Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 26, 2012

पाप और पुण्य का चिन्तन

कृष्ण ने गीता में कहा कि तू सारे कर्म मुझको अर्पित कर दे। यानि-कर्ता भाव को छोड़ दे और निमित्त बन जा। तू कौन? हर एक जीवात्मा। क्यों हो जा निमित्त? क्योंकि प्रत्येक कर्म अथवा क्रिया के पीछे कारण होता है। हर कारण के साथ इच्छा पैदा होती है। जिस विषय का ज्ञान हो, उसी की इच्छा मन में पैदा होती है। व्यक्ति इच्छा को स्वयं प्रकट नहीं कर सकता। जीवात्मा के क्षेत्राधिकार से बाहर है। सूक्ष्म है, अदृश्य है कारण। आत्मा में जीवात्मा के साथ जो ईश्वर बैठा है, साक्षी भाव में, वही नियंत्रण करता है। सारी इच्छाएं वही पैदा करता है। ईश्वर भी ज्ञान की भूमिका में ह्वदय में बैठा है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र रूप ह्वद् प्राण ही हमारे अक्षर प्राण रूप ईश्वर का स्वरूप है। ब्रह्मा ह्वदय केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है। विष्णु बाहर से मन की खुराक (अन्न) लाता है। विभिन्न इन्द्रियों के विषय ही मन का अन्न है। मन की चंचलता का कारण भी यही है। इच्छा से ही चंचलता है। यह जीव की इच्छा कही जाती है। इसका कारण भी ईश्वर ही है। जब जीवन के सारे कर्म ईश्वर की इच्छा से ही होते हैं, तब मनुष्य क्यों स्वयं को कर्ता माने? प्राकृतिक स्वभाव रूप सहज कर्म ही ईश्वरीय कर्म कहलाता है। इससे हटकर किया गया कर्म नकली या नकल रूप होता है। वह बुद्धि द्वारा आरोपित कर्म हो जाता है। वहां अहंकार की भूमिका मुख्य हो जाती है। तब जीव का कर्ता भाव हावी रहता है।

एक तथ्य जो सदा दृष्टि से ओझल रहता है, वह यह कि मनुष्य भी प्रकृति का ही अंग है। उसके जीवन का संचालन भी प्रकृति ही करती है। अत: उसके सारे क्रिया-कलाप भी प्रकृति को ध्यान में रखकर ही करने पड़ते हैं। क्योंकि प्रकृति के विरूद्ध आचरण ही दु:खों का हेतु बनता है। लोक व्यवहार में इसी को पाप कहते हैं। जबकि प्रकृति में न कुछ पाप-पुण्य है, न ही कोई अच्छा-बुरा होता है। वहां कर्म को कर्म ही कहा है। प्रकृति के स्वरूप को ध्यान में रखकर ही इन अवधारणाओं के लौकिक व्यवहार के नियम बनाए गए हैं। प्रकृति एक संतुलन भी बनाकर रखती है। एक शेर को बनाए रखने के लिए पूरे जंगल-जानवरों की संरचना का पिरामिड बनाया गया है। मनुष्य के लिए भी ऎसा ही है।

प्रकृति में 84 लाख योनियों का विस्तार माना गया है। हर योनि की अपनी उपयोगिता भी है। सभी योनियों का रहना पारिस्थितिकी संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण भी है। हमारे ऋषियों ने ध्यान में जाना कि किस तरह के कर्म से किस प्रकार की योनि प्राप्त होगी। यह भी जाना कि भावनाओं के आधार पर ही कर्म फलदायी होते हैं। अत: पाप-पुण्य की अवधारणा में इनका विस्तृत विवेचन है।

एक नर्तकी के मकान के सामने एक धार्मिक व्यक्ति का मकान था। कुछ सालों के बाद दोनों यमराज के समक्ष उपस्थित हुए। वहां नर्तकी को स्वर्ग तथा धार्मिक व्यक्ति को नरक में भेजने का आदेश हुआ। धार्मिक व्यक्ति को यह निर्णय समझ में नहीं आया। उसने यमराज से प्रश्A कर ही लिया। यमराज ने कहा कि तुम धार्मिक क्रियाएं तो करते थे, किन्तु तुम्हारा ध्यान सदा नर्तकी पर टिका रहता था। मन पूर्ण रूप से वासना ग्रस्त था। नर्तकी के सामने नृत्य करना मजबूरी थी। किन्तु उसका मन तुम्हारी तरह धर्म नहीं कर पाने के लिए दुखी था। मन में धर्म का भाव नित्य रहता था। यही भाव उसके स्वर्ग का आधार रहा।

प्रकृति में कर्म तो शुद्ध कर्म ही है। उसी अनुरूप फल है। चूंकि मानव जीवन का मूल लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति कहा है, अत: उस दिशा में सहायक होने वाले कर्म की पुण्य संज्ञा की गई। पाप-पुण्य की इस अवधारणा से व्यक्ति के मन में लक्ष्य के प्रति जागरूकता एवं प्रेरणा बनी रहती है। समाज में भी मर्यादित आचरण बना रहता है। सकारात्मक सोच के कारण ही विद्या एवं ज्ञान के प्रति आकर्षण बना रहता है। आज शिक्षा के धर्मविहीन हो जाने से मानव समाज भी अमर्यादित होने लग गए।

सब कहते हैं कि मनुष्य को अच्छा होना चाहिए। अच्छा रहकर ही अच्छे से आगे जा सकते हैं। इसके लिए आगे निष्काम कर्म का अभ्यास करना पड़ता है। पाप कर्म में रमने वाला निष्काम कर्म तक सहजता से नहीं पहुंच सकता। उसका राग-द्वेष, अहंकार आदि अवरोध बन जाते हैं। तब व्यक्ति नया कुछ ग्रहण नहीं कर सकता। जैसे कि उल्टे पात्र में कुछ नहीं भर सकता। पुण्यकर्म इस पात्र को सीधा करने का प्रयास है।

आत्मा के दो धातु हैं- ज्ञान एवं क्रिया । ज्ञान ब्रह्म/आत्मा का अंश है और क्रिया शरीर/माया का। सृष्टि क्रम में सर्वप्रथम अव्यय पुरूष का निर्माण होता है। इसकी पांच कलाएं होती हैं-आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण और वाक्। इनमें मन में केन्द्र है। इसकी गति दोनों ओर होती है। जब मन सृष्टि की ओर बढ़ता है, तब वह प्राण एवं वाक् के साथ होता है। प्राणों के माध्यम से वाक् सृष्टि का निर्माण करता है। प्राणों से प्राण या अक्षर सृष्टि का भी निर्माण होता है। अक्षर पुरूष के ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र ही आगे की सृष्टि के ह्वदय बनते हैं। इनकी अग्नि-सोम पर होने वाली क्रिया से ही अगिA-सोमात्मक विश्व बनता है। अक्षर पुरूष से ही मृत्यु लोक अथवा क्षर संसार का निर्माण होता है। चूंकि ब्रह्म स्वयं में नियन्ता और साक्षी भाव में प्रतिष्ठित रहता है, अत: सारी रचना तो माया ही करती है। ब्रह्म के सारे स्वरूप माया ही बनाती है। सभी स्वरूप अगिA मूर्ति रूप होते हैं।

अक्षर सृष्टि का विस्तार अमृत एवं मत्र्य रूप में होता है। सूर्य ही अक्षर ब्रह्म या इन्द्र है। हमारी सृष्टि का पिता है। अत: सूर्य से पृथ्वी की ओर सारी मत्र्य सृष्टि है। ऊपर परमेष्ठी एवं स्वयं-भू पर्यन्त अमृत सृष्टि हैं। अव्यय पुरूष का मन जब आनन्द – विज्ञान की ओर मुड़ता है, तब वह अमृत भाग की ओर गमन करता है। इस बात से मन की दो गतियां स्पष्ट हो जाती है। एक ऊघ्र्व गति, अमृतमय तथा दूसरी अधोगति-मत्र्य विश्व की ओर । ऊध्र्व गति में आत्मा परात्पर अथवा अपने मूल की ओर आगति रूप होता है। विश्व भाव में माया का क्रिया भाव प्रधान होता है। ऊध्र्व गति का आधार ज्ञान है। ज्ञान को ही विद्या-धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऎश्वर्य, कहते हैं। अविद्या इसका विपरीत भाव-अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य अथवा अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश रूप है। ज्ञान भाव से आत्मा ब्रह्म के पास पहुंचती है तथा क्रिया भाव माया तथा सृष्टि का पर्याय है। अत: ज्ञान आधारित कर्म ही पुण्य कहलाता है तथा क्रिया आदि कर्म, जो आत्मा को आवरित करते हैं, आत्मा का भान भुला देते हैं तथा जिनके फल अधोगामी बनाते हैं, वे पाप कहलाते हैं।

जब तक ज्ञान ढका रहता है, उसका साध्य भी आवरित रहता है। व्यक्ति साध्य को लक्ष्य बनाकर ही अनुष्ठान करता है। कोई अनुष्ठान ज्ञान के बिना नहीं होता। किन्तु ज्ञान में गति नहीं है। वह प्राणों को गतिमान करता है। यह गति ही क्रिया लक्षणा है। प्राण-गति-यजु-ऋषि-अगिA आदि शब्द गति या माया के ही पर्यायवाची हंै। माया ही विद्या एवं अविद्या रूप गतिशीलता है। यही पुण्य एवं पाप कर्मो का उपादान कारण है। विश्व का मूल कारण भी अगिA या गतितžव है। एक एवागिAर्बहुधा समिध्द:। व्यक्ति ईश्वरीय नियमों की अवहेलना करके जब मनमर्जी अथवा बुद्धिमता के आधार पर काल्पनिक विधि -विधान बनाने में प्रवृत हो जाता है, तब उस दशा में अवश्य ही उसका स्खलन हो जाता है।

पातंजल योग सिद्धान्त कहता है कि जहां ईश्वर अविद्या रूप क्लेश भावों से, कर्म-विपाक आशयों से, ईष्र्या -मद-दंभ -मात्सर्यादि पाप्मा लक्षणा आसुरी भावों से लि# है, वहीं मानव अपने स्वतंत्र पुरूषार्थ का दुरूपयोग करता है। मानो वह ईश्वर से भी आगे निकल जाना चाहता है। ईश्वर के सारे गुण तो मानव में हैं ही । अत: शाश्वत नियमों का अतिक्रमण करने लगता है। इसी का नाम पाप कर्म है। इनका आधार भी है बुद्धिमानी और मनमानी । सूर्य से प्राप्त बुद्धि अगिAधर्मा है। चन्द्रमा से उत्पन्न मन सौम्य है। विश्वास और श्रद्धा का यही आधार है। विश्वास विकासात्मक तžव बनता है और श्रद्धा संकोचात्मकस्नेह तžव का रूप लेता है। संवत्सर सृष्टि में इसी से पुरूष का अगिAभाव तथा स्त्री का सोम रूप होता है। जब तक यह विश्वास-श्रद्धा तžव अक्षुण्ण रहता है, तब तक स्त्री-पुरूष का स्वरूप भी संरक्षित रहता है।

नकल में मन प्रधान बनता है। प्रवाह के अनुसार कर्म करने लग जाता है। बुद्धि अपने हित के अनुपात में कर्म तय करती है। महर्षि पतंजलि ने लिखा है- चित्तनदी नाम उभयतो वाहिनी। चित्त रूपी नदी दोनों ओर बहती है। ऊपर भी, नीचे भी। शुभ में भी, अशुभ में भी। मन का वातावरण ही इस दिशा को तय करता है। श्रीमद् भागवत में भी कहा है-

यत्र तत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया,
स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् भयाद् वापि याति तत्तत् स्वरूप ताम्।

व्यक्ति स्नेह, द्वेष एवं भय से प्रेरित होकर अपने मन को, भावना को, बुद्धि द्वारा जहां-तहां ले जाता है। मन वैसा ही आकार धारण कर लेता है। स्नेह से प्रेरित मन स्नेही, भय से भय युक्त और द्वेष से द्वेषी हो जाता है। संसार में जितने कारण बंधन के लिए हैं, उतने ही कारण मुक्ति के भी हैं। भावों के कारण ही राग, द्वेष, अमृत, विष आदि द्वैत कोई एक स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। मन को विचारों के जिस रस से भावित किया जाए, वैसी ही भावना बन जाती है। बुद्धि तात्विक परिस्थिति के अनुरूप निश्चित निर्णय पर पहुंचती है। मन प्रत्यक्ष से प्रभावित होकर तत्काल निर्णय कर बैठता है। मन सम्मत कृत्रिम इच्छा जीव की इच्छा है।

इसी मन से मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण करता है। मनमानी करता है। यहां बुद्धि सम्मत सहज इच्छा को ईश्वरीय कहा गया है। यह मानव को अतिक्रमण नहीं करने देती । इसी को बुद्धिमानी कहते हैं। अविद्या के चार दोष जहां मन को मनमानी करने के प्रवृत्त कर अतिक्रमण के कारण बनते हैं, वहीं विद्या रूपी चार गुण बुद्धि को बल प्रदान करते हुए मनोनियंत्रण के कारण बनते हैं। शब्द ब्रह्म रूपी शास्त्र ज्ञान ही ज्ञान है। इसे न जानना ही अविद्या है। आत्म विकास को ही ऎश्वर्य कहते हैं। संकोच ही अस्मिता है । विकास ही स्मित भाव है। आत्मा में सम्पूर्ण ऎश्वर्य व्याप्त है । किन्तु अस्मिता दोष के कारण व्यक्ति स्वयं को दीन-हीन-द्ररिद्र मानता रहता है । राग-द्वेष सहित ग्रन्थि बन्ध आसक्ति है। स्वरूप स्थिति को धर्म कहा है। इसको विस्मृत कराने वाली हठधर्मिता ही अभिनिवेश है । विद्या से बुद्धि सबल होकर मन का नियंत्रण रखती है। इसके बिना मन अधर्म के प्रवाह में बह जाता है।

इसी प्रकार जीवन का पुरूषार्थ भी धर्म पर ही टिका हुआ है। धर्म को पहले चुनना पड़ता है । तब संकल्प से उसको धारण करना पड़ता है । इसी से धर्म आगे चल कर व्यक्ति के जीवन को धारण करता है। कामनाओं से मुक्त करके मोक्ष गामी बनाता है। इस उपलब्घि के लिए हर जीव को अनिवार्य रूप से स्त्रैण होना ही पड़ता है। दया-करूणा, ममता, वात्सल्य, श्रद्धा, स्नेह, प्रेम आदि सभी गुण स्त्रैण ही हैं। स्त्री में तो होते ही हैं। पुरूष्ा को भी इनका अभ्यास करना पड़ता है। इसके अभाव में व्यक्ति के अहंकार तथा ममकार ज्ञान को उदय होने से रोक देते हैं। अहंकार पापमाओं का शीर्ष है। श्रद्धा पुण्य के गुणों का नेतृत्व करती है। भावनाओं के स्पन्दन अहंकार और श्रद्धा के कारण मन की दिशा को तय करते हैं। अहंकार सृष्टि-प्रधान इच्छा मन में पैदा करता है। प्राणों के माध्यम से वाक् का निर्माण करता रहता है। नित नए बन्धन पैदा करके व्यक्ति को 84 लाख योनियों में आवागमन के लिए बाध्य करता रहता है। श्रद्धा के कारण मन अध्यात्म की ओर मुड़ता है। भीतर गति करता हुआ प्रज्ञा क्षेत्र में प्रवेश करता है।

चेतना को स्वप्न-सुषुप्ति से निकालकर जाग्रत बनाए रखती है। इसी के सहारे आनन्द में प्रतिष्ठित होता है व्यक्ति । सही अर्थो में तो इस आनन्द का प्रकट होना ही ईश्वरीय प्रसाद कहलाता है।

पाप-पुण्य का लौकिक स्वरूप समझाता है कि जिसमें अनुकूलता की सिद्धि दिखाई पड़े वह पुण्यकर्म है। जिसमें प्रतिकूलता की प्रतीति हो वह पाप कर्म है। एक ही कर्म किसी के सापेक्ष होने से पुण्य होता है तो अन्य सापेक्ष होने से पाप होता है। अत: उसे इस
प्रकार समझकर इस पुण्य-पाप का सूक्ष्मबुद्धि से निpय करना चाहिए।

स्वर्गीय पं. मधुसूदन ओझा जी ने लिखा है कि जिस कार्य को करने से दिव्य लोकों की प्राप्ति होती है, वह पुण्य कहलाता है तथा जिस कर्म को करने से कष्टदायक नरक आदि लोकों की प्राप्ति होती है वह पाप कहलाता है। पुण्यकर्म करने से अतिशय एवं अपूर्व पुण्य की उत्पत्ति होती है। उन अपूर्व एवं अतिशय पुण्य से समय-समय पर क्रमश: पुण्य लोकों की प्राप्ति होती रहती है। पाप संबंधी कर्म को करने से अतिशय एवं अपूर्व कालुष्य की उत्पत्ति होती है जिससे समयानुसार नरक संबंधी लोक की प्राप्ति होती है।

जीवन में हर अवधारणा के पीछे एक लक्ष्य होता है। उसी से जीवन का स्वरूप होता है। समाज के धर्म और कर्म का परिवेश होता है। पाप-पुण्य की अवधारणा के मूल में भी जीवन का एक अतिमहत्वपूर्ण पहलू जुड़ा हुआ है। जीवन का आधार शरीर है, कर्म प्रधान है। शरीर आत्मा नहीं है। आत्मा को निश्चित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए, कर्मो के फल भोगने के लिए यह मानव देह प्राप्त हुई। आत्मा इसी चक्र से गुजरता हुआ नए कर्म भी तो अर्जित करता जाता है। ये कर्म और पिछले जन्मों के कुछ कर्म मिलकर अगले जन्म की भूमिका बनाते है। जीवन चक्र चलता ही रहता है। जीवन में ज्ञान आत्मा का पर्याय है। कर्म क्रिया अथवा चरित्र का। मनुष्य अपने ज्ञान की शक्ति से जीवन-मृत्यु अथवा पुन: जन्म के चक्र से बाहर निकल सकता है। कृष्ण भी कह गए कि मनुष्य ज्ञान के द्वारा अपने कर्मो को जला सकता है। इसके लिए हमको पुरूषार्थ का मार्ग मिला। जीवन का आधार हमारा मन है और मन की गति दोनों ओर होती है। (ऊध्र्वगति एवं अधोगति)। यह गति मन-प्राण-वाक् रूप सृष्टि क्रम को आगे बढ़ाने वाली भी हो सकती है अथवा निवृत्ति क्रम में जोड़ने वाली आनन्द-विज्ञान मन स्वरूप भी। किन्तु मन की चंचलता पर नियंत्रण भी कोई सहज कार्य नहीं है। इसके रहते मन आत्मा की ओर मुड़ ही नहीं सकता।

दूसरा पहलू यह भी है कि मन कामना अथवा इच्छा का केन्द्र भी है। यह इच्छा मन में पैदा नहीं की जा सकती। हर आत्मा का एक भाग जीव होता है और एक भाग ईश्वर का (साक्षी) होता है। यह ईश्वर मन में इच्छा पैदा करता है। जब तक यह रहस्य समझ में नहीं आ जाता, पाप और पुण्य की भूमिका को नहीं समझा जा सकता। हां, लौकिक जीवन के अथवा सामाजिक जीवन के पाप-पुण्यों पर चर्चा हो सकती है। जैसे कि स्व. मधुसूदन ओझा जी ने भी वेद धर्म व्याख्यानम् में की है। लौकिक व्यवहार आचरण/चरित्र संज्ञा में आता है। गत्यात्मक होने से चरित्र का आधार भी प्राणमय एवं माया शक्ति की अभिव्यक्ति ही है। चूंकि ब्रह्म और माया अभिन्न हैं, चरित्र भी आत्मा की अभिव्यक्ति ही है। किन्तु यह अभिव्यक्ति स्वतंत्र नहीं है। सारी क्रियाएं इच्छाओं द्वारा एवं ज्ञान द्वारा ही संचालित होती हैं। हर क्रिया का आधार या कारण उससे सूक्ष्म होता है। अदृश्य होता है। अत: दृश्य जगत की गतिविधियों में व्यस्त मन को दिखाई नहीं पड़ता। मन की चंचलता से सारा आदान-प्रदान अन्नमय कोश एवं मनोमय कोश के मध्य ही चलता रहता है। प्राणमय कोश के सहारे।

हमारा प्राणमय कोश श्वास-प्रश्वास से जुड़ा है। आकाश की तन्मात्रा नाद भी ध्वनि रूप में इस क्रिया का अंग होती है। जब श्वास भीतर आती है, तब “अ” की तथा बाहर निकलते समय “ह” की ध्वनि होती है। बोध रूपी अनुस्वार मिलकर ही “अहम्” पैदा करते हैं। “अ” और “ह” की ही आकर्षण और विकर्षण संज्ञा है। दोनों ही का संतुलन आवश्यक है। जब भी व्यक्ति अपने स्वरूप से ऊध्र्वमुखी होना चाहता है, तब वह “ह” का ह्रास करता है। इसी अनुरूप विकर्षण क्रिया एवं बहिर्मुखता का लोप होता जाएगा। आकर्षण का अकार अव्यक्त सृष्टि को प्रकट करता चला जाएगा। हमारी पाप-पुण्य की अवधारणा यहां समझ में आने लगती है। जिस भी क्रिया से इस विकर्षण क्रिया का अभाव बढ़ता जाए उसे प्रकृत साधन पथ अथवा लोक भाषा में पुण्य मार्ग कहते हैं। इसी प्रकार पाप-पुण्य को समझने के लिए आत्मा तथा जीव का, ईश्वर तथा परात्पर का स्वरूप समझना भी अनिवार्य है। इसी से सृष्टि और प्रतिसृष्टि का स्वरूप स्पष्ट होता है। पुरूष और प्रकृति की भूमिका दिखाई देती है। हर कर्म या क्रिया की तरह पाप-पुण्य का आधार भी प्रकृति है। जहां प्रकृति है, वहां आकृति भी है और अहंकृति भी। तीनों साथ होते हैं, जैसे कि मन-प्राण-वाक् या सत-रज-तम।

जहां क्रिया है, वहां शब्द भी है। जहां क्रिया मृदु है, वहां शब्द भी मृदु हो जाता है। क्रिया के साथ शब्द भी तीव्र हो जाता है। अत: क्रिया, भाव तथा शब्द अभेद सिद्ध हो जाते हैं। ये तीनों स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों में कार्य करते हैं। इन्हीं को क्रमश: प्रकृति, अहंकृति तथा आकृति कह सकते हैं। इनमें से किसी एक का परिवर्तन करके सम्पूर्ण अस्तित्व को बदला जा सकता है। इसमें स्पन्दनात्मक क्रिया का परिवर्तन कर सकना दुष्कर है। भक्ति योग द्वारा भाव-क्रिया का परिवर्तन किया जा सकता है। ध्वनि द्वारा परिवर्तन राजयोग/ मंत्र योग है। इसमें ध्वनि के साथ-साथ भावना भी जुड़ी रहती है। केवल भाव से भी परिवर्तन साध्य नहीं हो पाता। भावों का उद्रेक मनुष्य की इच्छा के अधीन नहीं है। इसको भी कोई अन्य कारण चाहिए। अत: ध्वनि ही सबसे सरल मार्ग है। ध्वनि का उच्चारण व्यक्ति अपनी इच्छा से कर सकता है। ध्वनि के उच्चारण से ध्वनिगत स्पन्दन उच्चारणकर्ता के भाव का तथा भावान्तरगत क्रिया का परिवर्तन कर देता है।

आकर्षण-विकर्षण (श्वास-प्रश्वास) ध्वनि का उच्चारण देह नहीं करता। उससे तो मात्र ध्वनि की प्रतिध्वनि अथवा ध्वनि का बहिर्गमन होता है। स्पन्दन क्रिया तो देह में भी ऊध्र्वमुखी होती है। तदनन्तर उसमें निमAगामी गति भी प्रत्यक्ष की जा सकती है। इसका कर्ता अहम् रूपी ह्वदय मे बैठा “ईश्वर” है। इसी क्रिया द्वारा ह्वदयस्थ ईश्वर का भी अस्तित्व प्रमाणित होता है। यह क्रिया ही शरीर का स्पन्दन रूप अस्तित्व है। यह कर्ता से सम्बद्ध है। इस क्रिया में तनिक भी परिवर्तन से भावादि बदल जाते हैं। गीता कहती है-”ईश्वर यंत्री के रूप में अवस्थित होकर देह रूप यंत्र तथा देहाभिमानी जीव को संचालित करता है।” जीव का संचालन स्पन्दन रूपी क्रिया के द्वारा ही करता है। यह स्पन्दन ही सृष्टि की मूल ध्वनि या आकाश की नाद रूप तन्मात्रा है। इसी स्पन्दन क्रिया के माध्यम से ईश्वर तथा जीव का सम्बंध योग बना रहता है। स्पन्दन क्रिया जीव का वर्तमान है। उसमें यथोच्छित परिवर्तन करती रहती है। जीवात्मा का इस क्रिया पर कोई आधिपत्य नहीं है। क्रिया ही सब कुछ का संचालन कर रही है। इसका ज्ञान होते ही द्रष्टत्व का विकास होने लगता है। तब कर्ता भाव रूप बन्धन भी छूट जाता है।
गुलाब कोठारी

बताओ धन कहां है?

आज पूरा देश एक बड़े भ्रष्टाचार के अaे की तरह दिखाई पड़ रहा है। किसी भी कोने में चले जाइए, भ्रष्टाचार के अतिरिक्त कुछ सुनाई ही नहीं देता। हर क्षेत्र के अपने रावण और कंस बने बैठे हैं। अब तो भ्रष्टाचार से आगे देश बलात्कार और हत्याओं के युग में प्रवेश कर रहा है। वहीं दूसरी ओर आत्महत्याएं सरकारों के मुकुटों की कीर्ति बढ़ा रही हैं। नेतृत्व पूर्ण बेखबर, अभिमानी तथा निम्नतर मानव कोटि में जी रहा दिखाई पड़ता है। भ्रष्टाचार के आरोपियों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि जीव नर या मादा नहीं होता।

भ्रष्ट लोगों को बचाने वालों की भी कोई कमी नहीं। जैसे अफजल को कोई मारना नहीं चाहता। टू जी प्रकरण में ए. राजा एवं कनिमोझी लाखों करोड़ के घोटालों में जेल गए। राडिया की टेपों ने भ्रष्टाचार के अनेक धरातल सामने ला दिए। देश को बेचने वाले उद्योगपतियों और पत्रकारों के मुंह काले कर दिए। राष्ट्रमण्डल वैसे भी अंग्रेजों की गुलामी का ही प्रमाण पत्र है। फिर इस आयोजन (खेलों में) में भी अरबों का घोटाला सामने आया। दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित तक के नाम सामने आए। तमिलनाडु के करूणानिधि, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, कांग्रेस-भाजपा एवं अन्य राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक दलों के नेता भ्रष्टाचार की मशाल लिए देश का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

अनेक जांच आयोग सैकड़ों रिपोट्र्स दे चुके, कई बड़े-बड़े नेता/ अधिकारी सुर्खियों में आ चुके। हां, एक बात सभी जांच आयोग दबाते जाते हैं, और वह यह कि घोटाले के धन के लेन-देन की बात नहीं करते। आखिर इतने लाख करोड़ हैं कहां? कहां हैं ए.राजा के पौने दो लाख करोड़? किन दस्तावेजों के आधार पर इतने बड़े-बड़े घोटालों की पुष्टि की जाती है? क्या इनमें धन का लेन-देन नहीं होता? क्यों जांच एजेंसियां इतने महत्वपूर्ण तथ्य को दबा जाती हैं अथवा यह भी जांच की कोई अनिवार्य शर्त होती है? जनता की जिज्ञासा तो यह है कि इतना धन कहां गया और क्या यह धन फिर से राजकोष में जमा हो सकेगा। क्या जांच एजेंसियों की यह कार्य शैली संघीय ढांचे में छेद नहीं कर रही?

हम चाहे सुभाष चन्द्र बोस की जांच पर चर्चा करें, चाहे भंवरी देवी की हत्या पर। सारा कार्य ढांचे को शक्तिहीन करने की दृष्टि से ही किया जा रहा है। सारी जांच एजेंसियां संवेदनहीन बनकर कार्य करती हैं। प्रयास सारे ढांचे को सुरक्षित किए रहने को नहीं किए जाते, बल्कि व्यक्ति विशेष अथवा क्षुद्र स्वार्थ ही केन्द्र में रहने लगे हैं। गांव के पंचों के नरेगा मुद्दों से लेकर बोफोर्स तोप सौदे चर्चा में तो आते हैं किन्तु कोई संस्था इनसे जुड़े धन की प्राप्ति की बात नहीं करती। कैग का अनुमान है कि टू जी में 1.76 लाख करोड़ रूपए का घोटाला हुआ होगा लेकिन यह राशि कितने हाथों में गई होगी किसी को नहीं पता। उनके नाम एवं राशि को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? इसके पीछे चोरी की मानसिकता ही होती है। जांच एजेंसियां भी अपवाद नहीं होतीं। तब क्या अर्थ रह जाता है घोटालों की चर्चा को इतनी ऊंची आवाज में उठाने का। किसी एक कलमाड़ी, राजा जैसे किसी बकरे की बलि देकर बाकी को मुक्त करना ही उद्देश्य जान पड़ता है। काले धन की विदेश यात्रा की चर्चा शायद इसलिए करते हैं ताकि देश में दबे काले धन एवं उनके धन कुबेरों की चर्चा पर अंकुश लगाया जा सके। हर बड़ा भ्रष्ट नेता किसी न किसी माफिया से जुड़ा है। इसी तथ्य को छिपाने के लिए धन के लेन-देन तथा वसूल करने के मुद्दे पर सरकारें मौन रहती हैं।
गुलाब कोठारी

फ़रवरी 19, 2012

अक्षर-3

सृष्टि दो प्रकार की होती है। एक अर्थरूप भूत सृष्टि और दूसरी शब्द रूप वाक् सृष्टि। दोनों का ही आधार ‘अक्षर’ है। इसको परब्रह्म कहते हैं। इसका आलम्बन अव्यय पुरूष होता है। अव्यय और अक्षर नित्य संस्थाएं हैं। अव्यय की पांच कलाओं- आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् में ये वाक् ही अक्षर कहलाता है। अक्षर की पांच कलाओं-ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अगिA और सोम में से अगिA और सोम के कारण क्षर का निर्माण होता है। अक्षर का ऊध्र्व भाग अमृत और अधोभाग मृत्यु कहलाता है। क्षर से ही मृत्यु सृष्टि (विश्व) का निर्माण होता है। अक्षर इस के पीछे कारण है। अक्षर ही शब्द सृष्टि का भी कारण है। वर्ण मातृका नित्य है, उत्पन्न नहीं होती। स्थान, प्रयत्न और संयोग से इसकी अभिव्यक्ति होती है।

 

 

वाक् से ही मण्डल बनते हैं। स्वरूप बनता है। ऋत् से सत्य बनता है। स्वयंभू मण्डल की वाक् को वाचस्पत्य या वैकुरा, परमेष्ठि की वाक् को ब्राह्मणस्पत्य या सुब्रह्मण्या, सूर्य मण्डल की वाक् को ऎन्द्र अथवा गौरीविता तथा चन्द्रमा युक्त पृथ्वी की वाक् को भौम या आंभृणि कहते है। वैदिक सिद्धान्त के अनुसार शुरू की तीन प्रकार की वाक् कहीं भी प्रकट नहीं होती। केवल चतुर्थ और अन्तिम वाक् ही कार्यरत जान पड़ती है।

 

कहा भी है-

‘चत्वारिवाक् परिमिता पदानि तानिविदुब्राüह्मणा ये मनीषीण:। गुह्या त्रीणिनिहतानेंगयन्ति तुरियं वाचो मनुष्या वदन्ति।।’ अन्न से वाक् उत्पन्न होती है। अगिA में आहुत होने वाला सोम अन्न कहलाता है। द्यु लोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वी का वाक् और चौथा पशुओं का वाक्।

 

स्व. पं. मधुसूदन ओझा ने अपने ग्रन्थ पथ्यास्वस्ति और वर्ण समीक्षा में अक्षर और वर्णमाला की वैज्ञानिकता पूर्ण स्पष्ट की है। उनका ही एक अंश या मुख्य बिन्दु यहां लिख रहा हूं। हो सकता है कुछ विद्वान इस पर आगे कार्य कर सकें। ईश्वर और जीव के सृष्टि स्वरूप को समझने के लिए इस शब्द ब्रह्म से आसान माध्यम नहीं है।

 

वाक् के बारे में अन्य मत इसके चार रूप – अमृता, दिव्या, वायव्या और ऎन्द्री – मानते हैं। मन-प्राण गर्भित सत्यावाक् अमृता है। ऋक्, यजु, साम तीनों को अमृता कहा है। आकाश अमृता है। अगिA इसका ब्रह्म है। दिव्या वाक् ऋत् कहलाती है। अथर्व है। देवता और भूत दिव्य वाक् हैं। इसी को सरस्वान वाक् भी कहा है। दिक् सोम इसका ब्रह्म है। यह सौया वाक् है। अमृता और दिव्या में ध्वनि नहीं होती।

 

ध्वनि भी दो तरह की होती है। शक्ति रहित ध्वनि सार्थक नहीं होती। गतिहीन होकर वायु के साथ बहती है। इसमें नाद, श्वास आदि विशेषताएं वायु से बनती हैं। यह सरस्वती वाक् है। अव्याकृत है। वर्ण, पद, वाक्य में विभक्त ध्वनि को सार्थक कहा है। सरस्वती वाक् में इन्द्र प्रविष्ट होकर भिन्न-भिन्न आकारों में व्याकृत करता है। जिसे हम बोलते हैं, इसको ही ऎन्द्री वाक् कहा गया है। प्राज्ञ प्राण ही इन्द्र है। प्रज्ञान से ही वाणी में वर्ण विभाग होते हैं। वर्णो में ‘अ’ तथा ‘उ’ मन और प्राण के बोधक है। प्रज्ञा और प्राण सदा मन के साथ रहते हैं।

 

अनाहत, महाभूत, पशु-पक्षी, शिशु रूदन आदि इन्द्र द्वारा व्याकृत न होने से अनिरूक्त हैं, वायव्य हैं। व्याकृत ऎन्द्री वाक् शरीर में परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी है। सारा ज्ञान इसमें है। बुद्धिस्थवाक् परावाक् है। उपांशुवाक् पश्यन्ति है। नाद ध्वनि के बिना किया गया उच्चारण मध्यमा है। नाद-ध्वनि के साथ किया गया स्पष्ट उच्चारण वैखरी है। निरूक्त है। ये इन्द्र और वायु के योग की ऎन्द्रवायव वाक् है। वैखरी के चार भाग-वर्ण, अक्षर, पद, वाक्य। वर्ण के चार भाग-स्पृष्ट, अस्पृष्ट, अर्द्धस्पृष्ट और इषत्स्पृष्ट।

 

पद के भी चार विभाग-नाभ, आख्यात, उपसर्ग, निपात। अर्थ के लिए प्रज्ञानयुक्त वाक् वाक्य कहलाती है। वाक् नाभिस्थान, प्रक्रमत्रय स्थान, मुख प्रदेश से चलकर श्रोत स्थान (कान) तक पहुंचती है। प्रक्रम स्थल हैं- उर, कण्ठ और शिर। मुख प्रदेश में कण्ठमूल, तालु, मूर्घा, दन्तमूल और ओष्ठ हैं।

पद के चार विभाग हैं- मित,अमित, स्वर, सत्यावृत।

 

मित-ऋक्, गाथा, कुम्ब्या। तीन प्रकार का।

अमित-यजु, निगद, वृथा।

स्वर-साम और गेष्ण।

ओम् सत्य है। न अनृत है।

‘अ’ कार ही अक्षर है। सब वर्णो का आदि मूल है। स्थान और करण (जिह्वा) के योग वियोग से, स्पर्श और उष्मा से, संकोच -प्रसारण से, संश्लेष-विश्लेष से वर्णमाला बनती है।

 

स्वरों में विश्लिष्ट उच्चारण में एक मात्रा का काल लगता है। संश्लिष्ट में 2-3 मात्रा का। स्वरों के अवयव संकोच से घनीभूत होकर स्वर ही व्यंजन बन जाते हैं। व्यंजन के उच्चारण में भी अर्द्धमात्रा काल लगता है। प्रक्रम स्थान (तीन), मुख स्थान (पांच), काल, बाह्य प्रयत्न और आयान्तर प्रयत्न (मुख में),  इन पांच गुणों के द्वारा ही एक ‘अ’ कार के द्वारा वर्ण समानाय उत्पन्न होता है।

 

उच्चारण के लिए प्राणवायु वाक् रूप में बदलता है। इसके लिए नाभि से उठकर उर, कण्ठ प्रदेश में टकराकर प्रथम प्रक्रम पूरा करता है। उर/कण्ठ में टकराकर शिर में टकराकर द्वितीय, मुख स्थानों में तीसरा और अन्त में वर्ण रूप में बाहर निकलता है।

 

पाणिनी ने लिखा है कि आत्मा बुद्धि के द्वारा अर्थो को जानकर दूसरों को बतलाने की इच्छा से मन को प्रेरित करता है। प्राणवायु उर स्थल में आहत होकर मन्द्र स्वर को उत्पन्न करता है। कण्ठ में टकराकर मध्यम स्वर, शिर में टकराकर तार स्वर बनाता है। वही मुख में आकर वर्ण बनता है। वर्णो के विभाग भी स्वर से, काल से, स्थान से, प्रयत्न से और अनुप्रदान से तय होते हैं।

 

नाभि स्थान से प्राण वायु बनता है। उर में वायु स्व स्वरूप में आता है, शिर में स्वर-ध्वनि रूप और मुख में ध्वनि-वर्ण रूप होता है। ध्वनि में बल का विशेष महत्व है। वायु नाभि से उठकर उर स्थान से टकराकर मुख से निकलता है, तब मन्द्र स्वर निकलता है (प्रात: सवन)। इसे उर स्थानीय अनुदात्त स्वर कहते हैं। नाभि से उठकर कण्ठ से टकराता हुआ मुख से निकलता है तो मध्यम स्वर होता है (मध्यन्दिन सवन)। इसे कर्ण मूलिय स्वरित स्वर कहते हैं। नाभि से उठकर शिर से टकराकर यदि मुख से निकलता है, तब यह तार (उदात्त) स्वर बनता है।

 

मुख से बाहर के स्थान-उर-कण्ठ-शिर बाह्य स्थान है। मुख में कण्ठ, तालु, मूर्घा, दन्त और ओष्ठ आभ्यान्तर स्थान कहलाते हैं। जिव्हा मूल कण्ठ है। पांचों स्थानों में क्रमश: जिव्हा मूल, जिव्हा मध्य, जिव्हा उपाग्र, जिव्हा अग्र तथा अधरोष्ठ (पांच करण) और पांच स्थानों के योग से वर्ण बनते हैं। वायु से कण्ठ में ‘अ’ कार, तालु में ‘इ’ कार, मूर्घा में ‘ऋ’ कार, दन्तमूल में ‘लृ’ कार और ओष्ठ में ‘उ’ कार बनते हैं। एक ही अकार से पांच वर्ण बन जाते हैं। मुख और नासिका से उच्चारित – अँ, इँ, ऋँ, लृँ, उँ पांच स्वर अनुनासिक कहलाते हैं।

 

गुलाब कोठारी

 

फ़रवरी 15, 2012

आद्या

आद्या
तुम्हारा आना
इस घर में
चमत्कार-सा है।
सबको लगा
सब बड़े हो गए
पदोन्नति हो गई,
ऊपर चढ़ गए
एक पीढ़ी,
परिवार की
एक सीढ़ी।
आज हम सब
गर्वित हैं
इस विकास से
और आज
लग रहा है
मुझको
एक झटका-सा,
क्यों बाबा,
बधाई के साथ
पिटाई भी,
कर रही हो
आद्या, तुम!
बाबा बनने तक
कहां था एहसास
पिता होने का,
कब हुए बच्चे
कब हो गए बड़े
पता कहां चला,
और आज
बघारते शेखियां
बाबा होने पर
तुम्हारे आने से।

गुलाब कोठारी

फ़रवरी 12, 2012

अक्षर-2

शब्द की उत्पत्ति संयोग, विभाग और शब्द से होती है। संयोग से मुख का एक स्थायी भाग है, दूसरा संचारी भाव है। स्थायी भाग को स्थान, संचारी को करण कहते हैं। स्थान के आठ भेद हैं। तीन बाहरी-उर, कण्ठ और शिर। पांच भीतरी- जिह्वा-मूल, दन्त, नासिका, ओष्ठ तथा तालु। जिह्वा-मूल, मध्य भाग, उपाग्रभाग, अग्रभाग और अधरोष्ठ। इन्हें करण कहते हैं। यही संचारी होता है और तालुमूल, मूर्घा, दन्तमूल आदि पंाचों स्थानों पर आघात करके पच्चीस वर्णो को उत्पन्न करते हैं।

वायु जिस प्रक्रम से उठकर कण्ठ में अकार बनती है, तालु स्थान में पहुंचकर इकार बन जाती है। मूर्घ स्थान में ऋकार, दन्त मूल में लृकार और ओष्ठ में उकार बन जाती है। एक ही प्राणवायु, एक ही अकार, भिन्न-भिन्न स्थानों में पहुंचकर अ,इ,ऋ,लृ,उ पांच स्वरूपों में बदल जाती है। एक ही अकार अक्षर के पांच भेद हुए। अकार रूप वाक् स्पर्श और उष्मा से नाना प्रकार की हो जाती है। स्थान और करण का संकोच-प्रसारण होने से भिन्न-भिन्न वर्णो की उत्पत्ति होती है। स्वरों के अवयव संकोच से घनीभाव होने पर स्वर व्यंजन बन जाते हैं।

अकार के उच्चारण में जितना काल लगता है उस काल को मात्रा कहते हैं। अकार जब अकार से मिलता है, तब उसे दीर्घ या द्विमात्रिक कहते हैं। त्रिमात्र या चातुर्मात्र अक्षर को प्लुत कहते हैं। एक मात्रिक-ह्रस्व, द्विमात्रिक की दीर्घ संज्ञा है। उदात्त-अनुदात्त-स्वरित तीन भेद से अकार के ही ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत भेद से 9 भेद हो जाते हैं। पांच स्थान भेद, मात्रा भेद, प्रक्रम भेद आदि से एक ही अक्षर के 42 निरनुनासिक और 42 सानुनासिक यानी 84 भेद हो जाते हैं।
मुख के भीतर जो प्रयत्न होते हैं, उनमें जहां स्थान और करण का स्पर्श होता है, उसे ‘स्पृष्ट’ प्रयत्न कहते हैं। स्पर्श विरोधी प्रयत्न ‘विवृत्त’ कहलाता है। अ, इ, ऋ, लृ, उ ये पूर्ण विवृत्त स्वर हैं। अर्द्ध मात्रिक, अभिनिधान, सान्ध्यक्षर आदि में विवृत्ति होती है। इन वर्णो में एक-एक वर्ण की जितनी मात्रा होती है उसके अर्द्धाश का ह्रास होने पर विवृत्तार्द्ध प्रयत्न द्वारा इनमें संकोच हो जाता है।

तब वे एक मात्रिक स्वर से च्युत होकर अर्द्ध मात्रिक व्यंजन हो जाते हैं। इकार तथा अकार की सन्घि होने पर जैसे इकार, लेकिन अर्द्ध मात्रा से च्युत हो जाता है। उसी प्रकार अकार और इकार की संघि होने पर पूर्व अकार, लेकिन अर्द्धमात्रा से हित होकर अर्द्धमात्र अकार शेष रह जाता है। पाणिनी लिखते हैं-एकार, ओकार में कण्ठ स्थानीय अकारी की अर्द्धमात्रा ही शेष रहती है। अर्द्धमात्र अकार व्यंजन होता है। पूर्ण स्पृष्ट न होने से स्वर भी है। अत: अन्त:स्थ कहलाता है।

बाह्य प्रयत्न (उर, कण्ठ, शिरो के दो भेद हैं सवार-नाद-घोष तथा विवार-श्वास अघोष) जिस उच्चारण में मृदुता के कारण बाह्य नली को फैलने नहीं दिया जाता, वह संवार हैं। इसका विपरीत भाव विवार है। जिस उच्चारण में वायु अघिक और प्राण रूप अगिA की मात्रा कम हो, उसे श्वास कहते हैं। इसका विपरीत भाव नाद है। जहां उच्चारण में दृढ़ता के कारण प्रतिध्वनि क्षमता कम हो, वह अघोष तथा इसका विपरीत भाव घोष कहलाता है। संवार-नाद-घोष तीनों साथ रहते हैं, अविनाभाव है। इनके बाह्य प्रयत्न से अ, य, र, ल, व, ड़, ज, व, ग, ज, द, ब, ड्, †ा, ण, न, म, वर्ण सिद्ध होते हैं। ये ही वर्ण जब विवार-श्वास-अघोष से युक्त होते हैं, तब क, च, ट, त, प हो जाते हैं। ये नासिक्य नहीं होते। ये पूर्ण स्पृष्ट वर्ण यदि भीतर अर्द्ध स्पृष्ट उच्चरित होते हैं, तब श,ष,स,ह, उष्म वर्ण बन जाते हैं। क और प दोनों ‘ह’ बन जाते हैं।

अत: दो प्रकार के बाह्य प्रयत्नों से 34 वर्ण उत्पन्न होते हैं। इनमें शुरू के पांच स्वर (अ,इ,ऋ,लृ,उ) तथा 29 व्यंजन सम्मिलित हैं। इनमें ‘अ’ और ‘हं’ कण्ठ स्थानीय, इ, च वर्ग य, श तालव्य, उ, प वर्ग ओष्ठय है। ऋ,र,ष,ट वर्ग मूर्घन्य है। लृ,ल,स,त वर्ग दन्तय है। क-वर्ग जिव्हा मूल स्थानी। ड़,ण,न,म,र और ल लोकभाषा में उष्म वर्ण हैं। वर्गो के द्वितीय और चतुर्थ वर्ण सोष्म (उष्मा युक्त) हैं। हकार यद्यपि अर्द्ध-स्पृष्ट है तथापि जिन ककारादि से इसका संयोग होता है, वे पूर्ण स्पृष्ट हैं। अत: इनको भी पूर्ण स्पृष्ट ही माना गया है। पाणिनी ने स्वरों को अस्पृष्ट, य,र,ल,व को ईष स्पृष्ट, श, ष,स, ह को अर्द्धü स्पृष्ट तथा शेष वर्णो को पूर्ण स्पृष्ट माना है।

ब्रह्म के तीन भेद हैं-अव्यय, अक्षर, क्षर। इन्हीं से मन-प्राण-वाक् कहते हैं। यह वाक् ही भूत भाव, शब्द भाव और अर्थभाव में फैलता है। वाक् रूप आकाश से ही वायु आदि भूत समूह पैदा होता है। आकाश सब में व्याप्त रहता है। यह आकाश ही आघात से कम्पित होता है। वायु के आधार पर गोल तरंगें उत्पन्न करता है। यही नाद रूप में कान तक पहुंचता है। शब्द कहलाता है। इसी से शब्द रूप और अर्थ रूप सृष्टि आगे बढ़ती है।
भर्तृहरि ने लिखा है-

अनादिनिधनं ब्रह्म शब्द तत्वं यदक्षरम्
विवर्ततेर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत:।
वाक् तत्व ही शब्द रूप और अर्थ रूप दो प्रकार का विनियोग है। जो सृष्टि और प्रकार भूत सृष्टि में हैं, वे ही यहां भी दिखाई पड़ते हैं। जिस प्रकार अक्षर पुरूष हमारी सृष्टि का आत्मा है, उसी प्रकार यह शब्द भी अक्षर भी वर्णो की आत्मा है। वर्ण और अक्षर भिन्न हैं।

1. वर्ण क्षर पुरूष है, अक्षर-अक्षर पुरूष हैं। पुरूष भेद है।
2. वर्ण 64 हैं। अक्षर छोटा बड़ा दो भेद संख्यात्मक हैं।
3. वर्ण एक बिन्द्वात्मक और अक्षर नव बिन्द्वात्मक है। योनि भेद।
4. वर्ण अन्न है, अक्षर अन्नाद है। वीर्य भेद।
5. वर्ण की प्रतिष्ठा अक्षर और अक्षर स्व प्रतिष्ठित है।
6. वर्ण अक्षर के अंग है, अक्षर अंगी है।
7. ‘ओम’ में तीन वर्ण, अक्षर एक ही है। वाक् भी एक अक्षर है। अक्षर में तीन अक्षर है।
स्वर का उच्चारण काल दो बिन्दुओं का और व्यंजन का उच्चारण काल एक बिन्दु (अर्द्धमात्रा) कहा गया है। ऎन्द्री वाक् कहलाता है। बृहती नौ भाग वाले छन्द को कहते हैं। अत: ऎन्द्री वाक् की व्याप्ति नौ बिन्दुओं तक है। इन्हीं नौ बिन्दुओं में व्याप्त अक्षर स्फोट है। हर बिन्दु का अर्द्धमात्रा काल है। स्वर एक मात्रिक होने से उसके दो बिन्दु होते हैं। एक से नौ बिन्दुओं में स्वर का स्थान पांचवां और छठा बिन्दु होता है।

अत: एक स्वर के पहले चार व्यंजन और बाद में तीन व्यंजन जुड़ सकते हैं। इनको मिलाकर जो स्वर का स्वरूप या शब्द बनता है, वह भी अक्षर ही कहलाता है। अक्षर रूप में यह स्वर नौ बिन्दुओं तक व्यंजनों को आत्मसात कर लेता है। यही नवबिन्दु रूप स्फोट अव्यय है। इस प्रकार शब्द ब्रह्म का ज्ञान हमें ब्रह्म (भूत) सृष्टि का पूर्ण बोध कराता है। इसी में उठने वाले स्पन्दनों की जानकारी माया के स्वरूप को अभिव्यक्त करती है। यही इस भाषा की वैज्ञानिकता सिद्ध करती है।

गुलाब कोठारी

फ़रवरी 8, 2012

अक्षर-1

सृष्टि का बड़ा सारा रहस्य सरस्वती और लक्ष्मी के साथ जुड़ा रहता है। लक्ष्मी विष्णु पत्नी है। विष्णु की नाभि से ब्रह्मा का जन्म होता है। सरस्वती ब्रह्मा की शक्ति है। आगे सरस्वती ही लक्ष्मी को प्रकट करने में सहायक होती जाती है। दोनों ही वाक् रूप है। लक्ष्मी अर्थवाक् या पदार्थ रूप है। सरस्वती शब्द वाक् अथवा नाद रूप है। लक्ष्मी जड़ रूप दिखाई पड़ती है। सरस्वती चैतन्य स्वरूपा है। सम्पूर्ण संसार पदार्थ रूप है। जड़ या नश्वर है। शब्द, संगीत, स्पन्दन और क्रियामान, गतिमान एवं रूपान्तरण की शक्ति के धारक हैं।

जो कानों को सुनाई दे वह वैखरी। जड़ शरीर से वैखरी-चैतन्य ऊर्जा, जैसे जड़ वाद्य से चैतन्य संगीत। वैखरी कोरे शब्दों का नाम नहीं है। वैखरी वाक् का स्थूल रूप है। शरीर की तरह। शरीर कितने कार्य कर सकता है, कितनी तरह की अभिव्यक्ति कर सकता है, किस-किस ऊर्जा से प्रभावित हो सकता है ; ठीक इसी प्रकार वैखरी के स्वरूप को भी समझना चाहिए। यह भी तो माया का रूप ही है। शब्द का आधार अक्षर होता है। इस विश्व का आधार भी अक्षर है। अक्षर सदा अव्यय पर टिका रहता है। शब्द संस्था में इसकी स्फोट संज्ञा है।

शरीर की तरह ही शब्द भी क्रियात्मक है। वैखरी कमरे की दीवारों से टकराकर वापिस भी लौटती है। वैखरी में मन के भावों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। जैसे शरीर भी भावों को प्रकट किया करता है। हो सकता है मनुष्य के साथ शरीर का सम्प्रेषण पूर्णता देते, किन्तु अन्य प्राणियों, पेड़-पौधे आदि के साथ तथा दूर बैठे व्यक्ति के साथ सम्प्रेषण के लिए शब्द विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। आप किसी पौधे से नित्य प्रेमपूर्वक बात करें तो उसका विकास चमत्कारी होता जान पड़ेगा। आप अपशब्द कहेंगे तो वैसा ही प्रभाव भी देख लेंगे। यही प्रयोग आप जल पर भी करके देख सकते हैं। आप किसी की आलोचना करें अथवा सुनें, एक ही बात है। प्रभाव तो शरीर पर, रक्त पर एक जैसा ही पड़ता है। शब्दों की मार से कोई नहीं बच पाता। शब्दों का आधार प्राण रूप होने से इनकी गति बाधित नहीं हो सकती।

न दूरी ही इनको रोक सकती है। वैज्ञानिक आज पुराने शब्दों को फिर से संग्रहित करने के लिए प्रयासरत हैं, ताकि गीता को कृष्ण के मुख से ही सुना जा सके। यह वैखरी के कारण ही संभव है। वैखरी में ही सारे मंत्रों का उच्चार होता है। सारे यज्ञों का निष्पादन होता है। यही शब्द स्पन्दन रूप होकर यजमान के लिए लक्ष्मी रूप में प्रकट होते हैं। अत: इनके उच्चारण की शुद्धता उतनी ही महत्वपूर्ण मानी गई है।

वैखरी का आधार हमारी वर्णमाला है। वर्णमाला “अ” से “ह” तक होती है। वर्ण 33 होते हैं। इनको योनि कहते हैं। व्यंजन कहते हैं। स्वर बीज रूप होते हैं। शरीर के चक्रों में हर वर्ण का अपना स्थान एवं कार्य क्षेत्र, रंग, स्वरूप, वाहन आदि होते हैं। इसी तरह मंत्रों के भी छन्द, गुरू देवता आदि होते हैं। मंत्रों का अर्थ नहीं किया जाता। वैखरी रूप प्रकट होने से पूर्व शब्द जिन-जिन स्थलों से गुजरता और टकराता है, आघात करता है, उनका प्रभाव भी शब्द में रहता है। सच तो यह है कि हर शब्द एक मंत्र ही है। हर वर्ण भी मंत्र है।

शास्त्र कहते हैं कि ज्ञान को पैदा नहीं किया जा सकता। न ही प्राप्त किया जा सकता है। ज्ञान और अज्ञान तो आत्मा के विद्या-अविद्या रूप आवरण हैं। जन्म से ही साथ रहते हैं। ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय को अलग नहीं किया जा सकता। जैसे-जैसे आत्मा के आवरण हटते जाते हैं, ज्ञान प्रकट होता जाता है। केवल आवरण भेद से ही ज्ञान की भिन्नता जान पड़ती है। मन में उठने वाली इच्छाओं की अभिव्यक्ति वाक् से है। मन और वाक् साथ रहते हैं। अत: जो विषय मन के पार होते हैं, वहां शब्दों की पहुंच नहीं है। यही वैखरी की सीमा बन जाती है। मध्यमा भी छूट जाती है। पश्यन्ति का क्षेत्र शुरू हो जाता है। विषयों को देखा जा सकता है। प्रज्ञा का जागरण ही यह क्षमता प्रदान करता है। वाक् का उक्थ नाभि है। हर अक्षर नाभि से उठकर मुंह में स्वरूप लेता है। अत: वैखरी के गर्भ में भी परा; पश्यन्ति और मध्यमा होते हैं।

वैखरी वाक् सृष्टि एवं साहित्य सृजन करती है। भावनाओं से जुड़कर कर्म और कर्म-फल का कारक बनती है। रोग और निरोग अवस्था का निर्माण करती है। बन्द स्थान में वैखरी के स्पन्दन दीवारों से टकराकर पुन: शरीर तक लौटते हैं। खुले आकाश में ये स्पन्दन विस्तार पाते हैं। वैसे तो ये स्पन्दन साधारण ध्वनि जैसे दिखाई देते है, जो कि बिना माध्यम के चलती नहीं है। वास्तव में इस ध्वनि में जो प्राणों का योग है उसे गति के लिए माध्यम की कोई आवश्यकता नहीं है। न ही कोई माध्यम इसके प्रसरण में बाधक बन सकता है। वर्तुलाकार गति होने से शब्द-स्पन्दन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो जाते हैं। मध्यमा में यही स्पन्दन शरीर के भीतर व्याप्त रहते हैं।

चूंकि वैखरी के भीतर परा, पश्यन्ति, मध्यमा रहती हैं और इनके साथ-साथ भाव भूमि की शक्ति, गति और दिशा होती है, अत: स्पन्दनों का प्रभाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। जिस प्रकार माया ब्रह्म को गर्भ में लेकर शरीर रूप धारण करती है तथा शरीर अपने आप में जड़ होते हुए भी चैतन्य प्रतीत होता है; इसी तरह वैखरी के गर्भ में परा वाक् को जानना चाहिए। जिसे स्वयं के बारे में ज्ञान नहीं हैं; उसका अन्य के संदर्भ में जो ज्ञान है वह भ्रान्तिपूर्ण ही होगा। प्रत्येक व्यक्ति अपनी सत्ता के अनुपात में ही अन्य का आकलन किया करता है।

कृष्ण कहते हैं कि मैं अक्षरों में अकार हूं-”अ” से ही सम्पूर्ण वर्णमाला उत्पन्न होती है। शब्द भी इसी वाक् का रूप है। शब्द से अर्थ की प्राप्ति होती है। अत: अर्थ भी वाक् है। पाणिनी लिखते हैं कि आत्मा बुद्धि के द्वारा अर्थो को जानकर अभिव्यक्ति की इच्छा रखता है। इच्छा मन को प्रेरित करती है। मन जठरागिA पर आघात करता है। उससे प्राणवायु प्रेरित होता है। वह वायु यदि उरस्थल में टकराता है तो मन्द स्वर निकलता है। कण्ठ और शिर में क्रमश: मध्यम और तार स्वर निकलता है। जो वर्ण मुख से निकलता हैं, उनके पांच विभाग होते हैं। स्वर-काल-स्थान-प्रयत्न और अनु प्रदान के योग से।

नाभि स्थान में प्राणवायु बनता है। उर स्थान में स्वर रूप लेता है। शिर स्थान में स्वर ध्वनि रूप होता। ध्वनि मुख में वर्ण रूप बन जाती है। नाभि, उर, शिर में प्राणवायु की वर्णरूप अभिव्यक्ति नहीं होती। मुख स्थान में ही होती है। उर स्थान के मन्द्र स्वर को अनुदात्त या प्रात: सवन कहते हैं। कण्ठ स्थान के मध्यम स्वर को मध्यन्दिन सवन और शिर स्थान के तार स्वर को उदात्त या सायं सवन कहते हैं।

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