शब्द की उत्पत्ति संयोग, विभाग और शब्द से होती है। संयोग से मुख का एक स्थायी भाग है, दूसरा संचारी भाव है। स्थायी भाग को स्थान, संचारी को करण कहते हैं। स्थान के आठ भेद हैं। तीन बाहरी-उर, कण्ठ और शिर। पांच भीतरी- जिह्वा-मूल, दन्त, नासिका, ओष्ठ तथा तालु। जिह्वा-मूल, मध्य भाग, उपाग्रभाग, अग्रभाग और अधरोष्ठ। इन्हें करण कहते हैं। यही संचारी होता है और तालुमूल, मूर्घा, दन्तमूल आदि पंाचों स्थानों पर आघात करके पच्चीस वर्णो को उत्पन्न करते हैं।
वायु जिस प्रक्रम से उठकर कण्ठ में अकार बनती है, तालु स्थान में पहुंचकर इकार बन जाती है। मूर्घ स्थान में ऋकार, दन्त मूल में लृकार और ओष्ठ में उकार बन जाती है। एक ही प्राणवायु, एक ही अकार, भिन्न-भिन्न स्थानों में पहुंचकर अ,इ,ऋ,लृ,उ पांच स्वरूपों में बदल जाती है। एक ही अकार अक्षर के पांच भेद हुए। अकार रूप वाक् स्पर्श और उष्मा से नाना प्रकार की हो जाती है। स्थान और करण का संकोच-प्रसारण होने से भिन्न-भिन्न वर्णो की उत्पत्ति होती है। स्वरों के अवयव संकोच से घनीभाव होने पर स्वर व्यंजन बन जाते हैं।
अकार के उच्चारण में जितना काल लगता है उस काल को मात्रा कहते हैं। अकार जब अकार से मिलता है, तब उसे दीर्घ या द्विमात्रिक कहते हैं। त्रिमात्र या चातुर्मात्र अक्षर को प्लुत कहते हैं। एक मात्रिक-ह्रस्व, द्विमात्रिक की दीर्घ संज्ञा है। उदात्त-अनुदात्त-स्वरित तीन भेद से अकार के ही ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत भेद से 9 भेद हो जाते हैं। पांच स्थान भेद, मात्रा भेद, प्रक्रम भेद आदि से एक ही अक्षर के 42 निरनुनासिक और 42 सानुनासिक यानी 84 भेद हो जाते हैं।
मुख के भीतर जो प्रयत्न होते हैं, उनमें जहां स्थान और करण का स्पर्श होता है, उसे ‘स्पृष्ट’ प्रयत्न कहते हैं। स्पर्श विरोधी प्रयत्न ‘विवृत्त’ कहलाता है। अ, इ, ऋ, लृ, उ ये पूर्ण विवृत्त स्वर हैं। अर्द्ध मात्रिक, अभिनिधान, सान्ध्यक्षर आदि में विवृत्ति होती है। इन वर्णो में एक-एक वर्ण की जितनी मात्रा होती है उसके अर्द्धाश का ह्रास होने पर विवृत्तार्द्ध प्रयत्न द्वारा इनमें संकोच हो जाता है।
तब वे एक मात्रिक स्वर से च्युत होकर अर्द्ध मात्रिक व्यंजन हो जाते हैं। इकार तथा अकार की सन्घि होने पर जैसे इकार, लेकिन अर्द्ध मात्रा से च्युत हो जाता है। उसी प्रकार अकार और इकार की संघि होने पर पूर्व अकार, लेकिन अर्द्धमात्रा से हित होकर अर्द्धमात्र अकार शेष रह जाता है। पाणिनी लिखते हैं-एकार, ओकार में कण्ठ स्थानीय अकारी की अर्द्धमात्रा ही शेष रहती है। अर्द्धमात्र अकार व्यंजन होता है। पूर्ण स्पृष्ट न होने से स्वर भी है। अत: अन्त:स्थ कहलाता है।
बाह्य प्रयत्न (उर, कण्ठ, शिरो के दो भेद हैं सवार-नाद-घोष तथा विवार-श्वास अघोष) जिस उच्चारण में मृदुता के कारण बाह्य नली को फैलने नहीं दिया जाता, वह संवार हैं। इसका विपरीत भाव विवार है। जिस उच्चारण में वायु अघिक और प्राण रूप अगिA की मात्रा कम हो, उसे श्वास कहते हैं। इसका विपरीत भाव नाद है। जहां उच्चारण में दृढ़ता के कारण प्रतिध्वनि क्षमता कम हो, वह अघोष तथा इसका विपरीत भाव घोष कहलाता है। संवार-नाद-घोष तीनों साथ रहते हैं, अविनाभाव है। इनके बाह्य प्रयत्न से अ, य, र, ल, व, ड़, ज, व, ग, ज, द, ब, ड्, †ा, ण, न, म, वर्ण सिद्ध होते हैं। ये ही वर्ण जब विवार-श्वास-अघोष से युक्त होते हैं, तब क, च, ट, त, प हो जाते हैं। ये नासिक्य नहीं होते। ये पूर्ण स्पृष्ट वर्ण यदि भीतर अर्द्ध स्पृष्ट उच्चरित होते हैं, तब श,ष,स,ह, उष्म वर्ण बन जाते हैं। क और प दोनों ‘ह’ बन जाते हैं।
अत: दो प्रकार के बाह्य प्रयत्नों से 34 वर्ण उत्पन्न होते हैं। इनमें शुरू के पांच स्वर (अ,इ,ऋ,लृ,उ) तथा 29 व्यंजन सम्मिलित हैं। इनमें ‘अ’ और ‘हं’ कण्ठ स्थानीय, इ, च वर्ग य, श तालव्य, उ, प वर्ग ओष्ठय है। ऋ,र,ष,ट वर्ग मूर्घन्य है। लृ,ल,स,त वर्ग दन्तय है। क-वर्ग जिव्हा मूल स्थानी। ड़,ण,न,म,र और ल लोकभाषा में उष्म वर्ण हैं। वर्गो के द्वितीय और चतुर्थ वर्ण सोष्म (उष्मा युक्त) हैं। हकार यद्यपि अर्द्ध-स्पृष्ट है तथापि जिन ककारादि से इसका संयोग होता है, वे पूर्ण स्पृष्ट हैं। अत: इनको भी पूर्ण स्पृष्ट ही माना गया है। पाणिनी ने स्वरों को अस्पृष्ट, य,र,ल,व को ईष स्पृष्ट, श, ष,स, ह को अर्द्धü स्पृष्ट तथा शेष वर्णो को पूर्ण स्पृष्ट माना है।
ब्रह्म के तीन भेद हैं-अव्यय, अक्षर, क्षर। इन्हीं से मन-प्राण-वाक् कहते हैं। यह वाक् ही भूत भाव, शब्द भाव और अर्थभाव में फैलता है। वाक् रूप आकाश से ही वायु आदि भूत समूह पैदा होता है। आकाश सब में व्याप्त रहता है। यह आकाश ही आघात से कम्पित होता है। वायु के आधार पर गोल तरंगें उत्पन्न करता है। यही नाद रूप में कान तक पहुंचता है। शब्द कहलाता है। इसी से शब्द रूप और अर्थ रूप सृष्टि आगे बढ़ती है।
भर्तृहरि ने लिखा है-
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्द तत्वं यदक्षरम्
विवर्ततेर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत:।
वाक् तत्व ही शब्द रूप और अर्थ रूप दो प्रकार का विनियोग है। जो सृष्टि और प्रकार भूत सृष्टि में हैं, वे ही यहां भी दिखाई पड़ते हैं। जिस प्रकार अक्षर पुरूष हमारी सृष्टि का आत्मा है, उसी प्रकार यह शब्द भी अक्षर भी वर्णो की आत्मा है। वर्ण और अक्षर भिन्न हैं।
1. वर्ण क्षर पुरूष है, अक्षर-अक्षर पुरूष हैं। पुरूष भेद है।
2. वर्ण 64 हैं। अक्षर छोटा बड़ा दो भेद संख्यात्मक हैं।
3. वर्ण एक बिन्द्वात्मक और अक्षर नव बिन्द्वात्मक है। योनि भेद।
4. वर्ण अन्न है, अक्षर अन्नाद है। वीर्य भेद।
5. वर्ण की प्रतिष्ठा अक्षर और अक्षर स्व प्रतिष्ठित है।
6. वर्ण अक्षर के अंग है, अक्षर अंगी है।
7. ‘ओम’ में तीन वर्ण, अक्षर एक ही है। वाक् भी एक अक्षर है। अक्षर में तीन अक्षर है।
स्वर का उच्चारण काल दो बिन्दुओं का और व्यंजन का उच्चारण काल एक बिन्दु (अर्द्धमात्रा) कहा गया है। ऎन्द्री वाक् कहलाता है। बृहती नौ भाग वाले छन्द को कहते हैं। अत: ऎन्द्री वाक् की व्याप्ति नौ बिन्दुओं तक है। इन्हीं नौ बिन्दुओं में व्याप्त अक्षर स्फोट है। हर बिन्दु का अर्द्धमात्रा काल है। स्वर एक मात्रिक होने से उसके दो बिन्दु होते हैं। एक से नौ बिन्दुओं में स्वर का स्थान पांचवां और छठा बिन्दु होता है।
अत: एक स्वर के पहले चार व्यंजन और बाद में तीन व्यंजन जुड़ सकते हैं। इनको मिलाकर जो स्वर का स्वरूप या शब्द बनता है, वह भी अक्षर ही कहलाता है। अक्षर रूप में यह स्वर नौ बिन्दुओं तक व्यंजनों को आत्मसात कर लेता है। यही नवबिन्दु रूप स्फोट अव्यय है। इस प्रकार शब्द ब्रह्म का ज्ञान हमें ब्रह्म (भूत) सृष्टि का पूर्ण बोध कराता है। इसी में उठने वाले स्पन्दनों की जानकारी माया के स्वरूप को अभिव्यक्त करती है। यही इस भाषा की वैज्ञानिकता सिद्ध करती है।
गुलाब कोठारी
