Gulabkothari's Blog

जनवरी 29, 2012

सत्संग

व्य क्ति अकेला नहीं जी पाता। इसका एक कारण है प्रारब्ध। पिछले कर्मो के फलों का आदान प्रदान। यह आदान-प्रदान ही संगत है। इसी में सुसंग और कुसंग के समीकरण बनते हैं। इसी से मन में इच्छाओं का एक वातावरण बनता है। जीवन शैली का परिवर्तन और रूपान्तरण इस वातावरण पर निर्भर करता है। अकेला व्यक्ति भले ही जंगलों में रहने लगे, किन्तु इस वातावरण के अभाव में वह जीवन को कभी समझ ही नहीं पाता। जीवन को तो जीना ही पड़ेगा। दूसरे के अनुभव भी इसमें काम नहीं आ सकते।

 

 

जीवन का उद्देश्य है माया के बीच जीते हुए माया के प्रभाव से मुक्त होना। जिस नाद से निकलकर आए, फिर से उसी में लीन हो जाना। स्वयं के मूल स्वरूप को समझ लेना। इसके लिए व्यक्ति को दर्पण चाहिए, जिसमें वह परिवर्तन को देख सके। संसार ही वह दर्पण है। व्यक्ति में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन को प्रतिबिम्बित कर देता है। इस दृष्टि से सम्पूर्ण जीवन व्यवहार ही सत्संग है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न कारणों से भिन्न-भिन्न लोगों की संगत करता है। वांछित के प्राप्त होते ही वहां से हट भी जाता है। स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति अनावश्यक और अवांछित के पास सोच-विचारकर तो नहीं जाता। तकदीर वहां ले जाए तो अलग बात है। इस सांसारिक सत्संग का मुख्य सूत्र होता है संस्कार। इनको ही व्यक्ति का धर्म कहा जाता है। क्योंकि इन्हीं के आधार पर व्यक्ति जीवन यात्रा तय करता है। जीवन के लक्ष्य निर्घारित करता है। इसीलिए कभी भी दो आदमियों का धर्म एक-सा नहीं होता। सम्प्रदाय हो जाता है।

 

आज व्यक्ति का धर्म नष्ट हो रहा है। उसे किसी प्रकार संस्कारों के क्षेत्र में शिक्षित ही नहीं किया जा रहा। सीधा उसको सम्प्रदाय से जोड़ दिया जाता है। एक संस्कारविहीन व्यक्ति अपने परिवार का भी हित नहीं करता। सम्प्रदाय अथवा देशहित के लिए कैसे सकारात्मक कार्य करेगा? हां, सम्प्रदाय के नाम पर किसी का भी अहित कर सकता है। बिना संस्कारों के उसके भीतर आसुरी भाव ही प्रबल होता जाता है। क्योंकि वह संगत का ही प्रभाव है। कोयले की दलाली में काले हाथ!

 

सत्संग का श्रेष्ठ स्थान परिवार ही होता है। बाहर जाकर किया सत्संग आज तो धन आधारित भी हो गया और शास्त्र आधारित भी रह गया। हम रामायण, महाभारत जैसी कथाएं सुनकर कुछ देर के लिए त्रेता और द्वापर युग में चले जाते हैं। वर्तमान से भटक जाते हैं। घर लौटकर पुन: कलियुग में व्यस्त हो जाते हैं। त्रेता और द्वापर में तो जी नहीं सकते। दर्द निवारक गोली की तरह कुछ देर मुक्ति का एहसास सत्संग नहीं कहला सकता। यह गोली कितनी महंगी होती है, इसको संतों की सम्पत्ति देखकर समझ सकते हैं। हर व्यक्ति अलग स्वभाव का होता है।

 

उसके जैसा सृष्टि में दूसरा नहीं होता। सबका प्रारब्ध, कर्म क्षेत्र और भाग्य भी अलग-अलग होते हैं।  अत: सत्संग भी तभी फलदायी होगा, जब व्यक्तिगत चिन्तनधारा और भावभूमि को प्रभावित कर सके। इने-गिने संत रह गए हैं जिनका ध्यान व्यक्तिगत रूपांतरण पर रहता है। वरना धन के जरिए से मीडिया से प्रचार और यश-कीर्ति का फैलाव लक्ष्य रह गया है। जो व्यक्ति समाज सुधार के लिए सांसारिक सुख छोड़कर संन्यास लेता है, वह नए सिरे से भिन्न प्रकार के ऎश्वर्य में खो जाता है। स्वयं को भगवान तक कहने लगता है। ऎसे महापुरूषों के साथ किया गया सत्संग सांई बाबा जैसी परिणति देता है। इसमें किसी के साथ जीवन का जुड़ाव नहीं होता।

 

जीवन का जुड़ाव सत्संग की पहली शर्त है। इसीलिए परिवार सबसे श्रेष्ठ सत्संग भूमि है। कभी मैला न पड़ने वाला दर्पण है। जीवन के पहलुओं पर विस्तार से व्यावाहारिक ज्ञान कराता है। स्वयं को समझने और सुधरने के लिए पूरा समय देता है। परिवार में सबका अपना-अपना स्थान होता है। मर्यादा के सूत्र में पिरोई एक माला की तरह हर मणिये का बराबर का महत्व होता है। उसका भी अपने प्रारब्ध के अनुरूप एक निश्चित स्वभाव होता है। संस्कारों की भी भिन्नता रहती है। सबसे बड़ी शर्त यह है कि आप साथ रहो या न रहो, सम्बन्धों को छोड़ा नहीं जा सकता। नहीं निभाने पर भी सम्बन्ध तो रहता है। व्यक्ति का व्यवहार ही संगदोष में बदल जाता है। परिवार और समाज के लिए उदाहरण बन जाते हैं।

 

परिवार के इस सत्संग का शत्रु भी सचाई को छिपाना ही है। झूठ ही है। यह झूठ सदा बोलने वाले का अपमान ही कराता है। मैं यदि अपने भाई या पुत्र का अपमान करूं  तो क्या मैं स्वयं का अपमान नहीं करता? पत्नी को यदि गाली दूंगा तो लगेगी तो मुझे ही। यदि उसे अपमानित होते देखकर मेरा खून नहीं खौले, तो सम्बन्ध कहां रह गया? प्रत्येक सम्बन्ध के साथ अपने व्यवहार को समझते जाना, संकल्प कर-करके ऊपर उठते जाना ही सत्संग का लाभ होता है। हम स्वयं को बचाने के लिए दूसरों को दोष देकर उनको अपमानित भी कर देते हैं। वह भी हमारा ही अपमान है। हम अपने किए से अपना ही सुख और साख घटाते हैं। दूसरों के कर्मो का फल हमको नहीं मिल सकता। इतने अनुभव दुनिया की कोई पाठशाला नहीं देती। तमस और राजस वृत्तियों और विचारों के पार जाकर सत्वगुण का ग्रहण ही सत्संग है। घर से बाहर का सत्संग यह गारण्टी नहीं देता। मन बहुत चंचल है।

 

एक कहावत है कि यदि आप पूरी दुनिया की बातें करते हैं, तो आपका ध्यान खुद पर कभी नहीं जाएगा। यदि आप स्वयं के सुधार के प्रति चिन्तित हैं, स्वयं के व्यवहार का नित्य आकलन (स्वाध्याय) करते हैं, तो आपको किसी की चिन्ता से व्यवधान नहीं होता। परिवार के वातावरण में हम एक-दूसरे का सहयोग करके संस्कार शुद्धि करते हैं। हर सदस्य के चिन्तन एक-दूसरे के प्रति सकारात्मक बनाते हैं। त्याग करते हैं। प्रेम करते हैं। सम्मान करने का अभ्यास करते हैं। धीरे-धीरे यही अभ्यास हमें समाज में भी प्रतिष्ठित करता है।

 

यही तो सत्संग का फल कहलाता है। इसके लिए परिवार का हर सदस्य बधाई का पात्र बन जाता है। ईश्वर की कृपा से ऎसी आत्माएं परिवार में अवतरित हुइंü, उसका भी धन्यवाद। और उन बुजुर्गो का भी धन्यवाद, जिन्होंने घर-परिवार को सत्संग की भूमिका के लिए तैयार किया। सभी को एक दूसरे का शुभ चिन्तक होने का पाठ सिखाया। यही सत्संग है। हर संग एक सत्संग बन जाता है।

 

गुलाब कोठारी

 

जनवरी 22, 2012

प्रहरी

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पत्रकार एक इतिहासकार भी होता है। साहित्यकार और कवि (क्रान्त द्रष्टा) भी होता है। उसका काम है अतीत पर आंख रखते हुए वर्तमान का आकलन और भविष्य पर लेखन। समाज में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या और समाज में स्वयं के प्रति विश्वास बनाए रखने का उत्तरदायित्व। उसके बिना पत्रकार के शब्दों की सार्थकता नहीं होती। न किसी के दिल को छू सकते हैं, न कोई इनका अनुकरण ही करेगा।

 

नौकरी करने वाले पत्रकारों की तरह जिनको न साख की चिन्ता, न ही पाठक के साथ भावनात्मक जुड़ाव की। उसे पेट भरने के लिए 6 घंटे काम करना है। ईमानदारी से। इस दृष्टि से राजस्थान पत्रिका ने भावनात्मक सम्प्रेषण के रूप में अपनी विशिष्ट  पहचान बनाई है। जो कुछ कहना है, उसमें विवेक के साथ-साथ भावना भी हो।

 

लोकहित का भाव तब सीधा मन के धरातल तक पहुंच जाता है। रास्ते में बुद्धि कोई प्रश्न या तर्क खड़ा नहीं करती। संदेश ग्राह्य हो जाता है। इसीलिए हम कहते भी हैं कि पत्रिका आत्मिक धरातल का समाचार-पत्र है। लोग इसका अनुसरण करते हैं। जैसे कभी धार्मिक ग्रन्थों का पारायण होता था। पत्रिका के सामाजिक सरोकार इसका उदाहरण हैं। राजस्थान के गुर्जर आंदोलन, भोपाल का किसान आंदोलन अथवा भोपाल के ही बड़े तालाब की जन-श्रमदान के द्वारा की गई खुदाई आदि पाठकों के विश्वास के अनुपम उदाहरण हैं। हमारे सामाजिक सरोकार हमें समाज के शुभेच्छु के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

 

एक अच्छे साहित्यकार की तरह पत्रकार भी शब्द-ब्रह्म का साधक होता है। स्वर, व्यंजन, छन्द, वर्ण आदि का ज्ञान एवं शरीर में उत्पत्ति स्थान, स्पन्दनों का प्रभाव आदि पर भी उसकी पकड़ मजबूत होती है। शब्दों की मंत्र शक्ति, सम्प्रेषण शक्ति, स्पन्दन शक्ति, नाद का रूप आदि का ज्ञान उसे ऋषि कोटि का स्थान दिला देता है। क्योंकि पत्रकार भी समाज को कुछ देने के लिए लिखता है। आगे की उपलब्घियां और सिद्धियां उसके श्रम एवं तप पर निर्भर करती है। आज मीडिया लेने के पीछे उतावला जान पड़ता है। मूल्यों से समझौता करता है। प्रतिस्पर्द्धा का वातावरण बन गया है।

 

इस दौड़ में पत्रकार भी श्रमजीवी बन गया है। तब वह स्वयं अपने ही लेखन से कैसे जुड़ेगा? उसका निष्प्राण लेखन उसी का पेट भर कर समाप्त हो जाएगा। अपने लेखन के शब्दों को यह पत्रकार तो कभी नहीं पढ़ पाएगा या सुन पाएगा। तब एक व्यक्ति अहंकार का मारा, प्राकृत ज्ञान से अनजान, पत्रकार का मुखौटा लगाए, पत्रकार के रूप में समाज में कभी प्रतिष्ठित नहीं होगा। इतिहास लेने वाले को कभी याद नहीं करता। कलम से कागज काले करता, कागज की नाव की तरह समय के साथ बह जाएगा। उसके द्वारा भेजे हजारों संदेशों में से किसी को कुछ याद नहीं रहेगा। पत्रकार के सम्प्रेषण का अर्थ है कि वह भी संदेश के साथ पाठक तक पहुंचे, स्वयं भी संदेश को निरन्तर ग्रहण करता जाए। समय के साथ अपने आवरण हटाता जाए और समाज के आवरण भी दूर करने में सहायक हो। तब जाकर समाज में रूपान्तरण की लहर उठेगी। पत्रकार की मशाल समाज में मिसाल बन जाएगी।

 

आज देश भर में लोकतंत्र का स्थान स्वच्छन्द तंत्र लेता जा रहा है, जो न केवल चिन्ता का विषय है, अपितु नई पीढ़ी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। इसका एक ही कारण है। प्रहरी स्वयं पथ भ्रष्ट हो गया। यहां तक कि उसने अपनी सही पहचान छिपाने के लिए चेहरे पर मुखौटा लगा लिया। जनता व लोकतंत्र के तीनों पायों के बीच सेतु का दायित्व निभाने वाला मीडिया स्वयं को ‘चौथा पाया’ कहने लग गया। सेतु का कार्य छोड़ दिया और स्तंभ का मुखौटा पहन लिया। संविधान माने या न माने, मीडिया ने स्वयं-भू घोषणा कर दी।

 

जनता और तीनों पायों के बीच का सेतु, लोकतंत्र का प्रहरी, पलायन कर गया। इससे न केवल तीनों स्तंभ निरंकुश हो गए, बल्कि स्वयं मीडिया भी स्तंभ जैसा ही व्यवहार करने लग गया। अत: वह भी जनता से दूर हो गया।  रखवाला के साथ जुड़ गया। शिक्षा ने और नेताओं ने जनता को जो सब्ज बाग दिखाए, उससे जनता निश्चिन्त होकर विश्राम के द्वश्स्त्रe में चली गई। पांच साल में एक बार मतदान करके सो जाती है। इससे अवधारणा भी मिट्टी में मिल गई। अब मीडिया की आक्रामकता का कारण जनता के मुद्दे नहीं रहे। अपने क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति ही उसका एकमात्र लक्ष्य बनने लगा। तभी तो पैड न्यूज जैसा व्यवहार, ब्लैकमेलिंग से लेकर माफिया की तरह सरकारों तक को धमकियां देने की शिकायतें आम हो गई। तब मीडिया कैसे तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष कर सकता है? वह तो स्वयं तंत्र का अंग हो गया। जनता के सामने तीनों स्तंभों के साथ खड़ा हो गया।

सत्ता का मद स्तंभ को तो स्वीकार करता है, सेतु को स्वीकार नहीं करता। अत: स्वयं सरकार ही उसकी शत्रु हो जाती है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकारें इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। वे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करतीं। निजी हित साधन में कार्यपालिका भी उनके साथ है।

 

इस परिस्थिति से बाहर निकलना भी आवश्यक है। भावी पीढ़ी के लिए कुछ तो नया आधार देना पड़ेगा। भ्रष्ट लोगों के चंगुल से देश को मुक्त कराना पड़ेगा। यह कार्य केवल और केवल मीडिया ही कर सकता है। इसे लोकतंत्र के पाये के स्थान पर फिर से लोकतंत्र का प्रहरी बनाना पड़ेगा। शेष तीनों स्तंभों की निगरानी करनी पड़ेगी। जनता के बीच जो साख आज गिर रही है, जो व्यापारिक स्वरूप उभरता जा रहा है, उस पर अंकुश लगाना पड़ेगा।

 

अकेला मीडिया ही तीनों स्तंभों को दिशा दे सकता है। देश से भ्रष्टाचार मिटा सकता है। तब यह कार्य कैसे किया जाए और कौन करे? युवा वर्ग ही वह शक्ति है। उसे मीडिया के साथ जुड़ जाना होगा। सूचना के अघिकार का भी निरन्तर उपयोग करना पड़ेगा। देश के बड़े-बड़े घोटाले इसी तरह सामने आ पाए। जो मीडिया-टीवी, अखबार, रेडियो, जनता का साथ नहीं दे, उसका घर में प्रवेश बन्द। जो ब्लैक मेल करता नजर आए, घटिया, नकारात्मक भाषा एवं सामग्री परोसे, अपने स्वार्थ के आगे लोकहित को गौण कर दे, उसका तुरंत सामूहिक रूप से बहिष्कार किया जाए। फिर देखना परिवर्तन कैसे आता है। तब पत्रकारों की लेखनी भी प्राणवान हो जाएगी। पाठक भी कलम के द्वारा फिर से पूजा जाने लगेगा। हमें आजादी को आजाद करने के लिए, ‘जनता के द्वारा’ लोकतंत्र को पुन: स्थापित करने को संकल्पित होना होगा।

 

 

गुलाब कोठारी

 

जनवरी 17, 2012

कौन किसका?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत का छत्तीसगढ़ दौरा पूरा हो गया। प्रदेश के संघ एवं भाजपा पदाघिकारियों ने इस प्रवास के भिन्न-भिन्न अर्थ भी लगाए। भागवत जी को कुछ निर्णायक एवं गंभीर मूड में भी माना। विशेष रूप से जो स्नेह भाजपा सांसद नंदकुमार साय के साथ आत्मीयता के क्षण बिताकर जताया। उनके साथ भोजन करके जो संदेश दिया, वह अपने आप में अनूठा माना जा रहा है।

 

 

इसी प्रकार भिलाई को राजनीतिक मानचित्र पर उभरने के विशेष प्रयत्न भी जारी हैं, यह स्पष्ट हुआ। पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का आयोजन भी भिलाई में ही रखा गया था। इस बार संघ प्रमुख के साçन्नध्य में भिलाई शिखर की ओर बढ़ता नजर आया। यहां की सांसद सरोज पांडे को आगे लाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री व राज्य के प्रभारी सौदान सिंह भी बराबर प्रयासरत रहे।

 

इसके विपरीत छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को एक बार तो लगभग आधा घंटा बाहर ही प्रतीक्षा में बिठा दिया, जो कि काफी चर्चा में है। इसे आश्चर्य की दृष्टि से देखा जा रहा है। इतना ही नहीं, जब सात प्रमुख पदाघिकारियों की अलग से बैठक हुई, उसमें भी मुख्यमंत्री के स्थान पर विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के साथ ही विचार-विमर्श चलता रहा।

 

इस बात को एक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है कि जहां-जहां भी सर संघचालक बोले, भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर बोले। भाजपा एवं संघ इस तथ्य को मुख्यमंत्री के लिए सार्वजनिक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। इसी के साथ-साथ आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत संघ के विभिन्न संगठनों की रिपोर्ट भी पूरी तरह नकारात्मक ही रही। सब इस बात पर एकमत थे कि इन क्षेत्रों तक विकास अभी तक भी नहीं पहुंचा है। कुछ गांवों में मुख्यमंत्री को नाराजगी जताते हुए लौटाने की जानकारी भी चर्चा में आई।

 

मोहन भागवत पूरे प्रवास में गंभीर अवश्य नजर आए, किंतु यह भी लगा कि केसी सुदर्शन के पहले तक के सर संघचालकों की तुलना मे भागवत कमजोर साबित हुए। हो सकता है इसका कारण ‘मराठा-पे्रम’ रहा हो। किंतु इसकी बड़ी कीमत भाजपा को ही चुकानी पड़ेगी।

 

जैसे ही भागवत विदा हुए, जयराम रमेश (केंद्रीय मंत्री) रायपुर ही नहीं, बल्कि रमन सिंह के साथ बस्तर के सुकमा जिले के उद्घाटन पर पहुंच गए। गत प्रवास में वन मंत्री के रूप में दो नए क्षेत्र छत्तीसगढ़ को खनन के लिए खोल गए थे। किंतु इसका एक प्रभाव यह भी दिखाई दिया कि कांग्रेस के एक केंद्रीय मंत्री के साथ कोई भी स्थानीय नेता सुकमा नहीं पहुंचा। इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा? इस समीकरण के अर्थ किसकी समझ नहीं आएंगे। शायद मोहन भागवत को अपने प्रश्नों के उत्तर भी मिल गए होंगे।

 

गुलाब कोठारी

 

जनवरी 15, 2012

सेतु रहने की चाह

पत्रकारिता इतिहास का लेखन भी है और भविष्य का लोक शिक्षक भी है। एक ही शर्त है कि उसके प्रति पाठक के मन में विश्वास होना चाहिए। इसके बिना पत्रकार एवं उसके संदेश दोनों अल्पजीवी रह जाते हैं। समाज के रूपान्तरण में भागीदार नहीं हो सकते। सम्प्रेषण का तो लक्ष्य होता है समाज के चिन्तन में परिवर्तन और जीवन शैली में रूपान्तरण। इसके लिए भीतर संकल्प की चिंगारी सुलगती रहे। इस चिंगारी का नाम पत्रकार है।

 

 

अखबार में नौकरी करने वाले शरीर को पत्रकार संज्ञा दी गई है, किन्तु रूपान्तरण करने वाला, साक्षी भाव में दृष्टा बनकर विषय को देखने वाला सन्त ही सदा लोकहित की मर्यादा में बात कहेगा। उस बात को स्वयं भी सुनेगा तथा स्वयं को सदा विषय से दूर रखेगा यानी कि निष्पक्ष रहेगा। इसी अवधारणा का एक मूर्त रूप पत्रिका ने पाठकों के समक्ष रखा रविवारीय अंक में ‘जैकेट’ के रूप में। इस प्रयोग को आज पूरा एक वर्ष हो गया। एक ओर व्यावसायिकता कलम पर बुरी तरह हावी है। विज्ञापनों के लिए सारे झूठ-सच, दावे-धमकियां प्रचलन में हैं, वहीं आपकी इस पत्रिका ने लोभ का संवरण किया तथा नई पीढ़ी के भविष्य को ध्यान में रखकर अनेक विषय उठाए।

 

उन विषयों का बदलता स्वरूप एवं नई तकनीक तथा रोजगार से जुड़ी संभावनाओं का स्पष्ट चित्रण भी किया। देश के राजनीतिक हालात, देश में नेतृत्व का अभाव तथा बड़े राष्ट्रीय दलों की एकरूपता, भ्रष्टाचार एवं युवा वर्ग के समक्ष उपलब्ध विकल्प, पुलिस की बदलती छवि जैसे नितान्त अनिवार्य विषयों पर विस्तृत चर्चा की। यहां यह कहना सही होगा कि पत्रिका ने पिछले वर्षो में भावनात्मक पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों में विश्वास के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। राजस्थान का गुर्जर आन्दोलन एवं भोपाल का किसान आन्दोलन कैसे पत्रिका की पहल से एक ही दिन में ठहर गए थे। भावनात्मक धरातल पर आदान-प्रदान के कारण ही पत्रिका ‘द न्यूज पेपर विद अ सोल’ बना।

 

पिछले एक साल के 52 रविवार जैकेटों के अलावा भी लगभग डेढ़ दर्जन अन्य अवसरों पर पत्रिका के जैकेट प्रकाशित हुए। जैकेट के विषय रोजमर्रा के विषयों से हटकर, किन्तु राष्ट्रीय महत्व के रहे हैं। कुछ नमूने उदाहरण के लिए इस पृष्ठ पर भी प्रकाशित किए जा रहे हैं।

 

आज लोकतंत्र में वंशवाद का नासूर पैदा हो गया, जिसके चलते देश एक परोक्ष राजाशाही-तानाशाही का शिकार होता जा रहा है। नेहरू-गांधी परिवार यदि छह दशकों से सत्ता पर काबिज है, तब इसका दुरूपयोग अन्य दल अथवा प्रभावशील वंश क्यों नहीं करेंगे। कहां-कहां इस विकृति की मार पड़ रही है, उसकी चर्चा भी की गई। युवा वर्ग इस चुनौती को कैसे झेलता है, उसी पर देश में लोकतंत्र का भविष्य टिका है।

 

इसी से जुड़ी मध्य एशिया की क्रान्तियों की ओर भी इशारा किया गया। वहां के एवं भारत के हालात भी सामने रखे तथा यह अपेक्षा भी की गई कि कोई क्रान्ति जन्म लेनी चाहिए। भ्रष्टाचार सारी हदों को पार कर चुका है। इसी प्रकार परमाणु विकिरण का खतरा है। हम नए-नए परमाणु संयंत्र लगाने की योजना तो बना रहे हैं, उनके विश्वव्यापी परिणाम भी लोगों के ध्यान में रहें।

 

अन्ना हजारे के आन्दोलन ने वर्षो बाद देश को ईमानदार एवं संकल्पवान नेतृत्व दिया। पूरा देश एकाएक उधर खिंचता चला गया। आज देश के समक्ष सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व का अभाव ही है। यही इतने भ्रष्टाचार का कारण भी है।

 

संसद में रखे जाने वाले विभिन्न विधेयकों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। विशेष रूप से महिला आरक्षण विधेयक की व्यावहारिकता, लिव-इन-रिलेशनशिप, रिटेल में एफडीआई आदि पर जैकेट के जरिए दी गई जानकारी का प्रभाव गहरा नजर आया।

 

इतना सब कहने का एक ही अर्थ है कि पत्रिका स्वप्रेरणा से पाठकों के हित में कई ऎसे कार्य हाथ में लेता रहा है, जिन पर अन्य माध्यम मौन दिखाई पड़ते हैं। ‘जागो जनमत’, संवाद सेतु, गुणवत्ता पुरस्कार, शहर के सफाई अभियान, अमृतं जलम् आदि कुछ उदाहरण हैं। एक ओर इन अभियानों की पूर्ति से कई तरह की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, पाठकों में प्रेरणा का प्रवाह होता है तथा विश्वास का रिश्ता आगे से आगे मजबूत होता जाता है। हम यह नहीं कहते कि हम चौथा स्तंभ हैं, क्योंकि स्तंभों से ही तो जनता दु:खी है। हम उनके साथ नहीं खड़े रहना चाहते। हम जनता एवं तीनों स्तंभों के मध्य सेतु ही रहना चाहते हैं। यही हमारे संविधान की मंशा भी है।

 

गुलाब कोठारी

 

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