Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 27, 2011

विज्ञान भीतर भी

बाल वैज्ञानिकों की राष्ट्रीय कांग्रेस जयपुर में कल शुरू हो गई। देश के लगभग डेढ़ हजार बच्चे इसमें भाग ले रहे हैं। आज विज्ञान जीवन शैली का सर्वाघिक महत्वपूर्ण अंग बन गया है। भारत में धर्म का स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है। सदियों से धर्म और विज्ञान आमने-सामने डटे रहे हैं। अब समय आ गया है कि हमको धर्म एवं विज्ञान को नई परिभाषा देनी चाहिए। क्योंकि दोनों के सहयोग से ही जीवन में पूर्णता संभव है।

 

 

आज पश्चिम, विज्ञान के कीर्तिमान स्थापित करने के बाद भी जीवन में भटकाव तथा तनाव से मुक्त नहीं हो पाया। पूरब में तनाव नहीं है, किन्तु समृद्धि हाथ से छूटती दिखाई पड़ती है। जब कि सबका लक्ष्य धन कमाना ही है। भारत में ज्ञान की परिभाषा है-’एकोज्ञानं ज्ञानम्’। सृष्टि में एक ही सत्ता केन्द्र में है। कृष्ण ने भी कहा गीता में-’ममैवांशो जीव लोके——-’ सभी जीवों के भीतर मैं ही हूं। इस बात को जान लेना ही ज्ञान है। ज्ञान को सीखा नहीं जा सकता। व्यक्ति जैसे-जैसे भीतर में स्वयं को जानता चला जाएगा, ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता चला जाएगा। हम जो कुछ शिक्षा में ग्रहण करते हैं-वह सूचना एवं जानकारियों की बाहरी श्रेणी है। ज्ञान तो भीतर प्रकट होता है, प्रज्ञा का, विजडम का क्षेत्र है। ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय (विषय) सदा साथ रहते हैं।

 

पश्चिम के विज्ञान में ज्ञान और ज्ञेय साथ रहते हैं। ज्ञाता स्वयं उपकरणों का अंग नहीं बन पाता। अत: इस ज्ञान का उपयोग व्यक्ति पर निर्भर करता है। सदुपयोग या दुरूपयोग। धर्म के सारे प्रयोग व्यक्ति स्वयं के भीतर करता है। अत: उसके परिणाम कल्याणकारी ही होते हैं।

 

विज्ञान का अर्थ है विशिष्ट ज्ञान। एक से अनेक बनने का ज्ञान। कैसे होता है सृष्टि विस्तार। भारतीय जीवन पद्धति पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। इसको समझने के लिए संस्कार चाहिए। प्रकृति की जानकारी होनी चाहिए। प्रकृति कैसे हमारे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को प्रभावी करती है-इसे समझना होता है। शरीर की भाषा, शरीर में मन-बुद्धि एवं आत्मा की अभिव्यक्ति पहला चरण है स्वयं को जानने का। बिना स्वयं को जाने विज्ञान को किस आधार पर उपयोगी ठहराओगे?

हमारे यहां शरीर के पांच कोष बताए हैं। इनके भीतर आत्मा का वास है। इस यात्रा के लिए नाद-ब्रह्म या शब्द ब्रह्म का मार्ग भी है। विज्ञान भी ध्वनि पर कार्य कर रहा है। पर हमारे शोध से बहुत दूर है।

 

महाविस्फोट भी करके देख रहा है, किन्तु प्राणों की भूमिका (अघिदेव) पर पश्चिम मौन है। हम प्राणों को ही देवता कहते हैं। सारी क्रियाओं का आधार प्राण ही है। पश्चिम हमारे देवताओं पर हंसता तो है, किन्तु अनुत्तरित भी है। हमारे तैंतीस देवता, तैंतीस वर्ण। हर एक अक्षर किसी देवता का मंत्र कहा गया है। मंत्र सरस्वती का क्षेत्र है। चेतना का रूप है। इससे लक्ष्मी (निर्जीव) पैदा होती है। हम सरस्वती के पीछे भागते हैं। पश्चिम लक्ष्मी के पीछे भागता है। जहां नेतृत्व ही जड़ करता हो, वहां चेतना सुप्त ही होगी। यह कार्य आज की शिक्षा ने ही किया है।

 

आज शिक्षा का अर्थ है विषय पढ़ना, कॅरियर यानी कि पेट भरना। शरीर और बुद्धि से पुष्ट एवं तुष्ट होना। मन और आत्मा से रूष्ट होना। शिक्षा में है नहीं। मां-बाप भी देते नहीं। बच्चों को स्वयं इस अभाव को दूर करना पड़ता है। इसके बिना पूर्णता संभव नहीं। ये भीतर का संसार है। दोनों का संतुलन ही सुख का आधार है। हम विज्ञान के सहारे बाहरी जीवन का विकास भी करें तथा मूल्यों के आधार पर हम अध्यात्म का विकास भी करें। स्वयं को जितना जल्दी जान सकें, प्रयास करें।

 

शब्द की शक्ति को पहचानें। नाद के स्पंदन से सृष्टि कैसे होती है, कैसे सम्पूर्ण जीवन नाद के स्पंदनों से प्रभावित रहता है। रोगी अथवा निरोग रहता है। कैसे नाद के सहारे हम पांचों कोष्ा पार करके अपने आपसे, अपनी आत्मा से, साक्षात्कार कर सकते हैं। अपनी जन्मजात शक्तियों का विकास कर सकते हैं। इसीलिए ईश्वर ने हमको, हर एक को, अद्वितीय बनाया है। हमें शिखर तय करने चाहिए, छूने चाहिए। किसी की नकल करके अपना महत्व कम नहीं करना चाहिए।

 

ईश्वर का आभार मानें कि हमें वह सब कुछ दिया है, जिससे हम विश्व का कल्याण कर सकें। हमारे विज्ञान भाव का परिणाम है-वसुधैव कुटुम्बकम्!

ज्ञान और विज्ञान मिलकर ही मानव समुदाय को संवेदनशील बना सकते हैं। मानव को पशु रूप आचरण करने से रोका जा सकता है। इन दोनों के बीच सेतु रूप शब्द ब्रह्म को समझने की आवश्यकता है। प्राणायाम का अभ्यास और श्वास-प्रश्वास पर शब्द सवार होकर हमारी जीवन यात्रा को पुरूषार्थ के अनुरूप सफल बना सकते हैं। आप सबको मंगल कामनाएं!

 

गुलाब कोठारी

दिसम्बर 18, 2011

छाया

या देवी सर्वभूतेषु छाया रूपेण संस्थिता।

 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

परिणाम-धर्मा कामना को धर्म कहते हैं। कामना का ही एक अर्थ है भूख-क्षुधा। कामना पूर्ति के अभाव में व्यक्ति व्याकुल हो जाता है। जैसे भूखा व्यक्ति निशक्त महसूस करता है। माया का विद्या/ अविद्या रूप कामना की दिशा तय करता है। कामना पूर्ति से नई ऊर्जा का प्रवाह होता है। व्यक्ति नया कर्म करने को प्रेरित होता है। अपने अहंकार के फैलाव में जुट जाता है। इस नई शक्ति को छाया कहते हैं। व्यक्ति की दिन-रात में भिन्न-भिन्न छाया बनती रहती है। अर्थात स्वयं एक होते हुए भी सब से भिन्न-भिन्न व्यवहार करता है। हमारे सारे रिश्ते छाया रूप ही हैं। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र आदि सब।

 

कोई भी एक दूसरे के सामने सचाई प्रकट नहीं करता। छाया जीवन की अनिवार्यता है। इसके बाहर कोई जीवन नहीं हुआ करता। इसकी सीमा को कोई लांघ भी नहीं सकता। मनुष्य तो आकृति का नाम है। इससे जीवन व्यवहार नहीं चलता। अत: उसका एक संज्ञा रूप होता है ताकि वह स्वरूप के साथ जुड़कर उसकी पहचान बना सके। किन्ही दो व्यक्तियो में भेद किया जा सके। मनुष्य हर एक से अलग व्यवहार करता है। भाई से अलग, बहन से, पिता से, मित्र से, कार्यालय में, समाज में, सबसे अलग-अलग। दिन भर में 200 लोगों से भी मिलता है तो सबसे ही भिन्न व्यवहार करता है। जैसे हर एक से बात करने के लिए अलग-अलग मुखौटा लगाता हो। इसी को छाया कहते हैं। यही बाधा है जो मूल प्रकाश को ढककर, छाया रूप लेता है। व्यक्ति को अपनी नई पहचान बनाने की भी बड़ी भूख होती है। यश कमाने की और प्रशंसा पाने की भी कामना रहती है। यह क्षुधा रूप ही छाया बनकर जीवन को प्रेरित करती है।

 

छाया ही प्रतिबिम्बित मन की कामना है। मूल मन या श्वोवसीयस मन या अव्यय मन तो हमारी आत्मा है। उस पर अनेक आवरण पड़े हैं। उनके पार जो आत्म-स्वरूप दिखाई पड़ता है, वही प्रतिबिम्ब है आत्मा का। छाया है। इसी कारण हमारी कामनाएं भी दो प्रकार की होती हैं। एक मूल मन की, एक प्रतिबिम्ब की। प्रतिबिम्ब में प्रकृति के तीनों गुण रहते हैं। इसकी कामना भी गुण प्रधान होगी। विद्या और अविद्या द्वारा संचालित होगी। मूल मन गुणातीत है। यह ईश्वरीय कामना होती है।

 

ईश्वरीय कामना में व्यक्ति के चाहने से परिवर्तन नहीं आता। उसकी कामना प्रारब्ध से जुड़ी रहती है। आत्म रूप होने से यह मन कुछ करता नहीं है। केवल सीमा मात्र है। व्यक्ति जो कुछ भी करता है, अच्छा-बुरा जैसा भी वह बनता है, वह छाया रूप ही है। आत्म रूप से जो जुड़ता है, वह शुद्ध होता है। छाया रूप सोच-विचारकर किया जाने वाला नाटक है; अभिनय है। नाटक आप स्वयं ही तय करते हैं। वास्तविकता को ढकने का प्रयास तथा वास्तविक जैसा दिखाई देने का प्रयास ही नाटक कहलाता है। मनुष्य कितना सोच-समझकर, प्रयास करके प्रतिदिन सचाई से दूर जीता है। फिर हर गलत परिणाम के लिए भाग्य अथवा ईश्वर को दोष देता है। बुद्धि का जन्म शायद इसी बात के लिए हुआ है। अहंकार की संतान है। विज्ञान भी बुद्धि की ही देन है और बुद्धि ही उसका उपयोग तय करती है। जीवन के अनेक बड़े-बड़े कष्टों का कारण बुद्धि बनती है। वह भी व्यक्ति की छाया रूप ही होती है। इसी प्रकार प्रतिबिम्ब मन भी छाया है। अत: मन और बुद्धि के निर्णय भी छाया रूप ही माने जाएंगे।

 

जीवन का लक्ष्य होता है पुरूषार्थ। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। अर्थात, त्रिगुण के चंगुल से बाहर निकल जाना। कामना से पार चले जाना। तब कोई बन्धन नहीं है। ऎसी स्थिति बनती है मन के पार पहुंचकर। अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोष का तो सारा व्यापार ही त्रिगुण युक्त है। शरीर का अन्न भी और मन तथा इन्द्रियों के व्यापार भी। इन दोनों के मध्य जब तक व्यापार बना है, वह कामना तथा फल का व्यापार है। तब ये गारण्टी नहीं है कि व्यक्ति की चेतना सुप्त है या नहीं। चेतना की जाग्रति का सूत्र है विज्ञानमय कोष और वहां तक पहुंचने का एक मात्र साधन होता है ध्यान। विज्ञान के सहारे चेतना तक पहुंचना संभव नहीं है।

ध्यान के प्रयोग मन के पार जाने के प्रयोग हैं।

 

काम, क्रोध, मोह आदि जीवन में छाया रूप बने रहते हैं। मेरा नकली चेहरा बनाकर समाज के सामने रखते हैं। ध्यान में इस छाया रूप को आसानी से हम समझ सकते हैं। वहां मिलावट या किसी प्रकार की तोड़-मरोड़ संभव नहीं है। आप किसी स्थिति को अपने पक्ष में नहीं कर सकते। और यदि छाया से पीछा छुड़ाना ही है तो पहले तो संकल्प करना चाहिए कि जब तक छाया से मुक्त नहीं हो जाऊं, मेरे प्रयास शिथिल नहीं होंगे। ध्यान में संकल्प के साथ उतरूं कि छाया के कारणों को समझूंगा और उनसे मुक्त हो जाऊंगा। तब तक मेरा कर्ता भाव नहीं रहेगा। सारा कर्ता भाव छाया का ही होगा। माया का ही होगा।

 

ध्यान में किया गया चिन्तन भाव बनकर उभरता है। आप एक-एक भाव पर ध्यान करते जाएं। जैसे ही भाव स्पष्ट हुआ अथवा कारण स्पष्ट हुआ कि आवरण स्वत: ही लुप्त हो जाएगा।

 

ध्यान ही चेतना का जागरण करता है। इसकी शुरूआत में ही व्यक्ति को शरीर से मुक्त हो जाना होता है। शवासन या कायोत्सर्ग की मुद्रा, भ्रस्त्रा, एकाग्रता का अभ्यास आदि इसमें सहायक क्रियाएं हैं। प्राणायाम दूसरा सोपान हैं। इसमें श्वास को लयबद्ध एवं मन्द करना होता है। जैसे-जैसे ध्यान गहन होता है, श्वास की गति मन्द होती जाती है। यह मन्द गति चमत्कारी साबित होती है। इसकी शरीर और मन को जोड़ने की शक्ति घट जाती है। मन में विचार चलते रहते हैं, वासनाएं भी जाग्रत रहती है, किन्तु शरीर पर प्रभावी नहीं हो पाती। तब संकल्पित मन विज्ञानमय कोष की ओर मुड़ता है। सुप्त चेतना से उसका साक्षात होता है। मन की वासनाएं चेतना से टकराती हैं।

 

उन वासना तरंगों को व्यक्ति समझने का प्रयास करता है। भाव भी विचार रूप होते हैं। विचार भी पदार्थ होते हैं। आचार का निर्माण विचारों से होता है। मनुष्य वैसा ही बन जाता है। भावना का अगला स्वरूप ही ध्यान है। भव यानि संसार, भाव यानि विचार। एक रोग, एक चिकित्सा। अन्तकरण की प्रवृत्ति को भाव कहा है। ध्यान आत्म चिन्तन है, अनुप्रेक्षा है। भाव एवं ध्यान साथ रहते हैं। बार-बार स्फुरित होने वाली विचार तंरगें ही भाव कहलाती हैं। जिनके द्वारा मन को भावित/ संस्कारित किया जाए। आत्मा का एकत्व, अनित्यता, अशरण आदि को धर्मध्यान कहा है। आगे चलकर ध्यान भी निरालम्ब रूप होने लगता है। यह ध्यान और इसके साथ लोक कल्याण का भाव, सकारात्मक नीयत, समष्टि भाव या वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा हर ध्यान को ऊध्र्वगामी बना देती हैं। तभी चेतना के जागरण की संभावना बन सकती है। चेतना का जागरण प्रकाश की स्थिति है। अत: छाया लुप्त हो जाती है। व्यक्ति आनन्द कोष में प्रतिष्ठित हो जाता है।

 

गुलाब कोठारी

 

दिसम्बर 3, 2011

भूखे बालगोपाल

जनता सत्ता को देखती है। सत्ता जनता को नहीं देखती। जनता सत्ता परोसती है। सत्ता जनता को ही कोसती है। सत्ता में बैठा व्यक्ति झूठ के सहारे ही स्वयं की श्रेष्ठता साबित करता है। उसके लिए इससे अच्छा व्यक्तित्व होता ही नहीं। सम्पूर्ण सत्ता का उपयोग स्वयं को सुरक्षित करने में तो करता है, किन्तु दूसरा उसे हर हाल में ही सुरक्षित लगता है। संवदेना सत्ता की शत्रु है। लोकतंत्र भी है तो सत्ता का ही एक स्वरूप।

भोपाल का गैस काण्ड इसका जीता-जागता उदाहरण है। यूनियन कार्बाइड ने तो इसे डाऊ केमिकल्स को बेच दिया और स्वयं चल बसी। पीडितों को छोड़ गई डाऊ के भरोसे। व्यापारी कम्पनी थी। किन्तु हमारी सरकार भी क्या व्यापारी हो गई?

सारे सत्ताधीश मगरमच्छी आंसू बहाते रहते हैं। पीड़ा वहीं की वहीं है। किसी ने कोई संकल्प किया हो, बीड़ा उठाया हो, सहायता करने का, दिखाई नहीं देता। हां, आश्वासनों के आसव सब पिलाते ही रहते हैं। करोड़ों के सब्जबाग दिखाते आ रहे हैं। करोड़ों खर्च भी बता रहे हैं। खूब खा भी रहे हैं। एक-दूसरे पर आरोप भी चलते रहते हैं। ऊपर से वोटों की राजनीति कोढ़ में खाज का काम कर रही है। घर उजड़ गए। कोई बात नहीं। उनको तो नाम भी याद नहीं। आपका वोट किसी और से डलवा लेंगे, किन्तु कष्ट के समय साथ देने के लिए उनके पास समय नहीं होता। फिर सरकार का अर्थ क्या? सरकारें तो आती-जाती रहेंगी पर करेंगी कुछ नहीं। गैस पीडित परिवारों को उनका हक देने की बजाय उनके साथ भिखारियों की तरह बर्ताव क्यों किया जाता है? ये परिवार सरकारी मदद के मोहताज क्यों रहें? क्यों नहीं समाज के लोग ही एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आएं। सक्षम लोग पीडित परिवारों के बच्चों को गोद लें और उनकी शिक्षा व स्वास्थ्य का खर्चा उठाएं। तब ही भोपालवासियों में आत्मसम्मान से जीने का भाव पैदा हो सकेगा। गैस त्रासदी के पीडितों को भी लगेगा कि उनकी मदद अपने ही कर रहे हैं।

कोई आए, लोगों को लूटकर ले जाए, जनता को मारकर चला जाए, संसद पर हमला कर जाए, सीमा में प्रवेश कर जाए, और सरकार? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यदि सरकार फैसले को लागू नहीं करा पाए तो सरकार पंगु ही कही जाएगी। या सम्बंधित सरकारी प्रतिनिधि डाऊ के दलालों की तरह मौन बैठे हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हम इन भागीदारों को पकड़वा नहीं सकते? उनकी गतिविधियों को देखें। सन् 2012 का ओलम्पिक आयोजन डाऊ के साçन्नध्य में हो रहा है। वही मुख्य प्रायोजक है। कितने अरबों डालर खर्च रहा है। भारत सरकार चुप बैठी है। यह सही समय है उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का।
उसके बारे में प्रचार भी ढंग से किया जाए। शर्म आती हो तो, इस बार भारत को ओलम्पिक खेलों के बहिष्कार करने की भी घोषणा कर देनी चाहिए। यह मुद्दा भी उतना ही भावनात्मक है, जितना कि खिलाडियों का भाग लेना। इण्टरपोल, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय आदि के जरिए भी कार्रवाई होनी चाहिए।

इनके साथ-साथ राज्य तथा केन्द्र को मिलकर इनकी पूर्ण व्यवस्था करनी चाहिए। आज लाखों-करोड़ के तो घपले हो ही जाते हैं। पीडितों के लिए कुछ सैकड़ों करोड़ भी हम मांगकर खर्चना चाहते हैं। भोपाल गैस हादसा हुआ तब से अब तक करीब सैंतीस सौ करोड़ रूपए मुआवजे के नाम बांटे गए। लेकिन पीडितों की हालत जस की तस है। यही मेरा भोपाल है, जहां के भूखे बालगोपाल हैं।

वाह रे सोने की चिडिया।

गुलाब कोठारी

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