राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत का छत्तीसगढ़ दौरा पूरा हो गया। प्रदेश के संघ एवं भाजपा पदाघिकारियों ने इस प्रवास के भिन्न-भिन्न अर्थ भी लगाए। भागवत जी को कुछ निर्णायक एवं गंभीर मूड में भी माना। विशेष रूप से जो स्नेह भाजपा सांसद नंदकुमार साय के साथ आत्मीयता के क्षण बिताकर जताया। उनके साथ भोजन करके जो संदेश दिया, वह अपने आप में अनूठा माना जा रहा है।
इसी प्रकार भिलाई को राजनीतिक मानचित्र पर उभरने के विशेष प्रयत्न भी जारी हैं, यह स्पष्ट हुआ। पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का आयोजन भी भिलाई में ही रखा गया था। इस बार संघ प्रमुख के साçन्नध्य में भिलाई शिखर की ओर बढ़ता नजर आया। यहां की सांसद सरोज पांडे को आगे लाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री व राज्य के प्रभारी सौदान सिंह भी बराबर प्रयासरत रहे।
इसके विपरीत छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को एक बार तो लगभग आधा घंटा बाहर ही प्रतीक्षा में बिठा दिया, जो कि काफी चर्चा में है। इसे आश्चर्य की दृष्टि से देखा जा रहा है। इतना ही नहीं, जब सात प्रमुख पदाघिकारियों की अलग से बैठक हुई, उसमें भी मुख्यमंत्री के स्थान पर विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के साथ ही विचार-विमर्श चलता रहा।
इस बात को एक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है कि जहां-जहां भी सर संघचालक बोले, भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर बोले। भाजपा एवं संघ इस तथ्य को मुख्यमंत्री के लिए सार्वजनिक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। इसी के साथ-साथ आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत संघ के विभिन्न संगठनों की रिपोर्ट भी पूरी तरह नकारात्मक ही रही। सब इस बात पर एकमत थे कि इन क्षेत्रों तक विकास अभी तक भी नहीं पहुंचा है। कुछ गांवों में मुख्यमंत्री को नाराजगी जताते हुए लौटाने की जानकारी भी चर्चा में आई।
मोहन भागवत पूरे प्रवास में गंभीर अवश्य नजर आए, किंतु यह भी लगा कि केसी सुदर्शन के पहले तक के सर संघचालकों की तुलना मे भागवत कमजोर साबित हुए। हो सकता है इसका कारण ‘मराठा-पे्रम’ रहा हो। किंतु इसकी बड़ी कीमत भाजपा को ही चुकानी पड़ेगी।
जैसे ही भागवत विदा हुए, जयराम रमेश (केंद्रीय मंत्री) रायपुर ही नहीं, बल्कि रमन सिंह के साथ बस्तर के सुकमा जिले के उद्घाटन पर पहुंच गए। गत प्रवास में वन मंत्री के रूप में दो नए क्षेत्र छत्तीसगढ़ को खनन के लिए खोल गए थे। किंतु इसका एक प्रभाव यह भी दिखाई दिया कि कांग्रेस के एक केंद्रीय मंत्री के साथ कोई भी स्थानीय नेता सुकमा नहीं पहुंचा। इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा? इस समीकरण के अर्थ किसकी समझ नहीं आएंगे। शायद मोहन भागवत को अपने प्रश्नों के उत्तर भी मिल गए होंगे।
गुलाब कोठारी
