Gulabkothari's Blog

June 1, 2009

विवाह-5

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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भौतिक विकास के साथ-साथ जीवन भी इतना भौतिकता से चिपक गया कि शरीर भी एक उपकरण बनकर रह गया। व्यक्ति जीवन भर इसके सहारे प्रयोग करता रहता है। प्रयोग करने की दृष्टि भी भौतिक बन गई है, बाहरी ज्ञान पर आधारित हो गई। जिस प्रकार शरीर नश्वर है, उसी प्रकार बाहर का ज्ञान भी नश्वर है। पेट भरने से आगे उस ज्ञान की उपादेयता नहीं है। इसीलिए आज ज्ञान पेट भरने का साधन बनकर रह गया। जीवन के साथ इसका दूसरा कोई सम्बन्ध ही नहीं रह गया है।

इसका पहला प्रभाव तो यह हुआ कि व्यक्ति का प्रकृति से सामंजस्य टूट गया। शरीर के भीतर प्रकृति भी कार्य करती है और हम स्वयं प्रकृति द्वारा संचालित है, यह विचार ही जीवन से बाहर हो गया। व्यक्ति स्वयं ही कर्ता और स्वयं का नियन्ता बन गया। उसको न तो शरीर की क्रियाओं की ही जानकारी है, न ही इसके भीतर होने वाली क्रियाओं की। व्यक्ति बाहरी संसार में ही जीता है। जो कुछ उसकी इन्द्रियों की पकड़ में आता है, उतना ही उसका संसार रह गया है। उसके आगे के जीवन क्रम को समझना आज उसकी आवश्यकता ही नहीं रह गई। जो कुछ उसे अच्छा लगता है, करने लग जाता है। हेय और उपादेय का भेद उसके जीवन से सिमट ही गया है। बाहरी ज्ञान की स्थूलता के कारण सूक्ष्म ओझल हो गया है। यही दृष्टि उसके निजी जीवन को प्रभावित करती है।

मेरे देखते-देखते कितने विदेशी मित्रों की शादियां हुई, तलाक हुए, फिर शादियां हुई। आज खुश कोई नहीं है। शादियां भी लम्बे काल तक नहीं टिक पाती। जिनको हम भारतीय लोग संस्कार कहते हैं, वहां नहीं दिखाई पड़ते। जो वहां हो रहा है, वही वहां के संस्कार हैं। जीवन शुद्ध शरीर, धन और अपेक्षाओं पर जुड़ा है। न मिलने में देर, न बिछुड़ने में।

ऎसा ही कुछ नजारा यहां भी समृद्ध परिवारों में देखने को मिलने लगा है। विवाह तो इतनी धूम-धाम से होते हैं कि इससे बड़ा झूठ जीवन में कुछ होता ही नहीं। वर-वधु के मां-बाप भी वैभव की चकाचौंध का ही बखान करते रहते हैं। परम्पराएं इतनी सख्ती से निभाई जाती हैं कि जरा कहीं चूक न हो जाए। स्वयं को तो परम्परा की याद भी नहीं होती। कोई याद दिला जाता है। वर-वधु मात्र यांत्रिक दिखाई पड़ते हैं। उनको कोई आदमी मानकर देखता ही नहीं है। घरवालों का ध्यान तो मेहमानों के साथ फोटो खिंचवाने में लगा रहता है। वर-वधु केवल उठक-बैठक करते हैं। उनको पानी पिलाना भी किसी को याद नहीं होता। मां-बाप का भावनात्मक जुड़ाव भी पश्चिम जैसा ही दिखाई देता है। शादी पैसे के जोर पर होती है। आदमी कहीं नहीं होता। होटल के लोग मांगें पूरी करते रहते हैं। दोनों परिवार के लोग सज-धजकर टहलते रहते हैं। इसी का तो नाम अब विवाह पड़ गया है। उस भीड़ में कौन तो आया, खाया भी कि नहीं खाया, कौन जाने! लिफाफे खोलेंगे, तब ध्यान आएगा।

पूरी की पूरी विवाह पद्धति ही नकली बनकर रह गई। तोरण-तलवार-घोड़ी जीवन में जुड़े ही नहीं, तब विवाह में क्यों चिपके हुए हैं फेरों का अर्थ और कारण किसी को मालूम ही नहीं, तब क्यों खा रहे हैं फेरो का समय पंडित तय करता है। जल्दी कराने के लिए उसे भी रिश्वत दी जा रही है। मंत्रों की भी जरूरत किसी को नहीं लगती। फिर यह दिखावा क्यों मुहूर्त निकल जाने के समय तक तो बारात ही नहीं आती। सारे घर वाले सड़क पर नाचते रहते हैं। लड़की वाले के घर पर नाचे, तब भी समझ में आता है। सज-धजकर सड़क पर और इसी वातावरण में हम वर-वधु का मंगल भविष्य ढ़ूढ़ रहे हैं। अनुष्ठान के जरिए देवता का आशीर्वाद मांग रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि जैसी प्रार्थना होगी, वैसा ही फल मिलेगा।
इस विवाह का वर-वधु के आत्मीय संबंध से कोई लेना-देना ही नहीं है। मां-बाप “कन्यादान” भी कर गए और वहां कन्या की परिभाषा ही लागू नहीं होती। वहां तो एक लड़की है, जैविक लड़की। घर छोड़कर जा रही है, पति के साथ। क्यों जा रही है, किसी ने नहीं बताया उसे। नए जीवन को कैसे परिभाषित करना है और क्यों, नहीं मालूम। संस्कारों का अध्याय तो शायद इसकी मां को भी नहीं मालूम। देखा-देखी का नाम ही संस्कार है।

देखा-देखी ही विवाह का कारण है। दोनों मिलकर गृहस्थी चलाएंगे, कमाएंगे, पेट पालेंगे और बस!
विवाह की तैयारी से ही पता चल जाता है कि हम कहां जा रहे हैं। लड़का कार्यालय में छुट्टी मांगता है -”सर मेरा विवाह है। पांच दिन की छुट्टी चाहिए। कपड़े सिलवाने हैं, सर। आप भी जरूर आइएगा।” उधर लड़की वाले कपड़ों और गहनों में उलझे दिखाई देंगे। उसके यहां ऎसा था, हमारे यहां उससे अच्छा होना चाहिए। सगाई भी विवाह के एक दिन पहले ही कर लेंगे। फेरों से पहले “रिंग सेरेमनी” भी होगी। लड़के की अंगुली की नाप भी चाहिए। लेकिन इस बीच मां को बेटी के साथ बैठकर अपने अनुभव बांटने की आवश्यकता ही नहीं लगती। वह तो पैसा देकर उसी मांग पूरी करके संतुष्ट रहती है।

लड़की को यह तैयारी जरूर करके जाना है कि जरूरत पड़ने पर अपने पांव पर खड़ी रह सके। इसी शक्ति के कारण उसका टकराव का मार्ग खुल गया। समझौता एक सीमा के आगे नहीं होता। दोनों की अपनी-अपनी पहचान भी बनी रहती है। एक तो होते ही नहीं ; केवल साथ रहते हैं। इनको अलग रहने में कितनी देर लगेगी। ससुराल से “लेटकर निकलने वाली” पत्नियां तो इतिहास में ही पढ़ाई जाएंगी। विवाह में 15 पीढियां अब नहीं जुड़ेंगी। केवल एक पीढ़ी में ही आपस में विवाह होंगे और उसी पीढ़ी में पूरे भी होते जाएंगे।

गुलाब कोठारी

6 Comments »

  1. सारी उम्र की कमाई शादियों में झोंक दी जाती है,शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बना रही है एक शादी पर यदि हम औसत पांच लाख का खर्च माने तो सालाना यदि कम से कम केवल राजस्थान में ही दस हजार शादियाँ हो तो पांच अरब रुपये शादियों में उड़ा दिए जाते है … इतने पैसों से कितनी जन कल्याणकारी योजनायें संचालित की जा सकती है सोचा जा सकता है !

    Comment by vidhan — June 4, 2009 @ 7:00 | Reply

    • संस्कार धन से अघिक महत्वपूर्ण हैं।

      Comment by gulabkothari — June 11, 2009 @ 7:00 | Reply

  2. Kothariji, All your columns in the Patrika on sundays are just beyond compare and eye opening for the cultural development of India. I have been reading your articles for a long-long time. Such Columns are essential for today’s generation. Only people like you could lead such a cultural movement for the betterment of the country. I do not have words for your article ‘Main aur voh’ and also the one that I read years back on women’s so called progress. Regards!

    Comment by m mandan — June 2, 2009 @ 7:00 | Reply

  3. विवाह जैसे पवित्र बंधन को आज एक दिखावा बना दिया गया है..!इस अवसर पर होने वाले विभिन्न आयोजनों में लड़का लडकी तो गौण हो गए है..!उन्हें विवाह के सही मायने समझाने का वक़्त किसी के पास नहीं है…

    Comment by RAJNISH PARIHAR — June 1, 2009 @ 7:00 | Reply

    • इसलिए दो बनकर जीते हैं, एक नहीं हो पाते ।

      Comment by gulabkothari — June 11, 2009 @ 7:00 | Reply


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