बहुत बड़े थे शेखावत सा.। राजनीति में तो कहते हैं कि संवेदना होती ही नहीं। उन्हें सत्ता के अलावा कुछ दिखाई भी नहीं देता। अधिकांश राजनेता खूब बहादुरी से झूठ ही बोलते हैं। निष्ठुर एवं घोर स्वार्थी भी होते हैं। हो सकता है शेखावत सा. में भी किसी ने ये गुण देखे हों। मैंने उनमें नेतृत्व की क्षमता देखी, जो आज किसी भी राजनेता (कांग्रेस या भाजपा) में दिखाई नहीं पड़ती। पूरा देश नेतृत्वविहीन चल रहा है। संवेदना एवं सह्वदयता ही तो उनके व्यक्तित्व की मूल शक्ति थी। सारी व्यस्तताओं, राजकाज और राजनीति के बीच उन्होंने व्यक्ति को कभी नहीं भुलाया। कभी व्यक्ति को छोटा नहीं माना। भले वह व्यक्ति जानकार हो अथवा अनजान। अमीर हो अथवा गरीब। उनके दरवाजे सबके लिए खुले रहते थे। उनके उपराष्ट्रपति भवन में भी एक निर्देश यह था कि राजस्थान से आने वाले हर व्यक्ति को भीतर आने दिया जाए। अभी तक तो ऎसा अनुभव किसी भी राजनेता के यहां नहीं हुआ। इसमें उनका मानवीय पक्ष इस बात का प्रमाण है कि वे सही अर्थो में नेता थे। इसी कारण लोग भी उनको चाहते थे। जब तक वे स्वस्थ रहे, राज्य की हर संवेदनशील घटना पर वहां (घटनास्थल) तक पहुंचे। व्यक्तिगत संबंधों को भी राजनीति से ऊपर उठकर निभाया। आज राजनीति का भावनाओं से कोई रिश्ता नहीं रह गया। अत: गरीब तो बड़े नेताओं तक पहुंच ही नहीं सकता है। गरीब को वोट भी डालने नहीं दिया जाता। सत्ता का अर्थ है- “”जिसकी लाठी, उसकी भैंस।”" उनके साथ कभी मेरा राजनीतिक संबंध भी नहीं रहा। न ही इस विषय पर हमारी चर्चा होती थी। मेरे लिए तो वे सदा पिताजी के अंतरंग मित्र ही रहे। अत: हमारे बीच एक अटूट विश्वास सदा ही बना रहा। इसका एक प्रभाव मैंने यह भी देखा कि जब भी मैं उनसे मिलने गया, वे हमेशा गाड़ी तक छोड़ने भी आते थे और बच्चों को भी बुलवाते थे कि उनको बुलाओ मामाजी जा रहे हैं। निश्चित रू प से वे मुझे महसूस करा देते थे कि मैं कोई बड़ा आदमी हूं। अधिकांश राजनेताओं का व्यवहार मुख्यतया आलोचनापरक ही होता है। खाने के लिए पूछना तो अब किताबों में ही पढ़ने को मिले। मुझे उनका सदा देने का भाव बड़ा ही प्रभावित करता रहा। नेकी कर कुएं में डाल। काम निकलने के बाद अनेक लोग रास्ता भूल जाते हैं। कई भाजपा मंत्रियों ने इनके कहे की अवज्ञा भी की है। इनको किसी से शिकायत नहीं रही। सत्ता के मद में भाजपा की जो छिछालेदार हुई, उनकी वेदना इनके मन पर भारी पड़ी। पनपते-गहराते भ्रष्टाचार को भी वे सहन नहीं कर पाए। उनके नेतृत्व की कुंजी रही उनका माटी से लगाव। केवल शब्दों में नहीं, कर्म से भी। परंपराओं से भी उतना ही जुड़ाव। आस्थावान तो थे ही। श्रीनाथजी, गणेशजी, गोविंद देवजी इनके नित्य आराध्य थे। इसी का प्रभाव था कि वे जीवन के प्रति एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखते थे। संबंधों के साथ काम को कभी जोड़ते हुए उनको नहीं देखा। पिताजी के साथ पचास वर्षो के संबंध रहे, निरंतर मिलने का क्रम भी रहा। शुरूआती दौर में तो दोनों एक-दूसरे के लिए कार्य करते भी रहे। राजस्थान पत्रिका में उनके या उनकी पार्टी के विरूद्ध क्या छपा, उस कारण उनका शाम को मिलना कभी बंद नहीं हुआ। भाजपा और संघ का तो कई बार हमें कोपभाजन बनना पड़ा होगा, किंतु मुझसे भी (संपादक बनने के बाद) कभी इस तरह के मुद्दों पर बात नहीं की। पत्रिका में कोई बात या किसी का व्यवहार उनको सही नहीं लगा, तो तुरंत जानकारी देते थे। स्नेह व सम्मान की पराकाष्ठा ही थी कि पिताजी के स्वर्गवास के बाद तो वे और भी नियमित रू प से संभालने लगे। हर बार जयपुर दौरे पर दो मंदिर (गोविंद देवजी और मोतीडूंगरी गणेश) तथा दो मित्रों के घर (हमारा तथा स्व. मोहन छंगाणी का) अवश्य छूते ही छूते थे। उपराष्ट्रपति के पद पर बैठने के बाद भी घंटों बातें करना मेरा सौभाग्य ही था। एक अन्य नेता रहे हैं अटलजी, जिन्होंने कभी बात समाप्त करने की जल्दी नहीं दिखाई। यही तो बड़े लोगों के लक्षण हैं। श्रद्धेय पिताजी की तरह शेखावत सा. भी साधारण स्थिति से पुरूषार्थ के सहारे ऊपर उठे थे। उन्होंने प्रत्येक पुरूषार्थी की आगे बढ़ने में मदद की। नई पीढ़ी के नेताओं का तो लेने से ही पेट नहीं भरता, देंगे क्या? शेखावत सा. राजनीति में रहते हुए भी अंत समय तक इससे ऊपर उठ गए थे। उनका अनेक अर्थो में मोहभंग भी हुआ। अनेक कार्यो और परिस्थितियों का सिंहावलोकन भी किया, जो शायद सब लोग करते भी न हों। इनकी रूग्णता ने इनको चिंतन-मनन का अच्छा समय दे दिया। कई लोगों से मन की बातें कर गए। हलके होकर, तैयारी करके गए। राजस्थान का सौभाग्य ही कहिए कि उसे एक संवेदनशील नेतृत्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ। आगे भी ईश्वर की कृपा हो कि शीघ्र ही लोगों का दिल जीतने वाला नेता मिले। भले किसी भी पार्टी का हो! स्व. शेखावत की आत्मा शांति को प्राप्त हो! ? शांति !!!
गुलाब कोठारी
