्पित योग का नाम है। प्रारब्ध ही इसका निमित्त बनता है। जीवन की दिशा यह संकल्प तय करता है। दोनों का संकल्प, दोनों के सपने और पुरूषार्थ में सामंजस्य रहता है। दोनों अपने में स्वतंत्र जीव भी हैं और दोनों के प्रारब्ध भी अलग-अलग होते हैं। नए कर्म साथ-साथ किए जाते हैं। दोनों के फल साथ-साथ भोगने पडते हैं। ज्ञान की आवश्यकता इन परिस्थतियों को समझने में ही होती है। वैवाहिक सम्बन्धों में प्रारब्ध भी परिलक्षित होता है और वर्तमान कर्म भी। दोनों को ही ध्यान में रखकर व्यवहार करना पडेगा। इसके बिना साथ रहना केवल सामाजिक लाचारी बन जाती है।

मूल रूप से विवाह के दो मुख्य पहलू होते हैं। प्रेम को पैदा करना, पल्लवित करना और इसका आगे विस्तार करना। इसी के साथ दाम्पत्य रति (स्त्रेह, वात्सल्य, श्रद्धा और प्रेम) का विकास इस तरह से करना कि यह देव रति में बदल सके। अर्थ और काम को धर्म से मर्यादित करते हुए, कामनाओं की पूर्ति करके, निष्काम हो सकें। गृहस्थाश्रम सृष्टि विस्तार का काल है। अच्छी, योख्य, सुस्कृत संतान के लिए प्रार्थना करें, ताकि उसी तरह का जीव हमारी ओर आकृष्ट हो सके। जीव के प्रवेश के बाद उसके स्वभाव को समझकर उसे मानव रूप में माता संस्कारित करे। बाद में माता-पिता और गुरू उसे व्यावहारिक और आध्यात्मिक ज्ञान में आगे बढाएं। इसके अभाव में जीवन का सुरक्षा भाव छूट जाता है। तब व्यक्ति देने के स्वभाव को ग्रहण ही नहीं कर सकता। वह सदा ही लेने की सोचता रहता है। उसका विस्तार ही संभव नहीं है। उसकी मानसिकता संकुचित होकर रह जाती है।

भक्ति भाव व्यक्ति सोच समझकर पैदा करता है। पहले अपना इष्ट तय करता है। फिर धीरे-धीरे उसकी भक्ति में डूबता चला जाता है। प्रेम का भी यही स्वरूप है। यह भी होता नहीं है, किया जाता है। नित्य अभ्यास और संकल्प के द्वारा एकाकार हो जाता है। अपने आप उठने वाला प्रेम का ज्वार स्थाई भाव में टिक पाना कठिन है। वहां संकल्प उतना दृढ पूरी उम्र नहीं रहता। उस कामना को समझने के लिए पश्चिम के बडे देशों की ओर देखना होगा। जहां विवाह सम्बन्ध अपेक्षाओं पर ही आधारित रहते हैं। अहंकार का टकराव नित्य रहता है। समर्पण की तो कोई सोच भी नहीं सकता। इसका कारण है वहां की जीवन शैली में अधिदेव (प्राण) की अवधारणा का अभाव। वहां शरीर है, बुद्धि है बस! शरीर जड पदार्थ है। इसका भोग भी जड पदार्थ की तरह किया जाता है। एक निश्चित ढांचे में जीवन चलता है। इसमें जीवन कहां ठहर सकता है। जीवन में तो नित नया होता रहता है। सम्बन्धों के विच्छेद का किसी को खेद कहां होता है। वे अपने पैरों पर खडे रहने को सक्षम होते हैं। अत: साथी के छूटने की उतनी चिन्ता क्यों करें! इसीलिए वहां पर विवाह संस्था जर्जर होती जान पड रही है। साथ रह लेंगे, किन्तु शादी नहीं करेगे।
इसका एक कारण यह भी है कि वहां लडके-लडकी की शिक्षा एक-सी हो गई। लडकी भी लडकों जैसे ही जी रही है। लडका बनकर। न उसे पत्नी बनने की चिन्ता, न मां बनने की। न ही संस्कारों जैसे शब्द से उसका परिचय है। पूरा समाज ही लडकों जैसा व्यवहार करने लग गया। लडकी होकर लडकी जैसे जीने को कोई तैयार नहीं। एकांगी हो गया। कुदरत का इतना बडा अपमान ही वहां के नारी क्रन्दन का मूल है। हम भी उधर ही जाने में प्रसन्नता/गर्व का अनुभव करते हैं। अत: जीव जिस योनि से मां के पेट में आता है, वैसा ही मनुष्य रूप लेकर पैदा हो जाता है। उम्र भर शरीर का उपभोग भी उसी तरह करता चला जाता है।

पति-पत्नी दोनों बौद्धिक धरातल पर जीते हैं। पत्नी का भावनात्मक स्वरूप विच्छिन्न हो रहा है। मन में संवेदना का स्तर गिर चुका है। बच्चों के प्रति भी वैसा मोह नहीं दिखाई देता। ममता, करूणा, वात्सल्य जैसे भावों का अभाव बढता जा रहा है। लडकी के शरीर में लडके की बुद्धि कार्य करती है। दोनों का अहंकार झुकने को तैयार नहीं होता। शरीर की पकड छूटते ही अहंकार हावी हो जाता है और झट से अलग हो जाते हैं। अगले विवाहों में शरीर की पकड क्रमश: कम होती ही जाती है। वैसे भी दो लडके एक साथ कितने साल पति-पत्नी जैसे रह सकते हैं! एक को गर्म दूसरे को नरम रहना ही पडेगा। सुख के साथ दुख मे भी मिल बैठकर पार चलना होगा। इस माहौल में न तो पुरूषार्थ का धर्म दिखाई देता है और न ही दाम्पत्य रति का विकास। चेतना का धरातल तो शून्य प्राय: होता है। कैसे कोई स्वयं को सृष्टि का अंग मान सकता है या किसी की मर्यादा में जीना स्वीकार कर सकता है।

विवाह संस्था के कारण कामना का संसार आगे बढता है। दाम्पत्य रति से कामना तृप्त होती है। पितृ और देव संस्थाओं का पोषण करते हुए दोनों आप्तकाम होकर शान्तानन्द में विहार करते हैं। यही मोक्ष है। संकल्प ही मार्ग है और विवाह ही इसका निमित्त बनता है।

गुलाब कोठारी

May 13, 2009

दलों का दलदल

देश के लोकसभा चुनावों का आज अन्तिम चरण है। कल से दिल्ली में नेताओं की मण्डी शुरू हो जाएगी। मतदाता सारे घटनाक्रम को मूक दर्शक बनता देखता रहेगा। ये सब वे ही लोग होंगे जो मतदाता द्वारा अथवा उसके नाम से चुने जाकर दिल्ली पहुंचते रहे हैं। जो कुछ परिणाम आएंगे, उन्हें देखकर मतदाता के मन पर जो कुठाराघात होगा उसका अनुमान कौन कर पाएगा नेता तो हर्गिज नहीं कर सकेंगे।
इस देश में चुनाव, दल, मतदान जैसे शब्दों के द्वारा कुछ नियम कानून भी बने हुए हैं, किन्तु उनकी पालना करने की बात कौन करता है हमारा तो देश ही आश्वासनों के सहारे चल रहा है।
हमारे देश में आज सात राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं और 39 प्रान्तीय दल हैं। इनकी भी परिभाषा बनी हुई है। प्रान्तीय दलों की शर्त यह है कि वह राज्य की राजनीति में पांच साल से सक्रिय हो और पिछली विधानसभा के चुनाव में उसके पास चार प्रतिशत सीटें हों। या फिर पार्टी को पिछले विधानसभा चुनावों में कुल मतदान का छह प्रतिशत हिस्सा मिला हो। एक बार सदस्य बनने के बाद यदि सदस्य किसी अन्य दल से जुडता है, तो उसको मिले मत मूल पार्टी के ही माने जाएंगे। हमने यह भी देखा है कि सरकार नियम-कानून तो बनाती है, लेकिन उसमें गलियां भी छोड देती है। जैसे एक तरफ पांच वर्ष की सक्रियता की बाध्यता और दूसरी तरफ सीधे चुनाव में कूद कर छह प्रतिशत वोट हासिल करने
की छूट।
इससे भी बडे आश्चर्य की बात है राष्ट्रीय दलों के बारे में। एक राष्ट्रीय दल का कम से कम चार राज्यों में मतदान का छह प्रतिशत हिस्सा होना चाहिए। तभी उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा दिया जा सकता है। क्या किसी ने इस दृष्टि से इन आंकडों को देखा है “हाथ कंगन को आरसी क्या” की तर्ज पर पिछले दो चुनाव के आंकडे देखने से भी सारी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। लगभग सभी प्रादेशिक दलों को चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लडने की स्वीकृति किस आधार पर दे रखी है स्वाभाविक ही है कि ऎसी स्थिति में मतदाता भ्रमित होता है। जातिवादी या निहित स्वार्थी ठेकेदार पार्टियां बनाकर मैदान में उतर जाते हैं। मोल-भाव और दबाव का बाजार गर्म होता है। ऎसे में मतदाता का रूझान चुनावों के लिए घटेगा ही।
प्रादेशिक और राष्ट्रीय पार्टियों की भेद रेखा भी आज दिखाई नहीं दे रही। सभी प्रमुख प्रादेशिक पार्टियां लोकसभा के लिए भी चुनाव लडने को स्वतंत्र हैं। यदि उनका अस्तित्व अन्य तीन राज्यों में है ही नहीं, तो उन्हें राष्ट्रीय दलों की हैसियत क्यों मिल जानी चाहिए यही तो एक भेद है दोनों के बीच। इस भेद को जाने-अनजाने मिटा देना ही वह कारण है कि इतने सारे दलों के प्रत्याशी लोकसभा में पहुंच जाते हैं। तब कैसे जनता किसी एक दल को बहुमत दे सकेगी। इससे तो बहुमत की सरकार बनने का रास्ता ही सदा के लिए बन्द कर दिया। हर सरकार गठबन्धन की ही बनेगी। बेशक देश का संविधान हर नागरिक को चुनाव लडने की आजादी देता है। लेकिन इस अधिकार का विवेकपूर्ण उपयोग होना चाहिए। तभी राजनीति शुद्ध हो सकेगी, मोल-भाव के रास्ते बन्द होंगे।
आज जितनी पार्टियों के प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचेंगे, उनमें कितने प्रत्याशी गैर राष्ट्रीय दलों से होंगे और वे देश के लिए कितने व्यापक दृष्टिकोण से कार्य कर पाएंगे! आज हर केन्द्रीय मंत्री अपने राज्य के लिए काम करके चला जाता है। राष्ट्र के प्रति समग्र दृष्टिकोण कहां से पैदा होगा देश में चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय, दो सक्षम संस्थाएं हैं, जिन्हें ऎसे मुद्दों पर तुरन्त निर्णय देने चाहिए, ताकि देश की बागडोर सक्षम हाथों में ही सुनिश्चित रह सके। वैसे चुनाव आयोग तो अपनी गलती मानने वाला नहीं है। कानून ही कुछ करे, तब है।
गुलाब कोठारी

May 14, 2009

नेतृत्वविहीन चुनाव

लो, चुनाव भी हो गए हैं। अब क्या होगा खरीद-बेच का समय आएगा। मोल-तोल होंगे। यह सारा इस बात पर भी निर्भर करेगा कि बढत किस पार्टी को मिलती है। मोल भी खरीददार देखकर ही बताया जाता है। फिर राष्ट्रपति का रूख क्या कहता है, वह भी महत्वपूर्ण है। वह बडे गठबन्धन को भी बुला सकती हैं और बडी पार्टी को भी। उनके बुलावे के बाद भाव-ताव और बदल जाएंगे।
किसी भी दल को राष्ट्रपति द्वारा बडे दल के रूप में स्वीकृत करने के समय चुनाव पूर्व का गठबन्धन समझौता महत्वपूर्ण होता है। इस बार कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और झामुमो से सीमित गठबन्धन करके देशभर में अपने ही प्रत्याशी खडे किए हैं। इससे कांग्रेस को अपनी सही शक्ति का अनुमान भी हो जाएगा। कांग्रेस का ही एक खेमा राहुल गांधी को विपक्ष में बिठाकर प्रतिष्ठित कराना भी चाहता है। इससे मध्यावधि चुनाव की भी सम्भावना बढ जाएगी। मायावती के साथ एनडीए आसानी से पांच साल नहीं खींच पाएगा। तब राहुल के प्रधानमंत्री बनने के अवसर होंगे।
चुनावों में दोनों ही दल कमजोर साबित हुए। दोनों में ही नेतृत्व का अभाव रहा। इसी कारण मतदाता भी उदासीन दिखाई दे रहा था। हालात यहां तक हो गए कि कई प्रदेशों में तो मतदान आधा भी नहीं हुआ। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि लोगों के मन में लोकतंत्र के प्रति सम्मान कम हो गया है! हमने देखा है कि कहीं विरोधी पार्टी के मतदाताओं को धमकियां दी जाती हैं, तो कहीं मदिरापान कराया जाता है। कहीं जीतने पर उपहार देने के लिए टोकन बांटे जाते हैं। गोलियां तक चलाने से नहीं चूकते लोग। यही रह गया हमारे लोकतंत्र का यथार्थ रू प। यही हमारी साठ साल की उपलब्धि है। ऎसे चुनाव तो वैध भी नहीं माने जाने चाहिए। नेताओं को क्या फर्क पडता है! उन्हें कुर्सी के अलावा कुछ नहीं दिखाई पडता। जो रास्ते में आता जान पडे उससे तो गाली-गलौच कर बैठते हैं। संतुलन खो देते हैं। अब जो खरीद-फरोख्त होगी, तब पीछे रहने वाले कैसे विष उगलेंगे, सामने आ जाएगा। सारे नेताओं को तो कुर्सियां मिल नहीं पाएंगी। चुनावों में सार्वजनिक रूप से गालियां देने वाले भी तलुए चाटेंगे और प्रशस्ति गान करते दिखाई देंगे। जोड-तोडकर भानुमति का कुनबा बनेगा। वही हमारा भविष्य तय करेंगे। शायद अगले चुनावों में नई पीढी कुछ क्रांतिकारी परिणाम दिला सके।
सरकार बनाने का निमंत्रण वैसे तो तयशुदा नियमों के तहत ही दिया जाता है, फिर भी राष्ट्रपति का स्वविवेक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अटलजी को तत्कालीन राष्ट्रपति ने बडे दल के रूप में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। वहीं राष्ट्रपति के.आर. नारायण ने सबसे बडे गठबन्धन को आमंत्रित किया था। वर्तमान राष्ट्रपति का नजरिया समय आने पर सामने आएगा। वर्तमान स्थिति में यह तो तय है कि कांग्रेस और भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा। ज्यादा सीटें मिलने का दावा भी दोनों ही दल कर रहे हैं। दोनों के बीच अन्तर भी बहुत बडा रहने वाला नहीं है। कौन दल किन-किन पार्टियों के साथ गठबन्धन करता है और संख्या में भी आगे निकलता है, उसी पर निर्णय ठहरेगा।
सरकार किसी की भी बने, मुख्य प्रश्न यह है कि कौन पार्टी आगे बढकर देश को नेता देती है। सरकार चलाना नेतृत्व नहीं है। देश जिसके पीछे चलने को तैयार रहे, वैसा नेता होना चाहिए। अभी दो बडे नेताओं पर तो जूते फेंके जा चुके हैं। जब तक देश में कोई नेता नहीं उभरेगा, देश आगे नहीं बढेगा। यह दायित्व भी दोनों ही मुख्य दलों का है।
गुलाब कोठारी

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May 18, 2009

विवाह-3

जीवन की पूर्णता का मूल आधार ही विवाह को माना गया है। इसके बिना पूर्ण पुरूष (ब्रrा) से मिल पाना लगभग असंभव माना गया है। अथवा इसके लिए एक से अधिक जन्मों तक अभ्यास करना पडेगा। इसका कारण प्रकृति का संचालन है। हमारी उत्पत्ति भी इन्हीं नियमों के अन्तर्गत होती है। प्रकृति के नियम जड-चेतन सभी वर्गो पर समान रूप से लागू होते हैं। इनकी जानकारी होते ही जीवन की अनेक गुत्थियां हल हो जाती हैं। भारतीय दर्शन में विवाह को एक सामाजिक रिवाज नहीं माना गया। इसको सम्पूर्ण संवत्सर का अंग मानकर विवाह संस्कार का निरूपण किया गया है। नर-नारी को एक ही सांवत्सरिक आत्मा का अंश माना गया है। भूतात्मा के रूप में इनका सहज समन्वय विवाह कहा गया है। इसको दो आत्माओं का मिलन कहा है। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं। कहा भी है-

1. पतिरेव गुरू: स्त्रीणाम्।
2. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते।

मानव का भी एक विकास क्रम रहा है। मानव को मनु का पुत्र कहा गया है। मनु विश्व की मूल प्रतिष्ठा का नित्य तत्व है। सम्पूर्ण सृष्टि ही मनु की संतान होती है, किन्तु मानव में मनु स्वतंत्र केन्द्र लक्षण के रूप में प्रतिष्ठित रहता है। परिपूर्णता स्पष्ट है। सृष्टि में तीन स्थूल पिण्ड हैं-सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी। चौथा भाव अव्यक्त रहता है- प्राण रूप में। चारों की समन्वित अवस्था मानव रूप लेती है। भू-पिण्ड से शरीर का निर्माण होता है। चन्द्रमा से मन का और सूर्य से बुद्धि का। अव्यक्त अंश मनु है-आत्म रूप है। जिनमें इन्द्रियों का विकास रहता है, वे चेतन कहलाते हैं। बाकी अन्य जड की श्रेणी में आते हैं।

केवल भू-पिण्ड से पत्थर आदि जड पदार्थो का निर्माण होता है। इसमें चन्द्र और सूर्य के अंश जुडने पर उसी मात्रा में मन और बुद्धि का विकास होता है। कृमि, कीट, पक्षी और पशुओं में। चन्द्रमा के प्रभाव के आठ सर्ग होते हैं। सूर्य के 33 सर्ग। इनके साथ-साथ जहां आत्मभाव का भी विकास हो वहां आत्मनिष्ठ मानव बनता है। जहां शरीर, मन, बुद्धि तीनों ही आत्मभाव से समन्वित रहते हैं। इन चारों के व्यवस्थित स्वरूप का नाम ही मानवता है। इस व्यवस्था के खण्डित होते ही मानव आक्रामक होने लगता है। एक वेद वाक्य है-

“न वै दैवा अतिक्रामन्ति, न पितर:, न पशव:,
नासुरा:। मनुष्या एवै के अतिक्रामन्ति।”

इसका सार यह है कि मानव के अलावा कोई भी प्राणी, देव आदि प्रकृति की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता।
हमारा प्राकृतिक स्वरूप क्या है। हम पार्थिव प्राणी हैं- पशु रूप हैं। जो पंच पाश से बंधा हो, उसे पशु कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ही पांच पाश हैं। हमारी पृथ्वी के मध्य में विषवत् रेखा या भूमध्य रेखा है।

इसके एक ओर 240 तक कर्क रेखा तथा दूसरी ओर मकर रेखा है। इन 480 के परिसर का क्रान्तिवृत्त ही हमारा संवत्सर कहलाता है। इसी को यज्ञाकाश कहते हैं। इसी में सूर्य और चन्द्रमा का भ्रमण होता है। इसमें दिन वाले आधे भाग का अधिपति सूर्य और रात्रिरूपी आधे आकाश का अधिपति चन्द्रमा होता है। सूर्य के अगिA प्रधान 240 भाग से मानव का (नर का) स्वरूप निर्माण होता है और चन्द्रमा के सौम्य आकाश के 240 से नारी के स्वरूप का विकास होता है। जिस प्रकार संवत्सर में सूर्य पति भाव और चन्द्रमा पत्नी भाव है, वही दाम्पत्य रूप-सम्बन्ध नर-नारी का होता है। एक ही प्रजापति दो सौर-चान्द्र रूपों में परिणत होते हुए प्रजा के उत्पादन में समर्थ बनें। दोनों ही अकेले अपूर्ण होते हैं। दाल की तरह एक भाग होते हैं। दोनों मिलकर सृष्टि यज्ञ के लिए पूर्णता ग्रहण करते हैं। शास्त्र कहते हैं-

“संवतसरो वै यज्ञ:, यज्ञो वै पुरूष:, पुरूषो वै यज्ञ:।”
जब नर-नारी एक-दूसरे के सम्मुख खडे होते हैं तब मेरूदण्ड ही भू-मध्य रेखा होता है। पूर्णवृत्त बन जाता है। दोनों की 24-24 पसलियां 480 के संवत्सर को पूर्णता देते हैं। जीवन का लक्ष्य चूंकि पुरूषार्थ है-मोक्ष है। उसके लिए पहले सांवत्सरिक पूर्णता प्राप्त करना पहली अनिवार्यता है। इसमें तत्व चिन्तन निष्ठा के माध्यम से आत्मरत बने रहना मानव की परिपूर्णता है। दाम्पत्य जीवन में विश्वास, विकासात्मक अगिA तत्व रूप में पुरूष से अनुगत रहता है और श्रद्धा, संकोचात्मक स्त्रेह तत्व रूप सौम्या स्त्री से अनुप्राणित रहता है। सोममयी श्रद्धा शक्ति तत्व है, स्त्री भाव है। अगिAमय विकास रूद्र/ शिव तत्व है। दोनों के सम-समन्वय से ही दोनों के स्वरूप की रक्षा संभव है। जहां भी समन्वय खण्डित हुआ, अतिक्रमण करने लगते हैं। हमारे यहां “सहधर्म चरताम्” को आदर्श कहा है। पूर्ण मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण नहीं करता।

इस दाम्पत्य भाव के कारण ही मन में स्त्रेह रूप तरल भाव रस पैदा होता है। इस रस प्रवाह वृत्ति का नाम ही प्रेम है। चूंकि सभी प्रवाह पंाच रूप में गति करते हैं, अत: प्रेम के प्रवाह की भी पांच ही गतियां होती हैं। ऊपर से नीचे, बडों का छोटों के प्रति वात्सल्य कहलाता है। नीचे से ऊपर, बडों के प्रति श्रद्धा रूप होता है। बराबरी में स्त्रेह रूप। जड पदार्थो के प्रति लगाव को “काम” कहते हैं। दाम्पत्य जीवन में इन चारों भावों का सम्मिश्रण होता है। इसको “रति” कहा गया है। यह दाम्पत्य रति ही कालान्तर में आत्मरति का रूप लेती है। पुरूषार्थ सिद्धि करती है।

समय के साथ ये सारे ही सिद्धान्त एक-एक करके लुप्त होते जा रहे हैं। शरीर मन-बुद्धि और आत्मा के समन्वय का विखण्डन होने लगा है। किसी भी परिस्थिति में मानव स्वयं को सुखी नहीं पाता। स्त्री भाव को आत्म बुद्धि साक्षिणी कहा है। आज सहकामचारिणी बनती जा रही है। कहीं-कहीं तो विनोद का, रंजन का विषय बन गई है। तब बलिष्ठ, महिष्ठ और यशस्वी संतान कैसे पैदा होंगीक् स्व. मोतीलाल शास्त्री ने लिखा है कि आज तो मर्यादाओं के अतिक्रमण को ही पौरूष मान लिया है। कल क्या होगाक् इसके उत्तर में स्व. शास्त्री लिखते हैं- “आज जैसे विधि-विधान निर्मित हो रहे हैं, इनसे कालान्तर में नारीत्व सर्वथा ही अभिभूत (परास्त) हो जाएगा। मानव का स्वरूप भी, मानवत्व भी विस्मृत हो जाएगा।”

गुलाब कोठारी

आशा की किरण

लोकसभा चुनाव के परिणामों ने मतदाता की परिपक्वता पर मुहर लगा दी है। अब कोई भी राजनीतिक दल मतदाता के साथ खिलवाड नहीं कर सकेगा। यह मान लेने का समय भी अब नहीं रहा कि मतदाता उदासीन दिखाई देते हुए भी चौकस नहीं हैं। चुनाव परिणाम यूं तो अनेक पहलुओं की स्थिति बखान कर रहे हैं, फिर भी दो-तीन बातें मुख्य तौर पर उभरी हैं। मतदाता ने किसी एक दल को, कांग्रेस को, ही बहुमत देने की ओर कदम उठाया है। ताकि कांग्रेस को अपना घोषणा पत्र निर्विघ्न रू प से लागू करने का अवसर मिल सके।
पिछले पांच वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री भी अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस की नीति के अनुरू प निर्णय नहीं कर सका। हर बार कोई न कोई सहयोगी ही कांटे बिछा देता था। मतदाता ने इस बार उन कांटों को भी बुहार दिया। जो आपराधिक तत्व सत्ता पर काबिज हो गए थे और सत्ता को अपनी मुट्ठी में लेकर चल रहे थे, उनको बडा सबक सिखा दिया।
देश के मानचित्र पर आपराधिक तत्वों का विकास और जमावडा सर्वाधिक उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में होने लगा है। इसके लिए जिम्मेदार वहां के क्षेत्रीय दल ही रहे हैं। मतदाता ने उन दलों को इस बार पटखनी दे दी और विकास की डोर विश्वसनीय पार्टी के हाथों सौंप दी। समाजवादी पार्टी, लोकजन शक्ति पार्टी, राजद एवं वाम दलों पर कडा प्रहार करके लोकतंत्र की लाज बचा ली। इसके लिए मतदाता को नमन! अपराधियों के बीच बैठकर इतना साहस दिखाना कम बात नहीं है। मतदाता ने भाजपा को भी बडा झटका दिया है। कर्मठ और विवेकशील माने जाने वाले दल ने पिछले दस वर्ष में अपनी छवि खराब ही की है। आज भाजपा के अधिकांश नेता अपने अहंकार के कारण यथार्थ को स्वीकार ही नहीं करते। वाणी का संयम भी खो बैठे। आचरण में भी भारी गिरावट आई है। इन सब पर भी धन का दाग गहरा लगा हुआ है (अनेक पर)। अटलजी का काल भी देखा, यूपीए की जीत के बाद भाजपा की बौखलाहट देखी और इस बार उन्हें अनियंत्रित होते हुए भी देखा। देश एक पार्टी का शासन तो चाहता है, किन्तु ऎसा सत्ता का मद भी नहीं चाहता, जैसा कि आज भाजपा में आ गया है। भाजपा को अपने आचरण पर चिंतन करना चाहिए।
तीसरा और चौथा मोर्चा किन दलों ने बनाया है, यह भी मतदाता के जेहन में रहा है और उन क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय स्तर पर निष्क्रिय करने का भी प्रयास किया है। उनको अपनी सीमा बताने का कार्य भी काफी हद तक इन चुनावों में हुआ है। बचा-खुचा अगले चुनाव में नई पीढी कर दिखाएगी। इस दृष्टि से ऎसे क्षेत्रीय दलों को मर्यादित एवं लोकहित का व्यवहार भी सीख लेना चाहिए।
कुल मिलाकर एक परिपक्व परिणाम सामने आया है। पिछले कार्य और भावी दृष्टि का प्रभाव भी इनमें झलकता है। उम्मीद करनी चाहिए कि नई सरकार देशहित के और जनजीवन के मुद्दों को प्राथमिकता देती रहेगी।
गुलाब कोठारी

May 19, 2009

भटकती भाजपा

इस बार लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की वैसी ही स्थिति उभरकर सामने आई, जैसी कि पिछले लोकसभा चुनाव में आई थी। शायनिंग इण्डिया का नारा अंधेरे में दबकर रह गया था। अपनी इतनी बडी हार से भाजपा में बौखलाहट का बडा वातावरण भी दिखाई दिया। इस बार भी दावे तो आसमान से नीचे ही नहीं उतरे, किन्तु भाजपा चारों खाने चित्त हो गई। लालजी ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि यदि मैं पी.एम. नहीं बना तो घर लौट जाऊंगा। न पी.एम. ही बने, न घर ही लौटे। भाजपा की यह सबसे बडी भूल साबित हुई कि उनको इतना पहले से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस सम्मान को पचा सकना उनके लिए असंभव हो गया। इस पूरे काल में उनके तेवर भी प्रधानमंत्री जैसे ही रहे। अन्तत: जनता ने ही उनके नेतृत्व को नकार दिया। चुनाव प्रचार के दौरान ही एक और समझदार नेता ने अपने पिटारे से मोदी का नाम छोड दिया। इसका एक अर्थ यह था भाजपा के एक धडे को भी आडवाणी का नेतृत्व स्वीकार नहीं है और वह भी ऎन चुनाव के पहले। भाजपा का इससे बडा नुकसान तो कांग्रेस ने भी नहीं किया। इस घोषणा से नरेन्द्र मोदी भी फुफकारने लग गए। सभी नेताओं की वाणी से विष उगला जा रहा था। इसका परिणाम भी वही होना था। भाजपा के सहयोगी दलों ने भी मोदी को नकार दिया।
दिल्ली के गढ में भाजपा का एक संतरी भी नहीं बचा। उत्तराखण्ड में भी भाजपा को बैरंग लौटना पडा। राजस्थान में अकाल पड गया। मात्र चार सीटों पर संतोष करना पडा। चुनाव प्रचार में यहां भी बयानबाजी का बडा दौर चला था। गुलाब चन्द कटारिया की रथ यात्रा आगे बढती गई और पीछे-पीछे भाजपा की चादर सिमटती चली गई। पहले ही दिन से उदयपुर की पांच सीटें कांग्रेस को जाती दिखाई दे रही थीं, राजसमन्द को छोडकर। भाजपा के लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। राजस्थान में हम इन चुनावों के आंकडों को पिछले चुनाव के आंकडों से मिलाएं तो पता चल जाएगा कि भाजपा का मतदाता उदासीन होता जा रहा है। सन् 2003 में विधानसभा और सन् 2008 के विधानसभा में कांग्रेस के पक्ष का मतदान मात्र 1 प्रतिशत बढा था, जबकि भाजपा के पक्ष में लगभग 5 प्रतिशत मतदाता घटे थे। सन् 2004 के और सन् 2009 के लोकसभा चुनाव कहानी को और आगे ले गए। कांग्रेस के पक्ष में 5.75 प्रतिशत वोट बढे, किन्तु भाजपा के पक्ष में टूट 12.44 प्रतिशत की हुई। शेष मतदाता वोट डालने नहीं आए।
कांग्रेस के हारे हुए विधायक सी.पी. जोशी और लालचन्द कटारिया सांसद चुने गए, जबकि भाजपा के जीते हुए विधायक घनश्याम तिवाडी, किरण माहेश्वरी और राव राजेन्द्र सिंह चुनाव हार गए। एक बात और भी है कि गांवों में रोजगार गारण्टी योजना का प्रभाव भी दिखाई पडा। भाजपा की कई योजनाएं लागू ही नहीं हो पाई।
किसी की नहीं मानना भी भाजपा के लिए शान की बात हो गई है। चाहे राजनाथ सिंह हो, चाहे आडवाणी, सुषमा स्वराज या वसुन्धरा राजे। इनके लिए तो सही उतना ही है जो इनको सही लगता है। इस पर भी जातिवाद का भूत भीतर इतना उतर गया है कि लोगों को राष्ट्रवाद छोटा सा जान पडता है। लोग अपनी-अपनी जाति के बाहर नेतृत्व देने को ही तैयार नहीं है। प्रचार के दौरान भाजपा की छवि गिरती चली गई और किसी के भी कान खडे नहीं हुए। भ्रष्टाचार और अपराधियों को शरण देने में भी किसी पार्टी से पीछे नहीं रही। आज भी भाजपा अपनी साम्प्रदायिक छवि से उबर नहीं पाई है। नई पीढी का मतदाता शान्ति चाहता है।
राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या हो, इस पर वह सोचे। आज भाजपा से न कार्यकर्ता संतुष्ट है, न ही देश। भाजपा ही देश की दूसरी बडी राजनीतिक पार्टी भी है। हर बार इसी तरह मार खानी हो तो इसकी मर्जी, किन्तु कुछ करने लायक बनना है तो पार्टी का पुनर्गठन एवं नीतियों का आकलन करना होगा। सभी पुराने चेहरों को सलाहकार का दर्जा देकर पीछे की सीट पर बिठा देना चाहिए। कांग्रेस में भी ऎसे ही लोग “घुण” का कार्य कर रहे हैं। वहां तो नीचे पोल ही पोल है। भाजपा में तो ऎसा नहीं है। केवल अहंकार है।
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि दो बडे दलों में से एक पटरी से उतर गया है। वरना तीसरे मोर्चे की जरूरत ही देश को नहीं पडती। सब जानते हैं कि तीसरा और चौथा मोर्चा किन लोगों का गठबन्धन है और देश को क्या दे सकता है। भाजपा में यदि आवश्यक सुधार नहीं हुआ तो ये लोग ही लोकतंत्र के नायक होंगे।
गुलाब कोठारी

May 25, 2009

धन्य-धन्य भागीदारी

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आपको याद होगा कि ठीक एक साल पहले हम कुछ सपने लेकर मध्यप्रदेश आए थे। एक वर्ष में वो सपने सच हुए। मध्यप्रदेश के लिए हम अपने हुए। और यह सारा हुआ ज्ञान और कर्म के सहारे। लोगों में आस्था का भाव पैदा कर पाए। हमारे अनुरोध पर लोग तपती दोपहर में “अमृतम् जलम्” के लिए श्रमदान करते रहे और आज तक कर रहे हैं। हमारे भी कोई पिछले पुण्य ही होंगे, जिनके कारण इतना आशीर्वाद मिला। यहां तक कि माननीय मुख्यमंत्री ने भी “अमृतम् जलम्” के जरिए अपना जन्मदिन मनाया।
यह जो पत्रिका आपके हाथ में है, वह तो पत्रिका का शरीर है। जो पढकर समझ रहे हैं, वह बुद्धि क्षेत्र का ज्ञान है। जिसे आप जीवन के साथ जुडा हुआ अनुभव करते हैं, वह पत्रिका की आत्मा है। केवल इसी का सम्बन्ध आपकी आत्मा से बना हुआ है। शरीर को पशु कहते हैं। इसका दुबला या मोटा होना अर्थहीन है। इसको आत्मा ही चलाता है। इसीलिए हमने पत्रिका को आत्मा का अखबार बनाना ही उचित समझा ताकि ज्ञान को प्रकाशित होने का अवसर मिल सके।

पिछले एक वर्ष के छोटे-से काल में जो वातावरण पत्रिका ने बनाया, आप सब उसके साक्षी हैं। पत्रिका ने हर पाठक के दिल को छुआ है। उसकी जिन्दगी के पास खडा रहने का प्रयास किया है। तभी लोगों ने हमारी बात में आस्था जताते हुए कडी धूप में श्रमदान करने का संकल्प किया और इतना बडा कार्य कर दिखाया। आत्मा के बुलावे पर आत्मा दौडी। धूप में पसीना बहाकर भी आनन्द की अनुभूति प्राप्त की।

इसी एक साल में हमने लोकतंत्र के दो महाकुंभ भी देखे। विधानसभा और लोकसभा के आम चुनाव। पत्रिका अपने आप पर चौथा पाया होने का गर्व करता है। बाजारू माल की तरह पत्रिका को कोई खरीद नहीं पाया। न ही पत्रिका ने किसी को भ्रमित किया। “जागो जनमत” और “प्रतिबद्धता पत्र” जैसे अभियान यहां के पाठकों को पहली बार देखने को मिले। हमारे आकलन आगे-से-आगे खरे उतरे और हर दृष्टि से निष्पक्ष भी रहे। दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दलों ने भी मुक्त कण्ठ से रिपोर्टिग और आकलन की प्रशंसा की।
पूरे वर्षभर पत्रिका सचाई उजागर करने के लिए चर्चा में रहा। सामाजिक मुद्दों पर तो सरकार ने भी तुरंत कार्रवाई कर दिखाई। व्यापार के साथ-साथ सामाजिक नेतृत्व का भी बोध बरकरार रहा। इसी का परिणाम रहा कि भोपाल में फिर से गंगा-जमुनी संस्कृति की लहरें उठने लगीं।

पंजाबी, सिंधी, मुसलमान आदि अल्पसंख्यकों ने तो पत्रिका के सम्मान में समारोह आयोजित किए। लोगों के इस जुडाव को देखकर ही शायद मुख्यमंत्री ने भोपाल की सभा में कहा था-”अकेली सरकार विकास नहीं कर सकती। समाज साथ होना जरूरी है। जल संरक्षण अभियान मे पत्रिका साथ है तो कुछ भी मुश्किल नहीं।”
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने तो एक से अधिक बार फोन करके पत्रिका को खरी-खरी समीक्षा के लिए बधाइयां दीं। उनको विश्वास ही नहीं था कि कोई अखबार इतना निष्पक्ष भी हो सकता है, कि पूरी तस्वीर आइने की तरह दिखा दे।

पत्रिका चूंकि पाठक को ही सब कुछ मानता है, अत: इसकी सामग्री की गुणवत्ता, मौलिकता और इसका सांस्कृतिक धरातल अपना एक मूल स्वरूप लिए रहता है। पत्रिका मूल लेखन और मूल्यपरक सामग्री को ही प्राथमिकता देता है। नकल नहीं करता। इसीलिए पाठकों के जीवन का अनिवार्य अंग बन जाता है। पत्रिका एवं अन्य अखबारों के पाठकों में यह वैचारिक अन्तर देखा जा सकता है। पत्रिका ने शिक्षा में छूट रही मानवीय संवेदनाओं को लोक शिक्षण के रूप में एक मशाल बनकर प्रयोग किया है।

अभी पत्रिका का यह पहला साल ही है और मध्यप्रदेश का बडा हिस्सा सामने भी है। हम आपको विश्वास दिला सकते हैं कि पत्रिका की पत्रकारिता का लोगों को अनुसरण करना होगा। नई पीढी तो बहुत जागरूक है। घटिया सामग्री पढकर स्वयं को अपमानित नहीं करेगी। पत्रिका की तरह हर अखबार को पहले पाठक के दिल से जुडना पडेगा, फिर धन से। इस दृष्टि से मध्यप्रदेश में भी एक नए युग की शुरूआत ही हुई है। इसका सभी ने ह्वदय से स्वागत भी किया है। पत्रिका के एजेण्ट और वितरकों का उत्साह इसका प्रमाण है। विज्ञापनदाता भी मानने लगा है कि अच्छे अखबार की साख ही माल को चोटी पर पहुंचा सकती है।

व्यापारिक क्षेत्र के लोगों को एक बात पर अवश्य चिन्तन करना चाहिए कि किस कारण से भोपाल और इन्दौर क्षेत्र के लाखों पाठकों ने दशकों से आ रहे अपने अखबारों को पढना बन्द कर दिया। और वह भी तब, जब कि पत्रिका के केवल दो संस्करण-भोपाल और इन्दौर ही शुरू हुए हैं। इसी में भविष्य की तस्वीर है।
विज्ञापन को पढ लेना ही काफी नहीं है, उसका प्रभाव मानस परिवर्तन में भी दिखना चाहिए। साख अच्छी हो तो अखबार भी बिकता है और विज्ञापनदाता का माल भी। वितरकों को तो राजस्थान का दौरा कर लेना चाहिए। सारा कुछ समझ में आ जाएगा।

पत्रिका ने एक साल में जो कुछ कर दिखाया है उसकी तो स्पर्द्धी अखबार भी नकल करते हैं। चाहे पुस्तक मेला हो, अमृतम् जलम् हो या फिर पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था। इसका एक ही अर्थ है-व्यापार में भले ही वे स्पर्द्धी हैं, किन्तु हमारे अच्छे कार्यो की सराहना वे भी करते हैं, और हमारा साथ देते हैं। हम तो उनके भी आभारी हैं।
पत्रिका अपनी कार्यशैली से भी सोते हुओं में जाग्रत रहने वाला है, यह उसने एक साल में यहां आकर भी सिद्ध कर दिया है। पत्रिका भोपाल की आवाज बन चुका है और इन्दौर की भी। बाकी क्षेत्र भी दूर नहीं हैं। आप लोगों का आशीर्वाद चाहिए। आप हमारे हाथ मजबूत रखें, हम आपके। भोपाल के ही बशीर बद्र साहिब का एक शेर है-

“तुम्हारे शहर के सारे दिये तो सो गए लेकिन,
हवा से पूछना दहलीज पर ये कौन जलता है।”
यही पत्रिका है।
आइए! ज्ञान की इस रोशनी में मिलकर एक नया प्रदेश बनाएं। बच्चों के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करें। आप और हम कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढते जाएं। ईश्वर भी खुद साथ हो जाएगा।
नमस्कार!

गुलाब कोठारी

May 24, 2009

विवाह-4

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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पथ्वी के सभी जीवों को पशु कहा जाता है। हमारी पृथ्वी की तरह सभी लोकों को भी पृथ्वी संज्ञा दी गई है। अत: सभी लोेकों में भी पशु ही रहते हैं। चाहे असंज्ञ हो, अन्त: संज्ञ हो, या फिर ससंज्ञ हो। मनुष्य की भी पशु संज्ञा है। प्रकृति के प्राणों में ऋषि, पितर, देव, गंधर्व प्राणों के बाद पशु प्राण आते हैं। ऋषि, पितर और देव प्राणों के कारण हमारे तीन ऋण बनते हैं। मानव जीवन का लक्ष्य है धर्मानुकूल अर्थ और काम के सहारे मोक्ष प्राप्ति। आ#काम हो जाना। मानव-रूप पशु की मोक्ष तक की यात्रा कोई साधारण घटना नहीं हो सकती। पशु को तो वैसे भी भोग योनि माना है।

अज्ञानवश मनुष्य भी भोग को ही प्रधान कर्म मानकर जीने लगता है। उसके कर्म में विद्या का अंश अल्प होता है। जीवन को दो ही तत्व चलाते हैं-विद्या और अविद्या। धर्म-ज्ञान-वैराख्य-ऎश्वर्य विद्या कहलाते हैं। अधर्म, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश को अविद्या कहते हैं। विद्या से बुद्धि प्रभावित होती है। अविद्या मन के प्रवाह से जुडती है। मनमानी करती है। विद्याभाव से ही मन पर अंकुश लगाया जाता है। पशु के पास अंकुश लगाने की क्षमता नहीं होती। वह तो प्रवाह पतित हो जाता है। मानव के पास यह क्षमता होती है।

इस भू पिण्ड पर औषधि, वनस्पति, कीट, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि सभी शरीर रहते हैं। सभी का अपना-अपना जीवन स्वतंत्र भी होता है और एक दूसरे पर निर्भर भी। ये सारे शरीर भू-पिण्ड के नभ्य (नाभि या केन्द्र) के द्वारा आकृष्ट भिन्न-भिन्न प्राणों से ही बनते हैं। अत: इन्हें पार्थिव या पृथ्वी के पशु कहा जाता है। जब तक इनका पृथ्वी केन्द्र से आदान-प्रदान रहता है, तब तक ही इनका जीवन रहता है। पृथ्वी के नष्ट होने पर भी ये सारे नष्ट हो जाते हैं।

पशु की एक अन्य व्याख्या यह भी है कि जो प्राणी पंच पाश से बंधा हो, वह पशु है। ये पांच पाश अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष और अभिनिवेश हैं। अज्ञान को अविद्या कहते हैं। ज्ञान को विद्या कहा है। एकोज्ञानं ज्ञानम् के अनुसार जिसको यह समझ में आ जाए कि सब प्राणियों में एक ही सत्ता रहती है, उसे ज्ञानी कहा जाता है।

पृथ्वी पिण्ड का पोषण करने वाले भी पशु कहे जाते हैं। अत: सभी असंज्ञ, ससंज्ञ और अन्त: संज्ञ पशु कहलाते हैं। सभी पृथ्वी के उपकरण हैं। जैसे मन, बुद्धि और शरीर आत्मा के उपकरण हैं। जो स्थान घेरते हैं, सीमायुक्त होते हैं, वे भी पशु हैं। अत: जीवों के अतिरिक्त अन्न, जल और अख्नि भी पशु हैं। लेकिन जिस जल और अख्नि से पृथ्वी का निर्माण होता है, वह पशु नहीं हैं। उनको प्राण पद कहते हैं। सभी पशु पृथ्वी की प्राण शक्ति के आधार पर स्थिरता पाते हैं। अन्न का अर्थ है-जिसको पाकर पिण्ड अपने स्वरूप में बना रहता है। शरीर, मन, बुद्धि जैसे उपकरणों से। सूर्य-परमेष्ठी आदि मण्डलों से जो रस पृथ्वी पर आते हैं, वे ही पशु रूप ग्रहण करते हैं। अन्त में जब पृथ्वी के मूल स्वरूप में जुड जाते हैं, तब इनका पशु भाव समाप्त हो जाता है। वर्षा का जल, नदी, तालाब का जल पशु रूप है। लकडी में छिपी हुई अख्नि पशु रूप है। पिण्ड शरीरों पर दिखाई देने वाला अख्नि भी पशु है। इसी प्रकार प्राणों के आधार हर लोक के अपने-अपने पशु होते हैं। प्राण के साथ मन और वाक् भी सदा जुडे रहते हैं। अविनाभाव होते हैं।

ये वाक् भी चार प्रकार की होती है। पृथ्वी की वाक् कारणभूत अग्नि में और जहां तक पृथ्वी दिखाई पडती है, उस रथन्तर साम में रहती है। अंतरिक्ष वाक् वायुमण्डल में, वाम देव्य साम में रहती है। सूर्य की वाक् केन्द्रस्थ इन्द्र में और सूर्य के वृहत साम में रहती है। इसमें अन्य सभी वाक् समाहित रहती हैं। चौथी वाक् लोक के सभी पशुओं में रहती है। इसके दो रूप होते हैं। प्राण रूप या प्राण गर्भिता वाक् रूप। एक को चित्य और दूसरी को चितेनिधेय कहते हैं। एक मत्र्य रूप, दूसरा अमृत रूप। पिण्ड रूप मत्र्य वाक् है। पिण्ड की स्थिति को बनाए रखने वाला चितेनिधेय कहलाता है। यह केन्द्रगत प्राण ही अगिA-सोम यज्ञ द्वारा पिण्ड को बनाता है। फिर उसी पर आरूढ हो जाता है। वही चारों और फैलता है। यह रस रूप यजु: है, पिण्ड भाग ऋक्। जहां तक पिण्ड दिखाई दे, वह साम कहा जाता है।

तीनों लोकों में अग्नि-वायु-आदित्य को अमृत कहा है। पृथ्वी अन्तरिक्ष द्यु लोक मत्र्य पिण्ड हैं। इनको लोक-मूर्ति-ऋक् भी कहते हैं। इनसे हमारी इन्द्रियों के विषय बनते हैं। रस रूप गंध आदि। साम बहिर्मण्डल कहलाते हैं। इनसे ही हमारी इन्द्रियों का सम्बन्ध बनता है। जो सदा दूसरों पर आश्रित रहते हैं, उनको भी पशु कहते हैं। इस प्रकार एक ही वाक् चार प्रकार से प्रकट होकर अन्न को प्रकट करती है। सूक्ष्म अवस्था की वाक् ही स्थूल अवस्था में अन्न कहलाती है। चौथा रूप ही स्थूल होता है। यही पशुभाव होता है। हम भी एक-दूसरे का अन्न बने रहते हैं।

पशु में भी अन्य प्राणियों की तरह वीर्य रहता है। ब्राह्, क्षत्र या विड वीर्य। चूंकि पशु की भी स्वतंत्र आत्मा होती है, अत: निर्वीर्य नहीं हो सकता। अल्पवीर्य कहलाता है। सूर्य-चन्द्र-पृथ्वी जैसे लोकों का आत्मा पूर्ण इन्द्र प्राण से बनता है। अत: इनकी पूर्ण संज्ञा है। पशु आत्मा अपूर्ण होता है। इनको पैदा करने वाले रस को केन्द्र प्राण एक ही दिशा में फेंकता है। अलग-अलग दिशा में अलग पशु पैदा होते हैं। आधे इन्द्र प्राण से उत्पन्न होने वाला पशु अर्धेन्द्र कहलाता है। इसमें जो रस सूर्य मण्डल की ओर फेंका जाता है, उससे आगAेय पुरूष और जो रस चान्द्र की सौम्य दिशा में जाता है, उससे स्त्री शरीर का निर्माण होता है। हर पशु एक भाग में बलवान रहता है। दूसरा भाग निर्बल होता है। वृक्ष ऊपर बढता है, नीचे नहीं। चेतन प्राणियों का शरीर नाभि से ऊपर-नीचे (लम्बा) होता है। दोनों पक्षों में नहीं बढता। स्त्री-पुरूष दोनों भाव ही अर्धेन्द्र होते हैं। अत: इनको पूर्णता की खोज रहती है।

यह भी तथ्य है कि अकेला प्राणी रमण नहीं कर सकता। ब्राह् भी चाह रहा था-एकोहं बहुस्याम। यह विनोद भाव गूढ में भी रहता है और अतिज्ञानी में भी (गूढ रूप से)। सभी पशु जीवात्मा अपूर्ण होते हैं। इच्छा का अभाव पूर्णता है। इसी प्रकार अपूर्ण कोई सृष्टि पैदा नहीं कर सकता। नया आत्मा आकृष्ट पूर्ण से ही होता है। अत: दो मिलकर पूर्ण बनते हैं। तब सृष्टि होती है। जाया प्राप्त करके पूर्ण होने के लिए विवाह किया जाता है। बिना पत्नी के पुरूष यज्ञ का अधिकारी नहीं होता। पूर्ण से सम्बन्ध बनाने के पहले स्वयं को पूर्ण बनना पडता है। यही मूल सिद्धान्त है। यज्ञ का फल भी तभी पूर्ण रूप में प्राप्त होगा। उसका आधे में समावेश नहीं हो सकता। विवाह एक संकल्प होता है। मन को एक निश्चित स्वरूप में मर्यादित करता है। संकल्प के टूट जाने पर व्यक्ति विकल्प तलाश करने लग जाता है।

जो इन्द्र प्राण पशु शरीर में रहता है, उसको “मनु” कहते हैं। सम्पूर्ण जगत का शासक, अणु से भी अणु, कान्तियुक्त, स्वप्न-सुषुप्ति में भी कार्य करने वाला, स्वपA में होने वाले ज्ञान से अनुमान करने योख्य जो प्राण रूप पुरूष है, सब भूतों का जो पर तत्व है, वह मनु है। चार मण्डल, स#लोक और 14 भुवनों के अपने-अपने मनु हैं। मनु और यम को सूर्य पुत्र कहा है। मनु को इस लोक का शासक कहा जाता है। यम को परलोक का। मनु ही अर्धेन्द्र है। “मैं हूं” इस अहं भाव को मनु ही प्रकट करता है। यही हमारा इन्द्र है।

इस पशु रूप मानव जीवन को दो अर्धेन्द्र मिलकर न केवल पूर्णता देते हैं, बल्कि पशु भाव से बाहर निकलने का प्रयास भी करते हैं। दोनों ही पूर्ण होकर पूर्णाकार बन जाते हैं। अकेला तो कभी पूर्णता प्राप्त ही नहीं कर सकता। धर्म, अर्थ, काम के बाद दोनों मोक्षगामी हो जाते हैं।

गुलाब कोठारी

June 1, 2009

विवाह-5

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भौतिक विकास के साथ-साथ जीवन भी इतना भौतिकता से चिपक गया कि शरीर भी एक उपकरण बनकर रह गया। व्यक्ति जीवन भर इसके सहारे प्रयोग करता रहता है। प्रयोग करने की दृष्टि भी भौतिक बन गई है, बाहरी ज्ञान पर आधारित हो गई। जिस प्रकार शरीर नश्वर है, उसी प्रकार बाहर का ज्ञान भी नश्वर है। पेट भरने से आगे उस ज्ञान की उपादेयता नहीं है। इसीलिए आज ज्ञान पेट भरने का साधन बनकर रह गया। जीवन के साथ इसका दूसरा कोई सम्बन्ध ही नहीं रह गया है।

इसका पहला प्रभाव तो यह हुआ कि व्यक्ति का प्रकृति से सामंजस्य टूट गया। शरीर के भीतर प्रकृति भी कार्य करती है और हम स्वयं प्रकृति द्वारा संचालित है, यह विचार ही जीवन से बाहर हो गया। व्यक्ति स्वयं ही कर्ता और स्वयं का नियन्ता बन गया। उसको न तो शरीर की क्रियाओं की ही जानकारी है, न ही इसके भीतर होने वाली क्रियाओं की। व्यक्ति बाहरी संसार में ही जीता है। जो कुछ उसकी इन्द्रियों की पकड़ में आता है, उतना ही उसका संसार रह गया है। उसके आगे के जीवन क्रम को समझना आज उसकी आवश्यकता ही नहीं रह गई। जो कुछ उसे अच्छा लगता है, करने लग जाता है। हेय और उपादेय का भेद उसके जीवन से सिमट ही गया है। बाहरी ज्ञान की स्थूलता के कारण सूक्ष्म ओझल हो गया है। यही दृष्टि उसके निजी जीवन को प्रभावित करती है।

मेरे देखते-देखते कितने विदेशी मित्रों की शादियां हुई, तलाक हुए, फिर शादियां हुई। आज खुश कोई नहीं है। शादियां भी लम्बे काल तक नहीं टिक पाती। जिनको हम भारतीय लोग संस्कार कहते हैं, वहां नहीं दिखाई पड़ते। जो वहां हो रहा है, वही वहां के संस्कार हैं। जीवन शुद्ध शरीर, धन और अपेक्षाओं पर जुड़ा है। न मिलने में देर, न बिछुड़ने में।

ऎसा ही कुछ नजारा यहां भी समृद्ध परिवारों में देखने को मिलने लगा है। विवाह तो इतनी धूम-धाम से होते हैं कि इससे बड़ा झूठ जीवन में कुछ होता ही नहीं। वर-वधु के मां-बाप भी वैभव की चकाचौंध का ही बखान करते रहते हैं। परम्पराएं इतनी सख्ती से निभाई जाती हैं कि जरा कहीं चूक न हो जाए। स्वयं को तो परम्परा की याद भी नहीं होती। कोई याद दिला जाता है। वर-वधु मात्र यांत्रिक दिखाई पड़ते हैं। उनको कोई आदमी मानकर देखता ही नहीं है। घरवालों का ध्यान तो मेहमानों के साथ फोटो खिंचवाने में लगा रहता है। वर-वधु केवल उठक-बैठक करते हैं। उनको पानी पिलाना भी किसी को याद नहीं होता। मां-बाप का भावनात्मक जुड़ाव भी पश्चिम जैसा ही दिखाई देता है। शादी पैसे के जोर पर होती है। आदमी कहीं नहीं होता। होटल के लोग मांगें पूरी करते रहते हैं। दोनों परिवार के लोग सज-धजकर टहलते रहते हैं। इसी का तो नाम अब विवाह पड़ गया है। उस भीड़ में कौन तो आया, खाया भी कि नहीं खाया, कौन जाने! लिफाफे खोलेंगे, तब ध्यान आएगा।

पूरी की पूरी विवाह पद्धति ही नकली बनकर रह गई। तोरण-तलवार-घोड़ी जीवन में जुड़े ही नहीं, तब विवाह में क्यों चिपके हुए हैं फेरों का अर्थ और कारण किसी को मालूम ही नहीं, तब क्यों खा रहे हैं फेरो का समय पंडित तय करता है। जल्दी कराने के लिए उसे भी रिश्वत दी जा रही है। मंत्रों की भी जरूरत किसी को नहीं लगती। फिर यह दिखावा क्यों मुहूर्त निकल जाने के समय तक तो बारात ही नहीं आती। सारे घर वाले सड़क पर नाचते रहते हैं। लड़की वाले के घर पर नाचे, तब भी समझ में आता है। सज-धजकर सड़क पर और इसी वातावरण में हम वर-वधु का मंगल भविष्य ढ़ूढ़ रहे हैं। अनुष्ठान के जरिए देवता का आशीर्वाद मांग रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि जैसी प्रार्थना होगी, वैसा ही फल मिलेगा।
इस विवाह का वर-वधु के आत्मीय संबंध से कोई लेना-देना ही नहीं है। मां-बाप “कन्यादान” भी कर गए और वहां कन्या की परिभाषा ही लागू नहीं होती। वहां तो एक लड़की है, जैविक लड़की। घर छोड़कर जा रही है, पति के साथ। क्यों जा रही है, किसी ने नहीं बताया उसे। नए जीवन को कैसे परिभाषित करना है और क्यों, नहीं मालूम। संस्कारों का अध्याय तो शायद इसकी मां को भी नहीं मालूम। देखा-देखी का नाम ही संस्कार है।

देखा-देखी ही विवाह का कारण है। दोनों मिलकर गृहस्थी चलाएंगे, कमाएंगे, पेट पालेंगे और बस!
विवाह की तैयारी से ही पता चल जाता है कि हम कहां जा रहे हैं। लड़का कार्यालय में छुट्टी मांगता है -”सर मेरा विवाह है। पांच दिन की छुट्टी चाहिए। कपड़े सिलवाने हैं, सर। आप भी जरूर आइएगा।” उधर लड़की वाले कपड़ों और गहनों में उलझे दिखाई देंगे। उसके यहां ऎसा था, हमारे यहां उससे अच्छा होना चाहिए। सगाई भी विवाह के एक दिन पहले ही कर लेंगे। फेरों से पहले “रिंग सेरेमनी” भी होगी। लड़के की अंगुली की नाप भी चाहिए। लेकिन इस बीच मां को बेटी के साथ बैठकर अपने अनुभव बांटने की आवश्यकता ही नहीं लगती। वह तो पैसा देकर उसी मांग पूरी करके संतुष्ट रहती है।

लड़की को यह तैयारी जरूर करके जाना है कि जरूरत पड़ने पर अपने पांव पर खड़ी रह सके। इसी शक्ति के कारण उसका टकराव का मार्ग खुल गया। समझौता एक सीमा के आगे नहीं होता। दोनों की अपनी-अपनी पहचान भी बनी रहती है। एक तो होते ही नहीं ; केवल साथ रहते हैं। इनको अलग रहने में कितनी देर लगेगी। ससुराल से “लेटकर निकलने वाली” पत्नियां तो इतिहास में ही पढ़ाई जाएंगी। विवाह में 15 पीढियां अब नहीं जुड़ेंगी। केवल एक पीढ़ी में ही आपस में विवाह होंगे और उसी पीढ़ी में पूरे भी होते जाएंगे।

गुलाब कोठारी

June 8, 2009

संकल्प-1

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न जाने कितने
पर्याय होते हैं
जीवन के,
किन्तु एक पर्याय
होता है
सभी के केन्द्र में,
वह है संकल्प।
संकल्प
स्वीकृति है
कामना की,
दिशा है
भावना की,
सूचना है
क्रिया की
और लक्ष्य है
अनागत का,
अदृश्य का
अनियंत्रित का,
अंधकार में
प्रकाश पाने का,
खोजने को शक्ति
भीतर की,
कृष्ण के अंश की,
प्रस्फुटित करने को
जिसे
अपने संकल्प से।
सहारा है
जीवन का
एक ही,
जो चलता है
साथ उम्रभर,
वही साहस है,
शस्त्र है,
प्रकाश है
पथ का
जीवन यात्रा में।
संकल्प ही
बनाता है शक्तिमान
व्यक्ति को,
बनकर
इसकी शक्ति,
क्षुधा है
संकल्प,
रखने को गतिमान
जीवन चक्र को,
शेष नकली है
सहयात्री
नहीं देते साथ
वक्त आने पर
संकल्प की तरह,
इसी के बूते
काट देता है
पूरी उम्र आदमी।
नहीं होता मन
संकल्पित
आसानी से,
चंचल है
भगाती हैं इन्द्रियां
उसे यहां-वहां,
इधर-उधर
बहाने को
एक प्रवाह में,
भटकता रहता है
आदमी सौ साल,
नहीं मिलता
लक्ष्य कोई।
कौन करता
संकल्पित मन को
बड़ा प्रश्न है
कौन चलाता
जीवन व्यापार
माया
महामाया
यानी प्रकृति,
वही प्रवृत्ति है
निवृत्ति वही है
वही संकल्प है,
करने का भी,
न करने का
चलाती है
शक्तिमान को
भाख्य के द्वारा।
जैसे पत्नी
चलाती है
पति के जीवन को
विवाह के बाद।
वह भी तो
आती है
नए घर में
किसी संकल्प से
कौन आता है
जीने को
उसके साथ
इस घर में
संकल्प,
उसका अपना संकल्प!
वही होता है
आत्म-विश्वास
जीने को
हर हाल में।
चलता भी है
जीवन
समय के साथ,
और बदलता भी
कर्म अनुरूप ,
ज्ञान के द्वारा,
तब जूझता है
विकल्पों से
जीवन भर।
उसका जीवन
संकल्प है बस
वही परिचय
वही स्वरूप
उसका
वही बनाता है
पत्नी, माता
वही मांगता है
संतान
उस प्रभु से
वही मित्र बनकर
सदा साथ देता।
वही तो क्षुधा है
जीवन में नर की
वही शक्ति,
वही लक्ष्मी है
वही तृप्ति है,
तृष्णा वही है
वही तो धुरी है
हर परिजन की,
वही खूंटा है
पति देव का भी
बंधा है जो
स्त्रेह की पकड़ से
जरा सोचो क्या हो
हिले यदि खूंटा,
ढ़ह जाए घर
विकल्पों के मारे
टूट जाएं
जीवन सहारे।
संकल्प ही है
सपनों का जीवन,
उसी में छिपी है
गहनता
प्रेम रस की
वही करता प्रेरित
देने को सब कुछ
न चाहिए उसको
बदले में कुछ भी,
बनाना नहीं है
व्यापारी खुद को।
मनुज रहता
क्षुद्र
जन्म से ही,
आधा-अधूरा
चना-दाल जैसा,
उसे पूर्णता देता
संकल्प नारी का
पत्नी बनकर।
किसने सिखाया
उसको प्रेम करना
किसने जगाया
उसका पौरूष
किसने दिशा दी
जीवन को उसके,
चलाया उसे
नई जीवन ड़गर पर
प्रकाश बनकर
संकल्पित
माया भाव ने,
कर लिया उसको
आवरित चहुं ओर
बन्द कमरे-सा,
ड़ुबा दिया
प्रेम सागर में
उसको
भर गया मन
उसका भी
इसी प्रेम रस से,
जो मिलता नहीं
कभी
किसी विकल्प में।

गुलाब कोठारी

June 12, 2009

आ-रक्षण

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अरक्षण का अर्थ है चारों ओर से सुरक्षित होना। महिला आरक्षण बिल को लेकर एक वाक् युद्ध सा देश में छिड़ा हुआ है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि आरक्षित वर्ग की सुरक्षा भी हो और देश भी असुरक्षित महसूस नहीं करे। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने पर दोनों बड़े दल तो सहमत हैं, किन्तु कुछ प्रान्तीय दल आलोचना कर रहे हैं। वैसे आरक्षण का मूल प्रस्ताव जब स्वीकृत हुआ, तब कोई आगे नहीं आया। आज मुलायम-लालू यदि कहते हैं कि सीटों का नहीं पार्टी प्रत्याशियों की संख्या का आरक्षण होना चाहिए। बात उचित तो है, किन्तु अन्य पदों के आरक्षण या अन्य सीटों के आरक्षण में यह नीति क्यों नहीं अपनानी चाहिए, इस पर वे मौन हैं।

वास्तविकता यह है कि अन्य नीयत से लागू किया कानून आज देश के विखण्ड़न का हेतु बन गया। क्योंकि इसके कार्यगत स्वरूप को नियंत्रण में नहीं रखा गया। इससे आरक्षण की मूल भावना ही खो गई। लाभ कुछ प्रभावशाली लोगों तक सिमट कर रह गया। अधिकांश वंचित रह गए। एक ही परिवार के एक ही सदस्य को आरक्षण देने की शर्त होती, तब इसका व्यावहारिक स्वरूप दूसरा होता। गुणवत्ता का मापदण्ड़ तो रहा ही नहीं।

आरक्षण की पूरी नीति पर पुनर्विचार होना चाहिए, ताकि इसका लाभ व्यापक समाज तक पहुंच सके और गुणवत्ता भी बनी रहे। इसके लिए जिस प्रकार सीटों या क्षेत्रों को आरक्षित किया गया है, यह तो सामन्ती दृष्टिकोण ही है। लोकतंत्र या जनता की आवाज कहां सुनाई देगी। आज इन सीटों पर जनता मतदान करते हुए भी कुण्ठित है। यह विड़म्बना ही है कि चुनाव आयोग की संहिता में जहां “जाति” शब्द का निषेध है, वहीं आयोग “जाति” आधारित आरक्षण के आधार पर सीटें आरक्षित करता है। आरक्षण का अर्थ होना चाहिए कि प्रत्येक पार्टी अपने प्रत्याशियों की सूची में आरक्षित वर्ग का हिस्सा निश्चित करे और जनता उनमें से अपनी पसन्द का उम्मीदवार चुने। सीटों का आरक्षण तो लोकतंत्र पर कुठाराघात ही है। यही लक्ष्य महिला आरक्षण में भी होना चाहिए। हर पार्टी की सूची में 33 प्रतिशत महिलाएं भी हों, सामान्य और आरक्षित वर्ग की भी हों। शेष जनता पर छोड़ा जाना चाहिए, ताकि हर उम्मीदवार गुणवत्ता के आधार पर ही मैदान में उतरे।

सच तो यह है कि हमारे राजनेता स्वयं संकल्पवान नहीं हैं, अवसरवादी हैं। भीतर से खोखले हैं, अत: जनता का सामना नहीं कर पाते। देश के हित में आवाज उठाने वाले भी नहीं हैं। साठ साल की यात्रा स्वयं इसका उदाहरण है। चुनाव जीतने के बाद सभी दलों के नेता एक-दूसरे की भाषा बोलने लग जाते हैं। तब सुधार कहां से निकलेगा आरक्षण का जहर भी यह देश इसीलिए पी रहा है। प्रतीक्षा है कि कब कोई नेता ऎसा आए, जनता को साथ ले और देशहित में बड़े मुद्दों को हल कर दे।

गुलाब कोठारी

June 15, 2009

संकल्प-2

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रस तो सदा है
संकल्प रूपी,
नीरस ही होते
विकल्प सारे।
इसी रस से
गढ़ती है
मूरत सजन की
बना देती उसको
छवि प्रियतम की,
देती है आकार
शिला को जैसे
बनकर हथौड़ी
कलाकार जैसी,
तभी निखरता है
रूप उसका,
घर के बाहर
बनती है पहचान,
चलता है
अपनी ड़गर पर
होता है तब
संकल्पित
मन उसका भी।
लुटाने लगता है
वह भी प्रेम
बदले में,
छूटने लगता है
अहंकार
उसका भी
छंट जाते हैं
विकल्पों के बादल,
पाता है
पूर्णता की मधुरता,
स्वपिल जीवन,
एक नई आस
नया क्षितिज
और एक नया
जीवन साथी।
छोड़कर मनमानी,
बहना प्रवाह में
अपनाता मर्यादा
होता है लज्जित
गलत काम करके,
यह लज्जा ही
बनती है
संकल्प घर का,
रोकती है ये
पशुभाव से
अविद्या
के योग से
अधंकार प्रवेश से,
यही तो है
संकल्प पत्नी का,
प्रवेश कर गया
पति-ह्वदय में।
इसी ने रोका
अधोगति को,
गिरने से नीचे,
इसी से बनी
सीढ़ी
उठने को ऊपर,
इसी से उपजा
रति भाव मन में,
इसी ने किया मुक्त
पितृ ऋणों से।
संकल्प बोला
गर्भस्थ शिशु से
आना है तुमको
बनकर एक मानव,
तुम्हे बनना माली
इस परिवार का
करने हैं पूरे
सपने संसार के।
बिना संकल्प
कहां मानव मिलेगा,
किसी एक घर में,
नहीं उतरेगा
कोई देव
इस देह में
बनने को मानव,
जीने उस घर में
सौ साल तक,
वहां तो पशु हैं,
असुर हैं
क्लेश हैं तैयार
आने को
नर शरीर में,
जीने को
स्वच्छन्द रहकर।
उन्हें रोकता यह
संकल्प पत्नी का,
बना देती
उसको मानव
जन्म से पहले,
जन्म बाद में
करती है
दीक्षित उसे
परम्पराओं में
विरासत में,
देखती रहती है
पहचान अपनी
उसके भविष्य में,
बनाती उसे
प्रतिबिम्ब अपना,
रखने को सदा
गर्व से सिर ऊंचा।
सोचो, क्या हो
यदि टूट जाए
यह संकल्प
जीवन का,
कौन-सा संकल्प
बड़ा होगा इससे
क्या होगी दशा
उस मन की
जो दौड़ता है
विकल्पों के पीछे,
कौन-सा संकल्प
बच पाएगा
उसके मन में,
कैसे बनेगा
मन पटु उसका,
बहता रहेगा
एक प्रवाह बनकर,
हवा के संग-संग
किसके सहारे
टिकेगा भवन
यदि कमजोर होगी
नींव संकल्प की,
खण्ड़हर ही होगा
बस जीवन सारा,
कैसे लौट पाएगा
कोई “अपने घर को”
जहां से चला था
84 लाख चक्कर
पशु भाव से
आता है जीव
मानव बनकर
जीकर मर्यादा में
और छोड़कर
सारी मर्यादाएं
बन जाता है
फिर से पशु,
शुरू होगा क्रम
आने-जाने का
फिर से।
कैसे जी गए
पहले के लोग
इस संकल्प से
न शिक्षा थी
न चकाचौंध ऎसी,
शरीर था ऎसा ही,
क्या बदला फिर
जमाने में ऎसा,
व्यक्ति भूल बैठा
सार इस जन्म का,
अटका ही रहा
अर्थ में
देह की खातिर
नश्वर हैं दोनों
कहां चेतना है,
तभी तो पशु है
नया आदमी
सुप्त चेतना लिए
चल रहा नींद में
पता नहीं कहां।
जागरण के लिए
चाहिए नया
संकल्प मन का,
छिपा है यह तो
शक्ति बनकर
भीतर सबके,
माया है यही तो,
त्रिगुण बनी है,
तोड़ना है बन्धन
इसी के जगत में,
जीवन के सुख-दुख
इसी के बनाए,
पिछले जन्म का भी
लेखा दिखाए,
संकल्प जोड़े,
संकल्प तोड़े,
संकल्प सहजता,
प्रखरता,
विश्वास बनता
यही स्वयं पर,
तभी करता है
शासन जगत पर,
क्यों दोष देना
कभी भी किसी को
यदि न हो
संकल्प,
विश्वास खुद पर
वही दिखता है
दूसरे मुख पर
प्रतिबिम्ब पर,
लौटते हैं
स्पन्दन हमारे ही
व्यवहार बनकर
पास अपने।
संकल्प करता है
शिकार किसी का,
यही कराता है
समर्पण भी जग में,
यही एक बूता है
जीवन में सबको
जिसके सहारे
जीता है मानव
पकड़कर इसे ही
जीवन के पथ पर।
बिना संकल्प
कैसे निभेगा रिश्ता
कैसे बंधेगा
कोई किसी से
दोनों ही मुक्त
एक-दूसरे से,
दृष्टि बस तन तक,
अर्थ पर हो
बुद्धि,
छलांगें लगाए
मन-उपवन में,
तृष्णा ही तृष्णा
ईष्र्या ही ईष्र्या,
नशा ही नशा
गफलत ही गफलत,
कहां आश्रम
कोई जीवन में
ठहरे,
कहां धर्म की
कोई पहचान होती,
आसक्ति छाए
चारों दिशा में
परिग्रह बनकर
पशुभाव घेरे
चारों तरफ बस
अंधेरे-अंधेरे,
ना कोई बचता
मातृत्व मन में
ना कोई रहता
मानव इस तन में।
छूट जाते सारे
यश-कीर्ति भी,
भाव सारे ही
लोक हित के।

गुलाब कोठारी

देशहित में

लोकतंत्र की दो बड़ी पार्टियों में से यदि एक छिन्न-भिन्न हो जाती है, जैसा कि स्पष्ट दिखाई दे रहा है, तब देश में लोकतंत्र की सुगंध फीकी पड़ जाएगी। देश का हित दोनों दलों के सक्षम और सशक्त रहने में ही है। लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत तो चलती रहती है। वर्ष 1977 में कांग्रेस हारी है तो वर्ष 1984 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को महज दो सीटें मिलीं। लेकिन कोई भी पार्टी खत्म नहीं हुई। नेतृत्व खत्म नहीं हुआ। लेकिन आज स्थितियां चिन्ताजनक हैं। देशभर का मीडिया एक स्वर में उनमें से एक के विखण्ड़न का चित्रण कर रहा है। पार्टी में नीचे का कार्यकर्ता मूकदर्शक है और राष्ट्रीय पदाधिकारी ही कूद-फांद कर रहे हैं। जबकि पार्टी उनकी विरासत तो नहीं है।

देशवासियों के सामने आज महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि भाजपा नहीं तो कौन लेकिन कौन के जवाब में कोई नहीं दिखाई दे रहा। कहने को भाकपा, माकपा, राकांपा, बसपा कई राष्ट्रीय पार्टियां हैं, लेकिन सब क्षेत्रीय पार्टियों जैसी। किसी पर भी देश चलाने का भरोसा नहीं कर सकते।

जब अटलजी प्रधानमंत्री थे, तब मैंने विभिन्न यात्राओं के दौरान देश और पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल उठाए थे। उन लोगों के नाम भी लिए जो पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं, ड़ुबोने का कार्य कर रहे हैं। बेलगाम तो बोल ही रहे थे। वे इतना ही कहकर रह जाते कि देश का दुर्भाग्य है। आज सारे ही नाम पटल पर हैं और पूरा देश इन्हें टकटकी बांधे देख रहा है। नीचे कार्यकर्ता लज्जित भी महसूस कर रहा है। मोहन भागवत इस दर्द को समझ तो रहे हैं, किन्तु संघ को अचानक राजनीति से बाहर निकालने में हिचक रहे हैं। न वे यह कह पाते कि भविष्य में संघ भी राजनीति में रहेगा। अच्छा तो ये हो कि संघ अपनी सन् 1965 की भूमिका पर लौट आए और देश का गौरव बढ़ाए। भाजपा के अधिकांश राष्ट्रीय पदाधिकारी संघ की पृष्ठभूमि के हैं।

इतना ही नहीं, पिछले कुछ वर्षो में भाजपा के सहयोगी दल विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, शिव सेना आदि का भी जो व्यवहार देश के समक्ष दिखाई दिया, उसे भी गरिमापूर्ण नहीं कहा जा सकता। उसमें भी अधिकांशत: धर्म के नाम पर ही किया गया। बड़े नेताओं के अहंकार की चर्चाएं मीडिया में भरी पड़ी हैं। चुनाव में जनता द्वारा नकारे जाने पर भी इनकी हैंकड़ी कम नहीं हुई। देश को किसी दल की चिन्ता नहीं होती, यदि नकारा है तो। चिन्ता तो लोकतंत्र और देश की है। ऎसा भी नहीं कि कांग्रेस इन झगड़ों से बची हुई है। किन्तु वहां एक ड़ोर से बंधे हैं।

आज कांग्रेस की सरकार केन्द्र में है। उसे भी दो दलों पर आधारित लोकतंत्र के बारे में चिन्तन करना चाहिए। प्रादेशिक पार्टियों को प्रदेश तक ही सीमित करना उचित है। नए सिरे से चुनाव आयोग को निर्देश दिए जाएं। चुनाव में जातिगत विष प्रभावी न रहे और आरक्षण भी बना रहे, इस पर निर्णय करना भी आज की महती आवश्यकता है। देश खण्डित होने से बच जाएगा।

देश के आगे हर व्यक्ति गौण हो जाना चाहिए। यशवन्त सिन्हा के बाद उन अन्य नेताओं को भी पदों से इस्तीफे दे देने चाहिए, जिन पर सार्वजनिक रूप से अंगुलियां उठ रही हैं। आज की स्थिति में बाहर बैठकर भी उन्हें पार्टी के लिए सकारात्मक कार्य में सहयोग देना चाहिए। आखिर उनका भी वर्षो का दुख-सुख का साथ रहा है। आशा करनी चाहिए कि पार्टी और संघ मिलकर शीघ्र ही स्थिति में सुधार लाएंगे। नहीं तो लोकतंत्र अपनी करवट स्वयं बदलेगा।

गुलाब कोठारी

June 22, 2009

राधा

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राधा-कृष्ण, प्रकाश और अधंकार इस सृष्टि के मूल तत्व हैं। दोनों ही देने वाले हैं। राधा की “राध साध सन्सिद्धौं से देने वाला तत्व है। सूर्य की रश्मियों को ही राधा नाम से जाना जाता है। स्वयं सूर्य कृष्ण है, काला है। इसका उदाहरण सूर्य मंत्र है, जिसकी शुरूआत में ही इसको कृष्ण संज्ञा दी गई है।

आकृष्णेन रजसा वर्तमानो
निवेशयन्नमृतं मत्र्यच
हिरण्ययेन सविता रथेना
देवो याति भुवनानि पश्यन्।

राधा देती भी है, लेती भी है। सूर्य से हमें आयु प्राप्त होती है और किरणें एक-एक दिन करके हमारी आयु को ले जाती हैं। वर्षा से हमको जल प्राप्त होता है। सूर्य किरणें उसे फिर से उठा ले जाती हैं। सम्पूर्ण आकाश पर राधा का अधिकार स्पष्ट दिखाई पड़ता है। आकाश की तन्मात्रा नाद है। आकाश ही कृष्ण की बंशी है। नाद से ही आगे की सृष्टि होती है। नाद से ही प्रकाश उत्पन्न होता है। रंग पैदा होते हैं। ये सभी ध्वनि तंरगों पर आधारित रहते हैं। ध्वनि के सात सुर ही इन्द्र धनुष के सात रंग बनते हैं। इन्हीं प्रकम्पनों या स्पन्दनों से प्राणियों का सप्त धातु युक्त शरीर बनता है।

सूर्य एवं रश्मियों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। राधा के ह्वदय में तो कृष्ण रहते हैं। कृष्ण तक पहुंचने का माध्यम भी राधा ही है। अन्य कोई माध्यम हो ही नहीं सकता। राधा से ही सृष्टि का संचालन होता है। औषधि वनस्पति, अन्न पैदा होता है। अन्न ही शरीर में जाकर शुक्र-रज का निर्माण करता है और सृष्टि विकास का निमित्त बनता है।

राधा ही ज्ञान रूपी प्रकाश भी है। यही अज्ञान को जलाती है। आत्मा को प्रकाशित करने वाली है। व्यक्ति को अपने आत्मा के पास पहुंचाती है। राधा का विपरीत शब्द है-धारा। प्रवाह की निरन्तरता को धारा को कहा जाता है। धारा का कार्य है- विषय को व्यक्ति से दूर-दूर ले जाना। जिस प्रकार गंगा की धारा पानी को गंगोत्री से ले जाकर समुद्र में छोड़ देती है। हमारा जीवन भी एक धारा की तरह चलता रहता है। कभी लौटता नहीं है-धारा की तरह। जो पानी एक घाट से निकल गया, वापिस उस घाट पर नहीं आता। इसीलिए शास्त्र कहते हैं कि प्रवाह में नहीं जीना है। व्यक्ति प्रवाह पतित हो जाता है। अपना नियंत्रण भूल जाता है। यह भी निश्चित है कि धारा का सहज रूप नीचे की ओर बहना होता है। नीचे गिरने को ही नरक कहते हैं। धारा का रूख आसानी से ऊपर नहीं मुड़ता। वहां तो राधा ही उसे उठाकर ऊपर ले जा सकती है। बातचीत में एक बार स्वामी गुर्वानन्द जी ने कहा था कि “राधा” शब्द अत्यन्त शक्तिशाली मंत्र रूप है। किसी को नींद नहीं आ रही हो, उसे राधा-राधा बोलना शुरू कर देना चाहिए। सात मिनट में उसे हर हाल में नींद आ जाएगी। दवाई तो लेनी ही नहीं पड़ेगी।

राधा ही कृष्ण की शक्ति है। कृष्ण की शक्तियों का परिचय भी राधा से ही मिलता है। जिन गौओं को कृष्ण चराते हैं वे भी तो सूर्य रश्मियों के माध्यम से ही पृथ्वी पर आ रही हैं। सूर्य से हमको ज्योति-आयु और गौ (विद्युत शक्ति) प्राप्त होती है। इसी विद्युत शक्ति के सहारे हमारी चेतना का विकास होता है। मूल में यह परमेष्ठी मण्डल में सविता के नाम से जानी जाती है। सविता के लिए लिखा है-सविता वै अस्माकम् प्रसविता। हमको,सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाली है। यही विद्युत सूर्य किरणों के द्वारा सम्पूर्ण चराचर में व्याप्त रहती है। सूर्य का आधार ऊपर के सोम लोक-परमेष्ठी का सोम है। यह भी सूर्य किरणों के द्वारा ही सूर्य तक पहुंचता है। इसी से सूर्य की ज्योति और ताप बना रहता है। यह सोम ही सूर्य किरणों में मरीचि रूप झिलमिल की तरह दिखाई पड़ता है।

राधा ही गायत्री रूप दिखाई पड़ती है। ब्राह् मूहुर्त में इसी गायत्री के पांच मुख (रंग) हमें दिखाई पड़ते हैं। शेष अहोरात्र में यह रंग दिखाई नहीं पड़ते। अत: इस काल में स्वाध्याय करना विशेष महत्व रखता है। इसको संध्या काल भी कहा जाता है। इस काल के लिए तो कहा गया है कि व्यक्ति चाहे तो अपने भविष्य का निर्माण इस काल में कर सकता है। अपना भविष्य बदल सकता है। अन्य संध्याओं में यह शक्ति नहीं है। गायत्री ही सूर्योदय के बाद सावित्री कहलाने लगती है। महर्षि अरविन्द ने सावित्री तत्व पर अच्छा शोध किया है।
अंधकार में भी कुछ प्रकाश अवश्य रहता है। यह परावर्तित प्रकाश होता है। प्रकाश और अंधकार को भी अलग नहीं कर सकते। राधा-कृष्ण जो ठहरे। श्रद्धेय बाबूसा. ने सात सैंकड़ा में लिखा है-

जो दीखे सो राधिका, न दीखे वो कृष्ण
कृष्ण-शुक्ल दोनों खड़े, बड़ो विकट छे प्रश्न ।

हमारे शरीर में पांच स्थूल प्राण होते हैं-प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। इनमें से तीन- प्राण-अपान-व्यान मुख्य होते हैं। ये तीनों हमारा ह्वदय बनाते हैं। प्राण यानी “द”, अपान ह्व और व्यान को यम् कहा है। अपान आहरण शक्ति देता है। केन्द्र की ओर अन्न लाता है। प्राण बचे हुए को, उच्छिष्ट को बाहर फेंकता है। व्यान केन्द्र में रहकर नियंत्रण करता है। जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों को नियंत्रित करता है। व्यान रूप में हमारे शरीर का ह्वदय रूप नियंता बनता है। प्रतिष्ठा बनता है। सौर रश्मियों का प्राणन-अपानन (आना-जाना) सूर्य के द्वारा नियंत्रित रहता है। प्रत्येक रश्मि पीछे हटती हुई आगे बढ़ती है। हमारे श्वास की तरह जान पड़ती है। इस आगे पीछे होने की क्रिया को सर्पण प्रक्रिया कहते हैं। धूप और छाया के बीच एक रेखा खींच दें तो दिखाई देगा कि प्रकाश पीछे हटते हुए आगे बढ़ता है। यही प्राणन-अपानन क्रिया हमारे स्थूल शरीर में भी कार्य करती है। प्रकाश और अधंकार के बीच इसी को राधा-कृष्ण का रास कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होती। प्राणायाम का लक्ष्य भी प्राणन-अपानन प्रक्रिया के माध्यम से, श्वास-प्रश्वास पर ध्यान केन्द्रित करते हुए व्यक्ति को आत्मा से एकाकार करना है।

गुलाब कोठारी

June 26, 2009

बेडियां

बहुत अच्छा
लग रहा था
वह
पहली ही मुलाकात में,
चंचल मन
चाह रहा था
लपकना
बाद में भी
किए थे प्रयास
मैंने ही
उसे रिझाने के
अपनी अदाओं से
अपने श्रृंगार से
हंसी-गाथाओं से
सिनेमा की तरह
अभिनेत्री बनकर।
प्रशंसा करती थी
उसकी, मुक्त-कंठ से
मानती थी
उसकी हर बात
पी लेती थी
एक-दो घूंट भी
उसके साथ।
मम्मी कहती थी
बदल रही हूं मैं
शायद कोई
मिल गया मुझको
टालती रही
हर जवाब को
जैसे कुछ हुआ न हो।
अनायास
एक दिन
आया वो
नशे में धुत
बांह से खींचा
कमरे की ओर
मैं चीखी
किंतु भीतर
एक द्वंद्व भी था
चाहती भी रही हूं
इसी कमबख्त को
इतने काल से,
प्रतीक्षा रही थी
इसी दिन की भी
ताकि बन सकूं
मां
उसके बच्चे की,
किंतु सोचा ना था
ऎसा भी आएगा
मनहूस दिन,
लड़ना भी चाहा
हाथ उठे नहीं
भवानी की तरह
रोक पाने को
उसकी बढ़त
आधी हां, आधी ना,
में ही फंसी
चीखने का प्रयास
काम नहीं आया
और कुछ करती
इसके पहले ही
किसी ने बंद किया
मेरा मुंह
और कर दिया
उसे काला।
आज मैं
सिहर जाती हूं
आदमी के नाम से,
सिनेमा की तरह
घूम जाती है
सारी घटना
मेरी आंखों के आगे
देखती हूं
सूनी आंखें
मां के चेहरे पर
रोती हूं
अपने इस
औरत होने पर।
बच सकती थी
शायद
यदि रहती
मर्यादा में
बताती रहती
मां को भी
हर दिन की दास्तान।
नहीं रहती
इतनी स्वच्छंद
लड़कों की तरह
प्रवाह में पड़कर
नहीं सौंपती
अपनी धरोहर
किसी निर्लज्ज को
रोक सकती यदि
अपने इशारे
नादानी के
उसे रिझाने के,
नहीं करती
दुरूपयोग
स्वतंत्रता का।
इतनी बड़ी सजा
कैसे कटेगी
पूरी उम्रभर
क्या होगा
कोसते रहने से
आदमी को,
जीना भी पड़ेगा
उसी के साथ
बच नहीं पाऊंगी
संभव नहीं लौटाना
जो सब चला गया
नहीं बन पाऊंगी
अल्हड़,
पहले जैसी
स्वच्छंदता ही
बन गई हैं
बेडियां मेरी
मुक्ति की तलाश में।

गुलाब कोठारी

June 29, 2009

शिक्षा

एक समय था जब शिक्षा के लिए देश भर में गुरूकुल व्यवस्था थी। इस व्यवस्था में बच्चों को गुरू के पास ही रहना पड़ता था। गुरू हर शिष्य का परीक्षण करके उसके ज्ञान का आकलन करता था। उसके भावी जीवन पर दृष्टि डालकर उसे तैयार करता था। वही धर्म की शिक्षा भी देता था, वही लोक व्यवहार और प्रकृति के स्वरूप की शिक्षा भी देता था। जैसे-जैसे शिष्य तैयार होता जाता था, गुरू का गर्व भी बढ़ता जाता था। शिष्य में वह अपना प्रतिबिम्ब देखता रहता था। अपना सारा ज्ञान शिष्य को समर्पित कर देता था। एक पूर्ण मानव का निर्माण करके माता-पिता को सौंप देता था।

मानव तो आज भी वही है। केवल बाहरी परिवेश बदलता है। बदलता ही रहा है। इसका प्रभाव भी बाहरी जीवन पर अधिक होता है। चकाचौंध भी हर काल में रही है और सृष्टि का माया भाव भी। शिक्षा देने का कारण भी यही है। ज्ञान के द्वारा व्यक्ति शाश्वत और नश्वर का भेद समझ सके। बाहरी संसार की सीमा को ध्यान में रखकर उसका उपयोग कर सके। नश्वर के पीछे छिपे हुए शाश्वत को पकड़ सके। जीवन भ्रमित न हो पाए। जीवन का लक्ष्य हाथ से छूट न पाए। ईश्वर में पूर्ण आस्था रखते हुए सुख-दु:ख में तटस्थ रह सके। तभी उसे आसक्ति का अर्थ और प्रभाव भी समझ में आ सकेगा। राग-द्वेष पर नियंत्रण करके शान्त हो सकेगा।

आज का मानव अशान्त है, क्लान्त है। अपने ज्ञान के सहारे वह शाश्वत और नश्वर का भेद नहीं कर पा रहा। पुरूष और प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहा। शरीर को स्वयं से अलग करके देख ही नहीं पा रहा। कोई शरीर के आधार पर ही जी रहा है। कोई बुद्धि के आगे कुछ स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। कोई-कोई तो बस मनमानी ही करता रहता है। खेद की बात है कि जो जिस धरातल पर जी रहा है, उस धरातल को भी अच्छी तरह नहीं जानता। शरीर में जीने वाले को पता नहीं शरीर का स्वरूप क्या है। कैसे कार्य करता है। प्रकृति किस प्रकार शरीर को चला रही है। व्यक्ति का योगदान क्या है। शरीर के भीतर रहने वाली अदृश्य शक्तियां-मन-बुद्धि-आत्मा, कैसे इस शरीर को चलाती हैं। शरीर को जड़ क्यों कहते हैं। शरीर का उपयोग कैसे-कैसे हो सकता है। शरीर की भाषा क्या है। इस भाषा को कैसे सीखा जा सकता है। भीतर की शक्तियां कैसे अभिव्यक्त होती हैं, इस शरीर में। आधि-व्याधि का शरीर के साथ क्या सम्बन्ध है। समाधि क्या है। प्राण क्या हैं। मन क्या है। इन्द्रियों का संचालन कैसे होता है। कामनाएं कैसे पैदा होती हैं। आत्मा क्या है। कैसे और किस रूप में रहता है इस शरीर में। कैसे काम लेता है, इस शरीर से। कैसे आता है और शरीर के जाते ही चला जाता है। ऎसे अनेक प्रश्नो का उत्तर जीवन खोजता भी रहता है। इसके बिना जीवन को समग्रता के साथ नहीं जी सकते। सार्थक नहीं बना सकते। गुरूकुल शिक्षा इसी जीवन-स्वरूप पर आधारित थी। हर व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप भिन्न होती थी। आज स्कूलों से बच्चे एक कारखाने के उत्पाद की तरह पढ़कर बाहर निकलते हैं। एक-सी यांत्रिक शिक्षा ग्रहण करके नौकरी पाने को एक-दूसरे से होड़ करते रहते हैं। नौकरी के अतिरिक्त इस शिक्षा की उपयोगिता नहीं है। शिक्षा में न तो प्रकृति का वर्ण भेद आधार है, न ही व्यक्ति के संस्कार और पारिवारिक परिवेश। एक व्यापारी/ उद्योगपति के बच्चे को भी नौकरी मांगने वाली शिक्षा ही दी जाती है। किसी को पेट भरना सिखाने के लिए जीवन का कितना बड़ा भाग व्यर्थ जा रहा है। रेल के डिब्बों की तरह सारे बच्चे एक जैसे तैयार हो रहे हैं। सचाई यह है कि सबको ही अपना-अपना जीवन अलग तरह से जीना है।

इसका मुख्य कारण है कि शिक्षा में मानवता का अभाव। व्यक्ति से जुड़े जीवन के विषय चर्चा में भी नहीं आते। केवल बाहरी जीवन के विषय पढ़ाए जाते हैं। जीवन जीने में इनका कहीं कोई उपयोग ही नहीं होता। फिर शिक्षा जीवन से कहां और कैसे जुड़ी है ऎसी शिक्षा की क्या अनिवार्यता है अक्षर ज्ञान तो भाषा सीखने के लिए दिया जाता है। भाषा ज्ञान ग्रहण करने का माध्यम है। स्वयं ज्ञान नहीं है। ज्ञान का शिक्षा में कोई स्थान ही नहीं है। अत: मुमुक्षु के लिए साक्षरता की अनिवार्यता समझ में आती है। शिक्षा की अनिवार्यता समझ में नहीं आती। हमारे ग्रामीण समुदाय की विडम्बना यही है कि अनिवार्य शिक्षा के नाम पर उनके बच्चों को स्कूल ले जाया जाता है। आठवीं-दसवीं के आगे पढ़ नहीं पाते। नौकरी उनको मिलेगी भी कहां से! वे लौटकर पैतृक काम को भी करने के लिए तैयार नहीं होते। उन्हें तो बस नौकरी चाहिए। इसका असर यह हुआ कि हमारी सारी ग्रामीण सेवाएं एक-एक करके ठप्प होती जा रही है । खाती, कुम्हार, माली, धोबी, आदि सभी आवश्यक सुविधाएं लुप्त हो रही हैं। इन बच्चों को यदि काम पर रहते भाषा ज्ञान कराया जाता तो पन्द्रह वर्ष की आयु तक सभी बच्चे अपना-अपना पैतृक कारोबार भी संभाल सकते थे। नौकरी से अच्छी आय भी कर सकते थे। स्वतंत्र जीवन भी जी सकते थे। हमारी विकृत मानसिकता ने पूरे समाज के आर्थिक ढांचे को ही तहस-नहस कर दिया। जिस गति से स्कूलें खोली जा रही हैं, उस गति से अच्छे शिक्षक भी तैयार नहीं हो सकते। स्कूलों के नाम पर कारखाने खड़े किए जा रहे हैं।

उच्च शिक्षा की स्थिति तो और भी दयनीय है। इसमें मानवीय अपूर्णता का ही प्रमाण-पत्र दिया जाता है। अदृश्य रूप से डिग्री पर पढ़ा जा सकता है कि इस डिग्री का धारक एक अपूर्ण मानव है। इसका व्यक्तित्व अपूर्ण है। जीवन-ज्ञान से तो यह शून्य ही है। भाग्य से यदि अच्छी नौकरी मिल जाए तो अपना और परिवार का पेट भर सकता है। सुखी तो रहेगा ही नहीं। क्योंकि जो कुछ भी इसे पढ़ाया गया है, वह इसकी संस्कृति और इसके संस्कारों से मेल नहीं खाता। नकल और स्पर्द्धा पर आधारित जीवन शैली इसे सिखाई गई है। जीवन निजी धरोहर है। स्पर्द्धा नहीं है। खुद को बड़ा करने के लिए जीना होता है। अद्वितीय है, तब दूसरों जैसा क्यों बनें

गुलाब कोठारी

July 1, 2009

छटपटाहट

फूटती है जब
दबी हुई
प्रतिक्रिया
विस्फोट होता है
जीवन में
बंधक बनी
नारी
छटपटाने लगी
स्वतंत्र होने को
इस संघर्ष में
लड़ते-लड़ते
हो गई
आक्रामक अनायास,
झपट पड़ती है
अवसर मिलते ही
आदमी पर
लहूलुहान हो जाता है
आदमी
उसे नहीं आता
पलटवार
नई सदी की नार
आदमी को ठोकर मार
चल पड़ती है
अगले मुकाम को।
यहीं से हो जाता है
शुरू तांडव
उसके जीवन में
शिवजी की तरह
नाप लेती है
धरती
लक्ष्यहीन बनकर
प्यासी, अतृप्त सी,
सारी मृदुला
पथरा जाती है
सपने बुन नहीं पाती
किसी एक के सहारे
मृगतृष्णा
मिट नहीं पाती
बंद हो जाते हैं
ह्वदय कपाट
बंद हो जाता है
क्रंदन
भीतर ही।
क्या कहे
किससे कहे
लगाकर मुखौटा
तलाशती रहती है
उन आंखों को
जो
झांक सके भीतर
उसके मन तक
दुलार सके
उसकी भूलों को
बांट सके
दर्द उसका
कर सके हल्का
उसके जी को
वरना
यह प्यास
भटकाएगी उसे
फिर से
जनम-जनम।

गुलाब कोठारी

July 4, 2009

कसो कमर

आज से मध्य प्रदेश के विधायकों का प्रशिक्षण शुरू हो रहा है। राजस्थान के विधायकों का ऎसा ही प्रशिक्षण शिविर विधानसभा के बजट सत्र के बाद होगा। उन्हें अपने काम-काज में दीक्षित किया जाएगा। दोनों ही जगह नई सरकार के 6 महीने तो चुनावों में ही गुजर गए। नई सरकार के विजय के जश्न भी हो चुके। मध्य प्रदेश में तो पहले भी सरकार भाजपा की ही थी, लेकिन राजस्थान में पिछली सरकार के कर्मो का फल इनके हिस्से में आया है। इसका अर्थ है कि हमें इतिहास से सीख लेनी चाहिए। ठोसकाम करने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। एक संकल्प यह भी होना चाहिए कि प्रतिनिधि आप किसी भी दल के हों, कार्य प्रदेश के लिए करना है। ये संकल्प मध्य प्रदेश, राजस्थान ही नहीं हर राज्य के विधायकों को लेने चाहिएं।
पिछले दशकों का इतिहास गवाह है कि सबसे अधिक गिरावट जन प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत आचरण और उसकेकारण सदन की गरिमा बनाए रखने में आई। अच्छा हो इस बात को प्रशिक्षण का पहला अध्याय बनाया जाए। व्यक्ति अच्छा है, तब उसके हाथ से गलत कार्य कभी हो ही नहीं सकता।
पिछली विधानसभा में भी अनेक विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। सदन में अनुशासनहीनता के दृश्य देखकर विधायकों को शर्म आना बन्द सा हो गया। मुद्दों के बजाए विरोधी दलों पर छींटाकशी आधुनिक संसदीय सभ्यता की शैली बनती जा रही है। जब विधायक मुद्दों पर तैयारी करकेनहीं आएंगे, देर रात तक अन्यत्र व्यस्त रहेंगे, तब सदन में और क्या कर सकते हैं
अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वे किसी भी दल से चुनकर आए हों, सदन का लक्ष्य एकही होना चाहिए- प्रदेश का हित। इसमें किसी तरह की जाति, धर्म, क्षेत्र अथवा राजनीति को जगह नहीं मिलनी चाहिए। इसके बिना किसी जन प्रतिनिधि की दृष्टि का विकास नहीं हो सकता। तब भावी नेतृत्व का विकास कैसे सम्भव हो सकेगा विधायकों को देश के चुने हुए विशेषज्ञों जैसे सोमनाथ चटर्जी के साथ संवाद कराया जाए। राजनीति को व्यवसाय बनाकर नेतृत्व के सपने नहीं देखे जा सकते। न &