बाल वैज्ञानिकों की राष्ट्रीय कांग्रेस जयपुर में कल शुरू हो गई। देश के लगभग डेढ़ हजार बच्चे इसमें भाग ले रहे हैं। आज विज्ञान जीवन शैली का सर्वाघिक महत्वपूर्ण अंग बन गया है। भारत में धर्म का स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है। सदियों से धर्म और विज्ञान आमने-सामने डटे रहे हैं। अब समय आ गया है कि हमको धर्म एवं विज्ञान को नई परिभाषा देनी चाहिए। क्योंकि दोनों के सहयोग से ही जीवन में पूर्णता संभव है।
आज पश्चिम, विज्ञान के कीर्तिमान स्थापित करने के बाद भी जीवन में भटकाव तथा तनाव से मुक्त नहीं हो पाया। पूरब में तनाव नहीं है, किन्तु समृद्धि हाथ से छूटती दिखाई पड़ती है। जब कि सबका लक्ष्य धन कमाना ही है। भारत में ज्ञान की परिभाषा है-’एकोज्ञानं ज्ञानम्’। सृष्टि में एक ही सत्ता केन्द्र में है। कृष्ण ने भी कहा गीता में-’ममैवांशो जीव लोके——-’ सभी जीवों के भीतर मैं ही हूं। इस बात को जान लेना ही ज्ञान है। ज्ञान को सीखा नहीं जा सकता। व्यक्ति जैसे-जैसे भीतर में स्वयं को जानता चला जाएगा, ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता चला जाएगा। हम जो कुछ शिक्षा में ग्रहण करते हैं-वह सूचना एवं जानकारियों की बाहरी श्रेणी है। ज्ञान तो भीतर प्रकट होता है, प्रज्ञा का, विजडम का क्षेत्र है। ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय (विषय) सदा साथ रहते हैं।
पश्चिम के विज्ञान में ज्ञान और ज्ञेय साथ रहते हैं। ज्ञाता स्वयं उपकरणों का अंग नहीं बन पाता। अत: इस ज्ञान का उपयोग व्यक्ति पर निर्भर करता है। सदुपयोग या दुरूपयोग। धर्म के सारे प्रयोग व्यक्ति स्वयं के भीतर करता है। अत: उसके परिणाम कल्याणकारी ही होते हैं।
विज्ञान का अर्थ है विशिष्ट ज्ञान। एक से अनेक बनने का ज्ञान। कैसे होता है सृष्टि विस्तार। भारतीय जीवन पद्धति पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। इसको समझने के लिए संस्कार चाहिए। प्रकृति की जानकारी होनी चाहिए। प्रकृति कैसे हमारे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को प्रभावी करती है-इसे समझना होता है। शरीर की भाषा, शरीर में मन-बुद्धि एवं आत्मा की अभिव्यक्ति पहला चरण है स्वयं को जानने का। बिना स्वयं को जाने विज्ञान को किस आधार पर उपयोगी ठहराओगे?
हमारे यहां शरीर के पांच कोष बताए हैं। इनके भीतर आत्मा का वास है। इस यात्रा के लिए नाद-ब्रह्म या शब्द ब्रह्म का मार्ग भी है। विज्ञान भी ध्वनि पर कार्य कर रहा है। पर हमारे शोध से बहुत दूर है।
महाविस्फोट भी करके देख रहा है, किन्तु प्राणों की भूमिका (अघिदेव) पर पश्चिम मौन है। हम प्राणों को ही देवता कहते हैं। सारी क्रियाओं का आधार प्राण ही है। पश्चिम हमारे देवताओं पर हंसता तो है, किन्तु अनुत्तरित भी है। हमारे तैंतीस देवता, तैंतीस वर्ण। हर एक अक्षर किसी देवता का मंत्र कहा गया है। मंत्र सरस्वती का क्षेत्र है। चेतना का रूप है। इससे लक्ष्मी (निर्जीव) पैदा होती है। हम सरस्वती के पीछे भागते हैं। पश्चिम लक्ष्मी के पीछे भागता है। जहां नेतृत्व ही जड़ करता हो, वहां चेतना सुप्त ही होगी। यह कार्य आज की शिक्षा ने ही किया है।
आज शिक्षा का अर्थ है विषय पढ़ना, कॅरियर यानी कि पेट भरना। शरीर और बुद्धि से पुष्ट एवं तुष्ट होना। मन और आत्मा से रूष्ट होना। शिक्षा में है नहीं। मां-बाप भी देते नहीं। बच्चों को स्वयं इस अभाव को दूर करना पड़ता है। इसके बिना पूर्णता संभव नहीं। ये भीतर का संसार है। दोनों का संतुलन ही सुख का आधार है। हम विज्ञान के सहारे बाहरी जीवन का विकास भी करें तथा मूल्यों के आधार पर हम अध्यात्म का विकास भी करें। स्वयं को जितना जल्दी जान सकें, प्रयास करें।
शब्द की शक्ति को पहचानें। नाद के स्पंदन से सृष्टि कैसे होती है, कैसे सम्पूर्ण जीवन नाद के स्पंदनों से प्रभावित रहता है। रोगी अथवा निरोग रहता है। कैसे नाद के सहारे हम पांचों कोष्ा पार करके अपने आपसे, अपनी आत्मा से, साक्षात्कार कर सकते हैं। अपनी जन्मजात शक्तियों का विकास कर सकते हैं। इसीलिए ईश्वर ने हमको, हर एक को, अद्वितीय बनाया है। हमें शिखर तय करने चाहिए, छूने चाहिए। किसी की नकल करके अपना महत्व कम नहीं करना चाहिए।
ईश्वर का आभार मानें कि हमें वह सब कुछ दिया है, जिससे हम विश्व का कल्याण कर सकें। हमारे विज्ञान भाव का परिणाम है-वसुधैव कुटुम्बकम्!
ज्ञान और विज्ञान मिलकर ही मानव समुदाय को संवेदनशील बना सकते हैं। मानव को पशु रूप आचरण करने से रोका जा सकता है। इन दोनों के बीच सेतु रूप शब्द ब्रह्म को समझने की आवश्यकता है। प्राणायाम का अभ्यास और श्वास-प्रश्वास पर शब्द सवार होकर हमारी जीवन यात्रा को पुरूषार्थ के अनुरूप सफल बना सकते हैं। आप सबको मंगल कामनाएं!
गुलाब कोठारी
