सृष्टि दो प्रकार की होती है। एक अर्थरूप भूत सृष्टि और दूसरी शब्द रूप वाक् सृष्टि। दोनों का ही आधार ‘अक्षर’ है। इसको परब्रह्म कहते हैं। इसका आलम्बन अव्यय पुरूष होता है। अव्यय और अक्षर नित्य संस्थाएं हैं। अव्यय की पांच कलाओं- आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् में ये वाक् ही अक्षर कहलाता है। अक्षर की पांच कलाओं-ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अगिA और सोम में से अगिA और सोम के कारण क्षर का निर्माण होता है। अक्षर का ऊध्र्व भाग अमृत और अधोभाग मृत्यु कहलाता है। क्षर से ही मृत्यु सृष्टि (विश्व) का निर्माण होता है। अक्षर इस के पीछे कारण है। अक्षर ही शब्द सृष्टि का भी कारण है। वर्ण मातृका नित्य है, उत्पन्न नहीं होती। स्थान, प्रयत्न और संयोग से इसकी अभिव्यक्ति होती है।
वाक् से ही मण्डल बनते हैं। स्वरूप बनता है। ऋत् से सत्य बनता है। स्वयंभू मण्डल की वाक् को वाचस्पत्य या वैकुरा, परमेष्ठि की वाक् को ब्राह्मणस्पत्य या सुब्रह्मण्या, सूर्य मण्डल की वाक् को ऎन्द्र अथवा गौरीविता तथा चन्द्रमा युक्त पृथ्वी की वाक् को भौम या आंभृणि कहते है। वैदिक सिद्धान्त के अनुसार शुरू की तीन प्रकार की वाक् कहीं भी प्रकट नहीं होती। केवल चतुर्थ और अन्तिम वाक् ही कार्यरत जान पड़ती है।
कहा भी है-
‘चत्वारिवाक् परिमिता पदानि तानिविदुब्राüह्मणा ये मनीषीण:। गुह्या त्रीणिनिहतानेंगयन्ति तुरियं वाचो मनुष्या वदन्ति।।’ अन्न से वाक् उत्पन्न होती है। अगिA में आहुत होने वाला सोम अन्न कहलाता है। द्यु लोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वी का वाक् और चौथा पशुओं का वाक्।
स्व. पं. मधुसूदन ओझा ने अपने ग्रन्थ पथ्यास्वस्ति और वर्ण समीक्षा में अक्षर और वर्णमाला की वैज्ञानिकता पूर्ण स्पष्ट की है। उनका ही एक अंश या मुख्य बिन्दु यहां लिख रहा हूं। हो सकता है कुछ विद्वान इस पर आगे कार्य कर सकें। ईश्वर और जीव के सृष्टि स्वरूप को समझने के लिए इस शब्द ब्रह्म से आसान माध्यम नहीं है।
वाक् के बारे में अन्य मत इसके चार रूप – अमृता, दिव्या, वायव्या और ऎन्द्री – मानते हैं। मन-प्राण गर्भित सत्यावाक् अमृता है। ऋक्, यजु, साम तीनों को अमृता कहा है। आकाश अमृता है। अगिA इसका ब्रह्म है। दिव्या वाक् ऋत् कहलाती है। अथर्व है। देवता और भूत दिव्य वाक् हैं। इसी को सरस्वान वाक् भी कहा है। दिक् सोम इसका ब्रह्म है। यह सौया वाक् है। अमृता और दिव्या में ध्वनि नहीं होती।
ध्वनि भी दो तरह की होती है। शक्ति रहित ध्वनि सार्थक नहीं होती। गतिहीन होकर वायु के साथ बहती है। इसमें नाद, श्वास आदि विशेषताएं वायु से बनती हैं। यह सरस्वती वाक् है। अव्याकृत है। वर्ण, पद, वाक्य में विभक्त ध्वनि को सार्थक कहा है। सरस्वती वाक् में इन्द्र प्रविष्ट होकर भिन्न-भिन्न आकारों में व्याकृत करता है। जिसे हम बोलते हैं, इसको ही ऎन्द्री वाक् कहा गया है। प्राज्ञ प्राण ही इन्द्र है। प्रज्ञान से ही वाणी में वर्ण विभाग होते हैं। वर्णो में ‘अ’ तथा ‘उ’ मन और प्राण के बोधक है। प्रज्ञा और प्राण सदा मन के साथ रहते हैं।
अनाहत, महाभूत, पशु-पक्षी, शिशु रूदन आदि इन्द्र द्वारा व्याकृत न होने से अनिरूक्त हैं, वायव्य हैं। व्याकृत ऎन्द्री वाक् शरीर में परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी है। सारा ज्ञान इसमें है। बुद्धिस्थवाक् परावाक् है। उपांशुवाक् पश्यन्ति है। नाद ध्वनि के बिना किया गया उच्चारण मध्यमा है। नाद-ध्वनि के साथ किया गया स्पष्ट उच्चारण वैखरी है। निरूक्त है। ये इन्द्र और वायु के योग की ऎन्द्रवायव वाक् है। वैखरी के चार भाग-वर्ण, अक्षर, पद, वाक्य। वर्ण के चार भाग-स्पृष्ट, अस्पृष्ट, अर्द्धस्पृष्ट और इषत्स्पृष्ट।
पद के भी चार विभाग-नाभ, आख्यात, उपसर्ग, निपात। अर्थ के लिए प्रज्ञानयुक्त वाक् वाक्य कहलाती है। वाक् नाभिस्थान, प्रक्रमत्रय स्थान, मुख प्रदेश से चलकर श्रोत स्थान (कान) तक पहुंचती है। प्रक्रम स्थल हैं- उर, कण्ठ और शिर। मुख प्रदेश में कण्ठमूल, तालु, मूर्घा, दन्तमूल और ओष्ठ हैं।
पद के चार विभाग हैं- मित,अमित, स्वर, सत्यावृत।
मित-ऋक्, गाथा, कुम्ब्या। तीन प्रकार का।
अमित-यजु, निगद, वृथा।
स्वर-साम और गेष्ण।
ओम् सत्य है। न अनृत है।
‘अ’ कार ही अक्षर है। सब वर्णो का आदि मूल है। स्थान और करण (जिह्वा) के योग वियोग से, स्पर्श और उष्मा से, संकोच -प्रसारण से, संश्लेष-विश्लेष से वर्णमाला बनती है।
स्वरों में विश्लिष्ट उच्चारण में एक मात्रा का काल लगता है। संश्लिष्ट में 2-3 मात्रा का। स्वरों के अवयव संकोच से घनीभूत होकर स्वर ही व्यंजन बन जाते हैं। व्यंजन के उच्चारण में भी अर्द्धमात्रा काल लगता है। प्रक्रम स्थान (तीन), मुख स्थान (पांच), काल, बाह्य प्रयत्न और आयान्तर प्रयत्न (मुख में), इन पांच गुणों के द्वारा ही एक ‘अ’ कार के द्वारा वर्ण समानाय उत्पन्न होता है।
उच्चारण के लिए प्राणवायु वाक् रूप में बदलता है। इसके लिए नाभि से उठकर उर, कण्ठ प्रदेश में टकराकर प्रथम प्रक्रम पूरा करता है। उर/कण्ठ में टकराकर शिर में टकराकर द्वितीय, मुख स्थानों में तीसरा और अन्त में वर्ण रूप में बाहर निकलता है।
पाणिनी ने लिखा है कि आत्मा बुद्धि के द्वारा अर्थो को जानकर दूसरों को बतलाने की इच्छा से मन को प्रेरित करता है। प्राणवायु उर स्थल में आहत होकर मन्द्र स्वर को उत्पन्न करता है। कण्ठ में टकराकर मध्यम स्वर, शिर में टकराकर तार स्वर बनाता है। वही मुख में आकर वर्ण बनता है। वर्णो के विभाग भी स्वर से, काल से, स्थान से, प्रयत्न से और अनुप्रदान से तय होते हैं।
नाभि स्थान से प्राण वायु बनता है। उर में वायु स्व स्वरूप में आता है, शिर में स्वर-ध्वनि रूप और मुख में ध्वनि-वर्ण रूप होता है। ध्वनि में बल का विशेष महत्व है। वायु नाभि से उठकर उर स्थान से टकराकर मुख से निकलता है, तब मन्द्र स्वर निकलता है (प्रात: सवन)। इसे उर स्थानीय अनुदात्त स्वर कहते हैं। नाभि से उठकर कण्ठ से टकराता हुआ मुख से निकलता है तो मध्यम स्वर होता है (मध्यन्दिन सवन)। इसे कर्ण मूलिय स्वरित स्वर कहते हैं। नाभि से उठकर शिर से टकराकर यदि मुख से निकलता है, तब यह तार (उदात्त) स्वर बनता है।
मुख से बाहर के स्थान-उर-कण्ठ-शिर बाह्य स्थान है। मुख में कण्ठ, तालु, मूर्घा, दन्त और ओष्ठ आभ्यान्तर स्थान कहलाते हैं। जिव्हा मूल कण्ठ है। पांचों स्थानों में क्रमश: जिव्हा मूल, जिव्हा मध्य, जिव्हा उपाग्र, जिव्हा अग्र तथा अधरोष्ठ (पांच करण) और पांच स्थानों के योग से वर्ण बनते हैं। वायु से कण्ठ में ‘अ’ कार, तालु में ‘इ’ कार, मूर्घा में ‘ऋ’ कार, दन्तमूल में ‘लृ’ कार और ओष्ठ में ‘उ’ कार बनते हैं। एक ही अकार से पांच वर्ण बन जाते हैं। मुख और नासिका से उच्चारित – अँ, इँ, ऋँ, लृँ, उँ पांच स्वर अनुनासिक कहलाते हैं।
गुलाब कोठारी
