भारतीय दर्शन में विवाह संस्था को सृष्टि का मूल आधार भी माना है और प्रति सृष्टि (विलय या मोक्ष) का आधार भी माना है। हमारे अध्यात्म के चारों अंगों-शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा के लिए पुरूषार्थ की व्यवस्था दी है। मोक्ष आत्मा का विषय है। कामना (काम) मन का क्षेत्र है। अर्थ शरीर चलाने की आवश्यकता है और धर्म हमारी बुद्धि को प्रज्ञा रूप देने का कार्य करता है। ये सारे कार्य भी जीवन के भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रूपों में किए जाते हैं। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों ही आश्रम केवल गृहस्थाश्रम पर टिके रहते हैं। अत: जीवन का मूल केन्द्र भी गृहस्थाश्रम को ही माना है। उसी के अनुरूप विवाह संस्था का स्वरूप निर्माण हुआ है। हर समाज की इकाई यह गृहस्थ ही नजर आएंगे। समाज के लिए व्यक्तित्व निर्माण भी यहीं होता है। इसी से किसी भी राष्ट्र का स्वरूप बनता है।
इस दृष्टि से भारतीय दर्शन के कुछ सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक है कर्म और कर्मफल का सिद्धान्त। दूसरा है पुनर्जन्म का सिद्धान्त। तीसरी है मोक्ष की अवधारणा। व्यक्ति को प्रकृति का अंग और ईश्वर का अंश मानकर उसका निरूपण किया गया है। व्यक्ति को पिता, पितामह, प्रपिता आदि से जोडकर भी देखा गया है और माता, मातामह और प्रमाता आदि से भी। सृष्टि युगल तत्व के सिद्धान्त पर आगे बढती है, अत: इसे ही जीवन की पूर्णता का दर्जा प्राप्त है। विवाह का मूल कहा है। सम्पूर्ण पितृलोक और देवलोक की संस्थाएं इस पर टिकी हुई हैं। ब्रह्म और माया के स्वरूप को भी विवाह संस्था के माध्यम से ही समझने का मार्ग बताया गया है। यही कामना से आप्तकाम होने का मार्ग भी है। माया ही कामना या क्षुधा रूप होकर जीवन को आगे बढाने वाली शक्ति है। गृहस्थाश्रम माया के प्रवेश के साथ जुडता है और वानप्रस्थ के साथ इसके द्वार बन्द हो जाते हैं। भोग संस्कृति में व्यक्ति पूरी उम्र गृहस्थ रहता है। उसके पास काम-अर्थ के अतिरिक्त कोई चिंतन ही नहीं होता। वह पूरी उम्र जड शरीर से ही बंधा रहता है। चेतना की दिशा में उसकी यात्रा शुरू ही नहीं होती। जबकि जीवन का पहला सोपान ही चेतना को जाग्रत करना है। उसको संस्कारित करके मानवीय धरातल पर लाना होता है। तब आत्मा जीने लगता है-इस शरीर में।
विवाह नर-नारी के संकल्पित योग का नाम है। प्रारब्ध ही इसका निमित्त बनता है। जीवन की दिशा यह संकल्प तय करता है। दोनों का संकल्प, दोनों के सपने और पुरूषार्थ में सामंजस्य रहता है। दोनों अपने में स्वतंत्र जीव भी हैं और दोनों के प्रारब्ध भी अलग-अलग होते हैं। नए कर्म साथ-साथ किए जाते हैं। दोनों के फल साथ-साथ भोगने पडते हैं। ज्ञान की आवश्यकता इन परिस्थतियों को समझने में ही होती है। वैवाहिक सम्बन्धों में प्रारब्ध भी परिलक्षित होता है और वर्तमान कर्म भी। दोनों को ही ध्यान में रखकर व्यवहार करना पडेगा। इसके बिना साथ रहना केवल सामाजिक लाचारी बन जाती है।
मूल रूप से विवाह के दो मुख्य पहलू होते हैं। प्रेम को पैदा करना, पल्लवित करना और इसका आगे विस्तार करना। इसी के साथ दाम्पत्य रति (स्त्रेह, वात्सल्य, श्रद्धा और प्रेम) का विकास इस तरह से करना कि यह देव रति में बदल सके। अर्थ और काम को धर्म से मर्यादित करते हुए, कामनाओं की पूर्ति करके, निष्काम हो सकें। गृहस्थाश्रम सृष्टि विस्तार का काल है। अच्छी, योख्य, सुस्कृत संतान के लिए प्रार्थना करें, ताकि उसी तरह का जीव हमारी ओर आकृष्ट हो सके। जीव के प्रवेश के बाद उसके स्वभाव को समझकर उसे मानव रूप में माता संस्कारित करे। बाद में माता-पिता और गुरू उसे व्यावहारिक और आध्यात्मिक ज्ञान में आगे बढाएं। इसके अभाव में जीवन का सुरक्षा भाव छूट जाता है। तब व्यक्ति देने के स्वभाव को ग्रहण ही नहीं कर सकता। वह सदा ही लेने की सोचता रहता है। उसका विस्तार ही संभव नहीं है। उसकी मानसिकता संकुचित होकर रह जाती है।
भक्ति भाव व्यक्ति सोच समझकर पैदा करता है। पहले अपना इष्ट तय करता है। फिर धीरे-धीरे उसकी भक्ति में डूबता चला जाता है। प्रेम का भी यही स्वरूप है। यह भी होता नहीं है, किया जाता है। नित्य अभ्यास और संकल्प के द्वारा एकाकार हो जाता है। अपने आप उठने वाला प्रेम का ज्वार स्थाई भाव में टिक पाना कठिन है। वहां संकल्प उतना दृढ पूरी उम्र नहीं रहता। उस कामना को समझने के लिए पश्चिम के बडे देशों की ओर देखना होगा। जहां विवाह सम्बन्ध अपेक्षाओं पर ही आधारित रहते हैं। अहंकार का टकराव नित्य रहता है। समर्पण की तो कोई सोच भी नहीं सकता। इसका कारण है वहां की जीवन शैली में अधिदेव (प्राण) की अवधारणा का अभाव। वहां शरीर है, बुद्धि है बस! शरीर जड पदार्थ है। इसका भोग भी जड पदार्थ की तरह किया जाता है। एक निश्चित ढांचे में जीवन चलता है। इसमें जीवन कहां ठहर सकता है। जीवन में तो नित नया होता रहता है। सम्बन्धों के विच्छेद का किसी को खेद कहां होता है। वे अपने पैरों पर खडे रहने को सक्षम होते हैं। अत: साथी के छूटने की उतनी चिन्ता क्यों करें! इसीलिए वहां पर विवाह संस्था जर्जर होती जान पड रही है। साथ रह लेंगे, किन्तु शादी नहीं करेगे।
इसका एक कारण यह भी है कि वहां लडके-लडकी की शिक्षा एक-सी हो गई। लडकी भी लडकों जैसे ही जी रही है। लडका बनकर। न उसे पत्नी बनने की चिन्ता, न मां बनने की। न ही संस्कारों जैसे शब्द से उसका परिचय है। पूरा समाज ही लडकों जैसा व्यवहार करने लग गया। लडकी होकर लडकी जैसे जीने को कोई तैयार नहीं। एकांगी हो गया। कुदरत का इतना बडा अपमान ही वहां के नारी क्रन्दन का मूल है। हम भी उधर ही जाने में प्रसन्नता/गर्व का अनुभव करते हैं। अत: जीव जिस योनि से मां के पेट में आता है, वैसा ही मनुष्य रूप लेकर पैदा हो जाता है। उम्र भर शरीर का उपभोग भी उसी तरह करता चला जाता है।
पति-पत्नी दोनों बौद्धिक धरातल पर जीते हैं। पत्नी का भावनात्मक स्वरूप विच्छिन्न हो रहा है। मन में संवेदना का स्तर गिर चुका है। बच्चों के प्रति भी वैसा मोह नहीं दिखाई देता। ममता, करूणा, वात्सल्य जैसे भावों का अभाव बढता जा रहा है। लडकी के शरीर में लडके की बुद्धि कार्य करती है। दोनों का अहंकार झुकने को तैयार नहीं होता। शरीर की पकड छूटते ही अहंकार हावी हो जाता है और झट से अलग हो जाते हैं। अगले विवाहों में शरीर की पकड क्रमश: कम होती ही जाती है। वैसे भी दो लडके एक साथ कितने साल पति-पत्नी जैसे रह सकते हैं! एक को गर्म दूसरे को नरम रहना ही पडेगा। सुख के साथ दुख मे भी मिल बैठकर पार चलना होगा। इस माहौल में न तो पुरूषार्थ का धर्म दिखाई देता है और न ही दाम्पत्य रति का विकास। चेतना का धरातल तो शून्य प्राय: होता है। कैसे कोई स्वयं को सृष्टि का अंग मान सकता है या किसी की मर्यादा में जीना स्वीकार कर सकता है।
विवाह संस्था के कारण कामना का संसार आगे बढता है। दाम्पत्य रति से कामना तृप्त होती है। पितृ और देव संस्थाओं का पोषण करते हुए दोनों आप्तकाम होकर शान्तानन्द में विहार करते हैं। यही मोक्ष है। संकल्प ही मार्ग है और विवाह ही इसका निमित्त बनता है।
गुलाब कोठारी

Mai Vivah ko sampuran jivan ka most part manta hu.Nar or Nari ke yog se ek new shakti ka janam hota hai.
Comment by Dinesh Vatsal — मई 12, 2009 @ 7:00 |
हर यज्ञ से नई सृष्टि होती है।
Comment by gulabkothari — मई 19, 2009 @ 7:00 |