पत्रकारिता इतिहास का लेखन भी है और भविष्य का लोक शिक्षक भी है। एक ही शर्त है कि उसके प्रति पाठक के मन में विश्वास होना चाहिए। इसके बिना पत्रकार एवं उसके संदेश दोनों अल्पजीवी रह जाते हैं। समाज के रूपान्तरण में भागीदार नहीं हो सकते। सम्प्रेषण का तो लक्ष्य होता है समाज के चिन्तन में परिवर्तन और जीवन शैली में रूपान्तरण। इसके लिए भीतर संकल्प की चिंगारी सुलगती रहे। इस चिंगारी का नाम पत्रकार है।
अखबार में नौकरी करने वाले शरीर को पत्रकार संज्ञा दी गई है, किन्तु रूपान्तरण करने वाला, साक्षी भाव में दृष्टा बनकर विषय को देखने वाला सन्त ही सदा लोकहित की मर्यादा में बात कहेगा। उस बात को स्वयं भी सुनेगा तथा स्वयं को सदा विषय से दूर रखेगा यानी कि निष्पक्ष रहेगा। इसी अवधारणा का एक मूर्त रूप पत्रिका ने पाठकों के समक्ष रखा रविवारीय अंक में ‘जैकेट’ के रूप में। इस प्रयोग को आज पूरा एक वर्ष हो गया। एक ओर व्यावसायिकता कलम पर बुरी तरह हावी है। विज्ञापनों के लिए सारे झूठ-सच, दावे-धमकियां प्रचलन में हैं, वहीं आपकी इस पत्रिका ने लोभ का संवरण किया तथा नई पीढ़ी के भविष्य को ध्यान में रखकर अनेक विषय उठाए।
उन विषयों का बदलता स्वरूप एवं नई तकनीक तथा रोजगार से जुड़ी संभावनाओं का स्पष्ट चित्रण भी किया। देश के राजनीतिक हालात, देश में नेतृत्व का अभाव तथा बड़े राष्ट्रीय दलों की एकरूपता, भ्रष्टाचार एवं युवा वर्ग के समक्ष उपलब्ध विकल्प, पुलिस की बदलती छवि जैसे नितान्त अनिवार्य विषयों पर विस्तृत चर्चा की। यहां यह कहना सही होगा कि पत्रिका ने पिछले वर्षो में भावनात्मक पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों में विश्वास के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। राजस्थान का गुर्जर आन्दोलन एवं भोपाल का किसान आन्दोलन कैसे पत्रिका की पहल से एक ही दिन में ठहर गए थे। भावनात्मक धरातल पर आदान-प्रदान के कारण ही पत्रिका ‘द न्यूज पेपर विद अ सोल’ बना।
पिछले एक साल के 52 रविवार जैकेटों के अलावा भी लगभग डेढ़ दर्जन अन्य अवसरों पर पत्रिका के जैकेट प्रकाशित हुए। जैकेट के विषय रोजमर्रा के विषयों से हटकर, किन्तु राष्ट्रीय महत्व के रहे हैं। कुछ नमूने उदाहरण के लिए इस पृष्ठ पर भी प्रकाशित किए जा रहे हैं।
आज लोकतंत्र में वंशवाद का नासूर पैदा हो गया, जिसके चलते देश एक परोक्ष राजाशाही-तानाशाही का शिकार होता जा रहा है। नेहरू-गांधी परिवार यदि छह दशकों से सत्ता पर काबिज है, तब इसका दुरूपयोग अन्य दल अथवा प्रभावशील वंश क्यों नहीं करेंगे। कहां-कहां इस विकृति की मार पड़ रही है, उसकी चर्चा भी की गई। युवा वर्ग इस चुनौती को कैसे झेलता है, उसी पर देश में लोकतंत्र का भविष्य टिका है।
इसी से जुड़ी मध्य एशिया की क्रान्तियों की ओर भी इशारा किया गया। वहां के एवं भारत के हालात भी सामने रखे तथा यह अपेक्षा भी की गई कि कोई क्रान्ति जन्म लेनी चाहिए। भ्रष्टाचार सारी हदों को पार कर चुका है। इसी प्रकार परमाणु विकिरण का खतरा है। हम नए-नए परमाणु संयंत्र लगाने की योजना तो बना रहे हैं, उनके विश्वव्यापी परिणाम भी लोगों के ध्यान में रहें।
अन्ना हजारे के आन्दोलन ने वर्षो बाद देश को ईमानदार एवं संकल्पवान नेतृत्व दिया। पूरा देश एकाएक उधर खिंचता चला गया। आज देश के समक्ष सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व का अभाव ही है। यही इतने भ्रष्टाचार का कारण भी है।
संसद में रखे जाने वाले विभिन्न विधेयकों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। विशेष रूप से महिला आरक्षण विधेयक की व्यावहारिकता, लिव-इन-रिलेशनशिप, रिटेल में एफडीआई आदि पर जैकेट के जरिए दी गई जानकारी का प्रभाव गहरा नजर आया।
इतना सब कहने का एक ही अर्थ है कि पत्रिका स्वप्रेरणा से पाठकों के हित में कई ऎसे कार्य हाथ में लेता रहा है, जिन पर अन्य माध्यम मौन दिखाई पड़ते हैं। ‘जागो जनमत’, संवाद सेतु, गुणवत्ता पुरस्कार, शहर के सफाई अभियान, अमृतं जलम् आदि कुछ उदाहरण हैं। एक ओर इन अभियानों की पूर्ति से कई तरह की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, पाठकों में प्रेरणा का प्रवाह होता है तथा विश्वास का रिश्ता आगे से आगे मजबूत होता जाता है। हम यह नहीं कहते कि हम चौथा स्तंभ हैं, क्योंकि स्तंभों से ही तो जनता दु:खी है। हम उनके साथ नहीं खड़े रहना चाहते। हम जनता एवं तीनों स्तंभों के मध्य सेतु ही रहना चाहते हैं। यही हमारे संविधान की मंशा भी है।
गुलाब कोठारी
