Gulabkothari's Blog

जनवरी 29, 2012

सत्संग

व्य क्ति अकेला नहीं जी पाता। इसका एक कारण है प्रारब्ध। पिछले कर्मो के फलों का आदान प्रदान। यह आदान-प्रदान ही संगत है। इसी में सुसंग और कुसंग के समीकरण बनते हैं। इसी से मन में इच्छाओं का एक वातावरण बनता है। जीवन शैली का परिवर्तन और रूपान्तरण इस वातावरण पर निर्भर करता है। अकेला व्यक्ति भले ही जंगलों में रहने लगे, किन्तु इस वातावरण के अभाव में वह जीवन को कभी समझ ही नहीं पाता। जीवन को तो जीना ही पड़ेगा। दूसरे के अनुभव भी इसमें काम नहीं आ सकते।

 

 

जीवन का उद्देश्य है माया के बीच जीते हुए माया के प्रभाव से मुक्त होना। जिस नाद से निकलकर आए, फिर से उसी में लीन हो जाना। स्वयं के मूल स्वरूप को समझ लेना। इसके लिए व्यक्ति को दर्पण चाहिए, जिसमें वह परिवर्तन को देख सके। संसार ही वह दर्पण है। व्यक्ति में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन को प्रतिबिम्बित कर देता है। इस दृष्टि से सम्पूर्ण जीवन व्यवहार ही सत्संग है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न कारणों से भिन्न-भिन्न लोगों की संगत करता है। वांछित के प्राप्त होते ही वहां से हट भी जाता है। स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति अनावश्यक और अवांछित के पास सोच-विचारकर तो नहीं जाता। तकदीर वहां ले जाए तो अलग बात है। इस सांसारिक सत्संग का मुख्य सूत्र होता है संस्कार। इनको ही व्यक्ति का धर्म कहा जाता है। क्योंकि इन्हीं के आधार पर व्यक्ति जीवन यात्रा तय करता है। जीवन के लक्ष्य निर्घारित करता है। इसीलिए कभी भी दो आदमियों का धर्म एक-सा नहीं होता। सम्प्रदाय हो जाता है।

 

आज व्यक्ति का धर्म नष्ट हो रहा है। उसे किसी प्रकार संस्कारों के क्षेत्र में शिक्षित ही नहीं किया जा रहा। सीधा उसको सम्प्रदाय से जोड़ दिया जाता है। एक संस्कारविहीन व्यक्ति अपने परिवार का भी हित नहीं करता। सम्प्रदाय अथवा देशहित के लिए कैसे सकारात्मक कार्य करेगा? हां, सम्प्रदाय के नाम पर किसी का भी अहित कर सकता है। बिना संस्कारों के उसके भीतर आसुरी भाव ही प्रबल होता जाता है। क्योंकि वह संगत का ही प्रभाव है। कोयले की दलाली में काले हाथ!

 

सत्संग का श्रेष्ठ स्थान परिवार ही होता है। बाहर जाकर किया सत्संग आज तो धन आधारित भी हो गया और शास्त्र आधारित भी रह गया। हम रामायण, महाभारत जैसी कथाएं सुनकर कुछ देर के लिए त्रेता और द्वापर युग में चले जाते हैं। वर्तमान से भटक जाते हैं। घर लौटकर पुन: कलियुग में व्यस्त हो जाते हैं। त्रेता और द्वापर में तो जी नहीं सकते। दर्द निवारक गोली की तरह कुछ देर मुक्ति का एहसास सत्संग नहीं कहला सकता। यह गोली कितनी महंगी होती है, इसको संतों की सम्पत्ति देखकर समझ सकते हैं। हर व्यक्ति अलग स्वभाव का होता है।

 

उसके जैसा सृष्टि में दूसरा नहीं होता। सबका प्रारब्ध, कर्म क्षेत्र और भाग्य भी अलग-अलग होते हैं।  अत: सत्संग भी तभी फलदायी होगा, जब व्यक्तिगत चिन्तनधारा और भावभूमि को प्रभावित कर सके। इने-गिने संत रह गए हैं जिनका ध्यान व्यक्तिगत रूपांतरण पर रहता है। वरना धन के जरिए से मीडिया से प्रचार और यश-कीर्ति का फैलाव लक्ष्य रह गया है। जो व्यक्ति समाज सुधार के लिए सांसारिक सुख छोड़कर संन्यास लेता है, वह नए सिरे से भिन्न प्रकार के ऎश्वर्य में खो जाता है। स्वयं को भगवान तक कहने लगता है। ऎसे महापुरूषों के साथ किया गया सत्संग सांई बाबा जैसी परिणति देता है। इसमें किसी के साथ जीवन का जुड़ाव नहीं होता।

 

जीवन का जुड़ाव सत्संग की पहली शर्त है। इसीलिए परिवार सबसे श्रेष्ठ सत्संग भूमि है। कभी मैला न पड़ने वाला दर्पण है। जीवन के पहलुओं पर विस्तार से व्यावाहारिक ज्ञान कराता है। स्वयं को समझने और सुधरने के लिए पूरा समय देता है। परिवार में सबका अपना-अपना स्थान होता है। मर्यादा के सूत्र में पिरोई एक माला की तरह हर मणिये का बराबर का महत्व होता है। उसका भी अपने प्रारब्ध के अनुरूप एक निश्चित स्वभाव होता है। संस्कारों की भी भिन्नता रहती है। सबसे बड़ी शर्त यह है कि आप साथ रहो या न रहो, सम्बन्धों को छोड़ा नहीं जा सकता। नहीं निभाने पर भी सम्बन्ध तो रहता है। व्यक्ति का व्यवहार ही संगदोष में बदल जाता है। परिवार और समाज के लिए उदाहरण बन जाते हैं।

 

परिवार के इस सत्संग का शत्रु भी सचाई को छिपाना ही है। झूठ ही है। यह झूठ सदा बोलने वाले का अपमान ही कराता है। मैं यदि अपने भाई या पुत्र का अपमान करूं  तो क्या मैं स्वयं का अपमान नहीं करता? पत्नी को यदि गाली दूंगा तो लगेगी तो मुझे ही। यदि उसे अपमानित होते देखकर मेरा खून नहीं खौले, तो सम्बन्ध कहां रह गया? प्रत्येक सम्बन्ध के साथ अपने व्यवहार को समझते जाना, संकल्प कर-करके ऊपर उठते जाना ही सत्संग का लाभ होता है। हम स्वयं को बचाने के लिए दूसरों को दोष देकर उनको अपमानित भी कर देते हैं। वह भी हमारा ही अपमान है। हम अपने किए से अपना ही सुख और साख घटाते हैं। दूसरों के कर्मो का फल हमको नहीं मिल सकता। इतने अनुभव दुनिया की कोई पाठशाला नहीं देती। तमस और राजस वृत्तियों और विचारों के पार जाकर सत्वगुण का ग्रहण ही सत्संग है। घर से बाहर का सत्संग यह गारण्टी नहीं देता। मन बहुत चंचल है।

 

एक कहावत है कि यदि आप पूरी दुनिया की बातें करते हैं, तो आपका ध्यान खुद पर कभी नहीं जाएगा। यदि आप स्वयं के सुधार के प्रति चिन्तित हैं, स्वयं के व्यवहार का नित्य आकलन (स्वाध्याय) करते हैं, तो आपको किसी की चिन्ता से व्यवधान नहीं होता। परिवार के वातावरण में हम एक-दूसरे का सहयोग करके संस्कार शुद्धि करते हैं। हर सदस्य के चिन्तन एक-दूसरे के प्रति सकारात्मक बनाते हैं। त्याग करते हैं। प्रेम करते हैं। सम्मान करने का अभ्यास करते हैं। धीरे-धीरे यही अभ्यास हमें समाज में भी प्रतिष्ठित करता है।

 

यही तो सत्संग का फल कहलाता है। इसके लिए परिवार का हर सदस्य बधाई का पात्र बन जाता है। ईश्वर की कृपा से ऎसी आत्माएं परिवार में अवतरित हुइंü, उसका भी धन्यवाद। और उन बुजुर्गो का भी धन्यवाद, जिन्होंने घर-परिवार को सत्संग की भूमिका के लिए तैयार किया। सभी को एक दूसरे का शुभ चिन्तक होने का पाठ सिखाया। यही सत्संग है। हर संग एक सत्संग बन जाता है।

 

गुलाब कोठारी

 

जनवरी 22, 2012

प्रहरी

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पत्रकार एक इतिहासकार भी होता है। साहित्यकार और कवि (क्रान्त द्रष्टा) भी होता है। उसका काम है अतीत पर आंख रखते हुए वर्तमान का आकलन और भविष्य पर लेखन। समाज में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या और समाज में स्वयं के प्रति विश्वास बनाए रखने का उत्तरदायित्व। उसके बिना पत्रकार के शब्दों की सार्थकता नहीं होती। न किसी के दिल को छू सकते हैं, न कोई इनका अनुकरण ही करेगा।

 

नौकरी करने वाले पत्रकारों की तरह जिनको न साख की चिन्ता, न ही पाठक के साथ भावनात्मक जुड़ाव की। उसे पेट भरने के लिए 6 घंटे काम करना है। ईमानदारी से। इस दृष्टि से राजस्थान पत्रिका ने भावनात्मक सम्प्रेषण के रूप में अपनी विशिष्ट  पहचान बनाई है। जो कुछ कहना है, उसमें विवेक के साथ-साथ भावना भी हो।

 

लोकहित का भाव तब सीधा मन के धरातल तक पहुंच जाता है। रास्ते में बुद्धि कोई प्रश्न या तर्क खड़ा नहीं करती। संदेश ग्राह्य हो जाता है। इसीलिए हम कहते भी हैं कि पत्रिका आत्मिक धरातल का समाचार-पत्र है। लोग इसका अनुसरण करते हैं। जैसे कभी धार्मिक ग्रन्थों का पारायण होता था। पत्रिका के सामाजिक सरोकार इसका उदाहरण हैं। राजस्थान के गुर्जर आंदोलन, भोपाल का किसान आंदोलन अथवा भोपाल के ही बड़े तालाब की जन-श्रमदान के द्वारा की गई खुदाई आदि पाठकों के विश्वास के अनुपम उदाहरण हैं। हमारे सामाजिक सरोकार हमें समाज के शुभेच्छु के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

 

एक अच्छे साहित्यकार की तरह पत्रकार भी शब्द-ब्रह्म का साधक होता है। स्वर, व्यंजन, छन्द, वर्ण आदि का ज्ञान एवं शरीर में उत्पत्ति स्थान, स्पन्दनों का प्रभाव आदि पर भी उसकी पकड़ मजबूत होती है। शब्दों की मंत्र शक्ति, सम्प्रेषण शक्ति, स्पन्दन शक्ति, नाद का रूप आदि का ज्ञान उसे ऋषि कोटि का स्थान दिला देता है। क्योंकि पत्रकार भी समाज को कुछ देने के लिए लिखता है। आगे की उपलब्घियां और सिद्धियां उसके श्रम एवं तप पर निर्भर करती है। आज मीडिया लेने के पीछे उतावला जान पड़ता है। मूल्यों से समझौता करता है। प्रतिस्पर्द्धा का वातावरण बन गया है।

 

इस दौड़ में पत्रकार भी श्रमजीवी बन गया है। तब वह स्वयं अपने ही लेखन से कैसे जुड़ेगा? उसका निष्प्राण लेखन उसी का पेट भर कर समाप्त हो जाएगा। अपने लेखन के शब्दों को यह पत्रकार तो कभी नहीं पढ़ पाएगा या सुन पाएगा। तब एक व्यक्ति अहंकार का मारा, प्राकृत ज्ञान से अनजान, पत्रकार का मुखौटा लगाए, पत्रकार के रूप में समाज में कभी प्रतिष्ठित नहीं होगा। इतिहास लेने वाले को कभी याद नहीं करता। कलम से कागज काले करता, कागज की नाव की तरह समय के साथ बह जाएगा। उसके द्वारा भेजे हजारों संदेशों में से किसी को कुछ याद नहीं रहेगा। पत्रकार के सम्प्रेषण का अर्थ है कि वह भी संदेश के साथ पाठक तक पहुंचे, स्वयं भी संदेश को निरन्तर ग्रहण करता जाए। समय के साथ अपने आवरण हटाता जाए और समाज के आवरण भी दूर करने में सहायक हो। तब जाकर समाज में रूपान्तरण की लहर उठेगी। पत्रकार की मशाल समाज में मिसाल बन जाएगी।

 

आज देश भर में लोकतंत्र का स्थान स्वच्छन्द तंत्र लेता जा रहा है, जो न केवल चिन्ता का विषय है, अपितु नई पीढ़ी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। इसका एक ही कारण है। प्रहरी स्वयं पथ भ्रष्ट हो गया। यहां तक कि उसने अपनी सही पहचान छिपाने के लिए चेहरे पर मुखौटा लगा लिया। जनता व लोकतंत्र के तीनों पायों के बीच सेतु का दायित्व निभाने वाला मीडिया स्वयं को ‘चौथा पाया’ कहने लग गया। सेतु का कार्य छोड़ दिया और स्तंभ का मुखौटा पहन लिया। संविधान माने या न माने, मीडिया ने स्वयं-भू घोषणा कर दी।

 

जनता और तीनों पायों के बीच का सेतु, लोकतंत्र का प्रहरी, पलायन कर गया। इससे न केवल तीनों स्तंभ निरंकुश हो गए, बल्कि स्वयं मीडिया भी स्तंभ जैसा ही व्यवहार करने लग गया। अत: वह भी जनता से दूर हो गया।  रखवाला के साथ जुड़ गया। शिक्षा ने और नेताओं ने जनता को जो सब्ज बाग दिखाए, उससे जनता निश्चिन्त होकर विश्राम के द्वश्स्त्रe में चली गई। पांच साल में एक बार मतदान करके सो जाती है। इससे अवधारणा भी मिट्टी में मिल गई। अब मीडिया की आक्रामकता का कारण जनता के मुद्दे नहीं रहे। अपने क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति ही उसका एकमात्र लक्ष्य बनने लगा। तभी तो पैड न्यूज जैसा व्यवहार, ब्लैकमेलिंग से लेकर माफिया की तरह सरकारों तक को धमकियां देने की शिकायतें आम हो गई। तब मीडिया कैसे तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष कर सकता है? वह तो स्वयं तंत्र का अंग हो गया। जनता के सामने तीनों स्तंभों के साथ खड़ा हो गया।

सत्ता का मद स्तंभ को तो स्वीकार करता है, सेतु को स्वीकार नहीं करता। अत: स्वयं सरकार ही उसकी शत्रु हो जाती है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकारें इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। वे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करतीं। निजी हित साधन में कार्यपालिका भी उनके साथ है।

 

इस परिस्थिति से बाहर निकलना भी आवश्यक है। भावी पीढ़ी के लिए कुछ तो नया आधार देना पड़ेगा। भ्रष्ट लोगों के चंगुल से देश को मुक्त कराना पड़ेगा। यह कार्य केवल और केवल मीडिया ही कर सकता है। इसे लोकतंत्र के पाये के स्थान पर फिर से लोकतंत्र का प्रहरी बनाना पड़ेगा। शेष तीनों स्तंभों की निगरानी करनी पड़ेगी। जनता के बीच जो साख आज गिर रही है, जो व्यापारिक स्वरूप उभरता जा रहा है, उस पर अंकुश लगाना पड़ेगा।

 

अकेला मीडिया ही तीनों स्तंभों को दिशा दे सकता है। देश से भ्रष्टाचार मिटा सकता है। तब यह कार्य कैसे किया जाए और कौन करे? युवा वर्ग ही वह शक्ति है। उसे मीडिया के साथ जुड़ जाना होगा। सूचना के अघिकार का भी निरन्तर उपयोग करना पड़ेगा। देश के बड़े-बड़े घोटाले इसी तरह सामने आ पाए। जो मीडिया-टीवी, अखबार, रेडियो, जनता का साथ नहीं दे, उसका घर में प्रवेश बन्द। जो ब्लैक मेल करता नजर आए, घटिया, नकारात्मक भाषा एवं सामग्री परोसे, अपने स्वार्थ के आगे लोकहित को गौण कर दे, उसका तुरंत सामूहिक रूप से बहिष्कार किया जाए। फिर देखना परिवर्तन कैसे आता है। तब पत्रकारों की लेखनी भी प्राणवान हो जाएगी। पाठक भी कलम के द्वारा फिर से पूजा जाने लगेगा। हमें आजादी को आजाद करने के लिए, ‘जनता के द्वारा’ लोकतंत्र को पुन: स्थापित करने को संकल्पित होना होगा।

 

 

गुलाब कोठारी

 

जनवरी 17, 2012

कौन किसका?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत का छत्तीसगढ़ दौरा पूरा हो गया। प्रदेश के संघ एवं भाजपा पदाघिकारियों ने इस प्रवास के भिन्न-भिन्न अर्थ भी लगाए। भागवत जी को कुछ निर्णायक एवं गंभीर मूड में भी माना। विशेष रूप से जो स्नेह भाजपा सांसद नंदकुमार साय के साथ आत्मीयता के क्षण बिताकर जताया। उनके साथ भोजन करके जो संदेश दिया, वह अपने आप में अनूठा माना जा रहा है।

 

 

इसी प्रकार भिलाई को राजनीतिक मानचित्र पर उभरने के विशेष प्रयत्न भी जारी हैं, यह स्पष्ट हुआ। पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का आयोजन भी भिलाई में ही रखा गया था। इस बार संघ प्रमुख के साçन्नध्य में भिलाई शिखर की ओर बढ़ता नजर आया। यहां की सांसद सरोज पांडे को आगे लाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री व राज्य के प्रभारी सौदान सिंह भी बराबर प्रयासरत रहे।

 

इसके विपरीत छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को एक बार तो लगभग आधा घंटा बाहर ही प्रतीक्षा में बिठा दिया, जो कि काफी चर्चा में है। इसे आश्चर्य की दृष्टि से देखा जा रहा है। इतना ही नहीं, जब सात प्रमुख पदाघिकारियों की अलग से बैठक हुई, उसमें भी मुख्यमंत्री के स्थान पर विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के साथ ही विचार-विमर्श चलता रहा।

 

इस बात को एक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है कि जहां-जहां भी सर संघचालक बोले, भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर बोले। भाजपा एवं संघ इस तथ्य को मुख्यमंत्री के लिए सार्वजनिक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। इसी के साथ-साथ आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत संघ के विभिन्न संगठनों की रिपोर्ट भी पूरी तरह नकारात्मक ही रही। सब इस बात पर एकमत थे कि इन क्षेत्रों तक विकास अभी तक भी नहीं पहुंचा है। कुछ गांवों में मुख्यमंत्री को नाराजगी जताते हुए लौटाने की जानकारी भी चर्चा में आई।

 

मोहन भागवत पूरे प्रवास में गंभीर अवश्य नजर आए, किंतु यह भी लगा कि केसी सुदर्शन के पहले तक के सर संघचालकों की तुलना मे भागवत कमजोर साबित हुए। हो सकता है इसका कारण ‘मराठा-पे्रम’ रहा हो। किंतु इसकी बड़ी कीमत भाजपा को ही चुकानी पड़ेगी।

 

जैसे ही भागवत विदा हुए, जयराम रमेश (केंद्रीय मंत्री) रायपुर ही नहीं, बल्कि रमन सिंह के साथ बस्तर के सुकमा जिले के उद्घाटन पर पहुंच गए। गत प्रवास में वन मंत्री के रूप में दो नए क्षेत्र छत्तीसगढ़ को खनन के लिए खोल गए थे। किंतु इसका एक प्रभाव यह भी दिखाई दिया कि कांग्रेस के एक केंद्रीय मंत्री के साथ कोई भी स्थानीय नेता सुकमा नहीं पहुंचा। इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा? इस समीकरण के अर्थ किसकी समझ नहीं आएंगे। शायद मोहन भागवत को अपने प्रश्नों के उत्तर भी मिल गए होंगे।

 

गुलाब कोठारी

 

जनवरी 15, 2012

सेतु रहने की चाह

पत्रकारिता इतिहास का लेखन भी है और भविष्य का लोक शिक्षक भी है। एक ही शर्त है कि उसके प्रति पाठक के मन में विश्वास होना चाहिए। इसके बिना पत्रकार एवं उसके संदेश दोनों अल्पजीवी रह जाते हैं। समाज के रूपान्तरण में भागीदार नहीं हो सकते। सम्प्रेषण का तो लक्ष्य होता है समाज के चिन्तन में परिवर्तन और जीवन शैली में रूपान्तरण। इसके लिए भीतर संकल्प की चिंगारी सुलगती रहे। इस चिंगारी का नाम पत्रकार है।

 

 

अखबार में नौकरी करने वाले शरीर को पत्रकार संज्ञा दी गई है, किन्तु रूपान्तरण करने वाला, साक्षी भाव में दृष्टा बनकर विषय को देखने वाला सन्त ही सदा लोकहित की मर्यादा में बात कहेगा। उस बात को स्वयं भी सुनेगा तथा स्वयं को सदा विषय से दूर रखेगा यानी कि निष्पक्ष रहेगा। इसी अवधारणा का एक मूर्त रूप पत्रिका ने पाठकों के समक्ष रखा रविवारीय अंक में ‘जैकेट’ के रूप में। इस प्रयोग को आज पूरा एक वर्ष हो गया। एक ओर व्यावसायिकता कलम पर बुरी तरह हावी है। विज्ञापनों के लिए सारे झूठ-सच, दावे-धमकियां प्रचलन में हैं, वहीं आपकी इस पत्रिका ने लोभ का संवरण किया तथा नई पीढ़ी के भविष्य को ध्यान में रखकर अनेक विषय उठाए।

 

उन विषयों का बदलता स्वरूप एवं नई तकनीक तथा रोजगार से जुड़ी संभावनाओं का स्पष्ट चित्रण भी किया। देश के राजनीतिक हालात, देश में नेतृत्व का अभाव तथा बड़े राष्ट्रीय दलों की एकरूपता, भ्रष्टाचार एवं युवा वर्ग के समक्ष उपलब्ध विकल्प, पुलिस की बदलती छवि जैसे नितान्त अनिवार्य विषयों पर विस्तृत चर्चा की। यहां यह कहना सही होगा कि पत्रिका ने पिछले वर्षो में भावनात्मक पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों में विश्वास के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। राजस्थान का गुर्जर आन्दोलन एवं भोपाल का किसान आन्दोलन कैसे पत्रिका की पहल से एक ही दिन में ठहर गए थे। भावनात्मक धरातल पर आदान-प्रदान के कारण ही पत्रिका ‘द न्यूज पेपर विद अ सोल’ बना।

 

पिछले एक साल के 52 रविवार जैकेटों के अलावा भी लगभग डेढ़ दर्जन अन्य अवसरों पर पत्रिका के जैकेट प्रकाशित हुए। जैकेट के विषय रोजमर्रा के विषयों से हटकर, किन्तु राष्ट्रीय महत्व के रहे हैं। कुछ नमूने उदाहरण के लिए इस पृष्ठ पर भी प्रकाशित किए जा रहे हैं।

 

आज लोकतंत्र में वंशवाद का नासूर पैदा हो गया, जिसके चलते देश एक परोक्ष राजाशाही-तानाशाही का शिकार होता जा रहा है। नेहरू-गांधी परिवार यदि छह दशकों से सत्ता पर काबिज है, तब इसका दुरूपयोग अन्य दल अथवा प्रभावशील वंश क्यों नहीं करेंगे। कहां-कहां इस विकृति की मार पड़ रही है, उसकी चर्चा भी की गई। युवा वर्ग इस चुनौती को कैसे झेलता है, उसी पर देश में लोकतंत्र का भविष्य टिका है।

 

इसी से जुड़ी मध्य एशिया की क्रान्तियों की ओर भी इशारा किया गया। वहां के एवं भारत के हालात भी सामने रखे तथा यह अपेक्षा भी की गई कि कोई क्रान्ति जन्म लेनी चाहिए। भ्रष्टाचार सारी हदों को पार कर चुका है। इसी प्रकार परमाणु विकिरण का खतरा है। हम नए-नए परमाणु संयंत्र लगाने की योजना तो बना रहे हैं, उनके विश्वव्यापी परिणाम भी लोगों के ध्यान में रहें।

 

अन्ना हजारे के आन्दोलन ने वर्षो बाद देश को ईमानदार एवं संकल्पवान नेतृत्व दिया। पूरा देश एकाएक उधर खिंचता चला गया। आज देश के समक्ष सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व का अभाव ही है। यही इतने भ्रष्टाचार का कारण भी है।

 

संसद में रखे जाने वाले विभिन्न विधेयकों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। विशेष रूप से महिला आरक्षण विधेयक की व्यावहारिकता, लिव-इन-रिलेशनशिप, रिटेल में एफडीआई आदि पर जैकेट के जरिए दी गई जानकारी का प्रभाव गहरा नजर आया।

 

इतना सब कहने का एक ही अर्थ है कि पत्रिका स्वप्रेरणा से पाठकों के हित में कई ऎसे कार्य हाथ में लेता रहा है, जिन पर अन्य माध्यम मौन दिखाई पड़ते हैं। ‘जागो जनमत’, संवाद सेतु, गुणवत्ता पुरस्कार, शहर के सफाई अभियान, अमृतं जलम् आदि कुछ उदाहरण हैं। एक ओर इन अभियानों की पूर्ति से कई तरह की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, पाठकों में प्रेरणा का प्रवाह होता है तथा विश्वास का रिश्ता आगे से आगे मजबूत होता जाता है। हम यह नहीं कहते कि हम चौथा स्तंभ हैं, क्योंकि स्तंभों से ही तो जनता दु:खी है। हम उनके साथ नहीं खड़े रहना चाहते। हम जनता एवं तीनों स्तंभों के मध्य सेतु ही रहना चाहते हैं। यही हमारे संविधान की मंशा भी है।

 

गुलाब कोठारी

 

दिसम्बर 27, 2011

विज्ञान भीतर भी

बाल वैज्ञानिकों की राष्ट्रीय कांग्रेस जयपुर में कल शुरू हो गई। देश के लगभग डेढ़ हजार बच्चे इसमें भाग ले रहे हैं। आज विज्ञान जीवन शैली का सर्वाघिक महत्वपूर्ण अंग बन गया है। भारत में धर्म का स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है। सदियों से धर्म और विज्ञान आमने-सामने डटे रहे हैं। अब समय आ गया है कि हमको धर्म एवं विज्ञान को नई परिभाषा देनी चाहिए। क्योंकि दोनों के सहयोग से ही जीवन में पूर्णता संभव है।

 

 

आज पश्चिम, विज्ञान के कीर्तिमान स्थापित करने के बाद भी जीवन में भटकाव तथा तनाव से मुक्त नहीं हो पाया। पूरब में तनाव नहीं है, किन्तु समृद्धि हाथ से छूटती दिखाई पड़ती है। जब कि सबका लक्ष्य धन कमाना ही है। भारत में ज्ञान की परिभाषा है-’एकोज्ञानं ज्ञानम्’। सृष्टि में एक ही सत्ता केन्द्र में है। कृष्ण ने भी कहा गीता में-’ममैवांशो जीव लोके——-’ सभी जीवों के भीतर मैं ही हूं। इस बात को जान लेना ही ज्ञान है। ज्ञान को सीखा नहीं जा सकता। व्यक्ति जैसे-जैसे भीतर में स्वयं को जानता चला जाएगा, ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता चला जाएगा। हम जो कुछ शिक्षा में ग्रहण करते हैं-वह सूचना एवं जानकारियों की बाहरी श्रेणी है। ज्ञान तो भीतर प्रकट होता है, प्रज्ञा का, विजडम का क्षेत्र है। ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय (विषय) सदा साथ रहते हैं।

 

पश्चिम के विज्ञान में ज्ञान और ज्ञेय साथ रहते हैं। ज्ञाता स्वयं उपकरणों का अंग नहीं बन पाता। अत: इस ज्ञान का उपयोग व्यक्ति पर निर्भर करता है। सदुपयोग या दुरूपयोग। धर्म के सारे प्रयोग व्यक्ति स्वयं के भीतर करता है। अत: उसके परिणाम कल्याणकारी ही होते हैं।

 

विज्ञान का अर्थ है विशिष्ट ज्ञान। एक से अनेक बनने का ज्ञान। कैसे होता है सृष्टि विस्तार। भारतीय जीवन पद्धति पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। इसको समझने के लिए संस्कार चाहिए। प्रकृति की जानकारी होनी चाहिए। प्रकृति कैसे हमारे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को प्रभावी करती है-इसे समझना होता है। शरीर की भाषा, शरीर में मन-बुद्धि एवं आत्मा की अभिव्यक्ति पहला चरण है स्वयं को जानने का। बिना स्वयं को जाने विज्ञान को किस आधार पर उपयोगी ठहराओगे?

हमारे यहां शरीर के पांच कोष बताए हैं। इनके भीतर आत्मा का वास है। इस यात्रा के लिए नाद-ब्रह्म या शब्द ब्रह्म का मार्ग भी है। विज्ञान भी ध्वनि पर कार्य कर रहा है। पर हमारे शोध से बहुत दूर है।

 

महाविस्फोट भी करके देख रहा है, किन्तु प्राणों की भूमिका (अघिदेव) पर पश्चिम मौन है। हम प्राणों को ही देवता कहते हैं। सारी क्रियाओं का आधार प्राण ही है। पश्चिम हमारे देवताओं पर हंसता तो है, किन्तु अनुत्तरित भी है। हमारे तैंतीस देवता, तैंतीस वर्ण। हर एक अक्षर किसी देवता का मंत्र कहा गया है। मंत्र सरस्वती का क्षेत्र है। चेतना का रूप है। इससे लक्ष्मी (निर्जीव) पैदा होती है। हम सरस्वती के पीछे भागते हैं। पश्चिम लक्ष्मी के पीछे भागता है। जहां नेतृत्व ही जड़ करता हो, वहां चेतना सुप्त ही होगी। यह कार्य आज की शिक्षा ने ही किया है।

 

आज शिक्षा का अर्थ है विषय पढ़ना, कॅरियर यानी कि पेट भरना। शरीर और बुद्धि से पुष्ट एवं तुष्ट होना। मन और आत्मा से रूष्ट होना। शिक्षा में है नहीं। मां-बाप भी देते नहीं। बच्चों को स्वयं इस अभाव को दूर करना पड़ता है। इसके बिना पूर्णता संभव नहीं। ये भीतर का संसार है। दोनों का संतुलन ही सुख का आधार है। हम विज्ञान के सहारे बाहरी जीवन का विकास भी करें तथा मूल्यों के आधार पर हम अध्यात्म का विकास भी करें। स्वयं को जितना जल्दी जान सकें, प्रयास करें।

 

शब्द की शक्ति को पहचानें। नाद के स्पंदन से सृष्टि कैसे होती है, कैसे सम्पूर्ण जीवन नाद के स्पंदनों से प्रभावित रहता है। रोगी अथवा निरोग रहता है। कैसे नाद के सहारे हम पांचों कोष्ा पार करके अपने आपसे, अपनी आत्मा से, साक्षात्कार कर सकते हैं। अपनी जन्मजात शक्तियों का विकास कर सकते हैं। इसीलिए ईश्वर ने हमको, हर एक को, अद्वितीय बनाया है। हमें शिखर तय करने चाहिए, छूने चाहिए। किसी की नकल करके अपना महत्व कम नहीं करना चाहिए।

 

ईश्वर का आभार मानें कि हमें वह सब कुछ दिया है, जिससे हम विश्व का कल्याण कर सकें। हमारे विज्ञान भाव का परिणाम है-वसुधैव कुटुम्बकम्!

ज्ञान और विज्ञान मिलकर ही मानव समुदाय को संवेदनशील बना सकते हैं। मानव को पशु रूप आचरण करने से रोका जा सकता है। इन दोनों के बीच सेतु रूप शब्द ब्रह्म को समझने की आवश्यकता है। प्राणायाम का अभ्यास और श्वास-प्रश्वास पर शब्द सवार होकर हमारी जीवन यात्रा को पुरूषार्थ के अनुरूप सफल बना सकते हैं। आप सबको मंगल कामनाएं!

 

गुलाब कोठारी

दिसम्बर 18, 2011

छाया

या देवी सर्वभूतेषु छाया रूपेण संस्थिता।

 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

परिणाम-धर्मा कामना को धर्म कहते हैं। कामना का ही एक अर्थ है भूख-क्षुधा। कामना पूर्ति के अभाव में व्यक्ति व्याकुल हो जाता है। जैसे भूखा व्यक्ति निशक्त महसूस करता है। माया का विद्या/ अविद्या रूप कामना की दिशा तय करता है। कामना पूर्ति से नई ऊर्जा का प्रवाह होता है। व्यक्ति नया कर्म करने को प्रेरित होता है। अपने अहंकार के फैलाव में जुट जाता है। इस नई शक्ति को छाया कहते हैं। व्यक्ति की दिन-रात में भिन्न-भिन्न छाया बनती रहती है। अर्थात स्वयं एक होते हुए भी सब से भिन्न-भिन्न व्यवहार करता है। हमारे सारे रिश्ते छाया रूप ही हैं। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र आदि सब।

 

कोई भी एक दूसरे के सामने सचाई प्रकट नहीं करता। छाया जीवन की अनिवार्यता है। इसके बाहर कोई जीवन नहीं हुआ करता। इसकी सीमा को कोई लांघ भी नहीं सकता। मनुष्य तो आकृति का नाम है। इससे जीवन व्यवहार नहीं चलता। अत: उसका एक संज्ञा रूप होता है ताकि वह स्वरूप के साथ जुड़कर उसकी पहचान बना सके। किन्ही दो व्यक्तियो में भेद किया जा सके। मनुष्य हर एक से अलग व्यवहार करता है। भाई से अलग, बहन से, पिता से, मित्र से, कार्यालय में, समाज में, सबसे अलग-अलग। दिन भर में 200 लोगों से भी मिलता है तो सबसे ही भिन्न व्यवहार करता है। जैसे हर एक से बात करने के लिए अलग-अलग मुखौटा लगाता हो। इसी को छाया कहते हैं। यही बाधा है जो मूल प्रकाश को ढककर, छाया रूप लेता है। व्यक्ति को अपनी नई पहचान बनाने की भी बड़ी भूख होती है। यश कमाने की और प्रशंसा पाने की भी कामना रहती है। यह क्षुधा रूप ही छाया बनकर जीवन को प्रेरित करती है।

 

छाया ही प्रतिबिम्बित मन की कामना है। मूल मन या श्वोवसीयस मन या अव्यय मन तो हमारी आत्मा है। उस पर अनेक आवरण पड़े हैं। उनके पार जो आत्म-स्वरूप दिखाई पड़ता है, वही प्रतिबिम्ब है आत्मा का। छाया है। इसी कारण हमारी कामनाएं भी दो प्रकार की होती हैं। एक मूल मन की, एक प्रतिबिम्ब की। प्रतिबिम्ब में प्रकृति के तीनों गुण रहते हैं। इसकी कामना भी गुण प्रधान होगी। विद्या और अविद्या द्वारा संचालित होगी। मूल मन गुणातीत है। यह ईश्वरीय कामना होती है।

 

ईश्वरीय कामना में व्यक्ति के चाहने से परिवर्तन नहीं आता। उसकी कामना प्रारब्ध से जुड़ी रहती है। आत्म रूप होने से यह मन कुछ करता नहीं है। केवल सीमा मात्र है। व्यक्ति जो कुछ भी करता है, अच्छा-बुरा जैसा भी वह बनता है, वह छाया रूप ही है। आत्म रूप से जो जुड़ता है, वह शुद्ध होता है। छाया रूप सोच-विचारकर किया जाने वाला नाटक है; अभिनय है। नाटक आप स्वयं ही तय करते हैं। वास्तविकता को ढकने का प्रयास तथा वास्तविक जैसा दिखाई देने का प्रयास ही नाटक कहलाता है। मनुष्य कितना सोच-समझकर, प्रयास करके प्रतिदिन सचाई से दूर जीता है। फिर हर गलत परिणाम के लिए भाग्य अथवा ईश्वर को दोष देता है। बुद्धि का जन्म शायद इसी बात के लिए हुआ है। अहंकार की संतान है। विज्ञान भी बुद्धि की ही देन है और बुद्धि ही उसका उपयोग तय करती है। जीवन के अनेक बड़े-बड़े कष्टों का कारण बुद्धि बनती है। वह भी व्यक्ति की छाया रूप ही होती है। इसी प्रकार प्रतिबिम्ब मन भी छाया है। अत: मन और बुद्धि के निर्णय भी छाया रूप ही माने जाएंगे।

 

जीवन का लक्ष्य होता है पुरूषार्थ। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। अर्थात, त्रिगुण के चंगुल से बाहर निकल जाना। कामना से पार चले जाना। तब कोई बन्धन नहीं है। ऎसी स्थिति बनती है मन के पार पहुंचकर। अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोष का तो सारा व्यापार ही त्रिगुण युक्त है। शरीर का अन्न भी और मन तथा इन्द्रियों के व्यापार भी। इन दोनों के मध्य जब तक व्यापार बना है, वह कामना तथा फल का व्यापार है। तब ये गारण्टी नहीं है कि व्यक्ति की चेतना सुप्त है या नहीं। चेतना की जाग्रति का सूत्र है विज्ञानमय कोष और वहां तक पहुंचने का एक मात्र साधन होता है ध्यान। विज्ञान के सहारे चेतना तक पहुंचना संभव नहीं है।

ध्यान के प्रयोग मन के पार जाने के प्रयोग हैं।

 

काम, क्रोध, मोह आदि जीवन में छाया रूप बने रहते हैं। मेरा नकली चेहरा बनाकर समाज के सामने रखते हैं। ध्यान में इस छाया रूप को आसानी से हम समझ सकते हैं। वहां मिलावट या किसी प्रकार की तोड़-मरोड़ संभव नहीं है। आप किसी स्थिति को अपने पक्ष में नहीं कर सकते। और यदि छाया से पीछा छुड़ाना ही है तो पहले तो संकल्प करना चाहिए कि जब तक छाया से मुक्त नहीं हो जाऊं, मेरे प्रयास शिथिल नहीं होंगे। ध्यान में संकल्प के साथ उतरूं कि छाया के कारणों को समझूंगा और उनसे मुक्त हो जाऊंगा। तब तक मेरा कर्ता भाव नहीं रहेगा। सारा कर्ता भाव छाया का ही होगा। माया का ही होगा।

 

ध्यान में किया गया चिन्तन भाव बनकर उभरता है। आप एक-एक भाव पर ध्यान करते जाएं। जैसे ही भाव स्पष्ट हुआ अथवा कारण स्पष्ट हुआ कि आवरण स्वत: ही लुप्त हो जाएगा।

 

ध्यान ही चेतना का जागरण करता है। इसकी शुरूआत में ही व्यक्ति को शरीर से मुक्त हो जाना होता है। शवासन या कायोत्सर्ग की मुद्रा, भ्रस्त्रा, एकाग्रता का अभ्यास आदि इसमें सहायक क्रियाएं हैं। प्राणायाम दूसरा सोपान हैं। इसमें श्वास को लयबद्ध एवं मन्द करना होता है। जैसे-जैसे ध्यान गहन होता है, श्वास की गति मन्द होती जाती है। यह मन्द गति चमत्कारी साबित होती है। इसकी शरीर और मन को जोड़ने की शक्ति घट जाती है। मन में विचार चलते रहते हैं, वासनाएं भी जाग्रत रहती है, किन्तु शरीर पर प्रभावी नहीं हो पाती। तब संकल्पित मन विज्ञानमय कोष की ओर मुड़ता है। सुप्त चेतना से उसका साक्षात होता है। मन की वासनाएं चेतना से टकराती हैं।

 

उन वासना तरंगों को व्यक्ति समझने का प्रयास करता है। भाव भी विचार रूप होते हैं। विचार भी पदार्थ होते हैं। आचार का निर्माण विचारों से होता है। मनुष्य वैसा ही बन जाता है। भावना का अगला स्वरूप ही ध्यान है। भव यानि संसार, भाव यानि विचार। एक रोग, एक चिकित्सा। अन्तकरण की प्रवृत्ति को भाव कहा है। ध्यान आत्म चिन्तन है, अनुप्रेक्षा है। भाव एवं ध्यान साथ रहते हैं। बार-बार स्फुरित होने वाली विचार तंरगें ही भाव कहलाती हैं। जिनके द्वारा मन को भावित/ संस्कारित किया जाए। आत्मा का एकत्व, अनित्यता, अशरण आदि को धर्मध्यान कहा है। आगे चलकर ध्यान भी निरालम्ब रूप होने लगता है। यह ध्यान और इसके साथ लोक कल्याण का भाव, सकारात्मक नीयत, समष्टि भाव या वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा हर ध्यान को ऊध्र्वगामी बना देती हैं। तभी चेतना के जागरण की संभावना बन सकती है। चेतना का जागरण प्रकाश की स्थिति है। अत: छाया लुप्त हो जाती है। व्यक्ति आनन्द कोष में प्रतिष्ठित हो जाता है।

 

गुलाब कोठारी

 

दिसम्बर 3, 2011

भूखे बालगोपाल

जनता सत्ता को देखती है। सत्ता जनता को नहीं देखती। जनता सत्ता परोसती है। सत्ता जनता को ही कोसती है। सत्ता में बैठा व्यक्ति झूठ के सहारे ही स्वयं की श्रेष्ठता साबित करता है। उसके लिए इससे अच्छा व्यक्तित्व होता ही नहीं। सम्पूर्ण सत्ता का उपयोग स्वयं को सुरक्षित करने में तो करता है, किन्तु दूसरा उसे हर हाल में ही सुरक्षित लगता है। संवदेना सत्ता की शत्रु है। लोकतंत्र भी है तो सत्ता का ही एक स्वरूप।

भोपाल का गैस काण्ड इसका जीता-जागता उदाहरण है। यूनियन कार्बाइड ने तो इसे डाऊ केमिकल्स को बेच दिया और स्वयं चल बसी। पीडितों को छोड़ गई डाऊ के भरोसे। व्यापारी कम्पनी थी। किन्तु हमारी सरकार भी क्या व्यापारी हो गई?

सारे सत्ताधीश मगरमच्छी आंसू बहाते रहते हैं। पीड़ा वहीं की वहीं है। किसी ने कोई संकल्प किया हो, बीड़ा उठाया हो, सहायता करने का, दिखाई नहीं देता। हां, आश्वासनों के आसव सब पिलाते ही रहते हैं। करोड़ों के सब्जबाग दिखाते आ रहे हैं। करोड़ों खर्च भी बता रहे हैं। खूब खा भी रहे हैं। एक-दूसरे पर आरोप भी चलते रहते हैं। ऊपर से वोटों की राजनीति कोढ़ में खाज का काम कर रही है। घर उजड़ गए। कोई बात नहीं। उनको तो नाम भी याद नहीं। आपका वोट किसी और से डलवा लेंगे, किन्तु कष्ट के समय साथ देने के लिए उनके पास समय नहीं होता। फिर सरकार का अर्थ क्या? सरकारें तो आती-जाती रहेंगी पर करेंगी कुछ नहीं। गैस पीडित परिवारों को उनका हक देने की बजाय उनके साथ भिखारियों की तरह बर्ताव क्यों किया जाता है? ये परिवार सरकारी मदद के मोहताज क्यों रहें? क्यों नहीं समाज के लोग ही एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आएं। सक्षम लोग पीडित परिवारों के बच्चों को गोद लें और उनकी शिक्षा व स्वास्थ्य का खर्चा उठाएं। तब ही भोपालवासियों में आत्मसम्मान से जीने का भाव पैदा हो सकेगा। गैस त्रासदी के पीडितों को भी लगेगा कि उनकी मदद अपने ही कर रहे हैं।

कोई आए, लोगों को लूटकर ले जाए, जनता को मारकर चला जाए, संसद पर हमला कर जाए, सीमा में प्रवेश कर जाए, और सरकार? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यदि सरकार फैसले को लागू नहीं करा पाए तो सरकार पंगु ही कही जाएगी। या सम्बंधित सरकारी प्रतिनिधि डाऊ के दलालों की तरह मौन बैठे हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हम इन भागीदारों को पकड़वा नहीं सकते? उनकी गतिविधियों को देखें। सन् 2012 का ओलम्पिक आयोजन डाऊ के साçन्नध्य में हो रहा है। वही मुख्य प्रायोजक है। कितने अरबों डालर खर्च रहा है। भारत सरकार चुप बैठी है। यह सही समय है उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का।
उसके बारे में प्रचार भी ढंग से किया जाए। शर्म आती हो तो, इस बार भारत को ओलम्पिक खेलों के बहिष्कार करने की भी घोषणा कर देनी चाहिए। यह मुद्दा भी उतना ही भावनात्मक है, जितना कि खिलाडियों का भाग लेना। इण्टरपोल, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय आदि के जरिए भी कार्रवाई होनी चाहिए।

इनके साथ-साथ राज्य तथा केन्द्र को मिलकर इनकी पूर्ण व्यवस्था करनी चाहिए। आज लाखों-करोड़ के तो घपले हो ही जाते हैं। पीडितों के लिए कुछ सैकड़ों करोड़ भी हम मांगकर खर्चना चाहते हैं। भोपाल गैस हादसा हुआ तब से अब तक करीब सैंतीस सौ करोड़ रूपए मुआवजे के नाम बांटे गए। लेकिन पीडितों की हालत जस की तस है। यही मेरा भोपाल है, जहां के भूखे बालगोपाल हैं।

वाह रे सोने की चिडिया।

गुलाब कोठारी

नवम्बर 27, 2011

माधुर्य

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जी वन में सबकी एक ही कामना होती है-सुख की प्राप्ति। इसके लिए हर व्यक्ति दुख से बचने का प्रयास करता रहता है। उसे यह भी नहीं मालूम कि सुख-दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि सुख के चक्कर में दुख से मुक्त हो गए तो सुख से भी मुक्त हो जाओगे। सुख को पाने के लिए दुख के मध्य से संघर्ष करते हुए, तपते हुए ही गुजरना पड़ता है। तभी सुख और दुख का स्वरूप भी समझ में आता है और सुख की कीमत भी। वास्तव में दुख जीवन की परीक्षा है और सुख उसमें तपने का परिणाम। एकपक्षीय जीवन तो संभव ही नहीं है। हां, जीवन के इस द्वैत से बाहर निकलने पर संभव है।

 

 

इसी प्रकार कर्म है और उसी के अनुरूप कर्मफल का सिद्धान्त है। इसी कर्मफल के डर से व्यक्ति अच्छा कार्य- व्यवहार करने का प्रयास करता है। सारे कर्मो का मूल आधार विषय का ज्ञान तथा फल की इच्छा होते हैं। ज्ञान और इच्छा भाषा मूलक है। इनकी शब्दों में व्याख्या हो सकती है। इनका प्रभाव क्रिया रूप होकर फल तक चलता है। क्रिया की दिशा इच्छा के स्वरूप पर भी निर्भर करती है। मन यदि प्राण-वाक् से जुड़ता है तो क्रिया की दिशा अलग होगी। मन यदि विज्ञान-आनन्द से जुड़ता है तो क्रिया की दिशा विपरीत या ऊध्र्वगामी होगी।

 

इसका निर्घारण इच्छा से नहीं होता। ज्ञान से भी नहीं होता। इसका निर्घारण भावना अथवा नीयत, मंशा से होता है। मंशा आंखों में दिखाई पड़ती है। मन का दर्पण होती हैं आंखें। चेहरे पर भी एक प्रतिबिंब होता है भावना का। अच्छे भाव वाले व्यक्ति के चेहरे पर सदा एक मुस्कान भी रहती है। मुस्कान मन की निर्मलता का प्रतिबिंब ही है। मानवता की श्रेष्ठता का प्रमाण है।

 

इसी के कारण वाणी का माधुर्य व्याप्त रहता है। मधु अथवा रस का नाम माधुर्य है। इसमें आनन्द भी है, बन्धन भी है और मुक्ति का मार्ग भी जुड़ा है। प्रवृत्ति भी है और निवृत्ति भी। अज्ञान के कारण राग को ही सुख मान लिया जाता है। वहां इस सहज मुस्कान के दर्शन नहीं होते। ज्ञान के अभाव में माधुर्य नहीं होता। हम अपने कर्म और उनके फल का स्वयं आकलन कर सकते हैं।

 

माधुर्य शब्दों में भी सुनाई देता। शब्द चूंकि ब्रह्म है, अत: वही सृष्टि में परिणामों का कारक भी है और वाहक भी। शब्दों के माध्यम से यदि हम मिठास बांटेंगे, तो हमे भी मिठास ही मिलेगा। यह निश्चित है। प्रकृति वही लौटाती भी है जैसा हम देते हैं। जैसा वर्तमान, वैसा ही भविष्य। मिठास जीवन को विस्तार देता है। रस है पर्यायवाची ब्रह्म का। रसौ वै स:। जहां ब्रह्म है, वहां आनन्द निश्चित है। मुस्कान, मिठास जीवन में ब्रह्म की प्रतिष्ठा का प्रमाण है। इनकी निष्पत्ति प्रेम में होती है। जहां प्रेम है, वहां लेन-देन नहीं है। व्यापार नहीं है। बस देना ही देना है। उंडेलना है। इसे कोई आवरण फिर ढंक नहीं सकता।

 

हमारा शरीर-बुद्धि-मन सब कुछ ध्वनि के स्पन्दनों से निर्मित होता है। जो कुछ हम बोलते हैं, उसमें स्पन्दन होता है, सुर होता है, हमारी भावना होती है। इसी के अनुरूप पार्थिव तत्वों को आकृष्ट करती है। आध्यात्मिक धरातल पर रहने वाले साधक लयपूर्ण, माधुर्य के साथ ; शान्त मुद्रा में बात करते दिखाई पड़ते हैं। एक विशेष रचनाधर्मिता उनकी वाणी से प्रकट होती है। तब वाणी में जीवनदायिनी शक्ति का बोध होता है। आप दूसरों को तथा स्वयं को किन शब्दों से सम्बोघित करते हैं, वे आपके जीवन का निर्माण करते हैं।

 

प्रकृति के अंग होने के कारण हम भी स्रष्टा हैं। परमात्मा की तरह। हमारी सृष्टि क्रियाएं शब्दों से संचालित होती हैं। सरस्वती संचालन करती है। लक्ष्मी प्रकट होती है-संसार रूप में। दृश्य जगत रूप में। सरस्वती सदा अदृश्य रहती है। कारण रूप में। ब्रह्म होने के कारण शब्द का सम्पूर्ण सृष्टि पर पूर्ण नियंत्रण रहता है। अत: हमारे शब्द ज्यों के त्यों सृष्टि मान लेती है। न शब्दों में झूठ और सच का कोई भेद रहता है। जो जैसा है, वैसा ही सृष्टि स्वीकार लेती है। उसी रूप में उसको पूरा करने का प्रयास करती है।

 

जो कुछ शब्द बोले जाते हैं, उनके स्पन्दन पहले शरीर को, रक्त को, श्वास को, विचारों, भावों आदि को प्रभावित करते हैं। अर्थात हमारे अन्नमय, प्राणमय तथा मनोमय कोश स्पन्दित होते हैं। अलग-अलग इन्द्रियों पर इनका भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है। भीतर में हमारी भावनाओं या नीयत का असर अघिक होता है।

आप शान्त स्वर में बात करके प्रभाव देखिए।

 

आप आवेश तथा आवेग में बात करके प्रभाव देखिए। शान्त स्वर में माधुर्य भी आपको दिखाई देगा, जो आवेश में खो जाएगा। आवेश भरे शब्द स्वयं का तथा सुनने वाले का भी अहित करते हैं। इसी प्रकार सत्य बोलने वाला भी सहज रूप में बात करता है। हां, मत प्रकट करने वाला अलग हो सकता है। आक्रामक भी हो सकता है। सत्य भाषी कठोर हो सकता है, आक्रामक नहीं हो सकता। अमरीकी मनोवैज्ञानिक सोनिया कोकेट ने एक शास्त्र सम्मत बात लिखी है-’सत्यभाषण न स्वयं को आहत करता है, न ही दूसरोें को। एक कला है जो दिलों को जोड़ने का कार्य करती है। आपसी विश्वास पैदा करती है। घाव भरने का कार्य करती है।’

 

यदि हम सच बोलते हैं, तो हमारी सृष्टि भी हमारी सहायक बन जाती है। हम इच्छाओं को मूर्त रूप देना चाहते हैं तो प्रकृति से झूठ नहीं बोलें, छलावा नहीं करें। सोनिया ने एक और महत्वपूर्ण बात कही है कि शब्दों के बने महल में ही व्यक्ति जीवन व्यतीत करता है। नकारात्मक और अपमान सूचक शब्द बोलकर आप ताजमहल नहीं पा सकते। अपशब्द सदा ही आत्मा को दूषित करते हैं। स्पन्दनों के धरातल को नीचे गिराते हैं। पाठकों को याद होगा कि किस प्रकार प्रार्थना और अपशब्दों से शीशियों में बन्द पानी में सुगंध और दुर्गध पैदा हो जाती है। इसी सिद्धान्त पर रक्त में भी विकार पैदा होते हैं और व्यक्ति को रोगी बना देते हैं। भावों के प्रभाव का, तरंगों के प्रभाव का यही प्रमाण है।

 

स्पन्दन रूप क्रिया का आधार होता है निष्क्रिय सत्ता। यही आत्मा भी है। अत: क्रियामूलक ज्ञान की अवस्था में निष्क्रिय को जान पाना कठिन है। क्रिया के साथ मनुष्य की भावना एवं अनुभव का सम्बन्ध भी नित्य रहता है। क्रिया के अभाव में भाव का भी प्रभाव हो जाता है। क्रिया के अनुरूप भाव तथा भाव के अनुरूप ही क्रिया होती है। जहां क्रिया है, वहीं शब्द भी है। क्रिया जब मृदु होती है, तब शब्द भी मृदु हो जाते हैं। क्रिया स्पन्दन की तीव्रता के साथ शब्द में भी तीव्रता दिखाई देने लगती है। अत: क्रिया, भाव और शब्द अभेद हैं। इनमें से किसी एक को बदलने पर तीनों बदल जाते हैं। ध्वनि के उच्चारण से ध्वनिगत स्पन्दन उच्चारणकर्ता के भाव का तथा भावान्तर्गत क्रिया का परिवर्तन कर देता है।

 

इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि यदि हम न चाहते हुए भी किसी के झगड़े की ध्वनि सुन रहे हैं, चाहे टीवी, सिनेमा के ही हों, हमारे भाव तथा क्रिया में दूषण पैदा हो जाएगा। हमें तुरन्त ऎसे श्रवण से दूर हो जाना चाहिए। ऎसे आकर्षक व्यक्ति के पास भी अघिक देर न बैठें कि उसके प्रति मन में राग पैदा जो जाए। सृष्टि वही आपको लौटाती है, जो आप उसे देते हैं। अत: शब्द हमारे भाग्य विधाता हैं। इनकी मृदुता पर हमारे जीवन की मृदुता टिकी रहती है। मृदुता का विकल्प नहीं है। भक्ति योग तो माधुर्य पर ही टिका है। अन्तरिक्ष में भी ईक्षु समुद्र, मधु, दघि और घृत समुद्र है। भीतर के आकाश की पूर्णता भी यही है।

 

गुलाब कोठारी

 

नवम्बर 6, 2011

चौथा स्तंभ!

अध्यक्ष, भारतीय प्रेस परिषद, भारत सरकार

 

 

मान्यवर,

 

न्याय का परचम लहराते हुए आप प्रेस परिषद के अध्यक्ष पद तक पहुंचे, यह आपकी व्यक्तिगत उपलब्घि है। राजनीतिक नियुक्ति नहीं है। सरकार को आपकी गैर-समझौतावादी प्रकृति की जरूरत यहां अघिक लगी, यह विवेकपूर्ण निर्णय लोकतंत्र के भविष्य को सुरक्षित करने का ही प्रयास कहा जाएगा। प्रेस परिषद का अध्यक्ष पद संभालने के बाद उससे जुड़े मुद्दों पर आपके विचार निरंतर पढ़ने को मिल रहे हैं। आपने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में बड़े बिन्दुओं का जिक्र भी किया है।

 

 

 

आज जिस तरह मीडिया काम कर रहा है, उस दृष्टि से यह पत्र सरकार की आंखें खोलने वाला साबित होगा। सरकार कुछ तो सीख लेगी। आपको बधाई! खेद इतना ही है कि, अब तक परिषद ज्यादा कुछ नहीं कर पाई। केवल फाइलों का पेट ही भर पाई। उसके देखते-देखते ही तो मीडिया आज व्यापार बन गया। तब क्या यह लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने योग्य रह गया है! वैसे भी, संविधान में तो केवल तीन ही स्तंभ वर्णित हैं।

 

 

 

अत: आपका यह कदम इस दृष्टि से साधुवाद का पात्र है। प्रेस ने स्वयं-भू चौथे स्तंभ का मुखौटा पहनने का जो दु:साहस किया और जिस प्रकार विभिन्न सरकारों ने प्रेस (तथा आज टीवी भी) को खरीदने का कारोबार शुरू करके लोकतंत्र की खरीद-बेच की बोलियां लगाई, इससे देश शर्मसार हो गया। भले सौ में से दस कार्य अच्छे किए होंगे, किन्तु लोकतंत्र को कलुषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह सारे सुनहरे पृष्ठ आपको अपने कार्यालय में ही पढ़ने को मिलेंगे भी। यही आपके कार्यकाल को सर्वाघिक चुनौती भी देंगे।

 

 

 

आज प्रेस भी वैसा नहीं रहा, जैसा कि आजादी की लड़ाई में था। नेताओं, अघिकारियों की तरह वह भी जनता से दूर हो गया। भू-माफिया, शराब माफिया की तरह प्रेस भी विज्ञापनदाता को ब्लैकमेल करने लग गया। टीवी चैनलों ने इस मामले में कई दिग्गजों की हालत बिगाड़ रखी है। लगभग सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्री इनके दबाव की झांकी प्रस्तुत करने की स्थिति में होंगे।

 

 

 

पिछले चुनावों में तो इन्होंने अलग ही रिकार्ड बना डाला। आपने टीवी को भी परिषद के दायरे में लाने और प्रेस परिषद को मीडिया परिषद बनाने की बातें कहीं हैं, यह प्रशंसनीय एवं स्वागतयोग्य चिंतन है। मान्यवर, इतना ही काफी नहीं होगा। यह एक पक्ष है। आपको इस पर भी निगाह रखनी होगी कि, कोई सरकार मीडिया के साथ क्या गलत कर रही है। आपने प्रेस परिषद को मीडिया का लाइसेंस रद्द करने और विज्ञापन बंद करने का अघिकार देने की मांग की है लेकिन उस स्थिति का कोई जिक्र नहीं किया जिसमें सरकारें मनमाने तरीके से अखबारों के विज्ञापन बंद कर दें।

 

 

 

प्रेस परिषद को सूचित करने की जरूरत तक नहीं समझें। तब परिषद की सार्थकता क्या रह जाती है? मैंने तो अपने कार्यकाल में कई बार सरकारी विज्ञापन बन्द होते देखें हैं। आज भी देख रहा हूं। हां, प्रेस परिषद नहीं देख पाता। उसे दिखाना पड़ता है। उसके पास जानकारियां नहीं होती। क्या परिषद के पास सूचनाएं प्राप्त करने का स्वतंत्र तंत्र नहीं होना चाहिए? जो स्थिति प्रेस की है, उसका एक कारण परिषद् की भूमिका भी है। कोई भी सरकार ऎसी संस्थाओं को यह ताकत देना भी नहीं चाहती। परिषद् बिना अघिकारों के सजावटी भूमिका में बैठी है। कितनी भी जांचें करवा लें और रिपोर्टे जारी कर दें, कोई प्रभाव तो पड़ने वाला नहीं है।

 

 

 

प्रेस परिषद् को, मुद्दों तथा आरोपियों को सार्वजनिक करने पर भी चिन्तन करना चाहिए। संसद में धन लेकर प्रश्न पूछने वालों को तो सजा मिल सकती है, क्योंकि वे तो सांसद हैं/ जन प्रतिनिघि हैं। उसी प्रकार के कृत्य के लिए प्रेस स्वतंत्र हैं? तब आम नागरिक प्रेस के खिलाफ शिकायत करने कैसे परिषद् तक पहुंचेगा? सजा प्रेस को मिलेगी नहीं और प्रेस पूरी उम्र शिकायतकर्ता के पीछे पड़ा रहेगा। अच्छा तो यह होगा कि प्रेस परिषद के कार्यकलापों की नए सिरे से समीक्षा हो। यह व्यापक भी हो और मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार के उन्मूलन को ध्यान में रखकर भी हो। जो हो, वह दृष्टि की समग्रता, दूरदर्शिता और संकल्प की दृढ़ता के साथ हो।

 

 

 

श्रीमान, परिषद को प्रेस के मालिकों की सम्पत्ति की भी जांच करवानी चाहिए। वहां भी बेनामी सम्पत्तियों का अम्बार मिलेगा। यही नहीं, आधे से ज्यादा तो प्रेस वाले ही बेनामी/ झूठे साबित हो जाएंगे, जो नेताओं की कृपा से सरकारी विज्ञापन बटोरकर ब्लैकमेलिंग करते रहते हैं। सरकारी साधनों एवं धन का दुरूपयोग करना, सरकारी अफसरों से सांठ-गांठ कर भ्रामक जानकारियां देते रहना या सही जानकारियों को दबाने का कुत्सित प्रयास करना, आपकी दृष्टि में क्या अर्थ रखता है, यह भी परिषद के कामकाज में दिखना चाहिए।

 

 

 

आपको कांटों के बीच जीना है, गुलाब की तरह। प्रेस को प्रेरित करके जनहित से जोड़ना है। अकेला मीडिया लोकतंत्र को स्वस्थ रख सकता है। देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कर सकता है। आज तो देश में, हर शहर में एक ही क्लब फैला हुआ है-प्रेस क्लब। जहां कोई भी सदस्य अपने परिवार के साथ जाकर गौरवान्वित नहीं होता। आपको इस परिदृश्य को बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

 

 

 

आपको जो भी किसी राजनीतिक दल अथवा धर्म/सम्प्रदाय से जुड़ा प्रेस दिखाई दे उसे प्रेस की सूची में रखने या न रखने पर भी सरकार को सुझाव भेजना चाहिए। इस दृष्टि से प्रेस को नए सिरे से परिभाषित करना भी जरूरी है। संविधान केवल जनहित के पक्षकार को ही प्रेस मानता है। न तो व्यापारियों को, न ही दलों के पक्षकारों को। ईश्वर आपको शक्ति दे कि देश में लोकतंत्र की पुन: प्रतिष्ठा के लिए आपकी आहुतियां फलदायी सिद्ध हो सके।

 

 

 

गुलाब कोठारी

 

 


अक्टूबर 30, 2011

वैराग्य-2

जी वन के मुख्य मार्गो में वैराग्य भी एक राजमार्ग है। मोक्ष चाहने वाले हर एक पुरूषार्थी को इस मार्ग से गुजरना ही पड़ता है। जीवन की शुरूआत कामना एवं कर्म से होती है। कर्म तो अन्त समय तक साथ रहता है, किन्तु कामना को संकल्प एवं ज्ञान के सहारे छोड़ा जा सकता है। निष्काम कर्म को ही वैराग्य कहा जाता है। जो जीवन अर्थ और काम पर टिका हो, जो शिक्षा शुद्ध ज्ञान पर टिकी हो, वहां न वैराग्य है और न ही मोक्ष की अवधारणा। विद्या और पुरूषार्थ दोनों ही धर्म पर टिके हैं। विद्या में धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य है। पुरूषार्थ में-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष है। विद्या का लक्ष्य आनन्द है। ब्रह्म है।

 

 

पुरूषार्थ का लक्ष्य कर्म है। वैराग्य का अर्थ है कर्म को ब्रह्म (अकर्म) में बदलना। इसके लिए संन्यास लेने की आवश्यकता नहीं है। विवेक की जरूरत है। प्रज्ञा के जागरण की जरूरत है। भीतर के संसार से निरन्तर जुड़े रहने की जरूरत है। जो कुछ घट रहा है, उसका ‘क्या’ न देखकर ‘क्यों’ घट रहा है, देखने की जरूरत है। अर्थात जिस मार्ग पर चलते-चलते व्यक्ति रागी बनता है, उसी मार्ग से लौटकर बेरागी बनना होता है। होश आने के साथ ही कामनाओ का घेरा बढ़ता जाता है। मृग तृष्णा की तरह व्यक्ति कामना पूर्ति के लिए भागता रहता है।

 

शिक्षा ने अर्थ को कामना के शीर्ष पर रख दिया। धर्म के बिना अर्थ भी जीवन को प्रवाहमान ही बनाता है। नियंत्रण, मर्यादा, निषेध आदि शब्द अर्थ के आगे ठहर नहीं पाते। अनर्थ रह जाता है। कामनाओं में राग-द्वेष का प्रवेश हो जाता है। लोभ अनाचार में उलझा देता है। व्यसन घेर लेते हैं। कामना पर्याय है माया का। अर्थ को भी लक्ष्मी/ माया ही कहा जाता है। व्यक्ति की आंखों पर मोह का चश्मा चढ़ता जाता है। व्यक्ति स्वयं से दूर होता चला जाता है। वैराग्य में तो माया भाव से कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ता है। जीवन माया भाव के बीच से गुजरने का ही नाम है। अर्थ-काम के सागर में गोते लगाते हुए पार निकल जाने का नाम है। धर्म के कंधों पर सवार होने पर यह कार्य निश्चित होता है, किन्तु संघर्ष एवं दृढ़ संकल्प मांगता है।

 

जिस जीवन की शुरूआत ही भोग को लक्ष्य बनाकर होती है, वहां वैराग्य का प्रवेश वर्जित होता है। ईश्वर का ‘एकोहं बहुस्याम’ हमारे जीवन में विवाह बन कर उतरता है। तब इस बहुस्याम के भाव को वैराग्य में रूपान्तरित कर देना आज की आवश्यकता तो नहीं है। सहज साध्य भी नहीं है। तुष्टिकरण के साथ तृष्णा भी रहती है। छाया भी रहती है। आसुरी रूप भी (तमस) रहता है। मन की कमजोरी, विकल्पों की भरमार, सभी तो वैराग्य के शत्रु हैं। कौरव सेना की तरह अनन्त दिखाई पड़ते हैं। कुछ आकर्षित भी करते हैं, तो कुछ भयभीत भी करते हैं। इस मार्ग से व्यक्ति नींद में कैसे गुजर सकता है। सदा जाग्रत रहना पड़ेगा ही।

हठ योग का नाम भी वैराग्य नहीं है। दमन का मार्ग भी वैराग्य का शत्रु ही होता है। आज जब अघिकांश धर्म निषेधात्मक बनते जा रहे हैं, तब व्यक्ति के लिए जीना कठिन हो जाता है। निषेध स्वयं एक जिज्ञासा पैदा कर देता है मन में। किसी बच्चे को निषेध करके देख लीजिए, अवसर मिलते ही पहले निषेध भंग करेगा। निषेध शान्त व्यक्ति को अशान्त कर देता है।

 

इस निषेध का घातक प्रभाव वहां देखिए, जहां बच्चों को छोटी उम्र में संन्यासी बना देते हैं। जो जीवन को देख नहीं पाया, समझ नहीं पाया, भोग नहीं पाया, उस पर निषेध का क्या प्रभाव होगा? क्या यह निषेध ईश्वर के नियमों के पार जा सकता है? क्या सात जन्मों के बन्धन इस निषेध से टूट सकते हैं? क्या प्रारब्ध बदला जा सकता है- दो व्यक्तियों का प्रारब्ध एक व्यक्ति के संकल्प से बदल सकता है? दमन का यह मार्ग जीवन को आनन्दित कर सकता है?

 

दमन एक विस्फोटक प्रक्रिया का नाम है। हर व्यक्ति अज्ञान के कारण इस मार्ग पर चला जाता है। परम्पराएं, धर्म, सम्प्रदायों के नियम भी दमन को हवा देते हैं। घूंघट निकालना क्या है। क्या हर स्त्री प्रसन्न है घूंघट निकालकर? पीहर जाकर हो सकता है वह स्त्री सिर भी नहीं ढके। प्रतिक्रिया का ही स्वरूप है यह। हर प्रकार के दमन की प्रतिक्रिया होती है। दुनिया के सारे व्यभिचार प्रतिक्रिया स्वरूप पैदा होते हैं। किसी भी भाव को दबाना शत्रुता है। वैराग्य तो मित्रता का मार्ग है।

 

मित्रता के लिए प्रेम चाहिए, शत्रुता का आधार अहंकार है। क्रोध है। हर समाज में प्रेम के मार्ग में भी अनेक निषेध हंै। जो व्यभिचार का मार्ग प्रशस्त करते हैं। समाज के निषेध प्रकृति के आगे घुटने टेक देते हैं। क्रोध- अहंकार तो आसुरी भाव ही है। जिस समाज में आसुरी भाव के साथ-साथ दैविक भाव पर भी निषेध हो, वहां समृद्धि खत्म ही समझो। वहां सारे व्यक्तित्व कुण्ठित अथवा आपराघिक ही नजर आएंगे। अधूरी कामना व्यक्ति को अघिक भटकाती है। उसे भूल पाना व्यक्ति के लिए कठिन होता है। भगवान चाहे याद आए या न आए, शत्रु का चेहरा सदा आंखों में रहता है। तब कैसे व्यक्ति कामना पार होकर वैराग्य में प्रवेश कर सकता है। वह तो उम्र भर निषेध तोड़कर कामना पूर्ति के लिए संघर्ष ही करेगा/करेगी।

 

वैराग्य का मार्ग संघर्ष का नहीं हो सकता। शत्रुता का नहीं हो सकता। वह तो प्रेम का मार्ग ही है। धर्म आधारित मार्ग है। धर्म भी प्रकृति से बाहर नहीं जा सकता। प्रकृति ही माया है। माया को समझना ही धर्म का मार्ग प्रशस्त करता है। माया के भाव को, इसके प्रभाव को, इसकी नश्वरता को समझ लेना ही स्वयं को मुक्त करना है। यह समझ लेना ही तो मित्रता का रूप है। दबाना शत्रुता है। क्योंकि दबा हुआ भाव अवसर पाकर कब फट पड़ेगा, पता भी नहीं चल पाएगा। कोई शक्ति उसे रोक नहीं पाएगी। जीवन में बड़ा अनर्थ कर जाता है। मित्रता में अनर्थ नहीं है। यदि क्रोध, लोभ, ईष्र्या, अर्थ, काम आदि का यथार्थ स्वरूप समझ में आ जाए तो जीवन में इनका प्रभाव स्वत: समाप्त हो जाता है।

 

मन में उठने वाली इच्छाओं को कभी-कभी अन्य प्राणियों की इच्छाओं के साथ भी मिलाकर देख लेना चाहिए। उनका अर्थ जल्दी समझ में आ जाता है। पशु के मन की इच्छाएं केवल भोग योनि की होती है। मनुष्य पशु की तरह जीना नहीं चाहता। वह अनेक इच्छाओं को तो इसीलिए छोड़ देगा कि वह पशुता का पर्याय नहीं दिखना चाहता। कई इच्छाओं की पूर्ति अन्त में घातक भी सिद्ध होती है। कुछ इच्छाएं जीवन में मिठास घोलती हुई भी जान पड़ती हैं। तब एक बात स्पष्ट हो जाती है कि वैराग्य का अर्थ भागना नहीं है। कामना से मित्रता करना है। धर्म के चश्मे से, ज्ञान की पुस्तकों में अर्थ और काम को जीना भी है और उनके प्रभाव को भी निष्प्रभावी करते जाना है। ताकि उनसे प्राप्त होने वाले फलों से कर्मो को दूर कर लिया जाए। कर्म अकर्म हो जाए।

 

गुलाब कोठारी

 

अप्रैल 24, 2009

सबसे पहले देश

विधानसभा चुनाव की खुमारी अभी उतरी नहीं थी, कि लोकसभा चुनाव धमक पडे। सारे कामकाज ठप हो गए। महंगाई चुनावी चन्दे की चादर ओढकर फूले नहीं समा रही। चुनाव की गर्मी सभाओं के साथ उठती है और सभा समाप्ति के साथ ही उड जाती है। बडी सभाओं में तो स्थानीय लोगों के बजाये बाहरी लोगों के भाव बढ रहे हैं। हालात कमोबेश राजस्थान जैसे ही हैं, कुछ अच्छे ही रहेंगे।
गत विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में भाजपा को पुन: सरकार बनाने का जनादेश मिला था। लोकसभा की भी 29 में से 24 सीटें भाजपा की झोली में थीं। शिखर पर बैठने वाले के लिए ऊपर जाना संभव नहीं होता। चलना है तो नीचे आना ही पडता है। देता भी वही है जिसके पास होता है। इसी सिद्धांत के अनुसार यदि कुछ देना पडा तो भाजपा को ही देना पडेगा। कांग्रेस के पास केवल चार सीटें हैं, तो देगी क्या! उसे तो मिलना ही है। यही संघर्ष है- कांग्रेस अधिक से अधिक लेने का प्रयास कर रही है और भाजपा टूट को रोकने का।
कांग्रेस की संगठन क्षमता विधानसभा चुनावों के मुकाबले कुछ सुधरी भी है। कमलनाथ अपने क्षेत्र में अटक गए। हार गए तो नेतागिरी उठने का डर है। अर्जुन सिंह, राहुल सिंह का प्रभाव उठ गया है। दिग्विजय सिंह को प्रचार के लिए प्रेरित किया जान पडता है। पहली बार 19 अप्रेल को बाहर निकले हैं। सुरेश पचौरी जरूर एक बार पूरे प्रदेश का दौरा कर चुके हैं। आलाकमान की कृपा दृष्टि इन पर ही दिखाई दे रही है। राहुल गांधी ने चुनाव घोषणा से पहले ही दौरा शुरू कर दिया था। इनके सामने टिकटों के आवंटन की नाराजगी अभी भी कई क्षेत्रों में दिखाई दे रही है।
भाजपा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर भी अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर निकलने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। उमा भारती तो लगता है राजनीति छोड गई हैं। कहीं उनका नाम लेवा ही नÊार नहीं आया। उनके कार्यकर्ता भी जहां से आए थे, वहीं लौट गए। उनके मतदाता भी नई जगह तलाश करेंगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पूरी तरह जोश में दिखाई दे रहे हैं और आशान्वित भी हैं कि अधिकांश सीटों को रोकने में सफल रहेंगे।
भाजपा को एक झटका यह भी लगा कि उसकी एक मंत्री रंजना बघेल ने गंगूबाई को चांटा मारकर नेताओं के मुंह एक बार तो बंद कर ही दिए थे। उधर जाटव समाज में कांग्रेस विधायक माखन सिंह की हत्या से ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना क्षेत्र में भी कुछ नुकसान हो सकता है। इस क्षेत्र पर ज्योतिरादित्य की भी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष इन सीटों को (कम से कम भिण्ड और मुरैना को) तो कांग्रेस भी झोली में मानकर ही चल रहे हैं।
इस बार चुनाव में दोनों ही पार्टियों के पास कोई मुद्दा उभरकर सामने नहीं आया। इससे चुनाव परिणाम व्यक्ति की सामथ्र्य पर अधिक निर्भर करेंगे। चुनाव के शुरू के दौर में कांग्रेस ठण्डी थी। राजकुमार पटेल का नामांकन रद्द होने के बाद तो मानो उसे लकवा ही मार गया था। यहां तक बातें होने लगी थीं कि सोच समझकर मुख्यमंत्री ने दिग्विजय सिंह के साथ समझौता करके पर्चा गलत ही भरवाया था। नहीं तो नौ बार चुनाव लड चुके पटेल इतनी बडी भूल कैसे करते! सुषमा स्वराज के सामने विदिशा में कांग्रेस प्रत्याशी नहीं होने से कार्यकर्ताओं में चुनौती का भाव ही समाप्त हो गया। वे वोट बढाने में लगे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता प्रयास कर रहे हैं कि भाजपा की जीत को कैसे छोटा किया जाए।
मध्यप्रदेश में मतदान का प्रतिशत भी लगातार घट रहा है। आज भी शाम को कुछ युवा मतदाता क्रिकेट देखेंगे। गर्मी के तेवर भी कुछ बाधा बन सकते हैं। लोगों को फिर भी अपने अधिकार का विवेक सम्मत प्रयोग अनिवार्य रूप से करना ही चाहिए। हमारे सामने विडम्बना ही है कि एक ओर चुनाव आयोग जातिवाद को नकार रहा है, वहीं दूसरी ओर आरक्षण का आधार भी जातिवाद को ही बना रखा है। इसे भी तोडना है।
मध्यप्रदेश में इस बार भी भाजपा आगे तो रहेगी ही, किन्तु महाकौशल और विंध्य में कुछ परिवर्तन की हवा बनी है। ये क्षेत्र ही कुछ बदलाव लाएंगे। इनमें भी अधिकांश सीटें तो भाजपा के पास ही हैं। इनमें कितनी टूटेंगी और कितनी रहेंगी आज पहले चरण में तय हो जाएगा।
गुलाब कोठारी

अप्रैल 27, 2009

कन्या-2

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सृष्टि में केवल माया काम करती है। ब्राह् तो निष्काम रहता है। इच्छा करता है, कर्म नहीं करता। नर-नारी में केवल शरीर की भिन्नता है। मन, बुद्धि और आत्मा का स्वरूप भिन्न नहीं है। दोनों ही माया के द्वारा संचालित होते हैं। किन्तु समाज व्यवस्था में केवल नारी ही गतिमान है। वही माता-पिता का घर छोडकर जाती है। नर अपना स्थान नहीं छोडता। वह केवल बीज संग्राहक के रूप में रहता है।

विस्तार की कामना मन में रखकर जीता है। माया भाव पुरूष में भी है, किन्तु बुद्धि के अहंकार से दबा रहता है। नर शुक्र में उसकी सात पीढियों के अंश रहते हैं। उनको आठवीं पीढी तक पहुंचाना चाहता है। किन्तु इस शुक्र से केवल शरीर का ही निर्माण होता है। इस शरीर में सात पीढियों के कुछ कर्माश भी रहते हैं, जिनको आनुवांशिक कहा जाता है। यह अंश जीव में नहीं होते। वह स्वतंत्र रूप से आकर शरीर में रहता है। इसके साथ पिछले जन्मों के संस्कार आते हैं। कर्म-फल आते हैं। नर-नारी में मूल अन्तर बुद्धि की उष्णता और मन की चंचलता एवं शीतलता का होता है। माया की गतिशीलता का होता है। जीवन का सारा संचालन माया करती है। संरक्षण, पोषण माया करती है। जो लडका मां-बाप की कभी सुनता ही नहीं, शादी के अगले दिन ही बदला-बदला नजर आने लगता है। यह केवल कन्या की ही शक्ति है कि वह अपने पुरूष का स्वरूप निर्माण कर सके। उसको बदल पाना पुरूष के वश की बात नहीं है। उसे हर हाल में जीना आता है। अपमान सहकर चुप रहना भी आता है।

समय आने पर उसका हिसाब करना भी आता है। वानप्रस्थ तक आते-आते सारा घर परिवार उसके नियंत्रण में आ जाता है। सारे महिषासुर और रक्तबीज मर चुके होते हैं। महिषासुर क्रोध सूचक है, अहंकार की वजह से बढता है। रक्त बीज लोभ सूचक है। यह कला पुरूष रूप में कहीं नहीं देखी जा सकती।
माया सृष्टि कर्ता है। अत: निर्माण कला में पारंगत होती है। जीवन की सूक्ष्मता और व्यवहार को समझती है। उसकी एक ही कमजोरी होती है, उसका संकुचन भाव। पुरूष विस्तारवादी होता है। अग्नि का स्वभाव ही फैलना है। स्त्री का निर्माण उसके प्रारब्ध और संस्कारों पर आधारित होता है। सम्पूर्ण निर्माण में उसका प्रेम-वात्सल्य भरा रहता है। जिसे निर्माण कला सिखाई गई हो, वह तो अपनी मर्जी की आत्मा को आकर्षित कर लेती है। वैसा ही जीव उसके घर में प्रवेश करता है। जीव के आ जाने पर उसे संस्कारित करना, यह समझ पाना कि किस शरीर को छोडकर आया है, उसके माया भाव की पराकाष्ठा है। फिर प्रसव पूर्व उसे श्रेष्ठ मानव बना देना, अभिमन्यु की तरह तैयार कर देना उसी के बूते का काम है।

वह घडा बनाती है, उसे पकाकर समाज को सौंपती है। उसके दायित्व का बडा अंश यहां पूरा हो जाता है। वह पशु रूप मानव के बजाए आत्म-भाव से परिपूर्ण मानव का निर्माण करती है। यही उसके जीवन का मूल लक्ष्य रहता है। उसे अपनी संतान की क्षमताओं की जानकारी रहती है। जो कन्या समर्पण भाव से आई थी, स्त्रैण भाव से सृष्टि का निमित्त बनने को तैयार हुई, उसी ने क्षुधा रूप माया की तरह प्रवेश किया, पुरूष के जीवन में। क्षुधा को तृप्त किया, छाया बनी, शक्तियों की वृद्धि की। होता यह है कि अहंकार के कारण तृप्ति का स्थान तृष्णा ले लेती है।

कन्या के शरीर में भी सात पीढियों के अंश रहते हैं, किन्तु मातृ पक्ष के। मां-नानी-पडनानी आदि के। अत: कन्या का आदान-प्रदान भी मां या बहन से अघिक रहता है। अच्छे परिवारों में हर पीढी की नारी का स्त्रेह और वात्सल्य एकत्र होकर कन्या में आता है। स्वत: ही वह देवी तुल्य हो जाती है। प्राण को देवता कहते हैं। यह कन्या देवी रूप होती है। सोम प्राणों की पितर और अग्नि प्राणों की देव संज्ञा है। गुण तो पुरूष में भी होते हैं, किन्तु उसका अहंकार बडा होता है।

विवाह से पूर्व कन्या भावी जीवन के सपने बुनने लग जाती है। लडका ऎसा नहीं करता। उसे कुछ बदलने की जरूरत नहीं लगती। कन्या का तो रूपान्तरण हो जाता है। पति को पूर्णता प्रदान करती है। सौम्या है, अग्नि में आहूत होती है। तभी सृष्टि यज्ञ चलता है। यह प्रकृति ही है कि अग्नि-धर्मा पुरूष का शुक्र सोम प्रधान होता है और सौम्या का रज अग्नि प्रधान। तभी अग्नि में सोम आहूत होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शरीर से जब अग्नि (वैश्वानर) निकल जाता है, तब शरीर ही ठण्डा (सोम) पड जाता है। अग्नि-सोम रूपी इस सृष्टि यज्ञ में सोम सदा काम आ जाता है। सोम के अनुरूप ही सृष्टि का विकास होता है। जो कुछ स्वरूप बनता है, अग्नि रूप ही होता है। इसीलिए भारतीय दर्शन में कन्या के देवी भाव को संरक्षित किया गया है। जीवन के अन्त में यही भाव पुरूष को स्त्रैण गुणों से ओत-प्रोत करने में सफल हो सकता है। इसी कारण पुरूष आप्त काम हो सकता है। स्त्रैण पुरूष ही मानवता की सेवा कर सकता है। भक्ति मार्ग पर आगे बढ सकता है। उसका अहंकार गल जाता है। इससे बडा कार्य जीवन में क्या हो सकता है।

इसी के लिए पूरी उम्र पत्नी तप और उपासना करती है। पति की आयु मांगती है। इससे उसे अपने प्रयासों के लिए कुछ समय और मिल जाता है। पति के रहते वह अपना कार्य पूरा कर जाना चाहती है। सुहागिन जाना चाहती है। हालांकि उसका माया भाव का सृष्टि कारक अंश गृहस्थाश्रम के साथ ही छूट जाता है। आगे जीवन को समेटने का काल होता है। यह उसका दूसरा रूप होता है। शरीर वही है, भाव बदल जाते हैं। पति को भी निर्माण छोडकर निर्वाण की ओर प्रेरित करती है। अब पति उसकी इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकता।

समय ने करवट बदली है। सदा ही परिवर्तनशील है। हम अपनी जिन्दगी जीना भूल रहे हैं। अपना विकास, अपने गुणों का विकास नहीं करते हैं। हम झूठी नकल में पड गए हैं। ईष्र्या और स्पर्द्धा प्रवेश कर गई है हमारे जीवन में। हम किसी और की तरह जीना चाहते हैं। आंख मूंदकर। प्रकृति ने तो हर एक को अद्धितीय बनाया है। कोई दो एक जैसे नहीं बनाए। तब हम नकल करके भी दूसरे जैसा नहीं बन सकते। हर एक में ईश्वर के अंश भिन्न हैं। क्यों नहीं हम उन्हीं को ढूंढकर, उनका विकास करें। नकल करने में हम अपने आप से दूर होते जाते हैं।

स्पर्द्धा में हम एक दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। चाहे स्कूल में नम्बर लाने हों, या फिर नौकरी की बात हो। हम अपनी ही शक्तियों का विकास करेंगे तो दूसरों से आगे निकल ही जाएंगे। हमारा ध्यान दूसरों से हटकर स्वयं पर आ जाएगा। नहीं तो हमें मनुष्य जीवन का लाभ नहीं मिल पाएगा।

इसका एक पहलू कन्या की आज की अवधारणा से ही समझा जा सकता है। मां-बाप गर्व से कहने लगे हैं कि हमारे घर में लडके और लडकी में अन्तर नहीं है। बहुत अच्छी बात है। लेकिन इस नकल में लडकी को अच्छी पत्नी, अच्छी माता बनना अब कोई नहीं सिखाता। लडकी की मां ने भी उसे अभिमन्यु की तरह से संस्कार नहीं दिए। जैसा जीव शरीर में आया, वैसा ही समाज को सौंप दिया। पश्चिम की नकल कर रहे हैं। वहां मानव शरीर में क्या संस्कारित मानव जी रहा है! अथवा शरीर को पशुवत् भोगा जा रहा है। आज कोई कन्या पूजन की बात नहीं कहता। किन्तु उसे ससम्मान संस्कारित तो करना पडेगा। वरना वह अपने कुल को क्या पहचान देगी! कैसे समाज का निर्माण होगा!

वैसे भी आज के बच्चे अपनी शैली में जी रहे हैं। संस्कार शब्द जीवन पर लागू ही नहीं होता। जो कुछ संस्कार टी.वी. या इण्टरनेट से मिल जाते अथवा मित्र मण्डली भर देती है, वही जीवन का स्वरूप होता है। इसमें बाच्चा अकेला रहना सीखता है। पढाई और कैरियर की मार से दबा रहता है। उसे स्वजन, परिजन अथवा समाज की चिन्ता होती ही नहीं है। घर पर भी कोई मिलने आ जाए तो स्वयं मां-बाप टाल देते हैं। तब समर्पण तो क्या, दूसरों के लिए जीना भी असंभव बात होगी। अपने पेट के आगे कौन चिन्तन करने वाला है!

बराबरी की अवधारणा का एक और विकृत रूप हमने पश्चिम से ओढना शुरू कर दिया। लडके-लडकियो में स्पर्द्धा का भाव बढ गया। अब लडकियों को अपने भावनात्मक पोषण के बजाए बौद्धिक स्तर को उठाने की चिन्ता लग गई है। लडकों की तरह उष्णता का और अहंकार का मार्ग पकडने लगी हैं। अब वह किसी के भी आगे झुकने को तैयार नहीं होने वाली। विवाह के बाद भी दो बनकर ही जीएंगे। एक बनकर जीने की संभावना पश्चिम से तो सिमट चुकी। हमारे यहां अभी शुरूआत है। जब नारी शरीर भी नर जैसा व्यवहार करेगा, तब विपरीत ध्रुव के आकर्षण का प्रश्न स्वत: ही समाप्त हो जाएगा। शरीर की पकड उम्र भर नहीं रहती। उनको दूर होना ही पडेगा। विधाता भी टाल नहीं सकता। उनके इस भविष्य की जिम्मेदारी उनकी नहीं, मां-बाप की है। आंख मूंदकर नकल करना हमारा बुढापा खराब ही करेगा। आज के इस वातावरण में कन्या के स्वरूप की, उसकी शिक्षा-दीक्षा की नए सिरे से व्याख्या होनी चाहिए। वही किसी देश की संस्कृति का निर्माण करती है। यथार्थ के प्रति यदि हम आंखें मूंद लेंगे तो भविष्य हम पर कोडे बरसाएगा। पश्चिम की तरह यहां भी कन्या भोग की वस्तु बनकर रह जाएगी, मानव समाज संवदेनाओं से शून्य हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

मई 5, 2009

विवाह-1

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जब भी सिद्धान्तों को जीवन में उतारने की बात आती है, तब व्यवहार के कुछ न कुछ नियम बनाए जाते हैं। समय के साथ इन नियमों में इतना परिवर्तन आ जाता है कि सिद्धान्त दिखाई भी नहीं पडते। तब हम इनको रूढि मानने लग जाते हैं। व्यवहार में सिद्धान्त से ज्यादा रूढियों का महत्व अधिक होता है। इसका सबसे ज्वलन्त उदाहरण विवाह है। विवाह में कितनी तरह के रीति-रिवाज देखे जा सकते हैं। विश्व भर में, हर समाज में विवाह एक आवश्यक सामाजिक परम्परा है। हर देश और समाज में इसके विभिन्न रूप बन गए। विवाह की परम्पराओं का महत्व इतना अधिक हो गया कि व्यक्ति गौण हो गया। हर लडके-लडकी को यह मालूम है कि बडे होकर विवाह करना है। लडकी जानती है कि उसे लडके के साथ रहना है। यह सोच भी रूपान्तरित इतना हो गया कि विवाह का मूल भी भूल गए। सिद्धान्त पक्ष की चर्चा ही नहीं होती। मैंने अनेक लडकियों से यह प्रश्न किया है कि तुम विवाह की तैयारी तो कर रही हो, जानती भी हो कि विवाह करना भी है और लडके के साथ जाना है, पीहर छोडना है, अकेले जाना है, जो अब तक सीखा, उसमें से बहुत कुछ छोडना है, कुछ नया सीखकर जीना है, जीवन से समझौता भी करना है, पर यह सारा क्यों करना है क्या सोचकर तुम विवाह कर रही हो जीवन की कौनसी सार्थकता प्राप्त करना चाहती हो क्या परम्परा मानकर ही विवाह की तैयारी होती है। सब को करना पडता है, मुझे भी करना है। इस प्रश्न पर हर एक के चेहरे पर गंभीरता आते देखा। किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं गया था।
दोनो तरफ से “अच्छा खानदान” देखा जाता है, किन्तु खानदान की परिभाषा आज केवल धन से आंकी जाती है। संस्कारों की मांग लुप्त हो गई। वैभव की चमक के आगे सब छोटा हो गया। विवाह को इतना नकारात्मक धरातल दे दिया कि व्यापारिक लेन-देन में बदलकर रह गया। जीवन की पवित्रता का स्वरूप ही खो गया। लडकों की बोलियां लगने लग गई जैसे बिकाऊ माल हो। उन्हें निर्जीव पदार्थ मान लिया गया। लडकी के गुण भी महžवहीन हो गए। यह भी कोई अर्थ नहीं रखता कि वह मां-बाप को छोडकर आएगी। तलाक हो गया तो उसे ही वापिस लौटना पडेगा। वही इस घर को स्वरूप देगी। संतान को भी संस्कारवान बनाएगी। लडके को पूर्णता देगी। लडका तो उसके बिना ही स्वयं को परिपूर्ण मानकर चलता है। समर्पण नहीं चाहिए उसे।
हम कुछ पीछे चलते हैं, जब समाज व्यवस्था ही नहीं थी। तब क्या संतान पैदा नहीं होती थी विवाह शब्द पैदा ही नहीं हुआ था। विवाह और सारे सामाजिक सम्बन्ध विकसित समाज व्यवस्था के साथ पैदा हुए। पहले केवल प्रकृति थी। नर था, नारी थी। इनके आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक स्वरूप थे। केवल प्रारब्ध को भोगकर चले जाते थे। अन्य पशुओं की तरह।
जीवन में जितने भी परिवर्तन दिखाई पडते हैं, उनका मूल कारण भाषा है। शब्दावली है। सारे जीवन व्यवहार भाषा पर टिके हैं। भाषा ने ही ज्ञान का स्वरूप धारण किया। पुराने ज्ञान के आधार पर नया ज्ञान विकसित होता गया। इसी के साथ समाज व्यवस्था बदलती चली गई। इसी व्यवस्था में से विवाह संस्था का जन्म हुआ। मानव मन की चंचलता और व्यवहार की स्वच्छंदता को मर्यादित करने का सूत्रपात हुआ। सृष्टि के नियमों को मानव जीवन में लागू करने के लिए अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित हुए। फिर भी कोई समाज प्रारब्ध को रोक पाने में समर्थ नहीं हो सका। पिछले कर्मो के फल तो हर मानव को भोगने ही पडते हैं। विवाह संस्था में इसके परिणाम स्वरूप अनेक व्यवधान भी बने रहते हैं। मानव तो शरीर के स्वरूप का नाम है। जीव का कोई नाम-रूप नहीं होता। समाज के नियम-कायदों को वह आसानी से नहीं समझ सकता। उसे मानव बनाने की प्रक्रिया लम्बी भी है और जटिल भी। आज की विकसित समाज व्यवस्था में, विशेषकर विकसित देशों में तो यह प्रक्रिया ही लुप्त हो गई। उनकी जीवन शैली फिर से आदि मानव की तरह स्वच्छंद हो गई है। मानव देह रह गया, भीतर जीने वाला मानव नहीं बन पाता। इने-गिने दिखाई पडते हैं। निजी जीवन को यदि नजदीक से देखा जाए, तो स्पष्ट चित्र दिखाई दे जाएगा। विकास, सुविधाएं और समृद्धि तो है, किन्तु निजी जीवन में सभी त्रस्त हैं। मानवीय संवेदनाएं भोग तक आकर ठहर गई हैं। सभी एक दूसरे का उपभोग करना चाहते हैं। उसके बाद साथ रहने को भी तैयार नहीं। जिस तेजी से मिलते हैं, उसी तेजी से अलग भी हो जाते हैं। साथी बदलते जाते हैं। हर बार जीवन को नए सिरे से शुरू करते हैं और आधे रास्ते चलकर बिछुड जाते हैं। कहीं कोई दर्द नहीं होता। न किसी को संतानों की चिन्ता होती है। चिडिया के बच्चे के पंख आते ही उड जाता है। मां-बाप स्वतंत्र हो जाते हैं। वहां केवल भोग संस्कृति होती है। मानव सम्पूर्ण विकास के बाद फिर उधर ही अग्रसर हो रहा है। जब कि केवल मानव ही कर्म कर सकता है। अपना भाग्य बदलने की क्षमता रखता है। समृद्धि भाग्य या कर्म का लक्ष्य नहीं है। साधन मात्र है।
इस भोग संस्कृति को योग में बदलने और भविष्य निर्माण से जोडने के लिए केवल एक सूत्र चाहिए संकल्प। इस संकल्प का नाम ही विवाह पड गया। बिना संकल्प के विवाह का स्वरूप टिक ही नहीं सकता। संकल्प भी नर और नारी दोनों का। पूरक बनने के लिए हो, स्पर्द्धा करने के लिए नहीं। इस संकल्प के कारण ही नर-नारी में पति-पत्नी के भाव जाग्रत होते हैं। संकल्प टूटते ही फिर से नर और नारी बन जाते हैं।
बिना संस्कार के संकल्प करना भी संभव नहीं होता। संकल्प की दिशा तो संस्कार ही तय कर सकते हैं। मात्र संतान पैदा करने के लिए संकल्प की आवश्यकता नहीं होती। समय के साथ इन संस्कारों के क्षेत्रों का विकास भी हुआ। ज्ञान का, विज्ञान का विकास भी हुआ। संस्कारों की भी विस्तार से व्याख्याएं होने लगीं। संस्कार तो सदा ज्ञान के साथ रहे। शुद्ध विज्ञान, हर काल में, हर रूप में भौतिक विश्व का अंग ही रहा। ज्ञान और विज्ञान आज पूरक न होकर विरोधाभासी बन गए। ज्ञान भीतर चलता है, विज्ञान बाहर। सृष्टि के नियम दोनों पर एक जैसे लागू होते हैं। फिर भी इतना विरोधाभास आश्चर्यजनक ही है।
गुलाब कोठारी

मई 8, 2009

मत चूके चौहान

चुनाव का चिडियाघर आज बन्द हो जाएगा। सब अपनी-अपनी बोलियां बोलकर चले गए। झेलना तो हमको है। हमारी भाषा में किसी ने कोई भी बात नहीं कही। एक-दूसरे को ही सुना गए। उनको सत्ता चाहिए, फिर हमारी कोई जरू रत नहीं, अगले पांच वर्ष तक। हम तक दस पैसे पहुंचे या पांच ये भी जबानी जमा खर्च की बातें हैं। उनकी तो लडाई बडे हिस्से पर हाथ मारने की है। लोकतंत्र की धज्जियां उडाने में किसी ने कसर नहीं छोडी। मुद्दों पर किसी ने बात ही नहीं की। गरीबी और बेरोजगारी जैसे मुद्दे तो किसी को याद भी नहीं आए। विकास की बात तो बहुत दूर की है। आतंकवाद को तो जैसे भूल ही गए। हां, प्रचार अभियान में अचानक सभी पार्टियों को एक-दूसरे की झोली में काला धन भरा हुआ जरू र दिखाई देने लगा।
राजस्थान का चुनाव प्रचार मूल रू प में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे पर ही निर्भर रहा। दोनों ने ही अपनी पार्टियों का प्रतिनिधित्व किया। इसमें भी कांग्रेस ने वसुंधरा को झालावाड में अटका कर अपना रास्ता काफी साफ कर दिया। इसी प्रकार भाजपा ने जसवंत सिंह और उनके पुत्र को साथ-साथ टिकट देकर अपनी लाचारी भी प्रकट की। गहलोत का प्रचार अभियान 125-150 बैठकों तक पहुंच गया। लाभ तो मिलेगा ही।
इस बार जातिगत समीकरण भी कुछ तो ठण्डे पडे हैं। विधानसभा चुनावों जितनी चर्चा इस बार केवल मीणा वर्ग में ही रही। किरोडी लाल ने मीणाओं का साथ देकर कांग्रेस के नमोनारायण को जिताने का आह्वान भी किया, वहीं भाजपा के श्याम शर्मा का प्रचार करने कोटा पहुंच गए। इधर गैर मीणा समुदाय ने मीणा जाति के प्रत्याशी को वोट न देने का मंतव्य जता करके सारा समीकरण बिगाड दिया। इससे दौसा के दोनों ही मुख्य पार्टियों के प्रत्याशी सकते में आ गए। जो भी हो जातीय आधार तो समाप्त होना चाहिए। और वंशवाद भी। हालांकि राहुल गांधी ने कहा है कि परिवारवाद अलोकतांत्रिक है, फिर भी इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने देश में जितने सामंतों को सत्ता सौंपी है, वह तो इसके विपरीत ही है। बडे लोगों को करना चाहिए, कहने का काम तो छोटे लोग करते रहेंगे। आज दोनों ही दल देश को नेतृत्व देने की स्थिति में नहीं हैं। इसके बारे में पूरे प्रचार के दौरान किसी ने कुछ चिन्ता नहीं जताई। सरकारें भी तभी काम करती हैं, जब देश किसी नेता की आवाज के पीछे चलता है। इस चुनाव में भी कोई नेता उभरकर नहीं आया।
आज मतदान करना है। लोकतंत्र के उत्सव का दिन है। आज का संकल्प है कि हमें “मतदान” करके ही अन्य कार्य करने हैं। कोई भी छूट न जाए। राजस्थान वैसे ही देश में सदा से पीछे रहा है। औसत मतदान में। उसमें भी महिलाएं और भी पीछे हैं। पिछले चुनाव में भी महिलाएं पुरूष मतदाताओं से 11 प्रतिशत पीछे थीं। इस बार तो कुछ आगे निकलने की बात हो। युवा पीढी भी जुड गई है अब तो। और हां! मतदान भी करना है और विवेक पूर्वक भी करना है। प्रत्याशी जनता के बीच का हो, जमीन से जुडा हो, शिक्षित और अनुभवी हो। अपराधी प्रवृत्ति का तो बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। न ही किसी जाति के वोट मांगने वाला ही हो। उसे तो अन्य लोग सीधा नकार सकते हैं। आपका वोट इस देश का भविष्य बनाता है। फिर किसी पर दोष डालकर भी क्या मिल जाएगा। आपका प्रत्याशी किसके साथ मिलकर काम करेगा, यह भी समझना है। ईश्वर हम सबको सद्बुद्धि दे, चुनाव शान्तिपूर्वक सम्पन्न हों और देश विकास के पथ पर आगे बढ सके, यही प्रार्थना है।
गुलाब कोठारी

मई 11, 2009

विवाह-2

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भारतीय दर्शन में विवाह संस्था को सृष्टि का मूल आधार भी माना है और प्रति सृष्टि (विलय या मोक्ष) का आधार भी माना है। हमारे अध्यात्म के चारों अंगों-शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा के लिए पुरूषार्थ की व्यवस्था दी है। मोक्ष आत्मा का विषय है। कामना (काम) मन का क्षेत्र है। अर्थ शरीर चलाने की आवश्यकता है और धर्म हमारी बुद्धि को प्रज्ञा रूप देने का कार्य करता है। ये सारे कार्य भी जीवन के भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रूपों में किए जाते हैं। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों ही आश्रम केवल गृहस्थाश्रम पर टिके रहते हैं। अत: जीवन का मूल केन्द्र भी गृहस्थाश्रम को ही माना है। उसी के अनुरूप विवाह संस्था का स्वरूप निर्माण हुआ है। हर समाज की इकाई यह गृहस्थ ही नजर आएंगे। समाज के लिए व्यक्तित्व निर्माण भी यहीं होता है। इसी से किसी भी राष्ट्र का स्वरूप बनता है।

इस दृष्टि से भारतीय दर्शन के कुछ सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक है कर्म और कर्मफल का सिद्धान्त। दूसरा है पुनर्जन्म का सिद्धान्त। तीसरी है मोक्ष की अवधारणा। व्यक्ति को प्रकृति का अंग और ईश्वर का अंश मानकर उसका निरूपण किया गया है। व्यक्ति को पिता, पितामह, प्रपिता आदि से जोडकर भी देखा गया है और माता, मातामह और प्रमाता आदि से भी। सृष्टि युगल तत्व के सिद्धान्त पर आगे बढती है, अत: इसे ही जीवन की पूर्णता का दर्जा प्राप्त है। विवाह का मूल कहा है। सम्पूर्ण पितृलोक और देवलोक की संस्थाएं इस पर टिकी हुई हैं। ब्रह्म और माया के स्वरूप को भी विवाह संस्था के माध्यम से ही समझने का मार्ग बताया गया है। यही कामना से आप्तकाम होने का मार्ग भी है। माया ही कामना या क्षुधा रूप होकर जीवन को आगे बढाने वाली शक्ति है। गृहस्थाश्रम माया के प्रवेश के साथ जुडता है और वानप्रस्थ के साथ इसके द्वार बन्द हो जाते हैं। भोग संस्कृति में व्यक्ति पूरी उम्र गृहस्थ रहता है। उसके पास काम-अर्थ के अतिरिक्त कोई चिंतन ही नहीं होता। वह पूरी उम्र जड शरीर से ही बंधा रहता है। चेतना की दिशा में उसकी यात्रा शुरू ही नहीं होती। जबकि जीवन का पहला सोपान ही चेतना को जाग्रत करना है। उसको संस्कारित करके मानवीय धरातल पर लाना होता है। तब आत्मा जीने लगता है-इस शरीर में।

विवाह नर-नारी के संकल्पित योग का नाम है। प्रारब्ध ही इसका निमित्त बनता है। जीवन की दिशा यह संकल्प तय करता है। दोनों का संकल्प, दोनों के सपने और पुरूषार्थ में सामंजस्य रहता है। दोनों अपने में स्वतंत्र जीव भी हैं और दोनों के प्रारब्ध भी अलग-अलग होते हैं। नए कर्म साथ-साथ किए जाते हैं। दोनों के फल साथ-साथ भोगने पडते हैं। ज्ञान की आवश्यकता इन परिस्थतियों को समझने में ही होती है। वैवाहिक सम्बन्धों में प्रारब्ध भी परिलक्षित होता है और वर्तमान कर्म भी। दोनों को ही ध्यान में रखकर व्यवहार करना पडेगा। इसके बिना साथ रहना केवल सामाजिक लाचारी बन जाती है।

मूल रूप से विवाह के दो मुख्य पहलू होते हैं। प्रेम को पैदा करना, पल्लवित करना और इसका आगे विस्तार करना। इसी के साथ दाम्पत्य रति (स्त्रेह, वात्सल्य, श्रद्धा और प्रेम) का विकास इस तरह से करना कि यह देव रति में बदल सके। अर्थ और काम को धर्म से मर्यादित करते हुए, कामनाओं की पूर्ति करके, निष्काम हो सकें। गृहस्थाश्रम सृष्टि विस्तार का काल है। अच्छी, योख्य, सुस्कृत संतान के लिए प्रार्थना करें, ताकि उसी तरह का जीव हमारी ओर आकृष्ट हो सके। जीव के प्रवेश के बाद उसके स्वभाव को समझकर उसे मानव रूप में माता संस्कारित करे। बाद में माता-पिता और गुरू उसे व्यावहारिक और आध्यात्मिक ज्ञान में आगे बढाएं। इसके अभाव में जीवन का सुरक्षा भाव छूट जाता है। तब व्यक्ति देने के स्वभाव को ग्रहण ही नहीं कर सकता। वह सदा ही लेने की सोचता रहता है। उसका विस्तार ही संभव नहीं है। उसकी मानसिकता संकुचित होकर रह जाती है।

भक्ति भाव व्यक्ति सोच समझकर पैदा करता है। पहले अपना इष्ट तय करता है। फिर धीरे-धीरे उसकी भक्ति में डूबता चला जाता है। प्रेम का भी यही स्वरूप है। यह भी होता नहीं है, किया जाता है। नित्य अभ्यास और संकल्प के द्वारा एकाकार हो जाता है। अपने आप उठने वाला प्रेम का ज्वार स्थाई भाव में टिक पाना कठिन है। वहां संकल्प उतना दृढ पूरी उम्र नहीं रहता। उस कामना को समझने के लिए पश्चिम के बडे देशों की ओर देखना होगा। जहां विवाह सम्बन्ध अपेक्षाओं पर ही आधारित रहते हैं। अहंकार का टकराव नित्य रहता है। समर्पण की तो कोई सोच भी नहीं सकता। इसका कारण है वहां की जीवन शैली में अधिदेव (प्राण) की अवधारणा का अभाव। वहां शरीर है, बुद्धि है बस! शरीर जड पदार्थ है। इसका भोग भी जड पदार्थ की तरह किया जाता है। एक निश्चित ढांचे में जीवन चलता है। इसमें जीवन कहां ठहर सकता है। जीवन में तो नित नया होता रहता है। सम्बन्धों के विच्छेद का किसी को खेद कहां होता है। वे अपने पैरों पर खडे रहने को सक्षम होते हैं। अत: साथी के छूटने की उतनी चिन्ता क्यों करें! इसीलिए वहां पर विवाह संस्था जर्जर होती जान पड रही है। साथ रह लेंगे, किन्तु शादी नहीं करेगे।
इसका एक कारण यह भी है कि वहां लडके-लडकी की शिक्षा एक-सी हो गई। लडकी भी लडकों जैसे ही जी रही है। लडका बनकर। न उसे पत्नी बनने की चिन्ता, न मां बनने की। न ही संस्कारों जैसे शब्द से उसका परिचय है। पूरा समाज ही लडकों जैसा व्यवहार करने लग गया। लडकी होकर लडकी जैसे जीने को कोई तैयार नहीं। एकांगी हो गया। कुदरत का इतना बडा अपमान ही वहां के नारी क्रन्दन का मूल है। हम भी उधर ही जाने में प्रसन्नता/गर्व का अनुभव करते हैं। अत: जीव जिस योनि से मां के पेट में आता है, वैसा ही मनुष्य रूप लेकर पैदा हो जाता है। उम्र भर शरीर का उपभोग भी उसी तरह करता चला जाता है।

पति-पत्नी दोनों बौद्धिक धरातल पर जीते हैं। पत्नी का भावनात्मक स्वरूप विच्छिन्न हो रहा है। मन में संवेदना का स्तर गिर चुका है। बच्चों के प्रति भी वैसा मोह नहीं दिखाई देता। ममता, करूणा, वात्सल्य जैसे भावों का अभाव बढता जा रहा है। लडकी के शरीर में लडके की बुद्धि कार्य करती है। दोनों का अहंकार झुकने को तैयार नहीं होता। शरीर की पकड छूटते ही अहंकार हावी हो जाता है और झट से अलग हो जाते हैं। अगले विवाहों में शरीर की पकड क्रमश: कम होती ही जाती है। वैसे भी दो लडके एक साथ कितने साल पति-पत्नी जैसे रह सकते हैं! एक को गर्म दूसरे को नरम रहना ही पडेगा। सुख के साथ दुख मे भी मिल बैठकर पार चलना होगा। इस माहौल में न तो पुरूषार्थ का धर्म दिखाई देता है और न ही दाम्पत्य रति का विकास। चेतना का धरातल तो शून्य प्राय: होता है। कैसे कोई स्वयं को सृष्टि का अंग मान सकता है या किसी की मर्यादा में जीना स्वीकार कर सकता है।

विवाह संस्था के कारण कामना का संसार आगे बढता है। दाम्पत्य रति से कामना तृप्त होती है। पितृ और देव संस्थाओं का पोषण करते हुए दोनों आप्तकाम होकर शान्तानन्द में विहार करते हैं। यही मोक्ष है। संकल्प ही मार्ग है और विवाह ही इसका निमित्त बनता है।

गुलाब कोठारी

मई 13, 2009

दलों का दलदल

देश के लोकसभा चुनावों का आज अन्तिम चरण है। कल से दिल्ली में नेताओं की मण्डी शुरू हो जाएगी। मतदाता सारे घटनाक्रम को मूक दर्शक बनता देखता रहेगा। ये सब वे ही लोग होंगे जो मतदाता द्वारा अथवा उसके नाम से चुने जाकर दिल्ली पहुंचते रहे हैं। जो कुछ परिणाम आएंगे, उन्हें देखकर मतदाता के मन पर जो कुठाराघात होगा उसका अनुमान कौन कर पाएगा नेता तो हर्गिज नहीं कर सकेंगे।
इस देश में चुनाव, दल, मतदान जैसे शब्दों के द्वारा कुछ नियम कानून भी बने हुए हैं, किन्तु उनकी पालना करने की बात कौन करता है हमारा तो देश ही आश्वासनों के सहारे चल रहा है।
हमारे देश में आज सात राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं और 39 प्रान्तीय दल हैं। इनकी भी परिभाषा बनी हुई है। प्रान्तीय दलों की शर्त यह है कि वह राज्य की राजनीति में पांच साल से सक्रिय हो और पिछली विधानसभा के चुनाव में उसके पास चार प्रतिशत सीटें हों। या फिर पार्टी को पिछले विधानसभा चुनावों में कुल मतदान का छह प्रतिशत हिस्सा मिला हो। एक बार सदस्य बनने के बाद यदि सदस्य किसी अन्य दल से जुडता है, तो उसको मिले मत मूल पार्टी के ही माने जाएंगे। हमने यह भी देखा है कि सरकार नियम-कानून तो बनाती है, लेकिन उसमें गलियां भी छोड देती है। जैसे एक तरफ पांच वर्ष की सक्रियता की बाध्यता और दूसरी तरफ सीधे चुनाव में कूद कर छह प्रतिशत वोट हासिल करने
की छूट।
इससे भी बडे आश्चर्य की बात है राष्ट्रीय दलों के बारे में। एक राष्ट्रीय दल का कम से कम चार राज्यों में मतदान का छह प्रतिशत हिस्सा होना चाहिए। तभी उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा दिया जा सकता है। क्या किसी ने इस दृष्टि से इन आंकडों को देखा है “हाथ कंगन को आरसी क्या” की तर्ज पर पिछले दो चुनाव के आंकडे देखने से भी सारी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। लगभग सभी प्रादेशिक दलों को चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लडने की स्वीकृति किस आधार पर दे रखी है स्वाभाविक ही है कि ऎसी स्थिति में मतदाता भ्रमित होता है। जातिवादी या निहित स्वार्थी ठेकेदार पार्टियां बनाकर मैदान में उतर जाते हैं। मोल-भाव और दबाव का बाजार गर्म होता है। ऎसे में मतदाता का रूझान चुनावों के लिए घटेगा ही।
प्रादेशिक और राष्ट्रीय पार्टियों की भेद रेखा भी आज दिखाई नहीं दे रही। सभी प्रमुख प्रादेशिक पार्टियां लोकसभा के लिए भी चुनाव लडने को स्वतंत्र हैं। यदि उनका अस्तित्व अन्य तीन राज्यों में है ही नहीं, तो उन्हें राष्ट्रीय दलों की हैसियत क्यों मिल जानी चाहिए यही तो एक भेद है दोनों के बीच। इस भेद को जाने-अनजाने मिटा देना ही वह कारण है कि इतने सारे दलों के प्रत्याशी लोकसभा में पहुंच जाते हैं। तब कैसे जनता किसी एक दल को बहुमत दे सकेगी। इससे तो बहुमत की सरकार बनने का रास्ता ही सदा के लिए बन्द कर दिया। हर सरकार गठबन्धन की ही बनेगी। बेशक देश का संविधान हर नागरिक को चुनाव लडने की आजादी देता है। लेकिन इस अधिकार का विवेकपूर्ण उपयोग होना चाहिए। तभी राजनीति शुद्ध हो सकेगी, मोल-भाव के रास्ते बन्द होंगे।
आज जितनी पार्टियों के प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचेंगे, उनमें कितने प्रत्याशी गैर राष्ट्रीय दलों से होंगे और वे देश के लिए कितने व्यापक दृष्टिकोण से कार्य कर पाएंगे! आज हर केन्द्रीय मंत्री अपने राज्य के लिए काम करके चला जाता है। राष्ट्र के प्रति समग्र दृष्टिकोण कहां से पैदा होगा देश में चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय, दो सक्षम संस्थाएं हैं, जिन्हें ऎसे मुद्दों पर तुरन्त निर्णय देने चाहिए, ताकि देश की बागडोर सक्षम हाथों में ही सुनिश्चित रह सके। वैसे चुनाव आयोग तो अपनी गलती मानने वाला नहीं है। कानून ही कुछ करे, तब है।
गुलाब कोठारी

मई 14, 2009

नेतृत्वविहीन चुनाव

लो, चुनाव भी हो गए हैं। अब क्या होगा खरीद-बेच का समय आएगा। मोल-तोल होंगे। यह सारा इस बात पर भी निर्भर करेगा कि बढत किस पार्टी को मिलती है। मोल भी खरीददार देखकर ही बताया जाता है। फिर राष्ट्रपति का रूख क्या कहता है, वह भी महत्वपूर्ण है। वह बडे गठबन्धन को भी बुला सकती हैं और बडी पार्टी को भी। उनके बुलावे के बाद भाव-ताव और बदल जाएंगे।
किसी भी दल को राष्ट्रपति द्वारा बडे दल के रूप में स्वीकृत करने के समय चुनाव पूर्व का गठबन्धन समझौता महत्वपूर्ण होता है। इस बार कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और झामुमो से सीमित गठबन्धन करके देशभर में अपने ही प्रत्याशी खडे किए हैं। इससे कांग्रेस को अपनी सही शक्ति का अनुमान भी हो जाएगा। कांग्रेस का ही एक खेमा राहुल गांधी को विपक्ष में बिठाकर प्रतिष्ठित कराना भी चाहता है। इससे मध्यावधि चुनाव की भी सम्भावना बढ जाएगी। मायावती के साथ एनडीए आसानी से पांच साल नहीं खींच पाएगा। तब राहुल के प्रधानमंत्री बनने के अवसर होंगे।
चुनावों में दोनों ही दल कमजोर साबित हुए। दोनों में ही नेतृत्व का अभाव रहा। इसी कारण मतदाता भी उदासीन दिखाई दे रहा था। हालात यहां तक हो गए कि कई प्रदेशों में तो मतदान आधा भी नहीं हुआ। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि लोगों के मन में लोकतंत्र के प्रति सम्मान कम हो गया है! हमने देखा है कि कहीं विरोधी पार्टी के मतदाताओं को धमकियां दी जाती हैं, तो कहीं मदिरापान कराया जाता है। कहीं जीतने पर उपहार देने के लिए टोकन बांटे जाते हैं। गोलियां तक चलाने से नहीं चूकते लोग। यही रह गया हमारे लोकतंत्र का यथार्थ रू प। यही हमारी साठ साल की उपलब्धि है। ऎसे चुनाव तो वैध भी नहीं माने जाने चाहिए। नेताओं को क्या फर्क पडता है! उन्हें कुर्सी के अलावा कुछ नहीं दिखाई पडता। जो रास्ते में आता जान पडे उससे तो गाली-गलौच कर बैठते हैं। संतुलन खो देते हैं। अब जो खरीद-फरोख्त होगी, तब पीछे रहने वाले कैसे विष उगलेंगे, सामने आ जाएगा। सारे नेताओं को तो कुर्सियां मिल नहीं पाएंगी। चुनावों में सार्वजनिक रूप से गालियां देने वाले भी तलुए चाटेंगे और प्रशस्ति गान करते दिखाई देंगे। जोड-तोडकर भानुमति का कुनबा बनेगा। वही हमारा भविष्य तय करेंगे। शायद अगले चुनावों में नई पीढी कुछ क्रांतिकारी परिणाम दिला सके।
सरकार बनाने का निमंत्रण वैसे तो तयशुदा नियमों के तहत ही दिया जाता है, फिर भी राष्ट्रपति का स्वविवेक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अटलजी को तत्कालीन राष्ट्रपति ने बडे दल के रूप में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। वहीं राष्ट्रपति के.आर. नारायण ने सबसे बडे गठबन्धन को आमंत्रित किया था। वर्तमान राष्ट्रपति का नजरिया समय आने पर सामने आएगा। वर्तमान स्थिति में यह तो तय है कि कांग्रेस और भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा। ज्यादा सीटें मिलने का दावा भी दोनों ही दल कर रहे हैं। दोनों के बीच अन्तर भी बहुत बडा रहने वाला नहीं है। कौन दल किन-किन पार्टियों के साथ गठबन्धन करता है और संख्या में भी आगे निकलता है, उसी पर निर्णय ठहरेगा।
सरकार किसी की भी बने, मुख्य प्रश्न यह है कि कौन पार्टी आगे बढकर देश को नेता देती है। सरकार चलाना नेतृत्व नहीं है। देश जिसके पीछे चलने को तैयार रहे, वैसा नेता होना चाहिए। अभी दो बडे नेताओं पर तो जूते फेंके जा चुके हैं। जब तक देश में कोई नेता नहीं उभरेगा, देश आगे नहीं बढेगा। यह दायित्व भी दोनों ही मुख्य दलों का है।
गुलाब कोठारी

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मई 18, 2009

विवाह-3

जीवन की पूर्णता का मूल आधार ही विवाह को माना गया है। इसके बिना पूर्ण पुरूष (ब्रrा) से मिल पाना लगभग असंभव माना गया है। अथवा इसके लिए एक से अधिक जन्मों तक अभ्यास करना पडेगा। इसका कारण प्रकृति का संचालन है। हमारी उत्पत्ति भी इन्हीं नियमों के अन्तर्गत होती है। प्रकृति के नियम जड-चेतन सभी वर्गो पर समान रूप से लागू होते हैं। इनकी जानकारी होते ही जीवन की अनेक गुत्थियां हल हो जाती हैं। भारतीय दर्शन में विवाह को एक सामाजिक रिवाज नहीं माना गया। इसको सम्पूर्ण संवत्सर का अंग मानकर विवाह संस्कार का निरूपण किया गया है। नर-नारी को एक ही सांवत्सरिक आत्मा का अंश माना गया है। भूतात्मा के रूप में इनका सहज समन्वय विवाह कहा गया है। इसको दो आत्माओं का मिलन कहा है। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं। कहा भी है-

1. पतिरेव गुरू: स्त्रीणाम्।
2. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते।

मानव का भी एक विकास क्रम रहा है। मानव को मनु का पुत्र कहा गया है। मनु विश्व की मूल प्रतिष्ठा का नित्य तत्व है। सम्पूर्ण सृष्टि ही मनु की संतान होती है, किन्तु मानव में मनु स्वतंत्र केन्द्र लक्षण के रूप में प्रतिष्ठित रहता है। परिपूर्णता स्पष्ट है। सृष्टि में तीन स्थूल पिण्ड हैं-सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी। चौथा भाव अव्यक्त रहता है- प्राण रूप में। चारों की समन्वित अवस्था मानव रूप लेती है। भू-पिण्ड से शरीर का निर्माण होता है। चन्द्रमा से मन का और सूर्य से बुद्धि का। अव्यक्त अंश मनु है-आत्म रूप है। जिनमें इन्द्रियों का विकास रहता है, वे चेतन कहलाते हैं। बाकी अन्य जड की श्रेणी में आते हैं।

केवल भू-पिण्ड से पत्थर आदि जड पदार्थो का निर्माण होता है। इसमें चन्द्र और सूर्य के अंश जुडने पर उसी मात्रा में मन और बुद्धि का विकास होता है। कृमि, कीट, पक्षी और पशुओं में। चन्द्रमा के प्रभाव के आठ सर्ग होते हैं। सूर्य के 33 सर्ग। इनके साथ-साथ जहां आत्मभाव का भी विकास हो वहां आत्मनिष्ठ मानव बनता है। जहां शरीर, मन, बुद्धि तीनों ही आत्मभाव से समन्वित रहते हैं। इन चारों के व्यवस्थित स्वरूप का नाम ही मानवता है। इस व्यवस्था के खण्डित होते ही मानव आक्रामक होने लगता है। एक वेद वाक्य है-

“न वै दैवा अतिक्रामन्ति, न पितर:, न पशव:,
नासुरा:। मनुष्या एवै के अतिक्रामन्ति।”

इसका सार यह है कि मानव के अलावा कोई भी प्राणी, देव आदि प्रकृति की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता।
हमारा प्राकृतिक स्वरूप क्या है। हम पार्थिव प्राणी हैं- पशु रूप हैं। जो पंच पाश से बंधा हो, उसे पशु कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ही पांच पाश हैं। हमारी पृथ्वी के मध्य में विषवत् रेखा या भूमध्य रेखा है।

इसके एक ओर 240 तक कर्क रेखा तथा दूसरी ओर मकर रेखा है। इन 480 के परिसर का क्रान्तिवृत्त ही हमारा संवत्सर कहलाता है। इसी को यज्ञाकाश कहते हैं। इसी में सूर्य और चन्द्रमा का भ्रमण होता है। इसमें दिन वाले आधे भाग का अधिपति सूर्य और रात्रिरूपी आधे आकाश का अधिपति चन्द्रमा होता है। सूर्य के अगिA प्रधान 240 भाग से मानव का (नर का) स्वरूप निर्माण होता है और चन्द्रमा के सौम्य आकाश के 240 से नारी के स्वरूप का विकास होता है। जिस प्रकार संवत्सर में सूर्य पति भाव और चन्द्रमा पत्नी भाव है, वही दाम्पत्य रूप-सम्बन्ध नर-नारी का होता है। एक ही प्रजापति दो सौर-चान्द्र रूपों में परिणत होते हुए प्रजा के उत्पादन में समर्थ बनें। दोनों ही अकेले अपूर्ण होते हैं। दाल की तरह एक भाग होते हैं। दोनों मिलकर सृष्टि यज्ञ के लिए पूर्णता ग्रहण करते हैं। शास्त्र कहते हैं-

“संवतसरो वै यज्ञ:, यज्ञो वै पुरूष:, पुरूषो वै यज्ञ:।”
जब नर-नारी एक-दूसरे के सम्मुख खडे होते हैं तब मेरूदण्ड ही भू-मध्य रेखा होता है। पूर्णवृत्त बन जाता है। दोनों की 24-24 पसलियां 480 के संवत्सर को पूर्णता देते हैं। जीवन का लक्ष्य चूंकि पुरूषार्थ है-मोक्ष है। उसके लिए पहले सांवत्सरिक पूर्णता प्राप्त करना पहली अनिवार्यता है। इसमें तत्व चिन्तन निष्ठा के माध्यम से आत्मरत बने रहना मानव की परिपूर्णता है। दाम्पत्य जीवन में विश्वास, विकासात्मक अगिA तत्व रूप में पुरूष से अनुगत रहता है और श्रद्धा, संकोचात्मक स्त्रेह तत्व रूप सौम्या स्त्री से अनुप्राणित रहता है। सोममयी श्रद्धा शक्ति तत्व है, स्त्री भाव है। अगिAमय विकास रूद्र/ शिव तत्व है। दोनों के सम-समन्वय से ही दोनों के स्वरूप की रक्षा संभव है। जहां भी समन्वय खण्डित हुआ, अतिक्रमण करने लगते हैं। हमारे यहां “सहधर्म चरताम्” को आदर्श कहा है। पूर्ण मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण नहीं करता।

इस दाम्पत्य भाव के कारण ही मन में स्त्रेह रूप तरल भाव रस पैदा होता है। इस रस प्रवाह वृत्ति का नाम ही प्रेम है। चूंकि सभी प्रवाह पंाच रूप में गति करते हैं, अत: प्रेम के प्रवाह की भी पांच ही गतियां होती हैं। ऊपर से नीचे, बडों का छोटों के प्रति वात्सल्य कहलाता है। नीचे से ऊपर, बडों के प्रति श्रद्धा रूप होता है। बराबरी में स्त्रेह रूप। जड पदार्थो के प्रति लगाव को “काम” कहते हैं। दाम्पत्य जीवन में इन चारों भावों का सम्मिश्रण होता है। इसको “रति” कहा गया है। यह दाम्पत्य रति ही कालान्तर में आत्मरति का रूप लेती है। पुरूषार्थ सिद्धि करती है।

समय के साथ ये सारे ही सिद्धान्त एक-एक करके लुप्त होते जा रहे हैं। शरीर मन-बुद्धि और आत्मा के समन्वय का विखण्डन होने लगा है। किसी भी परिस्थिति में मानव स्वयं को सुखी नहीं पाता। स्त्री भाव को आत्म बुद्धि साक्षिणी कहा है। आज सहकामचारिणी बनती जा रही है। कहीं-कहीं तो विनोद का, रंजन का विषय बन गई है। तब बलिष्ठ, महिष्ठ और यशस्वी संतान कैसे पैदा होंगीक् स्व. मोतीलाल शास्त्री ने लिखा है कि आज तो मर्यादाओं के अतिक्रमण को ही पौरूष मान लिया है। कल क्या होगाक् इसके उत्तर में स्व. शास्त्री लिखते हैं- “आज जैसे विधि-विधान निर्मित हो रहे हैं, इनसे कालान्तर में नारीत्व सर्वथा ही अभिभूत (परास्त) हो जाएगा। मानव का स्वरूप भी, मानवत्व भी विस्मृत हो जाएगा।”

गुलाब कोठारी

आशा की किरण

लोकसभा चुनाव के परिणामों ने मतदाता की परिपक्वता पर मुहर लगा दी है। अब कोई भी राजनीतिक दल मतदाता के साथ खिलवाड नहीं कर सकेगा। यह मान लेने का समय भी अब नहीं रहा कि मतदाता उदासीन दिखाई देते हुए भी चौकस नहीं हैं। चुनाव परिणाम यूं तो अनेक पहलुओं की स्थिति बखान कर रहे हैं, फिर भी दो-तीन बातें मुख्य तौर पर उभरी हैं। मतदाता ने किसी एक दल को, कांग्रेस को, ही बहुमत देने की ओर कदम उठाया है। ताकि कांग्रेस को अपना घोषणा पत्र निर्विघ्न रू प से लागू करने का अवसर मिल सके।
पिछले पांच वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री भी अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस की नीति के अनुरू प निर्णय नहीं कर सका। हर बार कोई न कोई सहयोगी ही कांटे बिछा देता था। मतदाता ने इस बार उन कांटों को भी बुहार दिया। जो आपराधिक तत्व सत्ता पर काबिज हो गए थे और सत्ता को अपनी मुट्ठी में लेकर चल रहे थे, उनको बडा सबक सिखा दिया।
देश के मानचित्र पर आपराधिक तत्वों का विकास और जमावडा सर्वाधिक उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में होने लगा है। इसके लिए जिम्मेदार वहां के क्षेत्रीय दल ही रहे हैं। मतदाता ने उन दलों को इस बार पटखनी दे दी और विकास की डोर विश्वसनीय पार्टी के हाथों सौंप दी। समाजवादी पार्टी, लोकजन शक्ति पार्टी, राजद एवं वाम दलों पर कडा प्रहार करके लोकतंत्र की लाज बचा ली। इसके लिए मतदाता को नमन! अपराधियों के बीच बैठकर इतना साहस दिखाना कम बात नहीं है। मतदाता ने भाजपा को भी बडा झटका दिया है। कर्मठ और विवेकशील माने जाने वाले दल ने पिछले दस वर्ष में अपनी छवि खराब ही की है। आज भाजपा के अधिकांश नेता अपने अहंकार के कारण यथार्थ को स्वीकार ही नहीं करते। वाणी का संयम भी खो बैठे। आचरण में भी भारी गिरावट आई है। इन सब पर भी धन का दाग गहरा लगा हुआ है (अनेक पर)। अटलजी का काल भी देखा, यूपीए की जीत के बाद भाजपा की बौखलाहट देखी और इस बार उन्हें अनियंत्रित होते हुए भी देखा। देश एक पार्टी का शासन तो चाहता है, किन्तु ऎसा सत्ता का मद भी नहीं चाहता, जैसा कि आज भाजपा में आ गया है। भाजपा को अपने आचरण पर चिंतन करना चाहिए।
तीसरा और चौथा मोर्चा किन दलों ने बनाया है, यह भी मतदाता के जेहन में रहा है और उन क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय स्तर पर निष्क्रिय करने का भी प्रयास किया है। उनको अपनी सीमा बताने का कार्य भी काफी हद तक इन चुनावों में हुआ है। बचा-खुचा अगले चुनाव में नई पीढी कर दिखाएगी। इस दृष्टि से ऎसे क्षेत्रीय दलों को मर्यादित एवं लोकहित का व्यवहार भी सीख लेना चाहिए।
कुल मिलाकर एक परिपक्व परिणाम सामने आया है। पिछले कार्य और भावी दृष्टि का प्रभाव भी इनमें झलकता है। उम्मीद करनी चाहिए कि नई सरकार देशहित के और जनजीवन के मुद्दों को प्राथमिकता देती रहेगी।
गुलाब कोठारी

मई 19, 2009

भटकती भाजपा

इस बार लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की वैसी ही स्थिति उभरकर सामने आई, जैसी कि पिछले लोकसभा चुनाव में आई थी। शायनिंग इण्डिया का नारा अंधेरे में दबकर रह गया था। अपनी इतनी बडी हार से भाजपा में बौखलाहट का बडा वातावरण भी दिखाई दिया। इस बार भी दावे तो आसमान से नीचे ही नहीं उतरे, किन्तु भाजपा चारों खाने चित्त हो गई। लालजी ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि यदि मैं पी.एम. नहीं बना तो घर लौट जाऊंगा। न पी.एम. ही बने, न घर ही लौटे। भाजपा की यह सबसे बडी भूल साबित हुई कि उनको इतना पहले से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस सम्मान को पचा सकना उनके लिए असंभव हो गया। इस पूरे काल में उनके तेवर भी प्रधानमंत्री जैसे ही रहे। अन्तत: जनता ने ही उनके नेतृत्व को नकार दिया। चुनाव प्रचार के दौरान ही एक और समझदार नेता ने अपने पिटारे से मोदी का नाम छोड दिया। इसका एक अर्थ यह था भाजपा के एक धडे को भी आडवाणी का नेतृत्व स्वीकार नहीं है और वह भी ऎन चुनाव के पहले। भाजपा का इससे बडा नुकसान तो कांग्रेस ने भी नहीं किया। इस घोषणा से नरेन्द्र मोदी भी फुफकारने लग गए। सभी नेताओं की वाणी से विष उगला जा रहा था। इसका परिणाम भी वही होना था। भाजपा के सहयोगी दलों ने भी मोदी को नकार दिया।
दिल्ली के गढ में भाजपा का एक संतरी भी नहीं बचा। उत्तराखण्ड में भी भाजपा को बैरंग लौटना पडा। राजस्थान में अकाल पड गया। मात्र चार सीटों पर संतोष करना पडा। चुनाव प्रचार में यहां भी बयानबाजी का बडा दौर चला था। गुलाब चन्द कटारिया की रथ यात्रा आगे बढती गई और पीछे-पीछे भाजपा की चादर सिमटती चली गई। पहले ही दिन से उदयपुर की पांच सीटें कांग्रेस को जाती दिखाई दे रही थीं, राजसमन्द को छोडकर। भाजपा के लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। राजस्थान में हम इन चुनावों के आंकडों को पिछले चुनाव के आंकडों से मिलाएं तो पता चल जाएगा कि भाजपा का मतदाता उदासीन होता जा रहा है। सन् 2003 में विधानसभा और सन् 2008 के विधानसभा में कांग्रेस के पक्ष का मतदान मात्र 1 प्रतिशत बढा था, जबकि भाजपा के पक्ष में लगभग 5 प्रतिशत मतदाता घटे थे। सन् 2004 के और सन् 2009 के लोकसभा चुनाव कहानी को और आगे ले गए। कांग्रेस के पक्ष में 5.75 प्रतिशत वोट बढे, किन्तु भाजपा के पक्ष में टूट 12.44 प्रतिशत की हुई। शेष मतदाता वोट डालने नहीं आए।
कांग्रेस के हारे हुए विधायक सी.पी. जोशी और लालचन्द कटारिया सांसद चुने गए, जबकि भाजपा के जीते हुए विधायक घनश्याम तिवाडी, किरण माहेश्वरी और राव राजेन्द्र सिंह चुनाव हार गए। एक बात और भी है कि गांवों में रोजगार गारण्टी योजना का प्रभाव भी दिखाई पडा। भाजपा की कई योजनाएं लागू ही नहीं हो पाई।
किसी की नहीं मानना भी भाजपा के लिए शान की बात हो गई है। चाहे राजनाथ सिंह हो, चाहे आडवाणी, सुषमा स्वराज या वसुन्धरा राजे। इनके लिए तो सही उतना ही है जो इनको सही लगता है। इस पर भी जातिवाद का भूत भीतर इतना उतर गया है कि लोगों को राष्ट्रवाद छोटा सा जान पडता है। लोग अपनी-अपनी जाति के बाहर नेतृत्व देने को ही तैयार नहीं है। प्रचार के दौरान भाजपा की छवि गिरती चली गई और किसी के भी कान खडे नहीं हुए। भ्रष्टाचार और अपराधियों को शरण देने में भी किसी पार्टी से पीछे नहीं रही। आज भी भाजपा अपनी साम्प्रदायिक छवि से उबर नहीं पाई है। नई पीढी का मतदाता शान्ति चाहता है।
राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या हो, इस पर वह सोचे। आज भाजपा से न कार्यकर्ता संतुष्ट है, न ही देश। भाजपा ही देश की दूसरी बडी राजनीतिक पार्टी भी है। हर बार इसी तरह मार खानी हो तो इसकी मर्जी, किन्तु कुछ करने लायक बनना है तो पार्टी का पुनर्गठन एवं नीतियों का आकलन करना होगा। सभी पुराने चेहरों को सलाहकार का दर्जा देकर पीछे की सीट पर बिठा देना चाहिए। कांग्रेस में भी ऎसे ही लोग “घुण” का कार्य कर रहे हैं। वहां तो नीचे पोल ही पोल है। भाजपा में तो ऎसा नहीं है। केवल अहंकार है।
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि दो बडे दलों में से एक पटरी से उतर गया है। वरना तीसरे मोर्चे की जरूरत ही देश को नहीं पडती। सब जानते हैं कि तीसरा और चौथा मोर्चा किन लोगों का गठबन्धन है और देश को क्या दे सकता है। भाजपा में यदि आवश्यक सुधार नहीं हुआ तो ये लोग ही लोकतंत्र के नायक होंगे।
गुलाब कोठारी

मई 25, 2009

धन्य-धन्य भागीदारी

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आपको याद होगा कि ठीक एक साल पहले हम कुछ सपने लेकर मध्यप्रदेश आए थे। एक वर्ष में वो सपने सच हुए। मध्यप्रदेश के लिए हम अपने हुए। और यह सारा हुआ ज्ञान और कर्म के सहारे। लोगों में आस्था का भाव पैदा कर पाए। हमारे अनुरोध पर लोग तपती दोपहर में “अमृतम् जलम्” के लिए श्रमदान करते रहे और आज तक कर रहे हैं। हमारे भी कोई पिछले पुण्य ही होंगे, जिनके कारण इतना आशीर्वाद मिला। यहां तक कि माननीय मुख्यमंत्री ने भी “अमृतम् जलम्” के जरिए अपना जन्मदिन मनाया।
यह जो पत्रिका आपके हाथ में है, वह तो पत्रिका का शरीर है। जो पढकर समझ रहे हैं, वह बुद्धि क्षेत्र का ज्ञान है। जिसे आप जीवन के साथ जुडा हुआ अनुभव करते हैं, वह पत्रिका की आत्मा है। केवल इसी का सम्बन्ध आपकी आत्मा से बना हुआ है। शरीर को पशु कहते हैं। इसका दुबला या मोटा होना अर्थहीन है। इसको आत्मा ही चलाता है। इसीलिए हमने पत्रिका को आत्मा का अखबार बनाना ही उचित समझा ताकि ज्ञान को प्रकाशित होने का अवसर मिल सके।

पिछले एक वर्ष के छोटे-से काल में जो वातावरण पत्रिका ने बनाया, आप सब उसके साक्षी हैं। पत्रिका ने हर पाठक के दिल को छुआ है। उसकी जिन्दगी के पास खडा रहने का प्रयास किया है। तभी लोगों ने हमारी बात में आस्था जताते हुए कडी धूप में श्रमदान करने का संकल्प किया और इतना बडा कार्य कर दिखाया। आत्मा के बुलावे पर आत्मा दौडी। धूप में पसीना बहाकर भी आनन्द की अनुभूति प्राप्त की।

इसी एक साल में हमने लोकतंत्र के दो महाकुंभ भी देखे। विधानसभा और लोकसभा के आम चुनाव। पत्रिका अपने आप पर चौथा पाया होने का गर्व करता है। बाजारू माल की तरह पत्रिका को कोई खरीद नहीं पाया। न ही पत्रिका ने किसी को भ्रमित किया। “जागो जनमत” और “प्रतिबद्धता पत्र” जैसे अभियान यहां के पाठकों को पहली बार देखने को मिले। हमारे आकलन आगे-से-आगे खरे उतरे और हर दृष्टि से निष्पक्ष भी रहे। दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दलों ने भी मुक्त कण्ठ से रिपोर्टिग और आकलन की प्रशंसा की।
पूरे वर्षभर पत्रिका सचाई उजागर करने के लिए चर्चा में रहा। सामाजिक मुद्दों पर तो सरकार ने भी तुरंत कार्रवाई कर दिखाई। व्यापार के साथ-साथ सामाजिक नेतृत्व का भी बोध बरकरार रहा। इसी का परिणाम रहा कि भोपाल में फिर से गंगा-जमुनी संस्कृति की लहरें उठने लगीं।

पंजाबी, सिंधी, मुसलमान आदि अल्पसंख्यकों ने तो पत्रिका के सम्मान में समारोह आयोजित किए। लोगों के इस जुडाव को देखकर ही शायद मुख्यमंत्री ने भोपाल की सभा में कहा था-”अकेली सरकार विकास नहीं कर सकती। समाज साथ होना जरूरी है। जल संरक्षण अभियान मे पत्रिका साथ है तो कुछ भी मुश्किल नहीं।”
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने तो एक से अधिक बार फोन करके पत्रिका को खरी-खरी समीक्षा के लिए बधाइयां दीं। उनको विश्वास ही नहीं था कि कोई अखबार इतना निष्पक्ष भी हो सकता है, कि पूरी तस्वीर आइने की तरह दिखा दे।

पत्रिका चूंकि पाठक को ही सब कुछ मानता है, अत: इसकी सामग्री की गुणवत्ता, मौलिकता और इसका सांस्कृतिक धरातल अपना एक मूल स्वरूप लिए रहता है। पत्रिका मूल लेखन और मूल्यपरक सामग्री को ही प्राथमिकता देता है। नकल नहीं करता। इसीलिए पाठकों के जीवन का अनिवार्य अंग बन जाता है। पत्रिका एवं अन्य अखबारों के पाठकों में यह वैचारिक अन्तर देखा जा सकता है। पत्रिका ने शिक्षा में छूट रही मानवीय संवेदनाओं को लोक शिक्षण के रूप में एक मशाल बनकर प्रयोग किया है।

अभी पत्रिका का यह पहला साल ही है और मध्यप्रदेश का बडा हिस्सा सामने भी है। हम आपको विश्वास दिला सकते हैं कि पत्रिका की पत्रकारिता का लोगों को अनुसरण करना होगा। नई पीढी तो बहुत जागरूक है। घटिया सामग्री पढकर स्वयं को अपमानित नहीं करेगी। पत्रिका की तरह हर अखबार को पहले पाठक के दिल से जुडना पडेगा, फिर धन से। इस दृष्टि से मध्यप्रदेश में भी एक नए युग की शुरूआत ही हुई है। इसका सभी ने ह्वदय से स्वागत भी किया है। पत्रिका के एजेण्ट और वितरकों का उत्साह इसका प्रमाण है। विज्ञापनदाता भी मानने लगा है कि अच्छे अखबार की साख ही माल को चोटी पर पहुंचा सकती है।

व्यापारिक क्षेत्र के लोगों को एक बात पर अवश्य चिन्तन करना चाहिए कि किस कारण से भोपाल और इन्दौर क्षेत्र के लाखों पाठकों ने दशकों से आ रहे अपने अखबारों को पढना बन्द कर दिया। और वह भी तब, जब कि पत्रिका के केवल दो संस्करण-भोपाल और इन्दौर ही शुरू हुए हैं। इसी में भविष्य की तस्वीर है।
विज्ञापन को पढ लेना ही काफी नहीं है, उसका प्रभाव मानस परिवर्तन में भी दिखना चाहिए। साख अच्छी हो तो अखबार भी बिकता है और विज्ञापनदाता का माल भी। वितरकों को तो राजस्थान का दौरा कर लेना चाहिए। सारा कुछ समझ में आ जाएगा।

पत्रिका ने एक साल में जो कुछ कर दिखाया है उसकी तो स्पर्द्धी अखबार भी नकल करते हैं। चाहे पुस्तक मेला हो, अमृतम् जलम् हो या फिर पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था। इसका एक ही अर्थ है-व्यापार में भले ही वे स्पर्द्धी हैं, किन्तु हमारे अच्छे कार्यो की सराहना वे भी करते हैं, और हमारा साथ देते हैं। हम तो उनके भी आभारी हैं।
पत्रिका अपनी कार्यशैली से भी सोते हुओं में जाग्रत रहने वाला है, यह उसने एक साल में यहां आकर भी सिद्ध कर दिया है। पत्रिका भोपाल की आवाज बन चुका है और इन्दौर की भी। बाकी क्षेत्र भी दूर नहीं हैं। आप लोगों का आशीर्वाद चाहिए। आप हमारे हाथ मजबूत रखें, हम आपके। भोपाल के ही बशीर बद्र साहिब का एक शेर है-

“तुम्हारे शहर के सारे दिये तो सो गए लेकिन,
हवा से पूछना दहलीज पर ये कौन जलता है।”
यही पत्रिका है।
आइए! ज्ञान की इस रोशनी में मिलकर एक नया प्रदेश बनाएं। बच्चों के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करें। आप और हम कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढते जाएं। ईश्वर भी खुद साथ हो जाएगा।
नमस्कार!

गुलाब कोठारी

मई 24, 2009

विवाह-4

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पथ्वी के सभी जीवों को पशु कहा जाता है। हमारी पृथ्वी की तरह सभी लोकों को भी पृथ्वी संज्ञा दी गई है। अत: सभी लोेकों में भी पशु ही रहते हैं। चाहे असंज्ञ हो, अन्त: संज्ञ हो, या फिर ससंज्ञ हो। मनुष्य की भी पशु संज्ञा है। प्रकृति के प्राणों में ऋषि, पितर, देव, गंधर्व प्राणों के बाद पशु प्राण आते हैं। ऋषि, पितर और देव प्राणों के कारण हमारे तीन ऋण बनते हैं। मानव जीवन का लक्ष्य है धर्मानुकूल अर्थ और काम के सहारे मोक्ष प्राप्ति। आ#काम हो जाना। मानव-रूप पशु की मोक्ष तक की यात्रा कोई साधारण घटना नहीं हो सकती। पशु को तो वैसे भी भोग योनि माना है।

अज्ञानवश मनुष्य भी भोग को ही प्रधान कर्म मानकर जीने लगता है। उसके कर्म में विद्या का अंश अल्प होता है। जीवन को दो ही तत्व चलाते हैं-विद्या और अविद्या। धर्म-ज्ञान-वैराख्य-ऎश्वर्य विद्या कहलाते हैं। अधर्म, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश को अविद्या कहते हैं। विद्या से बुद्धि प्रभावित होती है। अविद्या मन के प्रवाह से जुडती है। मनमानी करती है। विद्याभाव से ही मन पर अंकुश लगाया जाता है। पशु के पास अंकुश लगाने की क्षमता नहीं होती। वह तो प्रवाह पतित हो जाता है। मानव के पास यह क्षमता होती है।

इस भू पिण्ड पर औषधि, वनस्पति, कीट, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि सभी शरीर रहते हैं। सभी का अपना-अपना जीवन स्वतंत्र भी होता है और एक दूसरे पर निर्भर भी। ये सारे शरीर भू-पिण्ड के नभ्य (नाभि या केन्द्र) के द्वारा आकृष्ट भिन्न-भिन्न प्राणों से ही बनते हैं। अत: इन्हें पार्थिव या पृथ्वी के पशु कहा जाता है। जब तक इनका पृथ्वी केन्द्र से आदान-प्रदान रहता है, तब तक ही इनका जीवन रहता है। पृथ्वी के नष्ट होने पर भी ये सारे नष्ट हो जाते हैं।

पशु की एक अन्य व्याख्या यह भी है कि जो प्राणी पंच पाश से बंधा हो, वह पशु है। ये पांच पाश अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष और अभिनिवेश हैं। अज्ञान को अविद्या कहते हैं। ज्ञान को विद्या कहा है। एकोज्ञानं ज्ञानम् के अनुसार जिसको यह समझ में आ जाए कि सब प्राणियों में एक ही सत्ता रहती है, उसे ज्ञानी कहा जाता है।

पृथ्वी पिण्ड का पोषण करने वाले भी पशु कहे जाते हैं। अत: सभी असंज्ञ, ससंज्ञ और अन्त: संज्ञ पशु कहलाते हैं। सभी पृथ्वी के उपकरण हैं। जैसे मन, बुद्धि और शरीर आत्मा के उपकरण हैं। जो स्थान घेरते हैं, सीमायुक्त होते हैं, वे भी पशु हैं। अत: जीवों के अतिरिक्त अन्न, जल और अख्नि भी पशु हैं। लेकिन जिस जल और अख्नि से पृथ्वी का निर्माण होता है, वह पशु नहीं हैं। उनको प्राण पद कहते हैं। सभी पशु पृथ्वी की प्राण शक्ति के आधार पर स्थिरता पाते हैं। अन्न का अर्थ है-जिसको पाकर पिण्ड अपने स्वरूप में बना रहता है। शरीर, मन, बुद्धि जैसे उपकरणों से। सूर्य-परमेष्ठी आदि मण्डलों से जो रस पृथ्वी पर आते हैं, वे ही पशु रूप ग्रहण करते हैं। अन्त में जब पृथ्वी के मूल स्वरूप में जुड जाते हैं, तब इनका पशु भाव समाप्त हो जाता है। वर्षा का जल, नदी, तालाब का जल पशु रूप है। लकडी में छिपी हुई अख्नि पशु रूप है। पिण्ड शरीरों पर दिखाई देने वाला अख्नि भी पशु है। इसी प्रकार प्राणों के आधार हर लोक के अपने-अपने पशु होते हैं। प्राण के साथ मन और वाक् भी सदा जुडे रहते हैं। अविनाभाव होते हैं।

ये वाक् भी चार प्रकार की होती है। पृथ्वी की वाक् कारणभूत अग्नि में और जहां तक पृथ्वी दिखाई पडती है, उस रथन्तर साम में रहती है। अंतरिक्ष वाक् वायुमण्डल में, वाम देव्य साम में रहती है। सूर्य की वाक् केन्द्रस्थ इन्द्र में और सूर्य के वृहत साम में रहती है। इसमें अन्य सभी वाक् समाहित रहती हैं। चौथी वाक् लोक के सभी पशुओं में रहती है। इसके दो रूप होते हैं। प्राण रूप या प्राण गर्भिता वाक् रूप। एक को चित्य और दूसरी को चितेनिधेय कहते हैं। एक मत्र्य रूप, दूसरा अमृत रूप। पिण्ड रूप मत्र्य वाक् है। पिण्ड की स्थिति को बनाए रखने वाला चितेनिधेय कहलाता है। यह केन्द्रगत प्राण ही अगिA-सोम यज्ञ द्वारा पिण्ड को बनाता है। फिर उसी पर आरूढ हो जाता है। वही चारों और फैलता है। यह रस रूप यजु: है, पिण्ड भाग ऋक्। जहां तक पिण्ड दिखाई दे, वह साम कहा जाता है।

तीनों लोकों में अग्नि-वायु-आदित्य को अमृत कहा है। पृथ्वी अन्तरिक्ष द्यु लोक मत्र्य पिण्ड हैं। इनको लोक-मूर्ति-ऋक् भी कहते हैं। इनसे हमारी इन्द्रियों के विषय बनते हैं। रस रूप गंध आदि। साम बहिर्मण्डल कहलाते हैं। इनसे ही हमारी इन्द्रियों का सम्बन्ध बनता है। जो सदा दूसरों पर आश्रित रहते हैं, उनको भी पशु कहते हैं। इस प्रकार एक ही वाक् चार प्रकार से प्रकट होकर अन्न को प्रकट करती है। सूक्ष्म अवस्था की वाक् ही स्थूल अवस्था में अन्न कहलाती है। चौथा रूप ही स्थूल होता है। यही पशुभाव होता है। हम भी एक-दूसरे का अन्न बने रहते हैं।

पशु में भी अन्य प्राणियों की तरह वीर्य रहता है। ब्राह्, क्षत्र या विड वीर्य। चूंकि पशु की भी स्वतंत्र आत्मा होती है, अत: निर्वीर्य नहीं हो सकता। अल्पवीर्य कहलाता है। सूर्य-चन्द्र-पृथ्वी जैसे लोकों का आत्मा पूर्ण इन्द्र प्राण से बनता है। अत: इनकी पूर्ण संज्ञा है। पशु आत्मा अपूर्ण होता है। इनको पैदा करने वाले रस को केन्द्र प्राण एक ही दिशा में फेंकता है। अलग-अलग दिशा में अलग पशु पैदा होते हैं। आधे इन्द्र प्राण से उत्पन्न होने वाला पशु अर्धेन्द्र कहलाता है। इसमें जो रस सूर्य मण्डल की ओर फेंका जाता है, उससे आगAेय पुरूष और जो रस चान्द्र की सौम्य दिशा में जाता है, उससे स्त्री शरीर का निर्माण होता है। हर पशु एक भाग में बलवान रहता है। दूसरा भाग निर्बल होता है। वृक्ष ऊपर बढता है, नीचे नहीं। चेतन प्राणियों का शरीर नाभि से ऊपर-नीचे (लम्बा) होता है। दोनों पक्षों में नहीं बढता। स्त्री-पुरूष दोनों भाव ही अर्धेन्द्र होते हैं। अत: इनको पूर्णता की खोज रहती है।

यह भी तथ्य है कि अकेला प्राणी रमण नहीं कर सकता। ब्राह् भी चाह रहा था-एकोहं बहुस्याम। यह विनोद भाव गूढ में भी रहता है और अतिज्ञानी में भी (गूढ रूप से)। सभी पशु जीवात्मा अपूर्ण होते हैं। इच्छा का अभाव पूर्णता है। इसी प्रकार अपूर्ण कोई सृष्टि पैदा नहीं कर सकता। नया आत्मा आकृष्ट पूर्ण से ही होता है। अत: दो मिलकर पूर्ण बनते हैं। तब सृष्टि होती है। जाया प्राप्त करके पूर्ण होने के लिए विवाह किया जाता है। बिना पत्नी के पुरूष यज्ञ का अधिकारी नहीं होता। पूर्ण से सम्बन्ध बनाने के पहले स्वयं को पूर्ण बनना पडता है। यही मूल सिद्धान्त है। यज्ञ का फल भी तभी पूर्ण रूप में प्राप्त होगा। उसका आधे में समावेश नहीं हो सकता। विवाह एक संकल्प होता है। मन को एक निश्चित स्वरूप में मर्यादित करता है। संकल्प के टूट जाने पर व्यक्ति विकल्प तलाश करने लग जाता है।

जो इन्द्र प्राण पशु शरीर में रहता है, उसको “मनु” कहते हैं। सम्पूर्ण जगत का शासक, अणु से भी अणु, कान्तियुक्त, स्वप्न-सुषुप्ति में भी कार्य करने वाला, स्वपA में होने वाले ज्ञान से अनुमान करने योख्य जो प्राण रूप पुरूष है, सब भूतों का जो पर तत्व है, वह मनु है। चार मण्डल, स#लोक और 14 भुवनों के अपने-अपने मनु हैं। मनु और यम को सूर्य पुत्र कहा है। मनु को इस लोक का शासक कहा जाता है। यम को परलोक का। मनु ही अर्धेन्द्र है। “मैं हूं” इस अहं भाव को मनु ही प्रकट करता है। यही हमारा इन्द्र है।

इस पशु रूप मानव जीवन को दो अर्धेन्द्र मिलकर न केवल पूर्णता देते हैं, बल्कि पशु भाव से बाहर निकलने का प्रयास भी करते हैं। दोनों ही पूर्ण होकर पूर्णाकार बन जाते हैं। अकेला तो कभी पूर्णता प्राप्त ही नहीं कर सकता। धर्म, अर्थ, काम के बाद दोनों मोक्षगामी हो जाते हैं।

गुलाब कोठारी

जून 1, 2009

विवाह-5

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भौतिक विकास के साथ-साथ जीवन भी इतना भौतिकता से चिपक गया कि शरीर भी एक उपकरण बनकर रह गया। व्यक्ति जीवन भर इसके सहारे प्रयोग करता रहता है। प्रयोग करने की दृष्टि भी भौतिक बन गई है, बाहरी ज्ञान पर आधारित हो गई। जिस प्रकार शरीर नश्वर है, उसी प्रकार बाहर का ज्ञान भी नश्वर है। पेट भरने से आगे उस ज्ञान की उपादेयता नहीं है। इसीलिए आज ज्ञान पेट भरने का साधन बनकर रह गया। जीवन के साथ इसका दूसरा कोई सम्बन्ध ही नहीं रह गया है।

इसका पहला प्रभाव तो यह हुआ कि व्यक्ति का प्रकृति से सामंजस्य टूट गया। शरीर के भीतर प्रकृति भी कार्य करती है और हम स्वयं प्रकृति द्वारा संचालित है, यह विचार ही जीवन से बाहर हो गया। व्यक्ति स्वयं ही कर्ता और स्वयं का नियन्ता बन गया। उसको न तो शरीर की क्रियाओं की ही जानकारी है, न ही इसके भीतर होने वाली क्रियाओं की। व्यक्ति बाहरी संसार में ही जीता है। जो कुछ उसकी इन्द्रियों की पकड़ में आता है, उतना ही उसका संसार रह गया है। उसके आगे के जीवन क्रम को समझना आज उसकी आवश्यकता ही नहीं रह गई। जो कुछ उसे अच्छा लगता है, करने लग जाता है। हेय और उपादेय का भेद उसके जीवन से सिमट ही गया है। बाहरी ज्ञान की स्थूलता के कारण सूक्ष्म ओझल हो गया है। यही दृष्टि उसके निजी जीवन को प्रभावित करती है।

मेरे देखते-देखते कितने विदेशी मित्रों की शादियां हुई, तलाक हुए, फिर शादियां हुई। आज खुश कोई नहीं है। शादियां भी लम्बे काल तक नहीं टिक पाती। जिनको हम भारतीय लोग संस्कार कहते हैं, वहां नहीं दिखाई पड़ते। जो वहां हो रहा है, वही वहां के संस्कार हैं। जीवन शुद्ध शरीर, धन और अपेक्षाओं पर जुड़ा है। न मिलने में देर, न बिछुड़ने में।

ऎसा ही कुछ नजारा यहां भी समृद्ध परिवारों में देखने को मिलने लगा है। विवाह तो इतनी धूम-धाम से होते हैं कि इससे बड़ा झूठ जीवन में कुछ होता ही नहीं। वर-वधु के मां-बाप भी वैभव की चकाचौंध का ही बखान करते रहते हैं। परम्पराएं इतनी सख्ती से निभाई जाती हैं कि जरा कहीं चूक न हो जाए। स्वयं को तो परम्परा की याद भी नहीं होती। कोई याद दिला जाता है। वर-वधु मात्र यांत्रिक दिखाई पड़ते हैं। उनको कोई आदमी मानकर देखता ही नहीं है। घरवालों का ध्यान तो मेहमानों के साथ फोटो खिंचवाने में लगा रहता है। वर-वधु केवल उठक-बैठक करते हैं। उनको पानी पिलाना भी किसी को याद नहीं होता। मां-बाप का भावनात्मक जुड़ाव भी पश्चिम जैसा ही दिखाई देता है। शादी पैसे के जोर पर होती है। आदमी कहीं नहीं होता। होटल के लोग मांगें पूरी करते रहते हैं। दोनों परिवार के लोग सज-धजकर टहलते रहते हैं। इसी का तो नाम अब विवाह पड़ गया है। उस भीड़ में कौन तो आया, खाया भी कि नहीं खाया, कौन जाने! लिफाफे खोलेंगे, तब ध्यान आएगा।

पूरी की पूरी विवाह पद्धति ही नकली बनकर रह गई। तोरण-तलवार-घोड़ी जीवन में जुड़े ही नहीं, तब विवाह में क्यों चिपके हुए हैं फेरों का अर्थ और कारण किसी को मालूम ही नहीं, तब क्यों खा रहे हैं फेरो का समय पंडित तय करता है। जल्दी कराने के लिए उसे भी रिश्वत दी जा रही है। मंत्रों की भी जरूरत किसी को नहीं लगती। फिर यह दिखावा क्यों मुहूर्त निकल जाने के समय तक तो बारात ही नहीं आती। सारे घर वाले सड़क पर नाचते रहते हैं। लड़की वाले के घर पर नाचे, तब भी समझ में आता है। सज-धजकर सड़क पर और इसी वातावरण में हम वर-वधु का मंगल भविष्य ढ़ूढ़ रहे हैं। अनुष्ठान के जरिए देवता का आशीर्वाद मांग रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि जैसी प्रार्थना होगी, वैसा ही फल मिलेगा।
इस विवाह का वर-वधु के आत्मीय संबंध से कोई लेना-देना ही नहीं है। मां-बाप “कन्यादान” भी कर गए और वहां कन्या की परिभाषा ही लागू नहीं होती। वहां तो एक लड़की है, जैविक लड़की। घर छोड़कर जा रही है, पति के साथ। क्यों जा रही है, किसी ने नहीं बताया उसे। नए जीवन को कैसे परिभाषित करना है और क्यों, नहीं मालूम। संस्कारों का अध्याय तो शायद इसकी मां को भी नहीं मालूम। देखा-देखी का नाम ही संस्कार है।

देखा-देखी ही विवाह का कारण है। दोनों मिलकर गृहस्थी चलाएंगे, कमाएंगे, पेट पालेंगे और बस!
विवाह की तैयारी से ही पता चल जाता है कि हम कहां जा रहे हैं। लड़का कार्यालय में छुट्टी मांगता है -”सर मेरा विवाह है। पांच दिन की छुट्टी चाहिए। कपड़े सिलवाने हैं, सर। आप भी जरूर आइएगा।” उधर लड़की वाले कपड़ों और गहनों में उलझे दिखाई देंगे। उसके यहां ऎसा था, हमारे यहां उससे अच्छा होना चाहिए। सगाई भी विवाह के एक दिन पहले ही कर लेंगे। फेरों से पहले “रिंग सेरेमनी” भी होगी। लड़के की अंगुली की नाप भी चाहिए। लेकिन इस बीच मां को बेटी के साथ बैठकर अपने अनुभव बांटने की आवश्यकता ही नहीं लगती। वह तो पैसा देकर उसी मांग पूरी करके संतुष्ट रहती है।

लड़की को यह तैयारी जरूर करके जाना है कि जरूरत पड़ने पर अपने पांव पर खड़ी रह सके। इसी शक्ति के कारण उसका टकराव का मार्ग खुल गया। समझौता एक सीमा के आगे नहीं होता। दोनों की अपनी-अपनी पहचान भी बनी रहती है। एक तो होते ही नहीं ; केवल साथ रहते हैं। इनको अलग रहने में कितनी देर लगेगी। ससुराल से “लेटकर निकलने वाली” पत्नियां तो इतिहास में ही पढ़ाई जाएंगी। विवाह में 15 पीढियां अब नहीं जुड़ेंगी। केवल एक पीढ़ी में ही आपस में विवाह होंगे और उसी पीढ़ी में पूरे भी होते जाएंगे।

गुलाब कोठारी

जून 8, 2009

संकल्प-1

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न जाने कितने
पर्याय होते हैं
जीवन के,
किन्तु एक पर्याय
होता है
सभी के केन्द्र में,
वह है संकल्प।
संकल्प
स्वीकृति है
कामना की,
दिशा है
भावना की,
सूचना है
क्रिया की
और लक्ष्य है
अनागत का,
अदृश्य का
अनियंत्रित का,
अंधकार में
प्रकाश पाने का,
खोजने को शक्ति
भीतर की,
कृष्ण के अंश की,
प्रस्फुटित करने को
जिसे
अपने संकल्प से।
सहारा है
जीवन का
एक ही,
जो चलता है
साथ उम्रभर,
वही साहस है,
शस्त्र है,
प्रकाश है
पथ का
जीवन यात्रा में।
संकल्प ही
बनाता है शक्तिमान
व्यक्ति को,
बनकर
इसकी शक्ति,
क्षुधा है
संकल्प,
रखने को गतिमान
जीवन चक्र को,
शेष नकली है
सहयात्री
नहीं देते साथ
वक्त आने पर
संकल्प की तरह,
इसी के बूते
काट देता है
पूरी उम्र आदमी।
नहीं होता मन
संकल्पित
आसानी से,
चंचल है
भगाती हैं इन्द्रियां
उसे यहां-वहां,
इधर-उधर
बहाने को
एक प्रवाह में,
भटकता रहता है
आदमी सौ साल,
नहीं मिलता
लक्ष्य कोई।
कौन करता
संकल्पित मन को
बड़ा प्रश्न है
कौन चलाता
जीवन व्यापार
माया
महामाया
यानी प्रकृति,
वही प्रवृत्ति है
निवृत्ति वही है
वही संकल्प है,
करने का भी,
न करने का
चलाती है
शक्तिमान को
भाख्य के द्वारा।
जैसे पत्नी
चलाती है
पति के जीवन को
विवाह के बाद।
वह भी तो
आती है
नए घर में
किसी संकल्प से
कौन आता है
जीने को
उसके साथ
इस घर में
संकल्प,
उसका अपना संकल्प!
वही होता है
आत्म-विश्वास
जीने को
हर हाल में।
चलता भी है
जीवन
समय के साथ,
और बदलता भी
कर्म अनुरूप ,
ज्ञान के द्वारा,
तब जूझता है
विकल्पों से
जीवन भर।
उसका जीवन
संकल्प है बस
वही परिचय
वही स्वरूप
उसका
वही बनाता है
पत्नी, माता
वही मांगता है
संतान
उस प्रभु से
वही मित्र बनकर
सदा साथ देता।
वही तो क्षुधा है
जीवन में नर की
वही शक्ति,
वही लक्ष्मी है
वही तृप्ति है,
तृष्णा वही है
वही तो धुरी है
हर परिजन की,
वही खूंटा है
पति देव का भी
बंधा है जो
स्त्रेह की पकड़ से
जरा सोचो क्या हो
हिले यदि खूंटा,
ढ़ह जाए घर
विकल्पों के मारे
टूट जाएं
जीवन सहारे।
संकल्प ही है
सपनों का जीवन,
उसी में छिपी है
गहनता
प्रेम रस की
वही करता प्रेरित
देने को सब कुछ
न चाहिए उसको
बदले में कुछ भी,
बनाना नहीं है
व्यापारी खुद को।
मनुज रहता
क्षुद्र
जन्म से ही,
आधा-अधूरा
चना-दाल जैसा,
उसे पूर्णता देता
संकल्प नारी का
पत्नी बनकर।
किसने सिखाया
उसको प्रेम करना
किसने जगाया
उसका पौरूष
किसने दिशा दी
जीवन को उसके,
चलाया उसे
नई जीवन ड़गर पर
प्रकाश बनकर
संकल्पित
माया भाव ने,
कर लिया उसको
आवरित चहुं ओर
बन्द कमरे-सा,
ड़ुबा दिया
प्रेम सागर में
उसको
भर गया मन
उसका भी
इसी प्रेम रस से,
जो मिलता नहीं
कभी
किसी विकल्प में।

गुलाब कोठारी

जून 12, 2009

आ-रक्षण

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अरक्षण का अर्थ है चारों ओर से सुरक्षित होना। महिला आरक्षण बिल को लेकर एक वाक् युद्ध सा देश में छिड़ा हुआ है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि आरक्षित वर्ग की सुरक्षा भी हो और देश भी असुरक्षित महसूस नहीं करे। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने पर दोनों बड़े दल तो सहमत हैं, किन्तु कुछ प्रान्तीय दल आलोचना कर रहे हैं। वैसे आरक्षण का मूल प्रस्ताव जब स्वीकृत हुआ, तब कोई आगे नहीं आया। आज मुलायम-लालू यदि कहते हैं कि सीटों का नहीं पार्टी प्रत्याशियों की संख्या का आरक्षण होना चाहिए। बात उचित तो है, किन्तु अन्य पदों के आरक्षण या अन्य सीटों के आरक्षण में यह नीति क्यों नहीं अपनानी चाहिए, इस पर वे मौन हैं।

वास्तविकता यह है कि अन्य नीयत से लागू किया कानून आज देश के विखण्ड़न का हेतु बन गया। क्योंकि इसके कार्यगत स्वरूप को नियंत्रण में नहीं रखा गया। इससे आरक्षण की मूल भावना ही खो गई। लाभ कुछ प्रभावशाली लोगों तक सिमट कर रह गया। अधिकांश वंचित रह गए। एक ही परिवार के एक ही सदस्य को आरक्षण देने की शर्त होती, तब इसका व्यावहारिक स्वरूप दूसरा होता। गुणवत्ता का मापदण्ड़ तो रहा ही नहीं।

आरक्षण की पूरी नीति पर पुनर्विचार होना चाहिए, ताकि इसका लाभ व्यापक समाज तक पहुंच सके और गुणवत्ता भी बनी रहे। इसके लिए जिस प्रकार सीटों या क्षेत्रों को आरक्षित किया गया है, यह तो सामन्ती दृष्टिकोण ही है। लोकतंत्र या जनता की आवाज कहां सुनाई देगी। आज इन सीटों पर जनता मतदान करते हुए भी कुण्ठित है। यह विड़म्बना ही है कि चुनाव आयोग की संहिता में जहां “जाति” शब्द का निषेध है, वहीं आयोग “जाति” आधारित आरक्षण के आधार पर सीटें आरक्षित करता है। आरक्षण का अर्थ होना चाहिए कि प्रत्येक पार्टी अपने प्रत्याशियों की सूची में आरक्षित वर्ग का हिस्सा निश्चित करे और जनता उनमें से अपनी पसन्द का उम्मीदवार चुने। सीटों का आरक्षण तो लोकतंत्र पर कुठाराघात ही है। यही लक्ष्य महिला आरक्षण में भी होना चाहिए। हर पार्टी की सूची में 33 प्रतिशत महिलाएं भी हों, सामान्य और आरक्षित वर्ग की भी हों। शेष जनता पर छोड़ा जाना चाहिए, ताकि हर उम्मीदवार गुणवत्ता के आधार पर ही मैदान में उतरे।

सच तो यह है कि हमारे राजनेता स्वयं संकल्पवान नहीं हैं, अवसरवादी हैं। भीतर से खोखले हैं, अत: जनता का सामना नहीं कर पाते। देश के हित में आवाज उठाने वाले भी नहीं हैं। साठ साल की यात्रा स्वयं इसका उदाहरण है। चुनाव जीतने के बाद सभी दलों के नेता एक-दूसरे की भाषा बोलने लग जाते हैं। तब सुधार कहां से निकलेगा आरक्षण का जहर भी यह देश इसीलिए पी रहा है। प्रतीक्षा है कि कब कोई नेता ऎसा आए, जनता को साथ ले और देशहित में बड़े मुद्दों को हल कर दे।

गुलाब कोठारी

जून 15, 2009

संकल्प-2

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रस तो सदा है
संकल्प रूपी,
नीरस ही होते
विकल्प सारे।
इसी रस से
गढ़ती है
मूरत सजन की
बना देती उसको
छवि प्रियतम की,
देती है आकार
शिला को जैसे
बनकर हथौड़ी
कलाकार जैसी,
तभी निखरता है
रूप उसका,
घर के बाहर
बनती है पहचान,
चलता है
अपनी ड़गर पर
होता है तब
संकल्पित
मन उसका भी।
लुटाने लगता है
वह भी प्रेम
बदले में,
छूटने लगता है
अहंकार
उसका भी
छंट जाते हैं
विकल्पों के बादल,
पाता है
पूर्णता की मधुरता,
स्वपिल जीवन,
एक नई आस
नया क्षितिज
और एक नया
जीवन साथी।
छोड़कर मनमानी,
बहना प्रवाह में
अपनाता मर्यादा
होता है लज्जित
गलत काम करके,
यह लज्जा ही
बनती है
संकल्प घर का,
रोकती है ये
पशुभाव से
अविद्या
के योग से
अधंकार प्रवेश से,
यही तो है
संकल्प पत्नी का,
प्रवेश कर गया
पति-ह्वदय में।
इसी ने रोका
अधोगति को,
गिरने से नीचे,
इसी से बनी
सीढ़ी
उठने को ऊपर,
इसी से उपजा
रति भाव मन में,
इसी ने किया मुक्त
पितृ ऋणों से।
संकल्प बोला
गर्भस्थ शिशु से
आना है तुमको
बनकर एक मानव,
तुम्हे बनना माली
इस परिवार का
करने हैं पूरे
सपने संसार के।
बिना संकल्प
कहां मानव मिलेगा,
किसी एक घर में,
नहीं उतरेगा
कोई देव
इस देह में
बनने को मानव,
जीने उस घर में
सौ साल तक,
वहां तो पशु हैं,
असुर हैं
क्लेश हैं तैयार
आने को
नर शरीर में,
जीने को
स्वच्छन्द रहकर।
उन्हें रोकता यह
संकल्प पत्नी का,
बना देती
उसको मानव
जन्म से पहले,
जन्म बाद में
करती है
दीक्षित उसे
परम्पराओं में
विरासत में,
देखती रहती है
पहचान अपनी
उसके भविष्य में,
बनाती उसे
प्रतिबिम्ब अपना,
रखने को सदा
गर्व से सिर ऊंचा।
सोचो, क्या हो
यदि टूट जाए
यह संकल्प
जीवन का,
कौन-सा संकल्प
बड़ा होगा इससे
क्या होगी दशा
उस मन की
जो दौड़ता है
विकल्पों के पीछे,
कौन-सा संकल्प
बच पाएगा
उसके मन में,
कैसे बनेगा
मन पटु उसका,
बहता रहेगा
एक प्रवाह बनकर,
हवा के संग-संग
किसके सहारे
टिकेगा भवन
यदि कमजोर होगी
नींव संकल्प की,
खण्ड़हर ही होगा
बस जीवन सारा,
कैसे लौट पाएगा
कोई “अपने घर को”
जहां से चला था
84 लाख चक्कर
पशु भाव से
आता है जीव
मानव बनकर
जीकर मर्यादा में
और छोड़कर
सारी मर्यादाएं
बन जाता है
फिर से पशु,
शुरू होगा क्रम
आने-जाने का
फिर से।
कैसे जी गए
पहले के लोग
इस संकल्प से
न शिक्षा थी
न चकाचौंध ऎसी,
शरीर था ऎसा ही,
क्या बदला फिर
जमाने में ऎसा,
व्यक्ति भूल बैठा
सार इस जन्म का,
अटका ही रहा
अर्थ में
देह की खातिर
नश्वर हैं दोनों
कहां चेतना है,
तभी तो पशु है
नया आदमी
सुप्त चेतना लिए
चल रहा नींद में
पता नहीं कहां।
जागरण के लिए
चाहिए नया
संकल्प मन का,
छिपा है यह तो
शक्ति बनकर
भीतर सबके,
माया है यही तो,
त्रिगुण बनी है,
तोड़ना है बन्धन
इसी के जगत में,
जीवन के सुख-दुख
इसी के बनाए,
पिछले जन्म का भी
लेखा दिखाए,
संकल्प जोड़े,
संकल्प तोड़े,
संकल्प सहजता,
प्रखरता,
विश्वास बनता
यही स्वयं पर,
तभी करता है
शासन जगत पर,
क्यों दोष देना
कभी भी किसी को
यदि न हो
संकल्प,
विश्वास खुद पर
वही दिखता है
दूसरे मुख पर
प्रतिबिम्ब पर,
लौटते हैं
स्पन्दन हमारे ही
व्यवहार बनकर
पास अपने।
संकल्प करता है
शिकार किसी का,
यही कराता है
समर्पण भी जग में,
यही एक बूता है
जीवन में सबको
जिसके सहारे
जीता है मानव
पकड़कर इसे ही
जीवन के पथ पर।
बिना संकल्प
कैसे निभेगा रिश्ता
कैसे बंधेगा
कोई किसी से
दोनों ही मुक्त
एक-दूसरे से,
दृष्टि बस तन तक,
अर्थ पर हो
बुद्धि,
छलांगें लगाए
मन-उपवन में,
तृष्णा ही तृष्णा
ईष्र्या ही ईष्र्या,
नशा ही नशा
गफलत ही गफलत,
कहां आश्रम
कोई जीवन में
ठहरे,
कहां धर्म की
कोई पहचान होती,
आसक्ति छाए
चारों दिशा में
परिग्रह बनकर
पशुभाव घेरे
चारों तरफ बस
अंधेरे-अंधेरे,
ना कोई बचता
मातृत्व मन में
ना कोई रहता
मानव इस तन में।
छूट जाते सारे
यश-कीर्ति भी,
भाव सारे ही
लोक हित के।

गुलाब कोठारी

देशहित में

लोकतंत्र की दो बड़ी पार्टियों में से यदि एक छिन्न-भिन्न हो जाती है, जैसा कि स्पष्ट दिखाई दे रहा है, तब देश में लोकतंत्र की सुगंध फीकी पड़ जाएगी। देश का हित दोनों दलों के सक्षम और सशक्त रहने में ही है। लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत तो चलती रहती है। वर्ष 1977 में कांग्रेस हारी है तो वर्ष 1984 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को महज दो सीटें मिलीं। लेकिन कोई भी पार्टी खत्म नहीं हुई। नेतृत्व खत्म नहीं हुआ। लेकिन आज स्थितियां चिन्ताजनक हैं। देशभर का मीडिया एक स्वर में उनमें से एक के विखण्ड़न का चित्रण कर रहा है। पार्टी में नीचे का कार्यकर्ता मूकदर्शक है और राष्ट्रीय पदाधिकारी ही कूद-फांद कर रहे हैं। जबकि पार्टी उनकी विरासत तो नहीं है।

देशवासियों के सामने आज महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि भाजपा नहीं तो कौन लेकिन कौन के जवाब में कोई नहीं दिखाई दे रहा। कहने को भाकपा, माकपा, राकांपा, बसपा कई राष्ट्रीय पार्टियां हैं, लेकिन सब क्षेत्रीय पार्टियों जैसी। किसी पर भी देश चलाने का भरोसा नहीं कर सकते।

जब अटलजी प्रधानमंत्री थे, तब मैंने विभिन्न यात्राओं के दौरान देश और पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल उठाए थे। उन लोगों के नाम भी लिए जो पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं, ड़ुबोने का कार्य कर रहे हैं। बेलगाम तो बोल ही रहे थे। वे इतना ही कहकर रह जाते कि देश का दुर्भाग्य है। आज सारे ही नाम पटल पर हैं और पूरा देश इन्हें टकटकी बांधे देख रहा है। नीचे कार्यकर्ता लज्जित भी महसूस कर रहा है। मोहन भागवत इस दर्द को समझ तो रहे हैं, किन्तु संघ को अचानक राजनीति से बाहर निकालने में हिचक रहे हैं। न वे यह कह पाते कि भविष्य में संघ भी राजनीति में रहेगा। अच्छा तो ये हो कि संघ अपनी सन् 1965 की भूमिका पर लौट आए और देश का गौरव बढ़ाए। भाजपा के अधिकांश राष्ट्रीय पदाधिकारी संघ की पृष्ठभूमि के हैं।

इतना ही नहीं, पिछले कुछ वर्षो में भाजपा के सहयोगी दल विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, शिव सेना आदि का भी जो व्यवहार देश के समक्ष दिखाई दिया, उसे भी गरिमापूर्ण नहीं कहा जा सकता। उसमें भी अधिकांशत: धर्म के नाम पर ही किया गया। बड़े नेताओं के अहंकार की चर्चाएं मीडिया में भरी पड़ी हैं। चुनाव में जनता द्वारा नकारे जाने पर भी इनकी हैंकड़ी कम नहीं हुई। देश को किसी दल की चिन्ता नहीं होती, यदि नकारा है तो। चिन्ता तो लोकतंत्र और देश की है। ऎसा भी नहीं कि कांग्रेस इन झगड़ों से बची हुई है। किन्तु वहां एक ड़ोर से बंधे हैं।

आज कांग्रेस की सरकार केन्द्र में है। उसे भी दो दलों पर आधारित लोकतंत्र के बारे में चिन्तन करना चाहिए। प्रादेशिक पार्टियों को प्रदेश तक ही सीमित करना उचित है। नए सिरे से चुनाव आयोग को निर्देश दिए जाएं। चुनाव में जातिगत विष प्रभावी न रहे और आरक्षण भी बना रहे, इस पर निर्णय करना भी आज की महती आवश्यकता है। देश खण्डित होने से बच जाएगा।

देश के आगे हर व्यक्ति गौण हो जाना चाहिए। यशवन्त सिन्हा के बाद उन अन्य नेताओं को भी पदों से इस्तीफे दे देने चाहिए, जिन पर सार्वजनिक रूप से अंगुलियां उठ रही हैं। आज की स्थिति में बाहर बैठकर भी उन्हें पार्टी के लिए सकारात्मक कार्य में सहयोग देना चाहिए। आखिर उनका भी वर्षो का दुख-सुख का साथ रहा है। आशा करनी चाहिए कि पार्टी और संघ मिलकर शीघ्र ही स्थिति में सुधार लाएंगे। नहीं तो लोकतंत्र अपनी करवट स्वयं बदलेगा।

गुलाब कोठारी

जून 22, 2009

राधा

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राधा-कृष्ण, प्रकाश और अधंकार इस सृष्टि के मूल तत्व हैं। दोनों ही देने वाले हैं। राधा की “राध साध सन्सिद्धौं से देने वाला तत्व है। सूर्य की रश्मियों को ही राधा नाम से जाना जाता है। स्वयं सूर्य कृष्ण है, काला है। इसका उदाहरण सूर्य मंत्र है, जिसकी शुरूआत में ही इसको कृष्ण संज्ञा दी गई है।

आकृष्णेन रजसा वर्तमानो
निवेशयन्नमृतं मत्र्यच
हिरण्ययेन सविता रथेना
देवो याति भुवनानि पश्यन्।

राधा देती भी है, लेती भी है। सूर्य से हमें आयु प्राप्त होती है और किरणें एक-एक दिन करके हमारी आयु को ले जाती हैं। वर्षा से हमको जल प्राप्त होता है। सूर्य किरणें उसे फिर से उठा ले जाती हैं। सम्पूर्ण आकाश पर राधा का अधिकार स्पष्ट दिखाई पड़ता है। आकाश की तन्मात्रा नाद है। आकाश ही कृष्ण की बंशी है। नाद से ही आगे की सृष्टि होती है। नाद से ही प्रकाश उत्पन्न होता है। रंग पैदा होते हैं। ये सभी ध्वनि तंरगों पर आधारित रहते हैं। ध्वनि के सात सुर ही इन्द्र धनुष के सात रंग बनते हैं। इन्हीं प्रकम्पनों या स्पन्दनों से प्राणियों का सप्त धातु युक्त शरीर बनता है।

सूर्य एवं रश्मियों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। राधा के ह्वदय में तो कृष्ण रहते हैं। कृष्ण तक पहुंचने का माध्यम भी राधा ही है। अन्य कोई माध्यम हो ही नहीं सकता। राधा से ही सृष्टि का संचालन होता है। औषधि वनस्पति, अन्न पैदा होता है। अन्न ही शरीर में जाकर शुक्र-रज का निर्माण करता है और सृष्टि विकास का निमित्त बनता है।

राधा ही ज्ञान रूपी प्रकाश भी है। यही अज्ञान को जलाती है। आत्मा को प्रकाशित करने वाली है। व्यक्ति को अपने आत्मा के पास पहुंचाती है। राधा का विपरीत शब्द है-धारा। प्रवाह की निरन्तरता को धारा को कहा जाता है। धारा का कार्य है- विषय को व्यक्ति से दूर-दूर ले जाना। जिस प्रकार गंगा की धारा पानी को गंगोत्री से ले जाकर समुद्र में छोड़ देती है। हमारा जीवन भी एक धारा की तरह चलता रहता है। कभी लौटता नहीं है-धारा की तरह। जो पानी एक घाट से निकल गया, वापिस उस घाट पर नहीं आता। इसीलिए शास्त्र कहते हैं कि प्रवाह में नहीं जीना है। व्यक्ति प्रवाह पतित हो जाता है। अपना नियंत्रण भूल जाता है। यह भी निश्चित है कि धारा का सहज रूप नीचे की ओर बहना होता है। नीचे गिरने को ही नरक कहते हैं। धारा का रूख आसानी से ऊपर नहीं मुड़ता। वहां तो राधा ही उसे उठाकर ऊपर ले जा सकती है। बातचीत में एक बार स्वामी गुर्वानन्द जी ने कहा था कि “राधा” शब्द अत्यन्त शक्तिशाली मंत्र रूप है। किसी को नींद नहीं आ रही हो, उसे राधा-राधा बोलना शुरू कर देना चाहिए। सात मिनट में उसे हर हाल में नींद आ जाएगी। दवाई तो लेनी ही नहीं पड़ेगी।

राधा ही कृष्ण की शक्ति है। कृष्ण की शक्तियों का परिचय भी राधा से ही मिलता है। जिन गौओं को कृष्ण चराते हैं वे भी तो सूर्य रश्मियों के माध्यम से ही पृथ्वी पर आ रही हैं। सूर्य से हमको ज्योति-आयु और गौ (विद्युत शक्ति) प्राप्त होती है। इसी विद्युत शक्ति के सहारे हमारी चेतना का विकास होता है। मूल में यह परमेष्ठी मण्डल में सविता के नाम से जानी जाती है। सविता के लिए लिखा है-सविता वै अस्माकम् प्रसविता। हमको,सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाली है। यही विद्युत सूर्य किरणों के द्वारा सम्पूर्ण चराचर में व्याप्त रहती है। सूर्य का आधार ऊपर के सोम लोक-परमेष्ठी का सोम है। यह भी सूर्य किरणों के द्वारा ही सूर्य तक पहुंचता है। इसी से सूर्य की ज्योति और ताप बना रहता है। यह सोम ही सूर्य किरणों में मरीचि रूप झिलमिल की तरह दिखाई पड़ता है।

राधा ही गायत्री रूप दिखाई पड़ती है। ब्राह् मूहुर्त में इसी गायत्री के पांच मुख (रंग) हमें दिखाई पड़ते हैं। शेष अहोरात्र में यह रंग दिखाई नहीं पड़ते। अत: इस काल में स्वाध्याय करना विशेष महत्व रखता है। इसको संध्या काल भी कहा जाता है। इस काल के लिए तो कहा गया है कि व्यक्ति चाहे तो अपने भविष्य का निर्माण इस काल में कर सकता है। अपना भविष्य बदल सकता है। अन्य संध्याओं में यह शक्ति नहीं है। गायत्री ही सूर्योदय के बाद सावित्री कहलाने लगती है। महर्षि अरविन्द ने सावित्री तत्व पर अच्छा शोध किया है।
अंधकार में भी कुछ प्रकाश अवश्य रहता है। यह परावर्तित प्रकाश होता है। प्रकाश और अंधकार को भी अलग नहीं कर सकते। राधा-कृष्ण जो ठहरे। श्रद्धेय बाबूसा. ने सात सैंकड़ा में लिखा है-

जो दीखे सो राधिका, न दीखे वो कृष्ण
कृष्ण-शुक्ल दोनों खड़े, बड़ो विकट छे प्रश्न ।

हमारे शरीर में पांच स्थूल प्राण होते हैं-प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। इनमें से तीन- प्राण-अपान-व्यान मुख्य होते हैं। ये तीनों हमारा ह्वदय बनाते हैं। प्राण यानी “द”, अपान ह्व और व्यान को यम् कहा है। अपान आहरण शक्ति देता है। केन्द्र की ओर अन्न लाता है। प्राण बचे हुए को, उच्छिष्ट को बाहर फेंकता है। व्यान केन्द्र में रहकर नियंत्रण करता है। जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों को नियंत्रित करता है। व्यान रूप में हमारे शरीर का ह्वदय रूप नियंता बनता है। प्रतिष्ठा बनता है। सौर रश्मियों का प्राणन-अपानन (आना-जाना) सूर्य के द्वारा नियंत्रित रहता है। प्रत्येक रश्मि पीछे हटती हुई आगे बढ़ती है। हमारे श्वास की तरह जान पड़ती है। इस आगे पीछे होने की क्रिया को सर्पण प्रक्रिया कहते हैं। धूप और छाया के बीच एक रेखा खींच दें तो दिखाई देगा कि प्रकाश पीछे हटते हुए आगे बढ़ता है। यही प्राणन-अपानन क्रिया हमारे स्थूल शरीर में भी कार्य करती है। प्रकाश और अधंकार के बीच इसी को राधा-कृष्ण का रास कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होती। प्राणायाम का लक्ष्य भी प्राणन-अपानन प्रक्रिया के माध्यम से, श्वास-प्रश्वास पर ध्यान केन्द्रित करते हुए व्यक्ति को आत्मा से एकाकार करना है।

गुलाब कोठारी

जून 26, 2009

बेडियां

बहुत अच्छा
लग रहा था
वह
पहली ही मुलाकात में,
चंचल मन
चाह रहा था
लपकना
बाद में भी
किए थे प्रयास
मैंने ही
उसे रिझाने के
अपनी अदाओं से
अपने श्रृंगार से
हंसी-गाथाओं से
सिनेमा की तरह
अभिनेत्री बनकर।
प्रशंसा करती थी
उसकी, मुक्त-कंठ से
मानती थी
उसकी हर बात
पी लेती थी
एक-दो घूंट भी
उसके साथ।
मम्मी कहती थी
बदल रही हूं मैं
शायद कोई
मिल गया मुझको
टालती रही
हर जवाब को
जैसे कुछ हुआ न हो।
अनायास
एक दिन
आया वो
नशे में धुत
बांह से खींचा
कमरे की ओर
मैं चीखी
किंतु भीतर
एक द्वंद्व भी था
चाहती भी रही हूं
इसी कमबख्त को
इतने काल से,
प्रतीक्षा रही थी
इसी दिन की भी
ताकि बन सकूं
मां
उसके बच्चे की,
किंतु सोचा ना था
ऎसा भी आएगा
मनहूस दिन,
लड़ना भी चाहा
हाथ उठे नहीं
भवानी की तरह
रोक पाने को
उसकी बढ़त
आधी हां, आधी ना,
में ही फंसी
चीखने का प्रयास
काम नहीं आया
और कुछ करती
इसके पहले ही
किसी ने बंद किया
मेरा मुंह
और कर दिया
उसे काला।
आज मैं
सिहर जाती हूं
आदमी के नाम से,
सिनेमा की तरह
घूम जाती है
सारी घटना
मेरी आंखों के आगे
देखती हूं
सूनी आंखें
मां के चेहरे पर
रोती हूं
अपने इस
औरत होने पर।
बच सकती थी
शायद
यदि रहती
मर्यादा में
बताती रहती
मां को भी
हर दिन की दास्तान।
नहीं रहती
इतनी स्वच्छंद
लड़कों की तरह
प्रवाह में पड़कर
नहीं सौंपती
अपनी धरोहर
किसी निर्लज्ज को
रोक सकती यदि
अपने इशारे
नादानी के
उसे रिझाने के,
नहीं करती
दुरूपयोग
स्वतंत्रता का।
इतनी बड़ी सजा
कैसे कटेगी
पूरी उम्रभर
क्या होगा
कोसते रहने से
आदमी को,
जीना भी पड़ेगा
उसी के साथ
बच नहीं पाऊंगी
संभव नहीं लौटाना
जो सब चला गया
नहीं बन पाऊंगी
अल्हड़,
पहले जैसी
स्वच्छंदता ही
बन गई हैं
बेडियां मेरी
मुक्ति की तलाश में।

गुलाब कोठारी

जून 29, 2009

शिक्षा

एक समय था जब शिक्षा के लिए देश भर में गुरूकुल व्यवस्था थी। इस व्यवस्था में बच्चों को गुरू के पास ही रहना पड़ता था। गुरू हर शिष्य का परीक्षण करके उसके ज्ञान का आकलन करता था। उसके भावी जीवन पर दृष्टि डालकर उसे तैयार करता था। वही धर्म की शिक्षा भी देता था, वही लोक व्यवहार और प्रकृति के स्वरूप की शिक्षा भी देता था। जैसे-जैसे शिष्य तैयार होता जाता था, गुरू का गर्व भी बढ़ता जाता था। शिष्य में वह अपना प्रतिबिम्ब देखता रहता था। अपना सारा ज्ञान शिष्य को समर्पित कर देता था। एक पूर्ण मानव का निर्माण करके माता-पिता को सौंप देता था।

मानव तो आज भी वही है। केवल बाहरी परिवेश बदलता है। बदलता ही रहा है। इसका प्रभाव भी बाहरी जीवन पर अधिक होता है। चकाचौंध भी हर काल में रही है और सृष्टि का माया भाव भी। शिक्षा देने का कारण भी यही है। ज्ञान के द्वारा व्यक्ति शाश्वत और नश्वर का भेद समझ सके। बाहरी संसार की सीमा को ध्यान में रखकर उसका उपयोग कर सके। नश्वर के पीछे छिपे हुए शाश्वत को पकड़ सके। जीवन भ्रमित न हो पाए। जीवन का लक्ष्य हाथ से छूट न पाए। ईश्वर में पूर्ण आस्था रखते हुए सुख-दु:ख में तटस्थ रह सके। तभी उसे आसक्ति का अर्थ और प्रभाव भी समझ में आ सकेगा। राग-द्वेष पर नियंत्रण करके शान्त हो सकेगा।

आज का मानव अशान्त है, क्लान्त है। अपने ज्ञान के सहारे वह शाश्वत और नश्वर का भेद नहीं कर पा रहा। पुरूष और प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहा। शरीर को स्वयं से अलग करके देख ही नहीं पा रहा। कोई शरीर के आधार पर ही जी रहा है। कोई बुद्धि के आगे कुछ स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। कोई-कोई तो बस मनमानी ही करता रहता है। खेद की बात है कि जो जिस धरातल पर जी रहा है, उस धरातल को भी अच्छी तरह नहीं जानता। शरीर में जीने वाले को पता नहीं शरीर का स्वरूप क्या है। कैसे कार्य करता है। प्रकृति किस प्रकार शरीर को चला रही है। व्यक्ति का योगदान क्या है। शरीर के भीतर रहने वाली अदृश्य शक्तियां-मन-बुद्धि-आत्मा, कैसे इस शरीर को चलाती हैं। शरीर को जड़ क्यों कहते हैं। शरीर का उपयोग कैसे-कैसे हो सकता है। शरीर की भाषा क्या है। इस भाषा को कैसे सीखा जा सकता है। भीतर की शक्तियां कैसे अभिव्यक्त होती हैं, इस शरीर में। आधि-व्याधि का शरीर के साथ क्या सम्बन्ध है। समाधि क्या है। प्राण क्या हैं। मन क्या है। इन्द्रियों का संचालन कैसे होता है। कामनाएं कैसे पैदा होती हैं। आत्मा क्या है। कैसे और किस रूप में रहता है इस शरीर में। कैसे काम लेता है, इस शरीर से। कैसे आता है और शरीर के जाते ही चला जाता है। ऎसे अनेक प्रश्नो का उत्तर जीवन खोजता भी रहता है। इसके बिना जीवन को समग्रता के साथ नहीं जी सकते। सार्थक नहीं बना सकते। गुरूकुल शिक्षा इसी जीवन-स्वरूप पर आधारित थी। हर व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप भिन्न होती थी। आज स्कूलों से बच्चे एक कारखाने के उत्पाद की तरह पढ़कर बाहर निकलते हैं। एक-सी यांत्रिक शिक्षा ग्रहण करके नौकरी पाने को एक-दूसरे से होड़ करते रहते हैं। नौकरी के अतिरिक्त इस शिक्षा की उपयोगिता नहीं है। शिक्षा में न तो प्रकृति का वर्ण भेद आधार है, न ही व्यक्ति के संस्कार और पारिवारिक परिवेश। एक व्यापारी/ उद्योगपति के बच्चे को भी नौकरी मांगने वाली शिक्षा ही दी जाती है। किसी को पेट भरना सिखाने के लिए जीवन का कितना बड़ा भाग व्यर्थ जा रहा है। रेल के डिब्बों की तरह सारे बच्चे एक जैसे तैयार हो रहे हैं। सचाई यह है कि सबको ही अपना-अपना जीवन अलग तरह से जीना है।

इसका मुख्य कारण है कि शिक्षा में मानवता का अभाव। व्यक्ति से जुड़े जीवन के विषय चर्चा में भी नहीं आते। केवल बाहरी जीवन के विषय पढ़ाए जाते हैं। जीवन जीने में इनका कहीं कोई उपयोग ही नहीं होता। फिर शिक्षा जीवन से कहां और कैसे जुड़ी है ऎसी शिक्षा की क्या अनिवार्यता है अक्षर ज्ञान तो भाषा सीखने के लिए दिया जाता है। भाषा ज्ञान ग्रहण करने का माध्यम है। स्वयं ज्ञान नहीं है। ज्ञान का शिक्षा में कोई स्थान ही नहीं है। अत: मुमुक्षु के लिए साक्षरता की अनिवार्यता समझ में आती है। शिक्षा की अनिवार्यता समझ में नहीं आती। हमारे ग्रामीण समुदाय की विडम्बना यही है कि अनिवार्य शिक्षा के नाम पर उनके बच्चों को स्कूल ले जाया जाता है। आठवीं-दसवीं के आगे पढ़ नहीं पाते। नौकरी उनको मिलेगी भी कहां से! वे लौटकर पैतृक काम को भी करने के लिए तैयार नहीं होते। उन्हें तो बस नौकरी चाहिए। इसका असर यह हुआ कि हमारी सारी ग्रामीण सेवाएं एक-एक करके ठप्प होती जा रही है । खाती, कुम्हार, माली, धोबी, आदि सभी आवश्यक सुविधाएं लुप्त हो रही हैं। इन बच्चों को यदि काम पर रहते भाषा ज्ञान कराया जाता तो पन्द्रह वर्ष की आयु तक सभी बच्चे अपना-अपना पैतृक कारोबार भी संभाल सकते थे। नौकरी से अच्छी आय भी कर सकते थे। स्वतंत्र जीवन भी जी सकते थे। हमारी विकृत मानसिकता ने पूरे समाज के आर्थिक ढांचे को ही तहस-नहस कर दिया। जिस गति से स्कूलें खोली जा रही हैं, उस गति से अच्छे शिक्षक भी तैयार नहीं हो सकते। स्कूलों के नाम पर कारखाने खड़े किए जा रहे हैं।

उच्च शिक्षा की स्थिति तो और भी दयनीय है। इसमें मानवीय अपूर्णता का ही प्रमाण-पत्र दिया जाता है। अदृश्य रूप से डिग्री पर पढ़ा जा सकता है कि इस डिग्री का धारक एक अपूर्ण मानव है। इसका व्यक्तित्व अपूर्ण है। जीवन-ज्ञान से तो यह शून्य ही है। भाग्य से यदि अच्छी नौकरी मिल जाए तो अपना और परिवार का पेट भर सकता है। सुखी तो रहेगा ही नहीं। क्योंकि जो कुछ भी इसे पढ़ाया गया है, वह इसकी संस्कृति और इसके संस्कारों से मेल नहीं खाता। नकल और स्पर्द्धा पर आधारित जीवन शैली इसे सिखाई गई है। जीवन निजी धरोहर है। स्पर्द्धा नहीं है। खुद को बड़ा करने के लिए जीना होता है। अद्वितीय है, तब दूसरों जैसा क्यों बनें

गुलाब कोठारी

जुलाई 1, 2009

छटपटाहट

फूटती है जब
दबी हुई
प्रतिक्रिया
विस्फोट होता है
जीवन में
बंधक बनी
नारी
छटपटाने लगी
स्वतंत्र होने को
इस संघर्ष में
लड़ते-लड़ते
हो गई
आक्रामक अनायास,
झपट पड़ती है
अवसर मिलते ही
आदमी पर
लहूलुहान हो जाता है
आदमी
उसे नहीं आता
पलटवार
नई सदी की नार
आदमी को ठोकर मार
चल पड़ती है
अगले मुकाम को।
यहीं से हो जाता है
शुरू तांडव
उसके जीवन में
शिवजी की तरह
नाप लेती है
धरती
लक्ष्यहीन बनकर
प्यासी, अतृप्त सी,
सारी मृदुला
पथरा जाती है
सपने बुन नहीं पाती
किसी एक के सहारे
मृगतृष्णा
मिट नहीं पाती
बंद हो जाते हैं
ह्वदय कपाट
बंद हो जाता है
क्रंदन
भीतर ही।
क्या कहे
किससे कहे
लगाकर मुखौटा
तलाशती रहती है
उन आंखों को
जो
झांक सके भीतर
उसके मन तक
दुलार सके
उसकी भूलों को
बांट सके
दर्द उसका
कर सके हल्का
उसके जी को
वरना
यह प्यास
भटकाएगी उसे
फिर से
जनम-जनम।

गुलाब कोठारी

जुलाई 4, 2009

कसो कमर

आज से मध्य प्रदेश के विधायकों का प्रशिक्षण शुरू हो रहा है। राजस्थान के विधायकों का ऎसा ही प्रशिक्षण शिविर विधानसभा के बजट सत्र के बाद होगा। उन्हें अपने काम-काज में दीक्षित किया जाएगा। दोनों ही जगह नई सरकार के 6 महीने तो चुनावों में ही गुजर गए। नई सरकार के विजय के जश्न भी हो चुके। मध्य प्रदेश में तो पहले भी सरकार भाजपा की ही थी, लेकिन राजस्थान में पिछली सरकार के कर्मो का फल इनके हिस्से में आया है। इसका अर्थ है कि हमें इतिहास से सीख लेनी चाहिए। ठोसकाम करने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। एक संकल्प यह भी होना चाहिए कि प्रतिनिधि आप किसी भी दल के हों, कार्य प्रदेश के लिए करना है। ये संकल्प मध्य प्रदेश, राजस्थान ही नहीं हर राज्य के विधायकों को लेने चाहिएं।
पिछले दशकों का इतिहास गवाह है कि सबसे अधिक गिरावट जन प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत आचरण और उसकेकारण सदन की गरिमा बनाए रखने में आई। अच्छा हो इस बात को प्रशिक्षण का पहला अध्याय बनाया जाए। व्यक्ति अच्छा है, तब उसके हाथ से गलत कार्य कभी हो ही नहीं सकता।
पिछली विधानसभा में भी अनेक विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। सदन में अनुशासनहीनता के दृश्य देखकर विधायकों को शर्म आना बन्द सा हो गया। मुद्दों के बजाए विरोधी दलों पर छींटाकशी आधुनिक संसदीय सभ्यता की शैली बनती जा रही है। जब विधायक मुद्दों पर तैयारी करकेनहीं आएंगे, देर रात तक अन्यत्र व्यस्त रहेंगे, तब सदन में और क्या कर सकते हैं
अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वे किसी भी दल से चुनकर आए हों, सदन का लक्ष्य एकही होना चाहिए- प्रदेश का हित। इसमें किसी तरह की जाति, धर्म, क्षेत्र अथवा राजनीति को जगह नहीं मिलनी चाहिए। इसके बिना किसी जन प्रतिनिधि की दृष्टि का विकास नहीं हो सकता। तब भावी नेतृत्व का विकास कैसे सम्भव हो सकेगा विधायकों को देश के चुने हुए विशेषज्ञों जैसे सोमनाथ चटर्जी के साथ संवाद कराया जाए। राजनीति को व्यवसाय बनाकर नेतृत्व के सपने नहीं देखे जा सकते। न ही इसके अभाव में विधायिका का सशक्तिकरण हो पाएगा। विधायक झोला लेकर अधिकारियों के पीछे घूमते रह जाएंगे। जनता अब आकलन के आधार पर ही किसी जन प्रतिनिधि को दोबारा अवसर देगी। अगला चुनाव नई पीढ़ी तय करेगी।
विधायक का अपना सचिवालय भी होना चाहिए और उसके कार्यो का नियोजन भी। तबादले कराना पिछली सदी का काम था, आज का नहीं है। अब तो उसे विकास के मुद्दों को समझना है। लोगों से जुडकर रहना है। उनके मूल अधिकारों की रक्षा के लिए कमर कसनी है। धर्म, जाति, वंश और क्षेत्र से ऊपर उठकर। यदि हर विधायकअपने-अपने क्षेत्र पर भी पूरी पकड़ कर लेता है, तो कागजों में होने वाले विकास पर अंकुश लगाया जा सकता है। बशर्ते कि स्वयं विधायक अपने कार्यो में पारदर्शिता बरते। उसका दृष्टिकोण भी व्यापक हो और स्वयं सदा सक्रिय बना रहे। स्थानीय मुद्दों पर सार्वजनिक बहस को बढ़ावा दे सके तो सोने में सुहागा। इससे स्थानीय परिस्थितियां, सम्भावनाएं और विकास के मुद्दे स्पष्ट हो सकेंगे। परम्पराओं और सांस्कृतिक वातावरण का संरक्षण हो सकेगा। यह निरन्तर संवाद ही आधुनिक विकास के मार्ग प्रशस्त करेगा और लोकतांत्रिक समाज के निर्माण का नया इतिहास रच जाएगा।
गुलाब कोठारी

जुलाई 11, 2009

संगीत

हमारी सृष्टि आकाश से होती है। आकाश की तन्मात्रा नाद है। अत: सम्पूर्ण सृष्टि का विकास ही नाद से होता है। नाद से ही ध्वनि बनती है। ध्वनि तरंगों की लयबद्धता को ही संगीत कहते हैं। ध्वनि के क्रम विशेष को (लय को) स्पन्दनों के द्वारा ही अनुभव किया जाता है। सभी प्रकार की ध्वनियां स्पन्दन से ही प्रभाव डालती हैं, अत: संगीत का प्रभाव भी स्पन्दन रूप ही होता है।
ध्वनि, नाद, शब्द, स्वर आदि वाक् कहलाते हैं। सरस्वती को वाग्देवी के नाम से जाना जाता है। लक्ष्मी अर्थवाक् की देवी है। दोनों ही प्रकार की वाक् नाद से ही उत्पन्न होती हैं। हमारा शरीर भी नाद के स्पन्दनों से ही बनता है। शरीर, इन्द्रियां, बुद्धि, मन, आत्मा आदि सभी के मध्य ये ध्वनि स्पन्दन सेतु का कार्य करते हैं। अत: संगीत और हमारे अध्यात्म का सीधा संबंध है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में संगीत को उपासना और भक्ति का अभिन्न अंग माना गया है।
ध्वनि, गति, दिशा आदि को प्राकृतिक क्रम में लयबद्ध करके भारतीय संगीत का यह विकास देखा जाता है। संगीत श्रम भी है, शिल्प भी है और कला भी। खड़े होकर जब कोई बच्चा गाने लगता है, तब उसे श्रम कहा जाता है। उसे तो बस आज्ञा का पालन करने के लिए गाना है। जब संगीत का गठन किया जाए, सुर-ताल-लय में स्वरूप दिया जाए, तब यह शिल्प रूप होता है। लेकिन संगीत को जब मनोभावों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में काम लिया जाए, तब संगीत कला बन जाता है। कला रूप होने के बाद ही संगीत श्रोता के मन को छू सकता है। प्रभावित कर सकता है। तब गायक और श्रोता एकाकार हो जाते हैं। शरीर और बुद्धि शिथिल हो जाते हैं, मन खो जाता है। व्यक्ति कुछ समय के लिए आत्मस्थ हो जाता है। इसी का नाम भक्ति संगीत है। भारतीय संगीत में एकल गायन की परम्परा भक्ति संगीत की देन है। इसमें ऊर्जा है, उष्मा है, प्रकाश है। चेतना जागरण का मार्ग प्रशस्त होता है।
भारतीय संगीत सत्वगुण प्रधान है। रजो गुण इसको गति देता है। इससे ही प्राणों में स्पन्दन उठता है। आकाश का नाद संगीत में बदल जाता है। इसी आधार पर हमारी मंत्र जप की परम्परा चलती है। व्यक्ति वाचिक जप से शुरू होता है, उपांशु से होते हुए मानस जप में उतरता है। इसमें आकाश और ध्वनि घटते जाते हैं। आगे चलकर आकाश लुप्त हो जाता है और व्यक्ति बिंदु भाव में प्रवेश कर जाता है।
भारतीय संगीत में ध्वनि की निरन्तरता रहती है। इसी से मन तक पहुंचता है। आज के पाश्चात्य संगीत में निरन्तरता नहीं है। अत: वह शरीर और बुद्धि के आगे प्रभावित नहीं करता। समझने की बात यह है कि हमारा शरीर ध्वनि से बनता है। गर्भावस्था में शिशु ध्वनि के माध्यम से ही ज्ञान प्राप्त करता है। अभिमन्यु का उदाहरण हमारे सामने है। हमारे शरीर में जो ऊर्जा केन्द्र हैं, जिन्हें हम चक्र कहते हैं, वे भी स्पन्दन रूप में ही आकाश से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। इन पर हमारे भावों और विचारों के स्पन्दनों का भी प्रभाव पड़ता है। उसी तरह का शरीर बनता है। प्रकृति से जुड़ा रहता है। अत: संगीत जीवन को प्रभावी करने वाला शक्तिशाली माध्यम है। व्यक्तित्व में परिवर्तन लाने का सशक्त माध्यम है। आज तो संगीत केवल मनोरंजन का साधन बनकर रह गया। इसका भी शरीर पर प्रभाव तो पड़ेगा ही। आवश्यकता है संगीत के सकारात्मक उपयोग की। इसके लिए आस्था ही एकमात्र सूत्र है। इसके बिना नाद ब्रह्म की साधना संभव नहीं। इसी साधना से ऊर्जा को पदार्थ में बदला जा सकता है। वर्षा हो सकती है। प्राकृतिक शक्तियों का और भीतर के ईश्वरीय अंश का विकास हो सकता है। संगीत के स्पन्दन भीतर आत्मा को छूते रहें, यह आवश्यक है। जीवन यापन एक बात है, साधना दूसरा मार्ग है। इस मार्ग पर आपको कभी यह अभाव महसूस नहीं होगा कि आपके पास दृष्टि नहीं है। संगीत साधना में आपको जो नजर आएगा, अन्य किसी को नहीं आएगा।
गुलाब कोठारी

जुलाई 13, 2009

तपन

जीवन के लिए शास्त्रों में अनेक विधान उपलब्ध कराए हैं। पुरूषार्थ एक है। ज्ञान मार्ग,कर्म मार्ग,भक्ति मार्ग, बुद्धि योग जैसे कई फार्मूले दिए हैं। साथ ही यह भी कहा है कि इस जीवन का पर्याय केवल कर्म है। इसी के सहारे भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। मन और प्राण इसमें सदा सहायक रहेंगे। कर्म शरीर करेगा। इसके बाद भी जीवन की चाबी ईश्वर ने अपने हाथ में रख ली। कर्म करने की इच्छा आप स्वयं पैदा नहीं कर सकते। यह ईश्वर के हाथ में ही रहेगी। सब कुछ करते हुए भी कर्ता वही है। मैं निमित्त मात्र ही हूं।

भारतीय शास्त्रों ने कर्म को दो भागों में श्रेणी बद्ध किया है- प्राकृतिक कर्म (आहार-निद्रा आदि) एवं मानव जनित कर्म। मानव के कर्म तीन प्रकार के कहे गए हैं-यज्ञ,तप और दान। कर्म का आधार इच्छा, कर्म का निर्णय बुद्धि(विद्या और अविद्या) से और कर्म का निष्पादन शरीर से। मन के साथ प्राण-वाक् का जुडे रहना ही कर्म है। शरीर स्वयं कर्म फल(प्राप्ति और भोग) का ही परिणाम है। चूंकि जीवन का लक्ष्य पुरूषार्थ पर आधारित मोक्ष है, अत: कर्म को मर्यादा में रखना और उसकी दिशा निर्धारित करना भी आवश्यक है। इसके बिना मनुष्य अविद्या के प्रवाह में आसानी से बहता चला जाता है। यज्ञ,तप और दान के माध्यम से जीवन की गति विद्या की ओर बनी रहती है। विज्ञान या प्रज्ञा की ओर बढ़ता है। सूक्ष्म धरातल से जुड़ जाता है। स्थूल और सूक्ष्म का संतुलन बना रहता है। ऎसी अवस्था में कर्म योग, ज्ञान योग आगे जाकर एक हो जाते हैं। संचित कर्मो को भी जला देते हैं।

यज्ञ का नाम सुनते ही लगता है कि यह तो जलाने वाला ही कार्य है। अग्नि में सोम की आहुति को यज्ञ कहते हैं। यह जीवन भी यज्ञ है। प्रकृति भी यज्ञ है। हर यज्ञ में सोम को तो जल जाना होता है। अग्नि ही शेष रहता है। अत: विश्व के सम्पूर्ण स्वरूप अग्नि रूप ही माने जाते हैं। वायु मण्डल के सोम के सहारे टिके रहते हैं। सबकी अपनी- अपनी आयु होती है। हमारा जीवन सौर संवत्सर पर आधारित है। एक वर्ष के काल को संवत्सर, छ: माह को अयन कहते हैं। ऋतुओं के चातुर्मास को आर्तव तथा पखवाड़े को पक्ष क हते हैं। यज्ञ कार्यों में अग्नि में अग्नि की आहुति देकर शरीर के आयतन को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है (अग्नि को)। इस अग्नि चित्या यज्ञ से देवात्मा बनता है। सूर्य देवराज है। इस कार्य के लिए पहले अग्नि होत्र, अग्नयाधान आदि से शरीर की अग्नि को यज्ञाग्नि में बदला जाता है। तब संस्कार रूप पांच प्रकार के यज्ञ किए जाते हैं। दैनिक, दर्शपूर्ण मासिक, चातुर्मास्य, पशुबन्ध और संवत्सर । इनका समापन ज्योतिष्टोम यज्ञ से होता है। ये सभी यज्ञ संस्कार रूप होते हैं। इनमें शरीर की वैश्वानर अग्नि पुष्ट होकर पांचों मार्गो से सूर्य तक जाती है। इसी को मोक्ष मार्ग कहा गया है।

आज यज्ञ परम्परा के ये आधार छूट चुके हैं। स्वयं यज्ञ तो कुछ ब्राह्मण ही करते होंगे। अन्य वर्णो में तो बन्द ही हो गए। किसी को बुलाकर करवाया जाए तो व्यापार दिखाई पड़ेगा। न तो यजमान कुछ जानता है, न ही आचार्य को यज्ञ की वैज्ञानिकता का पता होता है। मंत्रों के संगठनात्मक और ध्वन्यात्मक स्वरूप नहीं जानते। स्पन्दन की भूमिका, गति और प्रभाव से अनभिज्ञ होते हैं। पल्लवग्राही पांडित्य का युग है। इसीलिए लोगों का विश्वास उठता जा रहा है।

तप की भी कर्म संज्ञा है। इसका अर्थ सीधा-सीधा है- तपना। अर्थात अग्नि के साथ जुड़ना। अग्नि में कुछ जला डालना और हल्के हो जाना। यहां न तो स्थूल अग्नि का क्षेत्र है, न ही ज्वलनशील सामग्री का । अग्नि से हमारा स्वरूप बना है। अग्नि से हमारा अन्न पचता है और शरीर का पोषण करता है। अग्नि से ही विचार कार्य करते हैं। कार्य तो प्राणों का है, किन्तु ज्ञान का भाग, अंहकार के स्वरूप आग्नेय होते हैं। आत्मा के साथ कर्म संस्कार जुड़े रहते हैं, जिनके फल हम भोगते हैं। यहां तप का अर्थ है ज्ञानाग्नि के द्वारा कर्म संस्कारों को जला देना। इसके अलावा भी जब व्यक्ति कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त करना चाहता है, तब तप करता है। तपन सदा प्राणों का होता है। सूर्य तपता है, तब उसके भीतर जो ऋक्-यजु-साम प्राण हैं, उनका तपन होता है। उष्णता तो परिणाम है। हम श्रम करते हैं, तपते हैं, पसीना आता है। यह भी प्राणों का ही तपन है। तपन क्रिया है और यह प्राणों द्वारा ही चलती है। इससे सृष्टि की भूतमात्रा को कम किया जाता है। पशुभाव हटता है और इसका स्थान नया देवभाव लेता है। नए प्राणों का आना ही परिणाम है। तपन में दो क्रम होते हैं- याग और योग। हमारा सम्पूर्ण चिन्तन प्राणों का तपन ही है। इसी से नए- नए विचार पैदा होते हैं।

तप एक अभ्यास भी है। इससे शरीर पर नियंत्रण रखा जा सकता है। प्राण ही तो शरीर को क्रियाशील बनाते हैं। भूख-प्यास जैसी बाधाएं आपके ध्यान में न आएं, इस कार्य को तप के द्वारा साधा जाता है। जीवन स्वयं में एक तप ही है। संघर्ष भूमि है। हमें यदि सर्जन करना है, तो तपना ही होगा। किन्तु यह बाह्यान्तर तप है। इसमें यजु प्राण को गतिमान करके भाग्योदय किया जा सकता है। जबकि आभ्यान्तर तप शरीर की वैश्वानर को अन्तरिक्ष और द्यु-लोक की अग्नि से जोड़ता है। यहां प्रज्ञा तपन का माध्यम बनती है। व्यक्ति ऋत् में प्रवेश करता है। इन विभिन्न अग्नियों के संघर्ष से एक नया ज्ञानाग्नि पैदा होता है।

इसी के द्वारा कर्म संस्कारों को दग्ध किया जाता है। इसमें इतनी शक्ति होती है कि नए संस्कारों का प्रवेश ही नहीं हो सकता। आत्मा का अन्तरंग भाग हल्का होता जाता है। वहां विज्ञान और आनन्द भाव प्रतिष्ठित होने लगते हैं। हमारे यहां तप के अनन्त स्वरूप दिए गए हैं, किन्तु मुख्य रूप से ब्रह्मचर्य, सत्य भाषण और अनशन को विशेष महत्व दिया गया है। इनके कारण पशुभाव के आहार-निद्रा-भय, मैथुन पर विजय प्राप्त होती है। जिस प्रकार व्यायाम में प्राणों का तपन अधिक बल प्राप्ति के लिए किया जाता है, वैसे ही सत्य बल की प्राप्ति के लिए तप किया जाता है। तप में स्थूल दृष्टि नहीं रहती। भाव ही महत्वपूर्ण होते हैं। सारे परिणाम सूक्ष्म शरीर में आते हैं। तप वैसे तो त्याग के साथ ही जुड़ा रहता है। इसीलिए दान को भी त्याग रूप तप ही कहा गया है।

दान बाहरी संसार से जुड़ा रहता है। परिग्रह-मुक्ति का मार्ग है। जिन वस्तुओं के मोह ने मन पर अधिक आवरण डाल रखे हैं, मन की स्वतंत्रता को बन्धक बना लिया है, आत्मा को सुख की अनुभूति कराते हैं, जिनका अधिक अंश आत्मा पर छाया रहता है, उन प्रिय वस्तुओं को पूर्ण समर्पण भाव से किसी को दे देना। उस पर स्वयं का अधिकार छोड़कर, अन्य व्यक्ति का अधिकार स्थापित कर देना दान है। इससे नए बलों का सृजन होता है। शुभ कार्यों में, जनहित के कार्यो में किया गया व्यय भी आपूर्त दान कहलाता है। धन का नि:स्वार्थ उत्सर्ग करना। एक दान होता है जो पात्रता देखकर किया जाता है। संकल्प के साथ किया जाता है। एक दान है जो कुपात्र को भी दे सकते हैं। ये सारे बुद्धि के ही भेद हैं। दान भी मूलत: आत्मा का तपन ही है। सभी तप व्यक्ति को अविद्या से हटाकर, आवरण मुक्त करके अधिदेव की ओर मोड़ते हैं। ऊपर उठना है तो अग्नि रूपा होना पड़ेगा।

गुलाब कोठारी

जुलाई 15, 2009

भाग्य की लकीरें

दूर बैठे भी
मां जानती है
बच्चे के हालात
बाप नहीं जानता।
बच्चा
खाना खाते ही
कह उठता है
“मां ने बनाया है।”
यही शक्ति है
मनुष्य जीवन की।
यही बसती है
आत्मा
इस देश की
इसको आज
लील गया
पश्चिम का आवरण
दबकर रह गया
हमारा मन
हमें भी नहीं पड़ता
दिखाई
हम देखते हैं
केवल इच्छा को
बनाते रहते हैं
भाग्य अपना
इन्हीं इच्छाओं से
यही प्रवाह
गिराता है
हमारे जीवन को
एक गहरे सागर में,
खो बैठते हैं
अपना अस्तित्व।
बन जाते हैं
खार-खार
अमृत की तलाश में।
जीवन चल नहीं सकता
भाग्य के भरोसे।
भाग्य की पहेली
एक ही भाग है
जीवन का
पिछले कमो का।
ज्योतिषी
बता देता है
क्या आने वाला है,
भाग्य क्योंकि
तय हो जाता है,
जन्म के पहले ही।
दर्पण है
भाग्य तो
हमारे अतीत का।
भाग्य
नहीं होता
वर्तमान हमारा।
नहीं बनाता है
भविष्य की रेखाएं।
ज्योतिषी
नहीं बदल सकता
भाग्य की लकीरें
हम ही बदल सकते हैं
उनको
कुछ कर्म करके
वर्तमान में
वही बनेगा
हमारा भाग्य
नए जीवन काल में।
बिना कर्म किए
नहीं मिलती
भोग योनि भी।

गुलाब कोठारी

जुलाई 17, 2009

नई संस्कृति

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। इसी कारण हजारों साल से भारत ऎसा दर्पण बना हुआ था जिसमें अन्य देश अपना चेहरा देखते रहे हैं। उसी देश की संस्कृति की आज जो दुर्गति हो रही है, उसे देखकर खून के आंसू भी टपकें तो कम है। क्योंकि जो कुछ नया होने लगा है, उसके कर्णधार भी आज के शिक्षित लोग ही हैं। अशिक्षित ऎसा मर्यादाहीन होकर किसी समाज में नहीं रह सकता।
राजस्थान विधानसभा का नजारा हमने तीन दिन तक देखा। जो सुना, उसका स्वरू प मूल रू प में व्यक्तिगत लांछन का था। मायावती और रीता बहुगुणा का प्रकरण भी व्यक्तिगत लांछन का ही है। और इस नए प्रयोग की शुरूआत भी चुनाव अभियान में दोनों बड़े राजनीतिक दलों के मुखियाओं- मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी ने ही की। फिर नीचे वाले सवाया क्यों नहीं करेंगे।
आज राजनीति में पहले ही आपराधिक तत्वों की अनिवार्यता दिखाई पड़ रही है। राजनीति का ज्ञान और क्षेत्र या समस्याओं पर इनकी पकड़ होना कोई अनिवार्यता नहीं हैं। दु:साहसी भी होते हैं। चलते हुए को धक्का मारने का काम करते हैं। मर्यादा की इनकी अपनी कोई अवधारणा नहीं होती। ये अपनी अन्य विशेषताओं के कारण ऊपर तो पहुंच जाते हैं, किन्तु इनके आचरण से हम मतदाता जरू र शर्मिन्दगी महसूस करते हैं। नया मतदाता जागरू क है। जब वह पानी-बिजली के लिए दफ्तरों का घेराव कर सकता है, पुलिस के सामने डटा रह सकता है, तब वह दिन दूर नहीं जब अपने जन प्रतिनिधि से भी हिसाब मांग बैठे। आज जिस प्रकार की भाषा संभ्रांत नेताओं के नाम से सुनी जा रही है, जो कुछ रीता बहुगुणा जैसी महिला नेता ने कहा, अथवा बड़े नेता जो-जो बोल चुके, वह इस बात का प्रमाण है कि ये लोग शिक्षित तो हैं, किन्तु उनके संस्कारवान होने पर प्रश्नचिन्ह दिखाई पड़ता है। देश की धरती के प्रति इनके मन में कोई सम्मान नहीं बचा है।
आज इतने तरह के शिक्षण-प्रशिक्षण विश्व में हो रहे हैं, किन्तु राजनेताओं के प्रशिक्षण और आचरण के आकलन की व्यवस्था भी नहीं है। आज के वातावरण को देखकर तो लगता है कि इन मुद्दों को भी कानून के घेरे में लाने की महती आवश्यकता है। हालांकि कानून भी जब बनते हैं कुछ मंशा लेकर बनते हैं। बाद में राजनेता ही स्वार्थ या राजनीति के कारण इनको बदल देते हैं। जैसे दल-बदल कानून। यह भी सही है कि कानून से ही सब कुछ नहीं हो जाता। दृढ़ इच्छाशक्ति पहली आवश्यकता है। जो भी नेता/प्रतिनिधि मर्यादाविहीन प्रदर्शन करे, उसे तत्काल दण्डित किया जाना चाहिए। बिना किसी लिहाज के। इसमें लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को भी एकजुटता दिखानी चाहिए। देश हित में किसी भी अनौपचारिक गठजोड़ का साथ नहीं दिया जाए। अब आवश्यकता यह भी है कि संसद की तरह विधानसभाओं की कार्यवाही का भी टीवी पर सीधा प्रसारण होना चाहिए। नागरिक देख सकें कि उनका प्रतिनिधि अपनी ओछी हरकतों से उनकी नाक तो नहीं कटवा रहा।
गुलाब कोठारी

जुलाई 20, 2009

देववाणी संस्कृत

यह जयपुर अथवा छोटी काशी का ही सौभाग्य है कि यहां पर तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन हो रहा है। देश-विदेश के सभी विद्वानों का अभिनन्दन!
आज भी संस्कृत को देववाणी ही कहा जाता है, किन्तु इसकी दुर्दशा भी बहुत हो रही है। देश भर में संस्कृत के विश्वविद्यालय भी अनेक खुल चुके हैं। क्या लक्ष्य लेकर ऎसा हो रहा है, यह समझने की महती आवश्यकता है। यह भी बड़ा प्रश्न है कि क्या संस्कृत केवल भाषा ही है अथवा जीवन की डोर इसके साथ कहीं गहरे में जुड़ी हुई भी है। सारी भाषाओं को तो देववाणी नहीं कहा जाता। क्या संस्कृत पढ़े-लिखे लोग देवों की तरह व्यवहार करते दिखाई देते हैं क्या संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन के अलावा कहीं उपयोग किया जाता है आज संस्कृत का छात्र भी पढ़ाई के बाद संस्कृत पढ़ाने के अलावा क्या करता है

संस्कृत सृष्टि सूत्रों में बंधी भाषा है। जिन सिद्धान्तों पर सृष्टि का विकास होता है, उन्हीं सिद्धान्तों पर संस्कृत विकसित है। जिस प्रकार सृष्टि का आलम्बन अव्यय है, उसी प्रकार शब्द, वर्ण, पद आदि का आलम्बन भी स्फोट है। अक्षर से सृष्टि बनती है और अक्षर में ही लीन होती है। हमारी सम्पूर्ण वर्णमाला “अ” (स्वर) से निकलती है। संस्कृत की शोध सृष्टि के सभी प्राकृतिक रहस्यों को खोलती है। इसीलिए देववाणी है। इसीलिए शब्द को ब्राह् कहा है। आज की संस्कृत शिक्षा में कहीं इस क्षेत्र में कार्य होता नहीं दिखाई पड़ रहा। जो कार्य स्व. पं. मधुसूदन ओझा ने जयपुर में किया था, पथ्यास्वस्ति और वर्ण समीक्षा के रू प में, वह भी कहीं चर्चा में नहीं है।

संस्कृत भाषा की एक अन्य विशेषता यह भी है कि हर शब्द के अर्थ भी शब्द में ही निहित होते हैं। अत: वेदों का विश्लेषण करने की क्षमता अन्य भाषाओं में नहीं है। आज वेदों पर जो कार्य हो रहा है, उससे वेदों की वैज्ञानिकता विश्व के समक्ष नहीं पहुंच पा रही है। इस दृष्टि से भी स्व. मोतीलाल शास्त्री, स्व. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी जैसे मनीषियों ने खूब काम किया है। मैंने किसी शोध छात्र को इन पुस्तकों में डूबते हुए नहीं देखा। धूल ही खा रही हैं। हम शोधकर्ताओं को पत्रम्- पुष्पम् देने की व्यवस्था भी कर सकते हैं। आता कोई नहीं है। फिर संस्कृत को केवल भाषा रू प में प्रतिष्ठित करके हम विश्व के समक्ष क्या रख पाएंगे

कश्मीर की शैव परम्परा, ओझा जी की विज्ञान व्याख्याएं और पथ्यास्वस्ति का समानान्तर अध्ययन कराया जाए तो संस्कृत विद्वानों को नई दृष्टि प्राप्त हो सकती है। तब गीता भी हमें अलग तरह से दिखाई पड़ेगी। पुराणों के भी हम वैज्ञानिक अर्थ और सृष्टि तत्वों की विवेचना ग्रहण कर सकेंगे। इनके कथानक मात्र सांकेतिक भाषा है। संस्कृत सम्मेलन से अपेक्षा है कि संस्कृत के माध्यम से वेदों का पुन: आकलन करने का, आज के युग में व्यावहारिक बनाने का मार्ग प्रशस्त किया जाए। इसके बिना संस्कृत सीखने का भी कोई अर्थ नहीं है। इसे साध्य नहीं साधन रू प देखा जाए।

गुलाब कोठारी
[लेखक पत्रिका समूह के संपादक हैं]

संकल्प-3

जीवन चलाती है
माया ही
नर-नारी में,
किन्तु अलग हैं
धरातल उनके,
नर जीता है
बुद्धि से
जो आती है
सूर्य से, महत् से,
अहंकार से
उष्ण होती है
तोड़ती है अग्नि
स्वाभाव से,
शरीर अग्नि है,
ह्वदय प्राण
अग्नि हैं तीनों,
इन्हें चाहिए
संकल्प
शीतल रहने का
सहने का,
सहयोग चाहिए
सौम्या का,
स्त्रेह का
जो प्रेरित करे
मृदुता-माधुर्य
भीतर का।
अग्नि मांगती है
भोग-अन्न-सोम
चलने को
जीवन यज्ञ,
शरीर लेता है
अन्न
बनी रहे
जठराग्नि जिससे,
मन चाहता
शीतलता
मिठास की,
ह्वदय को चाहिए
सोम्य प्राण,
सभी त्रिगुणी हैं,
ढंके हैं
सत-रज-तम से,
अलग-अलग है
अन्न इनका,
अलग-अलग भाव
इन्द्रियों के,
अलग-अलग हैं
विषय भी,
आंख मे है
गहराई,
चमक-ज्योति
मन की,
करूणा है, दया है
अश्रु है
रंजन भी होता है
कटाक्ष भी
चपलता भी,
देखती नहीं खुद
उपकरण है
मन का,
जैसे शरीर है
उपकरण स्वयं
ईश्वर का,
जुड़े रहते हैं
एक-दूजे से
श्रद्धा सूत्र से
संकल्प से।
संकल्प ही
चमकता है
आंखों में,
प्रेम बनकर,
वही करता है
रक्तिम नेत्र
रौद्र बनकर,
यही तोड़ता है
आवरण भी
योगमाया के
माया भाव से।
नीति आती है
संकल्प से,
यही मार्ग है
चतुराई का,
वाणी संयम का
शब्द ब्राह् का,
इच्छा बनती है
प्रत्यक्ष, कार्य रूप
प्रवाहित करके
प्राणों को,
आकाश, वायु
अग्नि , जल
सभी चलते
संकल्प से,
करते हैं
सृष्टि विस्तार
और प्रलय भी
ईश्वर संकल्प से।

माया ही
तोड़ती है
संकल्प सारे
सम्मोहन से,
श्गार से
कटाक्ष से
काटने को सिर
मधु-कैटभ के,
सम्मोहन
अविद्या है,
अज्ञान है,
आसक्ति है,
राग-द्वेष है
अस्मिता है,
अभिनिवेश है
तोड़ते हैं ये
सारे शुभ संकल्प
सम्मोहन से।
माया ही है
विद्या रूप
ज्ञान रूप
धर्म-ज्ञान
वैराग्य-ऎश्वर्य
इनके सहारे
विजय पाता है
संकल्प
सम्मोहन से,
बदलता है
प्रिय को,
प्रवाह को
व्यसन को
अधोगति को,
यथार्थ में
सहजता में
प्रकृत रूप में
न कोई प्रिय,
न ही अप्रिय,
जो जैसा है
वैसा है।
संकल्प तोड़ता
बेडियां स्मृति की,
अतीत की
बाहर लाता है
निकालकर
श्मशान से
मरे हुए काल से,
संकल्प रोकता है
उड़ने से
आकाश में
बिना पंखों के,
अनागत की
कल्पनाओं में,
विकल्प है
स्मृतियां और
कल्पनाएं,
जीवन संकल्प है,
वर्तमान है।
संकल्प बनाता
व्यक्तित्व
फिर बनाता
हजारों को
संकल्पवान
निर्मित करता
राष्ट्र को,
नेतृत्व है
यह तो,
गुरू है
आधार है
शिखर है,
रोक लेता है
जाने से
रसातल में,
देता है साहस
चढ़ने का,
न थकने का,
शरीर की तरह
मन की तरह
कहां थकते हैं,
चांद-तारे,
अव्यय सारे,
निर्विकल्प है
जीवन इनका,
मानव थकता है
विकल्पों से,
भागता है दूर
अपने आप से,
ईश्वर से
जो बैठा है
उसके भीतर
और ढूंढ़ता है
विकल्प उसके
बाहरी जगत में,
जैसे दे रहा हो
ईश्वर धक्का
उसको
अपने से दूर।

गुलाब कोठारी

जुलाई 27, 2009

संकल्प-4

प्रारब्ध भी
देता है
संकल्प और
विकल्प,
बनते हैं भावों से
जुड़कर वर्तमान में,
करते हैं कर्म
पाने को फल
संकल्पित मन से,
दु:ख है
फल का संकल्प
मानव जीवन का,
फल नहीं होता
हमारे हाथ,
कब मिलेगा
कौन जाने,
कितने जनम बाद,
क्यों प्रतीक्षा
करें फल की
मानव
कर्म हजार हैं
जीवन में
संकल्प एक है,
बदलता नहीं,
समय के साथ,
जूझता है
बने रहने को
संकट काल में
हर हाल में,
तभी मिलती है
कीर्ति उसको,
बढ़ता है
यश उसका,
मिलता है सबको
भाग्य से,
संकल्प है तुष्टि
स्पर्द्धा रहित,
ईष्र्या रहित
कामना रहित,
अनूठा हर मानव
अनूठा ही
हर संकल्प,
ईश्वर अंश
अनूठे रूप में।
संकल्प करता है
विकसित
इस अंश को,
जोड़ता है
हर अंश को
प्राणी मात्र को,
विकसित होती है
उत्कृष्टता जीवन की,
सेवा, भक्ति रूप
मातृभाव से।
नारी अग्रणी है
संकल्प की,
वही करती है
संकल्पित
पुरूष्ा को भी,
बना देती है
उध्र्वमुखी,
शीतल करके
उसका अहं भाव।
बना देती है
उसे सृष्टा
ब्रह्मा की तरह
और बन जाते हैं
आकाश-वायु
अगिA-आदित्य
आगे से आगे,
हर मोड़ पर
मिलता है सोम
अगिA को
बढ़ जाता है
यज्ञ आगे
संकल्प से।
दो धाराएं
संकल्प की भी
युगल सृष्टि जैसे
देव भी-असुर भी
देश की सतियां
बनी सभी
संकल्प से
रहने को साथ
पति के
मरते दम तक,
आज की नारी
संकल्पित है
भारत की
जीने को
पति के घर में
मरते दम तक,
हर हाल में
क्योंकि
नर्क बना देता
विकल्प
जीवन को
सीमा नहीं कोई
विकल्प की,
नहीं दिशा कोई,
टूट जाता है
स्थायी भाव
जीवन का,
कहां रहती है
सुरक्षा
खतरों से,
असुरों से,
फिर रह जाता
मातृ गृह मात्र
आश्रय जीवन का,
वह भी तब
जब न हो
अन्य कोई
रहता वहां
पश्चिम की तरह,
बुढ़ापे में
अकेली नार
साथ उसके
अकेली पुत्री
और
नाती उसके
काटते भर हैं
उम्र के दिन
रीत जाता है
सुख
बिखर जाते हैं
सपने सारे,
संजोए हुए
अरमान
एक हठ से
अभिनिवेश से,
जो नहीं करती
स्वीकार
यथार्थ को,
देती है चुनौती
कुदरत को
ठुकराकर
सारा सम्मान
व्यवस्था का,
भूल जाती है
संकल्प अपना
समर्पण का,
भूल जाती है
आना-जाना
जीवन का
केवल नारी का,
नर नहीं जाता
नारी घर,
नहीं छोड़ता
अपना घर
किसी भी हाल में,
सृष्टि बस
भ्रमण है
नारी का, माया का
वही क्रिया है
वही शक्ति है
संकल्प है
विश्व सृजन का,
वही बनाती है
संस्कृति
इस धरती की
मानवता की,
वही लूटती है
भोग सारा
वही कुचलती है
अहंकार नर का,
बना दे संतान
असुर जैसी,
पशु भाव में,
वही लील जाएगी
सारी मानवता,
कर देगी शून्य
धरती को
मनुष्य योनि से,
अपने संकल्प से।
तभी पूजते हैं
नारी को
विश्व भर में
प्रसन्न रखते हैं
ताकि न डोले
उसका संकल्प
न बन जाए
दुर्गा कहीं,
फिर क्या बचेगा
किसी के लिए।

गुलाब कोठारी

जुलाई 30, 2009

बाहरी ज्ञान

आदमी खाता है ठोकरें
अपनी होशियारी
के कारण
मानता है
स्वयं को
अपना भाग्यविधाता
करता है मनमानी
उधार के ज्ञान से
समझ नहीं पाता
लेख
विधाता के।
समझ नहीं पाता
अपनी सीमा को
चाहता है लांघना
सारी मर्यादाएं
कुदरत की,
सुनता भी नहीं
अपने मन की
अंतरआत्मा की।
यही स्वतंत्रता
बदलती है
स्वच्छंदता में,
बन जाती है
कारण
ठोकरों का।

गुलाब कोठारी

अगस्त 3, 2009

क्लेश

कष्ट को ही क्लेश कहते हैं। जीव, अविद्या और क्लेश पर्यायवाची हैं। ईश्वर विद्या रूप है। वहां क्लेश होते ही नहीं हैं। जीव ही अविद्या का पर्याय है। मन-प्राण और वाक् आत्मा के रूप हैं। जीवन चूंकि कर्मो के फल भोगने के लिए मिलता है, अत: इसमेे सुख और दु:ख दोनों साथ-साथ चलते हैं। सुख का मार्ग विद्या को बताया गया है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऎश्वर्य को विद्या कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश को पंच क्लेश या अविद्या रूप कहा है। ये पांचों ही जीवन में कष्ट पैदा करने वाले तत्व हैं। तम रूप हैं। अविद्या का मूल अर्थ है-यथार्थ को नहीं समझ पाना। उसकी अपनी समझ या ज्ञान के अनुसार भिन्न-भिन्न अर्थ लगाना।

रजोगुण और तमोगुण द्वारा ज्ञान और कर्ममय ऎसे दोष उत्पन्न हो जाते हैं जो आत्म विद्या अथवा वास्तविक ज्ञान को ढंककर आत्मा में तमोगुण का विस्तार कर देते हैं। आत्म ज्योति आवृत्त हो जाती है। इनमें सम्मोहन रूप अज्ञान है। अभिनिवेश हठ रूप है। व्यक्ति के मन के अनिष्ट का भय बना रहता है। उसी डर से वह एक तरह से मोर्चा बनाकर खड़ा हो जाता है। राग-द्वेष नाम आसक्ति का है। जो सुखदायक लगे, उसके साथ चिपकना और दुखदायी लगे, उसे दूर रखने का प्रयास करना ही राग-द्वेष है। ममकार भी राग का ही रूप है, जिसमें व्यक्ति अपनों से आसक्त बना रहता है। व्यक्ति के सारे निर्णय इससे प्रभावित हो जाते हैं। प्रिय व्यक्ति में दोष दिखाई नहीं देता। अप्रिय में अच्छाई नजर नहीं आती। दोनों ही जगह हम गलत निर्णय कर बैठते हैं। मूल में व्यक्ति न अच्छा होता है, न ही बुरा। नित्य बदलता भी रहता है। हमारा पूर्वाग्रह ही उसे अच्छा-बुरा मानता है। और वह भी पुराने अनुभवों के कारण।
अस्मिता अहंकार की जनक मानी गई है। ये सब विद्या क्षेत्र को ढंक लेते हैं। कृष्ण कहते हैं कि अव्यय ब्रह्म के धातु रूप ज्ञान और कर्म को समान अवस्था में रखना चाहिए। इसको कृष्ण ने साम्यवाद कहा है।

ये क्लेश भी कम और अघिक होते रहते हैं। जब ये पूर्ण रूप में कार्य करते हैं, बन्धन शक्तिशाली हो जाता है। इस अवस्था को उदार कहा जाता है। इसका ही विपरीत स्वरूप शिथिल होता है, जब ये निर्बल होते हैं। कई बार किसी प्रबल कर्म के दबाव में आ जाते हैं। यह तनु अवस्था है। कभी-कभी दबाव में प्रसुप्त भी हो जाते हैं और दबाव हटते ही फिर उभर जाते हैं। यदि ज्ञान की अघिकता से या कर्म के भोग से ये सर्वथा नष्ट हो जाएं तो इनका स्वरूप छिन्न कहलाता है।

इन क्लेशों के कारण सत, रज, तम के स्वरूप बदल जाते हैं। उसी प्रकार के कारण बनते हैं। वैसे ही कर्म होते हैं। इस प्रकार एक कर्म से नए कर्म का मार्ग प्रशस्त होता है अथवा कर्म क्षय का द्वार खुलता जाता है। कर्म और विपाक के बीच ही मन पर क्लेश छाते रहते हैं। जब तक अविद्या का प्रभाव रहता है, ये क्लेश बने रहते हैं। वैसे विद्या और अविद्या दोनों ही ज्ञान के अंश हैं। विद्या शुद्ध और अखण्ड होती है, अविद्या मलिन और सखण्ड होती है। अविद्या में काम (इच्छा), कर्म और शुक्र (क्लेश) जुड़े होते हैं। अविद्या के कारण ही इनकी उत्पत्ति, स्थिति और बन्धन का क्रम चलता रहता है। विद्या के प्रभाव से प्रवृत्ति और निवृत्ति साथ बने रहते हैं। अविद्या के कारण ही जन्म, मृत्यु, आदान-विसर्ग और सुख-दु:ख पैदा होते हैं।

मन में कामना उठी, बुद्धि ने कहा कि पूरी करना है, प्राण गतिमान हुए। वाक् के एक-एक परमाणु का स्थान नए परमाणु लेने लगते हैं। अथवा एक परमाणु पर दूसरा परमाणु प्राणों के योग से बंधता है। इसी को चिति कहा जाता है। एक परमाणु पर दूसरे परमाणु की चिनाई होती है। वाक् का स्वरूप बदल जाता है। क्रिया से कर्म बदला, कर्म से परिणाम और परिणाम फिर नए कर्मो का मार्ग प्रशस्त करता है।

अज्ञान से तमोगुण उत्पन्न होता है। सबको यही मोह जाल में डालता है। प्रमाद, आलस्य, निद्रा आदि के द्वारा बन्धन में डालता है। राग मन को बांधने वाला है। द्वेष विज्ञान तत्व का आवरण करने वाला है। गीता में इसी को रजो रागात्मकम् विद्धि कहा गया। प्रकृति के तीनों गुणों में रजोगुण रागरूप होता है। वह पदार्थ की तृष्णा रूप आसक्ति से पैदा होता है। यही राग कर्म की आसक्ति से आत्मा का बन्धन करता है। काम की आसक्ति से किया गया कर्म आत्मा में अपूर्व वासना नाम का संस्कार पैदा कर देता है, जो विज्ञान रूप प्रकाश को ढक देता है।
अपेक्षा और उपेक्षा दो मूल वृत्तियां जीवन में बनी रहती हैं। अपेक्षा वृत्ति को प्रवृत्ति और उपेक्षा वृत्ति को निवृत्ति स्वरूप कहा गया है। इसमें लौकिक भावों की ओर उपेक्षा और आत्मा की ओर अपेक्षा के भाव को वैराग्य कहा गया है। उपेक्षा भाव विद्या मार्ग है और अभेद रहता है। अपेक्षा भाव अविद्या मार्ग है और अनन्त है। हमारे सारे कर्म विद्या-अविद्या से मिश्रित होते हैं। क्योंकि दोनों ही आत्मा से जुड़े होते हैं। यह कम-ज्यादा होते रहते हैं। शुद्ध विद्या में कर्म होता ही नहीं। जैसे-जैसे अविद्या बढ़ती जाती है, वैसे ही कामना और कर्म बढ़ते जाते हैं। ये ही आत्मा की गति के कारण हैं। गति टूटना एक बात है और आत्मा के आवरण हटना दूसरी बात। ये कार्य तो विद्या भाव से ही संभव है।

अविद्या के संयोग से विद्या (अखण्ड) भी खण्ड-खण्ड हो जाती है। इन खण्डों को ही मन कहा जाता है। यह अविद्या का पहला आवरण है। मन पर अविद्या का आघात होता है, जिससे उसका प्रकाश कम होता जाता है। शान्त मन अशान्त हो जाता है। गतिशीलता के कारण अब इसी मन की प्राण संज्ञा हो जाती है। जब इस प्राण की चेष्टा पूर्ण हो जाती है, तब स्वत: शान्त हो जाता है। इसी को वाक् कहते हैं। एक व्यापक आत्मा अविद्या के कारण खण्ड-खण्ड होकर मन-प्राण-वाक् बन गई। स्व. पं. मधुसूदन ओझा ने लिखा है कि इस कारण अविद्या के भी तीन रूप बन जाते हैं। मन के साथ जुड़ने वाली अविद्या को काम, प्राण के साथ संसर्ग से कर्म और वाक् के संयोग से उसी को क्लेश कहते हैं। क्लेश और शुक्र पर्यायवाची भी हैं।

विद्या में भी तीन ही भाव उत्पन्न होते हैं। आत्मा के वाक् भाग में मन के प्रभाव से इच्छा, प्राण के प्रभाव को तप कहते हैं। इच्छा और तप के कारण वाक् का जो नया स्वरूप बनता है, उसे श्रम कहते हैं। इन तीनों के बिना कुछ नहीं होता। मन में इच्छा के कारण प्रत्येक परमाणु दूसरे परमाणुओं पर आक्रमण करता है। संघर्ष पैदा करता है। इस कारण परमाणु गर्म हो जाते हैं। इसी को तप कहते हैं। इसी से नए स्वरूप का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया को श्रम कहते हैं। इसी प्रकार इच्छाएं उठती रहती हैं, तपन का क्रम चलता रहता है और भिन्न-भिन्न रूप में सृष्टि आगे बढ़ती जाती है।

हम यह जानते हैं कि सृष्टि अव्यय पुरूष से शुरू होती है। उसकी पांच कलाओं आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् में से मन का प्राण-वाक् की ओर गति करना ही अविद्या अथवा कर्म कहा गया है। हमारे पंचकोश का निर्माण भी इसी क्रम में होता है। अन्तिम वांग्मय कोश को ही स्थूल शरीर कहा गया है। अव्यय की यही वाक्, स्वरूप लेते-लेते स्थूल रूप ग्रहण करती है। हमारी जीवन यात्रा भी अविद्या को हटाते-हटाते स्थूल शरीर से शुरू होकर प्राण-मन और विज्ञान (प्रज्ञा) के सहारे आनन्द तक पहुंचती है। यही ज्ञान की भूमिका है, जिससे अविद्या के आवरण दूर करते-करते विद्या में आत्मा को प्रतिष्ठित किया जाता है। शुद्ध विद्या को ही ईश्वर कहते हैं। वहां कोई कर्म नहीं रहता। कोई कामना नहीं होती। ईशावास्य उपनिषद् में कहा है कि-

अंधम् तम: प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायांरता:।।
जो ज्ञान अंश को छोड़कर नितान्त कर्म के उपासक हैं, वे घोर अंधकार में डूब जाते हैं। जो कर्म मार्ग का परित्याग करके केवल ज्ञान की खोज में व्यसनी हो जाते हैं, वे इनसे भी गहरे अंधकार में डूबे हैं।

गुलाब कोठारी

अगस्त 4, 2009

मीडिया और संस्कृति

हमारा देश आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। वैश्वीकरण ने एक ओर अमरीकी डालर का तथा दूसरी ओर अंग्रेजी भाषा का महत्व बढ़ा दिया है। चूंकि हमारी शिक्षा में मानसिक परिपक्वता को स्थान नहीं है, अत: हम एक प्रवाह में पड़ गए। आंखें मूंदकर चले ही जा रहे हैं। अच्छे-बुरे अथवा उपादेय एवं हेय का भेद करना भूल गए। शिक्षित समाज धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति से और स्वयं अपनी आत्मा से दूर होता जा रहा है। अभी इनकी संख्या बहुत कम है, किन्तु इनका झुकाव अंग्रेजी संस्कृति एवं जीवन दर्शन की ओर दिखाई पड़ता है। ये ही लोग देश के नीति-निर्माता भी हैं।

परिणाम यह होता है कि जब भी कोई नीति संस्कृति में बदलाव की बात कहती है, तब टकराव की एक स्थिति बन जाती है। अधिकांश देशवासी मूल अवधारणाओं में बदलाव नहीं चाहते। नई संस्कृति इन मर्यादाओं को तोड़ती हुई दिखाई पड़ती है। जैसा कि आज संविधान की धारा 377 के मामले में होता दिखाई पड़ता है।
ऎसे हालात में मीडिया की भूमिका को भी इसी भाषाई परिपेक्ष में देखना चाहिए। अंग्रेजी मीडिया और टीवी नई विचारधारा के पोषक दिखाई पड़ते हैं। आम आदमी से दूर रहने के कारण भारतीय मानसिकता को गहराई से नहीं समझ पाते। भारतीय शब्दों को अंग्रेजी में अनुवाद करके ही समझते हैं। अत: विदेशी विचारधारा एवं तर्क देकर विषयों को प्रस्तुत करते रहते हैं। भाषाई समाचार-पत्र लोगों के नजदीक भी रहते हैं और सांस्कृतिक विषयों के साथ भी जुड़े होते हैं। वे मूल्यों पर किसी भी दबाव का विरोध करते हैं। हमारे नीति-निर्माता इसीलिए अंग्रेजी मीडिया तथा टीवी पर आश्रित रहते हैं। वहां टकराव भी नहीं है और उनके अहंकार की तुष्टि भी हो जाती है। चिन्तनधारा भी एक सी होती है। इस प्रकार मीडिया भी देशी एवं अंग्रेजी भेद से दो भागों में बंट गया।

अंग्रेजी का सर्वाधिक प्रभाव हमारे अधिकारी एवं न्यायिक वर्ग पर दिखाई पड़ता है। इनकी शिक्षा एवं प्रशिक्षण दोनों ही अंग्रेजी में होते हैं। इनकी जीवनशैली भी वैसी ही रहती है। इनके मुकाबले नेता आम आदमी के ज्यादा नजदीक होते हैं, किन्तु दोनों का चोली-दामन का साथ रहता है। नीतियां तो अधिकारी बनाते हैं। आम आदमी से तो इनका नाता ही नहीं रहा। विदेशी कानूनों और विश्लेषणों के आधार पर यहां भी कानून बनाते रहते हैं। देश में एक नई संस्कृति पैदा की जाने लगी है। नए कानूनों के कारण जनजीवन भी अस्त-व्यस्त और त्रस्त होने लगा है। इस ओर कानूनविदों का या नेताओं का ध्यान कभी नहीं जाता। देश में शान्ति के स्थान पर अशान्ति की प्रतिष्ठा होती है। टकराव तो सरकार से किया नहीं जाता, भ्रष्टाचार को अवश्य बढ़ावा मिलता रहता है।

आवश्यक यह है कि हम किसी व्यवस्था अथवा जीवन की अवधारणा को अच्छा-बुरा तो नहीं कहें, किन्तु हर निर्णय का दूरगामी परिणाम तो निर्णय करने से पहले समझ लें। यही तो नहीं होता। जिन लोगों को ईश्वर ने देश चलाने के लिए संसद में बिठाया, वे भी यदि प्रवाह में बहने लगे, तब दोष हम किस को देंगे।
हमें न अंग्रेजी से विरोध है, न ही किसी अन्य भाषा से। भाषा तो माध्यम ही है। जब तक माध्यम रहती है, तब तक कोई हानि भी नहीं होती। हो क्या रहा है कि हमारे शब्दों के समकक्ष अंग्रेजी शब्द ढूंढ़कर दोनों के पूरक की तरह काम लेने लग गए हैं। इस दोष को यदि दूर कर लिया जाए, तो टकराव स्वत: ही रूक जाएगा। उदाहरण के लिए हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है। धर्म की परिभाषा के अनुसार किन्हीं दो व्यक्तियों का धर्म एक नहीं हो सकता। हर व्यक्ति का अपना निजी धर्म होता है। धर्म को हम अंग्रेजी के रिलिजन में बदल दें तो वह साम्प्रदायिक/सामूहिक स्वरूप है। संविधान का सम्प्रदाय निरपेक्ष होना तो सही होगा। धर्मनिरपेक्ष अथवा अधर्मी होना वांछित नहीं है। धर्म की तरह शिक्षा भी एक अवधारणा है। बहुत बड़ी परिभाषा है इसकी और इसमें सम्पूर्ण जीवन का सर्वागीण विकास सम्मिलित है। एजुकेशन में व्यक्ति की तो कहीं चर्चा ही नहीं है। केवल विषय पढ़ाए जाते हैं। और इसका लक्ष्य केवल नौकरी देना रह गया। शेष जीवन से इसका लेना-देना ही नहीं है। शिक्षा नीति भले किसी भी भाषा में बने, उसकी मूल अवधारणा बनी रहनी चाहिए। आज शिक्षित व्यक्ति ही अधिक अपराध करता दिखाई पड़ता है। यह तो शिक्षा का अपमान ही कहा जाएगा। जब अरबों रूपए खर्च करके इसी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा तो एक संवेदनाविहीन मानव संस्कृति का ही निर्माण होगा। इसका विरोध करना ही यदि टकराव है, तो यह तो समय के साथ बढ़ता ही जाएगा। भले ही मीडिया का एक हिस्सा धन लेकर मौन हो जाए, देश की आत्मा तो मुक्ति के लिए छटपटाएगी।

(“राजनीतिक परिदृश्य पर सहमति और टकराव तथा इसमें मीडिया की भूमिका” विषय पर दिल्ली में आयोजित सेमिनार में पत्रिका समूह के सम्पादक गुलाब कोठारी द्वारा व्यक्त विचार)

अगस्त 10, 2009

वेद

हमारे शास्त्रों को केवल रटा और रटाया जाता है। इसी कारण न वेद समझ पाए हैं, न वेद का ज्ञान व्यवस्थित रूप से हमको पढ़ने को मिलता है। सब भ्रमित लगते हैं। अपने-अपने अनुमान से अर्थ लगाते रहते हैं। एक ही बात दर्जनों स्वरूपों में सुनाई देती है। समझता कोई कुछ नहीं। यही कारण है कि वेद केवल पढ़ने-पढ़ाने के विषय बनकर रह गए और जीवन में उनकी भूमिका खो गई। हमारे अनेक वेद मंत्र और अध्याय नित्य क्रम से जुडे तो दिखाई देते हैं, किन्तु एक परम्परा की तरह। अनेक परिभाषाएं, पुराण कथाएं सुनी जाती हैं। केवल कहानियों की तरह। उनमें मर्म क्या छिपा हुआ है, कोई बताने वाला नहीं।

यहां तक कि देवी-देवताओं के अस्त्र-शस्त्र, वाहन, स्वरूप जीवन के किन सिद्धान्तों से जुड़े हैं, नहीं मालूम।
वेदों को समझने के लिए भाषा का अध्ययन, शब्द, अर्थ, प्रत्यय की जानकारी, ध्वनि और स्पन्दन का स्वयं का अनुभव होना आवश्यक है। वेद के अनेक विषय न देखे जा सकते, न उनको प्रयोग के जरिए प्रयोगशालाओं में कहीं समझा जा सकता है। हां, जिनको “निदान” विद्या आती है, वे भूत पदार्थो के माध्यम से सृष्टि के सिद्धान्त समझ सकते हैं। वे कमल का (पद्म) अध्ययन करके ब्रह्मा प्राण को अथवा मूषक का अध्ययन करके गणपति प्राण को समझ सकते हैं। वेद की भाषा भी छन्दबद्ध है। सृष्टि का निर्माण भी छन्दों से ही हुआ है और छन्द ही उसके नियामक भी हैं। सूर्य को समझने के लिए बृहति छन्द को अथवा पृथ्वी को समझने के लिए अनुष्टुप को समझना पड़ेगा। अर्थ और शब्द वाक् के सिद्धान्त एक ही हैं। एक दूसरे के सहारे इनको समझा जा सकता है। व्यवहार में इस प्रकार का कोई प्रयास दिखाई नहीं पड़ता और वेद शब्द बनकर रह जाते हैं।

एक छोटा सा उदाहरण : -
जब कुछ नहीं था, आकाश था। उसकी तन्मात्रा नाद थी। हवा थी, उसकी तन्मात्रा स्पर्श थी। प्राण थे – ऋषि प्राण (आग्नेय) थे। जल मात्रा (सोम) प्रबल थी, अग्नि दुर्बल थी, अत: स्वरूप कोई नहीं था। परन्तु स्पन्दन थे। ये स्पन्दन ही माया कहलाते हैं। इनका स्वरूप ही संकोच और विकास है। आकाश में फै ला सारा पदार्थ ब्रह्म है और उसकी शक्ति स्पन्दन रूप माया है। स्पन्दन से ही ब्रह्म का अंश बिन्दु भाव में आता है। बिन्दु का केन्द्र ऋक है, परिघि साम है, बीच का क्षेत्र यजु है। यही वेद है। बिन्दु ही प्राणों द्वारा की गई प्रथम वाक् सृष्टि है। इस स्वयंभू लोक से बिन्दु नीचे बढ़ता है, परमेष्ठी लोक में। यहां सोम रूप पितर प्राण हैं। भू, भुव, स्व, मह, जन:, तप: और सत्यम् सात लोक हैं। स्वयंभू को सत्यम् कहा है। परमेष्ठी को जन:। दोनो के मध्य में तप: लोक है। अन्तरिक्ष है। चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर लगाता है, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है और सूर्य परमेष्ठी का उपग्रह है। तप:लोक में परिक्रमा करता है।

जहां सूर्य है, वहीं उसके उपग्रह भी हैं। वे भी सूर्य के साथ परमेष्ठी मण्डल के चक्कर लगाते हैं। तब भू, भुव, स्व और मह चारों लोकों की क्या स्थिति बनी आकाश में क्या दिखाई पड़ रहा है ऊपर सत्यम् (स्वयंभू) बीच में तप:(अन्तरिक्ष) और नीचे परमेष्ठी (जन:) लोक । दोनों लोकों के मध्य का अन्तरिक्ष भी इन लोकों से भिन्न दिखाई नहीं पड़ता। वेद वाक्य है कि सूर्य तप: लोक में तपता है।

अब एक और सिद्धान्त भी है कि परमेष्ठी मण्डल भी स्वयंभू लोक की परिक्रमा करता है। इसका अर्थ हुआ कि परमेष्ठी लोक को स्वयंभू लोक के बाहर होना चाहिए। तब यह सिद्ध हुआ कि भीतर का लोक सत्यम् और बाहर जन:। बीच में तप: लोक। तब जाकर केन्द्र से शुरू होकर अमृत सृष्टि सूर्य में पंहुचेगी और फिर सूर्य के द्वारा मत्र्य सृष्टि केन्द्र से दूर-दूर होती चली जाएगी। एक ही अंतरिक्ष भिन्न-भिन्न लोकों के मध्य भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाएगा।

स्वयंभू का ब्रह्म तप: लोक में ही अपना स्वरूप ग्रहण करता हुआ परमेष्ठी तक पहुंचता है। यह बिन्दु यहां अव्यय पुरूष कहलाता है। स्पन्दनों से ही इसका निर्माण हुआ है। यही बिन्दु इन्हीं स्पन्दनों के द्वारा स्वरूप बदलता हुआ आगे बढ़ता जाता है। यही अक्षर, क्षर और स्थूल (महाभूत) भाव तक पहुंचता है। स्पन्दनों के कारण ही प्राण भी स्वरूप बदलकर ऋषि से पितृ, देव, गन्धर्व, पशु आदि बनते हैं। परमेष्ठी में ही भृगु-अंगिरा का स्थान है। यही गो(विद्युत)लोक भी कहलाता है। इसी को शेष्ाशायी विष्णु का क्षीर सागर भी कहते हैं।
स्पन्दन का मूल स्वरूप नहीं बदलता। इसके कारण अन्य सारे स्वरूप बनते हैं और लीन भी हो जाते हैं। सातों लोकों को एक साथ देखें तो एक आकाश दिखाई पड़ता है और एक ही सूर्य। वेद की सारी व्याख्याओं को अलग-अलग धरातल पर समझने पर इन्हीं में सातों लोक स्पष्ट हो जाते हैं। इसी सिद्धान्त पर आत्मा और शरीर को देखा और समझा जा सकता है।

गुलाब कोठारी

अगस्त 12, 2009

देते रहें

कर्म और भोग
दोनों ही
पर्याय हैं जीवन के
भाग नहीं सकते
भोगना पडेगा
इसी दलदल में
और
उठना भी होगा
इससे ऊपर।
जीवन व्यापार है
लेन-देन है,
कर्म देना है
उल्टा भी होगा
यदि
उलट गए
हमारे भाव।
कुदरत देती है
हम मांगते हैं
ईश्वर देता है
हम मांगते हैं
सीखना पडेगा
हमको भी
देना
यदि बनना है
ईश्वर,
बिना किसी
अपेक्षा भाव के
लेने के लिए,
देना ही होता है
विस्तार आत्मा का,
‘स्व’ का
संकोच बन जाता है
लेना
आत्मा देता है
व्यक्ति नहीं देता
देय वस्तु
होती है
आत्मा का अंग
होता है उस पर
अधिकार हमारा
और
देते समय
हम दे देते हैं
अधिकार भी
साथ में
छोडकर अपना
स्वामित्व-भाव
फिर नहीं करते
कामना
उसे पाने की
वापस
अपने लिए।
जिंदगी
नहीं रहती
फिर व्यापार
देना ही देना
लेना कुछ नहीं,
बन जाता है
भामाशाह
देते रहने वाला,
धन नहीं चाहिए
देने के लिए
तन भी चलेगा
मन भी चलेगा
सेवा भी चलेगी
मिठास भी चलेगा
ताकि
कोई न रहे
वंचित
बनने से
भामाशाह।
कोई आस नहीं
शेष रहे
लेने की
वासना के घेरे की
देते-देते
बन जाए
नारायण
यह मानव देह
लोग मांगते रहें
हम देते रहें।
ईश्वर से लेकर
ईश्वर को ही
न भोग रहे
न कर्म रहे
न जीवन व्यापार।

गुलाब कोठारी

अगस्त 24, 2009

सेवा

प्रत्येक व्यक्ति को सौ साल का जीवन मिलता है। यह सौ साल शरीर की औसत आयु होती है। इसमें रहने वाला जीव अपना शरीर बदलता-बदलता इस शरीर में आकर रहने लगता है। उसे अगले सौ वर्ष इस शरीर का उपयोग करते हुए अगले शरीर में जाने की तैयारी करनी होती है अथवा जीवन-मरण के चक्र से बाहर निकलने का प्रयास करना होता है। इन्हीं प्रयासों के आघार पर हम कह सकते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन ही सौ साल का स्वपAलोक है।

इसमें शरीर कार्यरत दिखाई पड़ता है, किन्तु इसको चलाने वाली शक्तियां अदृश्य रहती हैं। सपना जीव देखता है और कार्य शरीर के माघ्यम से मन और बुद्धि करवाते हैं। ये दोनों भी अदृश्य शक्तियां ही हैं। शक्ति का अर्थ है ऎश्वर्य और पराक्रम। सपना कामना है, इच्छा है। पराक्रम क्रिया है और ऎश्वर्य प्राप्ति है। जब व्यक्ति भूखा होता है, तब खाने की इच्छा होती है। लगता है उसकी सारी शक्तियां क्षीण होने लगी हैं। खाना खाते ही एक तृप्ति का अनुभव करता है। यह तृप्ति ही शक्ति कहलाती है। व्यक्ति को आगे प्राप्ति की ओर अग्रसर करती है। घन और प्रशंसा की भूख को तृ# नहीं किया जा सकता। वे तृष्णा रूप में देखी जा सकती हैं।

हमारे सपनों का आघार हमारे कर्म होते हैं। कर्म के आघार पर ही मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। सौ साल तक की यात्रा में मनुष्य पिछले जन्मों के कर्म-फल का ही भोग करता है। इनको टाला नहीं जा सकता। इसी के अनुरूप हमारे मन में इच्छाएं पैदा होती हंै। ये सारी इच्छाएं प्रकृति द्वारा संचालित होती हंै। इसी प्रकार वर्तमान कर्म भी हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं। ये इच्छाएं भी उसी मन में उठती हैं। इनमें हमारी इन्द्रियों का और अर्जित ज्ञान का योग रहता है। हमारे चारों ओर के वातावरण का योग रहता है। इसी के अनुरूप हम कर्म करते हैं। इन कर्मो को अथवा इनके फलों को ही स्वपA कहा जाता है। फल चूंकि प्रकृति के हाथ में होते हैं, अत: ये कर्म प्राकृतिक कर्मो से जुड़कर भाग्य का निर्माण करते हैं। अत: फल कब मिलेगा, हम नहीं जानते। इसीलिए कृष्ण कह गए कि फल की इच्छा मत रखो।

कृष्ण की बातें तो गूढ़ होती हैं। ऋषि-मुनि ही पूरी तरह समझ सकते हैं। साघारण व्यक्ति कैसे इस अवघारणा को जीवन में उतारे! इसके लिए भारतीय दर्शन ने दिया पुरूषार्थ यानी घर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनके लिए जीवन के भी चार विभाग किए-ब्रrाचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम। इनको व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के चारों घरातलों पर जीते हुए फल की कामना से बाहर निकल जाता है। पचास के बाद गृहस्थी से निवृत्त होकर सेवा का मार्ग पकड़ लेता है। सेवा का अभ्यास ही जीवन को साघने का सबसे बड़ा मार्ग है। सेवा में केवल देना होता है, लेना कुछ भी नहीं। अर्थात फल की इच्छा कुछ नहीं। जहां देना-लेना साथ रहता है, उसको व्यापार कहा जाता है। हमारे यहां तो कहावत है कि नेकी कर कुएं में डाल। न प्रशंसा चाहिए, न ही प्रचार। सेवा व्यक्ति अपने स्वयं के सुख के लिए करता है। आत्म संतुष्टि के लिए करता है। सेवा के माघ्यम से वह तो अपनी आत्मा का विस्तार देखता है। जिसकी भी सेवा करता है, उसके भीतर अपनी आत्मा का प्रतिबिम्ब देखता है। अपने-पराए के, छोटे-बड़े के सारे भेद समाप्त हो जाते हैं। दोनों एक घरातल पर आ जाते हैं। इसी तरह जीवन में वसुघैव कुटुम्बकम् की अवघारणा मूर्त रूप होती दिखाई पड़ती है।

कहने को तो सेवा तन, मन और घन से की जाती है, किन्तु वास्तविकता यह है कि तन और घन तो साघन मात्र हैं। सेवा हमेशा मन से ही होती है। तन और घन दोनों ही जड़ हैं, निर्जीव हैं। मन चेतन है। मन में ही इच्छा पैदा होती है। यह इच्छा पूर्व कर्मो के कारण भी पैदा हो सकती है और वर्तमान सपनों के आघार पर भी। सेवा में जो कुछ तन-मन-घन लगता है, वह आत्मा का दान कहलाता है। ये सब आत्मा के वित्त अथवा सम्पदा माने गए हैं। अपनी सम्पदा के किसी अंश पर अघिकार छोड़कर अन्य का अघिकार प्रतिष्ठित कर देना दान कहलाता है। अत: सेवा में दान के बदले लिया कुछ नहीं जाता। देने वाला सदा समाज में बड़ा ही माना जाता है।

सेवा कार्य की एक और विशेषता है। सेवा में कोई स्पर्घा नहीं होती। आज हमारा जीवन स्पर्घा से अटा पड़ा है। ईष्र्या भी स्पर्घा ही है। हम स्पर्घा के बाहर कहां जी पाते हैं! आज की शिक्षा भी केवल स्पर्घा ही सिखाती है। चाहे नंबर लाने हो या कैरियर का क्षेत्र हो। स्पर्घा में व्यक्ति नकल करने लगता है। उसका घ्यान सदा दूसरों की गतिविघियों पर रहता है। वह अपनी क्षमताओं को भूलकर दूसरे जैसे कार्य करने का प्रयास करता है। इसका सीघा सा अर्थ है कि व्यक्ति अपने प्राकृतिक स्वरूप से दूर होता जाता है। उसके जीवन से सहजता निकल जाती है। अत: नित नई कठिनाइयों से जूझता है। वह दूसरे जैसा बन भी नहीं पाता और स्वयं के स्वरूप को बिगाड़ लेता है। इस नकली व्यक्तित्व के कारण हर कार्य में फल की अपेक्षा रखता है। जीवन में शरीर और बुद्धि हावी हो जाते हैं। मन की संवेदनाएं दब जाती हैं। उसके सही सपने भी दफन हो जाते हैं। बुद्धि सदा बाहरी ज्ञान पर आश्रित रहती है। भीतर का ज्ञान कभी प्रकट ही नहीं हो पाता। व्यक्ति स्वयं को कैसे देखेगा, यदि स्वयं से दूर जा रहा है! जो ज्ञान लेकर पैदा हुआ, वह तो सौ साल में काम ही नहीं ले पाता। अद्वितीय पैदा हुआ, किंतु आगे नहीं बढ़ा। बुद्धि और बुद्धि के अहंकार ने भीतर झांकने ही नहीं दिया।सेवा व्यक्ति को अर्थ और कामना की मर्यादा सिखाती है। अर्थ का उपभोग घर्म पर आघारित रहता है। व्यक्ति घनी व्यक्ति के बजाए दरिद्र के प्रति समर्पित होने लगता है। उसमें भी उसी ईश्वर का अंश देखता है, जो स्वयं के भीतर जान पड़ता है। इससे बड़ी ईश्वर की भक्ति भी और क्या हो सकती है। सारा अहंकार सेवा भाव के आते ही चूर्ण हो जाता है। सेवा करके जो प्रसन्नता अर्जित करता है, वही उसके जीवन के सपने को पूर्णता देता है। स्वयं कामनाओं से, निर्माण से मुक्त होकर निर्वाण पथ का यात्री बन जाता है।

गुलाब कोठारी

अगस्त 26, 2009

भागमभाग

जिस रंग का चश्मा
उस रंग का नजारा
पड़ोसन मेरी
बहुत सुंदर थी
आवाज भी सुरीली
लगता था
एक बार तो
दिखती रहे
दिन भर में
बहुत आकर्षण था
उसके रूप में।
पति बोले
एक दिन मुझसे
कैसे मिले शांति
उस कर्कशा से
कैसे छूटे पीछा
उस
भली मानस से
तंग आ गया
मैं तो
गलती भी तो है
मेरी ही
मैं ही
डालता था
डोरे
उसे रिझाने को
बहुत पीछा किया था
अब छटपटा रहा हूं
मैं ही
मुक्त होने को।
वो है कि
कसकर बांध दिया
मुझको
मैं अवाक था
मेरी अवधारणा
संुदरता की
हवा हो गई
वह तो चल पड़ी
किसी और के पीछे
छोड़कर सुख
बाल-बच्चों का
जो न हो सकी
अपने पति की
अपने बच्चों की
क्या होगी
किसी अन्य की ?
इस धरती पर
भोग में डूबी
आंखें
कैसे देखेंगी
धरातल
आत्मा का
नकली निकलता
24 कैरेट का
खरा सोना
18 का हो गया
14 कैरेट का
हो गया
क्या पता
मुलम्मा ही
निकले अंत में
फिर क्यों
भागता रहता है
इंसान
खोट भरने को
जीवन में
छोड़कर सुख
24 कैरेट का
प्रसाद
ईश्वर का
क्यों नहीं चाहता
भोगना
प्रारब्ध को ?
छूट नहीं सकता
भागने से
इसे तो
स्वीकारना होगा
भोगना होगा
यथार्थ मानकर
हंसते हुए।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 1, 2009

आनन्द

जिसकी जीवन भर सबको तलाश रहती है उसी को आनंद कहते हैं। सम्पूर्ण सुख-समृद्धि का सूचक शब्द है। और सृष्टि विस्तार का मूल कारक भी है। आनन्द के बिना सृष्टि नहीं हो सकती। आनन्द प्राप्त हो जाने के बाद कुछ और पाने की कामना भी नहीं रह जाती। आनन्द और सुख एक नहीं हैं। आनन्द आत्मा का तत्व है, जबकि सुख-दु:ख मन के विषय हैं। किसी भी दो व्यक्तियों के सुख-दु:ख की परिभाषा एक नहीं हो सकती। हर व्यक्ति का मन, कामना, प्रकृति के आवरण भिन्न होते हैं। अत: हर व्यक्ति का सुख-दु:ख भी अलग-अलग होता है। आनन्द स्थायी भाव है।

लोग अनेक प्रकार के स्वभाव वाले होते हैं। एक शरीर जीवी इनका सुख शरीर के आगे नहीं जाता। व्यायाम-अखाड़े से लेकर सुख भोगने तक ही सीमित रहता है। इसके आगे इनका सुख-दु:ख भी नहीं है। मनोजीवी अपने मनस्तंभ में आसक्त रहता है। कहीं किसी कला में रमा रहता है या नृत्य, गायन, वादन में। ये तो देश-काल के अनुरूप बदलते रहते हैं। हर सभ्यता की अपनी कलाएं और मन रंजन होते हैं। इनके जीवन में सांस्कृतिक गंभीरता का अभाव रहता है। इन्हीं विद्या का योग आत्मा से नहीं बन पाता। चंचल मना रह जाते हैं। प्रवाह में जीने को ही श्रेष्ठ मानते हैं। बुद्धिवादी आदतन नास्तिक बने रहना चाहते हैं। किसी न किसी दर्शन को लेकर अथवा किसी अन्य के विचारों पर उलझते ही नजर आते हैं। मनोरंजन, हंसी-मजाक से सर्वथा दूर, न शरीर को स्वस्थ रखने की चिन्ता होती है। स्वभाव से सदा रूक्ष बुद्धिमानों की कमी नहीं है। शरीर जीवियों को मन की कोमलता अनुभूतियों का कोई अनुभव ही नहीं होता। एक वर्ग स्वयं आत्मवादी मानकर जीता है। सहज जीवन से पूर्णतया अलग होता है।

मूलत: ये चार श्रेणियां हैं, जिनमें साधारण व्यक्ति जीता है और आनन्द को खोजता रहता है। खण्ड दृष्टि से अखण्ड आनन्द किसको अनुभव हो सकेगा आनन्द तो मूल मन (अव्यय मन) के साथ जुड़ा रहता है। भक्ति में आह्लादित होने जैसा है। आनन्द प्राप्ति की पहली शर्त यही है कि व्यक्ति समग्रता में जीना सीखे। उसके शरीर, मन, बुद्धि आत्मा के साथ जुड़े रहें। आत्मा से जुड़ा आनन्द तभी तो शरीर-मन-बुद्धि की अनुभूति में आएगा। योग का एकमात्र लक्ष्य भी यही है।

इसके विपरीत सुख-दु:ख मानव मन की कल्पना पर आधारित रहते हैं। इनका सम्बन्ध इन्द्रियों एवं एन्द्रिय सुख-दु:ख से ही रहता है। तात्कालिक भी होता है। किसी विषय अथवा परिस्थिति के कारण पैदा होता है और उसके साथ विदा भी हो जाता है। जब भी व्यक्ति के जीवन में समग्रता टूटती है, वह तात्कालिक सुख में ही अटक जाता है। उसके लिए सुख-दु:ख भी एक द्वन्द्व बनकर रह जाता है। गहनता तो होती ही नहीं है। क्योंकि वह पूर्ण मानव की तरह जीता ही नहीं है। अनेक पशु-पक्षी भी इन क्षेत्रों में मानव से आगे निकल जाते हैं। चाहे शारीरिक बल में हों अथवा बुद्धि के स्तर पर। मानव की श्रेष्ठता तो इनकी समग्रता में ही है।

जब किसी भी कार्य में शरीर-मन-बुद्धि और आत्मा एक साथ जुड़ेंगे, तभी व्यक्ति सुख-दु:ख के मिथक को तोड़ सकता है। शरीर और बुद्धि को तो सुख-दु:ख का अनुभव ही नहीं होता। मन को होता है, जो स्वयं आवरित होता है। बुद्धि स्वयं आवरित है। अत: जो सामने दिखाई पड़ता है, उसी के आधार पर सुख-दु:ख का ग्रहण कर लेता है। इन्द्रियों की पकड़ सूक्ष्म पर होती ही नहीं। अत: मन को बार-बार स्थूल और दृश्य पर टिकाती रहती हैं। मन पर इंद्रियों द्वारा विषय आ-आकर पड़ते हैं। चंचलता के कारण मन खुद को रोक नहीं पाता और प्रवाह में बह पड़ता है। उसी को सुख मान बैठता है।

ज्ञान के योग से जैसे ही बुद्धि में विद्या का प्रवेश होने लगता है, मन का स्वरूप बदलने लगता है। मन की भूमिका, दिशा और ग्राह्यता बदलने लगती है। अब वह भीतर की और भी मुड़ने लगता है। प्रवाह की गति धीमी होने लगती है। अब मन इच्छाओं का आकलन करके ही स्वीकृत करने लगता है। हर इच्छा को पूरी करने नहीं भागता। मन की संवेदना जाग्रत होने लगती है। यहीं से आनन्द का मार्ग प्रशस्त होता है।

जिस प्रकार किसी पात्र में भरा जल हिलता है, वैसे ही संवेदना के कारण मन में भी रस का प्रवाह बनने लगता है। यह प्रेम प्रवाह आनन्द तक पहुंचने का मार्ग है। रसानन्द और आनन्द एक ही है। रसा को ही ब्रrा कहते हैं। संवेदना के जागरण से व्यक्ति के धर्म में परिवर्तन आता है। पाषाण-मन अब पिघलने लगता है। दया-करूणा दिखाई पड़ने लगते हैं। किसी को दु:खी देकर आंसू बहने लगते हैं। यह आंसू भी उसी आनन्द का दूसरा छोर है। अधिक प्रसन्नता भी आंसू लाती है। अत्यन्त दु:ख की घड़ी में रोते-रोते भी हंसी छूट जाती है।
व्यक्ति जैसे-जैसे स्वयं को जानने लगता है, उसी क्रम में उसका बाहरी व्यवहार भी बदलता जाता है। उसके अहंकार और ममकार भी द्रवित होने लगते हैं। कल्पित सुख-दु:ख अब उसे स्पष्ट समझ में आने लगते हैं। उनके अर्थ बदल जाते हैं। मन के साथ-साथ प्राणों का व्यापार बदलता है। प्राण सदा मन के साथ रहते हैं और मन का अनुसरण करते हैं। मन की इच्छाओं का स्वरूप बदल जाता है। इनको खाना-पीना-पहनना जैसे क्षेत्रों में आसानी से देखा जा सकता है। व्यक्ति स्वचिन्तन में व्यस्त रहने लग जाता है। अब मिठास किसी अन्य स्तर पर दिखता है।

जैसे-जैसे प्राण उघ्र्वगामी होते हैं, चिन्तन के विष्ाय बदलते हैं। व्यक्ति का आभा मण्डल बदलता है। आकाश से कौन से प्राण आकर्षित होंगे, किन प्राणों का आकाश में विसर्जन होगा, यह अनायास ही सारा क्रम परिवर्तित हो जाता है। नए भावों के अनुरूप नए प्राण आते हैं। पुराने विचारों की श्रृंखला टूटने लगती है। व्यक्ति का मन अन्नमय और मनोमय कोश के आगे विज्ञानमय कोश में प्रवेश करने लगता है। प्रज्ञा जाग्रत होने लगती है। प्रज्ञा के सहारे व्यक्ति अपने सूक्ष्म स्तर को समझने लगता है। स्थूल की तरह सूक्ष्म का भी परिष्कार करने लगता है। प्रकृति के आवरणों का हटाता है। सत्व में स्वयं को प्रतिष्ठित करने का प्रयास करता है। अब तक व्यक्ति का मन इतना निर्मल हो चुका होता है कि वह प्राणी मात्र के प्रति संवेदनशील होने लगता है। मुख मण्डल पर शान्ति और प्रसन्नता का भाव सहज रूप से स्थायी होने लगता है। वैखरी, मघ्यम को पार करके पश्यन्ति में, मानसी धरातल पर जीने लगता है। बाहर जुड़े रहते हुए भी बेलाग हो जाता है। उसकी कामनाओं की श्रंखला भी टूट जाती है। मन मर जाता है। ह्वदय रूपी अक्षर प्राण-ब्रrाा-विष्णु इन्द्र का स्वरूप दिखाई देते ही एक आह्लाद प्रकट होता है। इसी के सहारे से व्यक्ति स्थायी आनन्द में प्रतिष्ठित हो जाता है।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 7, 2009

ज्ञान-कर्म-1

वेवेद शब्द विद् धातु से बना है। इसका अर्थ है ज्ञान अथवा लाभ। ज्ञान का स्वरूप निर्घारण करने से पहले ज्ञाता और ज्ञेय का निर्घारण करना पड़ता है। सम्पूर्ण विश्व ज्ञान का विषय होने से ज्ञेय कहलाता है। उसे जानने वाले को ज्ञाता कहते हैं। ज्ञाता और ज्ञेय के स्वरूप का यथावत् प्रतिपादन करने वाले साहित्य को वेद कहते हैं। वेद में सृष्टि का मूल कारण, सृष्टि प्रक्रिया तथा उसे जानने वाले का स्वरूप विवेचन मिलता है। ज्ञान के स्वरूप का निर्घारण पश्चिम में भी खूब हुआ है। वहां ज्ञेय पदार्थो का विश्लेषण, परिगणन, वर्गीकरण आदि करके जो निष्कर्ष निकाला जाता है, उसी को विज्ञान कहा जाता है। उन्होंने जिस प्राकृतिक विज्ञान का विकास किया है, उसमें सम्पूर्ण प्रकृति को विषय रूप में ग्रहीत किया गया है। ज्ञाता को विचार का विषय बनाने की आवश्यकता का अनुभव ही नहीं किया गया। ज्ञान का विशुद्ध रूप जानने के लिए ज्ञाता का स्वरूप निर्घारण भी आवश्यक है। वेद में विश्व एवं मनुष्य के यथार्थ स्वरूप को समझ पाने की क्षमता है। वेद ज्ञान देह है। ज्ञेय-ज्ञाता दोनों की बात करता है। व्यक्त-अव्यक्त, चर-अचर रूप में सारे प्राणी-पदार्थ ज्ञेय हैं।

वैदिक परम्परा में ज्ञान का अर्थ यह जानना है कि, सम्पूर्ण सृष्टि के भीतर एक ही तत्व निहित है। एक से अनेक रूप में कैसे विस्तार पाता है, इसको बताने वाला विज्ञान अथवा विशिष्ट ज्ञान कहा गया है। एको ज्ञानं ज्ञानं, विविधं ज्ञानं विज्ञानम्। ईश्वरादि किसी पुरूष विशेष से ज्ञान उत्पन्न नहीं होता। ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि ज्ञानाधीन है। ज्ञान की सिद्धि ईश्वर अधीन नहीं है। क्योंकि ज्ञान तत्व-विषयक नहीं होता, तत्व रूप होता है। साधन नहीं बनता, स्वयं साध्य ही होता है। कृष्ण ने गीता में ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञान गम्य के लिए कहा है कि तीनों सबके ह्वदय में सदा बने रहते हैं-

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं ह्वदि सर्वस्य विशिष्ठतम् । गीता 13-17
ज्ञान की उपादेयता बताते हुए मुण्डकोपनिषत् (2.2.5)
बताता है-
यस्मिन्द्यौ: पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मन: सह प्राणेp सर्वे:।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुंचथ अमृतस्यैष सेतु:।।

इसका अर्थ है-जिसमें द्युलोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष (तीनों लोक) तथा प्राण रूप सब इन्द्रियों के साथ मन भी पिरोया हुआ है, उस एक आत्मा को ही जानो। अन्य सारी बातें छोड़ो। क्योंकि अमरता प्राप्त कराने वाला सेतु यही है।

हम विज्ञान के युग में जी रहे हैं। विज्ञान का अर्थ है सृष्टि विकास का ज्ञान। बाहरी विश्व का ज्ञान। ज्ञान जुड़ा है प्रति सृष्टि से, अदृश्य क्षेत्र से। ज्ञान का माध्यम व्यक्ति स्वयं होता है। भीतर में देखता है। बाहर को जानने में उपकरण काम आते हैं। ज्ञाता का जुड़ा होना अनिवार्य नहीं होता। हमारी गतिविघियों में भीतर-बाहर दोनों ही सम्मिलित रहते हैं। मन-प्राण-वाक् बाहर से जुड़े रहते हैं। क्रियात्मक होते हैं। इनकी क्रिया का आधार अविद्या अथवा कर्म कहलाता है। आनन्द- विज्ञान-मन भीतर के ज्ञान का अंश है। इसे विद्या या ब्रह्म के नाम से कहा गया है। गीता में कृष्ण ने जीवन को ज्ञान और कर्म का संतुलन कहा है। यही जीवन के द्वन्द्व का कारण भी है। मन कभी विद्या की ओर उठता है, फिर प्रारब्ध और कर्म-फल के प्रभाव से अविद्या की ओर जाता है। विद्या का आधार धर्म है। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य को विद्या कहा है। पुरूषार्थ भी धर्म आधारित ही है (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष)।

अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष-अभिनिवेश को अविद्या कहते हैं। अविद्या ही माया का पर्याय है। अक्षर संस्था तक तो केवल विद्या भाव ही रहता है। अक्षर के ब्रह्मा प्राण से ही विष्णु और इन्द्र प्राण का रूप बनता है। शेष्ा दो प्राण अग्नि-सोम सूत्रात्मा कहलाते हैं। इनसे ही क्षर सृष्टि का तन्मात्राओं और महाभूत का निर्माण होता है। माया ही प्रकृति रूप में सृष्टि को बढ़ाती है। इसी से विश्व के भिन्न-भिन्न शरीरों का निर्माण होता है। बुद्धि और मन की अवस्थाएं बदलती हैं। मूल में सारा विकास एक ही तत्व का होता है। अहं ब्रह्मास्मि। व्यक्ति स्वयं ब्रह्म है। वही ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय है। सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान उसके भीतर है। जिस प्रकार बीज में सम्पूर्ण वृक्ष के अंग रहते हैं। हमारे पास जितना ज्ञान है, हम उतना ही सोच सकते हैं, उतना ही कर सकते है। “एकोहं बहुस्याम” ही कर्म की कारक कामना है। इसके बाद क्रिया(कर्म) और कत्ताü, इन तीन प्रकारों के योग से कर्म की प्रवृत्ति होती है। बिना कर्ता के कर्म नहीं हो सकता।
कर्म और ज्ञान के मध्य एक कड़ी है- इच्छा। यह इच्छा ही माया है। माया ही कला रूप में आदान-प्रदान का कारण बनती है। विद्या रूप में बुद्धि को विवेचना करने का सीमित अघिकार देती है। मन में राग-द्वेष पेदा करती है। काल गणना में बांधती है। नियति रूप कार्य-कारण भाव सुदृढ़ता तय करती है। यह आत्मा के मूल प्रथम आवरण (कंचुक) कहलाते हैं। देह-प्राण-इन्द्रियां बाहरी आवरण हैं। हमारा ज्ञान-क्रिया का संसार इन्हीं से ढका रहता है। अपने-अपने ग्राह्य विष्ायों को ग्रहण करते समय इन्द्रियों की ओर उन्मुख होने की अवस्था को प्रवृत्ति कहते हैं। विष्ाय को ग्रहण करके कुछ समय उसके साथ रहना “स्थिति” कहा जाता है। विष्ाय से हटकर अन्य विष्ाय की ओर चले जाना “संहार” कहलाता है। क्रिया ज्ञान की ही पल्लवित अवस्था है और ज्ञान क्रिया का ही पूर्व रूप है। अभेद ज्ञान में भेद पैदा करने वाली शक्ति को माया कहते हैं। प्रत्येक क्रिया को सिद्ध करने की क्षमता रखने वाले तथा शाश्वत रूप में स्वयं वर्तमान रहने वाले स्वतंत्र (ब्रह्म) कर्तृत्व की भाव संज्ञा है। क्रिया ही वर्तमानता है। परिणाम भाव पर निर्भर करते हैं और प्रारब्ध पर भी। इसीलिए कृष्ण कहते हैं कि कर्म फल की प्रतीक्षा मत करो। मुझे अर्पण करके आगे बढ़ते जाओ। ईश्वर की काल गणना हमसे भिन्न है।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 9, 2009

जो जागा

गलतियों का
पुतला है
आदमी।
भोलेपन में,
प्रवाह में,
आवेश में,
नादानी में,
हो सकती हैं
गलतियां।
क्या जरू री है
हर गलती का
लाभ उठाता रहे
जमाना,
कोई तो मिले
जो रोक सके
हाथों को
गलती करते समय
कोई तो दिखाए रास्ता
जीवन की सच्चाई का।
जब हाथ उठता है
गलती करने को
मन छूट जाता है
पकड़ से
तब वहां
उस माहौल में
कौन मिलेगा मनीषी
खोजता हुआ
अपने ईश्वर को
और, जो जागा,
मनीषी हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 21, 2009

ज्ञान-कर्म-3

जीवन में व्यवहार के दो धरातल हैं। एक ज्ञान प्रधान और दो, क्रिया प्रधान। ज्ञान प्रधानता में- संकल्प, निpय, अभिमान(मन, बुद्धि और अहंकार) तथा श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, आस्वादन और जिघ्रण (संूघना)-पांच ज्ञानेन्द्रियों- इन आठ इन्द्रियों के कार्य शामिल रहते हैं। क्रिया की प्रधानता में पांच कर्मेद्रियां-पाद, हस्त, जिह्वा, पायु और उपस्थ होती हैं। ये सभी 13 इन्द्रियां स्वयं में अचेतन हैं। माया शक्ति के स्पन्दन ही इनकी चेतना बनते हैं। माया ही इन्द्रियों को विष्ायों की ओर मोडती है तथा माया ही कार्य करने की स्वंतत्रता देती है। माया किसको कह रहे हैं। ब्रह्म उस पदार्थ का नाम है जो आकाश में उपलब्ध है। उसकी शक्ति जो अखण्डता को खण्ड-खण्ड करके विभिन्न स्वरूप बनाती है, उसे माया कहते हैं। ब्रह्म के शरीर में होने वाले सूक्ष्म स्पन्दन ही माया हैं। स्पन्दन में दोनों ओर गति होती है-भीतर भी और बाहर भी। इसी को प्रसार-संकोच अथवा अहं-विमर्श भी कहते हैं। ब्रह्म को अहं और विमर्श रूप विश्व को इदं कहा है। माया ही ब्रह्म से बिन्दु,नाद,भुवन,भाव आदि का निर्माण करती है। पदार्थ रूप में अव्यय, अक्षर, क्षर और पंच महाभूतों की जनक है। शब्द रूप में स्वर, व्यंजन, पद आदि बनाती है। सारी क्रियाएं स्पन्दन रूप में चलती हैं। हमारे शरीर का निर्माण, बुद्धि और मन की क्रियाएं सभी इसी स्पन्दन से चलती हैं। अत: बाहर हम भिन्न-भिन्न होकर भी भीतर एक ही हैं।
ध्वनि की एक अन्य विशेष्ाता है कि यह वर्तुलाकार आगे बढती है। आपके मुंह से निकला हुआ शब्द हर व्यक्ति और पदार्थ से गुजरता है। उसको प्रभावित करता है। आप भी हर ध्वनि से प्रभावित होते हैं। कोई भी इसके प्रभाव रूप से बच नहीं पाता। मान लीजिए, आप किसी का अहित करने की सोचकर कोई कार्य करते हैं। इसमें आप और आपकी इच्छा, क्रिया और भाव जुडे हैं। उनके स्पन्दन बाहर निकलते हैं। जब यह उस व्यक्ति के पास पहुंचेंगे, तब उसके स्पन्दन इनका विरोध भी करेंगे। यदि उसके प्रारब्ध में अहित नहीं लिखा है, तब यह स्पन्दन उससे टकराकर आपके पास ही लौटेंगे। विशेष कर जब वह व्यक्ति आपका अहित न चाहता हो। आपके स्पन्दन और कर्म से जुडे भाव नए स्पन्दनों का, नए भावों का निर्माण करेंगे। आपका ज्ञान क्या मार्ग पकडता है, आपके मन का संकल्प किस दिशा में जाना चाहता है, आपका अपनी प्रतिक्रियाओं पर कितना नियंत्रण है(चित्त निरोध), उसी के अनुरूप मन में इच्छा पैदा होगी। जो कर्म अहित करने के लिए आप कर चुके, वे आपका भी उतना ही अहित, उसी दिशा में करेंगे। ‘ताको फूल के फूल हैं, वाको है त्रिशूल’ ही चरितार्थ होता है। हितकारी स्पन्दन व्यक्ति के मन को छू लेते हैं। उसके भाव स्वत: ही आपके प्रति आकर्षण पैदा करते हैं। आप किसी अपरिचित शिशु के पास खडे होकर उसके प्रति स्त्रेह के भाव सम्प्रेषित करें। कुछ ही देर में वह आपको अपना लगने लगेगा। आपके साथ खेलने लगेगा। उसका शरीर भले छोटा है, किन्तु आत्मा वैसी ही है जैसी आपकी है। आप उसको देव मानकर पूजा करके देखिए। आपका स्वयं का मन देव तुल्य हो जाएगा। बच्चों के परिवर्तन तुरन्त दिखाई पडते हैं। बडों के परिवर्तन कभी सही होते हैं, कभी झूठे निकल जाते हैं। आप कुछ कहना चाहते हैं। कहने से पहले भीतर की प्रक्रियाओं को देखिए। कहने की इच्छा का और कहने के प्रभावों का आकलन करके देखिए। कैसे इच्छा से प्राणों में हरकत आती है, कैसे प्राण नाभि से ऊपर उठकर शब्द बनते हैं, कैसे श्वास भीतर पहंुचकर दिशा बदलती है, कैसे ध्वनि निकलती है यह सारा परिवर्तन कैसे आपके मनोभावों के साथ बदलता है। भाव हमारे कर्मो का बीज है। वैसा ही हम वृक्ष लगाते हैं। फल भी उसी अनुरूप लगते हैं। बीज कडवा या विषैला है तो दूसरों का भी अहित करते हैं और कर्म फल के रूप में अपनी जमीन को भी विषाक्त करके उजाडने का उपक्रम करते हैं। विद्या ही इस अज्ञान अथवा अविद्या के प्रभाव को निरस्त करके हमारे कर्मो को पवित्र करती है। जहां भी कर्म के साथ विद्या का योग रहता है, वहीं बुद्धियोग रहता है।
इस विश्व में केवल माया ही कर्ता रूप है। उसकी स्वतंत्रता को कोई नियंत्रित नहीं कर सकता। उसका नाम ही स्वतंत्र कर्तृत्व है। वही हर कर्ता की वर्तमानता है। यही शक्ति रूप भाव विश्व के अणु-अणु को सत्ता प्रदान करने वाला चैतन्य है। प्रत्येक जड और अजड भावों का ह्वदय है। इसका कार्य रूप तो त्रिगुणात्मक प्रकृति है। सत-रज-तम से मन-बुद्धि-अहंकार बनते हैं। यही हमारी जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्था है। हमारा अन्त:करण (मन-बुद्धि-अहंकार) ही चित्त रूप है। इसके साथ पांच तन्मात्राएं जुडकर सूक्ष्म शरीर का निर्माण करती हैं। यह भाव रूप है। पांच तन्मात्राएं – शब्द, रस, गंध, तेज और स्पर्श। इसी के भीतर कारण शरीर होता है, जिसके ह्वदय रूप ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र अक्षर प्राण होते हैं। सूक्ष्म और कारण शरीर सदा साथ रहते हैं, मुक्ति तक। माया के कारण ही तन्मात्राएं ज्ञानेन्द्रियों से जुडती हैं। पांचों कर्मेन्द्रियों से जुडती हैं। तन्मात्राएं ही स्थूल पांच महाभूत बनती हैं। त्रिगुण के कारण मन में भी संकल्प-विकल्प उठते रहते हैं। मन का सुख, बुद्धि का दु:ख और अहंकार की मूढता भी माया के स्पन्दनों से ही प्रकट होती है। अत: सुख-दु:ख पैदा करना और उनको भोगना दोनों ही कार्य माया के ही हैं। कार्यता और कतृüत्व, भोग्य और भोक्ता। अस्तित्व रूप में भाव कार्य करते हैं।
आत्म उन्नति के मार्ग में विकल्प संस्कार अर्थात् अपनी भावनाओं का परिष्कार करना ही मूल प्रयत्न है। प्रतिकूल दिशा में प्रवाहमान विकल्पों को परम्परा का मार्ग बदलकर बलपूवर्क, स्वरूप चिन्तन की अनुकूल दिशा में लगाने से स्वयं ही विकल्पों का संस्कार हो जाता है। यही चित्त निरोध है। इसके लिए संकल्प की दृढता, सद्विचार, अटल श्रृद्धा और आत्म शक्ति की तीव्रता चाहिए। माया के स्पन्दन ज्ञान रूप में अन्त:करण में कार्यरत रहते हैं और क्रिया रूप में पांच स्थूल प्राणों (प्राण-अपान, उदान, समान और व्यान) के रूप में। प्रत्येक मंत्र इन्हीं प्राणों के सहारे उस स्पन्दन रूप आत्मबल से तादात्म्य प्राप्त करने के लिए किए जाते हैं। जिस प्रकार इन्द्रियां संकल्प मात्र से अपने-अपने कार्यो को सिद्ध कर लेती हैं उसी प्रकार मंत्र भी मन चाहे कार्य को अधिकार पूर्वक सिद्ध करने में प्रवृत्त होते हैं। सृष्टि का विस्तार शब्द के साथ ही चलता है। आन्तर शब्दना को परा-वाणी कहते हैं। इसी में स्थूल वाचक और वाच्य शब्द राशि गर्भ में रहती है। वैखरी रूप स्थूल ध्वनियों की पृष्ठ भूमि में भी वही आन्तर विमर्श ही कार्य करता है। अत: मुख से उच्चारित ध्वनियां विचित्र प्रवाहों को उत्पन्न कर सकती हैं। मायाशक्ति के कारण ही साधारण वर्ण भी कल्पनातीत हलचल पैदा कर सकता है। फिर मंत्र क्यों नहीं कर सकता मंत्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही अन्तर्निहित रहता है। पहले चित्त को निर्मल करना मौलिक आवश्यकता है।
विकल्पों का संस्कार करने से भावनाएं निर्मल होती हैं। मन में ‘शुद्ध विद्या’ का उदय होता है। यह शुद्ध विद्या तत्व ईश्वर से नीचे और माया से ऊपर एक अन्तरावर्ती तत्व है। वह यहां अभिप्रेत नहीं है। विद् लाभे, विद् ज्ञाने, विद्-विचारार्थक। विद्या। विद्या से शिव धर्मो का लाभ, विचार पैदा होना कि मैं अनादि धर्मा हूं, मैं स्वयं ही शक्ति केन्द्र शिव हूं। यही उन्मना(उन्मेष) अवस्था है। यही कारण है कि मंत्र का उच्चारण करते ही चित्त, मंत्र और मंत्र के देवता की सघन एकाकारता हो जाती है। तब वह वर्ण न रहकर एक अमोघ शक्ति बन जाता है। शरीर में कार्यरत सभी विषय या तो भूतात्मक होते हैं अथवा भावात्मक। भूतात्मक सारे विषय पंच महाभूतों से बने होते हैं। भावात्मक विषय आकार रहित संवेदनात्मक हैं- सुख, दु:ख, धर्म आदि। (समाप्त)
गुलाब कोठारी

अक्टूबर 1, 2009

भावनात्मक विकास

 समाज की इकाई है—परिवार और परिवार की इकाई है—व्यक्ति। व्यक्ति अच्छे होंगे तो परिवार भी अच्छा होगा। समाज भी अच्छा होगा और राष्ट्र भी उन्नत होगा। इसीलिए परिवार को बच्चे का पहला स्कूल कहते हैं। बच्चा परिवार के साथ-साथ अपनी धरती की संस्कृति से जुड़ता है। परिवार में ही जीवन संघर्षो का सामना करना सीखता है। उसका भावनात्मक विकास होता है। ये घटक ही आगे चलकर उसके व्यक्तित्व को समाज में स्थापित करते हैं। भावना और वासना, ये मन की दो महत्वपूर्ण अवस्थाएं हैं। ज्ञान के द्वारा मन में जमे हुए संस्कार को भावना कहते हैं तथा कर्म के द्वारा मन में जमे हुए संस्कार को वासना कहते हैं। वासना को रोकने का विधान है जबकि भावना को बढ़ाने का विधान है। बच्चा परिवार में पांच-छ: साल की उम्र से ही सीखना शुरू कर देता है। अनुभव तो उसे पहले ही होने लग जाते हैं। वह उनको अलग ढंग से अभिव्यक्त करता है। उसका आस-पास का वातावरण सीमित ही होता है और विषय भी। यह उसके निजी विकास का काल है। जब बच्चा कुछ समझने लायक होता है तो दादा-दादी, नाना-नानी उसे कहानियां सुनाना शुरू कर देते हैं। बच्चा बड़े चाव से सुनता है। इन कहानियों का आधार लालित्य और माधुर्य होता है। जिस भावनात्मक वातावरण और स्नेह के साथ ये कहानियां कही जाती हैं, यही इनका महत्वपूर्ण पहलू है। किन्तु, आज इसको ही सबसे कम महत्व दिया जाता है। जबकि बच्चों में भावनात्मक विकास का आधार इसी उपक्रम से तैयार किया जा सकता है और वह भी इसी कच्ची उम्र में। इसी आधार पर बालक आगे मिलने वाले ज्ञान को ग्रहण करता है और अपने संस्कार अर्जित करता है। जिस बच्चे के पास यह भावनात्मक आधार नहीं है, वह जीवन के संघर्ष नहीं झेल सकता। पढ़ाई में अच्छा हो सकता है, बड़ा व्यवसायी या अधिकारी भी बन सकता है, किन्तु भावनात्मक संस्कार का धरातल उसका निर्बल ही रहेगा। पूरा पाश्चात्य समाज इसका ज्वलन्त उदाहरण है। आज शिक्षा ने युवकों को नौकरी में धकेलकर संयुक्त परिवार को छिन्न-भिन्न कर दिया है। बच्चे से उसके दादा-दादी और नाना-नानी छीन लिए। अब इतना समय और किसी के पास नहीं है। स्कूल में इस प्रकार के विषयों का स्थान ही नहीं रहा। वहां तो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ही आकलन के आधार रह गए। घर पर “होम वर्क” के आगे मानो शिक्षा ही समाप्त हो गई। बच्चों को छोटे से घर में खेलने के लिए न तो स्थान उपलब्ध है, न ही दूसरे बच्चे। ले-देकर आज टेलीविजन का प्रवेश एक अध्यापक की तरह हो गया है। इसी के आधार पर आप परिवार को पहला स्कूल कह सकते हैं। यही तय करता है कि बच्चा क्या सीखेगा? बड़ा घाटा तो बच्चे का आधारहीन होना है। भावनात्मक दृष्टि के बिना व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण इसलिए नहीं होता कि जहां उसकी दृष्टि जानी चाहिए वहां जाती ही नहीं, क्योंकि भावनात्मक संस्कार जम ही नहीं पाए हैं और न सिखाए गए हैं। अच्छी नौकरी अथवा कमाई का अर्थ अच्छा व्यक्तित्व कभी नहीं हो सकता। इसका एक अन्य प्रभाव भी पड़ता है। भावनाएं व्यक्ति को जीवन-संचालन की दृष्टि देती हैं। उसके पिछले जन्म के संस्कारों के कारण भी भावनाओं के कुछ अंश उस व्यक्ति में आते हैं। भावनात्मक विकास होने पर वह अपने अच्छे-बुरे संस्कारों का आकलन करके जीवन की दिशा तय करता है। बुरे गुणों का बहिष्कार करता है। अपने व्यक्तित्व में नया निखार पैदा करता है। समाज और राष्ट्र के लिए एक स्तम्भ के रूप में तैयार हो जाता है। इसके विपरीत, भावनात्मक विकास के बिना उसके विचारों में विशेष परिवर्तन नहीं आ पाता। अच्छे-बुरे सभी तरह के विचारों का पोषण उसमें समान रूप से होता है। बुरे विचार उसके मन को प्रभावित करते हैं और अन्तत: शरीर में रोग रूप में प्रस्फुटित होते हैं। शरीर का ग्रंथि-स्त्राव केवल वासनाओं से ही चलता है। बुरे संस्कार धीरे-धीरे ऎसे रसायन पैदा करते हैं कि कालान्तर में बड़ा रोग जड़ें जमा लेता है। जिस प्रकार क्रोध, चिन्ता आदि से रोग होते हैं, उसी प्रकार भावनात्मक निर्बलता और वासनात्मक प्रबलता भी बड़े रोगों का निमित बनती हैं।

वेदना के नश्तर

लता मंगेशकर का नाम स्वयं में एवरेस्ट शिखर है। गायकी का पर्यायवाची बन गई हैं। करोडों लोग जिसकी प्रशंसा करते नहीं थकते और ईष्र्या करने वाले भी इतने ही होंगे। उनके साक्षात्कार की एक पंक्ति ने आत्मा को झकझोर दिया। ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’। जीवन के 80 वर्ष पार करके, सफलता की हिमालय जैसी ऊंचाइयो को नाप लेने के बाद, आज उनके मुंह से निकली यह पंक्तियां नश्तर से भी गहरी चुभने वाली हैं। आम नारी के ह्वदय की वेदना, उसकी पीडा को व्यक्त करने वाली हैं। इनमें छिपे 80 वर्ष के न जाने कितने अनुभव देश की सभ्यता और संस्कृति को चांटे मार रहे हैं। यह वक्तव्य इस बात का भी प्रमाण है कि साठ साल की आजादी के बाद हमने क्या हासिल किया। कन्या शिक्षा, नारी शक्ति योजनाएं, आरक्षण और न जाने क्या-क्या बहाने ढूंढे, नारी के नाम पर शोषण के। हमारे देश के कर्णधारों को इस बात से कुछ शर्म आएगी, पता नहीं। और जब इनकी यह कहानी है तो साधारण महिला तो नर्क में ही जी रही होगी। दरिन्दों के बीच। मुझे तो यह भी लग रहा है कि राजस्थान के सिर पर जो कन्या भ्रूण हत्या का टीका लगा हुआ है, लताजी का कथन इसी का साक्षी है। एक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है, दूसरी सामाजिक।<br /><br />कल ही समाचार पढा था कि आठ माह में राज्य में महिलाओं के प्रति अपराध 18.5 प्रतिशत बढे हैं। बलात्कार भी बढे हैं। लगता है कि कोई आदमी किसी औरत को हंसते हुए देखना ही नहीं चाहता। उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि औरत के साथ धरती भी रोती है। संस्कृति और सभ्यता भी रोती है। वह चाहेगी तब तक ही आदमी हंस पाएगा।<br /><br />गहराई से देखें तो इसका कारण भी स्वयं स्त्री ही है। विश्व भर में। वह लडके की तरह जीना चाहती है। पत्नी और मां बनने की सीख अब नहीं लेती। उसका प्रभुत्व घर में जिन कारणों से रहा करता था, लुप्त हो गया। कहते हैं कि शरीर की पकड नौ साल, दिमाग की पकड दो साल। उसके बाद सुख कहां<br /><br />लताजी की वेदना में सामाजिक चिन्तन पर भी बडा प्रहार है। जिस प्रकार के परिवेश से लताजी गुजरीं, जिस प्रकार विवाह के संघर्ष में असफल हुई, ईष्र्याजन्य आरोपों से सदा घिरती रहीं, तब लगता है कि सुख को न धन से, न ही पद से खरीदा जा सकता है। वे छोटे परिवार में भी सुख से रह सकेंगी, यदि अगले जन्म में लडका बन पाई। शक्ति पूजा करने वाले देश को इससे बडा कौन सा अभिशाप लग सकता है सौ करोड की आबादी के देश में आधी दुनिया देश को जीने लायक ही नहीं मान रही। अपमान, संघर्ष और अपमान! जबकि देश की राष्ट्रपति स्वयं एक महिला हैं।<br /><br />गुलाब कोठारी

अक्टूबर 5, 2009

षोडशी-2

षोडषी अथवा स्वीट सिक्सटीन की अवधारणा इसलिए महत्वपूर्ण है कि जन्म के बाद प्रतिवर्ष एक-एक कला का पूर्ण विकास होता है। सोलह वर्ष में सभी सोलह कलाएं पूर्ण विकास को प्राप्त कर लेती हैं। एक और तथ्य महžवपूर्ण है कि इस षोडषी पुरूष में तीन पुरूष रहते हैं- अव्यय, अक्षर और क्षर। इसमें अव्यय आलम्बन है, किसी कार्य-कारण भाव में नहीं आता। अक्षर निमित्त कारण है। अक्षर पुरूष स्वयं समष्टि रू प है। उसमें से व्यष्टि भाव में जीव और जड प्रादुर्भूत होते हैं। अत: अक्षर पुरूष ईश्वर कहलाता है। स्वयं अव्यक्त है, अदृश्य रहता है। ये अतिसूक्ष्म तत्व जब घनभाव में आता है तब यही व्यक्त होकर क्षर पुरूष कहलाता है। विश्व क्षर रू प है। इसको ये अक्षर गतिमान रखता है। क्षर पदार्थ के स्वरू प से जुडा हुआ समवायी कारण है।

जगत की सत्तारू प प्रतिष्ठा के प्रतिष्ठाता ब्रम्हा हैं। यज्ञादिष्ठाता विष्णु हैं। अग्नि स्थानीय ईंधन इन्द्र हैं। अग्नि का कार्य वस्तु को पैना करके उसके अवयवों को तोडकर तीखा बना देना है। सोम पदार्थ को स्निग्ध करता है। विरल अवयवों को संकोचन करके घन बनाता है। अव्यय की पांच कलाएं आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण और वाक् आमोद, प्रमोद, ज्ञान, विज्ञान, चेतना, शक्ति, प्राणों एवं वाणी के नियामक पंचकोश के रू प में स्थित रहती हैं।
पिप्पलाद ऋषि ने आत्मा को षोडषी कहा है यानी यह सोलह कलाओं वाली है। ये कलाएं हैं- प्राण, श्रद्धा, पृथ्वी, आप, अग्नि, वायु, आकाश, इन्द्रिय, मन, अन्न, अन्न से उत्पन्न वीर्य, तप, मंत्र, लोक, नाम और कर्म। जैसे रथ के चक्र की नाभि में चारों ओर अरे जुडी रहती हैं वैसे ही इस पुरूष में ये 16 कलाएं चारों ओर ठहरी हुई हैं। ये कलाएं आत्मा में उत्पन्न होकर उसी के चारों ओर फैली हुई, उसी आत्मा में लीन हो जाती हैं। जैसे कई नदियां समुद्र में लीन होकर अपना नाम-रू प खो देती हैं वैसे ही पुरूष में लीन होने पर इन सोलह कलाओं के नाम-रू प भी नष्ट हो जाते हैं। केवल यह शुद्ध आत्मा ही रह जाता है।

आधुनिक पश्चिमी वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शरीर में भी प्रमुखत: सोलह तत्व हैं- आक्सीजन, हाइड्रोजन (यद्रुजन यानी बहती हुई), नाइट्रोजन (नक्तद्रुजन या स्याही), कार्बन (अंगार या कोयला), सल्फर (गंधक), फास्फोरस (पस्पर्श), सोडियम, पोटेशियम, कैलशियम, मैग्नीशियम, लीथियम, फ्लोरीन, क्लोरीन, आयोडीन, सिलीकॉन (शिलाकण) और आयरन यानी लौह तत्व। शरीर में अस्थि, मांस, मज्जा, रक्त, त्वचा, वसा, शुक्र आदि पदार्थ इन्हीं 16 तत्वों के आवाप (कुछ मिलाना) और उद्वाप (कुछ निकालना) से बनते हैं।

आत्मा के दो भेद हैं- ईश्वर प्रजापति रू प और जीव प्रजापति रू प। षोडष कला युक्त जीव प्रजापति रू प आत्मा में 18 व्यावहारिक आत्मा होती हैं। इनमें तीन वर्ग अमृतात्मा, ब्रम्हात्मा और शुक्रात्मा हैं। अमृत वर्ग की चार, ब्ा्रह्म वर्ग की पांच और शुक्रवर्ग की 9 आत्मा समझनी चाहिए। अमृतात्मा में परात्पर विवर्त का भाव अभयात्मा कहलाता है। अव्यय का आलम्बनात्मा, अक्षर का नियन्तात्मा और क्षर का भाव परिणाम्यात्मा कहलाता है। ये पुरूष आत्मा अमृतमय हैं।

इसके आगे ब्रम्हा के विकास में आत्मा का विवर्त प्राण, आप, वाक्, अन्न और अन्नाद के रू प में होता है। आत्मा के भाव प्राण का शांतात्मा, आप का महानात्मा, वाक् का विज्ञानात्मा, अन्न का प्रज्ञानात्मा और अन्नाद का आत्म भाव प्राणात्मा कहलाता है।

तीसरे वर्ग शुक्रात्मा में शरीरात्मा साधारण अग्नि रू प में है। हंसात्मा वायुरू प में है। दिव्यात्मा इन्द्र है जो वैश्वानर कहलाता है, अग्नि है। चौथा दिव्यात्मा ही, इन्द्र ही तैजसात्मा वायुरू प में है। पांचवां प्राज्ञ इन्द्र कर्मात्मा के रू प में है। छठा चिदाभास ज्योतिर्मय है। सातवां चिदात्मा साक्षात है। यही इष्टदेव कहलाता है। यह चेतना ज्ञानमय तत्व है, उसी को विभूति कहते हैं, ब्ा्रह्म भाव में है। फिर आठ और नवां शुक्रात्मा है- श्री और ऊर्क यानी ऊर्जा। श्री विड् भाव में और उर्जा क्षत्र भाव है।

कर्मरू प आत्मा वासनामय है। इस 16 कलाओं वाले कर्म पुरूष के 16 गुण सुश्रुत शारारीक में बताए गए हैं। ये सोलह गुण हैं-सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, बुद्धि, मन, संकल्प, विचारणा, स्मृति, विज्ञान, अध्यवसाय और विषय की उपलब्धि।

एक ही तत्व का 16 स्वरूप में बदलने का कार्य माया के द्वारा निष्पन्न होता है। माया का यह योग तीन प्रकार का होता है। इन्हें योग, बन्ध और विभूति कहते हैं। जहां भी रस (ब्रम्हा) अथवा अमृत की प्रधानता होती है, उसे विभूति संसर्ग कहते हैं। कर्म की प्रधानता होने पर यह बन्ध माना जाता है। विभूति और बन्ध की समता को योग कहते हैं। जहां दो के संयोग से तीसरा नया पैदा होता है और दोनों पुराने नहीं रहते, इसी का नाम बन्ध है। जल और वायु के संयोग होने पर न जल रहता है, न ही वायु। फेन बन जाता है।

तृण रूप घास खाने से गाय के शरीर में दूध बनता है। तृण दूध के भाव में बन्ध जाते हैं। गाय के शरीर की जठरागिA ने उन तृणों को दूध रूप में परिणत कर दिया। यह अगिA का विभूति सम्बन्ध है। इसी प्रकार आत्मा भिन्न-भिन्न विधाओं में भोक्ता बनता है। जो भोग्य पदार्थ आत्मा के लिए उपलब्ध होते हैं, वे वृत्तिता संसर्ग से होते हैं। ये भी अमृत एवं मृत्यु रूप तीन प्रकार के आसक्ति, उदार और समवाय रूप होते हैं। ये एक-दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं। परिवर्तन भी स्वाभाविक ही होता है। ब्रह्म के साथ जुडते ही बल/माया में असाधारणता आ जाती है। वायु की भिन्न-भिन्न गतिभाव के बाद भी आकाश तो निर्लेप ही रहता है। तीनों वृत्तिता संसर्ग कर्म सम्बद्ध आत्मा में कर्म रूप माया बल के कारण प्रवृत्त होते हैं।

अपने निज रूपेण रस रूप आत्मा और बल रूप शक्ति का एक रूप ही है। उन दोनों में भेद व्यवहार, रस के विभूति, बंध, योग सम्बन्ध से तथा बल के उदार, समवाय, आसक्ति संसर्ग से होता है। इसी कारण समस्त पदार्थो में भेद पैदा होता है। यह कैसे पैदा होता है और अन्त में कहां चला जाता है, यह नहीं जाना जा सकता। जो दिखाई पडे और जाना न जा सके उसी को संसार में माया कहते हैं। कार्य रूप में अचानक दिखाई पडे और उसका कारण समझ में नहीं आए। माया भी माया, महामाया और योग माया रूप में कार्य करती है।

रस और बल के परस्पर सम्बन्ध में जहां रस की प्रधानता हो, वहां तीन पुरूष (अव्यय, अक्षर, क्षर) का प्रादुर्भाव होता है। जहां बल या शक्ति की प्रधानता हो, वहां प्रकृति का प्रादुर्भाव होता है। पुरूष में मन-प्राण-वाक् मुख्य तत्व होते हैं। शक्ति स्वरूप में सत-रज-तम मुख्य तत्व रहते हैं। इनसे ही महत्, अहंकार और तन्मात्राएं पैदा होती हैं। इनमें एक-एक पुरूष का एक-एक शक्ति से सम्बन्ध रहता है। रस के व्यापक धर्म ज्योति, विधृति (धारण करना) और प्रतिष्ठा हैं। बल प्रधान शक्ति के तीन रूप हैं-अशनाया (भूख), विक्षेप और आवरण। प्रवाह रूप बल जब स्थिर-सा बन जाए, तब वह आवरण हो जाता है।

शैव शास्त्रों में जो माया का वर्णन है वह भी समान संकेत ही करता है। परमेश्वर की शक्ति को यहां स्वातं˜य शक्ति कहा है। इसके स्पन्दन पांच रूपों में होते रहते हैं। चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ये ही परम ईश्वर के सर्वकतृüत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व, और व्यापकत्व कहलाते हैं। परमेश्वर (अनुत्तर तत्व) इसी शक्ति पंचक के सहारे सृष्टि, स्थिति, संहार पिधान और अनुग्रह रूप कार्य हर क्षण करता रहता है। यही शक्ति पंचक आगे चलकर विद्या, कला, राग, काल और नियति रूप में बदल जाता है। माया तत्व के साथ मिलकर आत्मा का षट् कंचुक रूप आन्तरिक आवरण बनाता है। मोक्ष होने तक यह भी जन्म-जन्मान्तरों में आत्मा का अंग बना ही रहता है। देह, प्राण, पांच ज्ञानेन्द्रियों, पांच कर्मेन्द्रियो को बहिरंग आवरण या स्थूल शरीर कहते हैं। इस शरीर की आकृति, प्रकृति और अहंकृति षोडशी पुरूष के स्वरूप पर निर्भर करती है। सम्पूर्ण जगत यूं तो षोडशी है, किन्तु कर्म भेद के कारण भिन्नता लिए रहता है।

गुलाब कोठारी

अक्टूबर 7, 2009

किसके साथ

पशुभाव है
कर्म
ज्ञान के बिना
ज्ञान भी
बन जाता है
विष
बिना उपयोग के।
पैदा किसने किया
अज्ञान को
कौन करता है
इसको विकसित
फिर भी होता है
बहुत बडा
ज्ञान से
असीम-अनंत।
सर्वाधिक त्रस्त
होते हैं ज्ञानी ही
अज्ञान से
ज्ञान के अहंकार से
दुत्कारते हैं
अपने ही कर्मोü को
आगे चलकर
साहस नहीं होता
स्वीकार करने का।
जैसे कि
मुझे पसंद आई
एक लडकी
प्यार हो गया
मन भी
तैयार हो गया
करने को शादी
लगने लगी
सबसे सुंदर
दुनिया भर में
भाती नहीं
कोई भी दूसरी
जवाब दे दिया
बुद्धि ने भी
हम मान गए।
मान गए
मां-बाप भी
दोनों के
वे तो
करते भी क्या
बस गया
घर हमारा
सुंदर-सा।
कुछ काल बाद
गूंजने लगी
किलकारियां
देर कहां लगती है
गुजर जाने में
अच्छे दिनों को,
और फिर
शुरू हो गए
विवाद-संवाद
नित नए तेवर
नित नए विषय
कभी पीहर
कभी ससुराल
कभी बच्चे
सूखने लगे कंठ
पछताने लगा मन।
सुना था
शादी के लaू
खाओ और पछताओ
नहीं खाओ
तो भी पछताओ।
पडने लगा भारी
हर दिन
कटती नहीं रातें
होने लगा
बीमार, शरीर भी
चिंतित हो उठे
परिजन-स्वजन
फिर एक दिन
तय कर लिया
अलग होना
दोनों ने।
लगा, मिल गया
मार्ग
सुखी रहने का।
पिताजी ने पूछा
विश्व सुंदरी
आज बन गई है
विष-कन्या
किसके साथ रहकर
वाह, रे ईश्वर
जड दिया
मेरे ही गाल पर
उठा,
लगा दिया सिंदूर
फिर से
पत्नी के भाल पर।

गुलाब कोठारी

अक्टूबर 12, 2009

उलूक

उलूक यानी उल्लू, लक्ष्मी का वाहन। जो लक्ष्मी के साथ रहकर भी अंधेरे को प्रकाश मानकर विचरण करे, वही उल्लू। हम लक्ष्मी प्राप्ति के लिए पूजा-पाठ और अनुष्ठान करते हैं। कृष्ण कहते हैं कि ईश्वर जिससे रूष्ट होता है, उसे अथाह धन-सम्पदा, समृद्धि देता है। ताकि वह ईश्वर को याद ही नहीं करे। हम भी लक्ष्मी को पाकर ईश्वर को भूल जाना चाहते हैं। लक्ष्मी जिस पर सवारी करे, वही उल्लू। जीवन का यह कैसा विरोधाभास है। लक्ष्मी का त्यौहार भी अमावास की काली रात में। और हम इसी में ढूंढते हैं जीवन का प्रकाश।

उलूक शब्द का अर्थ करें- उ = उधर, लू = ले जाना, क = शक्तिपूर्वक। उधर का भावार्थ हुआ स्वयं से दूर। जो जबरदस्ती खींचकर स्वयं से, आत्म प्रकाश या ईश्वर से दूर ले जाता हो। आत्मा चेतना का नाम है, लक्ष्मी अर्थ (पदार्थ) या जड का नाम है। व्यक्ति एक ही दिशा में तो चल सकता है। या तो गति चेतन की ओर रह सकती है, या फिर जड की ओर। लक्ष्मी की ओर जाना ही जड की ओर, चेतना से दूर जाना है। और इसी के वाहक को उल्लू कहते हैं। इस मति का नाम ही उल्लू है। यह कोई पक्षी का नाम नहीं है। लक्ष्मी के प्रभाव में हमारी बुद्धि उल्लू जैसे कार्य करने लग जाती है। अज्ञान के अंधकार को जीवन का प्रकाश मानने लगती है। भौतिक सुखो की चकाचौंध में रमण करने लग जाती है। अहंकार उसमें आसुरी वृत्तियों का प्रवेश करता जाता है। जीवन को अंधकार में ले जाने का यह क्रम आगे से आगे बढता ही जाता है। तब निश्चित ही है कि लक्ष्मी का वाहन उल्लू होना वाजिब ही है।

लक्ष्मी का अंधेरे के साथ भी गहरा जुडाव है। लक्ष्मी विष्णु की पत्नी है। विष्णु क्षीर सागर में रहते हैं। यह परमेष्ठी लोक है, सोम लोक है। इसी में गौ लोक है। कृष्ण सोम वंशी हैं। काले हैं। सृष्टि का नियम है कि अग्नि में सोम की आहुति से यज्ञ चलता है। अत: सोम को अन्न का पर्यायवाची कहा गया है। सारी अर्थ सृष्टि सोम रूपा लक्ष्मी से उत्पन्न होती है। अग्नि सोम का भक्षण कर लेती है। सोम दिखाई नहीं पडता। जो कुछ दिखाई पडने वाला स्वरूप है, सम्पूर्ण सृष्टि में, वह अग्नि का ही प्रकट स्वरूप है। हमारा शरीर भी अग्नि रूप है। इसमें निरन्तर अन्न की आवश्यकता रहती है। तभी हमारी सृष्टि का भी संचालन होता है। दिन में सूर्य की तपन से सोम की कमी सम्पूर्ण जगत में व्याप्त होती रहती है। रात्रिकाल में आकाश द्वारा उसी सोम की वर्षा होती है। कमी को पूरा किया जाता है। सोम से निर्माण और पोषण भी। यही विष्णु का कार्य है। उसी को वेदों में यज्ञ पुरूष कहा गया है। सोम के बिना यज्ञ संभव ही नहीं है।

हमारा शरीर भी प्रकृति दत्त है। इसका निर्माण और पोषण भी सोम से होता है। दिन में खर्च हुआ सोम रात्रि को हमारी थकान भी दूर करता है। नई शक्ति देता है। इसी शक्ति को लक्ष्मी कहते हैं। जिसे हम अन्न कहते हैं, वह केवल हमारा भोजन ही नहीं है। हमारी सारी भोग्य सामग्री हमारा अन्न कहलाती है। हम सब एक-दूसरे का अन्न हैं। आप मेरे लिखे हुए को पढ रहे हो, मुझे भोग रहे हो। ये विचारों का अन्न है। इसी प्रकार मन का अन्न होता है। सारे अन्नों का निर्माण लक्ष्मी करती है। धन भी एक प्रकार का अन्न ही है।
परमेष्ठी लोक जिस प्रकार सोम लोक कहा गया है, वैसे ही पितर प्राणों का लोक भी यही है। सोम और पितर प्राण दोनों ही हमको चन्द्रमा से प्राप्त होते हैं। परमेष्ठी लोक हमारी सृष्टि का चन्द्रमा है। हमारी पृथ्वी का चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर लगाता रहता है। सोम और पितर प्राणों की आपूर्ति करता है।

रात्रिकाल में बरसने वाले सोम से ही औषध और अन्न पैदा होते हैं। पृथ्वी पर भी और अन्तरिक्ष में भी। फल पकने के बाद जिसका पेड/पौधा नष्ट हो जाए, उसे औषघि कहते हैं। जिसका पेड बच जाए, वह वनस्पति कहलाता है। इसी अन्न के जरिए पितर प्राणों की और सोम की आपूर्ति हमारे शरीर में भी होती है। अन्न से ही शुक्र का निर्माण होता है। अन्न से मन का निर्माण होता है। मन भी अन्न की ही श्रेणी में आता है। ये सारा ही लक्ष्मी का क्षेत्र है। सोम के सारे कार्य-कलाप रात्रि में ही होते हैं। दिन में सूर्य की उष्णता सोम को निर्बल बना देती है। जीवन में समृद्धि के साथ जो जडता का प्रवेश होता है, वह भी रात्रि में ही उसे प्रवृत्त करता है। मद्यपान-जुआ-मादक द्रव्य-यौनाचार आदि की सारी क्रियाएं अंधकार से ही जुडी होती हैं। रात्रि के अंधकार यही एक विश्ेाषता है। अंधकार से जुडे विषय जीवन में लाभकारी नहीं होते। जीवन के कृष्ण और शुक्ल पक्ष में से उल्लू को कृष्ण ही प्रिय होता है। उसमें कहीं कोई भेद दिखाई नहीं पडते। अच्छे-बुरे, छोटे-बडे सारे भेद अंधकार में समा जाते हैं। बिना विचारे, बिना भेद-ज्ञान के कार्य करने वाले को उल्लू ही कहेंगे।

उल्लू स्वभाव से भी क्रूर और अत्याचारी होता है। निर्दोष पक्षियों को यातना भी देता रहता है। धन मद में भी बहुत कुछ ऎसा ही करता है आदमी। उसे सब कुछ जायज भी लगता है और धन की ताकत से उसे एक गलतफहमी यह भी हो जाती है कि धन से वह सब कुछ खरीद सकता है। आदमी को धन से खरीद लेना आज आम बात हो गई। धीरे-धीरे ऎसे लोगों का समाज में उठना-बैठना भी कम हो जाता है। यह अलग बात है कि धन के जोर पर कुछ लोग सामाजिक पद हथिया लेते हैं। पर इनका सम्मान आम आदमी नहीं करता। उल्लू भले ही हमारी पूज्या लक्ष्मी का वाहन हो, इसका भी सम्मान कोई नहीं करता। हमारे यहां तो कहा जाता है कि जिस मकान पर उल्लू आकर नित्य बैठता है, वह मौत की सूचना देता है। उसे कोई अपने मकान पर बैठने तक नहीं देता। यदि मैं लक्ष्मी का वाहक बन गया तो मुझे भी बैठने देंगे या नहीं।

जीवन का लक्ष्मी के साथ यह व्यवहार कितना विरोधाभासी है। लक्ष्मी की पूजा करें, उसे आने के लिए प्रसन्न करें और उल्लू को आने से भी रोक दें। लक्ष्मी तो उस पर बैठकर ही आएगी। लक्ष्मी के आते ही घर जड पदार्थो से भरने लगेगा। न जाने हम कितनी वस्तुएं खरीदकर लाएंगे। घर को जड पदार्थो का श्मशान बना देंगे। दूसरों को दिखाकर फूले न समाएंगे। यही परिग्रह की शुरूआत है। जीवन में हिंसा का प्रवेश (भाव हिंसा का) यहीं से होता है। जीवन की चेतना के द्वार बन्द होने लगते हैं। एक मूच्र्छा-सी बुद्धि और मन पर छाने लगती है। भीतर का मार्ग पूरी तरह अवरूद्ध हो जाता है। व्यक्ति बाहर की ओर ही भागने लगता है। फिर वह कभी स्वयं के बारे में चिन्तन-मनन नहीं करेगा। अज्ञान के अंधकार में उल्लू की तरह, लक्ष्मी को बिठाए भटकता रहेगा। ईश्वर की ओर से उसके कर्मो की यही सजा है- जा, उल्लू हो जा!

गुलाब कोठारी

अक्टूबर 13, 2009

फैसला तो करो!

भारत आज एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। उसे अपनी क्षमता सिद्ध करते हुए शिखर पर भी पहुंचना है और स्वाभिमान भी बनाए रखना है। सरकार चलाना और नेतृत्व देना एक बात नहीं है। सरकार में फाइलों के, नेताओं और अघिकारियों के पेट भरे जाते हैं। उस धन को हमारे यहां धूल कहा जाता है। नेतृत्व इसे ठोकर पर रखता हुआ कफन बांधकर निकलता है। अपने संकल्प के सहारे। आज संकल्पविहीनता की स्थिति है। कोई दूरगामी निर्णय होते ही नहीं। हमारे अघिकारियों को दौरे करने और हाथ मिलाने का बड़ा शौक है। भले ही पीछे से कोई छुरा मार दे। पिछले साठ साल में हमने केवल पड़ोसियों की शत्रुता कमाई है। देश के टुकड़े किए हैं।

हमारे देश में जो कुछ हो रहा है, धर्म और जाति के नाम पर देश खण्ड-खण्ड हो रहा है, देश के भीतर विषाक्त वातावरण फैल रहा है। जनता में जितनी त्राहि-त्राहि मच रही है, पड़ोसी देश जिस प्रकार मित्रता भुलाकर शत्रु बनते जा रहे हैं, निर्णय लेने के बजाए गम्भीर से गम्भीर मुददों को टाला जा रहा है, देश में अनिर्णय की स्थिति बढ़ती जा रही है, इन सबका एक ही कारण है – देश में कोई नेता नहीं है। किसी भी पार्टी ने देश को नेता नहीं दिया। सबकी नेतागिरी अपनी-अपनी पार्टी तक सिमटी हुई है। चाहे लालकृष्ण आडवाणी हो या सोनिया गांधी। ऎसे ही हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हो गए हैं। इनके आह्वान पर देशवासी किसी मुददे पर कोई पहल नहीं कर सकते। आज जनप्रतिनिघि स्वयं कार्यपालिका पर अघिक निर्भर करते हैं। कार्यपालिका टालमटोल करने के लिए जग प्रसिद्ध है। कुर्सी और नेतृत्व में अन्तर होता है। नेता सभी दलों से ऊपर होता है। उसके समक्ष केवल राष्ट्रहित होता है। इसी के लिए वह जीता है, मरता है। मैंने राहुल गांधी से भी यही कहा था कि उन्हें देश को नेतृत्व देना चाहिए। कांग्रेस को नहीं। कांग्रेस उनके लिए सीढ़ी का कार्य करे, तब कुछ बात बनेगी। वरना उनके साथ भी कांग्रेस का वही सम्बन्ध रहेगा जो पिछली पीढियों के साथ रह चुका है।

देश का दुर्भाग्य है कि विदेश सेवा के अघिकारी केवल यही सपना देखते रहते हैं कि उन्हें कहां का राजदूत बनाया जा रहा है। उन्हें देशहित में तपस्या करने की तैयारी दिखानी चाहिए। इन दिनों चीन और पाकिस्तान दोनों ही हमारे सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। दोनों ने ही आजादी के बाद से अब तक समय-समय पर हमारा दोहन ही किया है, हम मौन बने बैठे हैं। क्या मार्गदर्शन किया विदेश विभाग ने। वह इसी बात से प्रसन्न है कि पाकिस्तान से हमारे रेल और बस मार्ग जुड़ गए। कश्मीर के जरिए व्यापार के रास्ते खुल गए। चीन से हमारा व्यापार सन् 2010 तक 30 अरब अमरीकी डॉलर हो जाएगा। साथ में भले हमारी 30 हजार बीघा जमीन दबा ले। कोई नेता देश के प्रति संकल्पवान ही दिखाई नहीं देता। ढुलमुल नीतियां चल रही हैं। शत्रुता को भी झेल रहे हैं। वार्ताएं भी जारी हैं। एक भी नेता ने स्पष्ट नहीं किया वह देश के हित में क्या करना चाहता है, जिसमें सभी देशवासी सहयोग करें। बकरी रोए जान को, खटीक रोए खाल को। सबसे दयनीय स्थिति यह है कि हम रोज यह जानकारियां दे रहे हैं कि पाकिस्तान और चीन क्या कर रहा है, किन्तु देशवासियों को नहीं पता कि भारत क्या कर रहा है।

पिछले साठ साल में भारत की विदेश नीति के कारण आज सभी पड़ोसी देश शत्रु बन गए। शत्रु ही क्यों लगभग सभी चीन के साथ मित्रता का जामा पहन चुके हैं। आज चीन के पास भारत में प्रवेश के लिए भले ही एकमात्र पाकिस्तान हो, आने वाले समय में यह सभी पड़ोसी देश चीन के लिए भारत प्रवेश का मार्ग बन जाएंगे। क्या हम इसे उपलब्घि मान सकते हैं। इसको देखकर लग रहा है कि सरकार के निर्णयों की प्रतीक्षा किए बिना ही देशवासियों को कुछ निर्णय ले लेने चाहिए। देश की सम्प्रभुता के हित में। आज चीन ने जो कुछ हमारे साथ किया है, वह 1962 की ही पुनरावृत्ति है। सुरक्षा परिषद की सदस्यता के मुद्दे पर भी सबसे बड़ा विरोध चीन ही कर रहा है। एक धोखा पं. नेहरू खा चुके हैं फिर हम छाछ को फू ंककर क्यों नहीं पी रहे? हम जानते हैं कि वहां निर्णय लिए जाते हैं, हमारे यहां टाले जाते हैं। अत: हमें भी तुरंत प्रभाव से चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर देना चाहिए। किसी “स्वदेशी अपनाओ” या “भारत छोड़ो” नारे की आवश्यकता नहीं है। चीनी नागरिकों को भारत में प्रवेश करने से रोक देना चाहिए। चीनी सहयोग से चलने वाले उद्योगों को भी बन्द कर देने के लिए दबाव डालना चाहिए। यह तब तक जारी रहना चाहिए जब तक चीन हमारी जमीन छोड़कर वापस न लौट जाए।

गुलाब कोठारी

नवम्बर 10, 2009

विष वृक्ष

महाराष्ट्र में एक विधायक को राष्ट्र भाषा में शपथ लेने के कारण पार्टी विशेष के विधायकों की आक्रामकता का शिकार होना पड़ा। पूरा सदन जैसे शिथिल होकर रह गया था। यह हमारे लोकतंत्र की पगड़ी उछालने जैसा ही मामला है। वह भी चुनौती देकर। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला नियम तो दुर्याधन और कंस के राज में भी था। महाराष्ट्र विधानसभा में आज जो कुछ दुर्घटना हुई, उस पर तो पूरे देशवासियों का खून उबल जाना चाहिए था। क्षेत्रवाद का यह स्वरूप किसी जातिवाद और आतंकवाद से कम तो नहीं कहा जा सकता। भाषा की इस संकीर्णता में और कटट्रवाद में कहां अन्तर रह जाता है?

राज ठाकरे ने जब यह घोषणा की कि जो भी विधायक मराठी में शपथ नहीं लेगा, उसे सदन में ही देख लिया जाएगा, उसे तब ही गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए था। इससे बड़ा देशद्रोह और क्या हो सकता है। जिन-जिन प्रदेशों ने क्षेत्रीयता और भाषावाद का सहारा लिया है, उनके सम्बन्ध शेष राष्ट्र के साथ स्वत: ही बदलते चले गए हैं। महाराष्ट्र में जब छठ की पूजा को लेकर बिहार/यूपी के लोगों के विरूद्ध अभियान चला था, तब भी शिवसेना प्रमुख की देश भर में थू-थू हुई थी। इस बार भी उनका अहंकार चुनाव से पूर्व चरम पर था, जब उन्होंने कहा था कि राज कौन होता है मराठी की बात करने वाला। मैं सबका बाप हूं। यही अहंकार राज ठाकरे को भी विरासत में मिला है। इसी के कांटे उसको चुभ भी रहे हैं।

ईश्वर ने उसे आगे बढ़ने का साहस दिया है। साथ चलने को टीम में भरोसे के साथी भी दिए हैं। फिर उसे समाज के हित में कार्य क्यों नहीं करना चाहिए। केवल मराठी का संघर्ष तो आगे चलकर घाटे का सौदा ही रहेगा। बाल ठाकरे इसके उदाहरण हैं। उनके पास धनबल, भुजबल, सत्ता क्या नहीं है। पर क्या महाराष्ट्र के बाहर देशवासी उनका उतना ही सम्मान करते हैं, जितना महाराष्ट्र में करते हैं।

प्रश्न यह है कि सदन में राज ठाकरे की पार्टी के विधायकों ने जब संविधान और लोकतंत्र का मखौल उड़ाते हुए अकेले विधायक पर आक्रमण कर दिया तब उन विधायकों को केवल चार साल के लिए निलम्बित करने का क्या औचित्य है? उनके लिए तो पूरे पांच साल के लिए सदन से निष्कासित किया जाना और जीवन में फिर कोई भी चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करना भी कम ही सजा होती। पुलिस में मामला भी दर्ज कराया जाता। चार साल का निलम्बन तो उनसे ज्यादा उनके चुनाव क्षेत्रों के मतदाताओं को दण्डित करना है, जिनकी अब सदन में आवाज ही नहीं रहेगी।

महाराष्ट्र की इस दुर्घटना ने एक मौका दिया है सच्चाई के लिए संघर्ष करने का। यह संघर्ष खतरों से खेलना ही है। लोकतंत्र को प्रतिष्ठित रखना है तो सामंती/ अपराधी तत्वों से संघर्ष करना ही पड़ेगा। बल्कि यह संकल्प तो अब हर प्रान्त के सदन और संसद के शपथ-पत्र में जुड़ जाना चाहिए कि- “मैं संकल्प करता हूं कि मेरी उपस्थिति में यदि सदन में कोई लोकतंत्र की मर्यादा तोड़ने का प्रयास करता है और सभापति भी कार्रवाई नहीं करता, तब मैं कानून की शरण लूंगा।”

महाराष्ट्र विधानसभा में भाषा के नाम पर आतंकित करना, मारपीट करना तो बलवे की परिभाषा में आता है। इसे किसी भी बहाने से, किसी भी समीकरण के बहाने ठण्डे बस्ते में नहीं डाला जाना चाहिए। यह अकेले महाराष्ट्र का नहीं देश का सवाल है। देशभर में इस दुर्घटना के विरोध में आवाजें उठनी चाहिएं। कैंसर प्रभावित अंग शरीर की शोभा नहीं बढ़ाता।

गुलाब कोठारी

नवम्बर 11, 2009

नया युग

कि मां कहती है
लडका अच्छा है
मेरा मान करता है
मित्रता चाहता है
किंतु डरती हूं
मैं
आगे बढने से
जानती नहीं
कौन है वो
वह भी नहीं जानता
मैं कौन हूं-कैसी हूं
फिर भी अच्छा तो
लगता है।
पहले भी हो चुका
ऎसा ही
एक बार
अच्छा लगा था
एक प्यार।
मिलते थे
कई संदेश
प्यार भरे
किंतु बादल थे
बरसाती
छंट गए
बहुत जल्दी
शादी की चर्चा
उसे नहीं सुहाई
जब वह आया
मुझे मिलने
साथ उसके
एक और कन्या आई
कह रही थी
हम करने वाले हैं
शादी, जल्दी ही।
अपनी भूल
मैं चिंतित हो गई
उसके लिए
आज फिर
खडी हूं
उसी दोराहे पर,
जाना भी चाहती हूं
किसी की गोद में
मिलते भी हैं
प्यार करने वाले
किंतु,
एक प्रश्न
उठता है बार-बार,
क्या कभी भी
बन सकूंगी
किसी के बच्चे की
मां
क्या हो सकेगी
मेरी भी
छोटी-सी गृहस्थी
क्या होगा
कभी मेरा मन संतुष्ट
इस सदी के रिवाज
कुछ अलग हैं
आदमी
नहीं बदलता
अपनी जगह
और औरतें
लुढकती रहती हैं
इनके हाथों में।
यही कहानी है
विकासवाद की
समानता की
समृद्धि की।
औरत रूक जाती है
कहानी ठहर जाती है
अकेले जीने की जगह
मर जाने की
याद आती है।

गुलाब कोठारी

मार्च 10, 2010

पुनरागमन

पूरब की दुल्हन
पश्चिम का दूल्हा
मिल गए
न जाने कैसे
मानते थे
भीतर से तो हैं
सभी बराबर
सभी एक से,
यह भरम
टूट गया
कुछ सालों में
विचारों का भेद
मिलने नहीं देता
दोनों को
अहंकार तैयार नहीं
झुकने को।
पहले घायल हुई
दुल्हन
चली गई साथ
पूरबिया के
छोड़कर
अपनी लाड़ली को
बाप के भरोसे।
होश उड़ गए
बाप के भी
कहां सोचा था
यह हो जाएगा
कैसे पालूंगा
इस नन्ही परी को
वह भी चल दिया
पश्चिम में
जा बसा
अमरीका में
भर्ती कराकर
बच्ची को
किसी छात्रावास में।
इस बीच
तड़प उठी मां
रो पड़ा
उसका कलेजा
धिक्कारने लगी
खुद को
कैसे जाए
इतनी दूर
कैसे मुंह देखे
दिल के टुकड़े का
पढ़ाई भी
इतनी महंगी
अमरीका में
बाप को करनी पड़ी
दो-दो नौकरियां
बच्ची की खातिर
बेहाल था
खुद का तो।
घर-बेघर सा
मारा-मारा
थकने लगा था
जीवन से।
क्या भूल हुई
उससे
क्यों दिया अभिशाप
ईश्वर ने
वह तो आस्तिक था
क्या हुआ जो नहीं गया
मंदिर
या गिरिजाघर,
भूल यही थी
बस
उसको मान लिया
अपने जैसा
संस्कृतियां
मिल नहीं सकतीं
शिक्षा के भरोसे
बुद्धि के बल पर
वहां तो होता है
बस अपमान
एक दूजे का
खोखले दिखते हैं
नारे सत्यता के
भौतिक विकास के
दिल तो सब में
एक-सा होता है
उस धरातल पर
कौन जीता है
मां समझती है
सबसे पहले
इसीलिए
लौट आई
दुल्हन
फिर से पश्चिम में
करके प्रायश्चित
पिछले कर्मों का
रहने लगे फिर से
साथ-साथ।

गुलाब कोठारी

अप्रैल 19, 2010

बस भोगवाद

ऎसा क्यूं होता है कि, भारतीय सभ्यता, संस्कृति और जीवन शैली से जुड़े मुद्दों के खिलाफ “अघिकांश कानूनों” का निर्माण तभी हुआ जब-जब केन्द्र में कांग्रेस सत्ता में रही। इनमें से अघिकांश विदेशी संस्कृति अथवा शुद्ध वोटों की राजनीति पर आधारित थे। कांग्रेस नेतृत्व ने इसके लिए सदा अपने मंत्रिमण्डल की राय को माना। कभी जनभावनाओं को जानने अथवा उनका सम्मान करने की कोशिश नहीं की। यही कारण है कि देश में आज कितने ही कानून बन चुके जो देश की संस्कृति या ग्रामीण शैली के विरूद्ध हैं। इन कानूनों का सहारा लेकर शासन/प्रशासन के लोग जनजीवन में सुख के स्थान पर नया त्रास पैदा कर रहे हैं। न कानूनों के बारे में देश को शिक्षित किया जा रहा है, न ही परम्परा की कहीं सुनवाई होती दिखाई देती। ऎसा ताण्डव और लूट का नजारा तो न अंग्रेजों के राज में था, न ही मुगलों के काल में। आश्चर्य इस बात का है कि, जब-जब ऎसे कानून बने विपक्ष भी सरकार की हां में हां मिलाता नजर आया। आज तो लोकतंत्र के प्रतिनिघि ही सबसे बडे भक्षक हो रहे हैं। आई.पी.एल. जैसी व्यापारिक गतिविघि में केन्द्रीय मंत्रियों की भागीदारी लोकतंत्र के गाल पर तमाचा ही तो है। और ये लोग कैसे-कैसे संस्कृति विरोधी बयान दे रहे हैं।

पिछले सालों में जो कानून विकास के नाम पर बने या कानूनों में संशोधन हुआ, सारा ही देश के विखण्डन के काम आया। आज गांधी, नेहरू या अम्बेडकर जीवित होते तो रो रहे होते। देश की एकता, अखण्डता और संस्कृति का जितना नुकसान हमारे नेताओं ने किया है, उतना किसी ने नहीं। आश्चर्य यह भी है कि सब के सब इनको उपलब्घि मान रहे हैं। किसी कानून के मसौदे पर राष्ट्रीय बहस नहीं कराई जाती। किसी पुराने कानून की राष्ट्र के परिपे्रक्ष्य में समीक्षा नहीं होती। अहंकार इतना हावी रहता है कि बोलने वाला ही अपमानित होकर चला जाता है। संवेदना तो मर गई पूरी की पूरी। औरतों में भी नहीं दिखती, मर्दो में कहां से लाओगे। कानून भी ऎसे ही लोग बनाते हैं। आजकल “लिव इन रिलेशनशिप” का कानून चर्चा में है। बिना शादी रहने के लिए कानून क्यों चाहिए। वयस्क स्वमर्जी से रह ही सकते हैं। लेकिन कुछ लोग की इज्जत आबरू उछालकर उत्सव मनाते हैं। उन्होंने ही संस्कृति के विरूद्ध कानून बनवाने का वातावरण बनाया है। ये सब अंग्रेजीदां हैं। भारतीय जीवन शैली से इनका परिचय भी नहीं हैं। पर केन्द्र में इनकी प्रभावशीलता के कारण देशवासियों की आवाज दबकर रह जाती है। फिर कानूनों की पालना भी गरीब की ही जिम्मेदारी है। अमीरों तथा प्रभावी लोगों पर इसकी कोई पाबन्दी नहीं। गरीब को नोंच लिया जाता है। वे ही लोग नोंचते हैं जिनको आम आदमी स्वयं चुनकर भेजता है। यह एक आसुरी सत्य है। सारे अफसर अंग्रेजी मानसिकता वाले और नेता लूटने वाले। दोनों मिल जाएं तब? इन सबकी कृपा से हमारा संविधान पंगु हो गया। सम्प्रदायों के बीच सौहार्द समाप्त हो गया। जातियों के बंटवारे ने देश को खण्ड-खण्ड कर दिया। आरक्षित जातियों की नई पीढियों को इनकी सजा भोगनी पड़ेगी। इनके पुरखों का किया ये ही भोगेंगे।

देश में शारदा एक्ट से लेकर महिला आरक्षण, बेटी को बाप की सम्पत्ति में अघिकार, दहेज विरोधी कानून, बाल अपराध आदि कई कानून बन चुके। कागजों में क्या है, नहीं मालूम। समाज को तो राहत नहीं मिली। और अब दहेज कानून का संशोधन। इसमें हर प्रकार के उपहार को रजिस्टर कराए जाने का प्रावधान है। शादी के पहले भी एवं बाद में भी। इसमें भी आम आदमी को तंग करने का एक नया हथियार मिल जाएगा। बड़ी-बड़ी शादियों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता या आंखें मूंद लेते हैं। तब कानून बनते किसके लिए हैं? जो महंगाई और भ्रष्टाचार से पहले ही दबा बैठा है। तब स्वत: ही एक प्रश्न उठता है कि यह सारा तंत्र लोक के लिए कार्य करता है या लोक के विरूद्ध? कानून बना “इण्डियन” रहे हैं और लागू भारत पर कर रहे हैं। लागू करने के स्तर पर अघिकांश कानून नीचे पहुंचते-पहुंचते जड़ अथवा संवेदनाशून्य हो जाते हैं क्योंकि वे मूल में इण्डियन हैं।

गुलाब कोठारी

मई 17, 2010

बड़ा बनाने वाले!

 बहुत बड़े थे शेखावत सा.। राजनीति में तो कहते हैं कि संवेदना होती ही नहीं। उन्हें सत्ता के अलावा कुछ दिखाई भी नहीं देता। अधिकांश राजनेता खूब बहादुरी से झूठ ही बोलते हैं। निष्ठुर एवं घोर स्वार्थी भी होते हैं। हो सकता है शेखावत सा. में भी किसी ने ये गुण देखे हों। मैंने उनमें नेतृत्व की क्षमता देखी, जो आज किसी भी राजनेता (कांग्रेस या भाजपा) में दिखाई नहीं पड़ती। पूरा देश नेतृत्वविहीन चल रहा है। संवेदना एवं सह्वदयता ही तो उनके व्यक्तित्व की मूल शक्ति थी। सारी व्यस्तताओं, राजकाज और राजनीति के बीच उन्होंने व्यक्ति को कभी नहीं भुलाया। कभी व्यक्ति को छोटा नहीं माना। भले वह व्यक्ति जानकार हो अथवा अनजान। अमीर हो अथवा गरीब। उनके दरवाजे सबके लिए खुले रहते थे। उनके उपराष्ट्रपति भवन में भी एक निर्देश यह था कि राजस्थान से आने वाले हर व्यक्ति को भीतर आने दिया जाए। अभी तक तो ऎसा अनुभव किसी भी राजनेता के यहां नहीं हुआ। इसमें उनका मानवीय पक्ष इस बात का प्रमाण है कि वे सही अर्थो में नेता थे। इसी कारण लोग भी उनको चाहते थे। जब तक वे स्वस्थ रहे, राज्य की हर संवेदनशील घटना पर वहां (घटनास्थल) तक पहुंचे। व्यक्तिगत संबंधों को भी राजनीति से ऊपर उठकर निभाया। आज राजनीति का भावनाओं से कोई रिश्ता नहीं रह गया। अत: गरीब तो बड़े नेताओं तक पहुंच ही नहीं सकता है। गरीब को वोट भी डालने नहीं दिया जाता। सत्ता का अर्थ है- “”जिसकी लाठी, उसकी भैंस।”" उनके साथ कभी मेरा राजनीतिक संबंध भी नहीं रहा। न ही इस विषय पर हमारी चर्चा होती थी। मेरे लिए तो वे सदा पिताजी के अंतरंग मित्र ही रहे। अत: हमारे बीच एक अटूट विश्वास सदा ही बना रहा। इसका एक प्रभाव मैंने यह भी देखा कि जब भी मैं उनसे मिलने गया, वे हमेशा गाड़ी तक छोड़ने भी आते थे और बच्चों को भी बुलवाते थे कि उनको बुलाओ मामाजी जा रहे हैं। निश्चित रू प से वे मुझे महसूस करा देते थे कि मैं कोई बड़ा आदमी हूं। अधिकांश राजनेताओं का व्यवहार मुख्यतया आलोचनापरक ही होता है। खाने के लिए पूछना तो अब किताबों में ही पढ़ने को मिले। मुझे उनका सदा देने का भाव बड़ा ही प्रभावित करता रहा। नेकी कर कुएं में डाल। काम निकलने के बाद अनेक लोग रास्ता भूल जाते हैं। कई भाजपा मंत्रियों ने इनके कहे की अवज्ञा भी की है। इनको किसी से शिकायत नहीं रही। सत्ता के मद में भाजपा की जो छिछालेदार हुई, उनकी वेदना इनके मन पर भारी पड़ी। पनपते-गहराते भ्रष्टाचार को भी वे सहन नहीं कर पाए। उनके नेतृत्व की कुंजी रही उनका माटी से लगाव। केवल शब्दों में नहीं, कर्म से भी। परंपराओं से भी उतना ही जुड़ाव। आस्थावान तो थे ही। श्रीनाथजी, गणेशजी, गोविंद देवजी इनके नित्य आराध्य थे। इसी का प्रभाव था कि वे जीवन के प्रति एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखते थे। संबंधों के साथ काम को कभी जोड़ते हुए उनको नहीं देखा। पिताजी के साथ पचास वर्षो के संबंध रहे, निरंतर मिलने का क्रम भी रहा। शुरूआती दौर में तो दोनों एक-दूसरे के लिए कार्य करते भी रहे। राजस्थान पत्रिका में उनके या उनकी पार्टी के विरूद्ध क्या छपा, उस कारण उनका शाम को मिलना कभी बंद नहीं हुआ। भाजपा और संघ का तो कई बार हमें कोपभाजन बनना पड़ा होगा, किंतु मुझसे भी (संपादक बनने के बाद) कभी इस तरह के मुद्दों पर बात नहीं की। पत्रिका में कोई बात या किसी का व्यवहार उनको सही नहीं लगा, तो तुरंत जानकारी देते थे। स्नेह व सम्मान की पराकाष्ठा ही थी कि पिताजी के स्वर्गवास के बाद तो वे और भी नियमित रू प से संभालने लगे। हर बार जयपुर दौरे पर दो मंदिर (गोविंद देवजी और मोतीडूंगरी गणेश) तथा दो मित्रों के घर (हमारा तथा स्व. मोहन छंगाणी का) अवश्य छूते ही छूते थे। उपराष्ट्रपति के पद पर बैठने के बाद भी घंटों बातें करना मेरा सौभाग्य ही था। एक अन्य नेता रहे हैं अटलजी, जिन्होंने कभी बात समाप्त करने की जल्दी नहीं दिखाई। यही तो बड़े लोगों के लक्षण हैं। श्रद्धेय पिताजी की तरह शेखावत सा. भी साधारण स्थिति से पुरूषार्थ के सहारे ऊपर उठे थे। उन्होंने प्रत्येक पुरूषार्थी की आगे बढ़ने में मदद की। नई पीढ़ी के नेताओं का तो लेने से ही पेट नहीं भरता, देंगे क्या? शेखावत सा. राजनीति में रहते हुए भी अंत समय तक इससे ऊपर उठ गए थे। उनका अनेक अर्थो में मोहभंग भी हुआ। अनेक कार्यो और परिस्थितियों का सिंहावलोकन भी किया, जो शायद सब लोग करते भी न हों। इनकी रूग्णता ने इनको चिंतन-मनन का अच्छा समय दे दिया। कई लोगों से मन की बातें कर गए। हलके होकर, तैयारी करके गए। राजस्थान का सौभाग्य ही कहिए कि उसे एक संवेदनशील नेतृत्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ। आगे भी ईश्वर की कृपा हो कि शीघ्र ही लोगों का दिल जीतने वाला नेता मिले। भले किसी भी पार्टी का हो! स्व. शेखावत की आत्मा शांति को प्राप्त हो! ? शांति !!!

 गुलाब कोठारी

मई 24, 2010

भूषण

भूषण, आभूषण, अलंकरण, प्रसाधन, परिष्कार आदि शब्द एक ही परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। भ+उ+ष+ण। प्रभावशाली, शक्तिशाली अभिव्यक्ति अथवा विषय का प्रकाशन करना। इसमें व्यक्ति एवं विषय दोनों समाहित हंै। समाज भूषण, देश भूषण जैसे पर्याय भी हैं। आभूषण शब्द व्यवहार में शरीर के साथ जुड़ा है। यह पूर्ण रूप से देश-काल से जुड़ा रहता है। श्ृंगार का अंग भी होता है। और अहंकार का भी। जबकि भूषण तपस्या का परिणाम होता है। आभूषण बनने के लिए तो चोटें भी सहन करनी पड़ती हैं। सोने के टुकड़े को कोई गले में लटकाकर नहीं चलेगा। भूषण हर परिवार में समाज की आवश्यकता है। अर्थात जीवन तपस्या पूर्ण होना चाहिए। सुविधापूर्ण नहीं।<br/><br/>तपस्या ही सुन्दरता का मूल है। आभूषण का यह सर्वोत्तम संदेश है। सुन्दरता मोह अथवा आकर्षण का भी कारण होती है। माया रूप है। माया का नया आवरण पैदा कर दिया जाता है। व्यक्ति अपने गले में सोने के इस आभूषण को डालकर बंध जाता है। यह बन्धन उसकी प्रसन्नता का कारक है। बिना विचार किए स्वयं को जड़ पदार्थ से बांधते जाना ही पशुभाव है। भूष्ाण भी दो श्रेणी के होते हैं। बाहरी दुनिया के और शाश्वत आत्मा के। आत्मा के भूषण संस्कारों से जुड़े होते हैं। प्रारब्ध से जुड़े होते हैं। वे मृत्यु के बाद भी आत्मा से जुड़े रहते हैं। व्यक्ति की प्रज्ञा भी इनके कारण ही प्रकट होती है। सम्यक् ज्ञान और सम्यक् दर्शन की आचरण में अभिव्यक्ति से ही व्यक्ति “भूषण” दिखाई पड़ता है।<br/><br/>हर देश का एक दर्शन होता है। लोकजीवन होता है। परम्पराएं होती हैं। इस जीवनशैली का कुछ अंश भौगोलिक परिस्थितियों से जुड़ा रहता है, कुछ इतिहास से तथा कुछ साम्प्रदायिक विचारों से। हम अपनी जीवनशैली में भी आभूष्ाणों की, श्ृंगार की, प्रसाधनों की भूमिका को नित्य देखते हैं। यह भी तथ्य हमारे सामने है कि यह परम्परा समय के साथ घट रही है। देवी-देवता हमें इसीलिए अच्छे लगते हैं कि वे आभूषणों से लदे रहते हैं। उनके तो अस्त्र-शस्त्र भी आभूषणों का ही कार्य करते हैं। त्रेता, द्वापर, कलयुग में लोगों की वेश भूषा का अभिन्न अंग रहे हैं आभूषण। शायद शुरू में फूलों और पत्तों के ही आभूषण बनते रहे होंगे। जैसा कि कालीदास की शकुन्तला पहनती थी। धातु युग के पहले। धीरे-धीरे विकास हुआ होगा। किन्तु एक काल ऎसा भी आया होगा, जब आभूषणों पर शरीर की दृष्टि से शोध हुआ होगा। समय के साथ आभूषण सम्पत्ति के रूप में भी उभर कर आए और समाज की स्थिति के मापदण्ड के रूप में भी। समय के साथ जीवन शैली के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ गए। स्त्री-पुरूष दोनों के लिए ही समान रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। आज जरूर शिक्षा और शहरीकरण ने इनको एक तरफ धकेलने का प्रयास किया है। शहरी पुरूष तो अब अंगूठी/चेन के अलावा कोई आभूषण पहनता दिखाई ही नहीं देता। शहरी, शिक्षित लड़कियां भी नाम-मात्र के गहने ही पहनती हैं। शादी के बाद भी त्यौहारों तक सीमित रह गए।<br/><br/>नई पीढ़ी में सुन्दरता का बोध तो उतना ही है किन्तु वह प्रसाधनों को अघिक महत्व देती है। केश विन्यास, उबटन, लिपस्टिक, आदि मुख्य प्रसाधन बन गए हैं। इनके बारे में सूचनाएं-विज्ञापन भी खूब होते हैं। मानस पटल पर छाए ही रहते हैं। फिर एक आधार विकसित देशों की नकल भी है। इससे अहं की तुष्टि होती है। भूषण शब्द ही खो गया। फूलों के गहने तो दिखाई ही नहीं पड़ते।<br/><br/>यही हाल विभिन्न समाजों का भी होता जा रहा है। हर समाज में पुराने कुछ लोग रह गए हैं, जिन्हे भूषण कह सकते हैं। जिस कारण समाज गौरवान्वित रहता है। उनके नाम से समाज का सम्मान होता है। आभूषणों का प्रत्यक्ष रूप भी होता है और परोक्ष स्वरूप भी। यह बात केवल भारतीय जीवनशैली से ही समझी जा सकती है। हमारे यहां आभूषणों की कई श्रेणियां बनी हुई हैं। सबसे महत्वपूर्ण है कर्म के अनुसार। रोग के अनुसार। कुमारी अथवा विवाहिता के लिए भी कुछ निषेध/ स्वीकृति है। इसी तरह वैधव्य में भी कुछ आभूषण उतरवा दिए जाते हैं। खेतों और जंगलों में कार्य करने वालों के गहने, धूप-छांव में रहने वालों के लिए, अत्यघिक ताप में कार्य करने वालों (भट्टी जैसे) के लिए, अमीर/गरीब लोगों के लिए आदि-आदि श्रेणियां बनी हुई हैं। इसका एक स्पष्ट अर्थ है कि आभूषण केवल सौन्दर्य की आवश्यकता ही नहीं है। शरीर की अनिवार्यता भी है। सम्पत्ति और दिखावा इनका नकारात्मक भाव हो सकता है, किन्तु इनका महत्व बहुत प्रकार से समझा जा सकता है। एक तो धातु, दूसरे मणिए-पत्थर तथा अन्य पदार्थ जिनसे भी आभूषण बनते हैं। यह सारा रूप शरीर के साथ-साथ भीतर भी प्रभाव तो डालता ही है। तभी तो ज्योतिषी कहता है कि अमुक पत्थर पहन लो। अमुक अंगुली में पहन लो। इनका सम्बन्ध भी सभी नौ ग्रहों के साथ समझाया जाता है।<br/><br/>सृष्टि के हर रूप में चार वर्ण होते हैं। पत्थर और धातुओं में भी होते हैं। तभी आपने देखा होगा कि कभी-कभी कोई पत्थर व्यक्ति को सहज नहीं होता। माफिक नहीं होता। किसी ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति को (जन्म से होना आवश्यक नहीं है) क्षत्रिय वर्ण का पत्थर कैसे माफिक आ सकता है। हर पत्थर का एक ग्रह स्वामी है। राहू-केतु के अलावा सात ग्रह हैं। शरीर के सात धातु हैं। हर एक पत्थर, शरीर के धातु का एक-एक ग्रह स्वामी होता है। शरीर के किसी भी धात में जब कोई रोग होता है, तब उसकी चिकित्सा उसके स्वामी ग्रह के पत्थरों से या औषघियों से ही की जाती है। यह भारतीय क्रम हैं। इसी प्रकार चीन में एक्यूप्रेशर/ पंचर चिकित्सा भी मेरिडियन आधारित होती है। रोग के अनुसार भिन्न मेरिडियन के बिन्दुओं को दबाव अथवा सुई से प्रभावित किया जाता है। हम इस चार्ट का भी यदि अध्ययन करें तो समझ जाएंगे कि हमारे सारे आभूषण किसी न किसी मेरिडियन पर निरन्तर दबाव बनाए रखते हैं। शरीर को प्रतिदिन स्वस्थ रखते हैं। तब हमें हमारे ऋषियों के ज्ञान की गहनता पर गर्व होता है। भूषण/ आभूषण बाहर/ भीतर की सुन्दरता, आभामण्डल तथा रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाने का अचूक उपक्रम है।<br/><br/>गुलाब कोठारी

मई 25, 2010

नकेल हाथ में लें

हमारा जीवन आशाओं, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ता है। जीवन किसी दर्शन के साथ लक्ष्य की ओर चले तो लक्ष्य प्राप्त हो जाता है। केवल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए जीना पशु भाव है। संवेदना, सह्वदयता एवं वसुधैव कुटम्बकम् की अवधारणा ही मनुष्य को बड़ा बनाती है तथा ऎसे समाज में सुख की प्रतिष्ठा रहती है। समष्टि भाव सभी शासन, प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थानों आदि की एक अनिवार्यता है। समय के साथ यह संकुचित (व्यष्टि रूप) हो रही है। पिछले दो वर्षो में जो अनुभव हमको मध्यप्रदेश में हुआ, उसमें राजनीति का व्यष्टि भाव चरम पर दिखाई दिया। कुछ लोगों ने तो द्वापर में मथुरा के कंस की याद दिला दी, जो किसी के भी अधिकारों का अतिक्रमण कर लेते हैं। अहंकार के जीते-जागते पुतले हैं। उनके साथ जरासंध, शिशुपाल सब मिले हुए हैं। जनता को त्रस्त करने में ही इनका गौरव स्फीत होता है। सरकार किसी भी पार्टी की हो, कोई अन्तर नहीं पड़ता। अब अगले चुनावों से पड़ने लगेगा।
दूसरी ओर, जनता के हौसले बुलन्द हुए। उनके दुख-दर्दो की चर्चा होने लगी। पूरा मध्यप्रदेश आज एक सूत्र से जुड़ गया। सारी जानकारियां पूरे प्रदेश में एक साथ उपलब्ध होने लगीं। जिन मुद्दों पर जनता हथियार डाल चुकी थी, वे फिर से एक-एक करके उठने लगे। पिछले दो वर्षो में पत्रिका ने कई मुद्दों का निस्तारण करने में अपनी भूमिका निभाई। कुछ आसुरी शक्तियों के चेहरे भी उजागर किए। संवाद-सेतु कार्यक्रम के जरिए लोगों से सीधा जुड़ने का प्रयास किया। इसका परिणाम सुखद रहा। लोग हर मुद्दे पर साथ होने लगे। शासन, प्रशासन, न्यायपालिका और जनता को विश्वास हो गया कि पत्रिका अपने कर्म के प्रति गम्भीर भी है और समझौता भी नहीं करता। अनेक अवसरों पर इन्होंने भी आगे आकर सहयोग किया। जनता ने सार्वजनिक सरोकारों में मुक्त हस्त साथ दिया। आज दो साल की अल्प अवधि में ही पत्रिका मध्यप्रदेश की आवाज बन गया। जनता ने इसे स्वीकार भी कर लिया है। आभार! आज भी पत्रिका कुछ नेताओं का भ्रष्टाचार उजागर कर रहा है। तथ्य जनता के समक्ष रखे हैं। सरकार कार्यवाही नहीं कर रही है। “जमीन का दर्द” में आम आदमी/संस्थाओं के विरूद्ध तो कार्रवाई हुई, किन्तु जैसे ही बड़े नाम उजागर होने लगे, सरकार हाथ खींचती नजर आई। एक मामले की जांच लोकायुक्त कर रहे हैं। वह मामला पहले ही न्यायालय में चल रहा है। कई मामले अभी कार्यवाही का इन्तजार कर रहे हैं। पुरानी जांचों का कार्य अभी तक शुरू नहीं हुआ। राज्यपाल का संकेत बेकार गया। इन सारी बातों से सरकार की मंशा तो समझ में आ गई कि यह जनता के काम नहीं आएगी, किन्तु मतदाता अब पहले जैसे सोया हुआ भी नहीं है। प्रदेश के अन्य अखबारों ने जनता का साथ न देकर हमारा रास्ता भी आसान किया। इन अखबारों ने अपनी कमाई का कुछ अंश पत्रिका की प्रतियां खरीदने में किया और हमारा मनोबल बढ़ाया, हम उनके भी आभारी हैं।
पाठकों से एक निवेदन। हमें प्रतिदिन जाग्रत रहना है। लोकतंत्र की नकेल हाथ में लेनी है। जनता के द्वारा नियंत्रित होना चाहिए। इसी के साथ नई पीढ़ी का भविष्य जुड़ा है। युवाओं को सूचना के अधिकार का नियमित प्रयोग करना है। घोटाले पत्रिका भी उजागर करेगा, जनता उनसे जुड़े लोगों का बहिष्कार करना शुरू कर दे। बस, हम गांधीजी के अहिंसा मार्ग पर चलकर भी भ्रष्ट लोगों को घरों में समेट देंगे। चारों पायों की मरम्मत कर देंगे। आगे अभी पूरी उम्र पड़ी है। जनता का आशीर्वाद ही हमारे लिए पा†चजन्य का काम करेगा।
गुलाब कोठारी

मई 28, 2010

Patrika Group completes 2 years in MP 1

Gulab Kothari the chairperson of patrika group, talk to media persons on completion of 2 years of patrika group in Madhya Pradesh.

Patrika Group completes 2 years in MP 2

Gulab Kothari the chairperson of patrika group, talks about the success story of patrika group on completion of 2 years in Madhya Pradesh.

Patrika Group completes 2 years in MP 3

Gulab Kothari the chairperson of patrika group, talks about the success story of patrika group on completion of 2 years in Madhya Pradesh.

जून 9, 2010

धरातल

मनुष्य
प्राणी है
पृथ्वी लोक का।
हर हाल में
जुडे रहना है
धरती से।
जब छूट जाती है
धरती,
जीने लगता है
देव लोक में,
इंद्रियों के सहारे,
बुद्धि के सहारे
प्राणों के सहारे,
तब उखड जाते हैं
पांव
जमीन से।
जवाब देने लगता है
शरीर,
छूटने लगते हैं
सहारे
डरने लगता है
पांव रखने से
जमीन पर।
पार्थिव देह
हिलने लगती है
बिना सहारे
बिगड जाता है
लौकिक व्यवहार
सृष्टि-रचना से।

गुलाब कोठारी

फ़रवरी 3, 2011

भले पधार्या!

सम्माननीय भागवत जी,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत राजस्थान की खैर-खबर लेने अजमेर आए हुए हैं। वे पांच दिन के प्रवास पर अजमेर में हैं। संगठन की विभिन्न स्तर पर जानकारियां करेंगे। निष्कर्ष निकालेंगे, फिर निर्णय भी करेंगे। ऎसे ही कुछ निष्कर्ष आपने दिल्ली में भी निकाल कर देश के सामने रखे थे। एक निष्कर्ष यह भी था कि संघ भाजपा के कामकाज में दखल नहीं करेगा। भाजपा को राख से भी उठ खड़ा होना आता है। भागवत ने भी देख लिया होगा कि उनके दोनों ही दावे ढह गए। देश को जो आशाएं आपके आने पर बंधी थीं, वे तो गड़करी के अध्यक्ष पद पर मनोनयन के बाद ही धूमिल हो गई थी। आज संघ भले ही आपसे कुछ उम्मीदें रखता होगा, देश तो आपका नाम लगभग भूल चुका है। आप ही बताएं कि पिछले साल-दो साल में संघ ने देश के विकास में कौनसी महत्ती भूमिका निभाई! अनेक कारणों से भाजपा को नीचा ही देखना पड़ा है। इसमें एक कारण गड़करी पुत्र के विवाह की चर्चा भी है। देश के सामने आपकी सकारात्मक भूमिका को लेकर प्रश्नचिन्ह है। देश के विकास को आज किसी भी प्रतिक्रियावादी संगठन की आवश्यकता नहीं है। संघ इसमें बहुत आगे निकल गया है। जिस प्रकार संघ अब सत्ता पर हावी होने लगा है, जिस प्रकार गड़करी वसूली अभियान के पर्यायवाची बन गए, जिस प्रकार सुरेश सोनी जैसे पदाधिकारियों के द्वारा प्रश्रय प्राप्त लोग संघ का मान बढ़ा रहे हैं, उससे एक ओर संघ कटघरे में खड़ा हो गया, वहीं भाजपा के नेता किंकत्तüव्यविमूढ़ हो गए। जिस तरह के नए दबाव इन नेताओं के सामने अब आ रहे हैं, कभी सुने भी नहीं थे। संघ की कथनी-करनी का अन्तर जनमानस की जुबान पर आ गया। भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरूण जेटली आदि जब अपनी-अपनी कुर्सियां खींच रहे थे, तब आप मौन क्यों थे। यह कहकर उत्तर टाल नहीं सकते कि भाजपा की भाजपा जाने। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के भाजपा अध्यक्ष आपकी निष्पक्षता के प्रमाण हैं।

आज भाजपा जिस प्रकार नेताओं को मनोनीत करने लगती है, चयन का और व्यक्ति की गुणवत्ता का मार्ग बहुत पीछे छूट गया है। आपने देखा है राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के साथ संघ के बड़े संचालकों ने कैसा व्यवहार किया था। उत्तराखण्ड के भुवनचन्द्र खण्डूरी (पूर्व मुख्यमंत्री) को कैसे मक्खी की तरह हटा दिया गया था। कैसे कर्नाटक का नाटक पार्टी के ही लोगों ने देश के सामने खेला, कैसे मध्यप्रदेश में उमा भारती गई, फिर बाबू लाल गौर का पत्ता साफ हुआ और अब फिर शिवराज सिंह चौहान को हटाने के लिए नए सिरे से मुहिम चलाई जा रही है। आज भी मुस्लिम नेता भाजपा में सहज नहीं हैं। भाजपा की कार्यकारिणी देख सकते हैं। अटल जी के मंत्रिमण्डल पर भी दृष्टि डालें तो समझ जाएंगे।

खुलेआम अपराध प्रवृत्ति के नेताओं को आपके नेतृत्व में संघ प्रश्रय दे रहा है। क्या भाजपा और संघ मिलकर देश को और कुछ देना ही नहीं चाहते। क्या कश्मीर के निष्कासित हिन्दू कभी आपका एजेण्डा बनेंगे। बिना इसके जब कश्मीर में चुनाव हुए तब आप मौन क्यों थे? बांग्लादेशियों के इतने बड़े अतिक्रमण पर आपके अभियान सुप्त क्यों? आरक्षण जैसे नासूर और धार्मिक कट्टरवाद पर आपको सांप क्यों सूंघ गया? क्यों भाजपा को इसके लिए तैयार नहीं किया जाता? जो कुछ पिछले 10-15 सालों में कश्मीर में हुआ, उसे भी आप भारत माता का सम्मान मानते हैं, तब हमें और कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है। ऊपर के गिने-चुने नेताओं ने निजी स्वार्थ पाल लिए हैं। देश उन पर थू-थू भी कर रहा है, नीचे कार्यकर्ता भी शर्मिन्दगी का अनुभव कर रहा है। हाल ही में आपने कहा था कि संघ में कट्टरवाद को स्थान नहीं है। क्या इसका अर्थ यह भी है कि हिन्दूत्व की रक्षा संघ का उद्देश्य नहीं रहा। हिन्दूवाद के कारण ही संघ का स्वरूप है। कट्टरवाद से लड़ने के लिए नहीं है, भागवतजी! शाखाओं का सूखते जाना ही प्रमाण भी है। नई पीढ़ी का शाखाओं से मोहभंग हो गया। क्या यही है संघ की भावी तस्वीर?

आप राजस्थान आए हैं। स्वागत है! किन्तु जाने से पहले उन घावों को अवश्य देख जाएं जो शंकर जी और प्रकाश जी अथवा इन्द्रेश जी के खातों में हैं। जिस प्रकार के हस्तक्षेप का दु:साहस सुरेश सोनी भी यहां दिखाते रहे थे। गुलाब चन्द कटारिया, घनश्याम तिवाड़ी, ललित चतुर्वेदी आदि के इतिहास के पन्ने भी पलट जाना। आमजन से बातें कर सकें तो और भी उत्तम रहेगा। धन की मर्यादा संघ के नेताओं में मृत प्राय: हो गई है। इनके दबाव से ही भाजपा के भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। किसी को भी लज्जा नहीं आती। कांग्रेसी को लज्जा नहीं, तो मुझे ही क्यों? आपसे एक अनुरोध है कि जाने से पहले पुष्कर जाकर यह संकल्प अवश्य कर जाएं कि शेष जीवन भारत माता को समर्पित रहेगा, भाजपा को नहीं शायद देश की आशाएं फिर जाग उठें!
गुलाब कोठारी

मार्च 21, 2011

बुरा न मानो

होली इस देश के चार प्रमुख सांस्कृतिक त्योहारों में से एक है। शत्रुता, द्वेष एवं मन की मलिनता मिटाने के लिए भी होली का सहारा लिया जाता है। कहने को भले ही आज इस त्योहार का स्वरूप बिगड़ गया, किन्तु रंग खेलने और मनों को नए सिरे से प्रेम के रंग में रंगने के लिए आज भी होली की भूमिका है। यह प्रेम रंग तभी चढ़ सकता है जब पुराना मैल उतरे।

आज हमारे देश में भ्रष्टाचार का मैल हर जाति-धर्म और समाजों में चढ़ता ही जा रहा है। जन-जन त्रस्त है। केवल भ्रष्ट लोग मस्त हैं। कोई नई बात भी नहीं है। हर युग में ऎसा होता रहा है। देव और असुर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दिन में गर्मी पाकर आकाश के कण देव रूप (अग्नि प्रधान) हो जाते हैं। रात्रि के समय वे ही कण उष्णता के अभाव में सोम प्रधान (अंधकार युक्त ) हो जाते हैं। किसी के चेहरे से पढ़ा नहीं जा सकता कि कौन किस गर्मी में देव रहेगा और किसकी कमी से असुर हो जाएगा।

बचपन में हम गांवों में देखा करते थे कि लोग होली दहन के बाद हर एक घर के बाहर जाकर व्यक्तिगत सम्बोधन से आवाजें लगाते थे कि व्यक्ति ने क्या बुरा किया। समाज में उसके आचरण से क्या छवि बनी। ये व्यक्तिके लिए सुधार की चेतावनी भी थी और अवसर भी। नकारात्मक भूमिका की सार्वजनिक अभिव्यक्तिभी थी। कोई इसका बुरा नहीं मानता था। न ही इस मुद्दे पर कभी चर्चा ही होती थी। यह सम्मान सूचक भी था।

तो आइए! इस होली से पुरानी परम्परा को पुनर्जीवित किया जाए। सफाई घर से ही शुरू हो। मित्र-रिश्तेदारों से बात की जाए। उनके गुण-दोषों पर चर्चा हो। मोहल्ले में रहने वाले भ्रष्ट लोगों से मिलकर बात की जाए। अपराधियों से बात करें, कि आपके मन में उनकी क्या छवि है। उनको अपनी छवि सुधारने का एक अवसर दें। स्वीकार करते हैं तो बहुत ही अच्छा है। नहीं तो प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। सुधरने का आश्वासन दें तो अति सुन्दर। नहीं तो फैसला द्वार पर चिपका कर लौट जाएं। उनके किसी स्वजन को भी दे सकते हैं। किन्तु उचित होगा चस्पा करना। इस सूचना में सजा की शर्त भी होनी चाहिए। कुछ लोग हो सकता है घर से गायब रहें। उन सबका सार्वजनिक बहिष्कार घोषित कर सकते हैं। या तो सुधर जाओ, या फिर चले जाओ। हमें आपके वर्तमान स्वरूप की आवश्यकता नहीं है। यदि व्यक्ति में जरा भी सकारात्मक भाव है, अच्छा बनने का सपना है, तो वह तुरन्त इस अवसर का लाभ उठाना चाहेगा। वह बाहर आएगा, स्वीकार करेगा और मार्ग बदलेगा। उसके बाद उसके बच्चों को भी तो उसी समाज में रहना है। अपने कृत्यों से कोई बच्चों को अपमानित नहीं होने देगा। महिला तो यह भूल हर्गिज नहीं कर सकती। यह अलग बात है कि भ्रष्टाचार में बच्चे भी साथ जुड़ें हों। बहिष्कार से बड़ी कोई सजा नहीं। न तो उनको बुलाना, न उनके यहां जाना।

हां, बड़े सरकारी अफसरों के मामले में झिझक हो सकती है। डरने की बात नहीं है। उन तक तो सूचना पहुंचा देना ही काफी है। जो अन्य प्रदेशों के हैं वे शुरू में परवाह नहीं करेंगे। धीरे-धीरे घाव गहरे होते जाएंगे। रहना तो उनको भी इसी प्रदेश में है। नेताओं की अकड़ तो वैसे भी पांच साल से ज्यादा नहीं चल पाती। सुना दो संकल्प कि अगले चुनाव में निवृत्त कर देंगे।

सब कुछ सम्मानजनक ढंग से किया जाना चाहिए। राजनीति अंश मात्र भी न हो। शुद्ध मानवीय धरातल, लोकहित का भाव और ईश कृपा का सहारा। विश्वास है सब कुछ ठीक ही होगा।
गुलाब कोठारी

अप्रैल 10, 2011

प्रहरी को जगाओ!

देश के संविधान में लोकतंत्र को तीन पाये मिले: विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका। इनके साथ एक जागरूक प्रहरी और जुड़ गया- मीडिया। उसने स्वयं को चौथा पाया घोषित कर दिया।

आजादी की जंग में मीडिया और पत्रकारों की भूमिका की प्रशंसा आज तक हो रही है। मीडिया की अवधारणा भारतीय नहीं है। यहां न मीडिया कभी संस्कृति का वाहक रहा, न ही विकास का। हमारे लोकगीत, लोकनृत्य और नाटय, छोटी-छोटी इकाइयों में, संस्कृति का संदेश दिया करते थे। आज भरतनाटयम, कथकली, यक्षगानम् आदि इन्हीं के अवशेष हैं।

हमारी जीवनशैली में पत्रकारकर्म कभी था ही नहीं। आज सूचना तंत्र के जाल ने एक नई जीवनशैली विकसित कर दी। मीडिया के बिना इस शैली की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
मीडिया अचानक उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण और भौतिकवाद की पकड़ में आ गया। ग्लैमर की चकाचौंध और सत्ता भोगने की महत्वाकांक्षाओं ने मीडिया की विश्वसनीयता विश्वभर में कम कर दी। सूचना और लोक शिक्षण की परिभाषाएं बदल गई।

मनोरंजन हावी होने लगा। बाजार की स्पर्द्धा में मीडिया का महत्व सामने आया। चुनावों को भी व्यापारिक स्पर्द्धा का रूप मीडिया ने ही दिया। और इसका दामन दागदार भी हुआ। मीडिया को आज जनता का नहीं, सत्ता का प्रतिनिधि माना जाने लगा है। मीडिया के सहयोग के बिना कोई नेता बन ही नहीं सकता। मीडिया क्या परोस रहा है, उस पर कोई गम्भीर नहीं है।

सत्ताधीश आपस में बांटकर अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं। इतनी बड़ी स्वार्थपूर्ति के चलते मीडिया भी भ्रष्टाचार के प्रति मौन हो गया है। यही एकमात्र कारण है देश में बढ़ते भ्रष्टाचार का। हाल ही में हमने देख लिया कि किस प्रकार राडिया प्रकरण में अपने स्वार्थ के लिए नामी-गिरामी पत्रकार भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे दिखाई दिए।

आज हम कैरियर प्रधान किन्तु संवेदनाशून्य शिक्षा के दौर से गुजर रहे हैं। मीडिया भी इसी का एक अंग है। मां-बाप, अध्यापक, धर्म गुरू आदि बच्चों को नित्य मानवता का पाठ नहीं पढ़ाते। एक मीडिया है जिसकी पहुंच घर-घर है। रेडियो, टीवी, इन्टरनेट बहुत गतिशील भी हैं और लोकप्रिय भी। अन्ना हजारे के अनशन का माहौल फेस-बुक तथा मोबाइल ने ही बनाया।

एक प्रमाण तो सामने आया कि मीडिया चाहे तो क्या नहीं कर सकता। प्रश्न यह है कि जब देश में भ्रष्टाचार को लेकर सब जगह त्राहि-त्राहि मची है, भूखे और बीमार भारतवासी सड़कों पर दम तोड़ रहे हैं, तब मीडिया मौन क्यों? क्या व्यापार इतना बड़ा लक्ष्य है? क्या भ्रष्टाचारियों की कमाई में हाथ बंटाना गौरवान्वित करता है? क्या देश हित के विरूद्ध कार्य करने वालों, देश हित को बेचने वालों और भूमिगत माफिया का साथ देना लोकतंत्र के पैंदे में छेद करना नहीं है? जनता के चुने हुए प्रतिनिधि का विभिन्न घोटालों में साथ देना, उसके अपराधों को आश्रय देना और बचाना इसे लोकतंत्र का प्रहरी बना सकता है? यह तो स्वयं देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना हो गया। और हुआ केवल इसलिए कि देश का युवा सो रहा था। मीडिया भी नेताओं, अधिकारियों के साथ मिलकर जनता से विमुख हो गया। अब जनता तक विकास नहीं, केवल कर्ज पहुंचता है।

अन्ना हजारे ने प्रमाणित कर दिया है कि “भय बिन होए न प्रीत”। उनके इस अभियान ने युवा वर्ग की नींद उड़ा दी। सारे भेद भूलकर वे देश के लिए उठ खड़े हुए। इसका स्थायी लाभ तब मिलेगा, जब सम्पूर्ण मीडिया, पूरी शक्ति के साथ जनता की भाषा बोलेगा। मीडिया के धरातल से जनता के दर्द की चीखें सत्ताधीशों के कान तक पहुंचेगी। जब चुने हुए प्रतिनिधि अपना धर्म स्वयं निभाने लगेंगे।

मीडिया उनका पीछा करेगा। उनसे अपने स्वार्थ के लिए हाथ नहीं मिलाएगा। क्या नहीं हो सकता एक ही साल में? और क्यों नहीं होना चाहिए? मीडिया होकर यदि अपनी भूमिका नहीं निभाए तो इसका भी वैसा ही बहिष्कार क्यों नहीं हो, जैसा किसी जनप्रतिनिधि का? जब खोटा व्यक्ति मेरे घर में नहीं घुस सकता, तब खोटा मीडिया कैसे घुस सकता है? या तो मीडिया रहे ही नहीं, या फिर चौथा पाया ही बनकर रहे। जनता का विश्वासपात्र बनकर रहे। नहीं तो राजनेता की तरह घर बैठे।

ऎसे मीडिया को सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं पर भी रोक लगनी चाहिए। मीडिया हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है। लोकतंत्र बचाने में सहायक केवल मीडिया ही हो सकता है। पर हमारा दिखाई दे, पराए जैसा नहीं। युवा शक्ति को यदि सुनहरा भविष्य चाहिए तो मीडिया को विश्वसनीय बनाने पर सारा जोर लगा देना चाहिए।

न किसी नेता को गाली देने की कोई जरूरत पड़ेगी, न किसी अधिकारी को। ऎसे मीडिया पर कार्रवाई के लिए युवा शक्ति को आगे आना चाहिए। मीडिया के बाहर कहीं कुछ नहीं है। भविष्य तुम्हारा है, मीडिया तुम्हारा है, निर्णय भी तुमको ही करना है। ईश्वर तुम्हारे विवेक और उत्साह को सही दिशा में बनाए रखे।

गुलाब कोठारी

अप्रैल 11, 2011

अहिंसक आक्रामकता

सामन्ती शासन और लोकतंत्र में एक अन्तर यह भी है कि कानून लागू कैसे किया जाए? फरियादी की बात यदि बिलकुल नहीं सुनी जाए, जैसे कि हमारी राष्ट्रीय सेवाओं के अघिकारी नहीं सुनते तो यह सामन्तवाद में भी आसुरी प्रवृत्ति मानी जाती है। राजा को सजा देने का अन्तिम अघिकार प्राप्त होता है। चाहे सही, चाहे गलत! लोकतंत्र में सुनवाई के अनेक धरातल होते हैं।

 

आज पूरा देश भ्रष्टाचार को कोस रहा है, क्योंकि जायज मांगों की भी पूर्ति नहीं होती। मानवीय समस्याओं जैसे पीने का पानी, सफाई आदि की शिकायतों को सुनने के लिए भी किसी के पास कान नहीं बचे। मुंह सबके खुले हैं। क्या किसी अघिकारी की वाणी ‘जनता के सेवक’ जैसी है? क्या उसे याद है कि जो व्यक्ति सामने खड़ा है, वही उसकी तनख्वाह के लिए टैक्स भरता है।

 

कभी देखो किसी अफसर को, कैसे दुत्कारता है जनता को। यदि अफसर विशेष श्रेणी का हुआ तो बात शुरू करने से पहले ही दो-चार गालियां मां-बहन की दे चुका होगा। जैसे उसके तो मां-बहन होती ही नहीं। इसीलिए आज तो सरकारी वर्ग में भी धड़े हो गए। ठीक ये की ये दुर्दशा हमारे धर्म-गुरूओं ने कर रखी है। साम्प्रदायिकता तीसरा बड़ा मुद्दा है। आतंकवाद तो है ही। ये सारे विषधर देश को खण्डित कर रहे हैं। हमारी गौरव गाथा कह रहे हैं- विश्व को। इसी तरह के विष्ायों ने मिलकर भ्रष्टाचार को जीवनशैली का अनिवार्य अंग बना दिया।

 

सरकार (विधायिका और कार्यपालिका) तो लगता है जनता को मच्छर-मक्खी से अघिक मानती भी नहीं। राजनेताओं को तो जनता के बीच हर पांच वर्ष में जाकर रिश्वत देते रहना पड़ता है, वोटों के लिए।

 

अफसरों को कोई हिला भी नहीं सकता। इनके बिना मंत्री भी क्या कर सकते हैं। मंत्री अस्थायी, अफसर स्थायी। मंत्री/विधायक/सांसद अपने कार्यकाल में अपनी लागत निकालना चाहता है, अगले चुनाव की व्यवस्था करना चाहता है और कुछ कमाना भी चाहता है। अफसर मदद करता है। अपनी भी सेंकता है। अब न्यायपालिका में भी इस तरह के कई उदाहरण सामने आने लगे। उच्चतम न्यायालय के कई मुख्य न्यायाधीशों के भी नाम मीडिया में आ चुके हैं।

 

जनता को सदा मीडिया पर विश्वास रहा है कि मीडिया ऎसे मुद्दों को जनता के सामने लाता रहेगा। लाता भी रहा है। लेकिन मीडिया का ही एक हिस्सा व्यापारिक भी हो गया। अब लोकतंत्र के चारों पाये मिलकर ‘महातंत्र’ का रूप ले चुके। अब आम आदमी के पास जाने को कोई जगह नहीं बची। इसके अनेक दुष्प्रभाव देश के सामने आ चुके। सबसे पहला तो प्रभाव ‘वंशवाद’ की स्थापना करके लोकतंत्र का अपमान करना। इसी का दूसरा रूप बना अपराघियों का सांसद-विधायक के रूप में चुनाव होना, उनको मंत्री तक बना देना।

 

जितना काला धन अर्जित हुआ उसे सही हाथों में, सुरक्षित कैसे रखा जाए। इस समस्या ने नेताओं तथा बड़े अफसरों को माफिया श्रेणी के लोगों से जोड़ दिया। अपराघियों को टिकट के साथ लाइसेंस एवं ठेके भी मिल गए। सुपारियां तो इनको पहले भी मिलती थीं। इनका अघिकांश धन मादक द्रव्यों, हथियारों तथा शराब की तस्करी आदि में ही लगता है। वो भी पुलिस की देख-रेख में।

 

यह सब कल तक होता रहा होगा। हम सारे नागरिक आज से ही प्रण कर लें कि जागरूक रहकर संघर्ष करेंगे। अपने भविष्य को इन झूठे, आपराघिक प्रवृत्ति के जन प्रतिनिघियों के भरोसे नहीं छोड़ेंगे। अब वोट देकर पाच साल चुप नहीं बैठेंगे। हमारी इस भलमनसाहत का नेताओं/अफसरों ने खुलकर दुरूपयोग किया है। जिसको भी आप खुली छूट दोगे, वह ऎसा ही करेगा। चाहे आपका बेटा ही क्यों न हो। मानव स्वभाव से स्वेच्छाचारी है। उसे मर्यादा में रखने के लिए अंकुश चाहिए। यह अंकुश आगे से हमें लगाना है।

 

जनता आज लोकतंत्र के चारों पायों के घेरे में फंसी है। अत: कोई योजना हम तक नहीं पहुंचती। हम चारों पायों के आधार हैं तो हमें अपना वह रूप दिखाना भी होगा। हम न तो कानून बनाएंगे, न ही कानून हाथ में लेंगे। लेकिन जब भी किसी पाये से जुड़े व्यक्ति का व्यवहार लोकहित अथवा कानून के विरूद्ध देखेंगे, उसे दिया अपना आधार-सहारा खींच लेंगे। उसका सार्वजनिक बहिष्कार घोषित कर देंगे।

 

ऎसे नेता, अफसर और मीडिया की पहचान करना मुश्किल काम नहीं है। ऎसे नेता-अफसर जिनका भ्रष्टाचार के मामलों में नाम आ जाए, जो समाज सुधार के बजाय जातिवाद को बढ़ाने वाले कार्यक्रमों में जाएं, जो स्वयं आपराघिक छवि के हों, जिन पर मुकदमें चल रहे हों और जो अपराघियों के कार्यक्रमों में जाएं। जो चारित्रिक रूप से गिरे हुए हों। ऎसे अघिकारी जो सरकारी निर्णयों में जातिवाद, भाई-भतीजावाद के आधार पर पक्षपात करें और राजनेताओं के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा दिखाएं। इसी तरह जो मीडिया भ्रष्ट और अपराधी तत्वों के साथ जुड़कर धन कमाने में लग जाए, स्वयं माफिया की तरह व्यवहार करे। जनहित की परवाह ही नहीं करे।

 

हम न ऎसे मीडिया को घर में घुसने देंगे न ऎसे राजनेता-अफसर को अपने कार्यक्रमों में बुलाएंगे, न उसके यहां जाएंगे। जनप्रतिनिघि हुआ तो अगले चुनाव का फैसला भी साथ ही हो जाएगा। धर्म, जाति, स्त्री, पुरूष जैसे मुद्दे बीच में कभी नहीं आएंगे। हमारी यह एकता ही एक-एक करके सबका नशा उतारेगी। सबको उत्तरदायित्व का बोध भी कराएगी। समाज से भी जोड़ेगी। फिर नेता भी योजना पूरी कराएंगे, मंत्री भी क्षेत्रों पर ध्यान देंगे, अघिकारी भी प्रतिनिघि को वस्तुस्थिति से एक बार तो परिचय कराएगा ही और भ्रष्ट मीडिया भी या तो सुधर जाएगा नहीं तो निबट जाएगा।

 

लोकतंत्र में लोक और तंत्र दोनों ही व्यवस्थित बने रहें, इसके लिए आवश्यक  है कि दोनों की भागीदारी सामंजस्यपूर्ण हो। लोक ब्रह्म होता है और तंत्र माया। माया के जाल पर जब तक लोक का अंकुश है तब तक लोकतंत्र अक्षुण्य है। आज चूंकि तंत्र की ही माया काम कर रही है। इस माया को जड़ता के स्थान पर जाग्रत चेतना से ही सही दिशा, सही देश और सही काल के परिप्रेक्ष्य में संयमित रख सकते हैं। वर्ना तो सब चौपट ही समझो। हमारे किये का फल हमें तथा हमारी सन्तानों को ही भोगना है।

गुलाब कोठारी

अप्रैल 17, 2011

संघ का वेंटीलेटर

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लोकतंत्र संकट काल से गुजर रहा है। आचरण का अनाचार देश हित पर हावी हो रहा है। व्यक्तिगत स्वार्थ का जंग भी लोकतंत्र की हर कड़ी पर लग चुका है। आरक्षण और वंशवाद की अमरबेल फल-फूल रही है। राजनीति सुधारवादी होने के स्थान पर प्रतिक्रियावादी होती जा रही है। देशभर में इसका व्यापारिक स्वरूप फैलता जा रहा है। क्या पहुंचेगा नई पीढ़ी तक?

आज भी देश में कांग्रेस शक्तिशाली राजनीतिक दल है तथा भाजपा अब तक की सबसे कमजोर स्थिति में। सही बात तो यह है कि चुनाव भाजपा के नाम पर लड़ा जाता है और राजनीति संघ करता है। संघ यह कहकर चुनाव नहीं लड़ता कि वह एक गैर राजनीतिक संगठन है। उसका यह अहंकार कि भाजपा को वोट संघ ही दिलाता है, भाजपा के हाथ से सत्ता छीन कर हर जगह काबिज होने का प्रयास कर रहा है। संघ की छवि और भाजपा दोनों संकट में हैं।

अटल जी जब प्रधानमंत्री थे, तब संघ के साथ सेतु रूप आडवाणी को उपप्रधानमंत्री का दर्जा दिया गया था। संघ इस देश का सर्वाधिक व्यापक और अनुशासित संगठन है। इसका विकल्प भी देश में नहीं है। इसकी कमजोरी यह है कि यह उदारवादी नहीं हो सकता। अटल जी उदारवादी थे। दोनों में मतभेद न रहें, यह कार्य नीति निर्घारण के साथ ही संघ के साथ संवाद से तय हो जाए।

हुआ ठीक उल्टा। उप प्रधानमंत्री के अपने नए कार्यकाल में आडवाणी जी ने संघ के साथ संवाद ही नहीं रखा। आलोचना भी कर बैठे। उसी काल में सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन जैसे नेताओं ने अपने शब्द बाणों से भाजपा की जड़ें काटने में प्रभावी भूमिका निभाई। तीन-चार बार तो मेरी अटल जी से सीधी बात हुई इन नामों को लेकर। उनका कटाक्ष “हमारा दुर्भाग्य है” यह सब कुछ कह देता है। इसी काल में भाजपा का भ्रष्टाचार भी चरम पर पहुंच गया था। बड़े-बड़े नेता भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ गए थे। यह भाजपा के पतन की शुरूआत थी, जिसे “इण्डिया शाइनिंग” भी नहीं रोक पाया। अटल जी ने घुटने टेक दिए। भाजपा को चुनावी हार पच नहीं पाई।

बौखलाहट में कई बयान जारी हुए थे। उसी का एक परिणाम था कि कांग्रेस ने भाजपा के काम निकाल कर अन्दर-अन्दर हाथ मिला लिया। आज कांग्रेस निश्चिंत है कि भाजपा उसे कभी सत्ताच्युत नहीं करेगी। स्वयं सुषमा स्वराज, लालकृष्ण आडवाणी, अरूण जेटली जैसे दिग्गज अपनी-अपनी कुर्सियों को हाथ में लिए दौड़ रहे थे, देश उन पर हंस रहा था। इनका कोई आधार नहीं रहा देश में।

प्रश्न यह है कि भाजपा कमजोर हो रही है? किनकी वजह से हो रही है फिर उन्हें हटाने का फैसला कौन करेगा? उल्टे आप उन्हें प्रमोशन दे रहे हो। आखिर संघ के सामने ऎसी क्या मजबूरी है कि वो उसे गाली देने वालों को सहन कर रहा है। चाहे लालकृष्ण आडवाणी हों या सुषमा स्वराज अथवा फिर अरूण जेटली उन्हें अपनी मनमर्जी से पद और अधिकार लेने की छूट कैसे दे रहा है? भाजपा सही अर्थो में नेतृत्वविहीन हो गई है। वरना शीर्ष स्तर पर यह तमाशा नहीं होता।

शायद यही कारण था कि संघ ने भाजपा की सत्ता को गडकरी के माध्यम से सीधा हाथ में लेना उचित समझा। अब तो हर प्रदेश और हर संगठन के शीर्ष पर संघ ही है। यही भाजपा के दम घुटने का संकेत है। उम्र तो समय के हाथ है। संघ का वेंटीलेटर अब इसमें पुन: प्राण नहीं फूंक पाएगा। अगले चुनाव में भाजपा का क्या स्वरूप होगा, भाजपा संघ के नियुक्त अध्यक्षों और संगठन महामंत्रियों के चंगुल से कितना बच पाएगी, उसी पर भाजपा की भावी जीवन यात्रा निर्भर करेगी। संभावना कम ही है। संघ जहां भी नाराज होकर बैठ जाता है, भाजपा हारती ही है।

भाजपा को जितवा कर कीमत मांग कर टांग खींचना इज्ात बिगड़वाता है। यह बातें चुनाव पूर्व में तय भी हो सकती हैं। अब देर हो गई। भाजपा नेतृत्व शून्य है। संघ के सहारे टिकी हुई है। या तो संघ अपना “गैर राजनीतिक दल” का मुखौटा उतारकर राजनीति में उतरे या पूरी तरह बाहर रहकर अपने मूल उद्देश्यों पर टिका रहे। आज तो भाजपा का बेजान शरीर दिख रहा है। संघ शक्तियों का केन्द्रीकरण कर रहा है। अब तो “मराठा” पदाधिकारियों की नई खेप भी चर्चा का विषय बन चुकी है। देश को संघ की भी जरूरत है और भाजपा की भी।

आज दोनों की स्थिति देश को स्वीकार्य भी नहीं है। लाखों कार्यकर्ताओं के अनुशासित संगठन को यदि मुटी भर स्वार्थी तत्व नियंत्रण में करना चाहें, अपने स्वार्थ के आगे देश की बदनामी की चिन्ता न करें, भाजपा को जीवनदान मिलने की संभावना क्षीण जान पड़े तो कार्यकर्ता के मनोबल का क्या होगा। भाजपा नहीं रही तो लोकतंत्र में विपक्ष का नया चेहरा कैसा होगा? क्या विपक्ष के बिना कांग्रेस सामन्तवाद के रूप में देश को स्वीकार्य होगा? प्रश्न आज मूलत: संघ के पाले में ही है।

क्या वह भाजपा के पेड़ को फिर से हरा-भरा होने में मदद करेगा अथवा अमरबेल बनकर सदा के लिए धराशायी करना चाहेगा? संघ में अपनी संस्थाओं के प्रति मातृत्व का भाव रहना चाहिए, न कि संहारक का। संघ के कार्यकर्ताओं में भी साहस होना चाहिए कि जैसे वे बाहरी आलोचकों के प्रति आक्रामक होते हैं, वैसे ही अपने शीर्ष पुरूषों के विरूद्ध क्यों नहीं हों। यदि उनके आचरण से संघ जैसी विशाल संस्था का मान भंग होता हो। भ्रष्टाचार के विरूद्ध अभियान को भी नाटक ही मानेंगे, यदि घर से शुरू नहीं हुआ तो। पहले घर के बड़े भ्रष्टों का बहिष्कार करे संघ!

गुलाब कोठारी

अप्रैल 23, 2011

रिश्वत जिन्दाबाद!

हर युग के साथ जीवन के नियम बदलते हैं। इसी परिवर्तन का नाम युग है। प्रकृति हर युग में एक ही सिद्धान्त पर कार्य करती है। युग परिवर्तन का अर्थ भौतिक परिवर्तन, मूल्यों में परिवर्तन, लक्ष्य, गति और दिशा में बदलाव। आज तो जीवन पूर्णतया अर्थशास्त्र पर टिका हुआ है। अर्थ दृष्टि के आगे कोई दृष्टि जाती ही नहीं है। अर्थ की तीन दशाएं होती हैं: दान, भोग और नाश। भोग प्रधान जीवन और अर्थ का अनर्थ ही कलियुग की भाषा है।

हमारे वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक बहस के लिए एक मुद्दा छेड़ा है। विभाग के मुख्य सलाहकार कौशिक बसु ने सुझाव दिया है कि रिश्वत लेने और देने के प्रति भेद दृष्टि रहनी चाहिए। कानून में परिवर्तन किया जाना चाहिए कि जायज कार्य करवाने के लिए भी यदि दबाव में रिश्वत दी जाती है तो उसे लाचारी मानते हुए रिश्वत देने वाले को दोषमुक्त मान लेना चाहिए तथा रिश्वत लेने वाले की सजा दोगुनी कर देनी चाहिए। बसु का मत है कि इससे रिश्वत देने वाला आश्वस्त होगा कि यदि रिश्वत लेने वाले को पकड़वा दिया, तो उसकी राशि उसे वापस मिल जाएगी। रिश्वत के प्रकरणों में तेजी से गिरावट आएगी।

पिछले सालों में, देश में जितने भी कानून बने, संशोधित हुए, उनका इतिहास देख लें। कानूनी किताबें जनता की समझ में नहीं आती। लागू करने वाले लोग वही होते हैं। किसी कानून ने सामाजिक दशा में अपेक्षित सुधार किया हो तो बता दें। फाइलों में तो कुछ भी हो सकता है। बाल श्रम कानून हो, महिला बाल विकास, महिला सशक्तिकरण हो, परिवार नियोजन आदि किसी भी कानून को देख लें।

सब जगह विपरीत परिणाम दिखाई देंगे। हां, राजनेताओं और अधिकारियों की समृद्धि से जुड़े कानून अक्षरश: लागू होते हैं। बाकी जनता के सारे अधिकार रिश्वत की भेंट चढ़ जाते हैं। रिश्वत के उदाहरण स्वरूप हाल ही में जोधपुर के अरावली इंस्टीटयूट की जमीन का मुद्दा सामने आया। जिसके भू-परिवर्तन के आदेश प्राप्त करने के लिए वरूण आर्य को सपत्नीक दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर भूख हड़ताल के लिए बैठना पड़ा। कुल 145 घण्टों की भूख हड़ताल के बाद 18 अपे्रल को भू-परिवर्तनों के आश्वासन का पत्र प्राप्त हुआ।

अक्टूबर 2009 में आवश्यक कार्यवाहियां पूरी करने के बाद भी आदेश इसलिए नहीं मिल पाया क्योंकि जनप्रतिनिधि पांच लाख रूपए मांग रहा था। सरकार गूंगी हो गई। उच्च न्यायालय में फरवरी में याचिका लगाई, जिसकी अभी तारीखें पड़ रही हैं। जायज कार्य के लिए रिश्वत का इतना दबाव कि व्यक्ति भूख हड़ताल करके मरना पसन्द करे। इससे बड़ी बेशर्मी किसी भी सरकारी तंत्र की क्या हो सकती है कि रोजमर्रा के काम के लिए यह रास्ता अख्तियार करना पड़े। यह सामन्ती व्यवस्था से भी बुरा हाल है। दरिन्दों की गिद्ध दृष्टि में लोगों का मर जाना भी तो आज जायज हो गया है।

देश भर में आत्महत्याएं हो रही हैं और बसुजी कह रहे हैं कि मजबूरी में दी गई रिश्वत कानून सम्मत कर दी जाए। उनको मालूम है क्या कि बिना मजबूरी रिश्वत नहीं दी जाती? आज तो लोग रिश्वत में भी इज्जत मांगने लगे हैं। लेने वाला क्या लौटाएगा। हमने ऎसे भी कई उदाहरण देखे हैं। रिश्वत में धन भी काला ही काम आता है। जो प्रमाणित करना चाहेगा, उसके लिए सजा मिलने या न मिलने का भेद नहीं होता।

न वह किसी कानून का मोहताज होता है। प्रश्न तो यह है कि क्या ऎसे कानूनों से हम भ्रष्टाचार को प्रतिष्ठित नहीं करेंगे। अभी राडिया काण्ड में रिश्वत का जो खुलासा हुआ उसमें अम्बानी, टाटा, जैसे नाम करोड़ों क्या अरबों के लेन-देन में पकड़े गए। क्या ये लोग कभी रिश्वत लेने वालों की शिकायतें करेंगे? क्या हमारे प्रधानमंत्री या कोई भी विधान इन लेने-देने वालों को जेल में भेज पाएगा? कानून तो आज भी है। क्या विभिन्न दलों के नेता/मंत्री भ्रष्टाचार के कारण जेल जाते हैं? बल्कि इनको तो मुख्यमंत्री गोदी में खिलाते हैं। कमाऊ पूत की तरह।

इस कानून के प्रस्तावित बदलाव से बड़े स्तर का भ्रष्टाचार तेज गति से बढ़ेगा। मध्यम वर्ग तो हर हाल में मार खाने के लिए ही भारत में पैदा हुआ है। उसके जीवन की मोमबत्ती दोनों सिरों से जलती है। कानून का डर उच्च वर्ग को है ही नहीं और निम्न वर्ग का क्या चला जाएगा। जब रिश्वत देने वाला भय मुक्त हो जाएगा तो काम करने का मार्ग सुलभ हो जाएगा। उसे क्या पड़ी है शिकायत करने की। खेद की बात तो यह है कि सारे रिश्वत के प्रकरण इस बात का प्रमाण हैं कि उचित कार्य के लिए भी रिश्वत लेने वाला संवेदनहीन है।

उसे न तो देश से कोई लगाव है, न ही किसी व्यक्ति से। तब क्या अर्थ रह जाएगा कानूनों का और क्या अर्थ रह जाएगा लोकतंत्र का। आप अपने ही देश में बेगाने बनकर जीते रहो। कानून की आड़ में रिश्वत देना अनिवार्यता हो जाएगी। धन ऊपर तक बंटता है। शिकायत कर भी दोगे, तो किस-किस से वसूल पाओगे। अफसर, बड़े अफसर का नाम लेगा। बड़ा अफसर किसी मंत्री का।

मंत्री मुख्यमंत्री का तथा मुख्यमंत्री आलाकमान का। रिश्वत देने वाला आसमान को ताकता रहेगा। अपनी तकदीर के लिए भगवान का धन्यवाद करके सो जाएगा। जैसे आज नई पीढ़ी की जवानी सो रही है।

गुलाब कोठारी

अप्रैल 24, 2011

हजारों हजारे!

नेतृत्वहीन देश अभावग्रस्त जीवन की तरह भटकता है। न कोई गति, न कोई दिशा, न कोई संकल्प। भौतिकता का आवरण, अर्थ का बोलबाला, संकुचित व्यष्टिभाव सत्ता का पर्याय बन गया। इस कारण भुजबल, माफिया, तस्करी, हत्या, बलात्कार, द्वेष और ईष्र्या का वातावरण बढ़ता ही जा रहा है। जब अपनी सत्ता के सामने ईश्वर की सत्ता छोटी लगने लगती हैं। तब कोई अन्ना हजारे प्रकट होता है। सोती हुई जनता के कान में एक अलार्म बजा जाता है।

देश इतना बड़ा है, मुद्दे इतने सारे हैं, भाषाएं इतनी हैं कि एक अन्ना हजारे कुछ नहीं कर सकता। देश को सैकड़ों अन्ना चाहिए। अनिवार्य तो पहले यह है कि देश को जगाया जाए। कलियुग है। एक ही शरीर में सुर-असुर रहते हैं। जैसे ही असुर प्रकट हो, धावा बोलना पड़ेगा।

जैसे आजकल हमारी संस्कृति पर धावा बोला जा रहा है। एक बाबा रामदेव, दो सौ देशों में योगासन, शाकाहार, अध्यात्म की लहर चला सकते हैं, एक अवधेशानन्द स्वामी, मुरारी बापू, कमल किशोर नागर लाखों पाषाण ह्वदय लोगों को पिघला सकते हैं, अकेला राजस्थान पत्रिका दो करोड़ से अधिक पाठकों को सामाजिक सरोकार तथा संस्कार के क्षेत्र में नेतृत्व दे सकता है। सर्व सुविधा सम्पन्न राजनेता क्यों नहीं कुछ कर पाते।

आज देश में अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्रक्रिया रूक गई है। संत तो त्यागमूर्ति होते हैं। आत्म-कल्याण के लिए ही कार्य करते हैं। वे इस कार्य को सहज ही हाथ में ले सकते हैं। बीज रूप होते हैं। क्षमताओं से परिपूर्ण होते हैं। पेड़ बनाने के लिए बीज को अपना अस्तित्व भुलाना पड़ता है। रात में आत्म-जागरण और दिन में लोक चेतना जागरण में लगना होगा। यही आज हर स्वस्थ नागरिक का संकल्प होना चाहिए।

लोकतंत्र के प्रत्येक पाये के साथ एक अन्ना हजारे चाहिए। हर मीडिया हाऊस एक अन्ना हजारे बन सकता है। क्योंकि वह स्वतंत्र है। अब्दुल कलाम, अजीम पे्रमजी राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं में अलख जगा सकते हैं।

वकीलों के संगठनों को भी आगे आना चाहिए। बिना कपिल सिब्बल के। देश में अब तक जितने भी सांस्कृतिक धरातल के कानून बने और जिन्होंने बिना चिन्तन किए ही संस्कृति से खिलवाड़ किया, उनको बदलने के लिए सामाजिक बहस भी छेड़े तथा बदलाव के लिए भी दबाव डाला जाए। बड़े प्रशासनिक अधिकारियों, राजनेताओं के विरूद्ध कानूनी कार्रवाई हो।

आज तो इनको अभयदान प्राप्त है। तभी तो जनता के शत्रु बन बैठे हैं। बिना किसी अन्ना हजारे के ये नहीं मानेंगे। इनमें भी पुलिस तो राजनेताओं का ही कार्य करने में व्यस्त रहती है। वेतन किसी से लेती है, कार्य किसी अन्य के लिए करती है। क्या कहते हैं ऎसे लोगों को? इनके लिए तो हर प्रदेश में ही एक-एक अन्ना चाहिए। प्रत्येक राजनीतिक दल में भी हो फूल हजारे का।

हर क्षेत्र का एक हजारे, किन्तु एक दम अन्ना जैसा भी नहीं। जो खुद्दार हो, संकल्पवान हो, मातृभूमि को समर्पित हो। जिसकी आंख, देने पर टिकी रहे, लेने पर नहीं। हर सामाजिक मुद्दे पर, समस्या पर वैचारिक वैषम्यता पर युवा मैदान में उतरें। अभियान चलाएं, किसी के बहकावे में फिसलें नहीं, बिकाऊ लोगों के आगे टिकाऊ बनकर डटे रहें। पत्रिका तो साथ ही होगा। मुद्दा भी उठायेगा। हर मुद्दे को अंजाम तक ले जाएं। अन्ना के आंदोलन में हुए बिखराव के कारणों को भी ध्यान में रखें। हर समस्या को निराकरण के फूल चढ़ाएं। अपराधी सामने आ जाए तो तुरन्त उसके बहिष्कार की घोषणा भी करें। इस बीच यदि नकली अन्ना घुस जाए तो उसका इलाज भी कर दें।

आज दृढ़ इच्छाशक्ति वाले अन्ना हजारे चाहिए। तब देश बनेगा, देश का, नई पीढ़ी का भविष्य बनेगा। इन्हीं अभियानों में से नेतृत्व भी नया निकलेगा। पुराने सड़ने लगे हैं, फैंक देना हैं। उठो, बनो हजारे अन्ना!

गुलाब कोठारी

पत्र

प्रत्येक अभिव्यक्ति में शब्द होते हैं, ध्वनि होती है। यहां तक कि यह ध्वनि लिखने में भी लेखक को सुनाई देती है। पढ़ने में पाठक को सुनाई देती है। चेहरे भी लिखने-पढ़ने वालों के एक-दूसरे को दिखाई पड़ते हैं। भले अनजान ही क्यों न हों। इसी को तो पश्यन्ति (देखना) कहते हैं। इसके बाद मध्यमा और वैखरी-शब्द और भाषा। जब लोग बोलने से पूर्व भी नहीं सोचते, तब लिखने से पहले कैसे सोच लेंगे। और वह भी सूक्ष्म तरंगों को। आज तो ई-मेल का युग है। वहां पश्यन्ति होती ही नहीं। अनुभूत नहीं हो पाती।

एक समय था जब हम एक-दूसरे को पत्र लिखा करते थे। पत्र को हाथ में लेते ही मन आनन्दित हो उठता था। उस लिखने वाले का चेहरा सामने आ जाता और अनुमान लगाते कि क्या लिखा होगा। जैसे-जैसे नई तकनीक आती गई, यह सुख पीछे छूटता चला गया। जो नित्य पत्र के सहारे संपर्क में रहते थे, वे घोर निराश हो गए। उनको फोन पर होने वाली बातचीत में वैसा सुख नहीं मिलता।

पत्र आना मन का उत्सव होता था। उसी प्रकार पत्र लिखना भी अनुष्ठान से कम नहीं होता था। अनपढ़ और नि:शक्त जन जब किसी से पत्र लिखवाते थे, उनके ह्वदय की हिलोरों को देखते ही बनता था। ये हिलोरें ही पत्र की शक्ति होती थी। पढ़ने वाले तक पहुंचती थी। पढ़ने वाले के ह्वदय में भी हिलोरें उठने लगतीं। मन से मन की बात। संप्रेषण का अद्भुत जरिया। व्यष्टि रूप पत्र का समाचार पत्र के रूप में समष्टि रूप सामने आया। लिखने वाले भी अनेक, पढ़ने वाले भी अनेक। आज इसमें से आदमी बाहर निकल गया। लिखने वाला पत्रकार पढ़ने वाले को दिखाई नहीं पड़ता। चेतनाविहीन संप्रेषण रह गया। अत: पत्रकार भी यंत्रवत् संवेदनहीन हो गया। बुद्धि विलास मात्र रह गया। अहंकार की तुष्टि, महत्वाकांक्षा, स्वार्थपूर्ति आदि ने इसे व्यापार का रूप दे दिया।

अब समाचारों के विषय पढ़ने वालों के लिए हितकारी हों, यह आवश्यक नहीं रह गया। लोकहित और लोकतंत्र, जिस नाम से समाज में प्रतिष्ठित हुए थे, दोनों ही विस्मृत होने लग गए। यहां तक कि स्वयं समाचार भी गौण होते जान पड़ते हैं। लक्ष्य तो विज्ञापन बनते जा रहे हैं। सिद्धान्तवादी सम्पादकों की ऎसे पत्रों को आवश्यकता ही नहीं लगती। व्यवस्थापक लगने लगे हैं।

पत्रकार बड़ा इसलिए माना गया कि वह एक साथ अनेक पाठकों का हित चिन्तन करता है। पत्र में लिखने से ही कोई पत्रकार नहीं हो जाता।
संप्रेषण का एक सिद्धान्त है जिसके कारण जीवन में पत्र का मूल्य अथवा महत्व होता है। पत्र में लिखने वाले के मनोभाव होते हैं। पूर्ण मनोयोग से लिखा जाता है। अत: पढ़ने वाले को मन की वह भाषा सुनाई देती है। लिखने वाले का चेहरा बात करता जान पड़ता है। वही संप्रेषण याद भी रहता है। स्मृति में स्थान बना लेता है। उसका न तो आकलन किया जाता, न उसकी किसी तरह की आलोचना ही होती है। बस, दो व्यक्ति होते हैं-लिखने वाला-पढ़ने वाला।

समाचार-पत्र का लेखन इसीलिए कठिन होता है कि उसे हर श्रेणी और समझ के पाठक पढ़ते हैं। श्रमजीवी, बुद्धिजीवी, मनोजीवी एवं आत्मजीवी। अत: पत्रकार की कलम इतनी दक्ष हो कि इन सबको संतुष्ट कर सके। पत्रकार स्वयं किस धरातल पर जीने वाला है, उस पर भी बहुत निर्भर करेगा। पुराने पत्रकार बुद्धिजीवी माने जाते थे। आज तो स्वेच्छा से श्रमजीवी बन गए। तब समाज के लिए शिक्षक की भूमिका कैसे निभा सकते हैं। इसके लिए सांस्कृतिक धरातल का बड़ा और मजबूत होना भी अति आवश्यक है। पाठक के श्वास के साथ जुड़कर शब्दों के स्पन्दन रक्त को प्रभावित कर सकते हैं? पाठक की प्रकृति और आकृति को बदल सकते हैं? पांच-छह घण्टे का नित्य पढ़ने का अभ्यास भी चाहिए। पत्रकार को ज्ञान का अभाव महसूस ही नहीं होता। न समाचारों में सम्बोधन होता है।

सम्बोधन व्यापारिक भी हो सकता है, आत्मीयता का भी और शुद्ध बुद्धिमता का भी। वैसी ही छवि समाज में पत्रकार की बनती है। आजादी के संघर्ष में पत्रकार निर्भीक थे क्योंकि अपने संकल्प पर दृढ़ थे और लिखने को स्वतंत्र भी थे। आजादी के बाद ऎसे पत्रकारों की संख्या घटती गई। सम्पादक के ऊपर स्वामी के निर्देश हावी होने लग गए। जहां स्वामी स्वयं सम्पादक का कार्य कर रहे थे, वे निर्भीक भी रहे और संघर्ष भी करते रहे। आज भी ऎसे पत्रकारों की स्वतंत्र श्रेणी है, पहचान है। वे तपने को तैयार रहते हैं। उनका सपना, उनका जीवन अपने पत्र से भिन्न नहीं होता।

वे ही समाज को रूपान्तरित कर सकते हैं। उनकी अभिव्यक्ति ही लोकतंत्र के लिए प्रकाश स्तंभ बनती है। पाठक उनसे ही जुड़ते हैं। अखबार पाठकों से जुड़े यह महत्वपूर्ण नहीं है। पाठक का अखबार से जुड़ना महत्वपूर्ण है। इसके लिए हर पत्रकार को एक कलाकार की तरह भूमिका निभानी चाहिए। शरीर के श्रम और बुद्धि के कौशल के सहारे मन के भावों को अभिव्यक्ति देनी होगी। तब जाकर अभिव्यक्ति कला बनेगी। तब पढ़ने वाले के मन को छू सकेगी।

पत्रकार पहले स्वयं से प्रश्न करे कि वह पाठक को पत्र क्यों लिखना चाहता है। क्या परिणाम अपेक्षित है अथवा मात्र सूचना ही देना है। क्या पाठक का रूपान्तरण चाहता है। क्या पाठक का आशीर्वाद चाहता है। वे सारे प्रश्A सामने रहें जो किसी मित्र या सम्बंधी को पत्र लिखते समय होते हैं। इसका अर्थ यह है कि पत्र में वह स्वयं भी रहे और उसका पाठक भी हर शब्द में साथ चले। आज क्या हो रहा है? मान लेे कि पत्र लिखने वाले आदमी को पत्रकार कहते हैं। उसकी जगह “पत्र” लिखने वाले को पत्रकार कहते हैं।

आदमी गायब हो गया। पदार्थ रह गया। जड़ ही जड़। इसके साथ जुड़कर चेतना भी जड़ हो गई। क्योंकि वह भी पाठक के स्थान पर धन (जड़) के पीछे भागने लगी। कला भाग समाप्त हो गया। यह कलम किसी का दिल नहीं छू सकती। स्वयं बेदिल है।

पत्रकारिता निर्जीव बन गई। पत्रकार किसी को पत्र भी लिखे और दिल को न छू सके तो? क्या समाज में कोई बदलाव ला सकता है? नहीं। अपना पेट भर सकता है, बस।

जब पढ़ने वाला लिखने वाले को नहीं पहचान सके तो लिखने की सार्थकता? आवश्यकता इस खोती हुई विरासत को फिर जीवन से जोड़ने की है। पत्र लिखने का अभ्यास शुरू होना चाहिए। हाथ से और पूर्ण मनोयोग से लिखें। जीवन में इस छोटे से संकल्प से मिठास की एक धारा बहने लगेगी। पीने वाले की तृप्ति की अनुभूति आपकी शक्ति होगी। मिठास से सींचने का यह अभ्यास भक्ति का ही दूसरा नाम है। पत्रकार चाहे तो इसे सहज ही प्राप्त कर सकता है। लाखों लोगों के दिलों में जगह बना सकता है। इसी का सुख आनी वाली पीढ़ी को मिलेगा।

गुलाब कोठारी

मई 1, 2011

सम्मान

मानव सामाजिक प्राणी भी है और व्यक्तिगत स्तर पर स्वतंत्र और अकेला भी जीना चाहता है। भारतीय दर्शन में अकेला जीना, स्वयं के लिए जीना निषिद्ध भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। समूह ही सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का हेतु भी था।

व्यक्तिगत पहचान के लिए जीने का मार्ग खोला आज की शिक्षा पद्धति ने। आप घरों में होने वाले पंरपरागत गीत-संगीत का स्वरूप देखें, तो वह भी समूह में ही रहा। जाति-समुदाय के रीति-रिवाज सामूहिक रहे। भाईचारे का एक वातावरण पूरे समूह पर छाया रहता। सुख-दु:ख में भागीदारी बहुत बड़ा संबल होती थी। यह समानता ही सम्मान था व्यक्ति का। समूह की मुख्य विशेषता ही यह थी कि वहां कोई छोटा-बड़ा नहीं होता था। धन, पद आदि सब बीच में नहीं आते थे। शिक्षा ने नौकरी का रास्ता दिखाया। घर से अलग होना मजबूरी बन गया।

व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं स्वच्छन्द होकर हावी होने लगीं। पुश्तैनी ज्ञान का साथ छूट गया। पराधीन भी हो गया और असुरक्षित भी। अकेले होते ही पूरी जीवनशैली बदल गई। परम्परागत वार-त्यौहार, रीति-रिवाज आदि अकेले रहने के कारण छूट गए एवं विकास की दौड़ में पीछे रह गए। छुियों का कलैण्डर जीवन का आधार बनकर रह गया। सम्मान शब्द की सार्थकता भी छूट गई। परिवार में कभी-कभी बहस हो जाती है। सम्मान कोई दूसरा करता है। जब व्यक्ति अपने अलावा किसी अन्य के लिए या समाज के लिए कुछ करने की क्षमता प्रदर्शित करता है। आज राजनीति में सम्मान और अपमान का भेद ही समाप्त हो गया। गुणों का होना भी अनिवार्य नहीं है। समान का साधारण अर्थ बराबरी का ही होता है।

सम्मान सहित। प्रतिष्ठा, मानता, प्रमाण आदि अर्थो में भी समान का प्रयोग होता है। यहां मान का अर्थ गर्व और ईष्र्या रूप में नकारात्मक भाव से भी होता है। व्यवहार में ये सारे पक्ष गौण हो जाते हैं। जब भी दो लोगों के बीच व्यवहार होता है, समानता का भाव ही श्रेष्ठ होता है। जहां भी इस भाव में कुछ कमी आई, समझो कुछ मिठास कम हो गया। यदि आत्मा के स्तर पर सब बराबर हैं और एक ही ईश्वर के सब अंश भी हैं, तब असमान तो हो ही नहीं सकते। बड़े होकर तो बच्चे भी मित्र बन जाते हैं। समानता सदा आत्मिक धरातल से अनुभूत होती है जो मन के पास ही होता है।

बुद्धि से कुछ दूर दिखाई पड़ता है। अत: बुद्धिमान व्यक्ति के व्यवहार में समानता का भाव कम ही दिखाई पड़ता है। ऊष्णता के कारण वह तोड़ने के गुणों से युक्त रहता है। मिठास पाने के लिए मनस्वी की ओर भागता है। मिठास समानता का ही परिणाम होता है। इसके कारण ही आया हुआ व्यक्ति खाली नहीं लौटता। प्रकृति ने नर-नारी को पूरक के रूप में पैदा किया, ताकि एक-दूसरे की जरूरत भी बनी रहे, आकर्षण शक्ति भी बनी रहे और समानता का भाव भी। समानता के मूल में केवल दृष्टि भेद ही है। गुरू शिष्य को यदि समान मानकर शिक्षित करता है, तभी उसे गुरू पद पर बिठाकर प्रसन्न हो सकता है। अपना प्रतिनिधि मान सकता है। यहां स्वयं गुरू भी निमित्त रहता है। ज्ञान वह अपने गुरू से ग्रहण करके शिष्य को देता है। पिता-पुत्र की स्थिति भी ऎसी ही है। पति-पत्नी के बीच समानता की परिभाषा समय के साथ तेजी से बदली है। इसमें विसंगति यह है कि हम जीना तो भारत में चाहते हैं, किन्तु जीवन शैली भारतीय हो यह हमको स्वीकार्य नहीं है। यही जीवन के हर क्षेत्र में असमानता की शुरूआत है। समानता दृष्टि है, नियम-कायदे का नाम नहीं है।

अवसर की समानता, सुविधाओं की समानता ही समान सूचक है। एक-दूसरे की नकल करना समानता नहीं है। “सहधर्म चरताम्” समानता सूचक है। गृहस्थी का सारा भार नारी पर थोपकर तटस्थ पुरूष कैसे सुखी रह सकता है। पत्नी की तरह पति को भी पत्नी के प्रति समर्पण करना पड़ेगा। आवश्यकतानुसार श्रद्धा, वात्सल्य, स्नेह आदि भी प्रकट करने होंगे। क्योंकि भारतीय विवाह सामान्य लोकानुबन्ध नहीं है। एक ही संवत्सर आत्मा के अर्घवृगलात्मक (दाल जैसे) दो भूतात्माओं का समन्वय माना गया है। यही इनकी पूर्णता का कारण है, पूरकता का प्रमाण है और समानता की दृष्टि है। भौतिक दृष्टि की समानता के लक्षण स्थूल होते हैं। आज समानता का अर्थ हुआ हर कार्य में दोनों का बराबर हाथ बटाना, हर सुविधा एवं स्वच्छन्दता की बराबरी। वासना-व्यसन में पूर्ण स्वतंत्रता। शिक्षा-नौकरी-खान-पान में बराबरी।

दोनों अपनी-अपनी बुद्धि के सहारे ताल ठोकते रहें, उलझते रहें समानता के नाम पर। इसी दृष्टिकोण पर आज के कानूनों ने भी मोहर लगाई है। न इसमें संस्कृति का ध्यान रखा गया, न विदेशों में इन कानूनों के प्रभावों पर शोध हुआ। पुरूष को बच्चे पैदा करने के लिए कानून क्यों बाध्य नहीं करता? स्त्री को ही बच्चे पैदा करने हैं तो विवाह पूर्व इस विषय की जानकारी कानूनी रूप से अनिवार्य क्यों नहीं हो सकती? क्योंकि जो शिक्षा लड़कों को नहीं दी जाती, वह केवल लड़कियों को कैसे दी जा सकती है। उनको लड़कों जैसी शिक्षा देना ही समानता का प्रमाण है। यहां तक कि आज की माताएं भी इस बोझ को अपने सिर नहीं लेती। शादी के बाद बेटी जाने और उसका भाग्य! हमने तो उसे बेटे जैसे ही पाला है। कोई किसी तरह का भेद महसूस होने नहीं दिया। यही अगर दर्द और वात्सल्य की भाषा और परिभाषा रह गई तो यह सिद्ध हो जाता है कि आज का उच्च शिक्षा प्राप्त मानव भी जैविक सन्तान पैदा कर रहा है। जब उसमें ही संवेदना नहीं है, तो संतान के पास कहां से आएगी? संपन्न परिवारों की çस्त्रयां तो गर्भकाल में भी इतना व्यसनों (शराब-तंबाकू) का सेवन करती हैं, कि उनकी सन्तानों पर भी इसका प्रभाव पड़ने लगा है। विकसित देशों की यही कहानी हमारे सामने है। समानता की भ्रामक परिभाषा ने हमें सम्मान से वंचित कर दिया है।

क्या बाहरी परिवेश के साथ भीतर का व्यक्ति बदल सकता है? त्रेता-द्वापर में भी हम ही थे। वे कहानियां आज भी हम पर लागू होती हैं। कौन किस-किस शरीर में जीता हुआ यहां पहुंचा, किस-किस रूप में हमारा आदान-प्रदान रहा होगा। यदि इन प्रश्Aों पर सोचे तब समानता का पहलू क्या? जब व्यक्ति विद्या (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य) का सहारा लेकर पुरूषार्थ करता है (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) तब दोनों का मूल समानता दिखाई देता है। दोनों ही एक धर्म पर आधारित हैं।

समानता एक ही दिशा तथा एक ही मार्ग (धर्म) की ही होती है। जब लक्ष्य भी एक हो, लक्ष्य के प्रति संकल्प भी एक हो, पूर्ण दृढ़ता हो, सहयात्रा का सपना हो, तब समानता संभव है। जिससे भी मिले उसे अपनी यात्रा में जोड़ लें अथवा उसकी यात्रा में शामिल हो जाएं। समानता का एक अर्थ है-वह ही मेरी पूर्णता है।

गुलाब कोठारी

मई 3, 2011

भोजन का महत्व

जीवन में शक्ति का आदान-प्रदान निरन्तर क्रम के रूप में चलता रहता है। एक से दूसरे का और दूसरे से तीसरे का निर्माण होता है। सृष्टि के इस क्रम को हम अपने ही शरीर में देख सकते हैं। एक कहावत है- “जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।”

हम जो भोजन करते हैं उससे हमारा शरीर बनता है। इसको आधुनिक चिकित्सा शास्त्र भी मानता है। भारतीय ज्ञान इससे भी ऊपर है। भोजन के साथ भाव का भी महत्व है, क्योंकि इससे खाने वाले का मन तुष्ट होता है। भोजन किस भावना के साथ बनाया गया, किस भाव और दुलार के साथ खिलाया गया, किस वातावरण और मनोभाव से भोजन ग्रहण किया गया, आदि बातों का सीधा प्रभाव मन पर पड़ता है।

व्यक्ति मन की इच्छाएं पूरी करने के लिए कर्म करता है। इच्छा व्यक्ति की मर्जी से पैदा नहीं हो सकती। पूरा करना या न करना व्यक्ति की मर्जी है। जब इच्छा किसी अन्य शक्ति से पैदा होती है और वही हमारा जीवन चलाती है, तो स्वत: ही हम निमित्त बन जाते हैं। हमारा बुद्धि तंत्र निर्णय करता है, योजना करता है और उसी के अनुरूप शरीर को निर्देश देता है। शरीर कार्य में लग जाता है। इसका अर्थ यह निकला कि मन राजा है, बुद्धि और शरीर सेवक हैं। अत: मन, जो हमारी पहचान है, को शक्तिवान बनाना हमारा प्रथम धर्म है, ताकि हमारी पहचान भी वैसी ही बने।

इसका सरलतम और मुख्य मार्ग है- भोजन। भारतीय संस्कृति में हर खुशी की पहली अभिव्यक्ति भोजन ही है। जन्म, विवाह आदि से लेकर जीवन की हर खुशी पर खाना, दावत, पार्टी से आगे कोई अन्य अपेक्षा क्यों नहीं रखता? क्योंकि इसके साथ जीवन-शक्ति जुड़ी है। इससे मन पल्लवित होता है। इसमें वातावरण भी अपना योगदान करता है।

भोजन शरीर में पहुंच कर रस बनाता है। रस से रक्त, मांस, मेदा, मज्जा, अस्थि और वीर्य बनते हैं। जो बचता है वह मल-मूत्र के रूप से बाहर निकल जाता है। यहां स्थूल निर्माण कार्य समाप्त हो जाता है। वीर्य आगे ऊर्जा के रूप में परिवर्तित हो जाता है, इसी से व्यक्ति का मन बनता है। चेहरे का “ओज” इसी से आता है। यही व्यक्तित्व की पहचान बनता है। ब्ा्रह्मचर्य का महत्व भी इसी संदर्भ में समझना चाहिए।

भोजन के गुण- सत्व, रज, तम ही हमारे व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण अंग बनते हैं। अत: भोजन हर दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

गुलाब कोठारी

मई 6, 2011

सम्मान करें!

पिछले कुछ वर्षो में भारत में भी नर-नारी के आपसी व्यवहार, जीवन शैली और दृष्टि में अनेक परिवर्तन आए हैं। कुछ परिवर्तन शिक्षा के कारण आए हैं। कुछ परिवर्तन सत्ता के अहंकार रूपी आक्रमण से आए हैं। कुछ परिवर्तन विदेशी जीवन शैली की नकल, स्वच्छंदता तथा मीडिया (विशेषकर टीवी, सिनेमा, इंटरनेट) के प्रभाव से भी हुए हैं। परिणाम देखकर नहीं कहा जा सकता कि कोई सामाजिक परिवर्तन कर पाए हैं। नए कानूनों ने तो वैवाहिक सुख-शान्ति को चौपट ही कर दिया। देश के सत्ताधीश इसी पर ठहाके लगाकर विजयगान गा रहे हैं।

महिला सशक्तीकरण के नाम पर जो दुर्दशा नारी की हुई है और आने वाले समय में होगी, ईश्वर भी नहीं बचाने वाला। सारा पश्चिम साक्षी है कि सत्ता के विकासवादी अंधकार और अहंकार ने नारी को कहां खड़ा कर दिया है। ठीक उसी मार्ग पर हमारा देश आंखें मूंदकर दौड़ा जा रहा है।

वैसे तो देश का प्रशासन अभी तक पुरूषवाद से ऊपर नहीं उठ पाया। अत: यह महिलाओं के साथ विकास में सहयोग कर पाएगा, सम्भव ही नहीं है। सरकारी सेवा में जो 20-25 वर्ष रह चुकी हैं, उनका साक्षात्कार आपकी आंखें खोल देगा। महिला आरक्षण बिल पास हो गया, तो महिलाएं पुरूषों के चक्कर लगाकर हांफ जाएंगी। मिलेगा कुछ नहीं। दहेज विरोधी कानून का लाभ अधिक हुआ या घर में बदला लेने का नया हथियार बन गया। अब लिव-इन-रिलेशनशिप का कानून आने दीजिए। सारा नशा चूर होने में देर नहीं लगेगी। देश की आम महिला को तो इस कानून की कोई जरूरत नहीं है।

पुरूषों को तो रत्तीभर भी नहीं है। इनी-गिनी औरतों को खुश करने के लिए देश की संस्कृति से बड़ा भौंड़ा खिलवाड़ हो गया।

आजकल खूब जोर-शोर से सरकारी अभियान चल रहे हैं कि अक्षय तृतीया पर होने वाले बाल-विवाहों को सख्ती से रोका जाएगा। मां-बाप को पुलिस की लाठियां खानी पड़ेंगी। सरकार के किसी अधिकारी को यदि आप यह कह दो कि इनका असली विवाह तो अठारह साल की उम्र के बाद (गौणा) होता है। तब तक तो इसे सगाई मान सकते हैं। इस बात पर अधिकारी और समाज की विकासवादी महिलाएं आपके कपड़े फाड़ देंगे।

क्योंकि वे हर परम्परा को रूढि मानते हैं। आप पुरातनपंथी, दकियानूस और न जाने क्या-क्या पदक प्राप्त कर लेंगे। लेकिन यही लोग कितने खुश हैं कि अब नये कानून की छत्र-छाया में बारह साल से बड़े बच्चे (स्कूली छात्र-छात्राएं) स्वेच्छा से शारीरिक सम्बन्ध बना सकेंगे। यह कानून तो मानव और पशु में भेद ही समाप्त कर देगा और इस पर हमारा विकासवादी समाज गौरवान्वित होगा। यह स्वच्छन्दता किसको और क्यों दी जा रही है। इसका प्रभाव किस प्रकार का समाज पैदा करेगा।

हम बच्चों को किस मार्ग पर जाने की प्रेरणा दे रहे हैं। पहले ही जितना जहर सिनेमा-टीवी-इंटरनेट ने घोल रखा है, उससे मां-बाप का दम घुट रहा है। चलती हुई क्लास से लड़के-लड़कियां दो-तीन पीरियड के लिए भागते हैं, पुलिस उनको यूनिफार्म में होटलों से पकड़कर मां-बाप को फोन करती है।

इस कानून के बाद नई प्रकार की समस्याएं समाज के सामने आने वाली हैं। गर्भपात, विवाह पूर्व सन्तान और तलाक की तेज गति से समाज/देश चरमरा जाएगा। आज भी मां-बाप तलाक के नाम पर बेटियों का किराया मांगने लग गए। एक बेटी के दो-तीन तलाक जीवनयापन के लिए काफी हैं। पहले दहेज का भूत लड़के वालों के पक्ष में वसूली करवाता था। इंसान का कोई सम्मान ही नहीं।

विरोधाभास तो अब दूर नहीं किया जा सकता। अब हमारे नए कानून सांस्कृतिक धरातल पर बनते ही नहीं। उन सारी गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हैं जिनका हमारे निषेध हैं या सुख छीनने वाले हैं। çस्त्रयों को पीहर की सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए। तब ससुराल में वह मालकिन कैसे बन पाएगी। न पीहर में उसका कोई स्वागत करेगा, न ही ननदें उसे छोड़ेंगी। होना तो यह चाहिए कि कोई भी नया कानूनी प्रारूप यदि हमारी संस्कृति को प्रभावित करता है तो बिना सामाजिक बहस के निर्णय नहीं होना चाहिए।

इसी प्रकार बारह साल की उम्र में बच्चों को शारीरिक सम्बन्धों की छूट देना और छोटी उम्र में होने वाली सगाई पर सरकार की लाठियां बरसाना न्यायसंगत नहीं है। हां, एक शर्त हो सकती है कि अठारह साल की होने तक कन्या मायके में ही रहेगी।

जो भी हो आने वाला समय, इस नए परिवेश में, भारतीय नारी के लिए बड़े मानसिक द्वन्द्व का होगा। मां-बाप भी मदद नहीं कर पाएंगे। कन्या भू्रण हत्या की बढ़ती दर इसकी साक्षी है।

गुलाब कोठारी

मई 8, 2011

मां

प्रकृति और पुरूष मिलकर सृष्टि उत्पन्न करते हैं और उसे चलाते भी हैं। सृष्टि में पुरूष बस एक है-अव्यय पुरूष और इसी का अंश ले-लेकर माया (प्रकृति) भिन्न-भिन्न रूपो में सृष्टि का निर्माण करती हैं।

पुरूष शक्तिमान है, किन्तु कत्ताü भाव उसमें नहीं है। कत्ताü भाव सारा माया का ही है। हमारा सिद्धान्त अर्द्धनारीश्वर पर टिका है और सृष्टि की हर मादा में प्रकृति अंश (सोम) अधिक रहता है। यह सोम ही रस प्रधान मिठास का तžव है।

मिठास ही आकर्षण का कारण भी है। इसी से संकुचन का भाव बना होता है। माया के स्पन्दन ही सृष्टि का संचालन करते हैं। अत: नारी, स्त्री, पत्नी और मां रूप से मानव सृष्टि एवं संस्कारों को धारण किए हुए है। माया प्रकृति रूप में तीन गुणों को धारण करती है-सत-रज-तम। तीन प्रकार की सृष्टि पैदा होती है। पशुभाव/ अज्ञान भाव सारा तम रूप है।

सृष्टि के सभी नर-मादा इससे बाहर नहीं होते। कुछ नर-नारी भी पशुओं की तरह आहार-निद्रा-भय-मैथुन तक पशु की तरह जीते हैं। कुछ रजोगुणी होते हैं। विवाह से पूर्व लड़का-लड़की में पौरूषेय भाव (अगिA) की प्रधानता के कारण विकास ऊध्र्वमुखी होता है।

विवाह के बाद रजोगुण बढ़ता है। लड़की में स्त्रैण तžव बढ़ता भी है और जो दबा था वह प्रस्फुटित भी होता है। यह स्त्रैण भाव नारी को पत्नी बनाता है। पूरा गृहस्थाश्रम इसी आधार पर टिका है। बिना स्त्रैण भाव के पौरूष सु# रहता है। पत्नी (संकल्पित स्त्री) का कार्य साधारण नारी नहीं कर सकती। वहां तो तमस है। प्रवाह पतित करेगी। संकल्प में श्रद्धा और समर्पण है। सतोगुणी मार्ग है। इस पंथ का अन्तिम पड़ाव या शिखर ही “मां” है।

पशुवत जैविक सन्तान पैदा करने वाली “मां” नहीं हो सकती। ऎसी मां को सन्तान के बारे में किसी तथ्य की जानकारी नहीं होती। न वे सन्तान को संस्कार दे पाती हैं। कब गर्भवती हो गई, प्रसव हो गया और मां बन बैठी। कोई शिक्षण-प्रशिक्षण कुछ नहीं। एक मकान का निर्माण कर दिया। घर बस गया। गृहस्थी नहीं शुरू हुई।

गृहस्थी की मां हर सदस्य की मां होती है। दुर्गा या लक्ष्मी क्या किसी एक की मां हो सकती है? मां किसी शरीर का नाम नहीं, पोषणकर्ता की अवधारणा है। मां के लिए सृष्टि में कोई पराया नहीं होता।

घर में बच्चों का मां, पति रोगी हो तो उसकी भी मां, सास-ससुर की सेवा में भी मातृभाव और स्त्रैण मिठास। हमारा परिवार सुबह चाय पीने बाहर खुले में बैठता है। पोते-पोती को जमीन पर बिठाने में डर लगता है। सामने “मां” अनाज साफ करती रहती है।

हजारों-हजार मकोड़े मुंह में गेहूं-दाल आदि लेकर रेले में चलते रहते हैं। “मां” कहती हैं- “मैं जीऊंगी तब तक तो ऎसे ही चलेगा।” इसी प्रकार घर में किसी भी अवसर पर खाना बने, पहले अनाथाश्रम, अपाहिजों, कोढियों के आश्रम जाएगा। आप भले ही मेहमानों की संख्या में कतरब्यौंत करते रहो।

जब तक औरत का शरीर दिखाई देता है, “मां” दिखाई नहीं देगी। उसके बनाए हुए खाने में जीवन के संदेश नहीं सुनाई देंगे। रसोईये के खाने में कोई सन्देश नहीं होता, चाहे घर का हो या किसी होटल का। आपको स्पन्दित ही नहीं करेगा।

नई शिक्षित मां रसोई से बाहर आ गई। भोजन निर्जीव हो गया। “जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।” पत्नी का बनाया खाना स्त्रैण भाव, स्नेह, प्रेम पैदा करता है। मां का बनाया खाना भक्ति मार्ग, निर्मलता, समष्टि भाव देता है। पुरूषार्थ के अन्तिम पड़ाव-मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

ऎसी मां को बच्चे के भविष्य की कभी चिन्ता नहीं होती। किसी भी अन्य प्राणी की मां को देख लें। बच्चा तैयार हुआ और चल दिया। कौन मां प्रतीक्षा करती है, उसके लौटने का? हां, पति की प्रतीक्षा रहती है। मानव मां को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। अन्य प्राणी भोग योनि में रहते हैं, मानव योग/ कर्म प्रधान योनि में जीता है। इस योनि का उपयोग मोक्ष प्राप्ति में कैसे हो, पुनर्जन्म से आत्मा मुक्त कैसे हो, ब्रह्म से छूटा जीव पुन: ब्रह्म में लीन कैसे हो, इस ज्ञान का पहला गुरू “मां” होती है। इससे मां की गुरूता का अनुमान लगाया जा सकता है। इसी को दुर्गा स#शती में देवता भी प्रणाम करते हैं-

या देवी सर्वभूतेषु, मातृ रूपैण संस्थिता।।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।

मां को अवतार कह सकते हैं। धर्म की पुर्नस्थापना के लिए, समय से पूर्व आती है। धर्म की स्थापना बिना मानवता के संभव नहीं है। त्रेता, द्वापर की तरह कलियुग मे मानवता उपलब्ध नहीं है। अत: आज मां का महत्व भगवान जैसा हो गया। वह मानव तैयार करती है, तब ही धर्म की स्थापना संभव है। इसके बिना तो आज कृष्ण भी धर्म की रक्षा नहीं कर पायेंगे।

मां कभी मरती नहीं है। उसने तो अपना अस्तित्व (यौवन) सन्तान के लिए अर्पित कर दिया। संतान के शरीर का निर्माण किया। उसमें पांचों महाभूतों की व्यवस्था की। आत्मा का प्रवेश करवाया। आत्मा की परीक्षा ली। वैसा ही है क्या, जैसा कि ईश्वर से मांगा था।

वरना वैसा बनाना पड़ेगा। और पूरी उम्र मां-बाप प्राण बनकर इस शरीर में बहते हैं। तभी लोगों को सन्तान के साथ, उसके कार्यो के रूप में मां-बाप दिखाई देते हैं। आज भौतिक चकाचौंध, शिक्षा, कॅरियर आदि ने विश्व को सब कुछ दिया। बदले में “मां” को छीन लिया।

किसी भी घर में स्त्री, पत्नी, नारी मिल जाएगी, परन्तु मां को ढूंढ पाना कठिन हो गया है। वही व्यक्ति का, संस्कृति का निर्माण करती है। पत्नी (संकल्पित स्त्री) भी अधिक से अधिक पति को दाम्पत्य रति के द्वारा देव रति के लिए तैयार कर सकती है। पति के मोक्ष मार्ग का ठेका नहीं ले सकती। जिसके “मां” है, वह तो स्वयं ही “देव” है। वहां बस अद्वैत है।

नारी देह का नाम है।
स्त्री संकल्पवान पत्नी है।
मां-आत्मीयता का भावनात्मक/ प्राणात्मक समष्टि भाव है।

गुलाब कोठारी

कन्या

माया का पर्यायवाची है षोडशी, कन्या, देवी, प्रकृति आदि। माया ही विश्व की शक्ति है। पुरूष पर पूर्ण शक्ति युक्त नियंत्रण प्रकृति का ही होता है। लोक व्यवहार में इसके विकल्प रूप में कन्या पूजन किया जाता है। कंस ने नवजात कन्या का वध किया था, उसका परिणाम पांच हजार सालों से हम पढ़ रहे हैं। यही बात बच्चों को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पढ़ाते हैं।

फिर भी कन्या भ्रूण हत्या की दर बढ़ रही है। कन्या दान का विषय मानी जाती थी। उसकी पवित्रता के उत्सव मनाए जाते थे। आज तो वह इन जंजीरों को तोड़कर स्वतंत्र होना चाहती है। उसे नहीं मालूम अच्छी पत्नी, अच्छी मां का जीवन में क्या महत्व है।

इनसे जुड़ी कोई शिक्षा आज उसके पास नहीं होती। मां-बाप बिना शिक्षण-प्रशिक्षण दिए ही उसको जीवन संग्राम में धकेल देते हैं। जो 8-10 हाथ वाली शक्तिरूपा बनने की क्षमता रखती है, उसे भी पुरूष के समान दो हाथ वाली बनकर संतोष करना पड़ रहा है। उसको मांगकर ले जाने वाले नहीं मिलते, दहेज के सहारे समझौता करते हैं।

क=शक्तिशाली, या=पूर्ण नियंत्रण। न्=शून्यता का पर्याय निराकार आत्मा। जो है, किन्तु ऋत् रूप है। स्थान नहीं रोक पाता। कत्ताü भी नहीं है। साक्षी भाव मात्र है। ऎसे तžव को समझ पाना, उसका स्वरूप तय कर पाना, आकार देना तथा उसके कार्यो का अथवा उसके नाम से किए गए कार्यो का नियमन चिन्तन के बाहर की बात है। कन्या में सृजन शक्ति होती है।

माया-महामाया-योगमाया का विकास, जीवन के प्रति दृष्टि, विषय को समझने की क्षमता, एकाग्रता आदि सभी बालक के मुकाबले कहीं अधिक विकसित होते हैं। उसमें आवरित करने की शक्ति होती है। पुरूष इस दृष्टि से प्रकृति के मुकाबले कमजोर होता है। परिणाम स्वरूप स्त्री ही पुरूष को भोगती है। इसी का नाम माया है कि पुरूष सदा भ्रमित रहता है कि वह भोक्ता है।

माया का उद्देश्य है शक्तिमान की शक्ति बनना। उसे माया के प्रपंचों से परिचित कराना, उसके पितृ ऋण मोचन में सहायक होना, उसके जीवन को पूर्णता प्रदान करके सृष्टि यज्ञ चलाना, जीवन के उत्तर काल में शान्ति में स्थित रहना तथा शक्तिमान को शक्ति के चंगुल से बाहर निकालकर मोक्ष मार्ग पर चढ़ाना। किसी पुरूष की जीवन शैली में जीवन के प्रति इतनी गहन समझ दिखाई नहीं देती। माया ही आकर उसे इन गहराइयों से, यथार्थ से परिचित करा कर पे्रम मार्ग से ह्वदय पट खोलती है।

आज गुरूकुल नहीं रहे। ब्रह्मचर्य आश्रम भी नहीं रहा। छोटी उम्र में तो शादी की संभावना वैसे भी कानून ने समाप्त कर दी। इसके विपरीत शिक्षा ने शादी की उम्र दो गुना से भी आगे खिसका दी। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव यह सामने आया कि शादी से पहले लड़कियां खोटे आचरण वाले लोगों के हाथों में फंसने लग गई, जिनके साथ शादी करवाना मां-बाप के लिए सुखद नहीं होता। विकल्प भी नहीं बचते।

कन्या भी नहीं बचती। तब लिव-इन-रिलेशनशिप जैसे कानून बनते हैं। किसी भी कन्या के लिए इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है। लड़का तो घर छोड़ता नहीं है। लड़कियां आती रहे-जाती रहे। बुढ़ापे में पीहर लौट जाए। घर-गृहस्थी-संतान के सपने?

कन्या मात्र शरीर का नाम नहीं है। शरीर जीवन के कार्य क्षेत्र का निर्घारण मात्र है। कार्य कब और कैसे अथवा क्यों करना है। यात्रा का निर्घारण वाहन नहीं करता। चालक करता है। कन्या शरीर का चालक अत्यन्त समर्थ एवं ऊर्जावान होता है। ऊर्जाओं के संचालन की क्षमता अद्भुत होती है। शरीर से कोमलता, चेहरे से निर्मलता और आंखों में चपलता उसके सृष्टि निर्माण के अस्त्र-शस्त्र हैं। संतान पैदा करना उसका निर्माण नहीं है। यह तो इस शरीर की नैसर्गिक क्रिया है।

कन्या शरीर से जुड़ी है। उसके यौवन का एक बड़ा काल खण्ड इसमें व्यतीत होता है। गर्भावस्था में संतान का रक्षण, पोषण और सर्वागीण विकास मां पर ही टिका रहता है। अत: कन्या की स्वीकृति के बिना सन्तान कर्म संभव नहीं है।
पुरूष की स्वीकृति परिवार के संस्कार तक सीमित रहती है। उसे बीज वपन के लिए भूमि चाहिए। संतान को संस्कार देने की समझ चाहिए। सौम्या को अगिA को जाग्रत करके उसको समर्पित हो जाने का संकल्प चाहिए। “हां, मैं आ गई। मैं तुम्हारी वंश वृद्धि के लिए तैयार हूं।

तुम्हारी सन्तान का पोषण भी करूंगी, सकारात्मक दृष्टि का संचार करूंगी तथा स्वयं को फिर भी गौण रखूंगी। हमारे बीच सदा सखा भाव रहेगा।” पुरूष की एकमात्र स्वीकृति सखा भाव बनाए रखने की होती है। सब कुछ एक-दूसरे पर आधारित होने के बाद भी सखा भाव (अपेक्षा रहित) रहता है। यही दैविक सबन्ध है।

असुरों को इसमें केवल दैहिक सबन्ध दिखाई पड़ता है। बिना दोनों की स्वीकृति के बलात्कार करना असुरों की प्रवृत्ति है। वे देवों के हर कार्य में बाधक होते हैं। कन्या असुरों के लिए अभिशाप बनती है। देव गुणों का रक्षण करती है। चन्द्रमा के प्रचुर मात्रांश के कारण ही सौम्या कहलाती है। इस कारण संकोच युक्त भी है, माधुर्य प्रधान भी और जोड़ने वाला तžव रूप भी। माया रूप होने से गति प्रधान सृष्टि स्वरूपा है।

आत्मबल का पर्याय होने से पीहर छोड़कर ससुराल में जाने को सदा ही तैयार रहती है। मन में शंका या संकोच तो होता ही नहीं। इसका अर्थ ही है कि वह स्वयं के लिए नहीं, सम्पूर्ण ससुराल के लिए जीने का साहस रखती है। इसी के लिए स्वयं को तैयार करती है।

मां-बाप भी ससुराल भेजने की दृष्टि से ही तैयार करते हैं। सारी शिक्षा-दीक्षा-संस्कार इसी बात को ध्यान में रखकर दिए जाते हैं। ये सब उसे अगले घर में उपयोग भी करने हैं, सिखाने भी हैं। धर्म-अर्थ-काम के दर्शन को सीख लेना उसकी अनिवार्यता है।

आश्रम व्यवस्था के अनुकूल चर्या, प्रकृति के स्वरूप का महत्व, कर्म और फल जैसे विषयों का व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त करती है। और सबसे आpर्य इस धरा का यही है कि हर दृष्टि से पारंगत इस कन्या का मां-बाप दान कर देते हैं। फिर जीवन भर उनका अधिकार पुत्री पर नहीं रह जाता। यही उसके जीवन का सर्वोच्च त्याग भी है और सबसे बड़ा उत्सव भी।

कन्या का स्वरूप और लक्ष्य ही प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ वरदान है। कौन दूसरा प्राणी है इस धरती पर जो मां-बाप के साथ रहकर स्वयं को इस तरह तैयार करता हो, किसी दूसरे घर को प्रकाशमान करने के लिए। न वह मां-बाप के लिए जीती है, न ही स्वयं के लिए। कन्या रूप में सारी दैविक शक्तियो का ज्ञान प्राप्त करती है।

इन्हीं की सहायता से निर्माण-पोषण और निवृत्ति के लक्ष्य को पूरा करती है। जिस जीव को शरीर में धारण करती है, वह स्वेच्छा से शरीर में प्रवेश करता है। पूछकर, स्वीकृति लेकर नहीं आता। अतिथि बनकर आता है। देवता की तरह रहता है, पूजित होता है। परिष्कृत और प्रशिक्षित किया जाता है। माया का मां रूप इससे बड़ा क्या होगा कि इस अनजान जीव का पोषण करके, शरीर में लपेटकर विश्व को भेंट करती है।

अभिमन्यु बनाकर। ससुराल में भी, अनजान जीव भिन्न-भिन्न शरीरों में रहते हैं। इसी स्थिति में अपने कर्मो का, प्रारब्ध का भोग भी करती है, सन्तान की आत्मा को संस्कारित भी करती है, पति को देवरति में प्रवेश कराती है, उसके मन में विरक्ति पैदा करती है (इस जीवन के आरंभ में यही माया कामना/आसक्ति बनकर आई थी) ताकि कामना से निवृत्त हो सके। पति की मोक्ष मार्ग पर प्रतिष्ठा ही इसके जीवन का लक्ष्य है। पितृ ऋण चुकाने में सहायक होना। पीहर की शक्तियों का ससुराल में स्थानान्तरण करना।

पितृ प्राण, देव प्राण एवं भूत ग्राम का स्थानान्तरण ही विवाह का प्रयोजन होता है। कन्या का इन पर नियंत्रण रहता है। तब कन्या का पूजन क्यों न हो? भाग्यहीन हैं वे जो भ्रूण हत्या करते हैं, दहेज (जड़) के लिए चेतन को प्रताडित करते हैं, कन्या का अपमान अथवा उसके साथ अभद्र/आसुरी व्यवहार करते हैं। मीरां आज भी अमर है। उसको कुलनाशी कहने वाली सास का अता-पता ही नहीं।

कन्या भावी सभ्यता, संस्कृति एवं सृष्टि विराट की प्रतिकृति है। भगवान से प्रार्थना करें कि इस देश में फिर से कन्याओं की इज्जत बढ़े। ताकि देश फिर से ज्ञान मे विश्व का सिरमौर बने, सुख-शान्ति की स्थापना हो और आत्माएं मुक्ति को प्राप्त हों।

कन्या एक बन्धन युक्त आत्मा का वरण करती है और उसके मुक्त होने में सहायक होती है। वही माया स्वतंत्र घूम रही आत्मा को शरीर प्रदानकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए जीने का मार्ग देती है। उसके साथ क्या बीतता है उसे सहन कर पाने की क्षमता भी उसमें होती है।

जिस कन्या का संकल्प टूट जाता है, वह टूटे पत्थर की तरह और संकल्पवान छीणी-हथोड़े की चोट खा-खाकर मूर्ति बन जाती है। हर कन्या में यह दिव्य स्वरूप विद्यमान रहता है। अत: उसका पूजन किया जाता है।

गुलाब कोठारी

मई 10, 2011

जीवन का विकास

हमारा शरीर स्थूल और भौतिक है, हम इसके हर अंग और कार्यो को देख सकते हैं, उनका आकलन कर सकते हैं, ऎसा हमारा मानना है। किन्तु, वास्तविकता यह है कि इसका संचालन हमारी बुद्धि करती है, हमारा भाव-तंत्र करता है जिसको हम न देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। शरीर में अपने आप तो केवल प्राकृतिक क्रियाएं ही हो सकती हैं, अन्य कुछ नहीं।

कोई भी व्यक्ति बिना भावों के जी नहीं सकता। हमारे सुख-दु:ख, मित्र-शत्रु, प्रसन्नता-अवसाद आदि सभी भावों पर आधारित हैं। इन्हीं के अनुरूप हमारी प्रतिक्रियाएं होती हैं। जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण ही इनका आधार तय करता है। भाव कहां से आते हैं?

भाव हमारे अनुभवों और दृष्टिकोण का मिश्रण कहे जा सकते हैं। हमारे अनुभव चेतनागत होते हैं। जिस प्रकार हमारी इच्छा मन में स्वत: उठती है, उसी प्रकार हमारे भाव भी स्वयं स्फूर्त होते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि इच्छा का स्वरूप स्वतंत्र होता है और भावना हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप ढली होती है।

भावना हमारे सूक्ष्म और कारण शरीरों से जुड़ी होती है, क्योंकि यह स्वयं सूक्ष्म है। इसका प्रतिबिम्ब होता है- हमारा आभा मण्डल। उसे हमारा भावनात्मक शरीर कह सकते हैं। दिनभर हमारे भावों के साथ आभा-मण्डल में भी परिवर्तन होते रहते हैं। आज आभा-मण्डल के अध्ययन में विश्व स्तर पर अनेक संस्थाएं जुड़ी हुई हैं। आभा- मण्डल में दो तरह के परिवर्तन होते हैं- रंगों के रूप में और तरंगों के रूप में। इनका विश्लेष्ाण करके व्यक्ति के भावों का आकलन किया जा सकता है। आज वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रकृति का सारा खेल ऊर्जा और पदार्थ के एक-दूसरे में परिवर्तित होने के सिद्धांत पर चलता है। हमारे भाव भी ऊर्जा की श्रेणी में आते हैं, इनको देखना, समझना और मापना भी सम्भव है। जब भावनाओं के द्वारा हमारे मन और शरीर में अनेक क्रियाओं का संचालन होता है तो निश्चित है कि वहां कोई शक्ति है।

सृष्टि की सभी ऊर्जा सामग्री का सम्बन्ध पदार्थ से होता है, अत: भाव भी पदार्थ रचना से बाहर नहीं हो सकते। यह भी सत्य है कि यह ऊर्जा अति सूक्ष्म है। इसी कारण यह (अंतरिक्षीय) वैश्विक ऊर्जा का अंग भी है और उसी के साथ एक जीव होकर कार्य करती है। एक ही प्रकार के नियम दोनों ऊर्जाओं पर लागू होते हैं। अत: इसका भी अर्थ यही है कि हम सीधे प्रकृति से जुड़े हैं और हमारे कार्यकलापों का नियमन भी प्रकृति ही करती है। चूंकि हमारा आभा-मण्डल पृथ्वी के आभा-मण्डल से सीधा जुड़ा है, इसीलिए हम पार्थिव कहलाते हैं। इसी प्रकार हमारा जीवन पृथ्वी पर निर्भर करता है और पृथ्वी सूर्य-चन्द्रमा आदि से जुड़ी हुई है।

जिस प्रकार भावों की तरंगों का आभा-मण्डल होता है, उसी प्रकार हमारी बौद्धिक तरंगों का आभा-मण्डल भी होता है। दोनों आभा-मण्डल अपने आप में स्वतंत्र होते हैं और एक-दूसरे को निरन्तर प्रभावित करते रहते हैं। ये शरीर के साथ भी जुड़े रहते हैं। इस प्रकार हमारे आभा-मण्डल के भी अनेक स्तर होते हैं, अनेक रूप और रंग होते हैं।

संसार में जड़ और चेतन दोनों में आभा-मण्डल विद्यमान रहता है। जड़ पदार्थो में आभा-मण्डल स्थिर दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि इनमें क्रियाकलाप नहीं होते। इसके विपरीत चेतना का आभा-मण्डल परिवर्तनशील नजर आता है। सभी चेतन स्वतंत्र रहते हुए भी पृथ्वी की सीमा में ही रहते हैं। इन सभी के केन्द्र में जीव होता है, आत्मा होती है या कारण शरीर रहता है। इसके बिना न तो क्रिया हो सकती है और न ही अभिव्यक्ति। हमारा शरीर, हमारी आकृति ही हमारी अहंकृति का यश है, सोम है, अभिव्यक्ति है और हमारी प्रकृति इसका व्यक्तित्व प्रकट करती है। हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करती है।

हमारे विचार और भाव आते-जाते रहते हैं, किन्तु यह केन्द्र अथवा “मैं” स्थाई बना रहता है। इसी के कारण शरीर की आस्था है। जीवन के सारे ज्ञान और अनुभवों का आधार यही है। अनुभवजनित यही ज्ञान सृष्टि के विकास का आधार बनता है। कौन सीखता है और कौन ज्ञान का उपयोग करता है, इसका उत्तर “अन्त” है। ज्ञान और अनुभव ही हमारी भावभूमि का निर्माण करते हैं। ये कार्य मन के स्तर पर होते हैं। अनुभव निरन्तर होते ही रहते हैं, रूकते नहीं। भाव भी रूकते नहीं हैं। हमारा आभा-मण्डल एक ओर हमारे व्यक्तित्व के आधार पर बदलता रहता है तो दूसरी ओर पृथ्वी के आभा-मण्डल के प्रभाव से भी बदलता रहता है, अत: इस सृष्टि और शरीर का संचालन एक ही सिद्धान्त पर आधारित है। “यथा अण्डे तथा पिण्डे” का भी यही अर्थ है।

जो कुछ हमारे जीवन में घटित होता है उसका भावनात्मक प्रारूप हमारे आभा-मण्डल में विद्यमान रहता है। सूक्ष्म स्तर पर आभा-मण्डल वैसा ही बना रहता है। चूंकि स्थूल के परिवर्तन धीरे होते हैं अत: समय के साथ ही वे परिलक्षित होते हैं। सूक्ष्म में परिवर्तन निरन्तर गतिमान रहता है। अतिसूक्ष्म तक इसका विस्तार होता है। हर प्राणी और पदार्थ का आभा-मण्डल सृष्टि से जुड़ा है। वह दूर-दूर तक सूक्ष्म रूप से व्याप्त है, अत: हर एक प्राणी एक-दूसरे से प्रभावित होता ही है चाहे दूसरा चुपचाप पास ही बैठा रहे। ऊर्जा का आदान-प्रदान तो वहां भी होता ही रहता है। भावनाओं को प्रभावित करने का क्रम तो बना ही रहता है। चीनी विद्वान एवं दार्शनिक ताओ ने लिखा है कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है। सृष्टि या प्रकृति के इस आदर्श को नकारा नहीं जा सकता। इसी में सृष्टि के विकास का बीज छिपा हुआ है।

यह परिवर्तन हम सब मिलकर लाते हैं। हमारी ऊर्जाओं का आदान-प्रदान ही परिवर्तन का मूल कारण है। हम भावनाओं को भले ही निजी सम्पत्ति मानें, किन्तु यह सत्य है कि हमारी भावनाओं को हमारा सम्पूर्ण वातावरण, जड़-चेतन प्रभावित करता है। सब मिलकर एक-दूसरे को परिवर्तित करते हैं, इसीलिए “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा का सही अर्थ समझा जाना आवश्यक है।

हमें आयु सूर्य से मिलती है। अन्न चन्द्रमा से मिलता है। सोम की कमी चन्द्रमा पूर्ण करता है। हमारा मन परमेष्ठि लोक से आया हुआ है। अर्थात हमारे जीवन में इन सबका नित्य जुड़ाव है, प्रभाव है। हमारी इच्छा, कामना, भावना इसी की अंग हैं। जैसे-जैसे हम ऊपरी स्तरों पर देखते हैं, इनका स्वरूप अतिसूक्ष्म होता चला जाता है, गतिमान होता चला जाता है।

हमारे भावों की तरंगें अंतरिक्ष में रहती हैं। सभी प्राणियों के भावों की तरंगें अंतरिक्ष में होने से अंतरिक्ष इन तरंगों का समुद्र बन जाता है। ये मिश्रित तरंगें सबको प्रभावित करेंगी और सब मिलकर इन तरंगों के मिश्रण को प्रभावित करेंगे। इस बात से किसी देश अथवा भू-भाग की संस्कृति का महžव भी समझा जा सकता है। एक व्यक्ति को आने वाला क्रोध दूसरे व्यक्ति के क्रोध की तरंगों को बढ़ा देता है और उनके आपसी व्यवहार का निर्घारण करता है। सही प्रभाव सद्भाव की तरंगों का होता है। ऋ çष्ा-मुनियों के समीप सभी शांत क्यों दिखाई पड़ते हैं- हम समझ सकते हैं। यही कारण है कि रोगी को स्वास्थ्य लाभ के लिए प्राकृतिक सौन्दर्यपूर्ण स्थानों पर रहने की सलाह दी जाती है। प्रकृति की इस अद्भुत उपचार क्षमता का कारण भी सूक्ष्म भाव तरंगें ही हैं। वन्य जीव, पशु-पक्षी, पर्वत, नदी-नाले, पेड़-पौधे सभी की भाव-तरंगों का मिश्रण हमें प्रसन्न एवं निरोगी बनाये रखता है।

गुलाब कोठारी

मई 14, 2011

सिमटता लोकतंत्र

समय की अपनी चाल होती है। उसी से प्रारब्ध जुड़ा रहता है और उसी से भविष्य। वर्तमान बीच का निर्णायक मोड़ होता है। आज जो चुनाव परिणाम सामने आए हैं, वे समय की भाषा बोलते सुनाई पड़ रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में तो चुनावी नतीजे सुनामी साबित हुए हैं। चाहे इसे कम्युनिस्ट पार्टी के विरोध में कहें या ममता की तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में। बिना ऎसी सुनामी के पुराने बरगद नहीं उखाड़े जा सकते। बंगाल में सर्वाधिक लम्बी अवधि (34 साल) के वामपंथी गठबंधन शासन को मुंह की खानी पड़ गई। गठबंधन को एक चौथाई सीटों के आगे रास्ता नहीं मिला। तमिलनाडु की स्थिति भी कमोबेश यही है। बल्कि करूणानिधि की द्रमुक और भी दयनीय स्थिति में पहुंच गई है। दोनों राज्यों में यही अपेक्षित भी था। दोनों ही राज्यों में सत्ता पक्ष की छवि जनता की नजरों में गिर चुकी थी। मतदान पूरा सत्ता पक्ष के विरूद्ध रहा। भले कांग्रेस जीतकर उभरी हो। केरल के चुनाव साधारण ही रहे। पुaुचेरी ने तमिलनाडु का अनुकरण किया। हां, असम में सत्ता पक्ष कांग्रेस ने अपनी पकड़ मजबूत की।
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुaुचेरी में एक आश्चर्यजनक स्थिति बनी, जिसकी ओर पत्रिका लम्बे समय से इशारा कर रहा है, किन्तु सत्ता का अहंकार इसे नकारता रहा है। राष्ट्रीय दलों में से कांग्रेस हर राज्य में है, जो आज केन्द्र में सत्ता में भी है। दूसरे बड़े राजनीतिक दल की भूमिका निभाने के बावजूद केन्द्र का विपक्षी दल भाजपा सभी जगह पर नकार दिया गया। केन्द्र में विपक्षी दल इन पांचों राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा। देश के लोकतंत्र को लकवा मारने लग गया है। संघ के भीष्म पितामह हाथ बांधे खड़े हैं। भाजपा को राख से उठते हुए देख रहे हैं!
इन परिणामों को देखकर भाजपा स्वीकार कर ले कि आज पांचों प्रान्तों में वह जनता की पहली, दूसरी, तीसरी पसन्द भी नहीं रही। आने वाले चुनावों में बाकी का भ्रम भी मिट जाएगा।

देखो तो, पश्चिम बंगाल में 294 में से 290 स्थानों पर भाजपा ने प्रत्याशी खड़े किए। कोलकाता भाजपा का अघोषित गढ़ और परिणाम शून्य। एक भी सीट नहीं जीत पाए। भले ही उनको गोरखा जन मुक्ति मोर्चा की तीनों सीटें मिल गई हों। हो गई न आतिशबाजी? भाजपा के लिए यह परिणाम गौरवशाली कहे जा सकते हैं!

तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा। 2-जी स्पैक्ट्रम के बाद भी द्रमुक तीस से अधिक सीटे ले आई। भाजपा अपना खाता भी नहीं खुला पाई। क्यों? साहुकार पेट पर तो भाजपा का कब्जा मानते हैं। राजनीति का भरोसा नहीं होता। करूणानिधि को हराने के लिए कांग्रेस ने जयललिता से हाथ मिला लिया हो। जैसा भाजपा ने झारखण्ड में शिबु सोरेन से हाथ मिलाया था।
असम में कांग्रेस ने पकड़ बढ़ाई। व्यापारियों ने वहां भी भाजपा को पूरी तरह नकार दिया। कुल 126 सीटों में से वह 121 पर लड़ी लेकिन उसे केवल चार सीटें मिली। पिछली बार दस मिली थीं। गरीबी में आटा गीला। केरल की राजनीति का अपना एक मार्ग है। वह उसी पर चल रही है। कुल 806 सीटों पर लड़कर वह केवल 4 सीटें जीत पाई। बधाई भाजपा नेतृत्व और चुनाव समिति को। इससे बुरी हालत और क्या होगी कि भाजपा के पास आज राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता तक नहीं है।

सारे परिणाम यह सिद्ध कर रहे हैं कि देश का विपक्ष अपनी क्षमता नहीं बढ़ा पा रहा है। जब सत्ता पक्ष के समक्ष इतनी बड़ी-बड़ी चुनौतियां हैं, इतने महाभ्रष्टाचार के आरोप हैं, जांचें चल रही हैं, उस हाल में विपक्षी भाजपा इन तीनों बड़े राज्यों में खाता न खोल पाई या स्थिति को सुदृढ़ नहीं कर पाई, तब निश्चित है कि वह कांग्रेस से भी बहुत कमजोर है। घर में भले ही वह मूंछों पर ताव देती रहे, लोक में उसका मान नहीं रहा। यदि आज मध्यावधि चुनाव हो जाएं तो भाजपा का कटोरा दिल्ली जैसे रीत जाएगा। जहां कुछ है, वह भी सिमट जाएगा। उसी दिन से देश में कांग्रेस का सामन्तवाद लागू हो जाएगा।
गुलाब कोठारी

मई 15, 2011

कारक

बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। यह कारण ही कारक का पर्याय है। हर कार्य में कारण-कार्य भाव रहता है। कारक शब्द में शक्ति भी है, ऊष्मा भी है। देने का भाव भी है। वैसे तो कर्म के लिए पहला कारक इच्छा होती है। इच्छा (अवग्रह) के बिना चेष्टा (ईहा) नहीं होती। अवगम से ही मानो स्वीकृति मिल गई। तब प्रश्A उठता है कि क्या इच्छा का भी कोई कारक होता है। इच्छा पैदा नहीं की जाती। इच्छा का एक कारक होता है ज्ञान। जिस विषय का ज्ञान नहीं उसके बारे में इच्छा नहीं उठती। जो उठती है तब उसका कारक ज्ञान न होकर प्रारब्ध होता है।

गीता में कृष्ण ने एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि ज्ञान-ज्ञाता-ज्ञेय तीनों सदा साथ रहते हैं। मूल में तो ज्ञाता की इच्छा ही रहती है। बिना ज्ञाता के ज्ञेय का ज्ञान मानव के लिए हित और अहित दोनों कर सकता है। भारत और पश्चिम के ज्ञान का मूल भेद यही है। हमारा ज्ञान आज भी ज्ञान ही माना जाता है। “एको ज्ञानं ज्ञानम्” इसकी परिभाषा है। ब्रह्माण्ड में सब चीजों एवं प्राणियों के मूल में एक ही तžव है। इसी का दूसरा पक्ष पश्चिमी प्रयोगात्मक ज्ञान है। इसको विज्ञान कहते हैं। “विविधं ज्ञानं विज्ञानम्”। विरूद्धं ज्ञानं विज्ञानम्। विशिष्टं ज्ञानं विज्ञानम्।

अन्तर बस इतना ही है कि हमारे ज्ञान में ज्ञाता है और पश्चिम के ज्ञान में ज्ञाता नहीं है। वह पूर्ण रूप में उपकरणों पर आधारित है। अत: उस ज्ञान का उपयोग व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करेगा। यही कारण है कि विज्ञान के प्रयोग सही और गलत दोनों दिशाओं में हो रहे हैं। भारतीय ज्ञान में सूचना एवं जानकारियों का अभाव है। वह विवेक एवं प्रज्ञा पर आधारित है। इसमें किसी का अहित संभव ही नहीं है। “सर्वे भवन्तु सुखिन” हमारा वेद वाक्य है।

शिक्षा एक बड़ा कारक है। अब तक शिक्षा का आधार ज्ञान रहा था। आज की शिक्षा मूलत: विज्ञान पर आधारित या पश्चिमी जीवन शैली पर टिकी हुई है। इसमें हित-अहित का कोई भेद स्पष्ट नहीं है। समाज का तो चिन्तन ही गौण है। यही शिक्षा जब कारक बनती है तब व्यक्ति केवल स्वयं के लिए जीने वाला बन जाता है। बौद्धिक स्तर पर स्वयं को ऊपर उठाकर और अकेला हो जाता है। सुविधाओं को ही सुख मानने वाला व्यक्तित्व तैयार होता है। सारी चेतना शक्ति का उपयोग जड़ (अर्थ) के संग्रहण में लगा देता है। ऎसे में न तो यह शिक्षा सर्वकालिक हो सकती है, न ही सार्वभौमिक। अत: शिक्षित व्यक्ति के कार्य भी अल्पकालिक एवं सामाजिक/ राष्ट्रीय दृष्टि से अर्थहीन ही साबित होते हैं।

इसी प्रकार एक कारक होती है प्रकृति – सतोेगुण, रजोगुण, तमोगुण रूप में। माया का यह रूप ही जीवन का कारक-पालक-संहारक है। महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली रूप इनका स्वरूप है। जैसी व्यक्ति की प्रकृति (स्वभाव) होती है, वैसी ही अहंकृति और आकृति भी होती है। इनमें से यदि एक भी बदल जाए तो अन्य दो भी स्वत: बदल जाती हैं। व्यक्ति न अहंकृति को बदल सकता है, न आकृति को। प्रकृति को सहजता से बदल सकता है। प्रकृति ही क्षर पुरूष रूप कर्म का कारक है।

हमारे जीवन में स्वाध्याय का यही महत्व है। कुछ समय निकाल कर व्यक्ति स्वयं के बारे में चिन्तन करता है। अपनी प्रकृति को समझने का प्रयास करता है। अपने विद्या-अविद्या अथवा ज्ञान-अज्ञान भाव को समझने का प्रयास। प्रकृति के रूपान्तरण का प्रयास अपने धर्म-ज्ञान-विवेक से करता है। अपने अर्थ चिन्तन एवं कामना-संसार का आकलन करता है। यदि ज्ञानवान है तो तमोगुणों को सतोगुण में रूपान्तरित करने का प्रयास करेगा। एक संकल्प रूप में। बदलाव अस्थाई होता है, रूपान्तरण स्थाई होता है। रूपान्तरण के साथ ही व्यक्ति की आकृति, वाणी, खान-पान और सम्बन्धों में परिवर्तन आता दिखाई पड़ता है। अहंकार की कमी सत्वगुण का प्रमाण है। इसके साथ ही निस्वार्थ प्रेम का विकास दिखाई देने लगता है।

कारकों में सर्वशक्तिमान कारक प्रारब्ध को माना गया है। पिछले कर्म जो पूरे हो चुके, चाहे इस जन्म के अथवा पूर्व जन्म के, उनके फलों को प्रारब्ध कहते हैं। इनका स्वरूप भी भिन्न होता है। व्यक्तिगत फल भी होते हैं, दूसरों के साथ लेन-देन के रूप में, सुख-दुख, धनी-गरीब, जन्म-मरण, यश-अपयश आदि प्रारब्ध का ही क्षेत्र माना जाता है। कहावत भी है कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ। जन्मकाल में जो कुण्डली बनी, उसमें हम प्रारब्ध देखते हैं। कर्म करना तो तब तक शुरू ही नहीं होता। कर्म-फल के अनुरूप न चाहते हुए भी व्यक्ति को रूग्णता, दुर्घटना, दारिद्रय आदि को स्वीकार करना पड़ता है। मित्रों एवं शत्रुओं के बीच में जीना पड़ता है। हमारा बनाया हुआ भाग्य हमें ही भोगना पड़ता है।

इसी प्रकार जो मेरा भावी जीवन बनेगा, उसका कारक मेरे वर्तमान कर्म होंगे। उन्हीं के फल मुझे कल मिलेंगे। वर्तमान मेरे जीवन का एक मात्र कारक काल क्षेत्र है। न अतीत मेरे काम का, जीवन का मृत अंश, न भविष्य मेरे नियंत्रण में। वर्तमान ही कर्म को पूजा का स्वरूप देता है। जीवन को धारण करके धर्मरूप बन जाता है।

कर्म मूल में स्थूल होता है। क्रिया रूप होता है। कर्मफल भी स्थूल रूप में ही अधिकांशत: प्राप्त होता है। सम्पूर्ण सृष्टि क्षर पुरूष से निर्मित हो रही है। इसका कारण अक्षर पुरूष होता है। प्राण रूप माया शक्ति होती है। अदृश्य और सूक्ष्म। अक्षर सृष्टि का निर्माण और आलम्बन अव्यय पुरूष होता है। वही अव्यय पुुरूष्ा जिसको कृष्ण ने स्वयं का पर्याय बताया है। सम्पूर्ण सृष्टि में यही एक मात्र पुरूष है। बाकी सब माया के ही नाम-रूप आकार हैं। माया ही राग-द्वेष रूप कर्म कराती है, कर्मबंध कराती है। कर्मफल भी भोगने को प्रेरित करती है।

क्या हर कर्म का कारक कर्म ही है? कर्म भी तो परिणाम ही है। ज्ञान युक्त इच्छा का। इच्छा को पैदा नहीं कर सकते। इच्छा पूरी करने को ही जीवन शैली नाम दिया गया है। इच्छा मन में उठती है। यह मन भी प्रकृति के प्रभाव में रहता है। अत: प्रवाह में बहना भी इसका स्वभाव है। यह प्रवाह भी कई तरह के कर्म करवाता है। इसके साथ ही विवेक का होना भी आवश्यक है। किन्तु फिर भी परिणाम सही निकलें, यह जरूरी नहीं। परिणाम नीयत से आते हैं। देश-काल-संयोग-निमित्त-विद्या-कला-राग आदि माया के सभी रूप कारक होते हैं। किन्तु जिन भावनाओं के आधार पर कर्म किया जाता है, फल की दिशा में तो यही एक कारक होता है।

गुलाब कोठारी

मई 16, 2011

जया और ममता का डंका

बिल्ली के भाग छींका

परिणाम बताते हैं कि तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव सीधे-सीधे भ्रष्टाचार से प्रभावित हुए। करूणानिघि परिवार की सत्तालोलुपता और धनसंग्रहण की नीति के कारण परिवार में कलह भी शुरू हुई तथा सार्वजनिक भी हो गई। दोनों पुत्रों की सत्ता पर कब्जे की महत्वाकांक्षा ने स्टालिन और अझगिरि में मतभेद पैदा कर दिए।

कांग्रेस ने भी इस बार द्रमुक पर अघिक सीटों का दबाव बनाया। इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा। चुनाव प्रचार में खुलकर उपहार बांटे जा रहे थे। सत्तर करोड़ रूपए की राशि बरामद होने के बाद यह स्पष्ट था कि यह राशि मतदाताओं को खरीदने में काम आने वाली थी।

पिछले पांच साल के सरकार के कार्यकाल को भी भ्रष्टतम ठहराया गया। धमकियां, भ्रष्टाचार एवं अतिक्रमण चरम पर रहे। परिवार के अनेक सम्बंधी इस कार्य में खुलेआम जुड़े थे। सरकारी अनुबन्धों की चर्चा तो मीडिया में पूरे कार्यकाल में बनी रही।

एक बड़ा मुद्दा और रहा। श्रीलंका में सरकार ने अभियान चलाकर लिट्टे का सफाया कर दिया था। इसके लिए भारत ने भी सैनिक सहयोग दिया था। श्रीलंका सरकार के नरसंहार की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र की जांच समिति ने की। इससे जनता का खून खौल गया था। अब तमिलों के पुनर्वास के लिए जो कुछ किया जा रहा है, उससे जनता संतुष्ट नहीं है। इतने संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस एवं द्रमुक की उदासीनता की प्रतिक्रिया भी चुनाव परिणाम में दिखाई दे रही है। इसी प्रकार जनता इस बात पर भी आक्रोश में है कि प्रदेश के मछुआरों पर भी श्रीलंकाई तटरक्षक जानलेवा हमला करते हैं। सोनिया का आश्वासन तनाव कम नहीं कर पाया। तमिलनाडु में तेरह जिले तटवर्ती क्षेत्र में आते हैं।

हाल ही में करूणानिघि की पुत्री का नाम जिस प्रकार 2-जी स्पेक्ट्रम में आया, जनता स्वयं को अपमानित एवं ठगी सी महसूस करने लगी। पिछले चुनावों में जनता ने जयललिता को भी भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण हराया था। इस बार उनका भ्रष्टाचार करूणानिघि के आगे छोटा पड़ गया। इसके अलावा भी एक नीतिगत फैसला जयललिता की सफलता का कारक बना, वह था छोटे दलों के साथ गठबन्धन। सन् 2006 के चुनाव में फिल्म अभिनेता विजयकान्त ने एक नई पार्टी बनाई थी डी.एम.डी.के.। इस पार्टी ने अन्नाद्रमुक का सर्वाघिक नुकसान किया था। इस बार जयललिता ने विजयकांत को साथ ले लिया। सारा घाटा ही लाभ में बदल गया। वन्नियर समुदाय पर भी विजयकान्त की अच्छी पकड़ है। चुनाव प्रचार में विजयकांत का प्रभाव रहा।

एक बात और भी। इस बार पूरे प्रचार के दौरान जयललिता का रूख उदारवादी रहा। इस कारण चुनाव प्रचार भी संगठित रूप ले पाया। मीडिया भी स्वीकारता है कि जयललिता इस बार कुछ नरम पड़ी, साथ लेकर चली।

लेकिन जयललिता ने जो चुनावी वादे किए, वे कितने पूरे कर पाएंगी, यह समय के गर्भ में है। धन बटोरना उनकी भी कमजोरी है। क्या ग्यारहवीं कक्षा से कॉलेज तक के विद्यार्थियों को मुफ्त लेपटॉप मिलेंगे? सभी गृहणियों को पंखे, मिक्सी, ग्राइण्डर। महिलाओं को विवाह सहायता 25 हजार रूपए। चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र साथ में। प्रसूता महिला को 12 हजार रूपए तथा 6 माह का अवकाश। बड़े शहरों में मोनो रेल सेवा आदि अनेक घोषणाएं कर रखी हैं। औद्योगिकीकरण, तकनीकी शिक्षा और रोजगार की बड़ी चुनौतियों का खुलासा शायद आगे होगा।

जयललिता के सिर पर विजयी सेहरा तो बंध गया, किन्तु इसका श्रेय द्रमुक को अघिक जाता है। अच्छा होगा यदि सरकार पहला संकल्प ही यह करे कि अगली बार खुद के बूते पर अच्छी छवि के साथ फिर आना है।

सोनार मोमता

पश्चिम बंगाल के आम चुनावों ने एक नया इतिहास रच दिया। पूरी कैडर वाली पार्टी को एक संघर्षशील और संकल्पवान शक्तिरूपा ने धराशायी कर दिया। अब मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर अपनी चोटी बांधेगी। जिस दिन ममता बनर्जी को राइटर्स बिल्डिंग से महिला पुलिस ने चोटी पकड़कर नीचे तक घसीटा था, सीढियों से, उस दिन द्रोपदी की तरह ममता ने भी संकल्प किया था, कि मुख्यमंत्री बनकर ही केश बांधेंगी और तभी सचिवालय में प्रवेश करेंगी। ज्योति बसु तब मुख्यमंत्री थे। काश, वे आज भी होते। आस्था और तपस्या के रंग और प्रजा के संग।

राजनीति के धरातल पर चुनाव परिणाम वाम मोर्चा की हार अघिक है। ज्योति बसु ने कृषि भूमि के पट्टे बांटकर लोकप्रियता भी कमाई थी और कृषि की उपज को भी दुगना कर दिया था। बुद्धदेव या तो अपनी छवि को बड़ा करते या बसु की छवि को छोटा करते। उन्होंने औद्योगिकरण को गतिमान कर दिया और प्रदेश को अग्रणी पंक्ति में खड़ा करने के पीछे पड़ गए। बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं लाए, भूमि अघिग्रहण करने की कवायद शुरू की। तीन-तीन फसलों वाली भूमि जाने लगी तो तीखी प्रतिक्रियाएं भी हुई। तब ममता आगे आई। सरकार भी आक्रामक हो गई। सिंगूर से टाटा की नैनो वापस लौटी। नंदीग्राम में प्रस्तावित बिजली परियोजना बन्द हुई। किसान वाम मोर्चा से छिटक गए।

उधर, पार्टी के भीतर हलचल हुई। मोर्चा के मुख्य घटक फारवर्ड ब्लॉक, सीपीआई, आरएसपी लगभग 70-75 सीटें जीतते रहे हैं। मोर्चा ने इनका कद छोटा कर दिया। टिकट कम कर दिए। ये बागी हो गए। इनके चेयरमैन विमान बोस अकेले पड़ गए।

ममता पर वाम मोर्चा के लोगों ने दो घातक हमले किए। ममता के कई जगह फ्रेक्चर हुए। प्रदेश की जनता में रोष व्याप्त हुआ। उधर व्यापारियों से चन्दा वसूली के नाम पर ज्यादतियां भी कम नहीं हुई। वाम मोर्चा के मुख्य संचालक अनिल विश्वास का अचानक निधन हो गया। सभा आयोजक सुभाष चक्रवर्ती नहीं रहे।

ममता बनर्जी के अकेले होने को लेकर भी बहुत असमंजस बना रहा, किन्तु अन्त में अच्छी छवि वाले सेवानिवृत अघिकारियों को साथ लिया। जनता ने सहारा दिया और नैया पार हुई।

अब जब ममता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगी, तब सब कुछ नए सिरे से करना पड़ेगा। पूरी उम्र जो पुलिस और प्रशासन उसे धक्के  मारते रहे, वे अब भी कन्नी काटेंगे। जिन मुद्दों को उसने उठाए रखा उनको भी नई दृष्टि से देखना होगा। जैसे कृषि और उद्योगों के बीच संतुलन। कोलकाता की और गंदे तथा पिछड़ेपन की छवि से मुक्ति भी उनका पहला प्रयास होना चाहिए।

ममता ने साहित्य, संस्कृति, सिनेमा क्षेत्र के अच्छे लोगों को भी साथ लिया। इससे भी बड़ी कूटनीति का दाव खेला। तृणमूल कांग्रेस, एनडीए का हिस्सा होती थी। धीरे-धीरे उसने अपना हाथ खींचना शुरू कर दिया। कठिन कार्य था, किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण भी था। कर दिखाया ममता ने। कांग्रेस के पाले में घुसपैठ कर डाली। इस कारण ममता की पकड़ राज्य के उन 27 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं पर हो गई, जो 34 वर्षो से वाम मोर्चा की विरासत बने हुए थे। सभी ममता के साथ आ गए। ममता ने भी उनको 15 प्रतिशत आरक्षण का लालीपॉप दे तो दिया है – धर्म के नाम पर। अब समय ही तय करेगा राज्य का भविष्य।

चुनाव तो पांच प्रदेशों में हुए, कोई नेता बनकर उभरा तो वह है ममता। कुल मिलाकर ममता की चतुराई ने परिस्थितियों का आकलन करके अपना मार्ग निकाला है, उसकी तपस्या का इतिहास साक्षी बना रहा है, हर बंगाली ने मां, माटी और मानुष के विश्वास को प्रतिष्ठित किया है। हार्दिक बधाई ममता को, बंगाल को!

गुलाब कोठारी

प्रधान संपादक पत्रिका समूह

मई 29, 2011

द्रवण

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हर पदार्थ की तीन अवस्थाएं होती हैं-घन, तरल और विरल। बर्फ, जल और वाष्प। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आदित्य। अगिA, वायु तथा आदित्य। शरीर में भी तीनों अवस्थाएं विद्यमान रहती हैं-अस्थि, अवयव, रक्त और श्वास-प्रश्वास। इसी प्रकार मन के भाव भी घन-तरल और विरल होते हैं। मन का द्रवण या द्रवित होना, भावपूर्ण अभिव्यक्ति में नेत्रों से जल बह पड़ना ही द्रवण है। जो टस से मस न हो, जिसे पत्थर का दिल कहा जाता है, वही घन रूप है।

दो शब्द हैं-द्रव और द्रव्य। द्रव्य तो पदार्थ, सामग्री को कहते हैं, किन्तु द्रव लक्षण रूप भी है। इसके साथ प्रवाह भी है, आवेग भी है। अवसर अथवा परिस्थितिवश द्रव घन भी बन जाता है और विरल (वायु रूप) भी। जीवन का निर्माण भी विरल अवस्था से तरल होते हुए घन रूप में आना ही है। इसी को हम अव्यय-अक्षर-क्षर अवस्था स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कह लेते हैं। पंचकोशों में बाहरी अन्नमय कोश घन रूप है। भीतर के तरल-विरल बनते हुए आनन्दमय कोश का निर्माण करते हैं।

हमारे जीवन का लक्ष्य पुरूषार्थ के रूप में स्पष्ट होता है। अर्थ और काम के व्यापार (शरीर और मन के) को धर्म का आधार देते हुए कामनातीत हो जाना (मोक्ष) ही जीवन की सार्थकता है। हर व्यक्ति के पास कामना के भी दो धरातल होते हैं-एक अहंकार का तथा दूसरा ममकार का। बाकी रूप इन्हीं के स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। विद्या (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य) तथा अविद्या (अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश) के कारण। शरीर, मन, बुद्धि पर सत-रज-तम के आवरण भी होते हैं। यही तो हमारे आचरण की भूमिका तय करते हैं।

संसार में हमारे व्यवहार के मूल बिन्दु भी अहंकार और ममकार ही होते हैं। अहंकार का धरातल ठोस होता है, ममकार का तरल। एक पक्षीय होने पर दोनों ही हितकारी नहीं होते। अहंकार बुद्धि में उठता है, अत: ऊष्ण है। सहजता से समझौता नहीं करता। ममकार मन रूप है। व्यक्ति एकपक्षीय प्रवाह में बह जाता है। मन के विषयों पर महिलाओं का नियंत्रण श्रेष्ठतर होता है। उनके व्यवहार का क्षेत्र भी प्रेम-स्नेह-श्रद्धा-वात्सल्य आदि होता है। अत: वे अधिक द्रवणशील होती हैं। यहां तक कहा जाता है कि आंसू तो उनकी आंख के कोर पर ही मानो बैठा रहता है। यह तो महिलाओं का अचूक हथियार कहा जाता है।

तब क्या द्रवण जीवन के युद्ध क्षेत्र का हथियार मात्र है? नहीं! द्रवण जीवन की एक ऎसी बरसात है, जो मन के धरातल को धोकर पाक-साफ (निर्मल) कर देती है। द्रवणशीलता का कारण भी तो निर्मलता ही होती है। दया-करूणा का भाव होता है। स्त्री के मुकाबले पुरूष में बहुम कम होता है। अहंकार इसे घन रूप कर देता है। पत्नी रूप में स्त्री ही इसे पिघला सकती है। जो स्त्री स्वयं पुरूष भाव में जीती है, वह भी पुरूष जितनी ही द्रवित हो पाती है। çस्त्रयों की तरह न होने से वह पुरूष के अहं को भी द्रवित नहीं कर पाती। उसका अपना अहं भी घन ही होता है।

मानव व्यवहार में द्रवण प्रेम का उच्चतम स्तर है। शबरी के बेर का प्रसंग, चन्दनबाला के बाकलों का महावीर स्वामी को बहराने का प्रसंग, विदुर पत्नी का कृष्ण को केले के छिलके खिलाने जैसे अनेक प्रसंग हैं, जो द्रवणशीलता के श्रेष्ठ उदाहरण बनते हैं। इसके विपरीत जब कौरव सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था, वह पूरी शक्ति से उसे रोकने का प्रयास कर रही थी। यह उसका अहंकार था। जब हारने लगी, कोई वश नहीं चला तब कृष्ण को पुकारकर समर्पित हो गई। यह भक्ति रस का शुद्ध द्रवण था।

हमारे सभी शास्त्र-पुराण साक्षी हैं कि भावनाओं की कठोरता में भी çस्त्रयां ही पुरूषों से काफी आगे हैं। जब-जब भी आसुरी शक्तियों ने दैविक शक्तियों को पराजित किया है, देवताओं ने देवियों की ही शरण ली है। देवियों ने ही असुरों का संहार भी किया है। क्रूरता में भी पुरूष कभी çस्त्रयों से आगे नहीं निकल सकता। यही कारण है कि सिंह जैसे पति पर भी सवार होकर उसे पिघलना सिखा देती है। गृहस्थाश्रम की शुरूआत करने को जीवन में प्रवेश करती है।

वानप्रस्थ से पूर्व पति को द्रवण का पाठ सिखाकर विदा हो जाती है। वानप्रस्थ में इसी के सहारे भक्ति मार्ग पर चढ़ाती है। भक्ति द्रवण का ही पर्याय है। बिना मां के आगे रोये भक्ति में प्रवेश संभव ही नहीं। आत्मा के सारे आवरण ज्ञान से ही नहीं हट जाते। मन का द्रवण चाहिए। पत्नी ही सिखा सकती है। स्त्री नहीं सिखा सकती। अर्घनारीश्वर में दोनों ही नर हैं, दोनों ही नारी। इस काल में दोनों में ही स्त्रैण भाव की बहुलता होने लगेगी। माया भाव के आवरण और माया ही हटाने वाली। पुरूष को प्राप्त करना है तो स्त्री भाव में आना ही होता है। तब देवता के आगे, गुरू के आगे आंखों से निरन्तर रस धार बहने लगती है।

एक आpर्यजनक बात यह भी है कि स्त्री ही द्रवण भाव में प्रतिष्ठित करती है। फिर भी वह स्वयं कामना से पार पाने में अक्षम है। उसका ममकार उसे बांधे रखता है। इसे पति ही तोड़ना सिखाता है। वैसे गुरू भी इस कार्य में सक्षम होता है, किन्तु वहां बिना शर्त का समर्पण सहज नहीं होता।

कृष्ण विश्राम कर रहे हैं। रूक्मणी पांव दबा रही है। अचानक उसका हाथ कृष्ण के तलुवे के छाले पर जाता है। आpर्यचकित हो कर कृष्ण से प्रश्न करती है कि यह कैसे हुआ। न आपको पैदल चलना पड़ा, न किसी भक्त ने नंगे पांव भगाया? कृष्ण बस मुस्कुरा दिए। रूक्मणी रहस्य को समझ नहीं पाई। फिर पूछा। कृष्ण ने कहा कि इसका कारण तो तुम स्वयं हो। काटो तो खून नहीं। “कृष्ण! यह कैसे संभव है? मेरे मन में तो इस प्रकार का भाव तक नहीं उठ सकता।” कृष्ण सहज भाव से कहने लगे कि çस्त्रयों की ईष्र्या का कोई विकल्प भी नहीं, इलाज भी नहीं। कुछ दिन पूर्व राधा यहां आई थी। तुम्हारी देख-रेख में ही थी। तुम अभी तक उससे ईष्र्या करती हो। तुमने उसको गरम-गरम दूध पिला दिया था। तुम्हें नहीं मालूम कि उसके ह्वदय में मेरे चरण रहते हैं। छाले तो होने ही थे। भतृüहरि शतक में एक विवेचन आता है पति-पत्नी संवाद का-

पति-”नाराज क्यों हो?”
पत्नी-मैं क्यों नाराज होने लगी।
पति-मेरी ऎसी कौनसी गलती हुई?
पत्नी-तुम्हारी तो कोई गलती नहीं, सारी गलती तो मेरे होने की है।
पति-किन्तु तुम्हारी आवाज रोने जैसी?
पत्नी-किसके आगे रोऊं?
पति-मैं हूं ना!
पत्नी-फिर तो रोने की जरूरत ही क्या थी।

ये अध्याय जीवन की उन पाठशालाओं के हैं, जो जीवन को मूल्यवान बनाते हैं। द्रवणशीलता में प्रवेश कराने का कार्य करते हैं। इस के बिना घन को द्रव नहीं कर सकते। द्रव भी द्रव में ही लीन हो सकता है। अत: संन्यास आश्रम का लक्ष्य तरल को विरल में रूपान्तरित कर देना है। तभी सत्य का रूप छूटेगा। ऋत् बनकर ऋत् में समा सकेगा। जहां से आए, वहीं लौट सकेंगे।

हर पदार्थ की तीन अवस्थाएं होती हैं-घन, तरल और विरल। बर्फ, जल और वाष्प। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आदित्य। अगिA, वायु तथा आदित्य। शरीर में भी तीनों अवस्थाएं विद्यमान रहती हैं-अस्थि, अवयव, रक्त और श्वास-प्रश्वास। इसी प्रकार मन के भाव भी घन-तरल और विरल होते हैं। मन का द्रवण या द्रवित होना, भावपूर्ण अभिव्यक्ति में नेत्रों से जल बह पड़ना ही द्रवण है। जो टस से मस न हो, जिसे पत्थर का दिल कहा जाता है, वही घन रूप है।

दो शब्द हैं-द्रव और द्रव्य। द्रव्य तो पदार्थ, सामग्री को कहते हैं, किन्तु द्रव लक्षण रूप भी है। इसके साथ प्रवाह भी है, आवेग भी है। अवसर अथवा परिस्थितिवश द्रव घन भी बन जाता है और विरल (वायु रूप) भी। जीवन का निर्माण भी विरल अवस्था से तरल होते हुए घन रूप में आना ही है। इसी को हम अव्यय-अक्षर-क्षर अवस्था स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कह लेते हैं। पंचकोशों में बाहरी अन्नमय कोश घन रूप है। भीतर के तरल-विरल बनते हुए आनन्दमय कोश का निर्माण करते हैं।

हमारे जीवन का लक्ष्य पुरूषार्थ के रूप में स्पष्ट होता है। अर्थ और काम के व्यापार (शरीर और मन के) को धर्म का आधार देते हुए कामनातीत हो जाना (मोक्ष) ही जीवन की सार्थकता है। हर व्यक्ति के पास कामना के भी दो धरातल होते हैं-एक अहंकार का तथा दूसरा ममकार का। बाकी रूप इन्हीं के स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। विद्या (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य) तथा अविद्या (अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश) के कारण। शरीर, मन, बुद्धि पर सत-रज-तम के आवरण भी होते हैं। यही तो हमारे आचरण की भूमिका तय करते हैं।

संसार में हमारे व्यवहार के मूल बिन्दु भी अहंकार और ममकार ही होते हैं। अहंकार का धरातल ठोस होता है, ममकार का तरल। एक पक्षीय होने पर दोनों ही हितकारी नहीं होते। अहंकार बुद्धि में उठता है, अत: ऊष्ण है। सहजता से समझौता नहीं करता। ममकार मन रूप है। व्यक्ति एकपक्षीय प्रवाह में बह जाता है। मन के विषयों पर महिलाओं का नियंत्रण श्रेष्ठतर होता है। उनके व्यवहार का क्षेत्र भी प्रेम-स्नेह-श्रद्धा-वात्सल्य आदि होता है। अत: वे अधिक द्रवणशील होती हैं। यहां तक कहा जाता है कि आंसू तो उनकी आंख के कोर पर ही मानो बैठा रहता है। यह तो महिलाओं का अचूक हथियार कहा जाता है।

तब क्या द्रवण जीवन के युद्ध क्षेत्र का हथियार मात्र है? नहीं! द्रवण जीवन की एक ऎसी बरसात है, जो मन के धरातल को धोकर पाक-साफ (निर्मल) कर देती है। द्रवणशीलता का कारण भी तो निर्मलता ही होती है। दया-करूणा का भाव होता है। स्त्री के मुकाबले पुरूष में बहुम कम होता है। अहंकार इसे घन रूप कर देता है। पत्नी रूप में स्त्री ही इसे पिघला सकती है। जो स्त्री स्वयं पुरूष भाव में जीती है, वह भी पुरूष जितनी ही द्रवित हो पाती है। çस्त्रयों की तरह न होने से वह पुरूष के अहं को भी द्रवित नहीं कर पाती। उसका अपना अहं भी घन ही होता है।

मानव व्यवहार में द्रवण प्रेम का उच्चतम स्तर है। शबरी के बेर का प्रसंग, चन्दनबाला के बाकलों का महावीर स्वामी को बहराने का प्रसंग, विदुर पत्नी का कृष्ण को केले के छिलके खिलाने जैसे अनेक प्रसंग हैं, जो द्रवणशीलता के श्रेष्ठ उदाहरण बनते हैं। इसके विपरीत जब कौरव सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था, वह पूरी शक्ति से उसे रोकने का प्रयास कर रही थी। यह उसका अहंकार था। जब हारने लगी, कोई वश नहीं चला तब कृष्ण को पुकारकर समर्पित हो गई। यह भक्ति रस का शुद्ध द्रवण था।

हमारे सभी शास्त्र-पुराण साक्षी हैं कि भावनाओं की कठोरता में भी çस्त्रयां ही पुरूषों से काफी आगे हैं। जब-जब भी आसुरी शक्तियों ने दैविक शक्तियों को पराजित किया है, देवताओं ने देवियों की ही शरण ली है। देवियों ने ही असुरों का संहार भी किया है। क्रूरता में भी पुरूष कभी çस्त्रयों से आगे नहीं निकल सकता। यही कारण है कि सिंह जैसे पति पर भी सवार होकर उसे पिघलना सिखा देती है। गृहस्थाश्रम की शुरूआत करने को जीवन में प्रवेश करती है।

वानप्रस्थ से पूर्व पति को द्रवण का पाठ सिखाकर विदा हो जाती है। वानप्रस्थ में इसी के सहारे भक्ति मार्ग पर चढ़ाती है। भक्ति द्रवण का ही पर्याय है। बिना मां के आगे रोये भक्ति में प्रवेश संभव ही नहीं। आत्मा के सारे आवरण ज्ञान से ही नहीं हट जाते। मन का द्रवण चाहिए। पत्नी ही सिखा सकती है। स्त्री नहीं सिखा सकती। अर्घनारीश्वर में दोनों ही नर हैं, दोनों ही नारी। इस काल में दोनों में ही स्त्रैण भाव की बहुलता होने लगेगी। माया भाव के आवरण और माया ही हटाने वाली। पुरूष को प्राप्त करना है तो स्त्री भाव में आना ही होता है। तब देवता के आगे, गुरू के आगे आंखों से निरन्तर रस धार बहने लगती है।

एक आpर्यजनक बात यह भी है कि स्त्री ही द्रवण भाव में प्रतिष्ठित करती है। फिर भी वह स्वयं कामना से पार पाने में अक्षम है। उसका ममकार उसे बांधे रखता है। इसे पति ही तोड़ना सिखाता है। वैसे गुरू भी इस कार्य में सक्षम होता है, किन्तु वहां बिना शर्त का समर्पण सहज नहीं होता।

कृष्ण विश्राम कर रहे हैं। रूक्मणी पांव दबा रही है। अचानक उसका हाथ कृष्ण के तलुवे के छाले पर जाता है। आpर्यचकित हो कर कृष्ण से प्रश्न करती है कि यह कैसे हुआ। न आपको पैदल चलना पड़ा, न किसी भक्त ने नंगे पांव भगाया? कृष्ण बस मुस्कुरा दिए। रूक्मणी रहस्य को समझ नहीं पाई। फिर पूछा। कृष्ण ने कहा कि इसका कारण तो तुम स्वयं हो। काटो तो खून नहीं। “कृष्ण! यह कैसे संभव है? मेरे मन में तो इस प्रकार का भाव तक नहीं उठ सकता।” कृष्ण सहज भाव से कहने लगे कि çस्त्रयों की ईष्र्या का कोई विकल्प भी नहीं, इलाज भी नहीं। कुछ दिन पूर्व राधा यहां आई थी। तुम्हारी देख-रेख में ही थी। तुम अभी तक उससे ईष्र्या करती हो। तुमने उसको गरम-गरम दूध पिला दिया था। तुम्हें नहीं मालूम कि उसके ह्वदय में मेरे चरण रहते हैं। छाले तो होने ही थे। भतृüहरि शतक में एक विवेचन आता है पति-पत्नी संवाद का-

पति-”नाराज क्यों हो?”
पत्नी-मैं क्यों नाराज होने लगी।
पति-मेरी ऎसी कौनसी गलती हुई?
पत्नी-तुम्हारी तो कोई गलती नहीं, सारी गलती तो मेरे होने की है।
पति-किन्तु तुम्हारी आवाज रोने जैसी?
पत्नी-किसके आगे रोऊं?
पति-मैं हूं ना!
पत्नी-फिर तो रोने की जरूरत ही क्या थी।

ये अध्याय जीवन की उन पाठशालाओं के हैं, जो जीवन को मूल्यवान बनाते हैं। द्रवणशीलता में प्रवेश कराने का कार्य करते हैं। इस के बिना घन को द्रव नहीं कर सकते। द्रव भी द्रव में ही लीन हो सकता है। अत: संन्यास आश्रम का लक्ष्य तरल को विरल में रूपान्तरित कर देना है। तभी सत्य का रूप छूटेगा। ऋत् बनकर ऋत् में समा सकेगा। जहां से आए, वहीं लौट सकेंगे।

गुलाब कोठारी

जून 1, 2011

बेचो और खाओ

भारतवर्ष एक पुरातन, बहुभाषी और सांस्कृतिक विभिन्नता वाला राष्ट्र है। यहां लोकतंत्र भी अखण्डता, एकता और सम्प्रभुता के चिन्तन पर आधारित है। देश के बंटवारे के साथ हिन्दू-मुस्लिम एक विरोधाभासी सम्प्रदाय के रूप में उभरने लगे। राजनेताओं ने इस विचारधारा को खूब हवा दी। गंगा-जमुनी संस्कृति को आमने-सामने खड़ा कर दिया।

देश टूटने लगा और नफरत की बढ़ती आग में नेता रोटियां सेकने लगे। जब इससे भी पेट नहीं भरा, तब अल्पसंख्यक शब्द का अविष्कार कर डाला। अच्छे भले मुख्य धारा में जीते लोगों को मुख्य धारा से बाहर कर दिया। अपने ही देश में लोग द्वितीय श्रेणी के नागरिक बन गए। उनके ‘कोटे’ निर्घारित हो गए। जन प्रतिनिघियों की क्रूरता की यह पराकाष्ठा ही है कि संविधान में बिना ‘बहुसंख्यक’ की व्याख्या किए ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को थोप दिया गया।  आप अल्पसंख्यकों को पूछें कि क्या उत्थान का चेहरा देखा?

राजनीति में संवेदना नहीं होती। अब तो लोकतंत्र में भी कांग्रेस/ भाजपा के प्रधानमंत्री/ मुख्यमंत्री होने लग गए। राष्ट्र और राज्यों का प्रतिनिघि कोई भी दिखाई नहीं देता। कोई किसी का रहा ही नहीं। कोई किसी को फलता-फूलता सुहाता ही नहीं। बस सत्ता-धन लोलुपता रह गई। इनका भी अपराधीकरण नेताओं ने ही किया। देश के सीने पर फिर आरक्षण के घाव किए गए। विष उगलने लगे, अपने ही गांव वाले, पड़ोसी। घर बंट गए, कार्यालय बंट गए।

एकता और अखण्डता को मेरे ही प्रतिनिघियों ने तार-तार कर दिया। नेताओं ने खूब जश्न मनाया। अब इन नासूरों से मवाद आने लगा है। आम आदमी कराह रहा है। आरक्षण के अनुपात (प्रतिशत) की सूची देखें तो सभी अल्पसंख्यक नजर आएंगे। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद जिस ‘साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निरोधक बिल-2011′ को कानूनी जामा पहनाना चाहती है, बहुसंख्यकों के विरूद्ध, उसे पहले परिभाषित तो करे। किसको बहुसंख्यक के दायरे में रखना चाहेगी?

हाल ही में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की ओर से जारी इस बिल के मसौदे को पढ़कर लगता है कि हमने क्यों आजादी के लिए संघर्ष किया था। क्यों हमने जन प्रतिनिघियों को देश बेचने की छूट दे दी। क्यों हमने समान नागरिकता के अघिकार को लागू नहीं किया? क्यों हमने कश्मीर को अल्पसंख्यकों के हवाले कर दिया और वोट की खातिर तीन करोड़ (लगभग) बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों को भारत में अनाघिकृत रूप से बसने की छूट दे दी।

इस नए बिल को देखकर तो लगता है कि हमारे नीति निर्माता पूरे देश को ही थाली में सजाकर पाकिस्तान के हवाले कर देना चाहते हैं। आश्चर्य है कि परिषद के साथ-साथ उसके अध्यक्ष ने भी बिल तैयार करके सरकार के पास भेज दिया। ऎसा घिनौना बिल आजादी के बाद पढ़ने-सुनने में भी नहीं आया। घिक्कारने लायक है। राष्ट्रीय स्तर के कानून बनाने के लिए संसद, संविधान एवं राष्ट्रीय एकता परिषद के होते हुए किसी नागरिक परिषद की आवश्यकता ही क्या है? क्यों बना रखी है सफेद हाथी जैसी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद?

बिल कहता है कि जब साम्प्रदायिक दंगे हों तो इसका दोष केवल बहुसंख्यकों के माथे ही मढ़ा जाए। अल्पसंख्यकों को मुक्त ही रखा जाए। तब अल्पसंख्यक अपराघियों के मन में भय कहां रहेगा? वे कभी भी बहुसंख्यकों के विरूद्ध कुछ भी उत्पात खड़ा कर सकते हैं। तब कश्मीर के अल्पसंख्यक कभी भी सेना के जवानों के विरूद्ध कोई भी शिकायत कर सकते हैं। जांच में उनको तो दोषी माना ही नहीं जाएगा। आज जिस आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल प्रोटेक्शन एक्ट ने सेना को कश्मीर और उत्तर पूर्व में सुरक्षित रखा हुआ है, वह भी बेअसर हो जाएगा। बांग्लादेशी भी अल्पसंख्यकों के साथ जुड़े ही हैं।

दोनों मिलकर आबादी का 20 प्रतिशत हिस्सा हैं।  क्या अपराध भाव किसी के ललाट पर लिखा होता है? क्या अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे देशों में यही अल्पसंख्यक आतंकवाद के सूत्रधार नहीं है और यहां किसी तरह की साम्प्रदायिक हिंसा में लिप्त नहीं होने की कसम खाकर पैदा होते हैं। आपराघिक प्रवृत्ति व्यक्तिगत होती है। इसे किसी समूह पर लागू नहीं किया जा सकता जैसा कि यह प्रस्तावित बिल कह रहा है। इसी प्रकार नेकी या उदारता भी सामूहिक रूप से लागू नहीं की जा सकती।

एक अन्य घोष्ाणा भी आश्चर्यजनक है। दंगों की अथवा अल्पसंख्यक की शिकायत पर होने वाली जांच में जो बयान अल्पसंख्यक देता है, उस बयान के आधार पर अल्पसंख्यक के विरूद्ध किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई नहीं होगी या कार्रवाई का आधार नहीं बनेगा। याद है न, जब दहेज विरोधी कानून बना था, तब किस प्रकार लड़के वालों की दुर्दशा करते थे पुलिस वाले। झूठी शिकायतों पर? किस प्रकार अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अघिनियम के हवाले से बिना जांच किए सजा देते हैं। अपने ही देशवासी कानून के पर्दे में देश को तोड़ने का निमित्त बन रहे हैं। अब यदि यह बिल पास हो गया, तब वैसे ही जुल्म होंगे, जैसे कुछ अफ्रीकी देशों में होते हैं। सबकी आंखें और कान बंद होंगे।

एक मुद्दा और भी है जिसका अवलोकन भी यहां कर लेना चाहिए। वह है आरक्षण कानून। इसमें अंकित सभी जातियां किस श्रेणी में आएंगी? हिन्दुत्व कोई धर्म या सम्प्रदाय नहीं है। क्या इन सभी जातियों को भी अल्प संख्यक माना जाएगा। क्या सिख, ईसाई, मुस्लिम आदि सम्प्रदायों के बीच आपसी हिंसा होने पर साम्प्रदायिक हिंसा के आरोप से सभी मुक्त रहेंगे? तब क्या यह सच नहीं है कि इस कानून का उपयोग येन-केन प्रकारेण बहुसंख्यकों को आतंकित करने के लिए किया जायेगा।

इसकी अन्य कोई भूमिका दिखाई ही नहीं देती। आज जो कानून हमारे संविधान में हैं, वे हर परिस्थिति से निपटने के लिए सक्षम हैं। जरूरत है उन्हें ईमानदारी और बिना भेदभाव लागू करने की। जो साठ साल में तो संभव नहीं हो पाया। राष्ट्रीय एकता परिषद भी यही कार्य देखती है। सजा का अघिकार नई समिति को भी नहीं होगा। निश्चित ही है कि इसका राजनीतिक दुरूपयोग ही होगा। इसके पास स्वतंत्र पुलिस भी होगी। मध्यप्रदेश में लोकायुक्त पुलिस जो कर रही है, उसे कौन नहीं जानता। सरकारें, राजनेताओं तथा अपने चहेतों को मंत्र देकर बिठाती जाएंगी।

मजे की बात यह है कि अल्पसंख्यक समूह की व्याख्या में एसटी/एससी को भी शामिल किया गया है। अर्थात उन्हें बहुसंख्यकों के समूह से बाहर निकाल दिया। तब अन्य आरक्षित वर्गो को कैसे साथ रखा जा सकेगा? यदि उनको भी अल्पसंख्यक मान लिया जाए तो, बहुसंख्यक कोई बचेगा ही नहीं। ब्राह्मण एवं राजपूत भी आंदोलन करते रहते हैं आरक्षण के लिए। उनको भी दे दो। तब आज के अल्पसंख्यक ही कल बहुसंख्यक भी हो जाएंगे।

क्या होगा, क्या नहीं होगा यह अलग बात है। प्रश्न यह है कि मोहल्ले के कोई दो घर मिलकर नहीं रह पाएंगे। बल्कि दुश्मन की तरह एक-दूसरे को तबाह करने के सपने देखने लग जाएंगे। अल्पसंख्यक पड़ोसियों को पूरी छूट होगी कि देश में आएं, कानून से मुक्त रहकर अपराध करें और समय के साथ देश को हथिया लें। धन्य-धन्य मेरा लोकतंत्र एवं उसके प्रहरी!!!

गुलाब कोठारी

जून 3, 2011

पधारो म्हारे देश!

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष, यू.पी.ए. की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी आज देश के सबसे बड़े प्रान्त की यात्रा पर आ रही हैं। स्वागत है! राजस्थान की इस यात्रा में वे कुछ ऎसे निर्णय कर सकती हैं जो देशहित में बहुत महत्वपूर्ण भी हैं और जो स्थानीय कांग्रेस सरकार को ताकत देंगे। जैसे कि राजस्थान को विशिष्ट राज्य का दर्जा देना।

 

इतना बड़ा रेगिस्तान, इतनी बड़ी पाक सीमा, इतना बड़ा राष्ट्रीय पशुधन, अन्तिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाने की भारी-भरकम लागत। सीमा ही 1044 किमी लम्बी है। इसी सीमा के दोनों ओर पारिवारिक रिश्ते पलते हैं। क्यों नहीं इनका आवागमन सुगम किया जाए, ताकि इस जरिए भाईचारे का एक नया वातावरण तो बनाया ही जा सकता है। यूं तो सीमा प्रदेश जम्मू-कश्मीर भी है, किन्तु वहां कट्टरता का वातावरण है।

 

राष्ट्रीय हित का एक बड़ा निर्णय होगा-यहां तेल की खोज, उसके उत्खनन और परिशोधन पर निवेश बढ़ाया जाना चाहिए। हर दृष्टि से ऎसा होना श्रेष्ठ तो होगा ही, प्रदेश का यह भाग मध्य-पूर्व देशों की तरह विकसित भी हो जाएगा। इसी के साथ सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की बड़ी योजनाएं परमाणु संयंत्रों का विकल्प बन सकती हैं। देश के अन्य भागों में सौर ऊर्जा इतनी घन रूप नहीं है।

 

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने देश को सूचना का अघिकार, शिक्षा का अघिकार, नरेगा जैसे कार्यक्रम दिए हैं। जरूरत इस बात की है कि, परिषद की ओर से सुझाए कार्यक्रमों को संसद में जस का तस पास किए बिना उन पर व्यापक बहस हो-चाहे संसद में या संसदीय समितियों में। इसी तरह परिषद आने वाले समय की आवश्यकताओं के अनुरूप देश का एक मानचित्र भी तैयार कर सकती है। ‘मेरे सपनों का भारत’ जैसा एक स्वरूप!

 

सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सरकार के अनेक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे पदों को भी उनकी सहमति से पूरित किया जाता है। विश्व की गिनी-चुनी शक्तिमान महिलाओं में भी उनका नाम है। लेकिन इन्दिरा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री जैसा प्रभाव पाने के लिए उन्हें अभी और मेहनत करनी होगी।

 

इसका सबसे बड़ा कारण है कि इनके अघिकांश निर्णय सरकार के अनुकूल दिखाई देते हैं। देश के अनुकूल हों, भले ही कांग्रेस को कम लाभ हो, तब इनको कांग्रेस के ऊपर देश का नेता माना जाएगा। आज नहीं। इसके लिए आपके पास एक सशक्त सूचना तंत्र भी होना चाहिए। लोग क्या सोचते हैं, क्या अपेक्षा रखते हैं आदि जानकारियां सीधी आपके पास आनी चाहिए। आज तो जगह-जगह छलनियां (फिल्टर्स) लगी हैं। इसीलिए आज तक देश में समान नागरिकता का कानून भी नहीं बन पाया।

 

राजस्थान में और केन्द्र में आपके दल की सरकारें हैं। दोनों में समन्वय करके बड़ी-बड़ी परियोजनाएं लागू की जा सकती हैं। पुरानी, अधूरी योजनाओं को पूरा किया जा सकता है। ये सारी बातें ही ऎसी हैं जिन पर आप निर्णय करके देश को एक बड़ा संदेश दे सकती हैं। समय-समय पर अन्य नेताओं को भेजकर कार्यो का जायजा कराया जा सकता है। राजनीति से ऊपर उठकर देश की कमान हाथ में लेने का प्रश्न है। ताकि देश का विकास राजनीति की भेंट न चढ़े और लोग आपकी आंखों में अपने सपनों को साकार होते देख सकें। साथ ही देश को सक्षम नेतृत्व मिल सके।

 

गुलाब कोठारी

जून 5, 2011

झूठ

हमें सदा सत्य बोलना चाहिए। सत्यमेव जयते! सत्य क्या है? ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या। जो दिखाई दे रहा है, वह भी मिथ्या है। हां, क्योंकि हर पल बदलता रहता है। जैसे नदी का पानी प्रतिक्षण अपना स्थान, स्वरूप और प्रभाव बदल लेता है। नियति को सत्य कहा है। पानी नीचे की ओर बहता है। अगिA ऊपर को उठता है। वायु तिरछा बहता है। यह नियति सत्य है। जो कभी नहीं बदलता, वही सत्य है। वह केवल ब्रह्म है। उसी के नाना रूप हैं। उसी का सारा विवर्त है।

हर कार्य के पीछे कारण रहता है। कारण एक रहते हुए भी कार्य अनेक हो सकते हैं। बीज एक है। उससे तना, टहनियां, पत्ते, फूल, फल आदि स्वरूप प्रकट होते हैं। जो सत्य नहीं होता उसे लोक व्यवहार में झूठ कहते हैं। काल्पनिक, अवास्तविक या मिथ्या भी कह देते हैं। सत्य छिपता नहीं है। एक ही रूप हो सकता है। झूठ का कोई निश्चित स्वरूप भी नहीं होता। बदलता रहता है। आकाश या जल की तरह फैला होता है। मैं जितने लोगों से मिलता हूं, व्यवहार करता हूं, सब भिन्न होता है। मां-बाप से अलग, बच्चों से अलग, मित्रों से अलग, व्यावसायिक लोगों से अलग, अजनबियों से अलग। और भी न जाने कितने रूप में मिलता हूं लोगो से। हर एक के साथ नया चेहरा।

नया मुखौटा। किसी को भी मेरा सही चेहरा दिखाई नहीं देता। यही झूठ है। सच होता तो सबको मेरा चेहरा एकसा दिखाई देता। किसको याद रहता है सत्य? एक और सत्य होता है। जिसके भी केन्द्र होता है, परिधि या स्वरूप होता है उसे सत्य कहते हैं। जिसके केन्द्र परिधि नहीं होते, वह ऋत कहलाता है। फैला हुआ। हवा-जल-आकाश आदि। इसीलिए कहते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते। जिसे हम सत्य कह रहे हैं वह ब्रह्म का विवर्त है। माया तैयार करती है। बनाती है तो बिगाड़ भी सकती है। यह माया द्वारा निर्मित विश्व झूठ होते हुए भी सत्य है। यानी झूठ भी अपने आप में एक सत्य है।

झूठ बोलना कारण वश भी होता है और किसी न किसी भय से भी। भय तो सबसे बड़ा मृत्यु का ही होता है। फिर भी इनके रूप हैं और मूल में सारे रूप मृत्यु से ही निकलते हंै। लोभ-स्वार्थ-ईष्र्या-संकटकाल-हानि का डर आदि कई कारण भी होते हैं कि व्यक्ति झूठ बोलता है। अहंकारवश अपनी होशियारी दिखाने को, किसी को नुकसान पहुंचाने अथवा गुमराह करने को, अज्ञान छिपाने को आदि हजारों कारणों से व्यक्ति झूठ बोलता है।

झूठ का अर्थ है सचाई से दूर। जैसे नदी जल को उद्गम से दूर ले जाती है। जैसे भौतिक चकाचौंध व्यक्ति को मोह में बांध लेती है। बाहरी विश्व में उलझे रहने को विवश करती है। व्यक्ति आत्मा से दूर रहकर भ्रम में जीता है। इसी के निराकरण के लिए तो योग का सहारा लिया जाता है। ताकि उसे झूठ और सत्य का भेद समझ में आ सके। पुरूष और प्रकृति मिलकर ही सृष्टि को चलाते हैं। प्रकृति के त्रिगुण- सत, रज, तम, हर सत्य को ढंकते रहते हैं। व्यक्ति की कामनाएं, महत्वाकांक्षाएं, असुर प्राणों के प्रभाव एवं प्रारब्ध भी यथार्थ से व्यक्ति को दूर ले जाते हैं। संकल्पवान व्यक्ति ही ऎसी स्थिति में स्थिर चित्त रह सकता है।

झूठ बोलने में वाक् चातुर्य की आवश्यकता होती है जो कि हर एक के पास नहीं होता। इसीलिए ज्यादातर लोगों का झूठ पकड़ा जाता है। जो होशियार होते हैं, वे आगे निकल जाते हैं। आज राजनीति में शीर्ष पर जितने भी नेता दिखाई पड़ते हैं, इसका उदाहरण हैं। सत्य पर टिके रहने के लिए साहस चाहिए। तपना पड़ता है। त्याग भी करना पड़ता है। मोह त्यागकर धैर्य की परीक्षा देनी पड़ती है। ऎसे लोगों का इतिहास लिखा जाता है। झूठ बोलने वाले हवा में ही उड़ जाते हैं। बड़े-बड़े पदों पर बैठकर भी विस्मृति में चले जाते हैं।

सत्य बोलने का अर्थ है स्वयं के आवरण हटाने का संघर्ष। हम मानते हैं कि झूठ दूसरे के साथ बोला जाता है। ऎसा नहीं है। वाणी तो बोलने का अन्तिम पड़ाव है। इससे पहले व्यक्ति शब्दों का, भाषा का योजन अपने चिन्तन में करता है। जब उसे सही लगता है, उसके बाद बोलता है। चिन्तन का चित्रण व्यक्ति के मानस पटल पर अंकित हो जाता है। यह अंकन ही आवरण चढ़ाने-हटाने का कार्य करता है। यह हमारे भावनात्मक धरातल के नए रूप का निर्घारण करता है। सत, रज, तम के समीकरण का रूपान्तरण करता है।

मन की चंचलता व्यक्ति को प्रवाह से बाहर नहीं आने देती। उसे भी झूठ का सहारा ही सुविधाजनक लगता है। वाणी सरस्वती और विश्व लक्ष्मी या अर्थजगत का अन्तिम पड़ाव है- वाक् रूप। परा-पश्यन्ति-मध्यमा से होकर ही वैखरी प्रस्फुटित होती है। योगीजन इसी वैखरी के सहारे-सहारे पर तक पहंुच जाते हैं। सत्य ही ऋत बन जाता है। इस मन पर विजय भी पाना सहज नहीं होता। केवल सत्य के मार्ग से ही संभव है। सत्य से ही तो स्वरूप का निर्माण हो रहा है। आकार-आचार ही पहचान बनते हैं और व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठित करते हैं। आवरण ही झूठ हैं। इनकी भी एक सचाई होती है। यही व्यक्ति के आचरण का प्रमाण-पत्र बनता है। एक दीपक के चारों ओर जिस रंग का कागज-सिलोफिन लगाएंगे, वैसी ही दीपक की लौ नजर आएगी। ये सारे आवरण संकल्प या लक्ष्य के अभाव में चढ़ते जाते हैं।

हमारी समाज व्यवस्था स्वयं आवरणों से शुरू होती है। जाति-धर्म-नियम-परम्पराएं सभी तो आवरण का कार्य करते हैं। शरीर स्वयं भी एक आवरण है। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य ही आवरण मुक्ति का मार्ग है। अविद्या-अस्मिता-आसक्ति-अभिनिवेश से आवरण चढ़ते हैं। सत्य इतना डरावना लगने लगा कि बोलना कठिन है। झूठ बोलने से किसी को डर नहीं लगता। बल्कि अनेक बार तो अपने बोले हुए झूठ पर व्यक्ति गर्व करता है।

गुलाब कोठारी

जून 12, 2011

मां द्वैत भी, अद्वैत भी

चहुंमुखी अर्थात सम्पूर्णता के साथ किया गया वरण (चयन) ही आवरण कहलाता है। वरण में कामना रहती है और माया का ही दूसरा नाम कामना है। अत: माया और आवरण पर्यायवाची कहलाते हैं। वरने की प्रक्रिया को वरण कहते हैं। इसमें मांगना, चुनना, छांटना आदि क्रियाएं समाहित होती हैं।

कामना-इच्छा को भी वर कहते हैं, क्योंकि उनका वरण करने के बाद ही तो कामना पूर्ति के उपाय किए जाते हैं। ब्ा्रह्म में कामना है, किन्तु विस्तार पाने की। माया स्वयं कामना है। अत: स्त्री और उसके सभी स्वरूप, चाहे पिछली पीढियों के हों, अपनी पीढ़ी के हों अथवा नई पीढ़ी के (पुत्री, पौत्री आदि) सभी का सम्बन्ध मूल में कामना से होता है। सम्बन्ध कामना का धरातल तय करता है, बुद्धि उसका स्वरूप तय करती है- भावों के अनुरूप। भाव की दिशा ही कामना को सकारात्मक या नकारात्मक रूप देती है।

चूंकि हमारा निर्माण भी आवरणों के कारण होता है अत: माया से ही हमें सीखना पड़ता है कि आवरण क्या हैं, उनका आकलन कैसे करें, उनको हटाएं कैसे? जीवन में स्त्री के सारे रूप इसी क्रम में देखे जाते हैं। हर रूप किसी न किसी मूल आवरण की व्याख्या है। माया के कारण इस जगत को मिथ्या कहा जाता है। ब्ा्रह्म सत्य है। जीवन के सात धरातल हैं। शरीर में सात धातुएं हैं।

सृष्टि में सप्त लोक हैं। सात ही शरीर में चक्र हैं। इन्द्र धनुष के सात ही रंग हैं। संगीत में सात सुर और पृथ्वी/द्युलोक में सात-सात महासागर हैं। सृष्टि के सभी तत्व इन सातों लोकों में व्याप्त रहते हैं, किन्तु स्वरूप एक सा नहीं होता। माया अथवा मां भी इन सातों लोकों में, तीनों गुणों (सत-रज-तम) में पंचकोश में भिन्न-भिन्न रूप से रहती हैं। चन्द्रमा से शरीर में बनने वाले 28 सह प्रतिमास सात पीढियों के अंश हमारे शरीर में लाते रहते हैं। इनके अनुपात से भी माया का कार्य प्रभावित होता रहता है।

मां पृथ्वी को भी कहते हैं। बीज को आवरित करती है। उसका पोषण करती है। पेड़-पौधों के शरीर का निर्माण करती है। बीज का निर्माण भी तो कोई मां ही करती होगी। बीज के वपन से पेड़ के जीवनपर्यत मां साथ रहती है। साथ तो हमारे भी रहती है, किन्तु दृष्टि भेद के कारण दिखाई नहीं देती। हम कहां जीवन में मां देखते हैं? पत्नी को मां कहो तो महीने भर बात नहीं करे। बेटी, पोती को मां कह दो, सब मूर्ख कहने लग जाएंगे। जबकि भिन्न-भिन्न अवस्था भेद के कारण ये सब रूप मां के ही हैं। उसके बिना कुछ नहीं है।

मां आवरण है। छुपाकर रखती है। पत्नी भी गृहस्थाश्रम में आवरण है। बाद में मित्र बनकर मां के स्वरूप में बदल जाती है। संन्यासाश्रम में पति को स्त्रैण बना चुकी होती है। दाम्पत्य रति से देवरति में पति को प्रतिष्ठित कर देती है। यहीं से मोक्ष मार्ग की शुरूआत होती है। वैराग्य में प्रवेश भी पत्नी ही करा सकती है। संसार का कोई गुरू यह कार्य नहीं कर सकता। विरक्ति को झेलती भी वही है। ऎश्वर्य की साक्षी भी पत्नी-मां होती है। दैहिक पत्नी नहीं हो सकती। वह तो मोह निद्रा के लिए आमंत्रण मात्र है। उसका लक्ष्य तो कुछ और ही होता है।

जीवन के हर मोड़ पर, बदलती हुई कामनाओं की पूर्ति करे, आवरणों के भेद खोलती जाए। पहले कामना में फंसाना, फिर मुक्त करने को प्रेरित भी करना, सहयोग करना, देखते जाना कि कौन से धरातल के आवरण नहीं हट पा रहे। सारे आवरणों को हटाकर मोक्ष तक पहुंचाना ही उसका लक्ष्य है। इसके लिए उसके पास भी सात जन्म का समय होता है। गहरी समझ रखने वाली पत्नियां समय से पूर्व पति में विरक्ति का भाव पैदा कर देती है। ऎसे पति सौभाग्यशाली होते हैं। जो इस विरक्ति को अभाव मानकर पूर्ति की तलाश करते हैं, वे फूटे भाग्य के होते हैं। वे पत्नी का सम्मान नहीं कर सकते। अपमान भी करें, तो आश्चर्य नहीं। मां रूप में सोच पाना तो उनके लिए असंभव है। उनको तो पशु रूप आहार-निद्रा-भय-मैथुन के बाहर जीना ही नहीं आता। पूरी उम्र गृहस्थाश्रम की तरह जीते हैं।

सृष्टि की शुरूआत आवरण से- अव्यय पुरूष रूप। मन पर प्राण-वाक् के आवरण। महामाया के आवरण से अक्षर पुरूष। प्रकृति के आवरण से क्षर पुरूष। ये सारे आवरण प्रसव पूर्व के हैं। पंच महाभूतों और तन्मात्राओं से शरीर का निर्माण। प्रसव बाद जगत के भौतिक आवरण चढ़ते हैं। ज्ञान के नए आवरण चढ़ते हैं। परिवार, धर्म, समाज, देश, शिक्षा आदि के आवरण चढ़ते हैं। इनको वह व्यक्ति समझ पाता है, जो संस्कारवान है। सभी आवरण सूक्ष्म होते हैं। मां ही गुरू बनकर पेट में ही इन आवरणों से परिचय कराती है। जीव का रूपान्तरण करती है। यही व्यक्तित्व जीवन का आधार होता है।

बचपन की गतिविधियों में समानता का भाव भी लड़के-लड़की के पालन-पोष्ाण में अधिक बढ़ गया है। अत: आकर्षण घटता हुआ मात्र शरीर पर ठहरने लगा है। मां का मूल कार्य इस पौरूष भाव को ही स्त्रैण बनाना है। इसके बिना पुरूष के मन में (ब्ा्रह्म) आकर्षण कैसे पैदा होगा। मन के सारे आवरण उतरने के बाद यह स्थिति भक्ति (अंग) रूप में प्रकट होती है।

बहुत लम्बी यात्रा है यह। पूरी 25 वर्ष की। इन पच्चीस वर्षो की यात्रा में पत्नी रूप मां (शक्ति) क्या करती है, कैसे आवरणों का भेद समझाती है, यह महत्वपूर्ण है। इसके लिए उसको प्रशिक्षण नहीं लेना पड़ता। अधिकांश पाशविक आवरण तो वह पेट में ही हटा देती है। उसके अलावा कोई नहीं जानता कि जीव कहां से चलकर आया है। उसके भविष्य की आवश्यकताएं क्या हैं। सम्पूर्ण छह माह का संसर्ग शिशु (गर्भस्थ) के लिए रूपान्तरण का काल होता है। जीव स्वयं भी अपने बारे में सब कुछ जानता है। अपने भावी लक्ष्य के अनुरूप ही मां-बाप का चयन करता है। ध्वनि स्पन्दनों के जरिए मां का संतान से संवाद बना रहता है।

नाभि ही ध्वनि स्पन्दनों का केन्द्र है। यहां मां का दैहिक ज्ञान काम नहीं करता। उसका अतीन्द्रिय ज्ञान, स्वप्नों में दिखाई पड़ती ईश्वरीय आस्था तथा मां के स्वरूप की नैसर्गिक शक्तियां काम करती हैं। उसकी अपनी भी मां होती है। विद्या, कला, राग, संयोग और काल का ज्ञान माया से मिलता है। मां और संतान के ह्वदयों के ब्ा्रह्मा-विष्णु-इन्द्र प्राण इस अवधि में एकाकार हो जाते हैं। इसी से सन्तान के मन में उठने वाली इच्छाओं की दिशा तय हो जाती है। संस्कार का यही तो स्वरूप है। तभी मां संतान के भविष्य को जानती है।

कन्या तो भावी मां है। स्वयं पृथ्वी है। धरती मां है। उसने भी किसी जीव के उद्धार के लिए ही जन्म लिया है। जीव के शरीर और मन के आवरणों के रहस्य खोलेगी। तम को सत्व में परिवर्तित करेगी। इनकी नश्वरता को प्रमाणित करके उसका मोह भंग करेगी। विरक्ति का भाव पैदा करके आवरण हटाने में सहयोगी बनेगी। उसे स्वयं के लिए नहीं जीना है। उसके जीवन का एक ही संकल्प होता है, जिसके लिए वह स्वयं को तैयार करती है। पति के जीवन का अभिन्न अंग बनकर सृष्टि क्रम में प्रेरित करना और आगे स्त्रैण भाव देकर मोक्षगामी होने को प्रेरित करना। इसके लिए वह सारा घर-बाहर छोड़कर संन्यास लेकर पति के पास जा बसती है। शेष्ा जीवन बस उसी के लिए।

ऎसा संकल्पवान कर्मयोगी, ज्ञानयोगी और बुद्धियोगी क्या पूजनीय नहीं होता! पुरूष तो कभी जीवन लक्ष्यों के प्रति संकल्पवान होता ही नहीं। पत्नी आकर जब उसके ह्वदय कपाट खोलती है, प्रेम का मार्ग प्रशस्त करती है, तब ही उसे जीवन का अर्थ प्राप्त होता है। सृष्टि करने के लिए कन्या को अपने शरीर के पांचों तत्वों को संतुलन में रखने का अभ्यास करना पड़ता है। ऋतुचर्या का प्रकृति के साथ संतुलन सीखना पड़ता है। भाव भूमि का निर्माण करना पड़ता है। प्रसव पूर्व की स्थितियों की जानकारी, संतान की देख-रेख, प्रसव बाद का ज्ञान, लालन-पालन का ज्ञान अर्जित करके तैयार करना होता है।

माया के मोह-पाश की जादूगरी, शक्ति अर्जन, लज्जा के स्वरूप, वात्सल्य और श्रद्धा में स्नान, त्याग करने की पृष्ठभूमि पर स्वयं को तैयार करना तथा स्वयं के जीवन के प्रति मोह-त्याग जैसे बड़े-बड़े अभ्यास करती है। माया का स्वरूप कामना के रूप में ही जीवन में प्रवेश करता है। कामना सही अर्थो में भूख और अभाव का ही दूसरा नाम है। मन में कामना ही बीज रूप में पल्लवित-पुष्पित होती है। कामना के साथ ही वह स्वयं को भी पति ह्वदय में प्रतिष्ठित करती है। उसके स्थान पर पति को अपने ह्वदय में बिठाकर जीवनभर उसका ही प्रतिनिधित्व करती है। पति के लिए सदा सौम्य और दण्ड विधान में रौद्रा हो जाती है।

माया सोम अवस्था का नाम है। अग्नि में सदा सोम आहुत होकर गौण हो जाता है। शेष्ा अग्नि ही रहता है। इसी यज्ञ से सृष्टि विस्तार चलता रहता है। घर में कन्या या पुत्री का होना भी विचारों और भावनाओं को प्रभावित करता है। वासना और विष्ााक्त भावों का प्रवाह बढ़ता है। मातृत्व की अनेक गतिविधियों का बोध भी कराती हैं। अपने से छोटे बच्चों के लिए तो मां स्वरूप होती है। फिर कुछ प्रारब्ध भी होता है। कर्मो के फल किसको छोड़ते हैं। आसुरी भाव जहां अभिव्यक्त हों, वहां परिजनों की हवस का शिकार भी बनना पड़ता है।

मां के तीन स्वरूप हैं- मां-शक्ति-माया। यह पहला माया भाव (तमस) है। शक्ति (राजस) और मां सात्विक भाव है। आज मातृत्व की शिक्षा तो मां भी नहीं देती। मातृत्व के प्रति आकर्षण भी घट रहा है। जहां नारी का व्यवहार मन के बजाए ज्ञान पर आधारित होगा, वहां मातृत्व, मिठास, समर्पण, त्याग और योग नहीं रहेंगे। पति के जीवन का अंग न होकर स्वतंत्र पहचान के साथ जीने की बात होगी। वहां बस टकराव या दुराव होगा। ज्ञान का अभाव एक-दूसरे के सम्मान को कम कराएगा। आज तो स्वच्छन्दता के वातावरण में हम फिर से वन-मानुष होते जा रहे हैं। बाहर भले ही चकाचौंध में जीते दिखाई पड़ते हों। क्योंकि जिस कामना के सहारे माया का जीवन में प्रवेश होता है, उसमें संकल्प नहीं रहा।

वासना आ गई। घर में पुत्री इस द्वन्द्व से मुक्त करने में सहायक होती है। जीवन को ब्ा्रह्म और माया का लीलाभाव कहा है। मिट्टी के घर बनाकर फिर ढहाते जाना। जिस माया ने ब्ा्रह्म का अंश लेकर हमारा निर्माण किया, वही तो फिर से मुक्त करेगी। इसके लिए व्यक्ति की चेतना को जाग्रत करना है, जाग्रत रखना है। माया सदा अव्यक्त रहती है। परोक्ष भाव होता है।

सूर्य से तीन तत्व हमें प्राप्त होते हैं- ज्योति (ज्ञान), आयु एवं गौ (विद्युत)। यह ज्योति ही बुद्धि रूप विकसित होती है। हमारी सृष्टि अर्घनारीश्वर के सिद्धान्त पर कार्य करती है। नर-नारी दोनों में स्त्री-पुरूष्ा भाव रहते हैं। नर में पौरूष्ा और नारी में स्त्रैण अधिक रहता है।

दोनों मिलकर समभाव में आ जाते हैं। यही मानव की पूर्णता है। माया का कार्य पुरू ष में भी स्त्रैण भाग को बढ़ाना, दाम्पत्य रति का विकास करना और आत्मा को ईश्वर की ओर मोड़ना है। जैसे-जैसे यह कार्य आगे बढ़ता है, माया के अन्य स्वरूप बाधक भी बनते हैं। माया भी अपनी पकड़ आसानी से नहीं छोड़ना चाहेगी। पत्नी रूप मां इन माया के विकल्पों को समझकर उनसे संघर्ष करने को प्रेरित करती है। सही अर्थो में संसार सागर के विषयों को और कोई इस व्यावहारिक तथा आत्मीय भाव में नहीं समझा सकता। यही कामना बनती है और यही तृप्ति भी देती है। शक्ति रूप में तृप्ति की छाया होती है। व्यक्ति को पराक्रम और ऎश्वर्य प्राप्त करने के लिए उकसाती रहती है। मिलता भले ही भाग्य के अनुसार ही है। जैसे-जैसे यह विकास यात्रा बढ़ती है आसुरी भाव- सुरा, सुन्दरी या अविद्या रूप में व्यवधान पैदा करने का प्रयास करते हैं। पत्नी चेतावनी बनकर खड़ी हो जाती है। ये सब तो उसकी तपस्या के लिए चुनौतियां हैं। हारती नहीं है।

पराक्रम और ऎश्वर्य को तृष्णा रूप में बदलते भी देर नहीं लगती। स्वयं के लिए परिग्रह का स्वरूप नकारात्मक भी हो सकता है। व्यक्ति दूसरे के अधिकारों का हनन भी कर सकता है। पत्नी सहनशीलता देती है। लज्जा का मार्ग प्रशस्त करती है। सुर-असुर के बीच इसी बात का भेद होता है कि एक को गलती करने में लज्जा आती है, दूसरे को नहीं आती। पुरूष के अहंकार में लज्जा नहीं होती। जिसकी पत्नी में मातृत्व है, वह लज्जा को ग्रहण कर ही लेता है। लज्जा ही वह सोपान है जिस पर चढ़कर ऊध्र्व यात्रा की जाती है। यही संस्कारों का केन्द्र है।

स्त्री की विरासत है। संकल्प के बिना लज्जा विकल्पों में खो जाती है। संकल्प और समर्पण ही दो आयुध होते हैं, पत्नी-मां के। लज्जा ही श्रद्धा और शान्ति का आधार बन जाती है। आक्रामकता को रोक देती है। जहां लज्जा, श्रद्धा, शान्ति है, वहां लक्ष्मी है, यश है, श्री है, कान्ति है। पत्नी यहां भी दान-पुण्य का मार्ग प्रशस्त करती है। स्वयं से बाहर निकलकर लोक के लिए कुछ कराती है। समष्टि भाव पैदा करने में सदा सहायक होती है। यहां तक कि पति के नाम की दान की रसीदें मन्दिर-गौशाला आदि में कटाती रहती है। इसी में व्यक्ति को तृप्ति का भाव दिखाई देता है। यह तृप्ति ही शनै:-शनै: व्यक्ति को कामना मुक्त करती है। अभाव की अनुभूति को मिटाती है। कामना मुक्ति ही मोक्ष है।

पुत्री/पौत्री रूप में मां/माया चेतना के जागरण में अपनी भी आहुतियां देती हैं। आत्मीयता के नए युग का पदार्पण होता है। पुत्री को देख कन्यादान का चित्र सदा आंखों के आगे बना रहता है। यह भी वैराग्य के अध्याय खोलता रहता है। परिष्कार का मार्ग बनाए रखता है। पौत्री तो वैसे भी ब्याज रूप मानी गई है। पुत्र पेड़ होता है- पौत्र-पौत्री फल होते हैं। अधिक प्रिय होते हैं। पौत्री करूणा के भाव को प्रेरित करती है। बात-बात में व्यक्ति पौत्री के लिए द्रवित हो जाता है। मां के रूप का यह पड़ाव लगभग सभी के अहंकार को घुटने टिका देता है।

समर्पण और भक्ति का अर्थ सिखा देता है। निर्मलता का निर्झर जीवन में बहने लगता है। तमस बाहर को दौड़ता है। सत्व का साम्राज्य फैलता जाता है। भाव शुद्धि का मन्दिर साक्षात हो उठता है। पुरूष्ा का पौरूष्ा स्त्रैण में रूपान्तरित होता जाता है। पति-पत्नी दोनों ही स्त्रैण, कामना मुक्त और माया से बाहर। मां ने माता रूप में आवरण हटाए (पिछले जन्म के), पत्नी ने व्यावहारिक ज्ञान देकर आवरण हटाने में साथ दिया और पौत्री ने शुद्धता को स्थायित्व भाव दिया। है सभी माया के रूप। वही व्यक्ति के पास आकर रहती है, उसे वश में करती है और बिना उसकी मर्जी के भी समय आने पर उसे मुक्त करा जाती है। पहले शुद्ध माया, फिर शक्ति और अन्त में मां।

हम प्रकृति के सिद्धान्त को साथ रखकर देखें। नर-नारी की युगल सृष्टि से ही यज्ञ सम्पूर्ण होता है। नर-नारी क ी शरीर भिन्नता के उपरान्त भी दोनों अर्घनारीश्वर के सिद्धान्त पर कार्य करते हैं। दोनों का ही आधा-आधा भाग पुरूष और प्रकृति का, अग्नि और सोम का होता है। अग्नि की पुरूष में तथा सोम की स्त्री में प्रधानता रहती है। अग्नि विस्तार धर्मा है, ऊपर को उठती है, तोड़ती है। सोम संकोच धर्मा है, जोड़ने वाला है। नर-नारी दोनों ही माया के रूप हैं। अत: पिता, पुत्र, पौत्र आदि भी माया का ही विस्तार है। इसी को द्वैत भाव भी कहा जा सकता है।

माया द्वैत भाव को ही कहते हैं। जब नर-नारी का भेद मिट जाए और मूल में एक ही नजर आने लगे, तब समझो द्वैत गया। माया के कार्य को पुरूष न तो समझ सकता है, न ही समेट सकता है। अत: माया ही सृष्टि को चलाती है। वही सृष्टि का गतिमान तत्व (शक्ति) है। अत: मां को ही नियन्ता कहा गया, ब्ा्रह्म को साक्षी माना। पुरूष देह में जो नारी अंश है, उसी के आधार पर तो वह बाहर नारी को देखता है। इसी प्रकार नारी की देह का पुरूष अंश बाह्य पुरूष से सामंजस्य बनाए रखने का प्रयास करता है। बिना अपने अंश को समझे हम कैसे और किस आधार पर दूसरे को समझ सकते हैं। इसी प्रकार दूसरे को देखकर भी हम अपने भीतर का आकलन कर लेते हैं। स्त्री सौम्या होने से अपनी ओर आकृष्ट करती है, घेरती है, आवरित करती है, तब हम अपना भीतर टटोल सकते हैं। कहां-कहां बच पाए, कहां-कहां आवरित हो पाए और क्यों? इसी क्रम को माया स्वयं समझाती जाती है, भिन्न-भिन्न स्वरूप लेकर। भिन्न-भिन्न जन्म लेकर। कर्मो के फल देकर। जब आप माया के सारे आवरण समझ गए, उस दिन आप द्वैत से मुक्त हो गए। मां को पुकारो और उसके अंक में बैठ जाओ!

कोई मां बच्चे को योग्यता के कारण प्यार नहीं करती। वह तो कपूत को भी करती है। न मां बदल सकती है, न ही सन्तान। जो है उसी में प्रेम को बढ़ाना है, भोगना है। मां तो यह भी समझती है कि यह जीव बाहर से मेरे पेट में आया है तथा उम्र भर यह तथ्य उसकी दृष्टि में रहता है। इसीलिए उसकी क्षमा का दायरा बहुत बड़ा है। उसकी सहनशक्ति, धैर्य, प्रतीक्षा सभी विशाल होते हैं। संतान से मार खाकर भी भीतर शान्त ही रहती है। कई क्षेत्रों में बच्चे मां को बेच देते हैं और वह हंसते-हंसते चली जाती है।

माया एक धारा का प्रवाह है। बहता ही जाता है। प्रवाह से पूर्व द्रवणता होना अनिवार्य है। यह मिठास से आती है। दया और करूणा से आती है। अत: माया मित्र या शुभचिन्तक बनकर घेरा डालती है। मोह लेती है। द्रवित करती है। व्यक्ति बहने लगता है। ऊपर की ओर बह नहीं सकता। धारा बनकर नीचे की ओर प्रवाहित करती है। मूल केन्द्र या उद्गम से दूर ले जाती है। जैसे ही वह गृहस्थाश्रम के कार्य से मुक्त होकर वानप्रस्थ में प्रवेश करती है, उसकी गति बदल जाती है। धारा से वह राधा हो जाती है। राधा में ऊपर की ओर बहने की शक्ति है। यह जीवन का महत्वपूर्ण चौराहा होता है। पत्नी मां ही हाथ पकड़कर सही मार्ग पर बनाए रख सकती है, क्योंकि उसके जीवन की तपस्या प्रभावित होती है। आने वाले जीवन में अनेक नई चुनौतियों का डर भी रहता है। अब तक हर चुनौती का सामना पति के साथ मिलकर करती रही है। पति यदि नई धारा में बहने की सोच ले तो उसी से संघर्ष करना होगा। वही धारा है, वही राधा भी है। वही मुक्त विचरण करते हुए जीव को आकर्षित करती है।

आज शिक्षा ने मां छीनकर औरत को शरीर तक सीमित कर दिया। समानता के भुलावे में प्रतिक्रियावादी बनती चली जा रही है। इसी कारण समलैंगिक विवाह होने लगे, पशुओं को उपकरण बनाने लगे, यांत्रिक स्त्री-पुरूष बन गए। बाजार में बिकने लगे। कहां ढूंढ़ेंगे उस मां को? बहुत पीछे काल के गर्त में खो गई। मां शरीर का नाम नहीं है। सन्तान पैदा करने वाली का नाम नहीं है। भावना का, विशिष्ट ऊर्जा का नाम है।

रूपान्तरण की क्षमता का नाम मां है, जो पहले बच्चे को टॉफी देकर वश में करती है, फिर उसके व्यक्तित्व का निर्माण करती है, मंजिल दिखाती है और उड़ान भरने को छोड़ देती है। उसके जीवन की तपस्या एवं सुन्दरता उसकी सन्तान में निहित रहती है। आज की शिक्षित मां इसके ठीक विपरीत होती है। उसके लिए स्वयं की सुन्दरता महत्वपूर्ण होती है। यही नहीं, उसकी अपनी समस्याओं एवं कुंठाओं का जाल भी छोटा नहीं होता। उसका अहंकार समर्पण भी नहीं करने देता। वह मां नहीं औरत रह जाती है। पुरूष्ा के समान व्यवहार करती है। उसका स्थायी स्वरूप बन ही नहीं पाता। उसके परिवार का सांस्कृतिक स्वरूप बिखरा होता है। मां के साथ ऎसा कभी नहीं होता। वह तो ईश्वरीय अवतरण जैसा होता है। सबके लिए होता है। बिना भेद-भाव के।

गुलाब कोठारी

जून 17, 2011

नई संस्कृति!

जिन लोगों ने हमारा संविधान लिखा और जो लोग आज उसे लागू कर रहे हैं, ये दोनों एक देश और एक सभ्यता के नजर नहीं आते। संविधान लिखने वालों के आगे हमारा सिर श्रद्धा से झुक जाता है। जो आज संविधान लागू कर रहे हैं, उनके आचरण और भाषा, संवेदनहीनता, व्यक्तिगत लांछन आदि से तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। राजनेताओं में गरिमा नहीं, अहंकार भर गया। अपने स्वार्थ के आगे किसी का सम्मान करना ही भूल गए। स्वार्थ सिद्ध नहीं तो पार्टियां बदल लेते हैं। आज स्पष्ट लगने लगा है कि भले ही ये लोग भिन्न-भिन्न भाषा और कटाक्ष काम में लें, हैं तो भीतर एक ही थैली के चट्टे-बट्टे।

 

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जो कुछ कांग्रेस के बारे में कहा, वह उनके भीतर का ही कलुष है। ‘यूपीए सरकार मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम हो गई है।’ ‘कांग्रेस लादेन की औलाद है।’ इस प्रकार की भाषा पहली बार नहीं बोली। यह मुम्बई की कच्ची बस्तियों की भाषा है। जहां लाज-शर्म-सभ्यता से जुड़े प्रश्न उठते ही नहीं। लेकिन चाल-चलन-चेहरा के आधार पर राजनीति करने वाले लोग अभद्र, अश्लील भाषा का प्रयोग करें और यह भी कहे कि मुझे तो येन-केन प्रकारेण सत्ता चाहिए, तब किसके कान खड़े नहीं होंगे। देखो तो, निकल किसके मुंह से रहे हैं।

 

यह तो एक ताजा बानगी है। पिछले कुछ सालों का राजनीति का इतिहास देखें तो लगेगा कि आज की राजनीतिक संस्कृति का यही नया स्वरूप बन गया है। फिर चाहे लालकृष्ण आडवाणी, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, सुषमा स्वराज, राहुल गांधी, लालू यादव, मुलायम सिंह, बाल ठाकरे, जयललिता, राबड़ी देवी…. किसी को भी ले लें।

 

अब नेता मुद्दों और नीतियों के आधार पर विपक्षी/ विरोधी दलों की आलोचना नहीं करते। अभद्र टिप्पणियां करते हैं। अन्दर सब एक जैसे हैं। सदन में किसी मुद्दे पर बहस करते ही नहीं। जो व्यक्ति सार्वजनिक सभाओं में अत्यन्त शालीन, विकासवादी एवं जोशपूर्ण भाषण देते हैं, लोगों को आश्वासन देकर वोट बटोरते हैं, वे ही सदन में कितना असभ्य व्यवहार करते हैं कि देखने वालों को शर्म आ रही है। उनको नहीं आती। अपने इस दोहरे चरित्र को ही शायद हथियार मान लेते हैं।

 

विकीलीक्स क्या है? राडिया पुराण देश को क्या संदेश दे रहा है? बाबा रामदेव क्यों अचानक हरिद्वार जाकर बैठ गए? जयललिता दिल्ली में करूणानिघि के परिवार और चिदम्बरम को क्यों निशाने पर लिए थी? इस्पात खनन की सूचनाएं लीक होने के पीछे क्या रहस्य है? रिलायन्स के साथ अनेक मुद्दे सरकारी मिलीभगत से जुड़े क्यों अचानक सार्वजनिक हो रहे हैं?

 

किसी भी मतदाता को पूछकर देख लो कि पिछले चुनावों में देश के बड़े-बड़े नेताओं ने किस-किस अभद्र भाषा का प्रयोग किया। किस प्रकार राजनेता कृतत्व से हटकर व्यक्तिगत लांछन लगाने लगे हैं। स्कूल का छात्र भी ऎसा करे उसे कोई माफ नहीं करेगा। कितना घटिया स्तर हो सकता है लोकतंत्र के चुने हुए जन प्रतिनिघियों का एक-दूसरे के खिलाफ! शर्म ही क्या, घिक्कारने की बात है। इस नई राजनीतिक संस्कृति को तो इनके परिजन भी टीवी पर देखकर पहचानने से मना कर देते होंगे। किन्तु सच तो यह है कि यही आज की संस्कृति हो गई है।

 

किसी राजनेता के पास जनता की बातों के लिए समय नहीं है। सभी मिलकर जनता को लूट रहे हैं। जो कम लूट रहा है वह राडिया को ले आएगा। विकीलीक्स का उपयोग कर लेगा या फिर सीधा-सीधा नाम लेकर आक्रमण कर देगा। आम आदमी को इन सूचनाओं की जानकारी या गहराई मालूम नहीं। उसे तो पता है कि राशन कार्ड का काम हो या ड्राइविंग लाइसेंस का, बिना पैसे काम नहीं होता।

 

लोकतंत्र का नया अर्थ धीरे-धीरे नई पीढ़ी समझने लग गई है। समय दूर नहीं लगता जब इन काले चेहरों को एक झटके में मतदाता बाहर कर देगा। वरना दिग्विजय, गडकरी जैसे एक-दो बड़बोले हर पार्टी में उभर कर आ गए तो पार्टियां तो डूबेगी ही, साथ ही हर सभ्य नागरिक इन पर थू-थू करेगा। पांच साल बाद उन्हें हरा कर। यह वही देश है जो वेदों के ज्ञान के आधार पर विश्व में फिर से सिरमौर होने के सपने देख रहा है।

 

गुलाब कोठारी

जून 18, 2011

सबका भला

एक ही ईश्वर की सृष्टि भिन्न-भिन्न आवरणों के कारण अलग दिखाई पड़ती है। विपरीत भाव में भी खड़ी हो जाती है। यही माया भाव का जगत है। भीतर एक, बाहर अनेक। बुद्धिमान वर्ग इस अनेकता के अहंकार में जीता है। मनीषी इस अनेकता में एकता देखकर। आज जो आरक्षण का विवाद छिड़ा हुआ है, वह इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। सरकार ने आरक्षण दिया और सहजता से देश के टुकड़े हो गए। आरक्षित वर्ग इतना प्रसन्न हुआ मानो जेल से छूटा हो। किन्तु विषवमन भी करने लगा। सारा देश इस दंश का अनुभव करने लगा। एक ओर सामूहिक रूप में गैर आरक्षित वर्ग के विरूद्ध कार्रवाइयां भी होने लगीं, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत तौर पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग आम बात हो गई। गांवों में भी दो धड़े हो गए। आरक्षित वर्ग के युवा अलग-थलग पड़ गए। इनमें अनेक तो पिता के पद के कारण अपराधों में भी लिप्त हो गए। इनका भविष्य मुख्य धारा का नहीं रहा। नई संस्कृति में ये फिर से अलग रहने को मजबूर हो गए। लाभ दो-तीन प्रतिशत को मिला, किन्तु सजा सभी सौ प्रतिशत को।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में रिगेनिंग को सही ठहरा दिया। जो व्यक्ति आरक्षण की आड़ में अपने वरिष्ठों से बहुत ऊपर निकल गए थे, उनको नए सिरे से वापस पुराने स्थान पर लाने के आदेश किस को नहीं चुभेंगे? मुख्यमंत्री की यह घोषणा कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना करेंगे, स्वागत योग्य है। अच्छा होगा यदि पालना शीघ्र एवं अक्षरश: उसी भावना में की जाए। बिना किसी समझौते के। जिन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आरक्षण स्वीकार करके ऊंचे पद ग्रहण किए थे, वे आज उसी कोर्ट के आदेश को मानने को तैयार नहीं दिखाई पड़ते। प्रतिक्रिया का एक छोटा रूप हम गुर्जर आंदोलन में भी देख चुके हैं। एक हलवाई ने इनके बच्चों को दूध बेचने से भी मना कर दिया था। अब यदि बड़ी प्रतिक्रिया होती है तो देश फिर वहीं पहुंच जाएगा, जहां से आरक्षण शुरू हुआ था। आगजनी और खून-खराबा महत्वपूर्ण नहीं होता। देश की एकता-अखण्डता और सामाजिक सौहार्द महत्वपूर्ण होते हैं। आरक्षण ने इनको तार-तार कर दिया है।
यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू किया गया और ईमानदारी से लागू किया तो देश में सैकड़ों अधिकारी और हजारों कर्मचारी फिर से नीचे के पदों पर काम करने को मजबूर होंगे।

नौकरी कोई छोड़ेगा नहीं। क्योंकि बाहर इनको यह लाभ नहीं मिलने वाले। जिन वरिष्ठ लोगों का ये अब तक अपमान कर रहे थे, फिर से उनके नीचे ही काम करना पड़ जाएगा। यही वह डर है जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के विरोध में ऎसी प्रतिक्रिया दिखाई पड़ रही है। जितनी अधिक प्रतिक्रिया होगी, उतना ही गैर आरक्षित वर्ग नाराज होता जाएगा। हालात बद से बदतर होते जाएंगे। इने-गिने सरकारी नौकरों के अत्याचारों एवं अधिनायकवादी व्यवहार का खमियाजा सारे समाज को पूरी उम्र भोगना पड़ेगा।

अन्त में आरक्षित वर्ग उसी सामाजिक धरातल पर जा पहंुचेगा, जहां उसको फिर से अपमान के घूंट पीने को बाध्य होना पड़ेगा। युवा पीढ़ी के प्रति समाज संवेदनशील नहीं दिखाई देगा। उचित तो यह होगा कि देशहित, समाजहित को ध्यान में रखकर फैसला तुरन्त लागू कर दिया जाए ताकि देश को नए घावों का दुख भोगने से बचाया जा सके। जो भूलें हुई , उन्हें भूल कर नया मार्ग प्रशस्त किया जाए। इसी में हम सब की भलाई है।
गुलाब कोठारी

जून 19, 2011

स्वार्थ

स्वार्थ यानी स्वयं के लिए। व्यक्ति जीता किसके लिए है-स्वयं के लिए। जो भी लक्ष्य लेकर पैदा हुआ, उसके लिए। अपने निजी स्वरूप- प्रकृति के अनुकूल, आत्म-स्फूर्त स्वतंत्रता के साथ। इस स्व में ही स्वजाति भी अन्तर्निहित रहती है। इसी से ‘स्वयं’ बनता है। जो अपने आप होता चला जाए और निजी रूप में भी बना रहे।

 

इस स्व को अर्थ के अनेकार्थ के साथ समझने से अर्थ-अनर्थ-व्यर्थ-स्वार्थ आदि स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। अर्थ को यहां ‘के लिए’ के रूप में देख रहे हैं। स्वयं के लिए। आशय, प्रयोजन, इच्छा, साधन, हेतु, विषय, धन, वस्तु, उपयोग के लिए जैसे भी इसके अर्थ होते हैं। चार पुरूषार्थो में एक पुरूषार्थ अर्थ भी है। अर्थ यानी मतलब। अभिव्यक्ति, लक्ष्य और व्यंग्य तीन रूप कहे गए हैं अर्थ के। अभिधा, लक्षणा, व्यंजना भी अभिव्यक्ति ही है।

 

अर्थ मांगने को भी कहते हैं और दावा करने को भी। रीति-परंपरा और यथार्थ को भी। जब व्यक्ति स्वयं के लिए जीता है, चिन्तन और कर्म करता है, वह व्यष्टि भाव कहलाता है। सामाजिक प्राणी होने से, प्रकृति दत्त स्वरूप के कारण, सम्पूर्ण सृष्टि के साथ अन्तर्निहित सम्बन्ध के कारण और ईश्वर अंश रूप होने के कारण ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इस जीवन की अवधारणा है। इस चिन्तन स्वरूप को समष्टि भाव कहते हैं।

 

जब व्यक्ति घोर स्वार्थी हो जाए तब क्या होता है। उसे हर चीज स्वयं के लिए जान पड़ती है। हर प्राणी उसके लिए उपभोग या उपयोग रूप जान पड़ता है। परायेपन का भाव मिट जाता है। सब कुछ स्व में समा जाता है। यही व्यष्टि से समष्टि में रूपांतरण है। स्व का ‘अहं ब्रह्मास्मि’ हर एक प्राणी में प्रतिष्ठित होना समष्टि है। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य रूपी ज्ञान से अविद्या-अस्मिता-आसक्ति (राग-द्वेष), अभिनिवेश के पर्दे हटे, वैसे समष्टि भाव प्रतिष्ठित हुआ। अहंकार और ममकार दोनों विदा हो जाते हैं।

 

स्व का भी तो अपना एक स्वरूप है। स्व किसको कहते हैं? शरीर को? नहीं! शरीर नष्ट होता है, स्व नहीं। शरीर मेरा है, मैं नहीं। शरीर स्वयं कुछ नहीं कर सकता। चलाया जाता है। शरीर स्व का आश्रय है, पहचान है, वाहन है, अभिव्यक्ति है, भीतर की सारी क्रियाओं का प्रतिबिम्ब है, स्व नहीं है।

 

तब क्या बुद्धि स्व है? नहीं। बुद्धि मेरा साधन है। मेरे लिए चिन्तन करती है, निर्णय करती है, नियोजन करती है, सही-गलत का फैसला भी करती है, मन की इच्छाओं का अनुसरण करती है, सूर्य के द्वारा प्राप्त होती है, इसका निर्माण अहंकार से होता है, अत: मेरे अहंकार से जुड़ी अवश्य रहती है किन्तु स्व नहीं है।

मन भी मेरा है, मैं नहीं हूं। इसमें उठने वाली इच्छाएं भी मेरी हैं, कत्ताü बनकर रहना चाहता है, चन्द्रमा की ऊर्जाओं का अनुसरण करता है। हर इच्छा के साथ नया मन बनता है। इच्छापूर्ति के साथ ही मर जाता है।

 

शरीर का स्वार्थ है अर्थ, सुख, सुविधा, भोग। इन्द्रियां भले ही मन से जुड़ी हों, किन्तु उनके विषयों को शरीर ही भोगता दिखाई देता है। इसी भोग के साथ रोग और योग भी शरीर के ही विषय जान पड़ते हैं।

 

शरीर आत्मा का प्रवेश द्वार है। शरीर के रहते हुए आत्मा को मुक्त कराना ही जीवन का सबसे बड़ा स्वार्थ है। अत: शरीर को जानना, इसकी भाषा को समझना हमें भीतर के अदृश्य धरातलों की (मन, बुद्धि, आत्मा की) गतिविधियों की जानकारी देता है। पास में कौन व्यक्ति बैठा है, थाली में रखा कौन-सा व्यंजन आज नहीं खाना चाहिए आदि बाहरी परिस्थितियों की सूचना भी शरीर के स्पन्दन देते हैं।

 

प्रकृति के साथ शरीर का सम्बन्ध, माता-पिता, भाई-बहन आदि के साथ सम्बन्ध भी प्राकृतिक अभिव्यक्ति ही है। सत, रज, तम का स्वरूप जीवन में क्या है-भोजन में क्या है, विचारों में क्या है, यह जानना सही मार्ग पकड़ने के लिए आवश्यक है। शरीर के माध्यम से कौनसी ऊर्जाएं बाहर जाती हैं, मन के स्पन्दन हजारों-हजार मील दूर पहुंचते हैं, आभामण्डल एवं विभिन्न शक्ति केन्द्रों के माध्यम से कैसे प्राणों को समझना, उनके प्रयोग करना, वाणी (वाक्) के क्षेत्र को ब्रह्म की तरह समझ पाना, इच्छाओं के निर्माण में वाक् के स्पन्दनों की भूमिका जान लेना हमारे गहन स्वार्थ का क्षेत्र है।

 

विचार, भाषा, शब्द, अर्थ, वर्ण, आदि को जान लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि मौन को जान लेना। व्यक्ति को उसके विचारों से ही जाना जाता है। विचार ही ज्ञान का धरातल है। इनको जाने बिना ज्ञाता और ज्ञेय के साथ एकाकार हो ही नहीं सकते। ज्ञान योग के द्वारा यदि कर्मो का विपाक करना है तो विचारों की प्रकृति (सत, रज, तम) को जान लेना पहला स्वार्थ है। धर्म का उपयोग इसके बिना न समझेंगे, न ही कर पाएंगे। विचारों की उष्णता को ह्वदय की शीतलता के साथ समन्वित करना भी सुख का मार्ग है। अहंकार की शक्ति एवं दिशा पर नियंत्रण भी विचारों की प्रकृति से जुड़ा है।

 

स्वार्थ का अर्थ आम तौर पर भौतिक जगत के साथ, धन-समृद्धि के साथ ही देखा जाता है। इसको तो क्षुद्र दृष्टि या जड़ता कहा जाता है। स्वार्थ तो कामना के साथ जुड़ता है। कामना अभाव सूचक होती है। आवश्यकता अभाव में ही दिखाई पड़ती है। हर इन्द्रिय प्रतिक्षण मन को किसी विषय की ओर ले जाता है, उससे जोड़ता है, मन में विषय के प्रति आकर्षण पैदा करता है। बार-बार पैदा करता है। प्रवाह बनाता है। इस मन को जानना हमारा अति महत्वपूर्ण स्वार्थ है। इसके बिना व्यक्ति मार्ग भटक सकता है। प्रवाह पतित हो सकता है। मन संवेदनाओं का केन्द्र है। अभिव्यक्ति का धरातल है। बिना मन को समझे मनोयोग प्राप्त नहीं होगा। भक्ति मार्ग नहीं मिलेगा।

 

जीवन के सम्बन्ध नहीं बनेंगे। इस मन पर पड़े आवरणों को समझना उन्हें हटाने का मार्ग प्रशस्त करता है। यह मन सृष्टि के मूल मन का प्रतिबिम्ब है। वही हमारा आत्मा है। जीवन का स्वार्थ है आत्म साक्षात्कार। स्वयं ही स्वयं को देखना। यदि यहां तक शरीर के रहते नहीं पहुंच पाए तो यह प्रमाण होगा कि हम कतई स्वार्थी नहीं हैं। न हम स्वार्थ की परिभाषा को सही अर्थो में समझ पाए। जब आत्म साक्षात्कार होता है तो सबमें एक ही स्वरूप भी नजर आता है। उसी समझ के साथ मन में निस्वार्थ प्रेम भी पैदा होगा। प्रेम का यह निस्वार्थ स्वरूप ही भक्ति है, यही मोक्ष है। हम इतने स्वार्थी बन सकें कि अपने भीतर ही ब्रह्माण्ड को, कृष्ण को पा सकें।

गुलाब कोठारी

जून 20, 2011

बाबा रे बाबा!

हाल ही दिवंगत हुए सत्य साई बाबा के निजी कक्ष से मिली सम्पत्ति का ब्योरा सुनकर देश स्तब्ध रह गया। स्वयं को संत ही नहीं भगवान कहने वाला व्यक्ति माया के जाल में इतना जकड़ा हुआ था कि संत की परिभाषा ही खो गई। भक्तों की श्रद्धा तो स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। यह भी हो जाना चाहिए कि ऎसे संतों के रूप में रहने वाले धर्म के सौदागरों को राजनीति में प्रश्रय नहीं मिले। बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग इनके आगे जब नतमस्तक होते हैं और मीडिया में प्रशस्ति ज्ञान होता है, तो आम आदमी मोह में फंस जाता है। ऎसे संतों के कार्यकलापों पर नियमित रूप से सरकार की भी दृष्टि होनी चाहिए।

 

बचपन में साधु-संतों की एक छवि गांवों में दिखाई पड़ती थी, कि वे घर के बाहर पहुंचकर आवाज लगाते थे। जैसे-अलख निरंजन! और भीतर से कोई आकर एक मुटी आटा दे जाता। कभी-कभार जैन मुनि भी आते। कथावाचक आते। इनमें कुछ तो किसी परम्परा में दीक्षित होते हैं, कुछ नहीं होते। संत शब्द तो लगता है अंग्रेजी के सेंट का अनुवाद बन गया है। साधु अपने-अपने सम्प्रदाय का प्रचार करते थे। आध्यात्मिक जीवन के प्रति जागरूकता पैदा करते थे। कुछ नागा साधु गांव के बाहर बगीचों में, चबूतरों पर धूणी जमा लेते। चिलम पीते और गांव वालो के साथ चर्चा करते।

 

एक और भी श्रेणी थी। इनके साधु अखाड़ों से जुड़े होते थे। गोरखनाथ परम्परा के लोग भी थे। सामन्त युग में ये लोग मल्ल युद्ध तथा अस्त्र-शस्त्र विद्याएं सीखते थे। क्षेत्र की सुरक्षा का भार इनके पास होता था। सामन्ती युग तो समाप्त हो गया, किन्तु अखाड़े रह गए। धीरे-धीरे ये भी नागा साधुओं के रूप में पूरे देश में छा गए। हर कुंभ मेले में इन अखाड़ों को देखा जा सकता है। आज ये सब साधु हो गए। व्यसनों से भी इनका जीवन ओत-प्रोत दिखाई पड़ता है। अभी हरिद्वार कुंभ के बाद अखाड़ों के क्षेत्र में सफाई अभियान के दौरान बड़ी संख्या में शराब की खाली बोतलें मिलीं। जबकि हरिद्वार में मद्यनिषेध लागू है। साधु की शास्त्रीय कल्पना भिन्न है।

 

हर जीवनशैली में धर्म भी एक अनिवार्य घटक है। रूप भिन्नता के साथ। आज अघिकांश लोग बिना दीक्षा के साधु-संत का ताना बना लेते हैं। इसमें इनका बाहरी स्वरूप साधु का जान पड़ता है और भीतर में बिना शिक्षा-दीक्षा का। आज इस देश में साधु-संत महत्वाकांक्षी हो गए। आश्रम-ट्रस्ट बना लिए। यात्राओं के दौर तथा वैभव और यश-कीर्ति की लालसा में लिपट गए। इस देश ने वशिष्ठ और वाल्मीकि से लेकर विदुर और चाणक्य तक के स्वरूप देखे हैं। इन सबने बिना किसी लोभ-लालच के केवल राजा का मार्गदर्शन किया। लोक की समृद्धि पर आंख रखी तथा राजनीति से बाहर रहे। संत ही रहे।

 

आजादी के बाद संतों ने भी जैसे स्वतंत्रता का अनुभव किया। श्रीमती इंदिरा गांधी के समय धीरेन्द्र ब्रह्मचारी हथियार का कारखाना चलाते थे। चन्द्रास्वामी को आप क्या कहेंगे- बाबा, तांत्रिक या सत्ता/हथियारों का दलाल? नरसिंह राव से लेकर चन्द्रशेखर तक पहुंच थी। सेंट किट्स घोटाला, लखू पाठक मामला और फेरा में भी आरोपी रहे। स्वामी चिन्मयानन्द अयोध्या मामले में भी जुड़े और मंत्री पद भी पाया। इसी प्रकार इनके साथी महन्त अवैद्यनाथ भाजपा की सक्रिय राजनीति में रहे। महंत चांदनाथ, आदित्यनाथ आदि भी राजनीति में रहे।

 

शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती भी राजनीति की चपेट में आ गए। जेल भी जाना पड़ा। स्वामी अग्निवेश, साध्वी उमा भारती, ऋतंभरा, प्रज्ञा ठाकुर जैसे कई नाम भी सीधे या परोक्ष रूप से सक्रिय राजनीति से जुड़े हैं। बाबा रामदेव ने जो अभियान एक संत के रूप में शुरू किया था, उसने भी बाद में राजनीतिक मोड़ ले लिया। अभियान ठप हो गया।

 

देश के सामने प्रश्न है कि किस को साधु-संत का दर्जा दे और किस आधार पर? क्या दीक्षित साधु को राजनीति में जाने की छूट दी जाए या गृहस्थ वेश में लौटकर ही प्रवेश करे। आज जिस प्रकार लोग संत बन रहे हैं, बदनाम हो रहे हैं, उससे नई पीढ़ी के मन में इन संतों के नाम से अविश्वास पैदा हो रहा है।

 

व्यक्ति संसार छोड़कर साधु-साध्वी बने और सत्ता के पीछे भी भागे तो संयम कैसे पाल सकता है? सत्ता से जुड़ते ही बाकी सारे कर्मकाण्ड भी जुड़ने लगते हैं। क्या आपने आसाराम बापू की भाषा सुनी है? बाबा रामदेव को बोलते सुना है? दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम मौलाना बुखारी के तो अनेक वाक्य आज भी लोगो के कानों में गूंज रहे होंगे। और ये सब धर्म के रहनुमा हंै।

 

साधु-साध्वी का चोला भी पहनो, सत्ता में भी रहो और गर्भपात भी करवाते रहो। बड़े-बड़े संतों के आश्रमों से निकले यौनाचार के किस्से देशभर में सुने जा सकते हैं। कई बड़े-बड़े आचार्यो के आश्रमों से हत्या के समाचार भी देश में फैले हैं। इससे मिलता-जुलता एक उदाहरण अजमेर का अश्लील फोटो काण्ड है। संत भिंडरावाले की घटना भी देश भूला नहीं है। तब क्या इनको डूबकर नहीं मर जाना चाहिए? लोग हैं कि फिर भी इनके आगे श्रद्धा से दण्डवत करते हैं। पश्चिम में भी ऎसे काण्ड न्यायालयों में पहुंचे हैं।

 

भीतर का आदमी सब जगह एक-सा है। क्यों नहीं ऎसे संतों को जनता वेश बदलने के लिए मजबूर करे? क्यों इनके नाम के पहले संत शब्द लगाया जाए? बल्कि इनका बहिष्कार क्यों नहीं किया जाए? क्यों इनको धन भेंट करें? क्या दे रहे हैं आश्रमों वाले देश को-अपना अहंकार? कभी अखाड़ों में लड़ने वाले, चरस-गांजा पीने वाले भी संत और तपस्या करने वाले भी संत।

 

व्यापार करने वाले भी संत और मर्यादाहीन बोलने वाले भी संत? देश को चिन्तन करना पड़ेगा कि हम किस अज्ञान की कीमत चुका रहे हैं। क्या विरासत नई पीढ़ी के लिए छोड़ना चाहते हैं। हजारों साल पुराने कर्म और कर्म फलों की अवधारणा या धर्म और विज्ञान के समन्वय का सिद्धांत। क्यों साधुता का अपमान करने का अघिकार उनको दिया जाए? जिस धर्म का साधु सत्ता में भागीदार हो गया, मान लो धर्म बिक गया। वह धर्म के माथे पर काला टीका बन जाएगा। वोट की राजनीति को इस नुकसान से कुछ लेना-देना नहीं होता।

 

साधु के पद से जो सत्ता को बड़ा मानता है, वह मन में तो साधु है ही नहीं। समाज को क्या फिर भी ऎसे लोगों का बोझ उठाना चाहिए? क्या इनके आचरण का प्रभाव इनके साथ के उन अन्य संतों पर नहीं पड़ता जो धन और सत्ता की भूख से दूर रहकर वास्तव में संत का सा आचरण करते हैं। समय आ गया है जब जनता दूध का दूध और पानी का पानी करे। जो सत्ता मांगे, पहले उसका चोला उतरवाया जाए। ताकि उनके कारण देश के अन्य साधु-संत लांछित होने से बच सकें। विदेशियों की नजरों में देश और धर्म का सम्मान बचाया जा सके।

 

गुलाब कोठारी

जून 23, 2011

बन जाओ भगत सिंह

देश में एक तूफान उठा है काले धन का। धन भी काला। लक्ष्मी काली। बड़े-बड़े नेताओं के नाम कई देशों में जमा है चोरी का यह धन। लाखों करोड़ रूपए हैं। अन्ना हजारे-बाबा रामदेव से लेकर आम आदमी तक जुड़ गया इस अभियान में। वे लोग भी जुड़े नजर आने लगे, जिनका धन भी जमा है विदेशी बैंकों में। लगता है सरकार पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है। सरकार की मजबूरी यह है कि यदि नामों का खुलासा हो जाए तो कांग्रेस में कौन बचे। जिनके नामों की शपथ ले-लेकर कांग्रेस सांसें गिन रही है, उनके नाम भी सूची में आते दिखाई पड़ रहे हैं। पार्टी सत्ता में है। तुरन्त सत्ता चली जाएगी।
सरकार ने एक नाटक चला रखा है। इस मुद्दे को बनाए भी रखो और आगे भी मत बढ़ने दो। स्विस सरकार को कोई एतराज नहीं है जानकारी देने में। हमारी सरकार लेने को तैयार नहीं है। दिखाने के लिए चिट्ठी-पत्री तो करती है, किन्तु गलत एवं अनावश्यक जानकारियां भेजकर पत्रावलियां चलाती रहती है। निश्चित है कि स्विस सरकार से फिर सही जानकारियां देने के पत्र आते रहते हैं। जैसे बोफोर्स सौदे की फाइल के साथ हुआ था। अन्त में उस फाइल को बन्द ही कर दिया गया। किसी तरह की जानकारी संसद के पटल पर नहीं रखी गई।

अब परिस्थिति और भी नाजुक है। सैकड़ों नाम सामने आने का भय है। तब क्या करे सरकार? दूसरे गैर-राजनीतिक लोगों की फाइलें दूसरे देशों से मंगाओ। उनके नाम उजागर करो और काले धन पर कार्रवाई करते रहो। ताकि जनता को यह भी लगे कि सरकार काले धन के खिलाफ कार्रवाई भी कर रही है। और नेता भी बचे रहें। किसी तरह पांच साल पूरे हो सकें।

अभी हाल ही में दिल्ली में जिस दलाल पंकज कपूर को पकड़ा, यह भी ध्यान बंटाने वाली कार्रवाई है। दलाल ने तुरन्त स्वीकार भी कर लिया कि उसने अब तक एक हजार करोड़ रूपए हवाला के जरिए देश के बाहर भेजे हैं। जांच एजेंसियों को ऎसी पकड़ के लिए बधाई मिलनी ही चाहिए। अब देखना यह है कि जो सूची सामने आएगी, उसमें किन-किन के नाम पढ़ने को मिलेंगे। क्या इनमें कोई एक राजनेता भी होगा या यूरोप के लिंचटेस्टाइन शहर के एल जी टी बैंक से प्राप्त सूची की तरह सभी आम व्यवसायी होंगे।

सरकार को एक बड़ा अवसर इस बात से मिला हुआ है कि विपक्ष कमजोर है। हालांकि विपक्ष में अधिक नेताओं का धन बाहर नहीं होगा, किन्तु जो कर्णधार हैं, उनका धन बाहर है। जब इन नेताओं को सूची के कुछ नाम दिखाए जाते हैं,तो ये अपना नाम देखकर चुपचाप चल देते हैं। बाकी नामों को देखने की जिज्ञासा भी नहीं रहती। तब इन्हीं के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान कैसे सफल हो पाएगा। भाजपा और संघ से जुड़े अनेक बड़े नेता तो भ्रष्टाचार के लिए देश में ही बदनाम हैं। कहीं सरकार ने जोखिम उठाकर छोटी सूची जारी कर दी और उसमें विपक्ष के बड़े नेताओं के दो-चार नाम भी डाल दिए तो क्या होगा? एक तरफ आडवाणी जी ने अपना वादा नहीं निभाया कि भाजपा यह शपथ-पत्र देगी कि उसके नेताओं का कोई काला धन विदेशों में नहीं है। भूल गए हैं शायद लिखकर देना या दबाव में आ गए। आज की परिस्थिति में एक ही मार्ग है देश के सामने।

भाजपा आगे आए कि सूची शीघ्र मंगाई जाए। हमारे नाम हैं तो भी परवाह नहीं। माफी मांग लेंगे जनता से। किन्तु साठ बरस की सच्चाई देखकर जनता अगले सौ साल तो भूल नहीं दोहराएगी। दो बार
कौन मरता है। अच्छा तो यह है कि देश के नाम पर बन जाओ भगत सिंह।
गुलाब कोठारी

जुलाई 4, 2011

बलिदान

कहते हैं कि जिनको मरना नहीं आता, उनको जीना भी नहीं आता। मरना कौन चाहता है- गरीब, रोगी, वृद्ध? कोई नहीं चाहता। प्रभात झा जैसे अपवाद को छोड़ दें, जो इच्छामृत्यु मांगकर स्वयं के लिए अनन्त भोगों की कामना करता जान पड़ता है। आहार-निद्रा-भय-मैथुन में उलझकर एक पशु की तरह जीने के स्वप्न देखता है। एक मृत्यु जबलपुर में रेलवे के मास्टर क्राफ्टमैन दसई ने देखी। कभी मृत्यु की कामना भी नहीं की। अपनी योग्यता के आधार पर प्रमोशन भी पाता रहा।

 

मृत्यु शरीर की होती है। महापुरूषों का शरीर मानवता का प्रकाश फैला देने वाली मशाल होता है। ऎसे लोग समय से पहले पैदा होते हैं। कृष्ण द्वापर में ही पैदा हो गए और आवश्यकता उनकी आज है। आज भी वे हमको उपलब्ध हैं। आजादी की जंग में कितने महापुरूष काम आए? क्या उनके बिना स्वतंत्रता का मिलना संभव था? वे कहीं भी इस मुद्दे के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। ऎसे महापुरूष स्वयं को देश और देशवासियों के आगे नगण्य मानते थे। जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग है, मातृभूमि के लिए काम आ सकना। और जिन-जिन को ऎसे अवसर प्राप्त हुए, उन्होंने प्रमाणित भी कर दिखाया। हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। शहीद हो गए। जीवन को देशवासियों के भावी सुख के लिए समर्पित कर गए। कुर्बान हो गए।

 

दसई की कुर्बानी भी शहीदों की सूची में सदा जीवित रहेगी। विवेकपूर्ण ढंग से, सम्पूर्ण जागरूकता के साथ डेढ़ हजार लोगों की जीवन रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर गए। एक ही बार मरता है आदमी। इनमें से कुछ मृत्यु को भी अनुष्ठान बना लेते हैं और सदा-सदा के लिए अमर हो जाते हैं।

 

दसई अमर हो गए। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि यदि सामान्य जन-जीवन में भी लोग देश के व्यापक हित में ऎसी कुर्बानियां देते हैं, तो सरकार उनको भी शहीदों की सूची में शामिल करे। उनके परिवारों का सम्मान किया जाए। उनके बच्चों का सिर गर्व से ऊंचा रह सके, इसमें समाज के हर वर्ग का सहयोग रहे। भ्रष्टाचार के युग में जहां बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग स्वार्थपूर्ति के लिए टूटे पड़ते हैं, वहां ऎसी शहादत युवा पीढ़ी में नए प्राण फूंकती है। इसी से देश जिन्दा रहता है।

 

यह सही है कि रेलवे ने दसई परिवार को बड़ी आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया है। किन्तु आर्थिक सुख-सुविधा की सीमा बहुत छोटी होती है। सम्मान बड़ी चीज है। नेताओं जैसा नहीं कि कुर्सी से उतरे और राम-राम से भी गए। सरकार को ऎसे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, जिससे समाज में ऎसे शहीदों के प्रति एक आत्मीयता का भाव जागृत हो, श्रद्धा पैदा हो सके। इनके परिजनों का समाज में स्थान बन सके। इनके लिए भी जन समारोह किए जाएं।

 

इनका राजकीय सम्मान हो। इनकी भी प्रतिमाएं लगाई जाएं। पाठ्य पुस्तकों एवं इतिहास में इनका नाम दर्ज हो। सेना में मरने वाले हर सैनिक को पदक और ‘शहीद’ संज्ञा से नवाजा जाता है। यहां इस स्वैच्छिक बलिदान को भी क्यों नहीं उसी श्रेणी का सम्मान, ‘पk’ अलंकरण जैसे सम्मानों से अलंकृत किया जाए। तब देश में एक नई शक्ति का संचार होता रहेगा। देश सुरक्षित ही नहीं, आत्मबल के साथ आगे बढ़ता रहेगा।

 

गुलाब कोठारी

जुलाई 7, 2011

असंवैधानिक!!!

आजादी के साठ साल बाद लोकतांत्रिक सरकार में किसी केन्द्र सरकार और राज्य सरकार स्तर की कार्यवाही, गतिविधि या किसी योजना को सर्वोच्च न्यायालय की ओर से असंवैधानिक ठहराना इस बात का प्रमाण है कि दोनों ही सरकारों का काम-काज लोकतंत्र के स्वरूप पर ही गहरी चोट करने जैसा चल रहा है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के विरूद्ध चलाया गया अभियान मानवीय संवेदनाओं की सभी सीमाओं को पार चुका था। आदिवासियों को बन्दूक की नोक पर पहाड़ों से नीचे उतार कर जंगल और पहाड़ खाली करवाए जा रहे थे।

आज भी बन्दूक की नोक पर उनसे जमीनें बेचने की कार्रवाई करते रहते हैं। दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर की तरह उत्तर के अकेले जाजंगीर जिले में 35 से ज्यादा पावर प्लान्ट बनाने के करार किए जा चुके हैं और इनके लिए सार्वजनिक उपयोग के नाम पर अपरिवर्तनीय भूमि को रूपान्तरित करके उद्योगपतियों को हस्तान्तरित किया जा रहा है। जो रूकावट पैदा करेगा, उसके साथ नक्सलियों जैसा व्यवहार होगा। इसके लिए आदिवासियों को ही हथियार उपलब्ध करा दिए सरकार ने, ताकि मारे भी वही और मरे भी वही।

सर्वोच्च न्यायालय का इतने साहसपूर्ण फैसले के लिए अभिनन्दन, साधुवाद, नमन और वन्दन! आश्चर्य की बात तो यह है कि इस असंवैधानिक गतिविधि को बनाए रखने के लिए केन्द्र सरकार की हजारों करोड़ रूपए की राशि राज्य सरकार के पेट में जा रही थी। इस दौरान हुई हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए, जैसे जंगलों से पेड़ काटे जाते हैं। इनमें नक्सली भी थे और बेगुनाह भी।

इसी धन से कुछ भिण्डरेवाला भी पैदा हो गए। जैसे प. बंगाल के पुरूलिया में केन्द्र सरकार ने नक्सलियों को राज्य के विरूद्ध हथियार उपलब्ध कराए थे। हाल में, पिछले माह जयराम रमेश ने कुछ नए क्षेत्र भी छत्तीसगढ़ में खनन के लिए संरक्षित वन भूमि से खोल दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने लोकतंत्र की हिलती हुई जड़ों की ओर देश को चेतावनी दी है, किन्तु यह नहीं बताया कि होना क्या चाहिए। न तो केन्द्र सरकार अपने मंत्री एवं विभाग के विरूद्ध अभियोग चलाने वाली और न ही राज्य सरकार अपने किए-कराए को गलत मानने वाली।

अब या तो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय आगे बढ़े या फिर राष्ट्रपति को विधि विशेषज्ञों से राय करके कुछ कठोर कदम उठाने चाहिए। इतने बड़े लोकतंत्र में असंवैधानिक सरकारी गतिविधि स्वयं लोकतंत्र का भी और 125 करोड़ नागरिकों का अपमान है। उल्लेखनीय है कि माओवादी नक्सलवाद के नाम से विनायक सेन को राजद्रोह के अपराध में राज्य सरकार ने जेल में बन्द कर दिया था। उच्च न्यायालय से उसको जमानत भी नहीं मिली। उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत स्वीकार कर ली कि वहां ऎसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

अब जब उच्चतम न्यायालय ने सरकार प्रायोजित सलवा जुडूम को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया, तब क्या स्वयं राज्य सरकार पर सवालिया निशान नहीं लग जाते? अब तक हजारों करोड़ रूपए का उपयोग इसी सरकार ने ही इस असंवैधानिक गतिविधि में किया है। नक्सल समस्या के केन्द्र में जाने की तैयारी (जड़ तक पहुंचने की) न राज्य सरकार ने दिखाई है, न ही केन्द्र सरकार ने जबकि मूल रूप से उत्तरदायित्व केन्द्र सरकार का ही है, जिसके निर्देशन में राज्य सरकारें काम करती हैं।

एक नक्सल क्षेत्र केन्द्रीय रूप में दण्डकारण्य (सभी छ: राज्यों की सीमा पर) के एक लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में कार्यरत है, जो संयुक्त रूप से इन प्रदेशों में सरकारों के समानान्तर कार्य करता है। इनकी आय का स्त्रोत स्थानीय लकड़ी, वन्य जीव आदि हैं।

उनके मार्ग बन्द करके सरकारें उनसे निपट सकती हैं। चन्दन तस्कर वीरप्पन की तरह। कुछ स्थानीय विद्रोही सरकारों की नीतियों से पैदा होते हैं। इनको स्वीकारने की तैयारी राज्य सरकारों की कम होती है। इस तंत्र की अपनी अर्थव्यवस्था होती है, जिसमें बड़े-बड़े औद्योगिक घराने भी जुड़े हैं। स्थानीय नागरिकों को तो हर स्थिति में अत्याचार ही सहने पड़ते हैं। राजनेता भी इनको विकसित करना नहीं चाहते। इनको आप रोटी, कपड़ा, इलाज, शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाएं तो दें। नक्सलियों के नाम सारा धन ऊपर वाले खा जाएंगे, तो क्या ये लोग प्रतिक्रिया नहीं करेंगे? इसका उत्तर भी उच्चतम न्यायालय से ही अपेक्षित है।
गुलाब कोठारी

जुलाई 14, 2011

हेराफेरी

हमारे यहां एक शब्द है फेर-बदल। उसका ही दूसरा रूप है हेरा-फेरी। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में जो फेरबदल हुआ, वह भी एक श्रेणी की हेराफेरी ही कही जाएगी। क्योंकि हेराफेरी के रूप में उन मंत्रियों को हटाया जाता है जिनका कार्य और आचरण सही नहीं होता या फिर जिनसे दल का अध्यक्ष नाराज होता है। आजकल दोनों ही कारण गौण हो गए।

 

भ्रष्टाचार ही वह कारण है जिस कारण एक को हटाया जाता है तथा दूसरे को अवसर दिया जाता है। दिल्ली में तो सोनिया गांधी के आगे सब गूंगे हैं, किन्तु राज्यों में स्थिति स्पष्ट दिखाई पड़ती है। भाजपा में तो हर विधायक ही मंत्रिमण्डल में रहना चाहता है। सब अपने मुख्यमंत्री के कपड़े खींचते रहते हैं।

 

समस्या बहुत बड़ी होती जा रही है। संसद के पास चिन्तन को समय नहीं है। गंभीर विषय या बिल चर्चा में आते ही शोर शुरू हो जाता है। क्योंकि जिस तरह के सदस्य चुनकर आने लगे हैं और बहुमत के अभाव में मिश्रित दलों की सरकारें बनने लगी हैं, वहां गुणवत्ता के प्रश्न हवा हो गए। संसद में सदस्य भी केवल मेरिट से आते हों ऎसा नहीं है। कई तरह की श्रेणियां-आरक्षण आदि से, जातिगत आधार पर, महिला आरक्षण के कारण गोलमा देवी जैसे सदस्य को मंत्री बनाना भी नेता के लिए लाजमी हो जाता है।

 

दल-बदलुओं की शक्ति भी फेरबदल के लिए मजबूर कर सकती है। इनमें अघिकांश सदस्य प्रदेश/देश के परिप्रेक्ष्य में चिन्तन क्षमता भी रखें, यह आवश्यक नहीं है। कई बार अपराघियों को भी मंत्री बनाना पड़ता है। मध्यप्रदेश में कई हैं। तब नेता के पास एक ही मार्ग बचता है सबको संतुष्ट करने का फेरबदल। हालांकि यह कोई समाधान नहीं, लाचारी है। इससे परिणाम सुधरते हों, ऎसा भी संभव नहीं है। बारह जुलाई के शपथ ग्रहण समारोह के चित्रों को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट दिखाई दे जाता है।

 

फेरबदल में दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है कुछ मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन। क्योंकि न तो उनको निकाला जा सकता, न ही वे खरे उतरे। अन्य लोगों को भी संतुष्ट करना पड़ता है। इन मामलों में जनता का अनुमान गलत भी निकल सकता है, क्योंकि जनता मेरिट को ध्यान में रखती है और नेता समीकरण को।

वैसे फेरबदल का यूपी चुनावों से ही तो लेना-देना है। वरना तो भ्रष्ट लोगों को फेरबदल के नाम पर बाहर निकालकर उन्हें सजा पाने से बचाया भी जाता है। यह भी भ्रष्टाचार ही है। अनेक मुद्दों पर चर्चाएं बदल जाती हैं, क्योंकि या तो मंत्री को हटा दिया गया या विभाग बदल गया।

 

विपक्ष स्वयं कुछ बोलने की स्थिति में आज नहीं है। मंत्री हटता है या बदल जाता है, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सजा तो उसको मिलनी ही चाहिए। होता कुछ विपरीत ही है। भ्रष्ट मंत्री ही धन लाते हैं और बांटते भी हैं। फण्ड-रेजर माने जाते हैं। वे तो दूसरों को भी भ्रष्टाचार का लाइसेंस देते हैं। जनता को लूट लेना, जमीनों के अतिक्रमण, हत्याएं करवाना आदि को आश्रय देने वाले होते हैं। इनका तो दलों में विशेष सम्मान होता है।

 

फेरबदल का एक कारण है शीर्ष नेताओं के मर्जीदां लोगों को जगह देना। यह बहुत नाजुक मसला है। इस पर या तो नेता चुप रहकर मान लेता है अथवा शीर्ष की त्योरियां भी चढ़ सकती हैं। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि अब राजनीति में मेरिट के जमाने लद गए। अब बहुमत से चुनने के भी मार्ग बन्द हो गए। फेरबदल के नाम पर शीर्ष नेताओं की ओर से की जाने वाली नियुक्तियां लोकतंत्र के गाल पर तमाचा हैं। इस बात की कोई गारण्टी नहीं कि नया स्वरूप देश के लिए कुछ अवश्य करेगा। उसका इस दृष्टि से शिक्षित होना भी आवश्यक नहीं है।

 

पहले दौर में श्रेष्ठ मानकर लोगों को मंत्रिमण्डल में लिया जाता होगा। आगे तो बस समीकरण ही तय कराते हैं। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि चुनाव तक अब कोई और फेरबदल नहीं होगा, तब कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकार सम्मेलन में कह डाला कि प्रधानमंत्री का आशय यह नहीं था। उनकी बात से प्रधानमंत्री को ठेस पहुंच सकती है, इसकी चिंता उनको नहीं है। वे तो उनसे ज्यादा समझदार नजर आना चाहते हैं।

 

खैर, मंत्रिमण्डल फेरबदल होते रहेंगे। इनका लोकतंत्रीय व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है। जरूरी है हर सदस्य को आवश्यक ज्ञान एवं अनुभव का सहारा देना। उसके लिए मात्र अघिकारियों पर छोड़ देना भी देशहित में नहीं है। क्योंकि यह लोकतंत्र की मूल अवधारणा से भिन्न है।

गुलाब कोठारी

 

जुलाई 17, 2011

बचेगा क्या?

Filed under: Special Articles — gulabkothari @ 7:00
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केन्द्रीय सरकार जिस ताबड़-तोड़ ढंग से नए-नए कानून पास कर रही है और जिस तरह विदेशी कम्पनियों को अंधाधुंध तरीके से भारत में आने को प्रेरित कर रही है; उससे यह तो स्पष्ट ही है कि उसका ध्यान भारतीयों के हितों से दूर है। यह आश्चर्य ही कहा जाएगा कि देशवासियों द्वारा चुनी हुई सरकार देशवासियों के हितों के विपरीत कानून पास करे। सही अर्थो में तो इसे “वफादारी” नहीं कहा जा सकता। अभी जिस मुद्दे पर चर्चा चल रही है वह है भारतीय खुदरा बाजार में विदेशी कम्पनियों का, वालमार्ट जैसी, निवेश खोलने का।

क्या सरकार में बैठे हुक्मरानों को यह अनुमान है कि इस निर्णय के देश पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे? लगता है उनको तो तत्कालीन स्वार्थ के आगे झांकने की आवश्यकता ही नहीं लगती। विदेशी कम्पनियां भारतीय व्यापारियों की लॉबी के जरिए सरकार पर दबाव बना रही हैं। मीडिया के लोगों को सैर सपाटे के लिए विदेश यात्राएं करवा रही हैं। फिर दोनों की चिन्ता करने की जरूरत कहां? एक ओर जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देश हैं जहां खुदरा व्यापार वहीं के नागरिकों के लिए सुरक्षित है। दूसरी ओर न्यूयार्क शहर जहां लाख कोशिश करके भी वालमार्ट प्रवेश नहीं कर पाया।

वालमार्ट तो सन् 1997 में जर्मनी में प्रवेश कर तो गया था, किन्तु सन् 2006 मे वापस भागना पड़ गया। जर्मन कानून के अनुसार कोई भी लागत मूल्य से कम दाम पर अपना माल नहीं बेच सकता। हमारे यहां तो नेता अफसर सब बिक जाते हैं। जर्मनी में सारे श्रमिक वहीं के होंगे, यह भी एक शर्त है। शाम 6.30 बजे जब देश के बाजार बन्द होते हैं, वालमार्ट भी बंद होगा। कहां दुकानें खुलेंगी, यह भी सरकार तय करेगी। फिर तो भागना ही था। हमारे देश का खुदरा व्यापार 16 लाख करोड़ रू. प्रति वर्ष का है। 2जी स्पेक्ट्रम का दस गुना।

इसमें ढाई करोड़ नागरिक एवं 12-13 करोड़ लोगों का जीवन यापन होता है। कृषि के बाद देश का दूसरा बड़ा रोजगार का क्षेत्र है। इनको अन्य कोई कार्य करना आता भी नहीं। इस क्षेत्र में विदेशी निवेश लोगों के जीवन से खिलवाड़ ही साबित होगा। कुछ अमरीकी व्यापारियों अथवा नीति निर्घारकों को प्रसन्न करने के लिए नए सिरे से लाल झण्डे का पोषण भी विचारणीय है। यह भी सरकारी भुलावा ही है कि किसानों को उचित मूल्य मिलेगा। हमारी सरकार में तो किसान आत्म हत्या कर रहा है और विदेशी व्यापारियों से दया की उम्मीद कर रहे हैं? जैसे-जैसे ये व्यापारी बड़े होते जाएंगे, किसानों पर दादागिरी बढ़ाते जाएंगे। आज तो हमारे ही जनप्रतिनिधि बड़े होकर जनता के साथ सामन्ती और संवेदनहीनता का व्यवहार कर ही रहे हैं। हर सरकार लोकतंत्र के नाम पर उनको आश्रय देती ही है।

एक और तथ्य समझना चाहिए। हमारे यहां 94 प्रतिशत सड़कें गांवों और शहरों में है। राष्ट्रीय राजमार्ग मात्र दो प्रतिशत। बिजली की कमी और कटौती के कारण भण्डारण सुचारू नहीं हो सकता। कोल्ड़ स्टोरेज के इस अभाव के कारण सफाई ठीक नहीं होगी। देश का परिवहन अधूरा भी है और महंगा भी। माल वाहन कार्य में रेलवे अगर आवश्यकता पूरी नहीं कर पाया। तब होगा क्या? हमें देखना चाहिए कि अन्य देशों में इन विदेशियों ने क्या किया। विश्व में जहां भी सबसे सस्ता माल मिले, ये वही लाकर हमारे यहां बेचेंगे। इनका उद्देश्य सस्ता खरीदकर 8-9 गुणा महंगा बेचना है।

स्थानीय उत्पादकों को भी बड़ा झटका लग जाएगा। देश के खुदरा व्यवसाय को अनेक संकटों से गुजरना होगा। बेरोजगारी तो निश्चित है ही। हमारा चर्म एवं वस्त्र उद्योग इसके जीवन्त उदाहरण हैं। हमारी जीवन शैली पूरी तरह तहस-नहस हो जाएगी। दीर्घकाल में राजनीति, समाज-संस्कृति और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे सामने आयेंगे, जिनकी हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते। नई व्यवस्था में चन्द लोगों के साथ हमारे नीति-निर्घारकों की शामें भले ही रंगीन हो जायें, हमारा धन तो विदेशी ले ही उड़ेंगे।

जो अपने माल को इतना महंगा बेचने वाले हैं, वे मुद्रास्फीति को कम करने में मदद करेंगे, यह तो कपोल कल्पना ही है। इसके विपरीत, कुछ वर्षो बाद तो हमें इनकी मर्जी के भावों पर उत्पाद खरीदने को मजबूर होना पड़ेगा। यह एक नई तरह की महंगाई की मार होगी। इस दुर्दशा का श्रेय केन्द्र सरकार को जाएगा, जो इसमें केवल अच्छाइयां ही देख पा रही है। यथार्थ में तो देश गिरवी हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

अगस्त 1, 2011

उघड़ता चेहरा

जिस प्रकार श्रीमती इन्दिरा गांधी ने आपातकाल लागू करके कांग्रेस को सदा-सदा के लिए मुक्त कर दिया, उसी प्रकार वर्तमान भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी एवं पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी पार्टी पदों को अपराधियों से प्रतिष्ठित देखा, मूक रहे, मुट्ठी भर लोगों के लिहाज में लोकतंत्र को नंगा होते देखने का गुनाह किया और कर रहे हैं। संघ की चाल, भाजपा का चलन लोकतंत्र के चेहरे का पर्दा बन गया।

आज यह कहना कतई सही नहीं होगा कि यह भाजपा कोई राजनीतिक दल भी है। पिछले सालों में केन्द्रीय समिति, संसदीय कार्य समिति या अन्य राष्ट्रीय बैठकों पर शोध किया जाए तो समझ में आ जाएगा कि इनमें कौनसे मुद्दे छाए रहे। केवल अपने भ्रष्टतम नेताओं, मुख्यमंत्रियों या पार्टी पदाधिकारियों के मुद्दे थे। पूरा सत्र बीत जाता है और मुद्दे ज्यों के त्यों।

संघ ने शीर्ष का अहंकार भोगा। भाजपा शीर्ष व्यापारी बन गई। भाजपा नेतृत्व को आज भाजपा के लोग ही भ्रष्टाचारी और कुशासक बता रहे हैं। गलत भी नहीं है। हास्यास्पद बात तो यह हुई कि किसी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री को भ्रष्ट बता दिया और भाजपा नेतृत्व ने इस आरोप को स्वीकार करके उनसे जबरन इस्तीफा भी मांग लिया। भाजपा शीर्ष ने यह भी नहीं पूछा कि येçaयूरप्पा ने लोकायुक्त को अपने बयान में क्या कहा। सच्चाई तो यह है कि माननीय न्यायाधीश ने प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से भी आरोपी का बयान लेने की जरूरत नहीं समझी।

उनकी नियुक्ति भाजपा ने थोड़े ही की थी जो उन्हें बचाने का प्रयास करते। अथवा राज्यपाल को भी लोकायुक्त (म.प्र.) नावलेकर की तरह गलत रिपोर्ट भेजकर मामले को नत्थी कर देते। इस निर्णय से भाजपा नेतृत्व ने स्वीकार कर लिया कि जो पकड़ा जाएगा, उसे चोर मान लिया जाएगा। नहीं तो सभी साहूकार ही हैं। भाजपा में अचानक ऎसा क्या हो गया कि जो अटलजी के समय तक ढका था, सब उघड़ गया? क्यों सारे राष्ट्रीय नेता बदनाम होकर भी शीर्ष पदों पर बैठे हैं? क्या भाजपा कांग्रेस की तरह कुछ लोगों की पार्टी बनकर रह जाएगी? आज तो जिनको भी इस नेतृत्व का आश्रय प्राप्त है, वे निरंकुश, भ्रष्ट, माफिया और हत्यारे तक भी हो गए।

सुरा-सुन्दरियों का मोह, भुज-बल और सत्ता की मदान्धता ने कांग्रेस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। कांग्रेस तो भाजपा से हजारों गुणा भ्रष्ट साबित हो चुकी है, किन्तु दस जनपथ के आगे सबकी आवाज बन्द रहती है। वहां के किसी निर्णय की सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं होती। भाजपा में कोई नेता है ही नहीं। बल्कि शीर्ष द्वारा पोषित हर नेता अपनी गली में भिण्डरावाला, बाल ठाकरे अथवा दाऊद जैसा दिखाई देता है। यही हाल इनके चहेते अधिकारियों के हैं। जहां किसी पर ये नाराज हुए कि भोपाल के मीनाल मॉल की तरह डायनामाइट से उड़ा देने का दु:साहस तक कर देते हैं। मुख्यमंत्री की मौन स्वीकृति तो रहती ही है। जैसे ही मुख्यमंत्री बदलता है, इनकी भाषा रातों-रात बदल जाती है।

मध्यप्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तो अपनी सीट देकर फरार चहेते को विधायक बना लाए। भाजपा नेतृत्व ऊपर तक मौन भी है और गौरवान्वित भी। मुख्यमंत्री अनदेखी करने में ही अपनी भलाई समझते हैं। वे तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आक्रामक रूख का प्रतिकार करने में भी सक्षम नहीं हैं। यही भाजपा की भितरघात का प्रमाण भी है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों ने भाजपा को सत्ता सौंपी और भाजपा ने आज तक कांग्रेस के विरूद्ध कोई मुकदमा दायर तक नहीं किया।

क्योंकि स्वयं यह सरकार भी उतनी ही बड़ी भ्रष्ट है। अब तो जनता को ही इनके खिलाफ जनहित याचिकाएं लगानी पड़ेंगी। शायद न्यायपालिका जनता का साथ दे। अभी तक तो उच्च न्यायालयों में भी सरकार के विरूद्ध बड़े निर्णय नहीं हुए, जिनमें भ्रष्ट मंत्रियों/अधिकारियों को सजा मिली हो या बर्खास्त किया गया हो। उच्चतम न्यायालय जरूर अपवाद बनता जा रहा है।

जिस दिन घड़ा भर जाएगा, स्वयं भाजपा शीर्ष मोहरा बदल देगा। आज तो सारी नियुक्तियों का आधार शीर्ष सेवा रह गया है। शीर्ष नेता निजी कार्यक्रमों में भी हवाई जहाजों में भर-भरकर भीड़ की तरह घण्टा-आधा-घण्टा रूकते हैं और चले जाते हैं। अगली बैठकों में इन्हीं मेजबानों को हटाने की चर्चा भी कर लेते हैं। बस चले जहां तक बचाते भी रहते हैं। ऎसे चहेते यदि चुनाव भी हार जाएं तो राज्यसभा के द्वार तो खुले ही हैं। पिछले 15-20 वर्षो में किन-किन को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा और क्यों? उन्होने देशहित में किन-किन मुद्दों पर काम किया?

कर्नाटक की घटना इस बात का प्रमाण है कि जिस अंग्रेजी-दां कांग्रेस संस्कृति से मुक्त होने के लिए देश ने संघ को विकल्प माना था, वह जरासंघ हो गया। जनता, देश, लोकतंत्र सबको भूलकर स्वयं के भ्रष्ट लोगों की अमरबेल में उलझ गया है। कुल मिलाकर परिदृश्य यह बना कि दोनों ही दल अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि से बाहर निकल गए। जनसमस्याएं इनकी चर्चा का मूल विष्ाय ही नहीं रहा।

संसद का उच्च सदन अधिकांशत: गैर राजनीतिक, व्यापारिक अथवा चुनाव में हारे हुए सेवानिवृत्ति योग्य नेताओं का जमघट बनने लग गया। जिसमें राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सोच एवं प्रतिबद्धता का अभाव टी.वी. पर जनसाधारण को भी दिखाई देता है। तब क्या इन दलों को हमारे लोकतंत्र के राजनीतिक दलों की परिभाषा में जोड़ना उचित होगा?

गुलाब कोठारी

अगस्त 5, 2011

समिति क्यों?

श्रीमती सोनिया गांधी इलाज के लिए अमरीका गई, यह एक दुखद बात है। आज भी इस देश में हम देशवासियों का इलाज करने की स्थिति में नहीं आ सके। इससे भी अघिक आश्चर्यजनक बात यह कि उनके पीछे से उनका कार्य एक चार सदस्यीय समिति देखेगी। इसमें राहुल गांधी के अलावा अहमद पटेल, ए.के. एंटनी तथा जनार्दन द्विवेदी हैं। इस कमेटी के गठन से अनेक प्रश्न पैदा हो गए हैं।

 

सोनिया गांधी कब यात्रा पर गई, इस बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं दी गई। यह कहना कि इलाज के लिए किस देश में गई यह भी पार्टी या सरकार को नहीं मालूम, हास्यास्पद लगता है। कोई देशवासी इस तर्क को मान लेगा, संभव नहीं है।

 

कांग्रेस प्रवक्ता ने यह भी कहा है कि श्रीमती गांधी को 2-3 सप्ताह लग सकते हैं। क्या यह इतनी बड़ी अवघि है कि जिसके लिए पीछे से समिति का गठन आवश्यक हो। अनेक उदाहरण विश्व में होंगे, जबकि इससे बड़ी अवघि के लिए शीर्ष लोग बाहर गए और कोई समिति नहीं बना गए। आज जिस प्रकार के सूचना तंत्र में हम बैठे हैं, विकीलीक्स जैसे संगठन जैसा कार्य कर रह रहे हैं, भ्रष्टाचार के चलते जब किसी को भी खरीदा जा सकता है, तब क्या कोई रहस्य टिक सकता है? सरकार की भूमिका कहीं दिखाई नहीं पड़ी।

 

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का या सरकार के कार्यो का भार भी क्या इस समिति को दिया गया है? क्या राहुल गांधी भी नहीं जानते कि उनकी मां इलाज के लिए अमरीका गई हंै? उनको यह भी पता है कि बीमारी क्या है और यह भी कि वे 2-3 सप्ताह में नहीं लौट पाएंगी। इस बात से ही बीमारी का अनुमान लगाया जा सकता है। राजधानी में तो बीमारी के बारे में बहुत कुछ बाते चर्चा में आ चुकी हैं। क्या यह सरकार का दायित्व नहीं है कि वह देशवासियों को विश्वास मेें लेने का प्रयास करें? अभी तो स्पष्ट ही है कि कांग्रेस पार्टी और सरकार दोनों ही वस्तुस्थिति को छुपाने का प्रयास कर रहे हैं।

 

ढाका से सीधे इलाज के लिए चले जाना एक गंभीर अथवा आपातकालीन कदम ही माना जाएगा। देश के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के मामले में सरकार का यह रवैया उचित नहीं कहा जा सकता। जनता को रोग और चिकित्सा की जानकारी मिलती रहनी चाहिए। भले ही कैंसर ही क्यों न निकले। यह व्यक्ति के बस की बात नहीं है। इसके साथ ही यह भी सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि 2-3 सप्ताह के लिए इस समिति की क्या आवश्यकता है?

 

गुलाब कोठारी

 

अंग्रेजी बनाम अंग्रेजियत

इस देश पर अनेक सांस्कृतिक आक्रमण हुए, साम्राज्य कायम रहे फिर भी देश की अखण्डता अक्षुण्ण रही। पहली बार अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए देश में क्रान्ति का वातावरण बना और सफलता भी मिली। आजादी के संग्राम में अंगे्रजों को तो विदा कर दिया, किन्तु अंग्रेजियत को यहीं रोक लिया गया। बस आज तक यह देश इस अंग्रेजी-सभ्यता की मार खा रहा है। अंग्रेजी शासन में अंग्रेजी भाषा माध्यम के रूप में काम आती थी। आज अंग्रेजी जीवन-शैली ने हमारे नागरिकों को अपने ही देश में विदेशी बना दिया और उनको बाहर निकाल पाना संभव भी नहीं है।

 

इसके विपरीत आज तो अंग्रेजी का प्रभाव अमरीकी डालर से भी तेज गति से बढ़ रहा है। पूरे विश्व में इण्टरनेट संवाद का माध्यम अंग्रेजी भाषा बन गई है। विश्व की प्रत्येक भाषा और संस्कृति के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा जान पड़ रहा है। कौन कह सकेगा कि दो-तीन पीढ़ी बाद अन्य भाषाओं और संस्कृतियों का क्या हाल होगा! भाषा के रूप में अंग्रेजी से किसी अन्य भाषा को खतरा नहीं रहा, किन्तु आधुनिक शिक्षा से जुड़कर अंग्रेजी ने जो ताण्डव करना शुरू किया, जीवन के प्रति सोच की दिशा ही बदल गई। हर घर की नई पीढ़ी अपने दादा-दादी की संस्कृति से स्वत: ही अलग हो गई और किसी को कानों-कान खबर नहीं।

 

आजादी के बाद भी लगभग 20-25 वर्ष तक देश के संविधान, कानूनों की व्याख्या और निर्माण अंग्रेजी से ही प्रभावित रहे। वही नींव का निर्माण काल था। जिसका प्रभाव आज तक यह देश भुगत रहा है। उच्च शिक्षा, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर तो अभी तक अंग्रेजी ही हावी है। पिछले साठ वर्षो में यह तबका शेष भारत से वैचारिक रूप से कट गया। इस तबके ने मूलत: अंग्रेजी ही पढ़ी। साहित्य भी, व्यवसाय भी और जीवन शैली भी। जो कुछ परिवर्तन पश्चिम में होते रहे, उनसे नियमित संपर्क में भी रहे और प्रभावित भी होते रहे। इन्हीं लोगों ने नए भारत की नीतियां भी बनाई। इन नीतियों में आज तक विदेशी संस्कृति की प्राथमिकता देखी जा सकती है। व्यक्तिगत जीवन के कानूनों में भी।

 

शिक्षा को धर्म निरपेक्षता के नाम पर मानवीय मूल्यों से ही विहीन कर दिया। धीरे-धीरे क्षेत्रियता को भी बाहर कर दिया- वैश्वीकरण के नाम पर। स्थानीय इतिहास-भूगोल-संस्कृति-सामाजिक मूल्य आदि सभी गायब हो गए। शिक्षा से मानवता का रिश्ता टूट कर विषयों तक सीमित रह गया। मानव मशीन बनने लगा। अंग्रेजी माध्यम ने इन मशीनों पर ‘हॉलमार्क’ का काम किया। अब बड़े होकर ये बच्चे अपनी दादी-नानी से संवाद करने मे अक्षम दिखाई पड़ते हैं। उनके ज्ञान की खिल्ली भी उड़ा देते हैं। भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के समकक्ष मानते ही नहीं हैं। आज तो अपने बच्चों को भारत में रहने तक को प्रेरित नहीं करते हैं। धन की इनके पास कमी है नहीं।

 

इसका दूसरा पहलू बहुत भयंकर साबित हुआ। इस देश का अंग्रेजी मीडिया इस अंग्रेजीदां तबके का अभिन्न अंग बन गया। शेष भारत से इसका भी सम्पर्क टूट गया। अंग्रेजी मीडिया में देश दिखाई नहीं पड़ता। भिन्न-भिन्न भाषाओं और संस्कृतियो से सजे धजे इस देश को अंग्रेजी एवं अंग्रेजीदां लोगों ने खूब मारा। किसी भी भाषाई प्रदेश का चित्रण दिल्ली के अखबारों में नहीं होता था। सन् 1970 तक जब केवल अखबार ही एकमात्र प्रतिनिघि था मीडिया का। भाषाई अखबारों का दिल्ली तक प्रभाव था ही नहीं। राज्य सरकारें अंग्रेजी दैनिकों के जरिए अपनी बात पहुंचाती थीं। तब इनका अंग्रेजी पत्रों के साथ घनिष्ठ सम्बंध बन गया। अत: जो कानून बने वे अंग्रेजी पत्रों से अघिक प्रभावित होकर बने।

 

इनमें से अघिकांश तो आज भी देश में प्रभावी नहीं हैं।  कर्नाटक या पश्चिम बंगाल में क्या हो रहा है यह दिल्ली सरकार तक कितना पहुंचे मीडिया के जरिए यह प्रदेश की सरकारें और अंग्रेजी अखबार ही तय करते थे। राज्य सरकारें इस कार्य की कीमत निरन्तर चुकाती रहती थीं। आज भी अंग्रेजी अखबारों की सरकारी विज्ञापनों की दरें अन्य भाषाओं की तुलना में कई गुना अघिक हैं। क्यों हैं? कोई खुद को जवाबदेह नहीं मानता।

 

हर राज्य की सरकार ने गुपचुप तरीकों से अंग्रेजी अखबारों से ही सम्पर्क बनाकर रखा। दिल्ली तक अपनी बात पहुंचाने का एक ही जरिया था। स्थानीय भाषाई पत्रों की आवाज वहां तक पहुंच ही नहीं सकती थीं। टीवी तब तक देश में आया ही नहीं था। मात्र एक अंग्रेजी ने ही इस देश में दिल्ली को अन्य प्रदेशों से जोड़कर रखा। अत: राज्यों एवं केन्द्र के बीच नीति-निर्घारण में सेतु का कार्य किया। सम्पूर्ण देश मूलत: एक ही दल कांग्रेस के हाथ में था। अंग्रेजी ही लोकतंत्र के इन स्तंभों को जोड़े हुए थी। उस काल के अघिकांश कानून भारतीयता के विपरीत चिन्तन वाले ही बन पाए। हमारे संविधान को भारतीय जामा इन लोगों ने पहनने ही नहीं दिया। समय के साथ ये सारे अंग्रेजी सोच वाले इस देश के साथ अपनी संवेदना भी खोते चले गए। अनपढ़ा/ अल्पशिक्षित जन प्रतिनिघि भी इनके हाथ की कठपुतली बनकर रह गया। आज वह भी इनसे बाहर जीने का साहस नहीं जुटा पाता।

 

राडिया जैसे प्रकरण टू-जी घोटाला या खेल घोटाला इन्हीं के दिमाग की उपज है। इनमें कोई देशवासी का अभिन्न अंग नहीं जान पड़ता। न उनके लिए काम ही करता है। हां, करता सब उन्हीं के नाम पर है। हर साल बीपीएल की संख्या बढ़ाने का श्रेय अंग्रेजी को ही जाता है। विकास के नाम पर विनाश, कर्ज की रणनीति, अफसरों का पालन-पोषण, पेंशन आदि का आकलन करें तो इनकी भारत विरोधी और अंग्रेजियत की समर्थक दृष्टि दिखाई पड़ जाएगी।

 

अंग्रेजी मीडिया भी इन्हीं अंग्रेजीदां लोगों के हाथ में है। इनकी सांस्कृतिक विरासत भी पश्चिमी जीवन शैली है। हमारे शास्त्रों ने भारत को कर्मभूमि का दर्जा दिया है और पश्चिम को भोग भूमि का। कहने में तो यह बात दकियानूसी लगती है, किन्तु यदि वहां जाकर व्यवहार में देखा जाए तो उनका भौतिकता के प्रति लगाव एक पक्षीय जीवन का आधार दिखाई पड़ जाएगा। यही आधार यहां अंग्रेजी के माध्यम से फैला है और फैलता जा रहा है। भ्रष्टाचार का मूल सूत्र धन-जन (भुज) बल ही तो है। अंग्रेजी मीडिया ने इस संस्कृति को हवा दी।

 

अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए राष्ट्रभाषा अभियान पर सदा उदासीन ही रहे। राजनेताओं का स्वार्थ भी इसी से सिद्ध होता था। अत: स्थानीय भाषाई मीडिया सशक्त होने के बाद भी केन्द्र राज्य सम्बन्धों में प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाया। सरकारें बदलने में तो प्रभावी रहे, किन्तु अंग्रेजीदां अघिकारियों की मानसिकता नहीं बदल पाए। ये स्वयं विदेशी सपने देखते रहते हैं। इनकी बनाई नीतियों के कारण ही आज देश का यह हाल हुआ। राजनेता और मीडिया भी इनकी चपेट में आ गए। शनै: शनै: सबका व्यापारिक स्वरूप हो गया। लोकतंत्र को भी व्यापार बना दिया। आज सरकार का हर एक संस्थान व्यापारिक ढंग से कार्य कर रहा है। पैसा दो, काम करवा लो। सरकारें सेवा नहीं करतीं। जनता के धन से, जनता के नाम पर, जनता के साथ ही व्यापार करती हैं। यही नया लोकतंत्र है।

 

इसका एक ही अर्थ है। जो हालात और नई जीवन शैली उभरकर आ रही है, वह किसी भी समस्या का समाधान नहीं कर पाएगी। इसके विपरीत अंग्रेजी मानसिकता के लोग सत्ता में बैठकर भारतीयता का दोहन करेंगे। मीडिया भी व्यापार बनकर रह जाएगा। जनता एक तरफ और चारों पाए एक तरफ। आश्चर्य होगा यदि हम अगली (बाईसवीं) सदी में कहीं भारतीय संस्कृति के अवशेष पर्यटकों के लिए भी बचा पाएं! जनता भी बिना कुछ किए सुख के सपने देखने लगी है, पर भूल रही है कि पराधीन सपनेहुं सुख नाहिं। अंग्रेजों के चले जाने से गुलामी नहीं गई। वह तो आज भी देश में राज कर रही है।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

अगस्त 7, 2011

वर्तमान

मुझे नहीं मालूम कि मैं अतीत से आता हुआ अनागत में जा रहा हूं अथवा अनागत से वर्तमान में आता हुआ इतिहास बनता जा रहा हूं। वर्तमान क्या है, किसका नाम है, क्या उसका स्वरूप है, नहीं जानता। इतिहास काल हजारों-लाखों वर्षो का है। भविष्य में भी अनन्त काल गणना है। वर्तमान तो बस पलक झपकना मात्र है। क्षण है। पिछले सभी क्षण इतिहास बन चुके। अब नहीं लौटेंगे।

 

जीवन को उतना छोटा कर गए। किसी ने सही कहा है कि इतिहास एक कब्रिस्तान है, जिसमें अतीत दफन रहता है। जो भी था, बस था। है नहीं, और होगा भी नहीं। कैसे समझा जाए कि कहां इतिहास है और कहां वर्तमान शुरू होता है। कहां वर्तमान समाप्त होकर भविष्य वर्तमान बनता है। कैसे पकड़ा जाए क्षणों की इस संघि को! शास्त्र कहते हैं वर्तमान में जीओ। आप आज जो कुछ हो, पिछले किए कर्मो के कारण हो। आज जो करोगे, वैसा ही तुम्हारा भविष्य होगा। भविष्य पर अलग से कोई नियंत्रण संभव नहीं है। प्रारब्ध भी रहता है भविष्य में। ग्रहों का प्रभाव भी, प्रकृति के आवरण भी। इन सबके साथ वर्तमान कर्मो के फल भी। कैसा वर्तमान?

 

क्या शाम को हम वही होते हैं, जो सुबह थे? संभव ही नहीं। शरीर के सारे रसायन बदल चुके। विचारों के विषय बदल गए। भावनाओं में कई उतार-चढ़ाव आ गए। अनेक प्राणी नए मिले और अपना प्रभाव छोड़ गए। कई छूट गए। इतिहास बन गए। शाम को सोचने पर लगता है, सारा दिन तो इतिहास बन गया। सुबह यही संध्या भविष्य में थी। दिनभर में जो कुछ किया, खाया-पीया, गाया सब कुछ तो इतिहास बन चुका। क्या निर्माण किया भविष्य का, दिनभर में? क्या खोया, क्या पाया? क्या मुझे याद है कि किस प्रकार मेरा वर्तमान इतिहास बनता जा रहा था। सारा कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ है।

 

क्या मुझे खाने का स्वाद याद है। किसने बनाया था, कहां से आया था, क्या मुझे इस बात का ध्यान था। क्या मुझे याद है कि मैंने कोई सब्जी थाली से बाहर निकाल दी थी और क्यों? क्या शरीर में खाने के साथ कुछ स्पन्दन भी थे? क्या मन कहीं और था, दिमाग में अनेक प्रश्A चल रहे थे। कहीं जाने की, किसी से मिलने की उतावल थी। मुझे पता भी नहीं चला क्या खाया, किसने बनाया होगा। मैं थाली पर नहीं था। वर्तमान के बजाए भविष्य में डूबा हुआ था। पता ही नहीं चला वर्तमान कब बीत गया।

 

सुबह मां कह रही थीं उनके आज कोई व्रत है। हम दोनों को भी मन्दिर में जाकर पूजा करनी है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करके आना है। मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आ पाई कि हम इक्कीसवीं सदी में पांच हजार साल पुराने रिवाज क्यों पाले हैं। हर बड़े धर्म के प्रवर्तक हजारों साल पहले पैदा हुए। गीता के कृष्ण पंाच हजार वर्ष पूर्व द्वापर में हुए। उनके उपदेशों पर आज अमल करना क्या वर्तमान में जीना है? हर संत यही प्रयास करता है कि हम वही चर्या अपनाएं, जो हजारों वर्ष पहले उनके प्रवर्तक ने प्रचारित की थी। वही पाठ, वही प्रार्थनाएं, वही अनुष्ठान! क्या भविष्य में भी हम यही जीवन शैली चाहते हंै, जैसी कि आज है? यदि कुछ नया चाहते हैं, तो नया करना भी पड़ेगा। मैं पंाच हजार वर्ष पूर्व के जीवन से आज कैसे जुड़ सकता हूं। वह मेरा इतिहास है। मुझे वर्तमान में जीना है।

 

मेरा वर्तमान वैसा नहीं हो सकता जैसा त्रेता या द्वापर में था। मेरे सामने जीवन की चुनौतियां हैं। स्पर्द्धा है, कैरियर है, विज्ञान का धरातल है, वैश्वीकरण है। उपभोग की आजादी है। नारी भी स्वतंत्र है। उसे भी कंधे से कंधा मिलाकर जीना है। आज वह भोग की वस्तु नहीं रह गई।

 

मेरा कैरियर मुझे स्थायी रूप से एक स्थान पर रहने नहीं देगा। कई शहर, देश, धर्म, समाज के बीच रहता चलूंगा। हां, अनभिज्ञ रहूंगा, उन लोगों की जीवन शैली से भी, क्यों नहीं आता मुझे वर्तमान में जीना। मैं और मेरा परिवार ; यही होगा मेरा संसार। कानून भी सामाजिक नहीं, व्यक्तिगत होंगे। मैं स्वयं अपना मालिक। यही अहंकार का पर्दा चट कर जाता है मेरे वर्तमान को। यह मुझे स्वीकार करने नहीं देता कालचक्र को। काल की गति को। मैं नहीं मानता स्वयं को प्रकृति का अंग या ईश्वर का अंश। मैंने नहीं पढ़ा कि पृथ्वी-जल-अगिA-वायु-आकाश चलाते हैं मेरे शरीर को। मैंने नहीं देखा बुद्धि को, मन को, आत्मा को। जानता हूं बस शरीर को।

 

मैंने पढ़ा है कि शरीर ही सारी उपलब्घियों का साधन है। पहला सुख निरोगी काया को ही माना है। विश्व की सर्वश्रेष्ठ काया भी मानव देह को ही माना है। मुझे क्या आवश्यकता वर्तमान को जानने की। कैरियर मेरा भविष्य है। मेरे स्वयं के हाथ में है। जो गया, सो गया ; जो आएगा, आ जाएगा।

 

इस देश में एक और अवधारणा भी है। कुछ कर्मो के फल सैंकड़ों वर्ष बाद भी आते हैं। उनको भी हमें भोगने के लिए वहां रहना पड़ता है। किसी न किसी देह में। तब क्या करेंगे हम? क्या बाहर हो सकते हैं प्रकृति के इस काल चक्र से? क्या पता हम त्रेता में रहे हों, द्वापर में रहे हों और अपने कर्म फलों को भोगने के लिए कलियुग में पैदा हो गए हों। तब प्रश्A यह भी उठता है कि भूत, भविष्य और वर्तमान की अवधारणा प्रकृति में भी हैं क्या? या मात्र काल की निरन्तरता है। तब वर्तमान में जीने का क्या अर्थ है? काल को, कर्म को जीवन में कैसे जोड़कर देखा जाना चाहिए। इसके लिए तो फिर उसी वर्तमान की अवधारणा पर आना पड़ेगा। आकलन के लिए कोई आधार तो होना चाहिए।

 

मेरे साथ क्या हो रहा है वर्तमान में? मैं कुछ नहीं करूं तब भी कुछ हो रहा है। मां आई, खाने का पूछकर चली गई। छत से चूने का प्लास्टर गिरा, पांव में लग गई। बेटे ने आकर बताया साइकिल किसी से भिड़ गई। मरम्मत के लिए पैसे चाहिए। मित्र ने आकर कुछ उधार मांगने की बात कर डाली। मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। मेरा वर्तमान फिर भी व्यस्त है। क्या भविष्य बनेगा इसमें से। बिना कुछ किए भाग्य कभी नहीं बनता। पहले के किए कर्मो के फल आ रहे हैं। प्रारब्ध बनकर। अभी कुछ और भी संचित हैं। आगे फल देंगे। जो कर चुके उसके परिणाम हैं।

 

सही बात यदि समझने की है, तो वह है परिणाम या फल। व्यक्ति इन्हीं को तो ध्यान में रखकर कर्म करता है। जब तक फल नहीं आ जाता, कर्म समाप्त नहीं होता। व्यक्ति यह भी नहीं जानता कि फल कब आएगा। मृत्यु के बाद भी कई कर्म जारी रहते हैं। कई जन्मों के बाद भी फल प्राप्त होते रहते हैं। तब काल की इस परिभाषा को कैसे समझा जाए। कैसे कर्म और काल का समन्वय किया जाए।

 

भारतीय दर्शन व्यक्ति को कर्म के माध्यम से कालातीत होने का मार्ग दिखाता है। कर्म से फल छोड़ दे, उसे ईश्वर के हवाले कर दे। कर्म से ही कामना का आधार भी निकाल दे। निष्काम भाव से कर्म करता रहे। लगता है बहुत कठिन कार्य है। असंभव भी लग सकता है। कामना नहीं तो व्यक्ति कर्म क्यों करेगा। कर्म में कैसे प्रेरित होगा? कर्म करेगा तो फल क्यों नहीं चाहेगा? युग की दृष्टि से दोनों ही प्रश्A महत्वपूर्ण हैं। उत्तर है वर्तमान, यानी वह क्षण जिसे वर्तमान कहा जा रहा है। क्या मैं उस क्षण को देख सकता हूं? इसके लिए स्थितप्रज्ञ होना ही पड़ेगा। इन क्षणों की संघि को पकड़ने के लिए ही त्रिकाल संध्या की जाती है। वर्तमान का यह क्षण ही व्यक्ति को कालातीत करने में सहायक है। वर्तमान पर दृष्टि कर्म से हटकर कारण पर ले जाती है। प्रज्ञा बन जाती है।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

अगस्त 10, 2011

कैंसर

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने पूरी ताकत लगाकर यह तो सिद्ध कर दिया है कि कैंसर लाइलाज है, किन्तु यह नहीं कहा कि यह रोग भिन्न-भिन्न रूपों में देशों और संगठनों को भी हो सकता है। जहां भी कैंसर फैला, मान लो मामला लाइलाज हो गया। अमरीकी अर्थव्यवस्था भी आज इसी कैंसर से जूझ रही है। दुनिया जानती है कि ऋण की कीमोथैरेपी लम्बी नहीं चलेगी।

 

अमरीकी अर्थव्यवस्था उधार के धन और उस पर लगने वाले ब्याज पर टिकी है। सारी दादागिरी और आर्थिक सहायता का नाटक, अन्य देशों की सम्प्रभुता एवं जीने के अघिकार का अपमान इसी धन के नशे में किया गया। इसी धन से अविकसित एवं विकासशील राष्ट्रों के शीर्ष नेताओं को खरीदा भी, धमकाया भी और उनसे अपना व्यापारिक स्वार्थ भी सिद्ध किया। अमरीका में देशभक्ति से अघिक व्यक्तिगत स्वार्थ भारी पड़ता है। वहां के व्यापारी भी लेन-देन की नीतियों को लेकर सदा हाशिए पर ही दिखाई देते हैं।

 

आज एक बड़ी मुहिम चल पड़ी है। तेल उत्पादक देश; चीन, जर्मनी के उद्योगपति अपना धन बैंकों से निकाल कर सोना खरीद रहे हैं। इससे बैंकों के सामने नकदी की समस्या बढ़ जाएगी। डालर के भाव, अमरीकी आयात-निर्यात डगमगा जाएंगे। अमरीका को एक बार तो सड़क पर आकर मर्यादा में जीना सीखना ही पड़ेगा। केवल विज्ञान और भौतिकवाद उसे नहीं बचा पाएगा।

 

ठीक इसी प्रकार का कैंसर आज कांग्रेस को भी खा रहा है। अमरीका के दबाव में कांग्रेस ने भी वही कार्यशैली अपनाई और ‘उधार लाओ-घी पीओ’ की तर्ज पर ही देश को चला रही है। भारतीय संविधान, भारतीय सभ्यता और संस्कृति को मानो नींद की गोलियां देकर सुला दिया है। जब सरकार का ही विभाग ‘कैग’ शीला दीक्षित पर इतने प्रमाणित आरोप लगा रहा है, तब भी उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का दु:साहस कैंसर की ही अभिव्यक्ति है।

 

सजा देने के बजाय उनको बचाने के प्रयास देश की जनता का ही अपमान है। क्योंकि यह सारा धन जनता का है। इधर, कांग्रेस अध्यक्ष भी कैंसर उपचार के लिए विख्यात अमरीका के एक चिकित्सालय में भर्ती हैं। इसमें भी कांग्रेस और देश के लिए कोई संदेश है। सोनिया गांधी ने तो राहुल को प्रतिष्ठित करके अपना संदेश भी स्पष्ट कर दिया है। ना समझे वो…।

 

इसका अर्थ यह नहीं है कि भाजपा पूर्णतया कैंसर मुक्त है। बीज बोए जा रहे हैं। जिन लोगों को मतदाता ने नकार दिया था, उनको एक-एक करके गडकरीजी वापस लाने में लगे हुए हैं। मानो भाजपा का डूबना निश्चित कर रहे हैं। अरे भाई विचारों से और मानसिकता के कैंसरग्रस्त जो नेता पार्टी की थू-थू करा रहे हैं, उनको तो काट फेंको। कटे हुओ को और जोड़ रहे हो। व्यवहार में भाजपा कांग्रेस को पीछे छोड़ चुकी। ऎसे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय कांग्रेस की तर्ज पर उन्हें बचाते हो। जनता देख रही है। भाजपा को यह ध्यान में जरूर रखना चाहिए कि कांग्रेस के डूब जाने पर भाजपा का ही प्रधानमंत्री होगा, यह जरूरी नहीं है। समय रहते कैंसर पर नियंत्रण उचित होगा।

 

गुलाब कोठारी

अगस्त 14, 2011

रूपान्तरण

भौतिकवाद, भोगवाद और स्वच्छन्दता की मार से व्यक्ति आज बेचैन हो उठा है। लगता है उसका दम घुट जाएगा। विश्वभर में आज शान्ति सम्मेलनों की बाढ़-सी आ गई है तथा परिणाम ठीक विपरीत दिखाई पड़ते हैं। चारों ओर आतंकवाद और साम्प्रदायिक कट्टरवाद की ऊंची उठती लपटें। क्यों? हर सम्मेलन में लगभग सभी धर्मो के शीर्ष पुरूष भी होते हैं और बुद्धिजीवी भी।

 

दोनों के ही वहां होने के अपने-अपने कारण होते हैं। ऎसे बड़े सम्मेलनों में भाग लेने का एक सीधा लाभ तो शैक्षणिक योग्यता के क्षेत्र में छवि बढ़ना ही है। अपने प्रवास में आप इनकी गतिविघियों को देखेंगे तो समझ में आ जाएगा कि विश्व शान्ति के बारे में बोलना तो चाहते हैं, किन्तु उसके प्रति चिन्तित नहीं है। अघिकांश चर्चा का आधार अहंकार के तुष्टिकरण का ही रहता है। तर्क, बहस, उद्धरण आदि बौद्धिक धरातल के विषयों की बाढ़ देखने को मिलेगी।

 

बुद्धि शान्ति का धरातल नहीं होती। वह तो टकराव का धरातल है। वहां मिठास नहीं होता। वाणी में रस होता ही नहीं। तब शान्ति का सन्देश किसी के मन को छूता ही नहीं। शान्ति, प्रेम, भाईचारा सब तो मन में रहते हैं। यदि हमें शान्ति एवं प्रेम के प्रयास करने हैं तो पहले मन के धरातल को खोलना पड़ेगा। यह भी समझना पड़ेगा कि मन क्यों अशान्त होता है। अनेक कारण होंगे। इन सबको श्रेणीबद्ध करना पड़ेगा। मन और बुद्धि पर पड़े आवरणों के बीच से यथार्थ को जानने का प्रयास करना पड़ेगा।

 

मन चंचल है। इन्द्रियों का राजा है। हर इन्द्रिय के अपने विषय होते हैं। भौतिक सुखों के लिए अर्थ प्रधान जीवन ने मनुष्य को धन से ही छोटा कर दिया। व्यक्ति शरीर जीवी बन गया। जैविक सन्तान बन गया। केवल मानव देह पा लेना काफी नहीं। भीतर भी मानव का होना जीवन की अनिवार्यता है। शान्ति उसी मानव की जरूरत है। उसके अभाव में सभी शरीर पशु-भाव का आश्रय बनने लग गए। वे ही जाते हैं शान्ति सम्मेलनों में। उनकी आवश्यकता होती ही नहीं है। तब शान्ति किसके लिए आएगी?

 

शान्ति के प्रयासों में रूपान्तरण करने की आवश्यकता होती है। शरीर और बुद्धि मात्र से यह कार्य नहीं किया जा सकता। मन के धरातल पर होने वाले इस कार्य में भावना एवं दृढ़ संकल्प पहली आवश्यकता है। प्रतिभागियों में बुद्धि का अहंकार इतना अघिक होता है कि वे या तो दूसरे की बात पर चिन्तन ही नहीं करना चाहते या अपनी ही बात पर अडे रहना चाहते हैं। कुछ वक्ता अपने पवित्र शास्त्रों के उद्धरणों को ही विश्व शांति का संदेश मानकर प्रस्तुत करते हैं।

 

रूपान्तरण के लिए एक निश्चित वातावरण चाहिए। आप यूं भी कह सकते हैं कि व्यक्ति के चारों ओर जिस प्रकार का वातावरण होता है, धीरे-धीरे वह उसी दिशा में रूपान्तरित हो जाता है। हर सम्प्रदाय को उसके शीर्ष पुरूष ने वातावरण के अनुसार ही स्वरूप प्रदान किया। कोई सम्प्रदाय संस्कृति या जीवन शैली के बाहर कैसे टिका रह सकता है। आज अशान्त वातावारण का एक कारण यह भी है कि अनेक सम्प्रदाय उपलब्ध वातावरण को स्वीकार नहीं करना चाहते। वे आज भी पुरातन नियमों के आधार पर समाज को खड़ा रखना चाहते हैं। यह स्थिति टकराव का मार्ग प्रशस्त करती है। इसी में से कट्टरवाद पैदा होता है। अन्य समुदायों अथवा देशों की जीवन शैली का सम्मान नहीं होता। मानव समाज में ही मानवता के शत्रु पैदा हो जाते हैं। विश्व पटल पर देवासुर संग्राम का ताण्डव बना ही रहता है।

 

शान्ति सम्मेलनों में अशान्ति के एक नहीं, अनेक कारणों पर चर्चा होती है। गरीबी, असमानता, अशिक्षा, भेदपूर्ण व्यवहार, युद्ध, अर्थ-शास्त्र का नेतृत्व आदि। फिर भी इनके मूल में तो मानव संस्कृति ही है। ये कारण तो हर युग में रहे हैं और आगे भी रहेंगे। इसमें बहुत कुछ योगदान प्रकृति एवं प्रारब्ध का भी है। बहुत कुछ प्रभाव कर्म क्षेत्र एवं भोग क्षेत्रों का भी रहता है। जिस प्रकार कर्म योनि (मनुष्य) एवं भोग योनि का अन्तर रहता है, चूंकि आज शिक्षा में और हर देश की जीवन शैली में भौतिकवाद प्रमुख हो गया है तथा मानवीय दृष्टिकोण पीछे छूटता जा रहा है, वहां मन की विकलता बढ़ रही है। अर्थ युग का जीवन कामना प्रधान हो गया। धर्म का अंकुश हट गया।

 

मर्यादाहीन जीवन ही मानव को पशु-श्रेणी में ले जाता है। जीवन शैली तथा समय के अनुरूप मर्यादाएं व्यक्ति को संयम पथ पर बनाए रखती हैं। उसी का एक अंग है-दूसरों का ध्यान रखना, उनका आदर करना, उनकी सहायता करना। जो आपको अपने लिए सही लगे वही व्यवहार दूसरों के साथ भी करना। जहां इस तरह का वातावरण है, मानवता प्रधान संस्कृति है, वहां आज भी शान्ति है। एक जैसा सोच रखने वाले समाज एवं प्रदेश में शान्ति ही रहती है। नेतृत्व भी यदि संयमी और चरित्रवान है, तब भी शान्ति को उपलब्ध हुआ जा सकता है।

 

किन्तु जहां अहंकार दूसरों को बराबर सम्मान के लायक नहीं मानता अथवा अपमान करने पर उतारू रहता है, वहां शान्ति कैसे संभव है? ऎसे हाल तो एक छोटे से परिवार को भी अशान्त कर देते हैं। शिक्षा से मानव के विषयों का, मूल्य परक जीवन शैली का बाहर हो जाना ही मानवता से दृष्टि को हटा देता है। तब किसी मानव के प्रति दया-करूणा-प्रेम जैसे भाव पैदा ही कैसे होंगे। हम स्वयं के जीवन-कैरियर-परिवार में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि पड़ौसी के बारे में भी नहीं सोच पाते। विश्व शान्ति जैसे विषयों पर तो हमारा चिन्तन मूलत: यांत्रिक ही रहता है। हम मंच से वैसे ही बोलते हैं जैसे कक्षा में कोई प्रोफेसर पढ़ाता है। उसे विषय पर केद्रित रहना होता है, आदमी पर नहीं। अन्त में घड़ी देखकर कक्षा से चला जाता है।

 

शान्ति मूल रूप से तृप्ति का विषय है। तृप्ति कामनाओं की पूर्ति से भी जुड़ी है। जीवन के यथार्थ में कामना का स्वरूप समझ में आ जाने के बाद ही कामनाओं में ठहराव आने लगता है। इसमें ज्ञान-ज्ञाता-ज्ञेय तीनों की भूमिका स्पष्ट रहती है। बिना तृप्ति के तृष्णा-ईष्र्या-लोभ जैसी वृत्तियां घेरे रहती हैं। अघिकांश वक्ता भी इनसे पार नहीं होते। तब वक्ता की अपनी कामनाएं उसके कथ्य पर आवरण डाले रहती हैं।

 

भले ही उसको इसकी अनुभूति हो या न हो। वह यदि ध्यान से श्रोताओं पर दृष्टिपात करेगा तो देख लेगा कि कौन-कौन उसे सुन रहे हैं। जब वह स्वयं अपने लक्ष्य को ध्यान में रख कर, सोच-विचार करके बोल रहा है, और साथ ही कुछ अपेक्षा भी रखता है, तब तो उसकी बात किसी के मन को छू ही नहीं सकती। वह भी श्रोता के बुद्धि पटल से टकराकर लौट आएगी। तब उसका ह्वदय परिवर्तन कहां हुआ? वक्ता का शान्ति का सन्देश किसी को प्रभावित ही नहीं कर पाया।

 

तब कैसे सफल हो सकते हैं इस तरह के सम्मेलन। वक्ता का श्रोता से जुड़ाव होना बड़ी जरूरत है। यदि वक्ता अपरिचित की तरह पेपर पढ़ कर चला जाएगा, तब कैसे जुड़ पाएगा श्रोता से? वक्ता को आधा घण्टा मिले बोलने का तथा दो घण्टे तक श्रोताओं से संवाद किया जाए। प्रश्नोत्तर हों। विषय के साथ श्रोताओं का जुड़ाव, भागीदारी, अनुभवों का आदान-प्रदान सभी आवश्यक है। वक्ता के लिए यह भी जरूरी है कि वह हर श्रोता को विशेषज्ञ मानकर उसकी बात का पूरा सम्मान करे। नहीं तो उसके बाद वह प्रश्न करने खड़ा ही नहीं होगा। श्रोताओं के अनुभव से वक्ता वंचित रह जाता है। आप प्रत्येक सम्मेलन में स्वयं वक्ता को ही सबसे अशान्त देख सकते हैं।

 

वैसे शान्ति का विषय तर्क-वितर्क से अघिक आत्मसात करने का है। ध्यान करने का है। स्वाध्याय में उन कारणों पर चिन्तन करने का है जो शान्ति में बाधक दिखाई देते हैं। उन्हें समझकर उनका निवारण किया जाना चाहिए। इसके लिए बाहर तथा भीतर दोनों तरफ साथ-साथ काम होना चाहिए। किसी भी सम्मेलन में भीतरी रूपान्तरण को अघिक महत्व नहीं दिया जाता। व्यक्ति तीन चौथाई भीतर जीता है, एक चौथाई बाहर।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

अगस्त 17, 2011

गले की हड्डी

अन्ना हजारे को जेल भेजकर सरकार ने देश को सन् 1975 के आपातकाल की याद दिला दी। इस कदम का क्या असर हो सकता है, सरकार को शाम होते-होते समझ में आ गया। पल प्रति पल बढ़ते दबाव को सरकार सहन नहीं कर सकी और अन्ना की रिहाई का निर्णय करना पड़ा। सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाकर लोकतंत्र के साथ अन्याय ही किया है।

 

सरकार ने स्पष्ट तौर पर जता दिया कि जो भी सरकार की नीतियों का सार्वजनिक रूप से विरोध करेगा, उसे कुचल दिया जाएगा। सरकारों के लिए सत्ता की लड़ाई में हत्याएं करवाना, अपहरण आदि तो साधारण बातें हो गई। सबसे ज्यादा तो आpर्य इस बात का है कि सरकार जिस व्यक्ति का अपमान कर रही है, वह आज भी उस कमेटी का सदस्य है, जिस कमेटी ने ड्राफ्ट बिल तैयार करने का काम किया है। कपिल सिब्बल यदि अन्ना को भला बुरा कह रहे हैं तो स्वयं अपना ही सार्वजनिक रूप से अपमान कर रहे हैं।

 

जो इतना भी नहीं समझ सकते, वे देश के हित को कितना समझते होंगे। वैसे तो यह तथ्य भी उनके रोज के बयानों से देशवासी अच्छी तरह समझ गए हैं। यह बात भी स्पष्ट हो गई कि सरकार एक व्यक्ति से भी हारी हुई दिखाई पड़ रही है। अन्ना हजारे सरकार के गले की हaी बन गए हैं। न निगल ही सकते, न निकाल ही सकते। ऊपर से कपिल सिब्बल जैसा सलाहकार। कल जिस प्रकार अन्ना ने कहा कि मैं कपिल के घर पर पानी भरने को स्वीकार कर लूंगा। मेरी टीम का सदस्य मेरे लिए यहां तक कह जाए, तब बाकी क्या रह गया। उचित होगा यदि कपिल सिब्बल इस विषय पर बोलना बन्द कर दें।

 

यह सारा मामला बाबा रामदेव जैसा नहीं है। अत्यघिक संवेदनशील भी है। अन्ना के साथ जैसे-जैसे सरकारी अड़ंगे बढ़ेंगे, देश की जनता अन्ना के साथ होती चली जाएगी। कांग्रेस के खातों में चल रहे टू जी घोटाले, खेल प्रकरण, शीला दीक्षित प्रकरण आदि से देश में पहले ही कांग्रेस विरोधी वातावरण बना हुआ है। अन्ना प्रकरण आग में घी का ही काम करेगा। धीरे-धीरे सभी विपक्षी दल भी एक होते दिखाई देंगे। भाजपा को भी इस मामले में और लोकपाल विधेयक के स्वरूप पर भी अपना स्पष्ट रूख घोषित कर देना चाहिए।

 

अभी तक उसका रूख अवसर के अनुसार पलटता रहा है। अभी जो कुछ सरकार कर रही है वह तो ‘चोरी और सीनाजोरी’ दिखाई दे रहा है। इसको तो किसी भी भाषा में लोकतंत्र नहीं कह सकते। बेहतर हो सरकार इस मुद्दे को जनता के सामने रखे, उस पर बहस हो और जनमानस को देखते हुए ही निर्णय किया जाए। जहां प्रधानमंत्री स्वयं शर्त मानने को तैयार हों, वहां छुटभैय्ये कूद-कूदकर वातावरण को विषाक्त बना रहे थे। एन.डी.ए. सरकार में भी स्व. प्रमोद महाजन इसी भूमिका को निभाते रहते थे। इनके डर कहीं और होते हैं।

 

इसी को ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ कहते हैं। यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि शासन ने जन्तर-मन्तर की अनुमति का मामला अन्त तक लटकाए रखा। चार नए विकल्प सुझाए, तो वहां भी स्वीकृति के लिए लटकाए रखा। बहाना ट्रेफिक जाम का! इसी से सरकार की नीयत साफ नहीं लगती। ऎन वक्त पर धारा-144 लगाना क्या संदेश देता है? जिस व्यक्ति को कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार ने सन् 1992 में पkभूषण दिया, जिसे जन लोकपाल बिल का आधार स्तंभ माना, उसके साथ यह व्यवहार दोगलापन नहीं है?

 

बाबा रामदेव के समय भी कार्रवाई का ठीकरा सरकार ने पुलिस के माथे ही फोड़ने का प्रयास किया था। अब भी यही कर रही है। सरकार किसकी और पुलिस किसकी? पुलिस ने क्या सोचकर मीडिया को दूसरे द्वार तक जाने से रोका और तीखी प्रतिक्रिया झेली? इसी प्रकार आज अन्ना पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना कांग्रेस का बचकानापन है। आरोप अन्ना को कमेटी में रखते समय लगते तो उनका कोई मतलब था। आज तो अपनी इज्जत ही धूल में मिला रहे हो। सारा देश थू-थू कर रहा है। लोकपाल विधेयक पर अन्ना टीम ने देशभर में जो सर्वे कराया है, उससे यह तो पता चल ही गया है कि देश की जनता सरकार के साथ नहीं है।

 

ट्रस्ट की आडिट का मुद्दा उठाकर कांग्रेस ने एक और घटिया खेल खेला। जस्टिस सांवत से जांच कराने की पहल खुद अन्ना ने की थी। अन्ना का कहीं नाम भी नहीं आया। इसके विपरीत कांग्रेस नेताओं के परिवार के सदस्यों के नाम एन.जी.ओ. चल रहे हैं? क्या सब जांच कराने को तैयार हैं? क्या सभी के ट्रस्टों का नियमित आडिट होता है? अन्ना को लेकर बार-बार निर्णय बदलना सरकार की बौखलाहट को दर्शाता है। जब इस मामले में सारे मुद्दों पर संसद काम कर रही है, तो अन्ना संबंधी निर्णय भी संसद पर ही छोड़ जाने चाहिए थे।

 

अन्ना की गिरफ्तारी ने देश को हिलाकर रख दिया। संसद में विपक्ष का भारी हंगामा हुआ, देश भर में प्रदर्शन हुए और कुछ ही घंटों में सरकार को पीछे हटना पड़ा। मानवाघिकार आयोग ने दिल्ली पुलिस से 14 दिनों में जवाब मांगा है? दिल्ली की निचली छह अदालतों के वकील बुधवार को हड़ताल पर रहेंगे। और इन सबसे महत्वपूर्ण बात है देश के युवावर्ग का अन्ना के साथ आना। इनके संदेश एक अलग चिन्गारी की आंच जैसी लग रहे हैं। कब लपटें बन जाएं, किधर से उठें, कहां तक फैल जाए, देश को कहीं और ले जाएगी। सरकार सावचेत रहे। सत्ता में डंडा ही सब कुछ नहीं होता।

 

गुलाब कोठारी

अगस्त 21, 2011

क्रन्दन

जीवन द्वैत पर टिका है, युगल तžव पर टिका है। एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह। यथार्थ में सिक्का तो एक ही है। चूंकि हमारे मन की गतियां दोनों ओर रहती हैं- ऊध्र्वगामी एवं अधोगामी, अत: प्रत्येक भाव भी दो रूप में दिखाई देता है। इन्हीं का एक आयाम है हंसना और रोना। मूल में दोनों भिन्न नहीं है। किसी अवसर पर जब हमें जोर का रोना आ रहा हो और हम उसे रोकने का प्रयास करें, तो मुंह से जोर से हंसी छूट जाती है। इसी प्रकार प्रेम और क्रोध को भी आगे पीछे देख सकते हो। प्रत्येक भावना वासना रूप भी देखी जा सकती है।

 

सृष्टि आनन्द से शुरू होती है। आनन्द भाव की गति का विस्तार सृष्टि का निमित्त है। तब क्रन्दन या रोना भी कहीं न कहीं सृष्टि क्रम से जुड़ा होगा। जो सृष्टि आनन्द से निकले, तथा बच्चा एक क्रन्दन के साथ पैदा हो, कुछ तो समन्वय होगा ही। आनन्द अव्यय (कृष्ण) पुरूष की प्रथम कला है। यह प्रथम सृष्टि है। माया के द्वारा सम्पादित होती है। माया ही ब्रह्म के एक अंश को घेरकर बांध लेती है। उसकी स्वतंत्रता छीन लेती है। अव्यय मन तभी से मुक्त होने के लिए छटपटाता है। क्रन्दन करता है। मां को मनाता है कि किसी तरह उसे फिर से मुक्त कर दे। बीच-बीच में मन बाहरी जगत की चकाचौंध में रमण करने लग जाता है। इन्द्रियों के सुखों के जाल में क्रन्दन भूलकर खेलने लग जाता है। इसी कारण अनेक ऎसे कर्म करता रहता है कि एक के बाद एक जन्म लेता हुआ चौरासी लाख योनियों से गुजरता रहता है। योनि वासना की सूचक है। इसी का दूसरा ऊध्र्वगामी भाव है भग, जो व्यक्ति को भगवान बनाने का, मुक्त होने का, मार्ग देता है।

 

मां तक क्रन्दन पहुंचे और इतना पहुंचे कि उसका मन द्रवित हो जाए। इसके लिए ध्रुव या प्रहलाद या द्रोपदी का क्रन्दन सीखना पड़ेगा। हाथी की चीत्कार सीखनी पड़ेगी जिसका पांव मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। चीत्कार की एक क्रिया भी होती है, जैसे चोट लगने या घायल होने की अवस्था में हर व्यक्ति करता है। वह किसी मां के कान तक ही पहुंचेगा, बुद्धि तक पहुंचकर ठहर जाएगा। मन और आत्मा के धरातल तक नहीं पहुंच सकता।

 

द्रोपदी का क्रन्दन तो उसी समय शुरू हो गया था, जब दु:शासन उसे घसीटने लगा था। चीर खींचते समय भी क्रन्दन था, अहंकार भी था। पाण्डवों के लिए उसके नेत्रों में चुनौती भी थी। धीरे-धीरे उसने एक-एक को हारते देखा। दु:शासन के आगे उसकी शक्ति भी हार गई। तब उसने कृष्ण को पुकारा और पूर्णत: समर्पित हो गई। किसी भी प्रकार का कोई प्रतिरोध आगे नहीं जताया। अब उसका क्रन्दन शरीर का नहीं था। बच्चा भी क्रन्दन करता है। भूख से, भय से, दर्द आदि अनेक कारणों से। हर क्रन्दन पर मां स्वयं नहीं भागती है। जब वह भागती है, तो क्रन्दन तुरन्त ठहर जाता है।

 

जीवन में हम क्रन्दन को दुख का पर्याय मानते हैं। सुख से छूटने पर भी रोना आता है। रोना दया-करूणा आदि कल्याण भावों के साथ भी जुड़ा होता है।

हंसने की तरह रोना भी कई तरह का होता है। बाहर और भीतर का रोना भिन्न-भिन्न होता है। रोना शरीर और बुद्धि को नहीं आता। रोता तो मन ही है। पर जीवन में सत, रज, तम के प्रभावों के रोने के स्वरूप भी बदलते रहते हैं। झूठ भी होता है रोने में। मगरमच्छी आंसू भी बहते हैं। बिना आंसू के आत्मा का क्रन्दन भी होता है। अनेक प्राणियों को आप तड़पता देखकर उनके भीतर का क्रन्दन सुन सकते हैं। भीतर के क्रन्दन को मनुष्य भी दबाकर ही रखना चाहता है। वह उसे बहुत प्यारा भी होता है। इससे भी गहरा प्रभाव उस क्रन्दन का होता है जो जीवन की ठोकरों और विफलताओं से उत्पन्न होता है। ह्वदय के घावों का क्रन्दन मार्मिक भी होता है और दीर्घजीवी भी।

 

यह कविताओं का उद्गम स्थल बनता है। वैसे कुछ लोग स्वभाव से रोते ही रहते हैं। उनको जीवन से कभी संतुष्टि होती ही नहीं। अभावग्रस्त की तरह जीते हैं, भले ही ईश्वर ने उनको सब कुछ दिया हो। इस कारण वे मिले हुए सुख को कभी भोग नहीं पाते। जिसको भोगना आता है, वह कभी अभावग्रस्त नहीं रहता। या तो वह परिस्थितियों को बदलने की क्षमता रखता है या फिर उनको स्वीकार लेने की। जैसे विवाह के बाद पत्नी की स्थिति होती है। नए घर में आकर रोते रहने का अर्थ है कि न तो वातावरण को बदल सकी, न ही खुद को, तब वहां सुख कहां! भले ही दोष किसी के सिर डाला जाए, उसका जीवन तो अभाव ग्रस्त ही रहेगा। उसके चेहरे पर न शान्ति, न ही कान्ति। वह वर्तमान से ज्यादा अतीत भी जीने के कारण वर्तमान का उपयोग नहीं कर पाती। जिसको वर्तमान में जीना आ गया, अतीत और अनागत से जो मुक्त हो गया, वह सदा अपने सपने साकार करता है।

 

रोना कब आता है, किसको आता है, क्यों आता है? कष्ट (व्याघि) का रोना शारीरिक क्षमता की कमी से तथा आघि का रोना मानसिक परिप`ता की कमी से आता है। इसमें व्यक्ति की सुख-दुख की अवधारणा जुड़ी है। ये दोनों ही अवधारणाएं यथार्थ से परे हैं। इनके आधार पर खुश होना, दुखी होकर रोने बैठ जाना दोनों ही यथार्थ नहीं हैं। इनकी अवधारणा का आधार प्रकृति (सत, रज, तम) है। अत: जिन कारणों से व्यक्ति दुखी होता है, उनको इस संदर्भ में समझना पड़ेगा।

 

दूसरी बात यह भी है कि ये सारी स्थितियां जीवन में व्यक्ति द्वारा स्वयं पैदा की हुई होती हैं। उसके अपने कर्मो के फल ही होते हैं। यदि इस बात को वह स्वीकार कर ले, तो हंसते हुए परिस्थिति से गुजरा जा सकता है। रोना निराकरण नहीं है। यह पलायन भी हो सकता है और दु:ख का दोष किसी अन्य के सिर भी गढ़ा जा सकता है। कायर व्यक्ति स्थितियों से डरता है।

 

संघर्ष करने अथवा तपने से डरता है। जिसे जूझना आता है व न तो रोता है, न हार ही मानता है। अपनी क्षमताओं का सही आकलन, उनका विकास और जीवन के प्रति विश्वास चाहिए। हर व्यक्ति आवरण लेकर पैदा होता है, जिनके कारण दृष्टि भेद होता है। इनको एक बार समझ लेना ही इनको हटाना है। फिर द्वैत समाप्त, प्रतिबिम्ब समाप्त। जो शेष रहेगा, वह आनन्द ही होगा। रोना सदा-सदा के लिए विदा हो जाएगा। इसके लिए भक्ति, समर्पण का ही मार्ग सुलभ है। मां के आगे बैठकर उससे प्रार्थना, उसके आगे क्रन्दन तो करना ही पड़ेगा। सारे आवरण इसी के तो होते हैं। अत: यह प्रसन्न होगी तभी आवरण हटेंगे। तभी इसकी गोद में स्थान मिलेगा। तभी रोना मिटेगा।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

अगस्त 22, 2011

बंशी द्वार है कृष्ण का

भारतीय शास्त्र कहते हैं कि देश में एक मात्र पूर्ण अवतार श्रीकृष्ण हुए हैं। और कृष्ण स्वयं यह कहते हैं कि मैं अव्यय पुरूष हूं। मेरे ही अंशों को केन्द्र में रखकर सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण होता है। तब क्या हम सब कृष्ण के अंशावतार नहीं हैं? कृष्ण यह भी कहते हैं कि सब कुछ छोड़कर मेरी शरण आ जा। क्या कृष्ण यह नहीं कह रहे कि अपने भीतर मुझे ढूंढ़ ले। कृष्ण विष्णु के अवतार कहे गए हैं। वे स्वयं विष्णु भी हैं, अवतार भी हैं और मानव रूप वसुदेव-देवकी के पुत्र भी हैं। विष्णु सृष्टि के प्रथम अक्षर पुरूष हैं, जिनकी नाभि से ब्रह्मा प्राण उत्पन्न होता है। ब्रह्मा-विष्णु प्राण इन्द्र प्राण रूप सूर्य को उत्पन्न करते हैं, जो शिव रूप में सर्वत्र पूजित है।

 

कृष्ण को पूर्णावतार मानने के पीछे सबके अपने मत हैं, किन्तु मेरे जैसे साधारण व्यक्ति को इतना ही समझ में आया कि कृष्ण पूरी उम्र प्रसन्न मुद्रा में रहे। प्रकृति के प्रतिनिघि रहे। तटस्थ भी रहे, धर्म का व्यावहारिक रूप (साम, दाम, दण्ड, भेद) भी समझा गए। प्रकृति की हर चीज हंसती गाती है। हवा, पानी, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, आकाश आदि सबका अपना संगीत है। सबकी अपनी मुस्कान है, जिसे देखकर हर किसी का मन प्रसन्न हो जाता है।

 

यह मुस्कान किसी चेहरे पर आसानी से नहीं आ सकती। इसके लिए मन बहुत पवित्र चाहिए। अहंकार मुक्त होना चाहिए। मन में कुछ दूसरों के लिए करने का भाव होना चाहिए। वापिस कुछ मांगे बिना, बिना अपेक्षा भाव के। आज इस मुस्कान का स्थान गंभीरता ने, अहंकार ने, अकेलेपन या व्यष्टि भाव ने ले लिया है। हर कोई गंभीर चिन्तक नजर आना चाहता है। हंसना-गाना तो बच्चों से भी छीना जा रहा है। मां-बाप स्वयं साक्षी बनते हैं।

 

कृष्ण ने हर परिस्थिति को हंसकर जिया। परिस्थिति कभी कृष्ण पर हावी नहीं हो पाई। कृष्ण सदा स्वयं के नियंत्रण में रहे। शायद इसी कारण वे सामाजिक मर्यादाओं को भंग कर सके। कभी स्वयं को लाचार नहीं माना। जीवन को स्वाभाविक ढंग से, खेल-खेल में जी कर दिखा गए। उन्होंने किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति को अच्छा बुरा नहीं माना। छोटा-बड़ा नहीं माना।

 

हर छोटी से छोटी क्रिया के मूल में सूक्ष्म को देखते रहे। अत: उनकी दृष्टि में सदा यथार्थ बना रहा। कृष्ण सदा हंसते रहे। आनन्द के पर्याय बने रहे। सृष्टि का निर्माण आनन्द के बिना नहीं हो सकता। अव्यय पुरूष की तो प्रथम कला ही आनन्द है। दूसरी विज्ञान कला ही बुद्धि योग है। जब व्यक्ति का मन बुद्धियोग के द्वारा आनंद से जुड़ता है, वही आत्म-साक्षात्कार है। कृष्ण ने ही इसका भी सरलतम मार्ग हमें दे दिया। वह है नाद। कृष्ण की बंशी ही इसका प्रमाण है।

 

जो व्यक्ति सदा प्रसन्न रहता है, आनंद भाव में रहता है, वह गाता है, बजाता है, नृत्य करता है। इनका आधार नाद ही है। नाद आकाश की तन्मात्रा है, गुण है। इसी से सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण होता रहता है। सम्पूर्ण सृष्टि इसी में लीन होती रहती है। कृष्ण इसी नाद के पर्याय बने रहे। गाना या गुनगुनाना नाद ही है। गुंजन शब्द नाद वाचक है। भौंरा, मधुमक्खी, मच्छर, झींगुर आदि गुंजन के उदाहरण है।

 

प्राणायाम में भी शुरू और अन्त में गुंजन कराया जाता है। गुंजन को, स्पन्दन रूप नाद को, भीतर बाहर आने-जाने का आलम्बन माना गया है। शरीर की शिथिलता, विचारों का तंत्र सब इससे प्रभावित होते हैं। कृष्ण की बंशी की धुन के स्पन्दन श्रोता के शरीर-मन के पार आत्मा तक पहुंच जाते थे। यहां प्रश्न मुक्त भाव का भी है। बिना पात्रता के ग्रहण कैसे हो सकता है? नाद और आत्मा दोनों शाश्वत हैं। शरीर और मन नश्वर हैं।

 

आत्मा ब्रह्म का अंश है और नाद शक्ति का। फैलाव शक्ति करती है। नाद ही मार्ग है ब्रह्म तक पहुंचने का। पूरा का पूरा भक्ति मार्ग नाद ब्रह्म की साधना है। बिना गीत-संगीत-ताल के भक्ति मार्ग गतिशील नहीं दिखाई पड़ता। हमारी आराधना-प्रार्थना-वेद वाचन-नृत्य आदि संगीत पर ही आधारित रहे हैं। वही संगीत कृष्ण स्वरूप के केन्द्र में है। गीत का माधुर्य सुनने वाले के लिए बाहरी विद्या है।

 

गाने वाले के लिए भीतर की विद्या है। दोनों के अनुभव एक नहीं हो सकते। यह अलग बात है कि गाने वाला श्रोताओं को प्रसन्न करने के लिए गा रहा है अथवा प्रभु को प्रसन्न करने के लिए। फिर भी गाना तो गाना ही है। गीत-संगीत-नृत्य जैसी लीनता, खो जाने का भाव अन्य कलाओं में नहीं होता। लीनता स्वत: ही ध्यान बन जाती है। भक्त खुद अपनी सुध-बुध भूलकर ईश्वर में लीन हो जाता है। सम्पूर्ण वातावरण पर इस लीनता का प्रभाव दिखाई पड़ेगा। संगीत का चरम यही लीनता है। मीरा की तरह, चैतन्य महाप्रभु की तरह, सूरदास की तरह, नरसी मेहता की तरह। इस लीनता का अर्थ ईश्वर से साक्षात्कार ही है। अत: अध्यात्म में प्रवेश संगीत से होता था।

 

हमारा उपासना क्षेत्र नाद पर ही आधारित रहा है। हमारा जप, माला और ध्यान सभी इस नाद पर आधारित हैं। हमें गुरू बीज मंत्र देता है। अभ्यास के द्वारा इसे वृक्ष रूप बड़ा किया जाता है। अक्षरों एवं व्यंजनों के बीच अवकाश कम करने का अभ्यास कराया जाता है। इन स्वरों को यह अवकाश जोड़ता है। इसमें सृष्टि का एक केन्द्रस्थ नाद रहता है। स्वरों के मध्य इस नाद को पकड़ना ही मन (ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र प्राण=ह्वदय) से बाहर होना है। कृष्ण की बंशी का संदेश स्पष्ट है। बंशी के सुरों में, संगीत में खो मत जाना। उसमें जो सूत्र रूप कृष्ण तत्व बह रहा है, उसे पकड़ना है। बंशी हमारा लक्ष्य नहीं है। भक्ति संगीत भी लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य है आल्हाद। यह आनन्द ही कृष्ण रूप है। सब तो अदृश्य है।

 

भीतर के इस सूक्ष्म नाद को सुनने के लिए ही महाप्राण ध्वनि (भ्रामरी) का प्रयोग कराया जाता है। वाचिक, उपांशु और मानस जप के तेज गति वाले अभ्यास कराए जाते हैं। ताकि शरीर शिथिल हो सके। विचारों की श्रृंखला टूट सके। मन से हम कट सकें। तब जो बचता है वही कृष्ण है। मैं ही हूं। नाद की गहनता, संकल्प की दृढ़ता तथा अभ्यास की निरन्तरता वहां पहुंचा देती है। इस मार्ग पर यदि कोई बाधा है, तो वह है अहंकार।

 

हम शरीर के सहारे आगे बढ़ते हैं। यह आत्मा का मन्दिर है। जैसाकि हमारे गांव में एक मन्दिर होता है। हम मन्दिर में प्रवेश के पूर्व घण्टा बजाते हैं और बाहर आते समय भी घण्टा बजाते हैं। इस घण्टे की गूंज के वही अर्थ हैं, जो भ्रामरी के हैं। मन्दिर भीतर से खाली होता है। नाद गूंजता है। उसी के बीच प्रवेश होता है। ओशो ने ‘एक ओकार सतनाम’ में इसका विस्तार किया है।

 

मानस जप को साक्षी भाव का क्रिया रूप माना है। गुरू नानक की वाणी की विवेचना में ओशो लिखते हैं:- अनेक नाद हैं और असंख्य बजाने वाले हैं। असंख्य गायक हैं, अनन्त राग-रागनियां हैं। धर्मराज जैसे गंभीर चिन्तक, भले-बुरे का ज्ञान रखने वाले भी नृत्य कर रहे हैं और हिसाब-किताब रखने वाले चित्रगुप्त भी। नानक कहते हैं- नाद, ओंकार तेरा द्वार है। उसी में छिपा हुआ तू (ईश्वर) सारे जगत को संभाले हुए है। ओकार से पहले भीतर एक सन्नाटे का सा नाद सुनाई देता है। झीगुंर जैसा। इसी को सçच्चदानन्द कहा है। ध्यान में नाद में होकर आत्म साक्षात्कार होता है।

 

नानक कहते हैं कि परमात्मा बनाता है। बना-बना कर अपनी सृष्टि को देखता है। उसे बड़प्पन देता है। यदि तुम्हें यह बात समझ में आ जाए कि तुम्हें परमात्मा ने बनाया है और देता चल रहा है, तुम्हे बड़प्पन। महिमा दे रहा है, तो तुम्हारे जीवन से पाप अपने आप विसर्जित हो जाएंगे। तुम उस तरह बोलोगे, व्यवहार करोगे, जिसको परमात्मा ने बनाया है। परमात्मा जिसे बचा रहा है। तुमसे प्रसन्न भी है। नहीं तो मिटा देता।

 

नाराज नहीं होता। इसके बदले हमको उसकी रजा, उसके हुकम की सीमा में रहना है। वरना दुख पाओगे। ध्यान तुम्हें अन्त:करण तक ले जाता है। अन्त:करण परमात्मा से जुड़ा है। तुम्हारा सोचना पूर्ण रूप से बन्द होना चाहिए। तभी अन्त:करण की ध्वनि सुनाई देगी। यही कृष्ण की बंशी का रहस्य है। यही कृष्ण तक पहुंचने का द्वार है। प्रश्A यही है कि जब पक्षी गाते हैं, हवाएं गाती हैं, झरने गाते हैं, प्रकृति गाती है, तब आदमी क्यों गाने से डरता है। क्या इसके बिना कृष्ण तक पहुंच पाना संभव है?

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

अगस्त 24, 2011

कब झुकोगे?

भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर किया जा रहा अन्ना हजारे का अनशन धीरे-धीरे एक देशव्यापी संघर्ष या क्रान्ति जैसा स्वरूप लेता जा रहा है। शुरू में अडियल रूख दिखाने वाली सरकार अनेक मांगों पर सहमत होती दिख रही है। इस आन्दोलन की विशेषता भी यही है कि यह पूर्णत: गैर राजनीतिक है। कांग्रेस सरकार सब तरह से ताल ठोककर देख चुकी है।

 

आज स्वयं को हारी हुई अनुभव तो कर रही है, किन्तु स्वीकार नहीं कर पा रही है। इसके बाद भी सरकार ने जो रूख दिखाया है, उसके कारण आशा की किरण दिखाई पड़ती है। स्वयं प्रधानमंत्री का यह कहना कि वे भी सशक्त लोकपाल बिल के समर्थक हैं। इससे भी एक कदम आगे स्व. जवाहर लाल नेहरू की अवधारणा भी लोकपाल बिल के पक्ष में थी।

 

इस तरह के समाचार अपने आप मीडिया में नहीं आ जाते। ये संकेतक का कार्य करते हैं। कांग्रेस इस दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग ढूंढ़ रही है। देश में चारों ओर से सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। जो बातचीत का लचीलापन शुरू में दिखाई पड़ रहा था, दबाव के साथ-साथ घटता जा रहा है। इसमें सर्वाघिक दबाव देश के युवा वर्ग का है। देश के 35 वर्ष से कम उम्र के 65 प्रतिशत युवा अन्ना का समर्थन कर रहे हैं। यही अभियान का भविष्य है।

 

पर्दे के पीछे भी कुछ घटनाक्रम होता जान पड़ रहा है। भाजपा स्वयं को पूरी तरह असहाय मान बैठी है। हाल ही में हुई सप्ताहभर की उज्ौन बैठक में संघ भी कोई राष्ट्रीय स्तर का निर्णय ही नहीं कर पाया। उसके अपने मुद्दों के आगे समय कम पड़ गया राष्ट्रीय मुद्दों के लिए। भाजपा, भ्रष्टाचार, लोकसभा चुनाव के हीरो जैसे मुद्दों में ही उलझी रही। अब भाजपा को शायद बहुत जोर लगाना पड़ेगा।

 

अब तक चुप रहने की कीमत भी चुकानी पड़ेगी। अन्ना टीम ने भाजपा को दूर रहने का इशारा पहले ही कर दिया था। वरना बाबा रामदेव के आन्दोलन की तरह इसे भी ले डूबती। भाजपा के सामने अब दुविधा यह भी आएगी कि, उसे राजग को एकजुट रखना है। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में अगले लोकसभा चुनाव लड़ने का निर्णय राजग की एकता पर भारी पड़ रहा है। इन्हीं सब स्थितियों में भाजपा इतनी कमजोर हो गई है कि, अब वामपंथियों का मुंह ताक रही है। अकेले खड़ी नहीं रह सकती। वामपंथी भी इसी स्थिति में हैं। प.बंगाल में चुप्पी छा जाने के कारण राष्ट्रीय मुद्दों पर भी गौण हो गए।

 

दोनों दल इस मुद्दे पर दिल्ली में एक साथ भारत बन्द जैसा कोई आयोजन करने की सोच सकते हैं। बन्द की तारीख दोनों दल एक ही रखने की सोच सकते हैं, किन्तु प्रदर्शन अलग-अलग स्थानों पर रखना चाहेंगे। उसी दिन शायद यह घोषणा भी कर दें कि भविष्य में साथ-साथ भागीदार रहेंगे। वे मानते हैं कि युवा इससे भ्रमित होकर उनकी बात स्वीकार लेगा। उनके साथ जुड़ेगा। जब इतना बड़ा गैर-राजनीतिक आन्दोलन गतिमान है तब कौन इससे अलग होना चाहेगा? कौन दलगत स्वरूप ग्रहण करना चाहेगा?

 

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता भी कूदने की तैयारी में दिख रही हैं। आज तो यह भी दोनों दलों से अलग हैं। पूर्व मुख्यमंत्री करूणानिघि के विरूद्ध कार्रवाई के लिए केन्द्र सरकार पर भी अपना दबाव बनाए हुए हैं। अमरीकी विदेश मंत्री की इनके साथ लम्बी मुलाकात का भी कोई तो मतलब होगा। इतना समय उन्होंने न तो प्रधानमंत्री को दिया, न ही  सोनिया गांधी को।

 

उधर सोनिया गांधी की बढ़ती बीमारी अलग चिन्ता है कांग्रेस की। इस बीच यू टयूब पर सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वढ़ेरा के विरूद्ध ढेर सारी सूचनाएं और जानकारियां उपलब्ध होने लग गई, जो भ्रष्टाचार के मुद्दे को नई परिभाषा भी दे सकती हैं। यू टयूब का दावा है कि पिछले वर्ष उसे भारत में अपने जो 12400 से अघिक वीडियो प्रतिबंघित करने पड़े, उनमें से 12200 तो अकेले गांधी परिवार से जुड़े भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों के थे। जन लोकपाल के बाद भी अन्ना हजारे के पास आंदोलन आगे बढ़ाने के कई मुद्दे बाकी हैं।

 

जैसे-जैसे अन्ना का आन्दोलन आगे बढ़ेगा, प्रादेशिक सरकारों की भूमिका भी नया रूप लेती चली जाएंगी। शीर्ष पर बैठे कुछ परिवारों के निजी विवाद भी आने वाले समय में देश की राजनीति को प्रभावित करते दिखाई देते हैं। एकमात्र रॉबर्ट वढ़ेरा पुराण का प्रभाव भी सोचा जा सकता है। कुछ नेताओं को विभिन्न दलों ने भी अपने-अपने स्तर पर दरकिनार कर रखा है।

 

उनके तेवर, उनके भ्रष्टाचार की गाथाएं लगता है शीघ्र देश के सामने आने वाली हैं। ऊपर से सब कुछ नेतृत्वविहीन! केन्द्रीय सरकार अन्ना के नजारे देख चुकी है। आगे हठधर्मी बनी रही तो देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। सरकार में चेहरे बदलना तो तय हो ही गया है। देश के आगे तो झुको!

 

गुलाब कोठारी

 

अगस्त 29, 2011

देशहित में झुके रहें

जो कुछ स्थितियां द्वापर में कंस के शासन में थीं, लगभग वैसी ही देश में व्याप्त थीं। भ्रष्टाचार, राजनीति का अपराधीकरण, जातिवाद, संाप्रदायिकता, चारो ओर निराशा का वातावरण। राजनीतिक दलों में विचार, नैतिकता व नेतृत्व का अभाव तो इस आंदोलन मे सामने आ ही गया। और यह भी कि कोई भी साधारण, संकल्पवान व्यक्ति, बेदाग छवि और जीवट के सहारे, भटकती युवा पीढ़ी में भी नैतिकता के पांचजन्य से प्राण फूंकसकता है। मात्र 12 दिनों के अल्पकालीन अनशन ने देश को झकझोर दिया।

 

सरकार ही नहीं, संसद भी नतमस्तक हो गई। इस आंदोलन ने अहिंसा की आणविक शक्ति फिर से विश्व को समझा दी। आधुनिक संचार माध्यमों का सकारात्मक उपयोग सामने आया। अन्ना ने देश प्रेम की भावना, देश के लिए संघर्ष करने का जज्बा दिखाकर युवा पीढ़ी के सामने आजादी-गांधी-अहिंसक क्रांति में विश्वास जगा दिया। हर प्राणी में परमात्मा का अंश है, कम ज्यादा भले ही हो, अत: ठान ले तो क्या नहीं किया जा सकता।

 

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध युद्ध छेड़ा था। जल्द ही जीत भी गए। यूपीए सरकार अपनी ही शकुनि मामा की खोटी नीतियों, सत्ता के दुरूपयोग तथा दाब-धौंस के प्रयासों के कारण बदनाम भी हुई और करारी हार का मंुह भी देखना पड़ा। संसद में शनिवार को सरकार ने जनभावनाओं के दबाव के आगे समर्पण कर दिया। घुटने भी टेके, अपमानित भी हुई और सरकार की भी भत्र्सना हुई। सरकार की मंशा शुरू से ही आंदोलन को कुचल देने की रही थी। भ्रष्टाचारियों को डर था कि यह बिल उनके पर कतर देगा।

 

अन्ना की गिरफ्तारी, छोड़ने का नाटक, सत्ता के सिपहसालारों की भाषा और दंभ देखने वाला था। एक नेतृत्व विहीनता का वातावरण। ‘ऊपर से प्रधानमंत्री का मौन’ अथवा ‘मैं तो बेईमान नहीं हूं।’ लोकतंत्र की खिल्लियां उड़ा रहे थे। देश टके-टके के भ्रष्ट नेताओं को आपके (प्रमं) प्रशस्ति के नाम पर सुन रहा था, क्योंकि वे सत्ता में थे। दूसरा मूर्खतापूर्ण कार्य हुआ कि गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने सारा ठीकरा दिल्ली पुलिस और केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के सिर फोड़ने का दुस्साहस दिखाया। इसी के साथ भ्रष्टतम नेताओं ने अन्ना टीम की बेदाग छवि पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने शुरू कर दिए। कौरव राज भी ऎसा ही था। यहां द्रौपदी के रूप में लोकतंत्र था।

 

सरकार की दुर्दशा के कारण भी सरकारी भोंपू ही रहे। ये जितना बोलते, उतनी अघिक जनता अन्ना के साथ हो जाती। देश ने अपनी पीड़ा और सत्ता से त्रस्त दबे हुए आक्रोश की अभिव्यक्ति अन्ना को सौंप दी। चुने हुए प्रतिनिधियों को न केवल नकारा बल्कि उनसे लोहा लेने के लिए अन्ना को नेतृत्व संभलाया और देश स्वयं उनके साथ हो लिया। विश्व के लिए एक आदर्श उदाहरण! शायद गांधीजी की नमक यात्रा (दांडी मार्च) के बाद किसी एक व्यक्ति के पीछे देश के गांव-गांव, गली-गली में चलने वाला यह पहला कारवां था। बिना दांडी के।

 

कांग्रेस ने धृष्टता बरतने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी और यहां तक कह गए कि अन्ना संसद की मर्यादा को ही कम कर रहे हैं। अब क्या वे थूक कर चाटेंगे? जब दो सप्ताह पूर्व ही स्पष्ट हो गया था कि सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा, उसी समय यह निर्णय हो जाता तो सरकार का भ्रष्ट चेहरा भी ढका रह जाता। भाजपा तो इस आंदोलन में पूरी तरह मार खा गई। नदारद ही रही जिसके कारण उसे राजनीतिक दल का दर्जा देने में भी अब देशवासियों को दिक्कत आने लगी है।

 

प्रश्न तो आज भी यही है कि जो राजनीति पूरी तरह भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, वह भ्रष्टाचार को खत्म करने केलिए कोई कदम उठाएगी? लोकपाल तो एक संस्था का ही नाम है, जिसे व्यक्ति भी भ्रष्टाचार का जामा पहनाएंगे। कांग्रेस में ऎसे व्यक्तियों की कहां कमी है, भावी संघर्ष में बहुत अवरोध आएंगे। भ्रष्ट नेता सत्ता को आसानी से नहीं छोडेंगे। एक-एक करके हटाना होगा।

 

बाकी को चुनाव में। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर फूट डालने की कोशिश तेज हो जाएगी। समझदार युवाओं को आंदोलन का नेतृत्व हाथ में लेना चाहिए। अनीति का मुकाबला नीति से करना है। नया नेतृत्व तैयार करना है। जनता हमेशा साथ देगी। अन्ना के पास समय कम है। राजनीतिक दलों के पास अब जीवट वाले, सच्चरित्र नेता नहीं हैं।

 

भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष की शुरूआत हो गई है। मुद्दे अनेक हैं। 60 साल में लोकतंत्र के नाम पर भ्रष्टाचार की फसलें ही काटी गई हैं। अब फिर से देश जागा है। फिर नींद न आ जाए। आपका भविष्य आपके हाथ में रहना चाहिए। जो इससे खिलवाड़ करे, चाहे नेता, अघिकारी, उद्योगपति, शिक्षक या कोई भी, तो अन्ना टीम निपटा दे उसे।

 

लोकतंत्र के बारे में 45 साल पहले ओशो ने कहा था- ‘हिन्दुस्तान की एक जलती समस्या है पाखंड, सब तरह का पाखंड। जो व्यक्ति पक्का अहंकारी है, वह हाथ जोड़कर कहता है, मैं तो कुछ नहीं हूं, आपके पैर की धूल हूं। वह भीतर तिजोरी बड़ी करता जा रहा है, वस्त्र सादे पहने हुए है। पैदल चलता है और विदेशों में धन जमा करता है। यहां बैठकर चरखा कात रहा है। बहुत अजीब मामला है।’

 

लोकतंत्र तभी सार्थक होता है जबकि नियंत्रण लोक के द्वारा होता है। जनता का और जनता के लिए क्या होता है, वह तो इस सरकार ने खूब साबित कर दिया। इस सारे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम के लिए प्रधानमंत्री को देश से क्षमा मांगनी चाहिए और भविष्य के प्रति देशवासियों को आश्वस्त भी करना चाहिए।

 

गुलाब कोठारी

सितम्बर 2, 2011

अन्याय

इस जगद्गुरूदेश की संस्कृति को किसी की नजर लग गई है। कैसी-कैसी अनहोनी घटनाएं हो रही हैं। अभी तो अन्ना हजारे की क्रांति आधे रास्ते ही पहुंची है। इस बीच एक और कानून-क्रांति के अंकुर फूट रहे जान पड़ते हैं। राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी देने के मुद्दे पर तमिलनाडु उच्च न्यायालय ने 8 सप्ताह की राहत दे दी।

 

शायद उसका दिल मुख्यमंत्री जयललिता के उस करूण रूदन से पसीज गया, जब उन्होंने कहा था कि, राज्य सरकार के पास सहायता करने का कोई उपाय नहीं है। ऎसा लग रहा है कि, जयललिता इस मुद्दे को कावेरी जल विवाद की तरह क्षेत्रीयता के तराजू पर तोल रही हैं, जबकि अपराधी की कोई जाति, धर्म या राज्य नहीं होता। वह अपराधी ही होता है। लगता यह भी है कि मुख्यमंत्री प्रवाह में बह गई अन्यथा ऎसे मामलों में वह हों या अन्य कोई, होना यह चाहिए कि, सम्बंघित संस्था तक सरकार या संगठन अपनी बात पहुंचा दे और जो भी निर्णय हो उसे माने। उसकी अवहेलना करने की कोशिश कभी नहीं हो, कहीं नहीं हो।

 

तमिलनाडु उच्च न्यायालय का फैसला संविधान की मर्यादा का उल्लंघन करता जान पड़ रहा है, इसके कारण विभिन्न प्रदेशों में एक नई बहस छिड़ गई है जो कि देश के लिए नासूर का काम करेगी। जिस मुद्दे पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने, अपना फैसला दे दिया, मंत्रिमण्डल ने हरी झण्डी दे दी, महामहिम राष्ट्रपति ने ‘क्षमा’ करने से इंकार कर दिया, उसके बाद क्या किसी भी प्रदेश के उच्च न्यायालय को यह अघिकार रह जाता है कि, इन सब उच्च संवैधानिक संस्थाओं की अवज्ञा कर सके? क्या सर्वोच्च न्यायालय की यह अवमानना नहीं, जिसको जन लोकपाल बिल से बाहर रखने के लिए इतना संघर्ष चल रहा है? क्या देश के राष्ट्रपति पद का अपमान नहीं है यह?

 

इसी फैसले की प्रतिक्रिया स्वरूप ही तो जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री ने यह कह दिया कि, यदि जम्मू-कश्मीर विधानसभा भी तमिलनाडु की तर्ज पर अफजल गुरू को लेकर ऎसा ही कोई प्रस्ताव पारित करती तो उस पर भी इसी तरह की मूक प्रतिक्रिया होती? हर्गिज नहीं! क्या इस वक्तव्य का अर्थ देश के कर्णधारों को समझाना पड़ेगा? आज पंजाब में भी सिख संगठनों की ओर से ऎसा ही प्रश्न उठाया गया।

 

जिस पर पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर युवक कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष मनिंदर जीत सिंह बिट्टा पर प्राणघातक हमला (जिसमें 9 लोगों की मृत्यु हो गई) करने के आरोपी देवेन्दर पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा माफ करने की अपील की है। अचरज की कोई बात नहीं है कि तमिलनाडु की तरह यहां भी कांग्रेस और अन्य संगठनों के नेता इस अपील पर उनके साथ हंै। गुजरात सरकार में मंत्री रहे हरेन पण्डया की हत्या का मामला भी ऎसा ही है जिसमें सरकार स्वयं पुनरीक्षण याचिका दायर करने की बात कह रही है।

 

अगर हर प्रदेश अपने-अपने मुद्दों/ अपराघियों को फांसी की सजा से बचाने के लिए ऎसे कदम उठाएगा, तब क्या राष्ट्र के विखण्डन का रास्ता नहीं खोलेगा? देश में अभी 22 मामले अटके हैं, फांसी के। और बरस लग गए इन पर निर्णय होते-होते। कभी वोट की राजनीति बीच में आ जाती है, तो कभी भाषा या क्षेत्रीयता। देश की प्राथमिकता सदा ही पिछली सीट पर बैठी नजर आती है।

 

क्या वोट मांगने वाले संविधान की रक्षा नहीं करेंगे? क्या वोट मांगने का अन्य लक्ष्य भी है? चीन की संसद पर कोई हमला कर दे तो क्या हमलावर 24 घंटे जीवित रह सकते हैं? किसी देश के प्रधानमंत्री रहे व्यक्ति के हत्यारों को बचाने के लिए, उसी देश का, कोई नागरिक आगे आ सकता है, यह बात तो सोच के दायरे के भी बाहर है। ऎसे नागरिकों के विरूद्ध तो देशद्रोह का मुकदमा चलाना भी वाजिब होगा।

 

देश के मुख्य न्यायाधीश भी चुप हंै, केन्द्र सरकार और यहां तक कि, राष्ट्रपति भवन भी मौन है? लगता है कि, नागरिक भी गलत सोच रहे हैं। अन्ना हजारे को भी इसमें भ्रष्टाचार अथवा असंवैधानिकता की दुर्गध नहीं आई। सर्वोच्च न्यायालय को तुरंत प्रभाव से ऎसे न्यायाधीशों के खिलाफ कदम उठाने चाहिएं ताकि ऎसे दुस्साहस को अंकुरित होते ही कुचला जा सके वर्ना यह अमरबेल लोकतंत्र को भी लील जाएगी!

 

गुलाब कोठारी

सितम्बर 7, 2011

चिकित्सा में विकल्प तो हो!

अंग्रेजियत का भूत इस देश की आत्मा को दिन-प्रतिदिन चट किए जा रहा है। इस देश की नीतियां संस्कृति, परम्परा अथवा जीवनशैली को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जातीं। न आम आदमी की आर्थिक स्थिति के परिपे्रक्ष्य में बनाई जाती हैं। आज तो एक श्रेणी विशेष के लोगों की चर्चा अथवा विदेशी परिवेश को ध्यान में रखा जाता है। देशवासियों के प्रति हमारे नीतिकार संवेदनशील नहीं हैं। हमारी विरासत से भी नीतिकार अनभिज्ञ होते हैं, क्योंकि इनके शिक्षण-प्रशिक्षण में भारतीयता अल्पतम ही होती है। इनके सपने भी भोगवादी संस्कृति का ही प्रतिनिघित्व करते हैं।

 

उदाहरण के लिए हमारे यहां कहा जाता है- ‘पहला सुख निरोगी काया।’ इस विषय में भारत का आयुर्वेद और अष्टांग योग आज भी सम्पूर्ण विश्व में छाया हुआ है। सिवाय हमारी शासन व्यवस्था के। आधुनिक चिकित्सक तो इनको शत्रु मानते हैं। इनमें भौतिकवाद के समावेश को स्थान नहीं है। अत: आज तो शिक्षित-स्नातक वैद्य भी इस ज्ञान से दूर होते जा रहे हैं।

 

प्रश्न यह नहीं है कि कौन सी पद्धति सही है या गलत, प्रश्न यह है कि कौन सी पद्धति आम आदमी तक सुलभ हो सकती है। उसकी सीमा में हो सकती है और उसकी जीवनशैली से जुड़कर उसे निरन्तर स्वस्थ रख पाने में सफल हो सकती है। हमारा देश बड़ा भी है, आर्थिक दृष्टि से पश्चिम की तरह सम्पन्न भी नहीं है। अत: किसी भी एक पद्धति के भरोसे सवा सौ करोड़ लोगों को स्वस्थ नहीं रखा जा सकता। हमें एक से अघिक पद्धतियों को मान्यता देनी चाहिए। उनकी शिक्षा, शोध, प्रशिक्षण एवं व्यवसायीकरण की भी व्यवस्था करनी चाहिए। वैकल्पिक चिकित्सा का क्षेत्र भी आज बहुत बड़ा और वैज्ञानिक हो गया है। इसमें भी कई प्रकार के शोध होते रहते हैं। कई देशों में इनको शिक्षा में शामिल कर लिया है। डिग्रियां दी जाती हैं, सरकारी मान्यता प्राप्त हैं।

 

कहने को तो हमारे देश में आयुर्वेद चिकित्सा प्रचलन में है। किन्तु सरकार या उसके नीति निर्घारक मन से ऎसा करते नहीं हैं। वे रसोई की सामग्री, वर्षो के अर्जित ज्ञान का उपयोग होते भी देखना नहीं चाहते। कोई भी सरकार ईमानदारी के साथ आयुर्वेद का विकास नहीं चाहती। जड़ी-बूटियों में मिलता क्या है? वैद्यों की जीवनशैली से जान जाएंगे। आधुनिक चिकित्सा को विकास के साथ जोड़कर बड़ा उद्योग बना दिया। चारों और धन की बरसात हो रही है। शिक्षा, दवा खरीद, जांच (टेस्ट) आपरेशन आदि सभी रास्ते कुबेर के घर पर मिलते हैं। भले ही देश के अघिकांश नागरिक चिकित्सा के अभाव में पीडित रहें या मर जाएं। सदा ही मरते रहे हैं अथवा भाग्य में लिखाकर लाए हैं।

 

क्या लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार का इस ओर कोई दायित्व नहीं है? क्या मात्र कागजी योजना बनाकर रस्म अदायगी कर देना काफी है? क्या शेष भारत के लिए सस्ती, वैकल्पिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना सरकार का कार्य नहीं है? क्या संविधान में केवल पाश्चात्य चिकित्सा या एलोपैथी की अनिवार्यता है? क्या प्राकृतिक चिकित्सा, प्राणायाम, योग, आयुर्वेद, चुम्बक, ध्वनि, गंध आदि प्रामाणिक चिकित्सा, एक्यूप्रेशर/पंचर/मेजोशियात्सु जैसे प्रचलित चिकित्सा ज्ञान का समावेश नहीं किया जाना चाहिए? क्यों आम गरीब, महंगाई से त्रस्त और अभावग्रस्त व्यक्ति को एक ही पद्धति से इलाज कराने के लिए कोई भी सरकार बाध्य करे? क्या चीन, जापान, कोरिया जैसे देशों ने अपनी-अपनी चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक स्वरूप नहीं दिया है? वे भी एलोपैथी की टक्कर में खड़े हैं। स्वास्थ्य प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ा विषय है। प्रकृति से भी जुड़ा है, भौतिक जीवन चर्या से भी।

 

शरीर को मन, बुद्धि और आत्मा का दर्पण मानकर रोगों पर विचार होता है। प्राणों की क्रियाएं, मन की भावनाएं आदि को भी रोग का कारण माना है। मन-प्राण-वाक्, ऋक्-यजु-साम, सत-रज-तम, वाक-पित्त-कफ आदि के आधार पर निदान और चिकित्सा के नियम बने हैं। हम किसी एक चिकित्सा पद्धति को इतने बड़े देश पर नहीं थोप सकते। नित्य स्वस्थ रहने की अवधारणा में चिकित्सा कहीं भी जुड़ी नहीं होनी चाहिए, तब योग के बारे में विचार करने की आवश्यकता पड़ती है।

 

स्कूलों और महाविद्यालयों में यदि योग के साथ वैकल्पिक विषयों का ज्ञान उपलब्ध कराया जा सके, तो चिकित्सा की समस्या को काफी हद तक निपटाया जा सकता है। चिकित्सा के लिए भी हर सरकार को पहले परम्परागत पद्धति की शिक्षा देनी चाहिए, जिसको गरीब तथा अनपढ़ भी जानता है। शायद किसी ने इस स्थिति का सर्वे नहीं किया कि एक पद्धति की चिकित्सा के कारण कितने लोगों के बर्तन तक बिक गए और आदमी को भी नहीं बचा सके। सेवा कहलाने वाले इस पेशे ने आज विकल्प के अभाव में शुद्ध व्यापारिक स्वरूप ग्रहण कर लिया है। चारों ओर दलाल खड़े हो गए। गांवों से मरीज पकड़ने के लिए भी दलाल हो गए हर गांव में।

इस स्थिति में आम आदमी सुरक्षित नहीं है। विशेष रूप से आर्थिक पक्ष के परिप्रेक्ष्य में। क्या सरकार गरीबों को सस्ते उपाय देना ही नहीं चाहती? क्या सरकार के हिसाब से गरीब का तो मर ही जाना उचित है। न सरकार अस्पताल खोल सकती, न डाक्टर भेज पाती, दवाईयां मरीज स्वयं लेकर आता है। ऊपर से डाक्टर तो देखने की फीस लेता है।

 

गांवों में तो यह सब है ही नहीं। ग्रामीण किसी दवा के बारे में कुछ जानता नहीं। स्वतन्त्र रूप से निरोग रहने वाला व्यक्ति आज कितना पराश्रित हो गया है। केवल इसलिए कि कोई भी सरकार न उसकी जीवनशैली की, आर्थिक स्थिति, परम्परा तथा न चिकित्सा की उपलब्धता का ध्यान करती है। यदि देश के हर व्यक्ति को निरोग रखना है, उसकी सोच एवं स्थिति के अनुरूप सम्मान से कार्य करना है तो उसे अनेक विकल्प देने होंगे। वह स्वयं तय करे कि उसे कौन सा विकल्प चुनना है। हमारे लिए सभी विकल्प अपने-अपने स्वरूप में उपयोगी हैं। हर विकल्प के लिए शोध, विकास, प्रसार, प्रयोग, सुविधाएं आदि उपलब्ध करानी होगी।

 

इसका एक बड़ा लाभ यह भी होगा कि हर वैकल्पिक चिकित्सा के लिए व्यक्ति को इतनी महंगी पढ़ाई भी नहीं करनी पड़ेगी। न डाक्टरों और अस्पतालों पर इतना अघिक दबाव ही रहेगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी एक नया आयाम जुड़ेगा। मध्यम एवं निम्न वर्ग को बड़ी राहत भी मिल पाएगी। अनेक पद्धतियां आसानी से गांवों तक पहुंच जाएंगी। कई तो ऎसी भी हैं जिनमें बिजली तक की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।

 

कई जनजीवन से जुड़ी तो हैं, किन्तु उनका ज्ञान व्यवस्थित नहीं है। सरकार के जरा से प्रोत्साहन से देश स्वस्थ हो सकता है। दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए बस। वरना ये व्यापारी आपका आश्रय पाकर उन्मुक्त बने रहेंगे। सेवा के नाम पर संवेदनहीन ही बनेंगे क्योंकि आप जनता को कोई विकल्प नहीं देना चाहते। सरकार चाहें तो स्वर्ग का निर्माण कर लें, या फिर नर्क तो है ही। ये ही सरकार का योगदान माना जाएगा। आज तो न जीने के लिए विकल्प है, न ही मरने के लिए।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

 

सितम्बर 10, 2011

समय की धार

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भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी में मंथन का जो क्रम चलाया उसे पानी बिलौने से अधिक नहीं कहा जा सकता। गडकरी इससे कौन से मक्खन की उम्मीद कर रहे हैं। भाजपा में तथा भाजपा नेताओं के बारे में जो भी निर्णय लिए गए, उसमें लोकतंत्र कहीं केन्द्र में दिखाई नहीं देता। सारी बैठकों पर खर्च तो जनता का धन ही हो रहा है और लोकतंत्र प्रतिबिम्बित नहीं होना पार्टी के राजनीतिक कद को छोटे से छोटा किए जा रहा है। पार्टी में संख्याबल के आगे सिद्धांत गौण हो गए। छोटी सी तृणमूल पार्टी ने जो करके दिखाया, वह भाजपा के लिए सबक हो जाना चाहिए। केवल भ्रष्टाचार के विरूद्ध नारे लगाने से पार्टी का सम्मान नहीं होने वाला। न ही आडवाणी के जेल चले जाने या रथयात्रा से दिलों में जगह बनने वाली है। सम्मान प्राप्त करने का एक ही मार्ग है- चाहे सत्ता में हो या विपक्ष में ईमानदारी से अपनी भूमिका का निर्वहन करना। आज तो धारणा यह बन चुकी है कि भाजपा कांग्रेस से मिली हुई है। तब उसके साथ भी वही व्यवहार किया जाएगा, जो कांग्रेस के साथ अन्ना हजारे ने किया है। लोग चुनाव के पहले ही समेट देंगे।

कर्नाटक का घटनाक्रम भाजपा के लिए दु:खान्तिका ही साबित होगा। जिस प्रकार सुषमा स्वराज और वेंकैया नायडू के नाम चर्चा में आए हैं, वे भविष्य की ओर कुछ और ही संकेत कर रहे हैं। भाजपा में ब्राह्मणवाद और राजपूतवाद के जो घुन लगे हैं, वे भी कोंकणी घुनों से कम नहीं हैं। अब उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पद को लेकर फिर उथल-पुथल हो रही है। बी.सी. खण्डूरी का नाम फिर से ऊपर चल रहा है। यदि यह सच हो जाता है, तो भाजपा के सामूहिक विवेक पर भी प्रश्न चिह्न लग जाएगा। जिस भ्रष्टाचार के कारण खण्डूरी को हटाया गया, उसी खण्डूरी को दूसरे के भ्रष्टाचार के कारण ईमानदार मुख्यमंत्री के रूप में पुन: प्रतिष्ठित किया जा रहा है। यह भी सिद्ध हो जाएगा कि भाजपा की आंख में लोकहित के अलावा भी कुछ और है। झारखण्ड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है। हो सकता है यहां भी पार्टी चुनाव के कुछ समय पहले मंथन करने लगे। जैसा कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में कर रही है। मिलेगा कुछ नहीं।

उधर सोनिया गांधी की वापसी से चर्चाओं का एक नया दौर चलेगा। बीमारी की जानकारी देश को है। सब जानते हैं, अब उनकी सक्रियता पहले जैसी दिख पाना मुश्किल रहेगी। ऎसे में यह भी हो सकता है कि वह ताबड़तोड़ में राहुल गांधी को प्रतिष्ठित कर दें। जो भी होगा अचानक होगा।

इस परिप्रेक्ष्य में भाजपा क्या भूमिका निभा पाएगी देश के सामने? आज कांग्रेस और भाजपा दोनों के पास राजनेता नहीं हंै। राज्यों में भी भ्रष्टाचार चरम पर है। कोई भी जन प्रतिनिधि सत्ता में आकर देश के लिए कुछ करना ही नहीं चाहता। स्वयं को ही देश मानता है। जिस प्रकार नेताओं के भ्रष्टाचार सामने आ रहे हैं, युवा वर्ग का विश्वास डगमगा रहा है, दलों में भी फूट और अस्थिरता बढ़ती जा रही है, पुलिस और न्यायपालिका सत्ता की ओर देख रही है, उस हाल में भाजपा की बौखलाहट अक्षमता ही प्रकट करती है। भविष्य को मानो देखने की बात ही नहीं रह गई। अच्छा तो यह होगा कि जिन नेताओं के विरूद्ध पार्टियां निर्णय करने से कतराती हैं, उनके लिए जनमत संग्रह करके उन्हें आईना दिखा दिया जाए।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 11, 2011

रूप-2

हमने देखा कि भू-पिण्ड का भाग शरीर बनाता है। चन्द्रमा का अंश मानव का मन कहलाता है। बुद्धि सूर्य से आ रही है। जो आत्मा है वह अव्यक्त है। इसी को मनु तžव कहा है, जिसके विकास से ही ‘मानव’ शरीर का नाम मानव हुआ। आत्मा-बुद्धि-मन-शरीर, इन चारों की समन्वित अवस्था का नाम मानव है। मानव योनि को सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ योनि कहा गया है।

 

क्योंकि इसी में रहकर व्यक्ति कर्म करता है। कर्म को लक्षित कर सकता है। शेष योनियां नर्क-त्रिर्यच-देव आदि भोग योनियां कही गई हैं। इनमें व्यक्ति कर्म-फल भोगकर जीता है। मानव योनि में कर्म एवं चिन्तन की स्वतंत्रता इसको विशिष्ट योनि बना देती है। शरीर, मन और बुद्धि में अनेक प्राणी मानव से आगे हो सकते हैं, किन्तु आत्म भाव के साथ इन तीनों को जोड़कर कर्म करना केवल मनुष्य की ही विशिष्टता है।

 

मनुष्य योनि को ही आत्म दर्शन का लक्ष्य भी प्राप्त है। धर्म को समझकर, धारण करके, जीवन की कामनाओं को अर्थ के सहारे पूरी करता हुआ पुनर्जन्म के चक्र से बाहर निकल सके। इसके लिए मानव आकृति-प्रकृति एवं अहंकृति विशिष्ट रूप लिए हुए है। बाहर और भीतर के जीवन को केवल मानव ही आत्म भाव के सहारे संतुलित कर सकता है।

 

माया एवं पुरूष के संघर्ष की योनि है मानव। पुरूष छटपटाता है मुक्त होने को और माया चाहती है अपना साम्राज्य। तभी माया को इतनी सुन्दर, देव-स्वरूप आकृति दी है कि व्यक्ति उसमें अटका ही रहे। यही आकृति असुर संहार के लिए भी उपयोगी होती है। जब व्यक्ति का दृढ़ संकल्प स्पष्ट हो जाता है-मुक्ति के लिए, तब माया भाव भी समर्पण कर देता है। सहयोगी बन जाता है। तब शरीर गौण हो जाता है।

 

भावनात्मक धरातल का श्रद्धात्मक संप्रेषण शुरू हो जाता है। वही माया पुरूष को आवरणों से मुक्त करती है। मातृ रूप में किस प्रकार उसकी विदाई की तैयारियां करवाती हैं, किस प्रकार नए आवरणों और बन्धनों से बचाती हुई, मीरां बनकर पुरूष से एकाकार हो जाती है। क्या मीरां को देखकर किसी के मन में जरा भी वासना का संचार हो सकता है? यही आकृति की शुद्धता हर प्राणी के आभामण्डल को शुद्ध करती है। लोक कल्याण के स्पन्दनों का प्रसार करती है। इसी आकृति में मनुष्य अपनी प्रकृति का प्रतिबिम्ब देखता हुआ अपनी अहंकृति की गांठें खोल सकता है। अपने आत्म भाव में प्रविष्ट हो सकता है। कामनाओं से मुक्त हो सकता है।

 

रूप के साथ अन्य तथ्य भी जुडे हैं। एक-इसके देखने के लिए नेत्र या चक्षु की जरूरत पड़ती है। दो-प्रकाश की उपस्थिति में ही रूप को देखा जा सकता है। अंधकार में सारे स्वरूपों एवं आकृतियों के भेद समाप्त हो जाते हैं। सारी गतियां ठहर जाती हैं। इसी का तो नाम प्रलय है। रात्रि प्रलय है।

 

प्रकाश सारा सूर्य से जुड़ा है। अंगिरा तžव भी हमें सूर्य से प्राप्त होता है। सृष्टि की सभी आकृतियां भी अगिA रूप हैं। यहां तक कि जो आकृतियां सौम्य जान पड़ती हैं, वे भी अगिA रूप ही होती हैं। सूर्य हमारा पिता है, बीज रूप है। अत: अहंकृति भी सूर्य से ही जुड़ी होती है। प्रकृति का मूल कार्य क्षेत्र मन है। अत: प्रकृति का जुड़ाव चन्द्रमा से बना रहता है। सूर्य की कलाएं परिवर्तनशील नहीं हैं। मन सदा चन्द्रमा की कलाओं के साथ बदलता रहता है। यह बदलने का गुण ही जीवन यात्रा का लक्ष्य तय करता है। इसी कारण प्रकृति को बदलकर आकृति और अहंकृति में परिवर्तन लाया जाता है।

 

आत्मा को आवरणमुक्त किया जा सकता है। बदलती कलाएं भी मन को चंचल बनाती हैं और सुन्दरता का पुजारी भी। इनके स्पन्दनों का प्रभाव भी आकृति को प्रभावित करता है। शब्दों के स्पन्दन भी शरीर में बदलाव का कारण बनते हैं। जो हम बोलते हैं, वे शब्द भी, तथा जो हम सुनते हैं, वे ध्वनियां भी। तब संगीत, भक्ति, उपासना, प्रार्थना आदि का महत्व समझ में आता है। भले लोगों को पहचानने में भूल हो सकती है, किन्तु आसुरी रूप दूर से ही समझ में आ जाता है। उसको देखते ही हमारा मुंह बिगड़ जाता है।

 

शरीर सिकुड़ जाता है। इसका अर्थ है कि हमारी आकृति हमारे कार्यों से भी प्रभावित होती है, वहीं दूसरों के व्यवहार से भी। सरल आत्माओं की आकृति सदा मोहक लगती है। बिना किसी सौन्दर्य प्रसाधन के। रूप की सुन्दरता का यही रहस्य है। व्यक्ति जैसे यथार्थ को छिपाकर जीता है, वैसे ही रूप को प्रसाधनों से ढकता है। सही स्वरूप भी दिखाना नहीं चाहता। जबकि सबसे पहले तो मेकअप ही दिखाई देता है। झूठ का प्रमाण-पत्र ही तो है। बड़े घरों में छिपाने को ज्यादा होता है।

 

रूप कान्ति से चमकता दिखाई देता है। आभामण्डल की शुद्धता से दिव्य जान पड़ता है। प्राणवान विचार और लोकहित के भाव ही हैं जो रूप को मानवीय धरातल से ऊपर उठाते हैं। मोह पैदा करने वाला रूप यहां पहुंचकर व्यक्ति को रूपातीत होने में सहायक बन जाता है। साथ में यदि गुणातीत करने वाले गुरू का सान्निध्य मिल जाए तो शेष रह ही क्या जाएगा।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

सितम्बर 13, 2011

अंतरजातीय विवाह की उलझन

हमारा देश आज एक ऎसे मार्ग पर चल पड़ा है जिसकी परिणति दुख के सिवाय कुछ और नहीं है। हर व्यक्ति उस मार्ग पर चलकर गौरवान्वित महसूस करता है। उसके पास कोई विकल्प भी नहीं है। हमारे सामने तथ्य हैं, सारे आंकड़े हैं, दर्शन है, अनुभव हैं, किन्तु हमारा अहंकार या लाचारी हमें इनमें से किसी को स्वीकारने नहीं देती। समाज और परिवारों में अनावश्यक तनाव, वैमनस्य बढ़ता जा रहा है। यह नया रोग है अन्तरजातीय विवाह।

 

इसको विकासवादी दृष्टिकोण की पैदाइश माना तो जाता है, किन्तु जीना उनके बीच पड़ता है, जिनके दिलो-दिमाग पर विकास पहुंचा ही नहीं है। प्रेम का रिश्ता कितनी सहजता से कट्टरता की भेंट चढ़ जाता है, यह दृश्य देखकर कितने लोग खुश हो सकते हैं, यह भी मानव समाज की त्रासदी ही है। क्योंकि भारत में यह पीड़ा या मुसीबतों का पहाड़ मूल रूप में तो कन्या पक्ष के सिर टूटता है।

 

पिछले सप्ताह कर्नाटक के धर्मस्थल गया था। एक ब्राह्मण लड़के की शादी अन्य जाति की कन्या से इसलिए की गई कि ब्राह्मण जाति में उपयुक्त कन्या नहीं मिली। एक साल के बाद लड़के ने लड़की को छोड़ दिया। वह लड़की न्याय की तलाश में आध्यात्मिक चेतना के साथ सामाजिक जनजागरण में जुटे वीरेन्द्र हेगड़े के पास आई थी।

 

आज शिक्षा की आवश्यकता और भूत ने इस समस्या में ‘आग में घी’ का काम किया है। भौतिकवाद, विकासवाद, स्वतंत्र पहचान, समानता की भ्रमित अवधारणा आदि ने व्यक्ति को शरीर के धरातल पर भी लाकर खड़ा कर दिया और अपने जीवन के फैसले मां-बाप से छीनकर अपने हाथ में लेने शुरू कर दिए। अधिकांशत: माता-पिता उसके मार्गदर्शक बनते नहीं जान पड़ते।

 

चूंकि शिक्षा नौकरी के अतिरिक्त अधिक विकल्प नहीं देती, अत: परिवार का विघटन अनिवार्य हो गया। दादा-दादी बिछुड़ गए। नई बहुएं सास-ससुर से भी मुक्त रहना चाहती हैं, तो बच्चों को संस्कार देने से भी। स्कूल, होम वर्क के सिवाय बच्चों के लिए उसके पास न समय है, न ही वह ज्ञान जिससे बच्चों का व्यक्तित्व निर्माण होता है। शिक्षा ने उसके मन को भी समानता के भाव के नाम पर यहां तक प्रभावित कर दिया कि वह ‘मेरे घर में लड़के-लड़की में कोई भेद नहीं है’ का आलाप तार स्वर में गाती है। इससे कोई अधिक क्रूर मां धरती पर कौन होगी जो अपनी बेटी को स्त्री युक्त, मातृत्व, गर्भस्थ अवस्था आदि की भी जानकारी नहीं देती, क्योंकि बेटे को भी नहीं देती। बेटी को अंधेरे में धक्का देकर गौरवान्वित होती है। बेटे को तो पूरी उम्र मां-बाप की छत्रछाया में रहना है। मां बनना नहीं है। नए घर में जीना नहीं है।

 

इस जीवन-शिक्षा के अभाव में न जाने कितने संकट हो रहे हैं। बच्चों को यथार्थ का ज्ञान नहीं होता और मित्र मण्डली के प्रवाह में जीना सीख जाते हैं। उच्च शिक्षा की भी अवधारणा हमारे यहां नकारात्मक है। बच्चों का शिक्षा के साथ उतना जुड़ाव भी नहीं होता, जितना विदेशों में दिखाई देता है। हां, शिक्षा के नाम पर अधिकांश बच्चों को उन्मुक्त वातावरण रास आता है। फिर कुदरत की चाल। उम्र के साथ आवश्यकताएं भी बदलती हैं। भूख लगी है और भोजन भी उपलब्ध है, तब व्यक्ति कितना धैर्य रख सकता है? मां-बाप बच्चों को भूखा रखते हैं।

 

संस्कारों का सहारा नहीं देते। उधर टीवी, इण्टरनेट इनको दोनों हाथों से शरीर सुख परोसने में लगे हैं। मन और आत्मा का तो धरातल ही भूल गए। शुद्ध पशुभाव रह गया। आहार-निद्रा-भय-मैथुन। और कुछ बचा ही नहीं जीवन में।

 

भारत में कुछ सीमा तक जो संस्कृत समाज हैं, उनको छोड़ दें। शेष अपने जीवन में इस पशुभाव पर नियंत्रण नहीं कर पाते। आज तो स्कूल में ही बच्चे 17-18 साल के हो जाते हैं। कक्षाओं से गायब रहते हैं। तब एक मोड़ जीवन में ऎसा आता है कि नियंत्रण भी छूट जाता है और विकल्प भी खो जाते हैं। ये परिस्थितियां ही इस अन्तरजातीय विवाह की जननी बनती हैं।

 

अन्तरजातीय विवाह में यूं तो खराब कुछ नहीं दिखाई देता। जिसको दिखाई देगा वह दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख है। जब लड़का-लड़की दोनों राजी हैं, तब किसी को अच्छा-बुरा क्यों लगना चाहिए? लेकिन जो कुछ नजारा अगले कुछ महीनों में सामने आता है, उसे देखकर मानवता पथरा जाती है। सारा समाज बीच में कूद पड़ता है। अनेक बाध्यताएं, जिनमें धर्म परिवर्तन तक की भी हैं, अपने मुखौटे दिखा-दिखाकर चिढ़ाती हैं। कट्टरता, संकीर्णता और निर्दयता से सारा वातावरण कम्पित हो जाता है। लड़की के मां-बाप की स्थिति बयान करना सहज नहीं है।

 

लड़की भी हजार गलतियां करने के बाद भारतीय है। मन में कुछ लज्जा का भाव होता है। जब किसी सभ्य परिवार की लड़की असभ्य परिवार से जुड़ जाती है, तब तो ताण्डव ही कुछ और होता है। किसी असभ्य परिवार की लड़की सभ्य और समृद्ध परिवार में चली जाती है, तब एक अलग तरह के अहंकार की टकराहट शुरू हो जाती है। जिन जातियों में नाता होता है, वहां मन कोई मन्दिर नहीं रह जाता। लड़की के दो-तीन तलाक हो जाएं तो लाखों का किराया वसूल लेते हैं मां-बाप। ऊपर से कानून एकदम अंधा। परिस्थितियों की मार से दबे मां-बाप के लिए कानून भी भयावह जान पड़ता है।

 

आज न्यायालयों में विवाह विच्छेद के बढ़ते आंकड़े इस देश के सामाजिक तथा पारिवारिक भविष्य को रेखांकित करते हैं। जीवन विषाक्त होता दिखाई पड़ रहा है। पश्चिम में सम्प्रदायों तथा जातियों की इस प्रकार की वैभिन्नता भी नहीं है और है तो भी ऎसी कट्टरता दिखाई नहीं देती। वहां पैदा होने वाले व्यक्ति को जीवन में दो-तीन शादी कर लेना मान्य है। हम अभी अर्घविकसित हैं। विकास का ढोंग करते हैं। भीतर बदले नहीं हैं। परम्पराओं और मान्यताओं की जकड़ से मुक्त भी नहीं हैं। फिर भी हम विकसित समाजों के पीछे दिखना भी नहीं चाहते। विदेशों में उच्च शिक्षा का कारण सुख प्राप्ति है।

 

स्वतंत्रता भी है और स्वावलम्बन भी। भारत में लड़कियों को उच्च शिक्षा सुख प्राप्ति के लिए नहीं दी जाती, बल्कि इसलिए दी जाती है कि खराब समय (वैधव्य या विवाह विच्छेद) की स्थिति में पराश्रित न रहे। नकारात्मक चिन्तन ही आधार होता है। तब समझौते का प्रश्न किसी के मन में उठता ही नहीं है। हम जब तक इस लायक हों कि यथार्थ को स्पष्ट समझ पाएं, हमारे यहां कुछ विकासशील कुण्ठाएं संस्कृति विरोधी कानून भी पास करवा लेती हैं। एक कहावत है कि हम अपने दुख से उतने दुखी नहीं हैं, जितने कि पड़ोसी के सुख से।

 

मात्र कानून बना देना विकास नहीं है। अभी मन्दिर-मस्जिद के झगड़ों से हम बाहर नहीं आए। आरक्षण ने जातियों के नाम पर अनेक विरोध के स्वर खड़े कर दिए। जब हमारी सन्तान हमारे साथ किसी जाति के विरोध में लड़ती है, हिंसक हो जाती है, तब क्या वह लड़का विरोधी जाति की लड़की का पत्नी रूप में सम्मान कर सकेगा।

 

अथवा ऎसा होने पर जातियों के बीच नए संघर्ष के बीज बोये जाएंगे? क्या समाज का यह दायित्व नहीं है कि यदि किसी सम्प्रदाय को वह स्वीकार नहीं करता, तो अपने बच्चों को भी शिक्षित करे? क्या विरोधी समाज की लड़की का अपमान करके अपनी बहू के प्रति उत्तरदायित्व के बोध का सही परिचय दे रहे हैं? क्या यह पूरे समाज का अपमान नहीं है? आज जीवन एक दौड़ में पड़ गया है।

 

एक होड़ में चल रहा है। स्पर्धा ने मूल्यों को समेट दिया है। नकल का एक दौर ऎसा चला है कि व्यक्ति की आंख खुद के जीवन के बजाए दूसरे पर टिकी होती है, जिसकी वह नकल करना चाहता है। जैसे कि शिक्षित लड़कियां भी लड़कों की नकल करना चाहती हैं। अत: लड़कियों के गुण ग्रहण ही नहीं करतीं। लड़का बन नहीं सकतीं। अत: यह आदमी की हवस का पहला शिकार होती हैं। भले ही इस कारण ऊंचे पदों तक पहुंच भी जाए, किन्तु सुख न इनको मिलता, न ही इनके माता-पिता को। बस, विकास की धारा में बहते रहते हैं।

 

प्रश्न यह है कि यदि हम विकसित हो रहे हैं, शिक्षित हो रहे हैं, तो इसका लाभ स्त्री को क्यों नहीं मिल रहा। शिक्षित व्यक्ति निपट स्वार्थी भी होता जा रहा है और उसे नुकसान करना भी अधिक आता है। अनपढ़ औरतें कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम इसलिए हो गई कि उनको गर्भस्थ शिशु के लिंग की जानकारी उपलब्ध नहीं थी। आंकड़े साक्षी हैं कि ऎसी हत्याओं में शिक्षित महिलाएं अधिक लिप्त हैं और चर्चा भी नहीं होती। ये हत्याएं इस बात का प्रमाण तो हैं ही कि नारी आज भी स्वयं को लाचार और अत्याचारग्रस्त मानती है। अपनी कन्या को इस पुरूष के हवाले नहीं करना चाहती।

 

पुरूष वर्ग का इससे अधिक अपमान हो भी क्या सकता है। अब अन्तरजातीय विवाह ने इस नासूर को नया रूप ही दिया है। लड़का अधिकांश मामलों में मां-बाप के साथ होकर लड़की को अकेला छोड़ देता है। तब उसके लिए मायके लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता। इसके लिए भी उसे अदालतों के और वकीलों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह आत्म-हत्याओं को बढ़ावा देने वाला मार्ग तैयार हो रहा है। यह भी सच है कि व्यक्ति अपना किया ही भोगता है।

 

समाज हर युग में एक-सा रहा है। शिक्षा बाहरी परिवेश है भीतर की आत्मा की शिक्षा, उसका जागरण, परिष्कार आदि जब तक जीवन में नहीं जुड़ेंगे, संस्कारवान मानव समाज का निर्माण संभव नहीं है।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

सितम्बर 14, 2011

माननीय

आदरणीय आडवाणी जी,

सादर प्रणाम,

आप फिर एक रथ यात्रा पर निकल रहे हैं। आपके लिए यह तीर्थाटन है या पर्यटन, मालूम नहीं, लेकिन देश आपसे बहुत से सवाल पूछना चाहता है। उनमें से कुछ मैं इस पत्र के माध्यम से आपके सामने रख रहा हूं। सबसे पहले क्या आपने अपनी पार्टी के नेतृत्व से इस यात्रा की इजाजत ले ली है? या फिर यह आपकी इकतरफा घोषणा है?

 

आपने अपनी यात्रा का आगाज सरदार पटेल की जन्मस्थली से करने का निर्णय किया है, ऎसा सुनने में आया है। अगर ऎसा हुआ तो क्या आप देश के उस सवाल का जवाब देने को तैयार हैं कि कंधार में आईसी 814 के अपहरणकर्ताओं को छोड़ने का फैसला तब हुआ जब आप देश के उपप्रधानमंत्री थे। क्या आपके पास उस सवाल का जवाब है कि आपके गृहमंत्री रहते हुए पुरूलिया हथियार काण्ड के मुख्य अभियुक्त पीटर ब्लीच को क्यों छोड़ा गया? क्या आपको फिरोजाबाद के एहसान अली का नाम याद पड़ता है? इस बीच, एक बात और याद आती है कि उसी गुजरात में पिछले सात साल से आपकी भाजपा सरकार लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं कर पाई है, और आप वहां से सांसद भी हैं। ऎसा बताया गया है कि आपकी यात्रा भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही है। सही है न।

 

फिर शायद आप मध्य प्रदेश जाएंगे। वहां पिछले लोकायुक्त की रिपोर्ट की आपको जानकारी मिली होगी। उसमें डंपर की खड़खड़ाहट आपको सुनने को मिली होगी। इंदौर में भूमाफिया के साथ आपके मंत्रियों की संलग्नता के किस्से भी वहां ही नहीं, दिल्ली में भी किवदंती बन चुके हैं। आपको पत्रिका के साथ-साथ दूसरे अखबारों में भी पढ़ने को मिले होंगे। बगल के छत्तीसगढ़ में आपके अपने कार्यकाल में नक्सलियों के साम्राज्य का कितना विस्तार हुआ, यह आपके गृह मंत्रालय की फाइलों में दर्ज है।

 

छत्तीसगढ़ के पड़ोस में ही झारखंड है। सुना है कि जब वहां पिछले साल दोबारा आपकी सरकार बन रही थी तो आप बहुत विचलित हुए थे। आपको लगा था कि भ्रष्टाचार में डूबे सोरेन के साथ कैसे सरकार बनाई जा सकती है। लेकिन आपने उसे किन परिस्थितियों में बनाना स्वीकार किया यह देश के लिए कौतुहल का विषय है। बिहार में भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का श्रेय आपकी पार्टी से ज्यादा नितीश कुमार को जाता है। उत्तर प्रदेश में आपकी सरकार नहीं है, लेकिन आपको वहां आपकी 1992 की कसम की याद तो जनता दिलाएगी ही। उत्तराखंड में अगर आपको नेतृत्व परिवर्तन का फैसला करना पड़ा है तो इसलिए नहीं कि वहां भ्रष्टाचार सिर के ऊपर से गुजर गया था, बल्कि इसलिए कि वहां आपको जल्दी ही होने वाले चुनावों का सामना करना पड़ रहा है।

 

हरियाणा में स्वर्गीय भजनलाल की पार्टी से समझौता करके आपने अपने कैडर को क्या संदेश दिया है, पता नहीं, लेकिन देश की जनता को समझ आ गया है कि शुचिता के मुकाबले राजनीतिक प्रैग्मेटिज्म आप पर कितना हावी है। पंजाब में आपके अपने मंत्री सीबीआई के शिकंजे में आ चुके हैं। आपकी पार्टी के ही सदस्य खुलेआम बाकी मंत्रियों के बारे में भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाते हैं वे आपको मिल ही गए होंगे। न मिले हों, तो कृपया बताएं, मैं व्यवस्था करने का प्रयास करूंगा। आपके सहयोगी अकाली दल के बारे में तो जितना कहा जाए उतना कम है।

 

कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे मुख्यमंत्री को आपको हटाना पड़ा। लेकिन उनसे भी कहीं ज्यादा विराट भ्रष्टाचार में घिरे रेaी बंधुओं को सरकार में बनाए रखने के लिए पिछले दो साल में आपकी पार्टी ने और स्वयं आपने कितनी मेहनत की यह पूरा देश जानता है। 2009 में तो आपको जन्मदिन का तोहफा ही यह दिया गया था न। जिस दिन तक जनार्दन रेaी को सीबीआई ने जेल नहीं भेजा, उस दिन तक भी उन भाई लोगों को सरकार में बनाए रखने के लिए आपकी पार्टी कितनी जोड़-तोड़ कर रही थी, यह किसी से छिपा नहीं है।

 

संयोग ही है कि उसी राज्य के अनंत कुमार को आपकी यात्रा का संयोजक बनाया गया है। अगर कहीं प्रशांत भूषण को याद आ गया कि उन्होंने अनंत कुमार के खिलाफ 14 हजार करोड़ रूपए के हुडको घोटाले में पीआईएल दायर कर रखी है और कहीं कोर्ट ने नीरा राडिया पर आरके आनंद की किताब से पाबंदी हटा ली तो क्या आपकी यात्रा में खलल नहीं पड़ जाएगा।

 

आपकी पार्टी ने हाल ही में बताया है कि पिछले साल उसे सिर्फ 36 करोड़ रूपए की आमदनी हुई। क्या आपको इस आंकड़े पर विश्वास है। इतने पैसे तो आप नेता लोगों की हवाई यात्राओं पर ही खर्च हो गए होंगे। पर शायद नहीं, वो तो आपके मध्य प्रदेश के सरकारी प्लेन जिसे लोग प्यार से कमल एयर टैक्सी सर्विस कहकर पुकारते हैं, उसके कारण बच गए होंगे।

 

आडवाणी जी, भ्रष्टाचार सिर्फ रिश्वत लेने-देने से ही नहीं होता। भ्रष्ट आचरण भी इसी दायरे में आता है। पार्टी नेताओं के प्रतिभाशाली बेटे-बेटियां पार्टी शासित राज्यों में काम के लिए मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों को किस तरह सीधे फोन करके विभिन्न कायोंü के लिए दबाव डालते हैं, मुख्यमंत्री कार्यालय में अपनी पसंद का ओएसडी लगाने के लिए प्रदेशों की राजधानियों के कितने ही चक्कर लगाते हैं ताकि वे उनकी फाइलों को फॉलो-अप कर सकें, इसकी सूचना भी पार्टी तंत्र को लगती ही रहती होगी।

 

इस यात्रा पर निकलने से पहले आपको कम से कम यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि, जिन-जिन राज्यों से आप गुजरेगे उन राज्यों के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ पार्टी कार्रवाई करेगी। इसके बिना भ्रष्टाचार के खिलाफ आपकी यात्रा का कोई अर्थ नहीं है। वह मुखौटा जैसी रहेगी। कुछ वर्ष पहले का संघ का वह निर्देश तो आपको याद होगा ही कि, कोई आंदोलन करना है तो पार्टी से बाहर आकर करो। तभी हम साथ देंगे। यात्रा पर निकलने से पहले जरा यह भी देख लें कि, पार्टी कार्यकर्ताओं में आपकी छवि आज भी वैसी ही है क्या जैसी बीस साल पहले थी? छब्बे बनने के चक्कर में कहीं दुब्बे जी न रह जाएं।

 

एक बात और, आपकी इस यात्रा पर सुरक्षा व्यवस्था में जो करोड़ों रूपए खर्च होंगे, क्या उसका हिसाब लगाया है आपने। आपके राजनीतिक हितों को साधने के लिए जनता पर करोड़ों रूपए का बोझ डालना क्या आपको अनुचित नहीं लगता।

 

पुनश्च: आपकी पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं को एक बात समझ नहीं आ रही है। कालेधन के बारे में आपके ही एस. गुरूमूर्ति की टास्क फोर्स के दावों पर पहले तो आपने प्रेस कांफ्रेंस की और फिर श्रीमती सोनिया गांधी से माफी मांगकर अपनी ही पार्टी को कटघरे में खड़ा कर दिया। दूसरी तरफ, भ्रष्टाचार के मामले में आपको क्वात्रोची और हसन अली ही क्यों याद आते हैं। शाहिद बलवा का नाम लेते हुए आपकी व पार्टी की जुबान क्यों लड़खड़ा जाती है।

प्रति: श्री मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, महाल, नागपुर

 

गुलाब कोठारी

सितम्बर 17, 2011

चलो, घर चलें!

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राजनेता अपनी “कथनी और करनी” के भेद को कैसे बनाकर रखते हैं, कैसे अवसरवादिता की अभिव्यक्ति होती है, कैसे समय देखकर अपनी बात से पलट जाते हैं, कैसे पल्ला झाड़ लेते हैं आदि प्रश्नों के उत्तर पिछले 72 घण्टों में हमारे समक्ष आ गए। गुरूवार के मीडिया कवरेज में आडवाणी की रथ यात्रा के भरपूर चर्चे रहे। भाजपा और संघ की सहमति के हवाले भी थे। इसी के बीच राजस्थान पत्रिका/ पत्रिका के मुख पृष्ठ पर सम्पादकीय “माननीय” भी प्रकाशित हुआ था। इसे लेकर अभी तक जितने फोन पत्रिका कार्यालयों में, एजेंटों, शुभचिंतकों या परिचितों के जरिए हमें प्राप्त हुए वे सूचना क्रान्ति के युग में भी किसी बाढ़ से कम नहीं थे। इनमें भी आश्चर्यजनक रूप से भाजपा एवं संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भी सम्मिलित थे, जो स्वयं व्यक्तिगत रूप से बधाई भी दे रहे थे और आभार भी ज्ञापित कर रहे थे। जो कार्य भाजपा की केन्द्रीय कार्यकारिणी और भाजपा अध्यक्ष नहीं कर सके, वह कार्य स्वत: ही पटल पर आ गया। पूरे देश ने इस सम्पादकीय के सकारात्मक एवं निष्पक्ष, साहसी स्वरूप को उचित माना। इसके लिए ह्वदय से आभार।

गुरूवार के समाचारों में बुधवार के मुकाबले विरोधाभास रहा। एक ओर संघ की नाराजगी तथा दूसरी ओर भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का यह वक्तव्य कि “वरिष्ठ नेता के नाते उन्हें सीधे इनकार करना मेरे लिए कठिन था” अध्यक्ष पद की गरिमा को कम करता है। आडवाणी तो समय-समय पर हल्का व्यवहार करते ही रहे हैं। विडम्बना ही है कि देश के शीर्ष राजनीतिक पदों पर बैठे लोग भी ऎसा व्यवहार करने से नहीं चूकते। और वह भी अपने अहंकार की तुष्टि के लिए। ताजा खबरों ने स्पष्ट कर दिया कि कल तक संघ और भाजपा दोनों ही आडवाणी के पक्ष में झूठ बोल रहे थे। कोई भी रथ यात्रा का समर्थन नहीं कर रहा था। यह बात उसी दिन स्पष्ट हो गई थी, जब संघ ने उन्हें लोकसभा से इस्तीफा देकर यात्रा पर जाने की सलाह दी थी। फिर भी यह फैसला आडवाणी ने क्या सोचकर किया, ईश्वर ही जाने; अथवा अनंत कुमार। संघ फैसला कर चुका है कि वह इस यात्रा में शामिल नहीं होगा। इसके बिना क्या किसी भी प्रदेश में स्वागत होगा? असंभव! लगता है आडवाणी के मन में भय बैठ गया है। कहीं उनकी पार्टी का युवा चेहरा प्रधानमंत्री नहीं बन जाए। उन्हे राहुल अथवा कांग्रेस से भय नहीं है। कांग्रेस उनको आगे निकलती दिखाई भी नहीं पड़ती। चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री बनते नजर आने लगे थे, तब मोरारजी ने स्वयं को आगे धकेला था और प्रधानमंत्री बन गए थे। हालांकि आडवाणी अब तक हर मोर्चे पर विफल ही रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने भी सी.बी.आई. को कुछ इस तरह काम में लिया था कि आडवाणी के भाजपा अध्यक्ष होते हुए चुनाव कराए तथा वाजपेयी प्रधानमंत्री बन गए। आडवाणी के लिए तो यह अन्तिम अवसर है। करो या मरो। अगले चुनाव तक पता नहीं क्या हो। रथ यात्रा के द्वारा स्वयं को देश के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयत्न कर लेना चाहते हैं। भाजपा एवं संघ दोनों के लिए विषम परिस्थिति है। आत्मघाती भी है। जो भी हो परिणाम देश के लिए भी सुखद नहीं होंगे। समय की चाल ही ऎसी है। सत्ता पक्ष सत्ता नहीं चला पा रहे। विपक्ष अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहा। मतदाता के पास तीसरा विकल्प भी नहीं है।

इस स्थिति में आडवाणी के लिए उचित होगा कि वे ससम्मान इस दौड़ से बाहर निकल जाएं। अपनी महत्वाकांक्षा का बहुत पोषण हो चुका। अच्छा तो यह है कि आडवाणी अपनी यात्रा के निर्णय पर पुनर्विचार करें और त्याग दें। वर्ना इस बार कुछ बड़ा नुकसान हो जाएगा लोकतंत्र को। अब नई पीढ़ी को आगे लाने में सहायक बनें। जनता को उनमें अब कोई भविष्य नजर नहीं आता। कभी जनसंघ के लाड़ले रहे आडवाणी आज अनुशासनहीन (बिना अध्यक्ष की स्वीकृति के घोषणा कर देना) और बिगड़ैल नेता माने जाते हैं। इसमें संघ प्रमुख का भी बड़ा दोष है। संघ अभी भी हुंकार तो भरता है “जागो भारत” किन्तु खुद सोया हुआ है। लेकिन अब समय आ गया है, संघ के जागने का। देश नाना प्रकार के संकटों से घिरा है। सरकार घोटालों से घिरी है। किसी भी समस्या के समाधान पर ध्यान नहीं दे पा रही है। यहां तक कि साम्राज्यवादी एवं विस्तारवादी चीन की गतिविधियों एवं मंसूबों पर भी उसका ध्यान नहीं है। हर निर्णय के लिए अमरीका की ओर ताकती है। डरा-सहमा भारत महाशक्ति बनने का स्वप्न कैसे देखे? इसके विपरीत संघ एक राष्ट्रवादी संगठन भी है और सबसे बड़ा भी। वह भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। कन्नी तो काटता दिखाई देता है। क्योंकि वह भी कांग्रेस की तरह अपने पराए के चक्कर में पड़ गया है। इसीलिए भाजपा जैसी बड़ी विपक्षी पार्टी के शीर्ष पर संघ के स्वयंसेवक बैठे हुए हैं। उनके प्रति मोह संघ की दृष्टि को धुंधला किए हुए है।

यह भी कारण है कि संघ के बहुत से बच्चे बिगड़ैल हो गए हैं। गलत हरकतों में पड़े दिखाई देते हैं। आडवाणी, गडकरी इन्हीं के शीर्ष पुरूष हैं। संघ प्रमुख उनकी करतूतों को ढंकने की कोशिश में रहते हैं। शायद स्वयं भी लाचार हो गए हैं। प्रचारकों का राजनीति में दखल एवं सत्ता भोग आम बात हो गई हैं। अत: संघ के कार्यो की समीक्षा अनिवार्य हो गई है। संघ की कार्यपद्धति टीम भावना पर आधारित है। आडवाणी फे्रंच भाषा के शब्द “फेट एकम्पली” यानी फैसला लो और पार्टी पर थोप दो, पर कार्य कर रहे हैं। उन्होंने ऎसे कई फैसले लिए हैं। संघ हर बार उनके सामने लाचार ही रहा है। पार्टी में काम कर रहे संघ के अधिकांश प्रचारक भी अब अपने-अपने स्तर पर ऎसे ही मनमाने निर्णय ले रहे हैं। जोड़-तोड़ करते हैं। तथ्यों के विपरीत रिपोर्ट संघ प्रमुख तक पहुंचाते हैं। इस सबमें संघ का आम स्वयंसेवक अपने आप को ठगा सा महसूस करता है। संघ को अब बड़े नेताओं के बजाय अपने लाखों स्वयंसेवकों को भरोसे में लेना चाहिए। उन्हीं की शक्ति से वह बिगड़ैलों को राह पर ला सकता है, देश को शक्तिशाली बना सकता है।

देश अब आडवाणी को नहीं गडकरी को देखेगा, जिनके हाथ में भाजपा की कमान है। यदि वे आज भी किसी व्यक्ति को पार्टी से बड़ा मानते हैं, देश हित में आदेश देने से डरते हैं, तो उन्हें भी पदभार किसी अनुभवी, साहसी और कत्तüव्यनिष्ठ नेता को सौंप देना चाहिए। देश सब कुछ सहन कर सकता है। दो में से एक बड़े राजनीतिक दल को व्यक्तिगत लिहाज के भरोसे नहीं छोड़ सकता। और यह भी स्वीकार्य नहीं कि इस पद पर बैठा व्यक्ति अपनी बात से चौबीस घण्टों में मुकर जाए अथवा शब्दों से खिलवाड़ करता रहे।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 21, 2011

राजनीतिक चातुर्मास

हर वर्ष वर्षा ऋतु के चातुर्मास काल में पूरा देश व्रत-उपवास करता है। किन्तु इस बार यह परम्परा राजनीति में भी प्रवेश कर गई, यह देश के लिए नई घटना है और आश्चर्यजनक भी। किसी भी प्रदेश का मुख्यमंत्री, किसी भी कारण से, अपने ही प्रान्त में उपवास पर बैठ जाए, यह तो उपहास का कारण ही बनेगा। हुआ भी वही। लोग कम पहुंचे, तब भाजपा कार्यकर्ताओं को लाने की व्यवस्था करनी पड़ी। क्या मोदी के लिए इसका कोई अर्थ भी है या नहीं?

 

इसी घटना का एक कृष्ण पक्ष यह भी है कि लालकृष्ण आडवाणी अपनी यात्रा की चर्चा भी करवा गए। हालांकि बाद में यह समाचार रूकवा दिया गया। संघ और भाजपा दोनों की ही नाराजगी को धता बताकर अपने स्वभाव के अनुकूल अपना मत भाजपा पर थोप गए। मोदी के मंच के आगे आम जनता को नदारद देखकर इनकी समझ में आ गया होगा, कि इनकी यात्रा की गत क्या होगी। जरूरी नहीं कि भाजपा और संघ के कार्यकर्ता भी इनका साथ दें। आडवाणी को आज वार्ता के लिए नागपुर पहुंचना है। वहां वे पार्टी अध्यक्ष से तो मिलेंगे ही, संघ प्रमुख से भी मिलने का प्रयास करेंगे।

 

विश्व में किसी भी राजनेता के (लोकतंत्र में) अहंकार का यह चरम था। उनको तो पता भी नहीं चला होगा कि देशभर में क्या प्रतिक्रिया हुई। उनको तो वैसे सरोकार भी कहां है, इस बात से। एक अन्य घटना भी कोढ़ में खाज का काम कर गई। स्वयं नरेन्द्र मोदी ने शहर मुफ्ती के हाथ से टोपी पहनने से इनकार कर दिया। अल्पसंख्यकों को सीधे-सीधे कांग्रेस के खाते में शिफ्ट कर दिया।

 

चर्चा तो यह है कि यह मोदी के प्रचार प्रबंधकों की व्यवस्था का ही अंग था। सोमवार को एक समुदाय विशेष के लोगों को अलीगढ़ से ट्रेन भरकर दिल्ली जन्तर-मन्तर लाया गया। मोदी के विरूद्ध नारे लगवाए गए। ताकि बहुसंख्यकों का दिल जीता जा सके। दोनों नेताओं के स्वरूप, व्यवहार और अहंकार पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। भाजपा में भी हुई, संघ में भी हुई। दिल्ली में तो यहां तक चर्चा चल पड़ी कि आडवाणीजी कांग्रेस से मिल गए हैं। इसीलिए भाजपा के लिए आत्मघाती कदम उठाने जा रहे हैं। उधर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि, हमको तो इस पर सोचने की जरूरत भी महसूस नहीं होती।

 

ऎसा न हो पार्टी में बगावत के स्वर फूट पड़ें। यदि पार्टी को भी ऎसा लगने लगे तो आडवाणी की रथयात्रा उन्हीं के हवाले छोड़ देनी चाहिए। वे स्वयं ही संचालन करें और स्वयं ही खर्चा उठाएं। जनता के सिर बोझ लादने का अघिकार अब उनको नहीं दिया जा सकता। गडकरी में दम हो और अध्यक्ष के पद का महत्व बनाए रखना चाहते हैं तो आडवाणी को पार्टी से निकाला भी जा सकता है।

 

भाजपा को आज इस बात की चिन्ता नहीं है कि सी.बी.आई. जसवन्त सिंह के विरूद्ध जांच कर रही है, क्योंकि वे वित्त मंत्री रहे हैं, किन्तु चिदम्बरम के विरूद्ध कोई जांच नहीं? कहां खो गई भाजपा? किसी भी समस्या पर कोई क्रिया, प्रतिक्रिया नहीं! भावी दृष्टि भी नहीं! जो कुछ नाक के नीचे हो रहा है, वहां भी आंखें बंद! पार्टी में किसी को यह सोचने की भी फुर्सत नहीं बची कि, ऎसे में क्या-क्या हो सकता है?

 

शरद पवार, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, डी.एम.के. आदि के साथ बैठकर मंथन किया जा सकता था। उनको सरकार से बाहर निकालकर नए नेता के नेतृत्व में नई सरकार का समर्थन करते। नेता चाहे नीतीश होते अथवा जयललिता होतीं। अगले चुनाव तक तो सरकार चल ही सकती थी!

 

क्या भाजपा को कांग्रेस की वर्तमान स्थिति का भान नहीं है? क्या सोनिया गांधी के स्वास्थ्य की अंदरूनी जानकारियां नहीं हैं? कांग्रेस भ्रष्टाचार के नाम पर जिस प्रकार घिरी हुई थी, क्या भाजपा के इन नाटकों ने टू-जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमण्डल खेल घोटाला जैसे मुद्दों को हल्का नहीं कर दिया है? क्या भाजपा नहीं जानती कि पेट्रोल के भाव बढ़ने के पीछे राज क्या है? जबकि भाजपा को कुछ समझ में नहीं आता, केवल आत्महत्या करने के, तो कौन रोक सकता है? मंचों पर खड़े होकर तालियां बजाना, नौटंकी करना, सामूहिक विवेक का निर्लज्ज प्रदर्शन आदि जनता को कुछ भी मंजूर नहीं है। सरकार देशहित को कहां नहीं देख रही, क्या विपक्ष देख रहा है? जनता तो नहीं मानती। जनता दु:खी है और जानना चाहती है कि देश में विपक्ष जीवित है या नहीं?

 

गुलाब कोठारी

 

सितम्बर 24, 2011

विरोध की भेंट चढ़ते सदगुण

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हर कार्य की निष्पत्ति से पूर्व कुछ न कुछ रोड़ा जरूर अटकता है। जैसे हर सड़क पर गति रोधक होते हैं। रोधक का ही नाम अड़चन है। रोध से ही अवरोध, विरोध आदि शब्द बनते हैं। अवरोध के कारण प्राकृतिक भी होते हैं, हमारे द्वारा निर्मित भी होते हैं। प्राकृतिक आपदाएं भी बाधाएं ही होती हैं। इनको पार करने के लिए चतुराई और साहस की जरूरत होती है। हां, कभी-कभी भाग्य भी आड़े आ जाता है। चूंकि भाग्य के निर्माता भी स्वयं हम ही होते हैं, अत: सारे अवरोध/विरोध के जनक भी हम ही होते हैं। हमारे काम में आने वाले अवरोध अलग, दूसरों के कार्यो में हमारे द्वारा पैदा किए जाने वाले अवरोध अलग होते हैं। कुछ अवरोध या विरोध लम्बे समय तक चलते हैं। सभी प्रकार के विरोध होते नकारात्मक ही हैं। विरोध सबसे बड़ा अवरोध होता है। इसमें प्रतिहिंसा, प्रतिरोध, प्रतिक्रिया अथवा अहंकार भी होता है। व्यक्ति उत्तेजित भी हो जाता है। विरोध प्रकट करने के तो स्वरूप भी कई प्रकार के होते हैं।

इनमें सामूहिक विरोध संकीर्णता का सूचक है। प्रवाह के साथ चलता है। भीड़ की मानसिकता के नियंत्रण में चलता है। अत: अन्त में स्वयं का ही नुकसान अधिक होता है। आज परिवारों में भी विरोध के स्वर आसानी से सुने जा सकते हैं। शादी के बाद भी पत्नी अब पति के साथ एकाकार नहीं होना चाहती। पति से अलग अपनी पहचान बनाए रखकर विरोध के स्वर को हवा देती है। पति के सम्मान को घटाकर भी अपने सम्मान को बनाए रखने की मुहिम के कारण उसके मन का स्त्रैण भाव, माधुर्य नष्ट हो जाता है। पौरूष्ा भाव का अहंकार उसका सुख सदा के लिए छीन लेता है। यही स्थिति साम्प्रदायिक स्तर पर देखी जा सकती है। नुकसान हमेशा विरोध करने वाले का अधिक होता है। जातिवाद, क्षेत्रवाद अथवा धर्म के विरोधों का तो यह देश अनेकों बार साक्षात् कर चुका है। आगे भी करता रहेगा। आरक्षण ने जाति आधारित विरोध की एक ऎसी आग देश में लगा दी है, जो देश को निरन्तर जलाती रहेगी। कैसी आश्चर्य की बात है कि जाति के या धर्म के नाम पर किस प्रकार देश की मुख्य धारा से कटकर भी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है। मैं यदि कहता हूं कि मैं तो हिन्दू हूं या मुसलमान हूं या जैन हूं, तो मैं यह भी उद्घोष्ा करता हूं कि मैं बाकी सबसे अलग हूं। उनके लिए मेरे पास जगह नहीं है। किसी ने मेरे धर्म या जाति के खिलाफ कुछ भी कह दिया, तो तुरन्त मेरा शत्रु हो जाता है। मेरी बिरादरी यदि दो-तीन प्रतिशत ही है, तो भी मैं 97-98 प्रतिशत को शत्रु मानने को राजी हूं। उनके साथ जुड़ने का सपना तो राजनीति ने सदा के लिए तोड़कर रख दिया।
राजस्थान में गुर्जर-मीणा, हिन्दू-मुसलमान, राजपूत-जाट आदि के बीच कैसे-कैसे विरोध के स्वर फूटते रहे हैं। सारे निर्णय प्रवाह में लिए जाते हैं। यही कारण है कि ऎसी गतिविधियों का प्रभाव अगली पीढ़ी तक को भी भोगना पड़ता है। विरोध वैचारिक जड़ता का सूचक होता है। चाहे कर्मचारियों का सरकार के प्रति विरोध प्रकट करना हो, अथवा किसी समुदाय विशेष्ा का। हमारे संविधान में कई धर्म, सम्प्रदायों को अल्पसंख्यक की संज्ञा दी गई। किसी को भी बुरा नहीं लगा कि उसे शेष्ा भारत से अलग माना जाएगा। हुआ यह कि कई ने तो इस घोष्ाणा का स्वागत करते हुए जश्न तक मनाया। अपने ही देश में द्वितीय श्रेणी के नागरिक हो गए। इसका नुकसान यदा-कदा व्यवहार में झलकता भी है।

विरोध को यदि तुरन्त आपसी बातचीत से दूर करने का प्रयास नहीं किया, तो विरोध करने वाले को पीढियों तक नुकसान भोगना पड़ता है। विरोध कितना भी आक्रामक क्यों न हो, पूरी उम्र नहीं चल सकता। वह तो शत्रुता में बदल जाएगा। इसमें भी बड़ा नुकसान विरोध करने वाले का ही होता है। इसके घाव गहरे होते हैं, अत: क्षमा मांग लेने पर भी हरे ही रहते हैं। विरोध करने वाला अन्य समुदायों की नजर में भी गिर जाता है। सामाजिक सम्मान के मार्ग बन्द हो जाते हैं। रहना तो पूरी उम्र साथ पड़ता है। चाहे मोहल्ले में, चाहे गांव में। आज तो राजनीति में विरोध को ही प्राथमिकता मिलती है। उम्र भर का वैर बंध जाता है। सकारात्मक विचारों का मार्ग भी अवरूद्ध हो जाता है। समाज के चिन्तन में ईष्र्या-द्वेष्ा जैसे आसुरी भाव प्रवेश कर जाते हैं। समुदाय का निर्माण रूक जाता है। कभी-कभी यह भी होता है कि मैं मन ही मन किसी का विरोध करता हूं और उसके कोई फर्क ही नहीं पड़ता। किन्तु मैं तो तन-मन से बीमार हो जाता हूं। विरोध का विपरीत शब्द है सौहार्द। इसी से दिलों में मिठास बहता है। मन उदार होता जाता है।

विरोध में आक्रामकता होती है। एकपक्षीय दृष्टिकोण भी हो सकता है। स्वार्थ सिद्ध न हो तो भी विरोध जता दिया जाता है। सबसे बड़ी बात यह भी है कि विरोध का यथार्थपरक होना भी आवश्यक नहीं है। मन की अवधारणाओं, पूर्वाग्रहों और वातावरण मिलकर विरोध के स्वर को परिभाçष्ात करते हैं। इसमें क्रोध के जुड़ने से, द्वेष्ा की दिशा में व्यक्ति आसानी से भटक सकता है। क्योंकि संवेदना नहीं रहती। सामने वाले के प्रति अहित का भाव अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। विरोध के स्वर जब प्रखर होते हैं, तब हम शब्द शक्ति अथवा शब्द ब्ा्रह्म को भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि नकारात्मक शब्दों के प्रभाव से पानी में दुर्गध उत्पन्न हो जाती है। हमारे शरीर में 70 प्रतिशत पानी है। यह पानी हमारे नकारात्मक, हिंसक या मनश्छेदक शब्दों से विष्ौला होकर रक्त को रोगयुक्त बना देता है। आप जिसका विरोध करते हैं उसको शायद इसकी जानकारी भी नहीं होती। वह तो सदा स्वस्थ रहता है।

शब्द जब विरोध के डुबकी लगाते हैं, तब तामसिक हो जाते हैं। मन एवं बुद्धि को ढंक लेते हैं। आहार सारा तामसिक हो जाता है। विरोध क्रोध का संग्रहालय है। व्यक्ति के सदगुणों का ह्रास करके उसे पाशविक धरातल पर ले जाता है। ज्ञान के आइने में विरोध स्वयं के अज्ञान का सूचक ही दिखाई पड़ता है। इसका आधार परम्परागत भी हो सकता है, अज्ञान रूप भी हो सकता है, अपनी जीवन शैली अथवा अवधारणाओं पर भी आधारित हो सकता है। जब हम यह मानते हैं कि कोई हमारा अहित कर रहा है तब विरोध का भाव पैदा होता है। जब यह बात समझ में आ जाए कि मेरा भाग्य कोई नहीं बदल सकता, और न ही मैं किसी का भाग्य बदल सकता हूं, तब विरोध नहीं हो सकता। जो कुछ मुझे मिलता है, उसका कारण मेरे अलावा कोई नहीं हो सकता। यह विचार पैदा होते ही विरोध समाप्त हो जाता है। सृष्टि में अच्छा और बुरा नहीं होता। यह हमारे मन की उपज है। इसी प्रकार कर्म करने की इच्छा भी ईश्वर ही पैदा करता है। हम पैदा नहीं कर सकते। हां, कर्म जाना तो हमारे नाम से ही जाता है। इसीलिए हम किसी को अच्छा-बुरा कहने लग जाते हैं। राग-द्वेष्ा इसी से पैदा होते हैं। इससे मुक्त होने का मार्ग है क्षमा! पहले स्वयं अपनी आत्मा से क्षमा। फिर जिनको हम शत्रु मानते हैं। जिन लोगों ने हमारा अहित किया। इसके बाद उनसे क्षमा, जिनका हमने अहित करने का प्रयास किया। आहत किया, जिनके दिलों को ठेस पहुंचाई। वे भी हमें क्षमा कर सके, ईश्वर उनको ऎसी बुद्धि और शक्ति दे। तब अन्य प्राणियों से—मानव, पशु-पक्षियों से, पेड़-पौधों आदि से क्षमा मांगें। सारा अहंकार, जो विरोध का पर्याय था, गल जाएगा। मैत्री का सकारात्मक भाव जाग्रत हो सकेगा। आप किसी एक पौधे से नित्य मैत्री भाव के साथ बात करें। देखना, कितनी तेजी से बढ़ता है। फलता-फूलता है। विरोध जहां जीवन को नीचे गिराता है, वहीं मैत्री नए शिखर देता है। सेतु बनकर मनों को जोड़ता है। भाई-चारे का, संगीतमय जीवन का संदेश देता है। यही तो सब धर्मो का मूल है।
गुलाब कोठारी
पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

सितम्बर 25, 2011

विषैले पकवान

बिलाड़ा के सिविल न्यायालय ने शुक्रवार को जल संसाधन मंत्री महिपाल मदेरणा के विरूद्ध एएनएम भंवरी देवी से दुष्कर्म, अपहरण और हत्या की धाराएं जोड़ते हुए जांच करने के आदेश दिए। राजस्थान में किसका सिर ऊंचा हुआ? केवल उन सत्ताधीशों का, जो भंवरी देवी को अपने प्रतिशोध के लिए हथियार की तरह काम ले रहे थे। खेद की बात है कि इस मामले से जुड़े मंत्री और विधायक मलखान सिंह के परिवार राजनीति में पुराने और अनुभवी माने जाते हैं।

 अपने क्षेत्र में दोनों परिवारों की अपनी साख रही है। एक विधायक से अपने सम्बंधों के बारे में तो भंवरी देवी ने पुलिस से अपनी बेटी का डीएनए परीक्षण तक कराने की मांग की थी। इस घटना ने सब पर बट्टा लगा दिया। शर्म के मारे मदेरणा का परिवार तो जोधपुर में सरकारी घर छोड़ गया। जो तीसरा नेता सामने आया वह भी पूर्व में कांग्रेस का ही उपजिला प्रमुख था सहीराम। सत्ताधीशों की इस चारित्रिक गिरावट को क्या नाम दिया जाए, समझ में नहीं आता। इतने बड़े पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों पर इतने नीचे गिरकर अपने बच्चों जैसी प्रजा का यौन शोषण करने का आरोप लगे तो इनके तो धिक्कार का भी क्या असर पड़ेगा। ये तो पशु की श्रेणी से भी नीचे गिर गए।

 

 ऎसी घटनाओं से अनुमान लगाया जा सकता है कि क्यों राज्य में कन्या भ्रूण हत्या का वातावरण बना हुआ था। इसके आगे एन.डी. तिवारी का मामला बौना लग रहा है। ऎसा ही एक जघन्य काण्ड दिल्ली में हुआ था, जब सत्ता से जुड़े कुछ दरिन्दों ने नैना साहनी के शरीर के टुकड़े करके होटल के तंदूर में डाल दिए थे। भंवरी देवी काण्ड राज्य सरकार के लिए तो आत्मघाती ही सिद्ध होगा, क्योंकि इससे जुड़े सभी शीर्ष महापुरूष सत्ताधारी दल के हैं। सरकार अब तक मौन थी। अपराधियों को बचाने की ठान रखी थी। उसी के अनुसार पुलिस भी बहाने बनाती रही।

भला हो न्यायाधीश का, जिन्होंने इतना साहस दिखाया और सरकार की नाराजगी की चिन्ता न करते हुए वही किया, जो करना था। उनको साधुवाद। मदेरणा और विश्नोई पर लग रहे आरोपों के परिप्रेक्ष्य में सरकार से भी उम्मीद है कि वह तटस्थ व्यवहार करेगी, क्योंकि इसी समुदाय को सरकार भी बढ़-चढ़कर आगे लाने का प्रयास कर रही है। राजनीतिक नियुक्तियों से भी अनुमान हो जाएगा। कहां-कहां क्या-क्या लिहाज किए गए, कागजों पर हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों में और यौन शोषण के आरोपों में अन्तर है। इस सरकार में यौन उत्पीड़न के मामले भी बहुत सामने आए।

जो अधिकारी कह देता है, उसके आगे मंत्री किसी की सुनना ही नहीं चाहता। अभी एक शिक्षिका के तबादले को लेकर काम पड़ा, तो पता लगा कि राज्य के पश्चिमी जिलों में कार्यरत अध्यापकों का तबादला अन्य जिलों में हो ही नहीं सकता। पहले तो अफसरों ने कानून बना दिया। फिर हाईकोर्ट ने उस पर मोहर लगा दी। यानी वह शिक्षिका अपने पति और परिवार के साथ रह ही नहीं सकती। अपने प्रदेश में अपनी सरकार काले पानी जैसी सजा दे रही है।

 सबकी संवेदना मर गई। क्या यह यौन शोषण का तरीका नहीं है? एक-दो मामलों में तो मुझे स्वयं मुख्यमंत्री से सहयोग मांगना पड़ा। कौन देखता है कि महिलाओं के साथ कैसा हल्का व्यवहार करते हैं- ऊपर वाले। अब तो पुलिस जैसे विभाग में महिला कर्मचारियों के साथ बलात्कार होने लगे। कौन महिला आना चाहेगी सरकारी नौकरी में। क्या कोई महिला सरकार के “महिला सशक्तीकरण” के नारे पर विश्वास करेगी? प्रदेश भर में छाया हुआ और फलता-फूलता देह व्यापार भी दर्दनाक स्थिति है। इसका हिस्सा भी तो पुलिस के जरिए ऊपर तक जाता होगा। भंवरी देवी प्रकरण से एक चीख तो उठती है कि जिन लोगों ने उसकी मांसल देह का हंस-हंसकर भोग किया, क्या सोचकर उन्हीं लोगों ने उसे एक विष कन्या मानकर एक हिस्ट्रीशीटर के हवाले कर दिया। खुश भी हुए होंगे ये नर-पिशाच कि चलो सबूत भी दब जाएगा।

भंवरी देवी काण्ड कोई एक दिन में हुई घटना नहीं है। न ही पुलिस यह कह सकती है कि उसे इन गतिविधियों की जानकारी नहीं थी। इसका एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि सरकार के चहेतों को आपराधिक गतिविधियों के लिए संरक्षण प्राप्त है। पुलिस उनके कृत्यों को ढकने में सहायक होगी। कोर्ट तक में टालमटोल करती रहेगी। शायद यही कारण है कि एक के बाद एक मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरते जा रहे हैं और मुखिया हल्के से मुस्कराकर रह जाते हैं। बाबूलाल नागर, बीना काक, भरोसीलाल जाटव आदि नाम तो अब जनता की जुबान पर भी आ गए।

मुख्यमंत्री शायद अपनी ओर से पहल करके जनता को विश्वास में नहीं लेना चाहते। भले प्रतिक्रिया कुछ भी हो। यदि किसी भी मुद्दे के खिलाफ और वो भी भ्रष्टाचार, यौनाचार जैसे मुद्दों के विरूद्ध, तो यह सरकार का ही सार्वजनिक अपमान है। जनता के साथ अन्याय होता है तथा न्याय नहीं मिलता, तभी यह स्थिति बनती है। मामला किसी भी तहसील का क्यों न हो, प्रभाव पूरे प्रदेश में पड़ता है। क्या गोपालगढ़ की घटना का प्रभाव मात्र स्थानीय स्तर पर होकर रह जाएगा? एक बात और भी है। मुद्दा किसी नेता या अधिकारी से जुड़ा हो, नाम तो नेता (मुख्यमंत्री) का ही होता है। महिपाल मदेरणा ने देश भर में सरकार को सुर्खियों में ला दिया। कुछ और नेता तैयारी कर रहे हैं। समय किसी का सगा नहीं होता।

गुलाब कोठारी

सितम्बर 27, 2011

गले में घंटी

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जब भी किसी न्यायालय में सरकार के किसी विभाग से जुड़े प्रकरण पहुंचते हैं, तो अक्सर देखा जाता है कि उनके निपटारे में लम्बा समय लगता है और जब तक फैसला होता है, विषय स्वयं गौण हो जाता है। पिछले दिनों एक बड़ा सकारात्मक परिवर्तन सामने आया कि कुछ प्रकरणों में परिवादी सरकारी अघिकारी का पदनाम न लेकर उनके व्यक्तिगत नाम से मुकदमा दायर करने लगा है। अघिकारियों को नामजद किया जाने लगा है। मध्यप्रदेश हो, राजस्थान हो अथवा अन्य प्रदेश, इसका प्रभाव यह देखा गया कि इस कारण प्रशासनिक हलके में अफरा-तफरी तो मची, किन्तु जिस गति से क्रिया और प्रतिक्रिया सामने आई, वह इस देश के न्यायिक अध्याय में स्वर्ण रेखा का कार्य करेगी। अभी तक बड़े अघिकारी न्यायालय में पेश होने से बचते रहते थे। पद बदलने के साथ ही उनका उत्तरदायित्व स्वत: ही बदल जाता था। इस नई शैली मे मुख्य व्यक्ति ही नामजद होकर अन्त तक उत्तरदायी होगा। पदनाम गौण हो जाएगा।

 

 

आज भी कई अघिकारी अपनी गिरफ्तारी को लेकर फरार हैं। अपने कृत्य को स्वीकार भी नहीं कर पाते और न ही आत्म समर्पण कर पाते। मधुकर टण्डन और ए.के. जैन (ए.डी.जी.) तो बहुचर्चित उदाहरण हैं। निगरानी याचिका के जरिए अपने को बचाने की कोशिशों में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। पूरा सरकारी अमला इनको बचाने में जुट जाता है। पुलिस भी इनको ‘ढूंढ़’ नहीं पाती। कोर्ट की फटकार का असर होता ही नहीं।

 

कई अवमानना याचिकाएं चलती ही रहती हैं। राजस्थान सरकार ने तो लगभग एक साल पहले अघिकारियों/ राजनेताओं के विरूद्ध सभी आपराघिक मामले वापस ले लिए, जबकि कोर्ट इसके लिए मना कर रहा था। लोकतंत्र के इतिहास में यह घटना भी मील का एक पत्थर होगी। इस पृष्ठभूमि में अफसर पूरी तरह अपने को सुरक्षित मानकर चलता रहा है। समय के साथ अब हर स्तर पर न्यायालय भी करवट बदल रहे हैं। टू जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमण्डल खेल या कर्नाटक खनन प्रकरण इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। न्यायाधीश भी लीक से हटकर बड़े-बड़े अघिकारियों एवं राजनेताओं के विरूद्ध गिरफ्तारी वारण्ट जारी करने लगे हैं।

 

न्याय की दृष्टि से यही कदम उचित भी है और न्यायालय ने इसे कानूनी मान्यता देकर जनता को एक नया मार्ग दिखाया है। इसका अन्तर तो हो सकता है आगे की बहस में ही दिखाई भी पड़ जाए। न भी पड़े। किन्तु इतना प्रभाव तो भविष्य में दिखाई देगा कि कोई भी मुकदमा पद के विरूद्ध न होकर व्यक्ति विशेष के विरूद्ध होने लगेगा। न्याय सबके लिए बराबर है।

 

नामजद होने से नेता, मंत्री, अघिकारी आदि को सीधे नोटिस जारी किए जा सकते हैं, जिनके भी आदेशों पर हस्ताक्षर हो। भ्रष्ट व्यक्ति के बचने के मार्ग भी घट जाते हैं। सार्वजनिक सूचना भी उसके चरित्र की हो जाती है। बचने के कारण भी कई हो सकते हैं, किन्तु उनके सेवा के रिकार्ड पर मुकदमा अंकित हो जाएगा। विभिन्न पदों पर आसीन नेताओं तथा अघिकारियों के मन में डर तो रहेगा। जैसे गोपालगढ़ में एक पिता ने अपने पुत्र की हत्या के लिए अन्य के साथ भरतपुर के कलक्टर, एसपी के विरूद्ध भी मुकदमा दर्ज कराया है।

 

जिस प्रकार का प्रभाव नामजद मुकदमों का पड़ेगा, वैसा ही परिणाम पुलिस भी दे सकती है। नामजद गिरफ्तारी के मामलों में ढील बरतना, या गिरफ्तारी न करने का एक ही अर्थ होता है कि पुलिस अपराधी से मिल गई है या प्रभावित हो गई है। आम आदमी के लिए तो पुलिस ऎसा नहीं करती। इस पर रोक लगाकर राजनेताओं के प्रभाव में अपने सितारों (पदसूचक) को बट्टा लगने से बच भी सकती हैं।

 

नेता आते-जाते रहते हैं। उनका आदेश यदि जनहित में हो तो माना भी जा सकता है, किन्तु नितान्त निजी स्वार्थ अथवा अपराधी को बचाने में मानना अपनी ली हुई शपथ का ही अपमान होगा। ऎसी घटनाएं जीवन के उत्तरार्द्धकाल में मन को बहुत कचोटती हैं। हम सब पहले आदमी हैं, फिर कुछ और हैं। आइए, एक-एक करके हम सब इस तरह की मुहिम में जुड़ें। कुछ ही समय में वातावरण बदलने लगेगा। आने वाला समय कुछ और ही कहानी सुनाएगा नई पीढ़ी को। शुरूआत हो चुकी है।

 

गुलाब कोठारी

सितम्बर 28, 2011

प्रकृति : क्रंदन से मां का आह्वान

जब भी मुझे क्रोध आता है अथवा किसी को कष्ट देकर सुखी होना चाहता हूं, तब मैं रावण हो जाता हूं। जब गुरू के आगे बैठता हूं, तो पांव तले जमीन देखता हूं। राम और रावण दोनों मेरे ही भीतर हैं। एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों की आत्मा अभेद है। केन्द्र में दोनों के वही ब्रह्म और स्वरूप सारा माया भाव। राम भी माया भाव और रावण भी माया भाव। विद्या (धर्म-ज्ञान और वैराग्य-ऎश्वर्य) भी माया है और अविद्या (अज्ञान, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश) भी वही माया। यानी वही शक्ति रूपा मां जिसकी नवरात्र में पूजा करते हैं। हमारे अविद्या भाग का परिष्कार करके विद्या भाग को पोषित करने का प्रयास करते हैं।

 

 

राम का ममकार अथवा सीता के प्रति आसक्ति का भाव ही उन्हें रावण को भली भांति समझने में सहायक हुआ। हनुमान से परिचय, शबरी का माधुर्य अथवा सुग्रीव की मुक्ति तभी संभव हो पाई। रावण का होना समय-समय पर समाज में राम के स्वरूप की प्रतिष्ठा कराता रहता है। बिना कंस या शिशुपाल के कृष्ण की प्रतिष्ठा केवल रास से तो नहीं हो सकती थी। कंस तो वास्तव में कृष्ण को प्रकाशित करने के लिए पैदा हुआ था। तभी लोगों का ध्यान कृष्ण की ओर गया।

 

रावण कभी अकेला पैदा नहीं होता। उसके सारे नाते-रिश्तेदार भी साथ ही पैदा होते हैं, ताकि साधारण व्यक्ति भी लंका से परिचित हो सके। कृष्ण ने कहा था कि ईश्वर जिससे नाराज होता है, उसे खूब समृद्धि देता है, ताकि वह उससे (ईश्वर से) दूर हो जाए। नाना प्रकार के अनाचार में व्यस्त हो जाए। रावण पुलस्त्य ऋषि का वंशज होकर भी, शिव को प्रसन्न करके भी, अपने अहंकार को रोक नहीं पाया। वरना राम कैसे प्रकट होते। रावण को भी माया ही चलाती है। तब इस प्रकृति की शक्ति का अनुमान लगाना कठिन है।

 

व्यक्ति कदम-कदम पर भूल करता है। नित्य स्वाध्याय से उन पर विचार भी करता है। किन्तु परिवर्तन के लिए समय चाहिए। रावण को अपने भीतर पहचान सके। सीता को अशोक वाटिका में देख सके। अपनी विद्या को जाग्रत कर सके। जीवन-मृत्यु रूप नाभि (केन्द्र) पर ध्यान केन्द्रित कर सके। पंचकोश के आवरणों को एक-एक करके हटा सके। सारे अविद्या भावों को विद्या में बदल सके। तमस को सत्व में ढाल सके। अहंकार का रावण तमस ही तो है। सत्व भी मां है, तमस भी मां है।

 

इसी मां के स्वरूप को समझ कर तमस से सत्व की ओर बढ़ते हैं। राम के साथ लक्ष्मण, भरत आदि गुणवान शक्तियों का समूह रहता है। रावण के साथ मन्दोदरी भी हो सकती है, तो सूर्पणखां भी हो सकती है। मन्दोदरी उसे संयम पर टिके रहने को प्रेरित करेगी। सूर्पणखां आसक्ति भाव का पर्याय है। वह किसी की पत्नी बन जाए तो? सीता को राम पर दया नहीं आती, न स्वयं कभी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करती है। हर व्यक्ति के साथ यह माया भाव रहता है। सब लोग मिलकर व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब दिखाते जाते हैं। भीतर सबके वही ब्रह्म और माया है। प्रारब्ध है।

 

माया भाव का प्रथम रूप होता है क्षुधा अर्थात इच्छा (भूख लगना) अथवा अशनाया। माया ही इच्छा बनती है। हम अपने मन में इच्छा प्रकट नहीं कर सकते। इच्छा को पूरी कर सकते हैं अथवा छोड़ सकते हैं। पूरी करने के लिए हमारे पास दो मार्ग हैं- सतोगुणी (ऊध्र्वगामी) अथवा तमोगुणी (अधोगामी)। यही राम और रावण बना देता है व्यक्ति को। रजोगुण इनका विस्तार करता है, क्योंकि सत्व और तम दोनों ही गतिहीन होते हैं। रज ही इनको गति प्रदान करता है।

इच्छा को, इच्छा के कारणों को यदि समझ लिया, तो माया के केन्द्र तक पहुंचा जा सकता है।

 

ब्रह्म का विस्तार होता है मन, प्राण, वाक् रूप में और माया का विस्तार सत-रज-तम रूप में। अत: सर्वप्रथम इच्छा के स्वरूप को ही समझना आवश्यक है कि वह सतोगुणी है या तामसी। यह परिणाम से जुड़ी कामना ही धर्म रूप बन जाती है। एक मन तो होता है- अव्यय मन। किन्तु जिसे हम अपना मन कहते हैं वह आवरित मन होता है। एक कामना अव्यय मन की (कृष्ण की), एक कामना हमारे मन की। कामना मन का बीज है। अत: बीज के अनुरूप ही हमारी सृष्टि होती है। फल तो पेड़ के कारण नहीं आते, बीज के कारण आते हैं। पेड़ कर्म रूप है। फल कामना और उसके पीछे भावना पर आधारित है। इसी भावना के स्पन्दन से कर्म की दिशा तय होती है। भावनाओं के स्पन्दन ही अन्त:स्रावी गं्रथियों का नियंत्रण करते हैं। शरीर और मन की निर्माण करते हैं। इच्छाओं की दिशा तय करते हैं।

 

व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन कामनापूर्ति में ही व्यस्त रहता है। उसी में व्यक्ति अपनी सामथ्र्य का अनुभव करता है। कामना पूर्ति के कारण ही नई कामना भी पैदा होने लगती है। व्यक्ति के स्वभाव के अनुकूल ही उसकी वाणी और ज्ञान हो जाता है। हर सम्बन्ध के साथ व्यक्ति निजी पहचान बनाना चाहता है। अत: मूल में व्यक्ति एक होते हुए भी दिन-रात उसकी छाया बदलती रहती है। ये छाया ही आवरण बनकर बाहरी जीवन में उलझाए रहती हैं। अपनी भीतरी मूल संज्ञा को समझ नहीं पाता। दिशा तो विद्या/अविद्या से तय होगी। दिशा के अनुरूप ही शक्ति का विकास आघिभौतिक, आघिदैविक और आध्यात्मिक क्षेत्र में (भीतर भी और बाहर भी) होने लगता है।

 

माया भाव को समझने में पत्नी (जिसमें माया भाव अघिक हो) बड़ी सहायक सिद्ध होती है, यदि वह स्वयं को पति का अंग मानकर जीती है। पति को तृष्णा, लोभ, मोह, ईष्र्या, काम, क्रोध आदि अविद्या के घेरे से निकालकर दिव्य रूप में प्रतिष्ठित करती है। अपने सपनों का आराध्य बनाती है। यही भाव सम्बन्ध के अनुकूल हर आत्मा का होता है। यदि प्रेम से हम हर आत्मा को अपने साथ जोड़ते चले जाएं, तो हर व्यक्ति, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे तक हमारे विकास में सहयोग करते जान पड़ेंगे। हम प्रकृति के संगीत को सुन सकेंगे।

 

चूंकि हर व्यक्ति का आधा भाग माया है, अत: नवरात्र में व्यक्ति इस माया के स्वरूप को ही परिष्कृत करने का प्रयास करता है। भीतर माया यदि सत्व प्रधान हो गई तो बाहर की माया के साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जाएगा। प्रत्येक स्थूल क्रिया के पीछे अदृश्य एवं सूक्ष्म कारण होता है। वही माया है।

 

व्यक्ति सदा आहार-विहार के द्वारा पहले शरीर की शुद्धि करता है। योग एवं जप आदि से प्राणमय कोष को समभाव में लाता है। विचारों के प्रति जाग्रत होता है। सद्विचार, सत्संग, अनुष्ठान आदि से सात्विक स्पन्दन ग्रहण करता है। धारणा, ध्यान और समाघि के द्वारा माया के आवरणों से मित्रता बढ़ाता है, ताकि वे मित्रवत् सहयोग करें। बाधा न बनें।

 

व्यक्ति नित्य अपने संकल्प को दोहराकर उस पर ध्यान करता है। दिशा को सही रखने का प्रयास करता है। मां से मित्रता हो जाना ही अनुष्ठान का रहस्य है। वही आवरण डालती है, वही हटाने का मार्ग भी बताती है। वही बीच-बीच में परीक्षा भी लेती है कि व्यक्ति शक्ति प्रदर्शन में तो नहीं भटक गया है। यदि फेल हुआ, तो अगली कक्षा में जाने के मार्ग बन्द हो जाते हैं। आप धन और यश तो कमा सकते हैं, किन्तु स्वयं को कभी उपलब्ध नहीं हो पाओगे। अपना अर्द्ध भाग दूसरे अर्द्ध भाग से सामंजस्य नहीं बिठा पाएगा। अपने क्रन्दन से मां का आह्वान करें कि वह आए, अपने अंक में उठाकर पिता तक पहुंचा दे।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

अक्टूबर 6, 2011

घर बैठे रावण मारिए!

भगवान महावीर, बुद्ध, महात्मा गांधी के साथ चलता हुआ अहिंसा का अभियान अन्ना हजारे के रूप में प्रकट हुआ। अहिंसा का व्यावहारिक स्वरूप यही है कि यदि किसी को ‘गुड़ देकर निपटा सकते हैं तो जहर देने की जरूरत क्या है’? अब बाबा रामदेव भी अहिंसक अभियान चला रहे हैं। गुर्जर नेता कर्नल बैंसला की घोष्ाणा भी अहिंसक आन्दोलन की हो चुकी है।

 

 

क्या सभी अहिंसक आन्दोलन राष्ट्रव्यापी जनाधार बना पाएंगे? कुछ प्रश्न नेतृत्व के प्रति विश्वसनीयता के भी हैं। बाबा रामदेव हों, लालकृष्ण आडवाणी हों, कर्नल बैंसला हों, इनके अभियानों का स्वरूप व्यापक जनाधार खो चुका है। मार खाए हुए सांप की तरह इनका अहंकार फुफकार रहा है। इनके ग्लानि-भरे शब्दों की दहाड़ नकली साबित हो चुकी है। इनके अभियान थोथे साबित होंगे, क्योंकि इनमें सत्य को स्वीकारने का साहस नहीं है। इनकी यात्राएं अथवा अभियान मुखौटे साबित होने वाले हैं। स्वच्छन्दता इनके जीवन की पर्याय बनती जा रही है। अन्ना हजारे की स्पर्द्धा में देश में क्रान्ति लाना चाहते हैं।

 

कई बड़े-बड़े नेताओं की आजकल पोल खुल रही है। उच्चतम न्यायालय ने भी करवट बदली है। कैग ने भी साहस एवं निर्भीकता का परिचय दिया है। आने वाले समय में देश का परिदृश्य भी बदलने वाला है। अगले चुनाव आते-आते तो लगने लगेगा कि देश फिर से जनता के हाथ में आ गया।

 

हमारा दर्शन कर्म एवं कर्म-फल का प्रतिबिम्ब है। आज हमारे नेता जिस तरह के कर्म करने में व्यस्त हैं, उनके फल भी उन्हीं को भोगने हैं। सत्ता के अहंकार में वे इस तथ्य को स्वीकार करें या न करें। जो नेता अब हमारे बीच नहीं हैं, उनके परिवारों पर दृष्टि डालना ही निश्चित हमारा मार्गदर्शन करेगा। कितने नेता कालेधन को भोग पाए? कितने नेताओं के पीछे खाने वाले भी नहीं बचे? जिनके पीछे बचे वे या तो उनकी ही पटरी पर चढ़ गए या अपराधी बन गए।

 

प्रश्न है कि किस प्रकार देश के नागरिक विकास के साथ जुड़ें। लगता है कि दवा के बजाय दुआ का सहारा लेना पड़ेगा। इससे अघिक अहिंसक आन्दोलन हो भी क्या सकता है! शब्द को भी इस देश में ब्ा्रह्म माना जाता है। असर होता है इसीलिए हर धर्म में प्रार्थना का विधान है। जप और अनुष्ठान किए जाते हैं। हवन में मंत्रों (सरस्वती) के द्वारा अर्थ (लक्ष्मी) की प्राप्ति के प्रयास होते हैं। हम भी किसी को शुभकामना देते हैं।

 

वरदान और अभिशाप की परम्परा शब्द की साधना एवं सामथ्र्य का ही प्रमाण है। इतनी बड़ी शक्ति जब हम में से प्रत्येक व्यक्ति के पास है, तब किसी भी आन्दोलन की आवश्यकता क्या रह जाती है? हम जहां हैं, जैसे हैं अपना प्रभाव डाल सकते हैं। कृष्ण कह गए हैं कि ममैवांशो जीव लोके। सबके भीतर बैठे हैं। कोई कम शक्तिमान नहीं है। कोई गरीब या लाचार नहीं है।

 

देश के निर्माण में और भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघष्ाü करने में सबकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। बिना किसी आवाज के, प्रदर्शन और हिंसा के। हम सब मिलकर भ्रष्टाचार को तथा जरूरत पड़े तो भ्रष्टाचारियों को भी मिटा सकते हैं। कुछ को तो देश अभी सड़ते हुए, तड़पते हुए, तकदीर की मार खाते हुए देख रहा है। इसी प्रकार जो हमारी तकदीर से खेलता है, बदलने को तैयार नहीं है, हम सब मिलकर उनकी तकदीर भी बदल सकते हैं। शर्त यही है कि प्रयास मन से हो, निरन्तर हो और संकल्प के साथ हो। तो आइए, हम मिलकर नित्य प्रार्थना करें कि—

 

‘हे आत्मा, हे परमात्मा, देश के सभी भ्रष्ट लोगों को, जीवों को, आत्माओं को सद्बुद्धि देना कि वे अपनी शक्तियों का मानव कल्याण के लिए उपयोग कर सकें। कर्म-फलों के प्रति सबकी जागरूकता बनी रहे। यदि कोई परिष्कार-सुधार करने को तैयार न हो, तो हे ईश्वर, वे तुम्हारा कोपभाजन बनें! उनकी हालत देखकर अन्य भ्रष्ट लोगों का साहस भी टूट जाए।

 

नए लोग भ्रष्टाचार से न जुड़ें। हम सबके मनों को देशभक्ति के धागे से, प्रेम और भाईचारे से बांधे रखना।’

अभी नवरात्रा में देशवासियों ने शक्ति पूजन का अनुष्ठान किया। ये जाग्रत शक्तियां ही सोए हुए देवों को जगाएंगी। हमारे भीतर का देव भी जाग उठे, फिर कभी न सोए! हर व्यक्ति भारतवष्ाü है। कुछ इण्डियन्स हैं। उनसे हमें भारत को बचाना है। संकल्प करें कि लक्ष्य प्राप्ति तक सतत चलते रहेंगे।

 

गुलाब कोठारी

 

अक्टूबर 13, 2011

नया विश्वास

तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने के बाद पहली बार आठ अक्टूबर को मुख्यमंत्री, सुश्री ममता बनर्जी से मिलने का अवसर मिला। मन में कई प्रश्न भी रह-रहकर उठ रहे थे। सम्पादक की हैसियत से समय मांगा था, किन्तु वहां पहले से ही पत्र विशेष के पत्रकार उपस्थित थे और पूरे समय बैठे भी रहे। अत: मेरे मन के भीतर के प्रश्न तो मेरे साथ ही वापस लौट आए।

 

 

हां, उन्होंने राजस्थानी उद्यमियों से प्रदेश (पश्चिम बंगाल) में निवेश करवाने के लिए सहयोग मांगा। इस मुद्दे पर गंभीर भी नजर आई। मैंने उनके समक्ष यह स्थिति भी रखी कि राजस्थान के पिछली पीढ़ी के उद्योगपति यहां खूब हैं। प्रदेश की पहचान भी बनाई है। तब नई पीढ़ी के उद्यमी स्वयं क्यों नहीं आ रहे हैं, इसकी समीक्षा भी होनी चाहिए। मैं यहां के उद्यमियों, चुनिन्दा व्यवसायियों के साथ संवाद करवा सकता हूं।

 

आप राजस्थान आएं तो वहां भी उद्यमियों के साथ बातचीत की जा सकती है। जो रूकावटें हैं, उनको दूर करने की पहल सरकार की ओर से होगी, तो नए लोग अवश्य आएंगे। पिछली सरकार में भी ऎसे अनुभव हुए कि राजस्थानी व्यापारियों का सम्मान तार-तार हुआ। इस पर ममता दी ने तुरन्त फैसला दे दिया। आप मुझे राजस्थानी उद्यमियों की सूची दें, जो यहां प्रतिष्ठित हैं।

 

उनको 17 अक्टूबर को होने वाली विचार-विमर्श बैठक में बुला लेंगे। फोन उठाया और उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी को पत्रिका के कोलकाता प्रभारी के फोन नम्बर लिखा दिए। कहा भी कि इनको भी कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाए। सूची के अनुरूप भी निमंत्रण-पत्र भेज दिए जाएंगे। ‘राजस्थान में तो आप हमारे ही हैं। आने की दरकार क्यों होनी चाहिए! हम पर भरोसा कीजिए।’

 

ममता दी की बात में कहीं अहंकार नहीं था। बंगाल के विकास के प्रति एक भावपूर्ण अपेक्षा का भाव भी था और स्नेह भी। उन्होने अपना मोबाइल नम्बर देते हुए एक चुटकी मीडिया के नाम जरूर काटी। ‘किसी को देना मत। लोग अभद्र संदेश भी देते हैं।’ आपको मिलने में कभी दिक्कत नहीं होगी। हमें राजस्थान से निवेश चाहिए। इसमें आपका सहयोग चाहिए। हर बार की तरह इस बार भी द्वार तक छोड़ने आई। सरस्वती लक्ष्मी में रूपान्तरित होना चाह रही थी।

 

गुलाब कोठारी

अक्टूबर 20, 2011

आकांक्षा के दाग

शिखर पर पहुंचने के बाद और ऊपर चढ़ पाने की संभावना भी समाप्त हो जाती है। जीवन तो गतिशील है, अत: नीचे की ओर चल पड़ता है। अन्ना टीम का राजनीति में जुड़ना और टीम में फूट पड़ना इसी बात को स्पष्ट करता है। अन्ना हजारे को देश ने सिर पर बिठाया, देशहित के प्रति उनकी संकल्पबद्धता देखकर। जनता को इस बात की चिन्ता नहीं रही कि अन्ना टीम के सदस्य कौन हैं। यह विश्वास अन्ना के भरोसे छोड़ दिया था। कौन थाह ले सकता है जनता के दिलों की, इस अटूट विश्वास की? अन्ना ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध एक आन्दोलन सा खड़ा कर दिया। सारे हथियार जनता के हाथ सौंप दिए। जिसके आगे सूचना का अघिकार भी निष्प्रभावी साबित हो गया।

 

 

हरियाणा के हिसार उपचुनाव में अन्ना टीम का कांग्रेस के विरोध में चलाया गया अभियान अन्ना के राष्ट्रव्यापी अभियान को डस गया। लोकपाल विधेयक से जुड़ा अभियान जितनी तेजी से जन समर्थन जुटा पाया, यह अपने आप में एक मिसाल बन गया। देश के इतिहास का गौरवशाली पृष्ठ बन गया। क्योंकि उसमें देशहित समाहित था। अन्ना का पूर्ण मनोयोग एवं भावनाओं की पारदर्शिता थी। कहीं भी संदेह की अंगुली नहीं उठी। जैसे ही राजनीति के दलदल में प्रवेश किया, लोगों की महत्वाकांक्षा सामने आ गई। अन्ना टीम में अन्य राजनीतिक दलों की घुसपैठ तथा खरीद-फरोख्त के चर्चे होने लग गए। पृष्ठभूमि से राष्ट्रीय संवेदना का लोप हो गया।

 

ह्वदयजीवी-मनोजीवी अन्ना के यात्रा-पथ को बुद्धिजीवियों ने मोड़ने का कुत्सित प्रयास कर डाला। वे यह भूल गए कि एक भारतीय संन्यासी- बाबा रामदेव के इसी प्रकार के एक देशव्यापी अभियान को मुंह की खानी पड़ी थी। भाजपा का पक्ष लेने के कारण ही।

 

सरकार को अभियान को कुचलने का मौका मिल गया था। टीम ने भी अन्ना को देश के समक्ष कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार को एक अवसर दे दिया सुनी-अनसुनी करने का। देश के बुद्धिजीवी हर क्षेत्र में आज ऎसा ही प्रदर्शन कर रहे हैं। संवेदनशीलता ढूंढ़ने पर भी उनमें दिखाई नहीं देती।

 

अब जब दो वरिष्ठ साथियों ने टीम का साथ छोड़ने की घोषणा कर दी है, यह देशवासियों की लिए सदमा भी है और आश्चर्य भी। एकता परिषद के अध्यक्ष तथा गांधी शान्ति प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष पी.वी. राजगोपाल तथा मैग्सेसे सम्मान प्राप्त राजेन्द्र सिंह द्वारा इस्तीफे की घोषणा कर देना टीम के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है। राजनीति से जुड़ने का अर्थ है कुछ पाने की कामना। इसी को मांगना कहते हैं। अन्ना की भाषा में यह स्वर कभी सुनाई नहीं दिया। अरविन्द केजरीवाल पर फेंकी गई चप्पल इस स्वर की ही प्रतिक्रिया है।

 

आज सारा आन्दोलन एक चौराहे पर खड़ा हो गया है। ठहर गया है। इसकी गति रूक गई तो जल की तरह दूषित हो जाएगा। अन्ना को चाहिए कि टीम का पुन: मुल्यांकन करें, महत्वाकांक्षियों की छुट्टी करें तथा देश को फिर से विश्वास में लें कि उनका हर एक कदम संकल्प के साथ केवल देशहित में उठेगा। राजनीति से दूर! बहुत दूर!!

 

गुलाब कोठारी

 

अक्टूबर 25, 2011

एक ही किरण

दीपावली का पर्व लक्ष्मी-उल्लू और अंधकार का है। उल्लू को प्रकाश में दिखाई नहीं देता। इसीलिए पर्व रात में ही मनाया जाता है। आज रोशनी आधार बन गई है पर्व के वैभव का, क्योंकि आज लक्ष्मी की परिभाषा भी बदल गई। अब केवल धन, दौलत, वैभव ही लक्ष्मी कहलाते हैं। इनको शास्त्रों में जड़ कहा है। इनके पीछे भागने वाले की चेतना भी जड़ हो जाती है। जड़ रूप लक्ष्मी उल्लू पर बैठकर जब आती है, तब व्यक्ति तामसिक प्रवृत्तियों की ओर मुंह करता है। संसार के सारे कुकर्म, तामसिक व्यवहार तथा अज्ञान के अहंकार का एक ही आश्रय है-अंधकार। आध्यात्मिक जीवन से कोसों दूर। यही कारण है आज की वैश्विक  अर्थदशा का।

 

 

आज विश्वभर में आर्थिक संकट है। त्राहि-त्राहि मची है। सैकड़ों शहरों में जनता सड़कों पर उतर चुकी है, क्योंकि लोग लक्ष्मी के जड़ भाग के पीछे दौड़ रहे हैं। अगले आठ-दस वर्षो की आय उधार लेकर अग्रिम खर्च कर चुके हैं। विकसित देशों के दबाव में उनके आश्रित देशों ने भी नकल करनी शुरू कर दी। नई व्यापार-विपणन प्रणाली, अनावश्यक के प्रति आकर्षण, बचत के विपरीत जीवन शैली तथा जीवन में स्थायित्व का अभाव उनके कष्टों का कारण बन गया। समाज की संरचना इसी क्रम में टूट गई। व्यक्ति एकल परिवार के रूप में अकेला पड़ गया। किसी के लिए जीना, संघर्ष करना तो भूल ही गए।  एक बेहोशी की अवस्था में व्यक्ति यंत्रवत् चलने लगा।

 

हम आज भी टिके हैं। हमारी काली कमाई विदेशों में जमा होकर सड़ रही है। भ्रष्टाचार है कि रूकने का नाम ही नहीं लेता। काली कमाई और सामन्तवादी लोकतंत्र ने महंगाई पर लगाम लगाना ही छोड़ दिया है। उसके बाद भी यह देश सोने की चिडिया ही बना हुआ है। दुनिया भर के उद्योगपति यहां आ चुके। हमारे बन्द हो चुके ‘ब्राण्ड्स’ के नाम पर या किसी बहाने एक रूपए के माल के पचास रूपए लेकर अपने देश का विकास करने में लगे हैं। दैनिक उपकरण, प्रसाधन क्या नहीं आया।

 

और कारें? जो कुछ अपने देश में नहीं बेच पा रहे, यहां आकर बेच रहे हैं। अब तो खुदरा व्यापारियों को भी बुलाया जा रहा है, ताकि भारत पूरी तरह लूट लिया जाए। हमारे जनप्रतिनिघि ही देश को बेचने में, फिर से आर्थिक गुलाम बनाने में लगे हैं। देश के सामने, विशेष कर नई पीढ़ी के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। शिक्षा उसे सब्जबाग तो दिखा रही है, किन्तु भ्रष्टाचार के कारण बेरोजगारी का ताण्डव भी उतना ही बड़ा है।

 

आधुनिक व्यापारिक ढांचे से, लाभ की नई अवधारणा से, स्पर्घा और प्रतिस्पर्घा से, धन की तृष्णा के ताण्डव से और इसके कारण बढ़ती अपराध प्रवृत्तियों से जन-जन दु:खी है। व्यापार अब शुद्ध धन आधारित हो गया। बड़े वेतनमान की शर्ते भी लाभ के साथ जुड़ी हैं। रास्ता कोई भी पकड़ा जा सकता है – नैतिक या अनैतिक। मुनाफे की सीमा ही समाप्त हो गई। मानसिकता अभावग्रस्त हो गई। प्राप्ति का सुख किसी को नहीं रहा।

 

अप्राप्य की ओर, दिशाहीन होकर भाग रहे हैं। हर कोई असंतुष्ट है। अमीर-गरीब की खाई बढ़ती जा रही है। हर देश की सरकार गरीबों के सहारे बनती है और नीति-निर्घारण अमीरों अथवा विकसित देशों को ध्यान में रखकर किया जाता है। यही बढ़ते भ्रष्टाचार का मूल कारण भी है और सार्वजनिक जीवन में इसी कारण नैतिकता का पतन भी हो रहा है। लक्ष्मी के वाहन की अंधकार-यात्रा स्पष्ट रूप में दिखाई दे रही है। स्वयं लक्ष्मी जड़ है, निष्क्रिय है। इसकी गति एवं दिशा उल्लू ही तय करता है।

 

लक्ष्मी के बढ़ते प्रकोप ने सरस्वती को (शिक्षा को) भी स्पर्घा की आग में झोंक दिया। नम्बर महत्वपूर्ण हो गए, बच्चा मशीन बन गया। व्यक्तित्व गौण हो गया। चार में से एक सही उत्तर ढूंढ़ने की कोचिंग दिलाई जा रही है। सवालों का जीवन से जुड़ा होना जरूरी नहीं है। इस पढ़ाई में उतरने के लिए भी ऋण लेना पड़ता है, ब्याज देना पड़ता है। खाएगा क्या? इन सबके जो परिणाम सामने आ रहे हैं, वे ही आर्थिक दुर्दशा के कारण हैं। शिक्षा के उद्देश्य को बदलना ही निराकरण का एकमात्र मार्ग है।  शिक्षा को रोजगार के साथ-साथ व्यक्तित्व निर्माण से भी आवश्यक रूप से जोड़ना होगा। जहां सरस्वती का वास नहीं है, वहां लक्ष्मी नहीं रह सकती – स्थायी भाव में। बांधने की कोशिश की तो खानदान को ही ले डूबेगी।

 

अत: हमें देश को ज्ञान का मार्ग उपलब्ध कराना चाहिए। धर्म के स्थान पर सम्प्रदाय निरपेक्ष बनाना चाहिए। तब देश के युवा आसानी से एक मंच पर आ सकेंगे। दीप से दीप जलेगा। स्वतंत्र चेतना का नया युग शुरू हो सकेगा।

 

रोशनी की ऎसी ही एक किरण निकली है-सूचना का अघिकार। इसके आगे तीनों स्तंभ भी लाचार और मीडिया भी। सफेदपोश लोगों के काले-चेहरे तेजी से उजागर होने लगे। नामीगिरामी सत्ताधीश जेल जाने लगे। राजनेताओं में हड़कम्प मच गया।

 

कई जगह सूचना देने से इन्कार भी किया गया, चुप्पी साधकर बैठने का प्रयास भी किया, डराने-धमकाने की शिकायतें प्राप्त हुइंü, किन्तु अन्त में अघिकांश लोगों को सफलता हाथ लगी। यह सरकारों को, नेताओं तथा अघिकारियों को रास नहीं आ रहा। अब रह-रहकर यह आवाजें उठ रही हैं कि इस कानून पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। जनता के लिए बड़ी चुनौती है। हम सबको मिलकर इसका सामना करना चाहिए और सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि कोई भी सरकार ऎसा नहीं कर पाए।

 

तो उठो, मेरे नौजवान दोस्तो! एक बार फिर नए सिरे से इस आजादी की जंग का बिगुल बजाएं। आपके शंखनाद से वैश्विक भ्रष्ट ताकतें कांपने लगें। देश के भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने का संकल्प करें! फिर देखें सरस्वती का चमत्कार। सरस्वती से ही लक्ष्मी पैदा होती है। हम सरस्वती से जुड़ें। हमारा संकल्प यदि दृढ़ है तो लक्ष्मी बरसेगी। उसको लाना है, चिरस्थाई बनाना है, उसका सामूहिक उपभोग करना है और लक्ष्मी चोरों (भ्रष्टों) को नंगा करके हम सड़क पर ले आएं। हमारे पास सूचना का अघिकार जैसा ब्रह्मास्त्र है।

 

आज हम सबको मां लक्ष्मी-सरस्वती तथा गणपति की साक्षी में एक संकल्प कर लेना चाहिए कि साल में कम से कम दो बार सूचना के अघिकार का उपयोग करेंगे। ईश्वर हमें शक्ति देगा और राजनेताओं को सद्बुद्धि, ताकि कोई हमारे इस अघिकार को दबाने का कुत्सित प्रयास भी न करे। कुछ घरों से मुक्त होकर लक्ष्मी हर घर में प्रतिष्ठित हो।

 

गुलाब कोठारी

 

अक्टूबर 29, 2011

इस लोकतंत्र के लिए

प्रतिष्ठा में,
मुख्य चुनाव आयु्रक्त
भारत सरकार
मान्यवर,
आज देश में हमारे जनप्रतिनिधि जिस प्रकार लोकतंत्र की धçज्जयां उड़ा रहे हैं, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं, जिस प्रकार क्षुद्र स्वार्थो के लिए देश के भविष्य को गिरवी रख रहे हैं, अलग-अलग नीतियों की आड़ में तथा वोट की राजनीति से देश को खंड-खंड कर रहे हैं तब आम नागरिक क्यों मायूस नहीं होगा। न रोजगार, न शिक्षा, न स्वास्थ्य, न कोई समानता एवं सम्मान का भाव। अपने ही देश में पराया बनकर जी रहा है हर एक भारतवासी!

समय करवट बदलता दिखाई पड़ रहा है। न्यायपालिका ने, विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय ने देश का नए सिरे से विश्वास जीतना शुरू कर दिया है। उच्च न्यायालयों की स्थिति अभी कई प्रदेशों में स्पष्ट नहीं है। लेकिन जिस प्रकार कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) ने केंद्रीय मंत्रियों, सत्ताधीशों के कार्यो का विवरण निर्भीकता एवं निष्ठा के साथ देश के समक्ष रखा, सिर आंखों पर बिठाने के काबिल है। इस कार्य ने भी न्यायपालिका को प्रेरित किया है। दोनों संस्थाओं ने मिलकर देश में फिर से नया वातावरण बनाना शुरू कर दिया है।

हां, लोकायुक्त संस्था इस दृष्टि से अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पाई। बल्कि न्यायपालिका के मुंह पर तो स्याही ही अधिक पोती है। राज्य सरकारों से अपेक्षा रखने वाले लोकायुक्त कभी सरकार के विरूद्ध कार्य नहीं करते। विशेष रूप से मंत्रियों एवं मुख्यमंत्री के विरूद्ध। दूसरी ओर देश में लोकपाल बिल को लेकर अभियान चल रहे हैं। बिल के प्रारूप पर गहन चिंतन-मनन तो पहले ही हो जाना चाहिए।

चुनाव आयोग का स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण है तथा आपकी छवि भी उपरोक्त दोनों संस्थाओं के शीर्ष पुरूषों जैसी उज्वल ही है। अत: चुनाव सुधारों की दृष्टि से, परोक्ष प्रभाव की दृष्टि तथा कानूनों की व्याख्या की दृष्टि से आपकी भूमिका अतीव महत्वपूर्ण है और लोकतंत्र को सही दिशा में ले जा सकती है।
इनमें एक मुद्दा तो सीटों के आरक्षण का है। आरक्षण का प्रतिशत तो सरकारें तय करती हैं, किंतु लागू करना तो आपके नियंत्रण में होता है। आज तो सीटों को ही आरक्षित कर दिया गया है। कुछ महिलाओं के नाम पर, तो कुछ अजा-जजा के नाम पर। कहीं अल्पसंख्यक दिखाई देते हैं। क्या आप इसको शेष देशवासियों का अपमान नहीं मानते? क्या आदिवासी क्षेत्रों में गैर आदिवासी नहीं रहते? क्या पूरी उम्र वे अपने अधिकारों से वंचित ही रहेंगे? जिन सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया गया है, क्या वहां के आधे (पुरूष) मतदाता कभी चुनाव लड़ने का सपना नहीं देख पाएंगे?

अब महिला आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने की बात चल रही है। पांच-पांच साल के लिए बारी-बारी से आरक्षण किया गया, तो अगली बारी दस वर्ष बाद आएगी। क्या न्याय की दृष्टि से यह उचित है? अथवा हर बार हर मतदाता एवं राजनीतिक दल के लिए अवसरों की उपलब्धता यथार्थपरक होगी? आपसे आग्रह है कि इस बारे में अपनी स्पष्ट राय से सरकार को अवगत कराते हुए सभी कानून, नीतियां दलों की सूचियों पर क्रियान्वित कराएं। सीटों पर नहीं। हर दल की सूची में श्रेणीवार प्रतिशत रहना चाहिए। सीटें मुक्त रहनी चाहिए। यदि महिलाओं का प्रतिशत 33 प्रतिशत है, तो सूची में एक तिहाई नाम महिलाओं के रहने चाहिए। चुनाव किसी भी सीट से लड़ सकती हैं। दल तय करें, सरकार या चुनाव आयोग तय नहीं करें। तब किसी नागरिक को अपमानित नहीं होना पड़ेगा।

इसी प्रकार अपराधियों द्वारा चुनाव लड़ने का मुद्दा है। जेल में सजा काट रहे अपराधी चुनाव लड़ते रहें, जनप्रतिनिधि बनने के योग्य मान लिए जाएं, ये तो लोकतंत्र, जनता तथा चुनाव आयोग की गरिमा के अनुकूल नहीं है। तब चुनाव प्रक्रिया का ही अपराधीकरण क्यों नहीं होगा? क्यों चुनाव संबंधी इतनी याचिकाएं न्यायालयों में पहुंचती हैं और क्यों इनका निपटारा छह माह में नहीं होता? न्यायपालिका को जबरन पार्टी बनने पर मजबूर किया जाता है। प्रदेशों के अधिकतर चुनाव आयुक्त एवं न्यायालय सत्तापक्ष से प्रभावित रहते हैं। वे झूठी जानकारियां देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं। प्रत्याशी स्वयं अपराधी है और सूचित नहीं करता, संपत्ति का ब्योरा गलत दे रहा है, चुनाव अधिकारी यह सब जानता है। चुनाव खर्च को आंखों से देखता है, रिकॉर्ड भी करता है, किंतु सत्ता के प्रभाव में कोई कार्रवाई नहीं करता। लोकतंत्र की हत्या होती जाती है। तब क्यों अच्छे लोग आकर चुनाव लड़ेंगे? यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है। देश आपकी ओर भी देख रहा है। आप, कैग एवं मुख्य न्यायाधीश यदि ठान लें तो फिर से यह देश आजादी की हवा में श्वास ले सकेगा।
गुलाब कोठारी

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