कृष्ण ने गीता में कहा कि तू सारे कर्म मुझको अर्पित कर दे। यानि-कर्ता भाव को छोड़ दे और निमित्त बन जा। तू कौन? हर एक जीवात्मा। क्यों हो जा निमित्त? क्योंकि प्रत्येक कर्म अथवा क्रिया के पीछे कारण होता है। हर कारण के साथ इच्छा पैदा होती है। जिस विषय का ज्ञान हो, उसी की इच्छा मन में पैदा होती है। व्यक्ति इच्छा को स्वयं प्रकट नहीं कर सकता। जीवात्मा के क्षेत्राधिकार से बाहर है। सूक्ष्म है, अदृश्य है कारण। आत्मा में जीवात्मा के साथ जो ईश्वर बैठा है, साक्षी भाव में, वही नियंत्रण करता है। सारी इच्छाएं वही पैदा करता है। ईश्वर भी ज्ञान की भूमिका में ह्वदय में बैठा है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र रूप ह्वद् प्राण ही हमारे अक्षर प्राण रूप ईश्वर का स्वरूप है। ब्रह्मा ह्वदय केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है। विष्णु बाहर से मन की खुराक (अन्न) लाता है। विभिन्न इन्द्रियों के विषय ही मन का अन्न है। मन की चंचलता का कारण भी यही है। इच्छा से ही चंचलता है। यह जीव की इच्छा कही जाती है। इसका कारण भी ईश्वर ही है। जब जीवन के सारे कर्म ईश्वर की इच्छा से ही होते हैं, तब मनुष्य क्यों स्वयं को कर्ता माने? प्राकृतिक स्वभाव रूप सहज कर्म ही ईश्वरीय कर्म कहलाता है। इससे हटकर किया गया कर्म नकली या नकल रूप होता है। वह बुद्धि द्वारा आरोपित कर्म हो जाता है। वहां अहंकार की भूमिका मुख्य हो जाती है। तब जीव का कर्ता भाव हावी रहता है।
एक तथ्य जो सदा दृष्टि से ओझल रहता है, वह यह कि मनुष्य भी प्रकृति का ही अंग है। उसके जीवन का संचालन भी प्रकृति ही करती है। अत: उसके सारे क्रिया-कलाप भी प्रकृति को ध्यान में रखकर ही करने पड़ते हैं। क्योंकि प्रकृति के विरूद्ध आचरण ही दु:खों का हेतु बनता है। लोक व्यवहार में इसी को पाप कहते हैं। जबकि प्रकृति में न कुछ पाप-पुण्य है, न ही कोई अच्छा-बुरा होता है। वहां कर्म को कर्म ही कहा है। प्रकृति के स्वरूप को ध्यान में रखकर ही इन अवधारणाओं के लौकिक व्यवहार के नियम बनाए गए हैं। प्रकृति एक संतुलन भी बनाकर रखती है। एक शेर को बनाए रखने के लिए पूरे जंगल-जानवरों की संरचना का पिरामिड बनाया गया है। मनुष्य के लिए भी ऎसा ही है।
प्रकृति में 84 लाख योनियों का विस्तार माना गया है। हर योनि की अपनी उपयोगिता भी है। सभी योनियों का रहना पारिस्थितिकी संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण भी है। हमारे ऋषियों ने ध्यान में जाना कि किस तरह के कर्म से किस प्रकार की योनि प्राप्त होगी। यह भी जाना कि भावनाओं के आधार पर ही कर्म फलदायी होते हैं। अत: पाप-पुण्य की अवधारणा में इनका विस्तृत विवेचन है।
एक नर्तकी के मकान के सामने एक धार्मिक व्यक्ति का मकान था। कुछ सालों के बाद दोनों यमराज के समक्ष उपस्थित हुए। वहां नर्तकी को स्वर्ग तथा धार्मिक व्यक्ति को नरक में भेजने का आदेश हुआ। धार्मिक व्यक्ति को यह निर्णय समझ में नहीं आया। उसने यमराज से प्रश्A कर ही लिया। यमराज ने कहा कि तुम धार्मिक क्रियाएं तो करते थे, किन्तु तुम्हारा ध्यान सदा नर्तकी पर टिका रहता था। मन पूर्ण रूप से वासना ग्रस्त था। नर्तकी के सामने नृत्य करना मजबूरी थी। किन्तु उसका मन तुम्हारी तरह धर्म नहीं कर पाने के लिए दुखी था। मन में धर्म का भाव नित्य रहता था। यही भाव उसके स्वर्ग का आधार रहा।
प्रकृति में कर्म तो शुद्ध कर्म ही है। उसी अनुरूप फल है। चूंकि मानव जीवन का मूल लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति कहा है, अत: उस दिशा में सहायक होने वाले कर्म की पुण्य संज्ञा की गई। पाप-पुण्य की इस अवधारणा से व्यक्ति के मन में लक्ष्य के प्रति जागरूकता एवं प्रेरणा बनी रहती है। समाज में भी मर्यादित आचरण बना रहता है। सकारात्मक सोच के कारण ही विद्या एवं ज्ञान के प्रति आकर्षण बना रहता है। आज शिक्षा के धर्मविहीन हो जाने से मानव समाज भी अमर्यादित होने लग गए।
सब कहते हैं कि मनुष्य को अच्छा होना चाहिए। अच्छा रहकर ही अच्छे से आगे जा सकते हैं। इसके लिए आगे निष्काम कर्म का अभ्यास करना पड़ता है। पाप कर्म में रमने वाला निष्काम कर्म तक सहजता से नहीं पहुंच सकता। उसका राग-द्वेष, अहंकार आदि अवरोध बन जाते हैं। तब व्यक्ति नया कुछ ग्रहण नहीं कर सकता। जैसे कि उल्टे पात्र में कुछ नहीं भर सकता। पुण्यकर्म इस पात्र को सीधा करने का प्रयास है।
आत्मा के दो धातु हैं- ज्ञान एवं क्रिया । ज्ञान ब्रह्म/आत्मा का अंश है और क्रिया शरीर/माया का। सृष्टि क्रम में सर्वप्रथम अव्यय पुरूष का निर्माण होता है। इसकी पांच कलाएं होती हैं-आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण और वाक्। इनमें मन में केन्द्र है। इसकी गति दोनों ओर होती है। जब मन सृष्टि की ओर बढ़ता है, तब वह प्राण एवं वाक् के साथ होता है। प्राणों के माध्यम से वाक् सृष्टि का निर्माण करता है। प्राणों से प्राण या अक्षर सृष्टि का भी निर्माण होता है। अक्षर पुरूष के ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र ही आगे की सृष्टि के ह्वदय बनते हैं। इनकी अग्नि-सोम पर होने वाली क्रिया से ही अगिA-सोमात्मक विश्व बनता है। अक्षर पुरूष से ही मृत्यु लोक अथवा क्षर संसार का निर्माण होता है। चूंकि ब्रह्म स्वयं में नियन्ता और साक्षी भाव में प्रतिष्ठित रहता है, अत: सारी रचना तो माया ही करती है। ब्रह्म के सारे स्वरूप माया ही बनाती है। सभी स्वरूप अगिA मूर्ति रूप होते हैं।
अक्षर सृष्टि का विस्तार अमृत एवं मत्र्य रूप में होता है। सूर्य ही अक्षर ब्रह्म या इन्द्र है। हमारी सृष्टि का पिता है। अत: सूर्य से पृथ्वी की ओर सारी मत्र्य सृष्टि है। ऊपर परमेष्ठी एवं स्वयं-भू पर्यन्त अमृत सृष्टि हैं। अव्यय पुरूष का मन जब आनन्द – विज्ञान की ओर मुड़ता है, तब वह अमृत भाग की ओर गमन करता है। इस बात से मन की दो गतियां स्पष्ट हो जाती है। एक ऊघ्र्व गति, अमृतमय तथा दूसरी अधोगति-मत्र्य विश्व की ओर । ऊध्र्व गति में आत्मा परात्पर अथवा अपने मूल की ओर आगति रूप होता है। विश्व भाव में माया का क्रिया भाव प्रधान होता है। ऊध्र्व गति का आधार ज्ञान है। ज्ञान को ही विद्या-धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऎश्वर्य, कहते हैं। अविद्या इसका विपरीत भाव-अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य अथवा अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश रूप है। ज्ञान भाव से आत्मा ब्रह्म के पास पहुंचती है तथा क्रिया भाव माया तथा सृष्टि का पर्याय है। अत: ज्ञान आधारित कर्म ही पुण्य कहलाता है तथा क्रिया आदि कर्म, जो आत्मा को आवरित करते हैं, आत्मा का भान भुला देते हैं तथा जिनके फल अधोगामी बनाते हैं, वे पाप कहलाते हैं।
जब तक ज्ञान ढका रहता है, उसका साध्य भी आवरित रहता है। व्यक्ति साध्य को लक्ष्य बनाकर ही अनुष्ठान करता है। कोई अनुष्ठान ज्ञान के बिना नहीं होता। किन्तु ज्ञान में गति नहीं है। वह प्राणों को गतिमान करता है। यह गति ही क्रिया लक्षणा है। प्राण-गति-यजु-ऋषि-अगिA आदि शब्द गति या माया के ही पर्यायवाची हंै। माया ही विद्या एवं अविद्या रूप गतिशीलता है। यही पुण्य एवं पाप कर्मो का उपादान कारण है। विश्व का मूल कारण भी अगिA या गतितžव है। एक एवागिAर्बहुधा समिध्द:। व्यक्ति ईश्वरीय नियमों की अवहेलना करके जब मनमर्जी अथवा बुद्धिमता के आधार पर काल्पनिक विधि -विधान बनाने में प्रवृत हो जाता है, तब उस दशा में अवश्य ही उसका स्खलन हो जाता है।
पातंजल योग सिद्धान्त कहता है कि जहां ईश्वर अविद्या रूप क्लेश भावों से, कर्म-विपाक आशयों से, ईष्र्या -मद-दंभ -मात्सर्यादि पाप्मा लक्षणा आसुरी भावों से लि# है, वहीं मानव अपने स्वतंत्र पुरूषार्थ का दुरूपयोग करता है। मानो वह ईश्वर से भी आगे निकल जाना चाहता है। ईश्वर के सारे गुण तो मानव में हैं ही । अत: शाश्वत नियमों का अतिक्रमण करने लगता है। इसी का नाम पाप कर्म है। इनका आधार भी है बुद्धिमानी और मनमानी । सूर्य से प्राप्त बुद्धि अगिAधर्मा है। चन्द्रमा से उत्पन्न मन सौम्य है। विश्वास और श्रद्धा का यही आधार है। विश्वास विकासात्मक तžव बनता है और श्रद्धा संकोचात्मकस्नेह तžव का रूप लेता है। संवत्सर सृष्टि में इसी से पुरूष का अगिAभाव तथा स्त्री का सोम रूप होता है। जब तक यह विश्वास-श्रद्धा तžव अक्षुण्ण रहता है, तब तक स्त्री-पुरूष का स्वरूप भी संरक्षित रहता है।
नकल में मन प्रधान बनता है। प्रवाह के अनुसार कर्म करने लग जाता है। बुद्धि अपने हित के अनुपात में कर्म तय करती है। महर्षि पतंजलि ने लिखा है- चित्तनदी नाम उभयतो वाहिनी। चित्त रूपी नदी दोनों ओर बहती है। ऊपर भी, नीचे भी। शुभ में भी, अशुभ में भी। मन का वातावरण ही इस दिशा को तय करता है। श्रीमद् भागवत में भी कहा है-
यत्र तत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया,
स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् भयाद् वापि याति तत्तत् स्वरूप ताम्।
व्यक्ति स्नेह, द्वेष एवं भय से प्रेरित होकर अपने मन को, भावना को, बुद्धि द्वारा जहां-तहां ले जाता है। मन वैसा ही आकार धारण कर लेता है। स्नेह से प्रेरित मन स्नेही, भय से भय युक्त और द्वेष से द्वेषी हो जाता है। संसार में जितने कारण बंधन के लिए हैं, उतने ही कारण मुक्ति के भी हैं। भावों के कारण ही राग, द्वेष, अमृत, विष आदि द्वैत कोई एक स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। मन को विचारों के जिस रस से भावित किया जाए, वैसी ही भावना बन जाती है। बुद्धि तात्विक परिस्थिति के अनुरूप निश्चित निर्णय पर पहुंचती है। मन प्रत्यक्ष से प्रभावित होकर तत्काल निर्णय कर बैठता है। मन सम्मत कृत्रिम इच्छा जीव की इच्छा है।
इसी मन से मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण करता है। मनमानी करता है। यहां बुद्धि सम्मत सहज इच्छा को ईश्वरीय कहा गया है। यह मानव को अतिक्रमण नहीं करने देती । इसी को बुद्धिमानी कहते हैं। अविद्या के चार दोष जहां मन को मनमानी करने के प्रवृत्त कर अतिक्रमण के कारण बनते हैं, वहीं विद्या रूपी चार गुण बुद्धि को बल प्रदान करते हुए मनोनियंत्रण के कारण बनते हैं। शब्द ब्रह्म रूपी शास्त्र ज्ञान ही ज्ञान है। इसे न जानना ही अविद्या है। आत्म विकास को ही ऎश्वर्य कहते हैं। संकोच ही अस्मिता है । विकास ही स्मित भाव है। आत्मा में सम्पूर्ण ऎश्वर्य व्याप्त है । किन्तु अस्मिता दोष के कारण व्यक्ति स्वयं को दीन-हीन-द्ररिद्र मानता रहता है । राग-द्वेष सहित ग्रन्थि बन्ध आसक्ति है। स्वरूप स्थिति को धर्म कहा है। इसको विस्मृत कराने वाली हठधर्मिता ही अभिनिवेश है । विद्या से बुद्धि सबल होकर मन का नियंत्रण रखती है। इसके बिना मन अधर्म के प्रवाह में बह जाता है।
इसी प्रकार जीवन का पुरूषार्थ भी धर्म पर ही टिका हुआ है। धर्म को पहले चुनना पड़ता है । तब संकल्प से उसको धारण करना पड़ता है । इसी से धर्म आगे चल कर व्यक्ति के जीवन को धारण करता है। कामनाओं से मुक्त करके मोक्ष गामी बनाता है। इस उपलब्घि के लिए हर जीव को अनिवार्य रूप से स्त्रैण होना ही पड़ता है। दया-करूणा, ममता, वात्सल्य, श्रद्धा, स्नेह, प्रेम आदि सभी गुण स्त्रैण ही हैं। स्त्री में तो होते ही हैं। पुरूष्ा को भी इनका अभ्यास करना पड़ता है। इसके अभाव में व्यक्ति के अहंकार तथा ममकार ज्ञान को उदय होने से रोक देते हैं। अहंकार पापमाओं का शीर्ष है। श्रद्धा पुण्य के गुणों का नेतृत्व करती है। भावनाओं के स्पन्दन अहंकार और श्रद्धा के कारण मन की दिशा को तय करते हैं। अहंकार सृष्टि-प्रधान इच्छा मन में पैदा करता है। प्राणों के माध्यम से वाक् का निर्माण करता रहता है। नित नए बन्धन पैदा करके व्यक्ति को 84 लाख योनियों में आवागमन के लिए बाध्य करता रहता है। श्रद्धा के कारण मन अध्यात्म की ओर मुड़ता है। भीतर गति करता हुआ प्रज्ञा क्षेत्र में प्रवेश करता है।
चेतना को स्वप्न-सुषुप्ति से निकालकर जाग्रत बनाए रखती है। इसी के सहारे आनन्द में प्रतिष्ठित होता है व्यक्ति । सही अर्थो में तो इस आनन्द का प्रकट होना ही ईश्वरीय प्रसाद कहलाता है।
पाप-पुण्य का लौकिक स्वरूप समझाता है कि जिसमें अनुकूलता की सिद्धि दिखाई पड़े वह पुण्यकर्म है। जिसमें प्रतिकूलता की प्रतीति हो वह पाप कर्म है। एक ही कर्म किसी के सापेक्ष होने से पुण्य होता है तो अन्य सापेक्ष होने से पाप होता है। अत: उसे इस
प्रकार समझकर इस पुण्य-पाप का सूक्ष्मबुद्धि से निpय करना चाहिए।
स्वर्गीय पं. मधुसूदन ओझा जी ने लिखा है कि जिस कार्य को करने से दिव्य लोकों की प्राप्ति होती है, वह पुण्य कहलाता है तथा जिस कर्म को करने से कष्टदायक नरक आदि लोकों की प्राप्ति होती है वह पाप कहलाता है। पुण्यकर्म करने से अतिशय एवं अपूर्व पुण्य की उत्पत्ति होती है। उन अपूर्व एवं अतिशय पुण्य से समय-समय पर क्रमश: पुण्य लोकों की प्राप्ति होती रहती है। पाप संबंधी कर्म को करने से अतिशय एवं अपूर्व कालुष्य की उत्पत्ति होती है जिससे समयानुसार नरक संबंधी लोक की प्राप्ति होती है।
जीवन में हर अवधारणा के पीछे एक लक्ष्य होता है। उसी से जीवन का स्वरूप होता है। समाज के धर्म और कर्म का परिवेश होता है। पाप-पुण्य की अवधारणा के मूल में भी जीवन का एक अतिमहत्वपूर्ण पहलू जुड़ा हुआ है। जीवन का आधार शरीर है, कर्म प्रधान है। शरीर आत्मा नहीं है। आत्मा को निश्चित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए, कर्मो के फल भोगने के लिए यह मानव देह प्राप्त हुई। आत्मा इसी चक्र से गुजरता हुआ नए कर्म भी तो अर्जित करता जाता है। ये कर्म और पिछले जन्मों के कुछ कर्म मिलकर अगले जन्म की भूमिका बनाते है। जीवन चक्र चलता ही रहता है। जीवन में ज्ञान आत्मा का पर्याय है। कर्म क्रिया अथवा चरित्र का। मनुष्य अपने ज्ञान की शक्ति से जीवन-मृत्यु अथवा पुन: जन्म के चक्र से बाहर निकल सकता है। कृष्ण भी कह गए कि मनुष्य ज्ञान के द्वारा अपने कर्मो को जला सकता है। इसके लिए हमको पुरूषार्थ का मार्ग मिला। जीवन का आधार हमारा मन है और मन की गति दोनों ओर होती है। (ऊध्र्वगति एवं अधोगति)। यह गति मन-प्राण-वाक् रूप सृष्टि क्रम को आगे बढ़ाने वाली भी हो सकती है अथवा निवृत्ति क्रम में जोड़ने वाली आनन्द-विज्ञान मन स्वरूप भी। किन्तु मन की चंचलता पर नियंत्रण भी कोई सहज कार्य नहीं है। इसके रहते मन आत्मा की ओर मुड़ ही नहीं सकता।
दूसरा पहलू यह भी है कि मन कामना अथवा इच्छा का केन्द्र भी है। यह इच्छा मन में पैदा नहीं की जा सकती। हर आत्मा का एक भाग जीव होता है और एक भाग ईश्वर का (साक्षी) होता है। यह ईश्वर मन में इच्छा पैदा करता है। जब तक यह रहस्य समझ में नहीं आ जाता, पाप और पुण्य की भूमिका को नहीं समझा जा सकता। हां, लौकिक जीवन के अथवा सामाजिक जीवन के पाप-पुण्यों पर चर्चा हो सकती है। जैसे कि स्व. मधुसूदन ओझा जी ने भी वेद धर्म व्याख्यानम् में की है। लौकिक व्यवहार आचरण/चरित्र संज्ञा में आता है। गत्यात्मक होने से चरित्र का आधार भी प्राणमय एवं माया शक्ति की अभिव्यक्ति ही है। चूंकि ब्रह्म और माया अभिन्न हैं, चरित्र भी आत्मा की अभिव्यक्ति ही है। किन्तु यह अभिव्यक्ति स्वतंत्र नहीं है। सारी क्रियाएं इच्छाओं द्वारा एवं ज्ञान द्वारा ही संचालित होती हैं। हर क्रिया का आधार या कारण उससे सूक्ष्म होता है। अदृश्य होता है। अत: दृश्य जगत की गतिविधियों में व्यस्त मन को दिखाई नहीं पड़ता। मन की चंचलता से सारा आदान-प्रदान अन्नमय कोश एवं मनोमय कोश के मध्य ही चलता रहता है। प्राणमय कोश के सहारे।
हमारा प्राणमय कोश श्वास-प्रश्वास से जुड़ा है। आकाश की तन्मात्रा नाद भी ध्वनि रूप में इस क्रिया का अंग होती है। जब श्वास भीतर आती है, तब “अ” की तथा बाहर निकलते समय “ह” की ध्वनि होती है। बोध रूपी अनुस्वार मिलकर ही “अहम्” पैदा करते हैं। “अ” और “ह” की ही आकर्षण और विकर्षण संज्ञा है। दोनों ही का संतुलन आवश्यक है। जब भी व्यक्ति अपने स्वरूप से ऊध्र्वमुखी होना चाहता है, तब वह “ह” का ह्रास करता है। इसी अनुरूप विकर्षण क्रिया एवं बहिर्मुखता का लोप होता जाएगा। आकर्षण का अकार अव्यक्त सृष्टि को प्रकट करता चला जाएगा। हमारी पाप-पुण्य की अवधारणा यहां समझ में आने लगती है। जिस भी क्रिया से इस विकर्षण क्रिया का अभाव बढ़ता जाए उसे प्रकृत साधन पथ अथवा लोक भाषा में पुण्य मार्ग कहते हैं। इसी प्रकार पाप-पुण्य को समझने के लिए आत्मा तथा जीव का, ईश्वर तथा परात्पर का स्वरूप समझना भी अनिवार्य है। इसी से सृष्टि और प्रतिसृष्टि का स्वरूप स्पष्ट होता है। पुरूष और प्रकृति की भूमिका दिखाई देती है। हर कर्म या क्रिया की तरह पाप-पुण्य का आधार भी प्रकृति है। जहां प्रकृति है, वहां आकृति भी है और अहंकृति भी। तीनों साथ होते हैं, जैसे कि मन-प्राण-वाक् या सत-रज-तम।
जहां क्रिया है, वहां शब्द भी है। जहां क्रिया मृदु है, वहां शब्द भी मृदु हो जाता है। क्रिया के साथ शब्द भी तीव्र हो जाता है। अत: क्रिया, भाव तथा शब्द अभेद सिद्ध हो जाते हैं। ये तीनों स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों में कार्य करते हैं। इन्हीं को क्रमश: प्रकृति, अहंकृति तथा आकृति कह सकते हैं। इनमें से किसी एक का परिवर्तन करके सम्पूर्ण अस्तित्व को बदला जा सकता है। इसमें स्पन्दनात्मक क्रिया का परिवर्तन कर सकना दुष्कर है। भक्ति योग द्वारा भाव-क्रिया का परिवर्तन किया जा सकता है। ध्वनि द्वारा परिवर्तन राजयोग/ मंत्र योग है। इसमें ध्वनि के साथ-साथ भावना भी जुड़ी रहती है। केवल भाव से भी परिवर्तन साध्य नहीं हो पाता। भावों का उद्रेक मनुष्य की इच्छा के अधीन नहीं है। इसको भी कोई अन्य कारण चाहिए। अत: ध्वनि ही सबसे सरल मार्ग है। ध्वनि का उच्चारण व्यक्ति अपनी इच्छा से कर सकता है। ध्वनि के उच्चारण से ध्वनिगत स्पन्दन उच्चारणकर्ता के भाव का तथा भावान्तरगत क्रिया का परिवर्तन कर देता है।
आकर्षण-विकर्षण (श्वास-प्रश्वास) ध्वनि का उच्चारण देह नहीं करता। उससे तो मात्र ध्वनि की प्रतिध्वनि अथवा ध्वनि का बहिर्गमन होता है। स्पन्दन क्रिया तो देह में भी ऊध्र्वमुखी होती है। तदनन्तर उसमें निमAगामी गति भी प्रत्यक्ष की जा सकती है। इसका कर्ता अहम् रूपी ह्वदय मे बैठा “ईश्वर” है। इसी क्रिया द्वारा ह्वदयस्थ ईश्वर का भी अस्तित्व प्रमाणित होता है। यह क्रिया ही शरीर का स्पन्दन रूप अस्तित्व है। यह कर्ता से सम्बद्ध है। इस क्रिया में तनिक भी परिवर्तन से भावादि बदल जाते हैं। गीता कहती है-”ईश्वर यंत्री के रूप में अवस्थित होकर देह रूप यंत्र तथा देहाभिमानी जीव को संचालित करता है।” जीव का संचालन स्पन्दन रूपी क्रिया के द्वारा ही करता है। यह स्पन्दन ही सृष्टि की मूल ध्वनि या आकाश की नाद रूप तन्मात्रा है। इसी स्पन्दन क्रिया के माध्यम से ईश्वर तथा जीव का सम्बंध योग बना रहता है। स्पन्दन क्रिया जीव का वर्तमान है। उसमें यथोच्छित परिवर्तन करती रहती है। जीवात्मा का इस क्रिया पर कोई आधिपत्य नहीं है। क्रिया ही सब कुछ का संचालन कर रही है। इसका ज्ञान होते ही द्रष्टत्व का विकास होने लगता है। तब कर्ता भाव रूप बन्धन भी छूट जाता है।
गुलाब कोठारी
