Gulabkothari's Blog

सितम्बर 13, 2011

अंतरजातीय विवाह की उलझन

हमारा देश आज एक ऎसे मार्ग पर चल पड़ा है जिसकी परिणति दुख के सिवाय कुछ और नहीं है। हर व्यक्ति उस मार्ग पर चलकर गौरवान्वित महसूस करता है। उसके पास कोई विकल्प भी नहीं है। हमारे सामने तथ्य हैं, सारे आंकड़े हैं, दर्शन है, अनुभव हैं, किन्तु हमारा अहंकार या लाचारी हमें इनमें से किसी को स्वीकारने नहीं देती। समाज और परिवारों में अनावश्यक तनाव, वैमनस्य बढ़ता जा रहा है। यह नया रोग है अन्तरजातीय विवाह।

 

इसको विकासवादी दृष्टिकोण की पैदाइश माना तो जाता है, किन्तु जीना उनके बीच पड़ता है, जिनके दिलो-दिमाग पर विकास पहुंचा ही नहीं है। प्रेम का रिश्ता कितनी सहजता से कट्टरता की भेंट चढ़ जाता है, यह दृश्य देखकर कितने लोग खुश हो सकते हैं, यह भी मानव समाज की त्रासदी ही है। क्योंकि भारत में यह पीड़ा या मुसीबतों का पहाड़ मूल रूप में तो कन्या पक्ष के सिर टूटता है।

 

पिछले सप्ताह कर्नाटक के धर्मस्थल गया था। एक ब्राह्मण लड़के की शादी अन्य जाति की कन्या से इसलिए की गई कि ब्राह्मण जाति में उपयुक्त कन्या नहीं मिली। एक साल के बाद लड़के ने लड़की को छोड़ दिया। वह लड़की न्याय की तलाश में आध्यात्मिक चेतना के साथ सामाजिक जनजागरण में जुटे वीरेन्द्र हेगड़े के पास आई थी।

 

आज शिक्षा की आवश्यकता और भूत ने इस समस्या में ‘आग में घी’ का काम किया है। भौतिकवाद, विकासवाद, स्वतंत्र पहचान, समानता की भ्रमित अवधारणा आदि ने व्यक्ति को शरीर के धरातल पर भी लाकर खड़ा कर दिया और अपने जीवन के फैसले मां-बाप से छीनकर अपने हाथ में लेने शुरू कर दिए। अधिकांशत: माता-पिता उसके मार्गदर्शक बनते नहीं जान पड़ते।

 

चूंकि शिक्षा नौकरी के अतिरिक्त अधिक विकल्प नहीं देती, अत: परिवार का विघटन अनिवार्य हो गया। दादा-दादी बिछुड़ गए। नई बहुएं सास-ससुर से भी मुक्त रहना चाहती हैं, तो बच्चों को संस्कार देने से भी। स्कूल, होम वर्क के सिवाय बच्चों के लिए उसके पास न समय है, न ही वह ज्ञान जिससे बच्चों का व्यक्तित्व निर्माण होता है। शिक्षा ने उसके मन को भी समानता के भाव के नाम पर यहां तक प्रभावित कर दिया कि वह ‘मेरे घर में लड़के-लड़की में कोई भेद नहीं है’ का आलाप तार स्वर में गाती है। इससे कोई अधिक क्रूर मां धरती पर कौन होगी जो अपनी बेटी को स्त्री युक्त, मातृत्व, गर्भस्थ अवस्था आदि की भी जानकारी नहीं देती, क्योंकि बेटे को भी नहीं देती। बेटी को अंधेरे में धक्का देकर गौरवान्वित होती है। बेटे को तो पूरी उम्र मां-बाप की छत्रछाया में रहना है। मां बनना नहीं है। नए घर में जीना नहीं है।

 

इस जीवन-शिक्षा के अभाव में न जाने कितने संकट हो रहे हैं। बच्चों को यथार्थ का ज्ञान नहीं होता और मित्र मण्डली के प्रवाह में जीना सीख जाते हैं। उच्च शिक्षा की भी अवधारणा हमारे यहां नकारात्मक है। बच्चों का शिक्षा के साथ उतना जुड़ाव भी नहीं होता, जितना विदेशों में दिखाई देता है। हां, शिक्षा के नाम पर अधिकांश बच्चों को उन्मुक्त वातावरण रास आता है। फिर कुदरत की चाल। उम्र के साथ आवश्यकताएं भी बदलती हैं। भूख लगी है और भोजन भी उपलब्ध है, तब व्यक्ति कितना धैर्य रख सकता है? मां-बाप बच्चों को भूखा रखते हैं।

 

संस्कारों का सहारा नहीं देते। उधर टीवी, इण्टरनेट इनको दोनों हाथों से शरीर सुख परोसने में लगे हैं। मन और आत्मा का तो धरातल ही भूल गए। शुद्ध पशुभाव रह गया। आहार-निद्रा-भय-मैथुन। और कुछ बचा ही नहीं जीवन में।

 

भारत में कुछ सीमा तक जो संस्कृत समाज हैं, उनको छोड़ दें। शेष अपने जीवन में इस पशुभाव पर नियंत्रण नहीं कर पाते। आज तो स्कूल में ही बच्चे 17-18 साल के हो जाते हैं। कक्षाओं से गायब रहते हैं। तब एक मोड़ जीवन में ऎसा आता है कि नियंत्रण भी छूट जाता है और विकल्प भी खो जाते हैं। ये परिस्थितियां ही इस अन्तरजातीय विवाह की जननी बनती हैं।

 

अन्तरजातीय विवाह में यूं तो खराब कुछ नहीं दिखाई देता। जिसको दिखाई देगा वह दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख है। जब लड़का-लड़की दोनों राजी हैं, तब किसी को अच्छा-बुरा क्यों लगना चाहिए? लेकिन जो कुछ नजारा अगले कुछ महीनों में सामने आता है, उसे देखकर मानवता पथरा जाती है। सारा समाज बीच में कूद पड़ता है। अनेक बाध्यताएं, जिनमें धर्म परिवर्तन तक की भी हैं, अपने मुखौटे दिखा-दिखाकर चिढ़ाती हैं। कट्टरता, संकीर्णता और निर्दयता से सारा वातावरण कम्पित हो जाता है। लड़की के मां-बाप की स्थिति बयान करना सहज नहीं है।

 

लड़की भी हजार गलतियां करने के बाद भारतीय है। मन में कुछ लज्जा का भाव होता है। जब किसी सभ्य परिवार की लड़की असभ्य परिवार से जुड़ जाती है, तब तो ताण्डव ही कुछ और होता है। किसी असभ्य परिवार की लड़की सभ्य और समृद्ध परिवार में चली जाती है, तब एक अलग तरह के अहंकार की टकराहट शुरू हो जाती है। जिन जातियों में नाता होता है, वहां मन कोई मन्दिर नहीं रह जाता। लड़की के दो-तीन तलाक हो जाएं तो लाखों का किराया वसूल लेते हैं मां-बाप। ऊपर से कानून एकदम अंधा। परिस्थितियों की मार से दबे मां-बाप के लिए कानून भी भयावह जान पड़ता है।

 

आज न्यायालयों में विवाह विच्छेद के बढ़ते आंकड़े इस देश के सामाजिक तथा पारिवारिक भविष्य को रेखांकित करते हैं। जीवन विषाक्त होता दिखाई पड़ रहा है। पश्चिम में सम्प्रदायों तथा जातियों की इस प्रकार की वैभिन्नता भी नहीं है और है तो भी ऎसी कट्टरता दिखाई नहीं देती। वहां पैदा होने वाले व्यक्ति को जीवन में दो-तीन शादी कर लेना मान्य है। हम अभी अर्घविकसित हैं। विकास का ढोंग करते हैं। भीतर बदले नहीं हैं। परम्पराओं और मान्यताओं की जकड़ से मुक्त भी नहीं हैं। फिर भी हम विकसित समाजों के पीछे दिखना भी नहीं चाहते। विदेशों में उच्च शिक्षा का कारण सुख प्राप्ति है।

 

स्वतंत्रता भी है और स्वावलम्बन भी। भारत में लड़कियों को उच्च शिक्षा सुख प्राप्ति के लिए नहीं दी जाती, बल्कि इसलिए दी जाती है कि खराब समय (वैधव्य या विवाह विच्छेद) की स्थिति में पराश्रित न रहे। नकारात्मक चिन्तन ही आधार होता है। तब समझौते का प्रश्न किसी के मन में उठता ही नहीं है। हम जब तक इस लायक हों कि यथार्थ को स्पष्ट समझ पाएं, हमारे यहां कुछ विकासशील कुण्ठाएं संस्कृति विरोधी कानून भी पास करवा लेती हैं। एक कहावत है कि हम अपने दुख से उतने दुखी नहीं हैं, जितने कि पड़ोसी के सुख से।

 

मात्र कानून बना देना विकास नहीं है। अभी मन्दिर-मस्जिद के झगड़ों से हम बाहर नहीं आए। आरक्षण ने जातियों के नाम पर अनेक विरोध के स्वर खड़े कर दिए। जब हमारी सन्तान हमारे साथ किसी जाति के विरोध में लड़ती है, हिंसक हो जाती है, तब क्या वह लड़का विरोधी जाति की लड़की का पत्नी रूप में सम्मान कर सकेगा।

 

अथवा ऎसा होने पर जातियों के बीच नए संघर्ष के बीज बोये जाएंगे? क्या समाज का यह दायित्व नहीं है कि यदि किसी सम्प्रदाय को वह स्वीकार नहीं करता, तो अपने बच्चों को भी शिक्षित करे? क्या विरोधी समाज की लड़की का अपमान करके अपनी बहू के प्रति उत्तरदायित्व के बोध का सही परिचय दे रहे हैं? क्या यह पूरे समाज का अपमान नहीं है? आज जीवन एक दौड़ में पड़ गया है।

 

एक होड़ में चल रहा है। स्पर्धा ने मूल्यों को समेट दिया है। नकल का एक दौर ऎसा चला है कि व्यक्ति की आंख खुद के जीवन के बजाए दूसरे पर टिकी होती है, जिसकी वह नकल करना चाहता है। जैसे कि शिक्षित लड़कियां भी लड़कों की नकल करना चाहती हैं। अत: लड़कियों के गुण ग्रहण ही नहीं करतीं। लड़का बन नहीं सकतीं। अत: यह आदमी की हवस का पहला शिकार होती हैं। भले ही इस कारण ऊंचे पदों तक पहुंच भी जाए, किन्तु सुख न इनको मिलता, न ही इनके माता-पिता को। बस, विकास की धारा में बहते रहते हैं।

 

प्रश्न यह है कि यदि हम विकसित हो रहे हैं, शिक्षित हो रहे हैं, तो इसका लाभ स्त्री को क्यों नहीं मिल रहा। शिक्षित व्यक्ति निपट स्वार्थी भी होता जा रहा है और उसे नुकसान करना भी अधिक आता है। अनपढ़ औरतें कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम इसलिए हो गई कि उनको गर्भस्थ शिशु के लिंग की जानकारी उपलब्ध नहीं थी। आंकड़े साक्षी हैं कि ऎसी हत्याओं में शिक्षित महिलाएं अधिक लिप्त हैं और चर्चा भी नहीं होती। ये हत्याएं इस बात का प्रमाण तो हैं ही कि नारी आज भी स्वयं को लाचार और अत्याचारग्रस्त मानती है। अपनी कन्या को इस पुरूष के हवाले नहीं करना चाहती।

 

पुरूष वर्ग का इससे अधिक अपमान हो भी क्या सकता है। अब अन्तरजातीय विवाह ने इस नासूर को नया रूप ही दिया है। लड़का अधिकांश मामलों में मां-बाप के साथ होकर लड़की को अकेला छोड़ देता है। तब उसके लिए मायके लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता। इसके लिए भी उसे अदालतों के और वकीलों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह आत्म-हत्याओं को बढ़ावा देने वाला मार्ग तैयार हो रहा है। यह भी सच है कि व्यक्ति अपना किया ही भोगता है।

 

समाज हर युग में एक-सा रहा है। शिक्षा बाहरी परिवेश है भीतर की आत्मा की शिक्षा, उसका जागरण, परिष्कार आदि जब तक जीवन में नहीं जुड़ेंगे, संस्कारवान मानव समाज का निर्माण संभव नहीं है।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

जुलाई 14, 2011

हेराफेरी

हमारे यहां एक शब्द है फेर-बदल। उसका ही दूसरा रूप है हेरा-फेरी। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में जो फेरबदल हुआ, वह भी एक श्रेणी की हेराफेरी ही कही जाएगी। क्योंकि हेराफेरी के रूप में उन मंत्रियों को हटाया जाता है जिनका कार्य और आचरण सही नहीं होता या फिर जिनसे दल का अध्यक्ष नाराज होता है। आजकल दोनों ही कारण गौण हो गए।

 

भ्रष्टाचार ही वह कारण है जिस कारण एक को हटाया जाता है तथा दूसरे को अवसर दिया जाता है। दिल्ली में तो सोनिया गांधी के आगे सब गूंगे हैं, किन्तु राज्यों में स्थिति स्पष्ट दिखाई पड़ती है। भाजपा में तो हर विधायक ही मंत्रिमण्डल में रहना चाहता है। सब अपने मुख्यमंत्री के कपड़े खींचते रहते हैं।

 

समस्या बहुत बड़ी होती जा रही है। संसद के पास चिन्तन को समय नहीं है। गंभीर विषय या बिल चर्चा में आते ही शोर शुरू हो जाता है। क्योंकि जिस तरह के सदस्य चुनकर आने लगे हैं और बहुमत के अभाव में मिश्रित दलों की सरकारें बनने लगी हैं, वहां गुणवत्ता के प्रश्न हवा हो गए। संसद में सदस्य भी केवल मेरिट से आते हों ऎसा नहीं है। कई तरह की श्रेणियां-आरक्षण आदि से, जातिगत आधार पर, महिला आरक्षण के कारण गोलमा देवी जैसे सदस्य को मंत्री बनाना भी नेता के लिए लाजमी हो जाता है।

 

दल-बदलुओं की शक्ति भी फेरबदल के लिए मजबूर कर सकती है। इनमें अघिकांश सदस्य प्रदेश/देश के परिप्रेक्ष्य में चिन्तन क्षमता भी रखें, यह आवश्यक नहीं है। कई बार अपराघियों को भी मंत्री बनाना पड़ता है। मध्यप्रदेश में कई हैं। तब नेता के पास एक ही मार्ग बचता है सबको संतुष्ट करने का फेरबदल। हालांकि यह कोई समाधान नहीं, लाचारी है। इससे परिणाम सुधरते हों, ऎसा भी संभव नहीं है। बारह जुलाई के शपथ ग्रहण समारोह के चित्रों को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट दिखाई दे जाता है।

 

फेरबदल में दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है कुछ मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन। क्योंकि न तो उनको निकाला जा सकता, न ही वे खरे उतरे। अन्य लोगों को भी संतुष्ट करना पड़ता है। इन मामलों में जनता का अनुमान गलत भी निकल सकता है, क्योंकि जनता मेरिट को ध्यान में रखती है और नेता समीकरण को।

वैसे फेरबदल का यूपी चुनावों से ही तो लेना-देना है। वरना तो भ्रष्ट लोगों को फेरबदल के नाम पर बाहर निकालकर उन्हें सजा पाने से बचाया भी जाता है। यह भी भ्रष्टाचार ही है। अनेक मुद्दों पर चर्चाएं बदल जाती हैं, क्योंकि या तो मंत्री को हटा दिया गया या विभाग बदल गया।

 

विपक्ष स्वयं कुछ बोलने की स्थिति में आज नहीं है। मंत्री हटता है या बदल जाता है, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सजा तो उसको मिलनी ही चाहिए। होता कुछ विपरीत ही है। भ्रष्ट मंत्री ही धन लाते हैं और बांटते भी हैं। फण्ड-रेजर माने जाते हैं। वे तो दूसरों को भी भ्रष्टाचार का लाइसेंस देते हैं। जनता को लूट लेना, जमीनों के अतिक्रमण, हत्याएं करवाना आदि को आश्रय देने वाले होते हैं। इनका तो दलों में विशेष सम्मान होता है।

 

फेरबदल का एक कारण है शीर्ष नेताओं के मर्जीदां लोगों को जगह देना। यह बहुत नाजुक मसला है। इस पर या तो नेता चुप रहकर मान लेता है अथवा शीर्ष की त्योरियां भी चढ़ सकती हैं। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि अब राजनीति में मेरिट के जमाने लद गए। अब बहुमत से चुनने के भी मार्ग बन्द हो गए। फेरबदल के नाम पर शीर्ष नेताओं की ओर से की जाने वाली नियुक्तियां लोकतंत्र के गाल पर तमाचा हैं। इस बात की कोई गारण्टी नहीं कि नया स्वरूप देश के लिए कुछ अवश्य करेगा। उसका इस दृष्टि से शिक्षित होना भी आवश्यक नहीं है।

 

पहले दौर में श्रेष्ठ मानकर लोगों को मंत्रिमण्डल में लिया जाता होगा। आगे तो बस समीकरण ही तय कराते हैं। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि चुनाव तक अब कोई और फेरबदल नहीं होगा, तब कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकार सम्मेलन में कह डाला कि प्रधानमंत्री का आशय यह नहीं था। उनकी बात से प्रधानमंत्री को ठेस पहुंच सकती है, इसकी चिंता उनको नहीं है। वे तो उनसे ज्यादा समझदार नजर आना चाहते हैं।

 

खैर, मंत्रिमण्डल फेरबदल होते रहेंगे। इनका लोकतंत्रीय व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है। जरूरी है हर सदस्य को आवश्यक ज्ञान एवं अनुभव का सहारा देना। उसके लिए मात्र अघिकारियों पर छोड़ देना भी देशहित में नहीं है। क्योंकि यह लोकतंत्र की मूल अवधारणा से भिन्न है।

गुलाब कोठारी

 

जुलाई 4, 2011

बलिदान

कहते हैं कि जिनको मरना नहीं आता, उनको जीना भी नहीं आता। मरना कौन चाहता है- गरीब, रोगी, वृद्ध? कोई नहीं चाहता। प्रभात झा जैसे अपवाद को छोड़ दें, जो इच्छामृत्यु मांगकर स्वयं के लिए अनन्त भोगों की कामना करता जान पड़ता है। आहार-निद्रा-भय-मैथुन में उलझकर एक पशु की तरह जीने के स्वप्न देखता है। एक मृत्यु जबलपुर में रेलवे के मास्टर क्राफ्टमैन दसई ने देखी। कभी मृत्यु की कामना भी नहीं की। अपनी योग्यता के आधार पर प्रमोशन भी पाता रहा।

 

मृत्यु शरीर की होती है। महापुरूषों का शरीर मानवता का प्रकाश फैला देने वाली मशाल होता है। ऎसे लोग समय से पहले पैदा होते हैं। कृष्ण द्वापर में ही पैदा हो गए और आवश्यकता उनकी आज है। आज भी वे हमको उपलब्ध हैं। आजादी की जंग में कितने महापुरूष काम आए? क्या उनके बिना स्वतंत्रता का मिलना संभव था? वे कहीं भी इस मुद्दे के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। ऎसे महापुरूष स्वयं को देश और देशवासियों के आगे नगण्य मानते थे। जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग है, मातृभूमि के लिए काम आ सकना। और जिन-जिन को ऎसे अवसर प्राप्त हुए, उन्होंने प्रमाणित भी कर दिखाया। हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। शहीद हो गए। जीवन को देशवासियों के भावी सुख के लिए समर्पित कर गए। कुर्बान हो गए।

 

दसई की कुर्बानी भी शहीदों की सूची में सदा जीवित रहेगी। विवेकपूर्ण ढंग से, सम्पूर्ण जागरूकता के साथ डेढ़ हजार लोगों की जीवन रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर गए। एक ही बार मरता है आदमी। इनमें से कुछ मृत्यु को भी अनुष्ठान बना लेते हैं और सदा-सदा के लिए अमर हो जाते हैं।

 

दसई अमर हो गए। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि यदि सामान्य जन-जीवन में भी लोग देश के व्यापक हित में ऎसी कुर्बानियां देते हैं, तो सरकार उनको भी शहीदों की सूची में शामिल करे। उनके परिवारों का सम्मान किया जाए। उनके बच्चों का सिर गर्व से ऊंचा रह सके, इसमें समाज के हर वर्ग का सहयोग रहे। भ्रष्टाचार के युग में जहां बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग स्वार्थपूर्ति के लिए टूटे पड़ते हैं, वहां ऎसी शहादत युवा पीढ़ी में नए प्राण फूंकती है। इसी से देश जिन्दा रहता है।

 

यह सही है कि रेलवे ने दसई परिवार को बड़ी आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया है। किन्तु आर्थिक सुख-सुविधा की सीमा बहुत छोटी होती है। सम्मान बड़ी चीज है। नेताओं जैसा नहीं कि कुर्सी से उतरे और राम-राम से भी गए। सरकार को ऎसे उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए, जिससे समाज में ऎसे शहीदों के प्रति एक आत्मीयता का भाव जागृत हो, श्रद्धा पैदा हो सके। इनके परिजनों का समाज में स्थान बन सके। इनके लिए भी जन समारोह किए जाएं।

 

इनका राजकीय सम्मान हो। इनकी भी प्रतिमाएं लगाई जाएं। पाठ्य पुस्तकों एवं इतिहास में इनका नाम दर्ज हो। सेना में मरने वाले हर सैनिक को पदक और ‘शहीद’ संज्ञा से नवाजा जाता है। यहां इस स्वैच्छिक बलिदान को भी क्यों नहीं उसी श्रेणी का सम्मान, ‘पk’ अलंकरण जैसे सम्मानों से अलंकृत किया जाए। तब देश में एक नई शक्ति का संचार होता रहेगा। देश सुरक्षित ही नहीं, आत्मबल के साथ आगे बढ़ता रहेगा।

 

गुलाब कोठारी

जून 20, 2011

बाबा रे बाबा!

हाल ही दिवंगत हुए सत्य साई बाबा के निजी कक्ष से मिली सम्पत्ति का ब्योरा सुनकर देश स्तब्ध रह गया। स्वयं को संत ही नहीं भगवान कहने वाला व्यक्ति माया के जाल में इतना जकड़ा हुआ था कि संत की परिभाषा ही खो गई। भक्तों की श्रद्धा तो स्वत: ही समाप्त हो जाएगी। यह भी हो जाना चाहिए कि ऎसे संतों के रूप में रहने वाले धर्म के सौदागरों को राजनीति में प्रश्रय नहीं मिले। बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग इनके आगे जब नतमस्तक होते हैं और मीडिया में प्रशस्ति ज्ञान होता है, तो आम आदमी मोह में फंस जाता है। ऎसे संतों के कार्यकलापों पर नियमित रूप से सरकार की भी दृष्टि होनी चाहिए।

 

बचपन में साधु-संतों की एक छवि गांवों में दिखाई पड़ती थी, कि वे घर के बाहर पहुंचकर आवाज लगाते थे। जैसे-अलख निरंजन! और भीतर से कोई आकर एक मुटी आटा दे जाता। कभी-कभार जैन मुनि भी आते। कथावाचक आते। इनमें कुछ तो किसी परम्परा में दीक्षित होते हैं, कुछ नहीं होते। संत शब्द तो लगता है अंग्रेजी के सेंट का अनुवाद बन गया है। साधु अपने-अपने सम्प्रदाय का प्रचार करते थे। आध्यात्मिक जीवन के प्रति जागरूकता पैदा करते थे। कुछ नागा साधु गांव के बाहर बगीचों में, चबूतरों पर धूणी जमा लेते। चिलम पीते और गांव वालो के साथ चर्चा करते।

 

एक और भी श्रेणी थी। इनके साधु अखाड़ों से जुड़े होते थे। गोरखनाथ परम्परा के लोग भी थे। सामन्त युग में ये लोग मल्ल युद्ध तथा अस्त्र-शस्त्र विद्याएं सीखते थे। क्षेत्र की सुरक्षा का भार इनके पास होता था। सामन्ती युग तो समाप्त हो गया, किन्तु अखाड़े रह गए। धीरे-धीरे ये भी नागा साधुओं के रूप में पूरे देश में छा गए। हर कुंभ मेले में इन अखाड़ों को देखा जा सकता है। आज ये सब साधु हो गए। व्यसनों से भी इनका जीवन ओत-प्रोत दिखाई पड़ता है। अभी हरिद्वार कुंभ के बाद अखाड़ों के क्षेत्र में सफाई अभियान के दौरान बड़ी संख्या में शराब की खाली बोतलें मिलीं। जबकि हरिद्वार में मद्यनिषेध लागू है। साधु की शास्त्रीय कल्पना भिन्न है।

 

हर जीवनशैली में धर्म भी एक अनिवार्य घटक है। रूप भिन्नता के साथ। आज अघिकांश लोग बिना दीक्षा के साधु-संत का ताना बना लेते हैं। इसमें इनका बाहरी स्वरूप साधु का जान पड़ता है और भीतर में बिना शिक्षा-दीक्षा का। आज इस देश में साधु-संत महत्वाकांक्षी हो गए। आश्रम-ट्रस्ट बना लिए। यात्राओं के दौर तथा वैभव और यश-कीर्ति की लालसा में लिपट गए। इस देश ने वशिष्ठ और वाल्मीकि से लेकर विदुर और चाणक्य तक के स्वरूप देखे हैं। इन सबने बिना किसी लोभ-लालच के केवल राजा का मार्गदर्शन किया। लोक की समृद्धि पर आंख रखी तथा राजनीति से बाहर रहे। संत ही रहे।

 

आजादी के बाद संतों ने भी जैसे स्वतंत्रता का अनुभव किया। श्रीमती इंदिरा गांधी के समय धीरेन्द्र ब्रह्मचारी हथियार का कारखाना चलाते थे। चन्द्रास्वामी को आप क्या कहेंगे- बाबा, तांत्रिक या सत्ता/हथियारों का दलाल? नरसिंह राव से लेकर चन्द्रशेखर तक पहुंच थी। सेंट किट्स घोटाला, लखू पाठक मामला और फेरा में भी आरोपी रहे। स्वामी चिन्मयानन्द अयोध्या मामले में भी जुड़े और मंत्री पद भी पाया। इसी प्रकार इनके साथी महन्त अवैद्यनाथ भाजपा की सक्रिय राजनीति में रहे। महंत चांदनाथ, आदित्यनाथ आदि भी राजनीति में रहे।

 

शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती भी राजनीति की चपेट में आ गए। जेल भी जाना पड़ा। स्वामी अग्निवेश, साध्वी उमा भारती, ऋतंभरा, प्रज्ञा ठाकुर जैसे कई नाम भी सीधे या परोक्ष रूप से सक्रिय राजनीति से जुड़े हैं। बाबा रामदेव ने जो अभियान एक संत के रूप में शुरू किया था, उसने भी बाद में राजनीतिक मोड़ ले लिया। अभियान ठप हो गया।

 

देश के सामने प्रश्न है कि किस को साधु-संत का दर्जा दे और किस आधार पर? क्या दीक्षित साधु को राजनीति में जाने की छूट दी जाए या गृहस्थ वेश में लौटकर ही प्रवेश करे। आज जिस प्रकार लोग संत बन रहे हैं, बदनाम हो रहे हैं, उससे नई पीढ़ी के मन में इन संतों के नाम से अविश्वास पैदा हो रहा है।

 

व्यक्ति संसार छोड़कर साधु-साध्वी बने और सत्ता के पीछे भी भागे तो संयम कैसे पाल सकता है? सत्ता से जुड़ते ही बाकी सारे कर्मकाण्ड भी जुड़ने लगते हैं। क्या आपने आसाराम बापू की भाषा सुनी है? बाबा रामदेव को बोलते सुना है? दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम मौलाना बुखारी के तो अनेक वाक्य आज भी लोगो के कानों में गूंज रहे होंगे। और ये सब धर्म के रहनुमा हंै।

 

साधु-साध्वी का चोला भी पहनो, सत्ता में भी रहो और गर्भपात भी करवाते रहो। बड़े-बड़े संतों के आश्रमों से निकले यौनाचार के किस्से देशभर में सुने जा सकते हैं। कई बड़े-बड़े आचार्यो के आश्रमों से हत्या के समाचार भी देश में फैले हैं। इससे मिलता-जुलता एक उदाहरण अजमेर का अश्लील फोटो काण्ड है। संत भिंडरावाले की घटना भी देश भूला नहीं है। तब क्या इनको डूबकर नहीं मर जाना चाहिए? लोग हैं कि फिर भी इनके आगे श्रद्धा से दण्डवत करते हैं। पश्चिम में भी ऎसे काण्ड न्यायालयों में पहुंचे हैं।

 

भीतर का आदमी सब जगह एक-सा है। क्यों नहीं ऎसे संतों को जनता वेश बदलने के लिए मजबूर करे? क्यों इनके नाम के पहले संत शब्द लगाया जाए? बल्कि इनका बहिष्कार क्यों नहीं किया जाए? क्यों इनको धन भेंट करें? क्या दे रहे हैं आश्रमों वाले देश को-अपना अहंकार? कभी अखाड़ों में लड़ने वाले, चरस-गांजा पीने वाले भी संत और तपस्या करने वाले भी संत।

 

व्यापार करने वाले भी संत और मर्यादाहीन बोलने वाले भी संत? देश को चिन्तन करना पड़ेगा कि हम किस अज्ञान की कीमत चुका रहे हैं। क्या विरासत नई पीढ़ी के लिए छोड़ना चाहते हैं। हजारों साल पुराने कर्म और कर्म फलों की अवधारणा या धर्म और विज्ञान के समन्वय का सिद्धांत। क्यों साधुता का अपमान करने का अघिकार उनको दिया जाए? जिस धर्म का साधु सत्ता में भागीदार हो गया, मान लो धर्म बिक गया। वह धर्म के माथे पर काला टीका बन जाएगा। वोट की राजनीति को इस नुकसान से कुछ लेना-देना नहीं होता।

 

साधु के पद से जो सत्ता को बड़ा मानता है, वह मन में तो साधु है ही नहीं। समाज को क्या फिर भी ऎसे लोगों का बोझ उठाना चाहिए? क्या इनके आचरण का प्रभाव इनके साथ के उन अन्य संतों पर नहीं पड़ता जो धन और सत्ता की भूख से दूर रहकर वास्तव में संत का सा आचरण करते हैं। समय आ गया है जब जनता दूध का दूध और पानी का पानी करे। जो सत्ता मांगे, पहले उसका चोला उतरवाया जाए। ताकि उनके कारण देश के अन्य साधु-संत लांछित होने से बच सकें। विदेशियों की नजरों में देश और धर्म का सम्मान बचाया जा सके।

 

गुलाब कोठारी

जून 3, 2011

पधारो म्हारे देश!

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष, यू.पी.ए. की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी आज देश के सबसे बड़े प्रान्त की यात्रा पर आ रही हैं। स्वागत है! राजस्थान की इस यात्रा में वे कुछ ऎसे निर्णय कर सकती हैं जो देशहित में बहुत महत्वपूर्ण भी हैं और जो स्थानीय कांग्रेस सरकार को ताकत देंगे। जैसे कि राजस्थान को विशिष्ट राज्य का दर्जा देना।

 

इतना बड़ा रेगिस्तान, इतनी बड़ी पाक सीमा, इतना बड़ा राष्ट्रीय पशुधन, अन्तिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाने की भारी-भरकम लागत। सीमा ही 1044 किमी लम्बी है। इसी सीमा के दोनों ओर पारिवारिक रिश्ते पलते हैं। क्यों नहीं इनका आवागमन सुगम किया जाए, ताकि इस जरिए भाईचारे का एक नया वातावरण तो बनाया ही जा सकता है। यूं तो सीमा प्रदेश जम्मू-कश्मीर भी है, किन्तु वहां कट्टरता का वातावरण है।

 

राष्ट्रीय हित का एक बड़ा निर्णय होगा-यहां तेल की खोज, उसके उत्खनन और परिशोधन पर निवेश बढ़ाया जाना चाहिए। हर दृष्टि से ऎसा होना श्रेष्ठ तो होगा ही, प्रदेश का यह भाग मध्य-पूर्व देशों की तरह विकसित भी हो जाएगा। इसी के साथ सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की बड़ी योजनाएं परमाणु संयंत्रों का विकल्प बन सकती हैं। देश के अन्य भागों में सौर ऊर्जा इतनी घन रूप नहीं है।

 

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने देश को सूचना का अघिकार, शिक्षा का अघिकार, नरेगा जैसे कार्यक्रम दिए हैं। जरूरत इस बात की है कि, परिषद की ओर से सुझाए कार्यक्रमों को संसद में जस का तस पास किए बिना उन पर व्यापक बहस हो-चाहे संसद में या संसदीय समितियों में। इसी तरह परिषद आने वाले समय की आवश्यकताओं के अनुरूप देश का एक मानचित्र भी तैयार कर सकती है। ‘मेरे सपनों का भारत’ जैसा एक स्वरूप!

 

सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सरकार के अनेक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे पदों को भी उनकी सहमति से पूरित किया जाता है। विश्व की गिनी-चुनी शक्तिमान महिलाओं में भी उनका नाम है। लेकिन इन्दिरा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री जैसा प्रभाव पाने के लिए उन्हें अभी और मेहनत करनी होगी।

 

इसका सबसे बड़ा कारण है कि इनके अघिकांश निर्णय सरकार के अनुकूल दिखाई देते हैं। देश के अनुकूल हों, भले ही कांग्रेस को कम लाभ हो, तब इनको कांग्रेस के ऊपर देश का नेता माना जाएगा। आज नहीं। इसके लिए आपके पास एक सशक्त सूचना तंत्र भी होना चाहिए। लोग क्या सोचते हैं, क्या अपेक्षा रखते हैं आदि जानकारियां सीधी आपके पास आनी चाहिए। आज तो जगह-जगह छलनियां (फिल्टर्स) लगी हैं। इसीलिए आज तक देश में समान नागरिकता का कानून भी नहीं बन पाया।

 

राजस्थान में और केन्द्र में आपके दल की सरकारें हैं। दोनों में समन्वय करके बड़ी-बड़ी परियोजनाएं लागू की जा सकती हैं। पुरानी, अधूरी योजनाओं को पूरा किया जा सकता है। ये सारी बातें ही ऎसी हैं जिन पर आप निर्णय करके देश को एक बड़ा संदेश दे सकती हैं। समय-समय पर अन्य नेताओं को भेजकर कार्यो का जायजा कराया जा सकता है। राजनीति से ऊपर उठकर देश की कमान हाथ में लेने का प्रश्न है। ताकि देश का विकास राजनीति की भेंट न चढ़े और लोग आपकी आंखों में अपने सपनों को साकार होते देख सकें। साथ ही देश को सक्षम नेतृत्व मिल सके।

 

गुलाब कोठारी

मई 14, 2011

सिमटता लोकतंत्र

समय की अपनी चाल होती है। उसी से प्रारब्ध जुड़ा रहता है और उसी से भविष्य। वर्तमान बीच का निर्णायक मोड़ होता है। आज जो चुनाव परिणाम सामने आए हैं, वे समय की भाषा बोलते सुनाई पड़ रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में तो चुनावी नतीजे सुनामी साबित हुए हैं। चाहे इसे कम्युनिस्ट पार्टी के विरोध में कहें या ममता की तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में। बिना ऎसी सुनामी के पुराने बरगद नहीं उखाड़े जा सकते। बंगाल में सर्वाधिक लम्बी अवधि (34 साल) के वामपंथी गठबंधन शासन को मुंह की खानी पड़ गई। गठबंधन को एक चौथाई सीटों के आगे रास्ता नहीं मिला। तमिलनाडु की स्थिति भी कमोबेश यही है। बल्कि करूणानिधि की द्रमुक और भी दयनीय स्थिति में पहुंच गई है। दोनों राज्यों में यही अपेक्षित भी था। दोनों ही राज्यों में सत्ता पक्ष की छवि जनता की नजरों में गिर चुकी थी। मतदान पूरा सत्ता पक्ष के विरूद्ध रहा। भले कांग्रेस जीतकर उभरी हो। केरल के चुनाव साधारण ही रहे। पुaुचेरी ने तमिलनाडु का अनुकरण किया। हां, असम में सत्ता पक्ष कांग्रेस ने अपनी पकड़ मजबूत की।
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुaुचेरी में एक आश्चर्यजनक स्थिति बनी, जिसकी ओर पत्रिका लम्बे समय से इशारा कर रहा है, किन्तु सत्ता का अहंकार इसे नकारता रहा है। राष्ट्रीय दलों में से कांग्रेस हर राज्य में है, जो आज केन्द्र में सत्ता में भी है। दूसरे बड़े राजनीतिक दल की भूमिका निभाने के बावजूद केन्द्र का विपक्षी दल भाजपा सभी जगह पर नकार दिया गया। केन्द्र में विपक्षी दल इन पांचों राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा। देश के लोकतंत्र को लकवा मारने लग गया है। संघ के भीष्म पितामह हाथ बांधे खड़े हैं। भाजपा को राख से उठते हुए देख रहे हैं!
इन परिणामों को देखकर भाजपा स्वीकार कर ले कि आज पांचों प्रान्तों में वह जनता की पहली, दूसरी, तीसरी पसन्द भी नहीं रही। आने वाले चुनावों में बाकी का भ्रम भी मिट जाएगा।

देखो तो, पश्चिम बंगाल में 294 में से 290 स्थानों पर भाजपा ने प्रत्याशी खड़े किए। कोलकाता भाजपा का अघोषित गढ़ और परिणाम शून्य। एक भी सीट नहीं जीत पाए। भले ही उनको गोरखा जन मुक्ति मोर्चा की तीनों सीटें मिल गई हों। हो गई न आतिशबाजी? भाजपा के लिए यह परिणाम गौरवशाली कहे जा सकते हैं!

तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा। 2-जी स्पैक्ट्रम के बाद भी द्रमुक तीस से अधिक सीटे ले आई। भाजपा अपना खाता भी नहीं खुला पाई। क्यों? साहुकार पेट पर तो भाजपा का कब्जा मानते हैं। राजनीति का भरोसा नहीं होता। करूणानिधि को हराने के लिए कांग्रेस ने जयललिता से हाथ मिला लिया हो। जैसा भाजपा ने झारखण्ड में शिबु सोरेन से हाथ मिलाया था।
असम में कांग्रेस ने पकड़ बढ़ाई। व्यापारियों ने वहां भी भाजपा को पूरी तरह नकार दिया। कुल 126 सीटों में से वह 121 पर लड़ी लेकिन उसे केवल चार सीटें मिली। पिछली बार दस मिली थीं। गरीबी में आटा गीला। केरल की राजनीति का अपना एक मार्ग है। वह उसी पर चल रही है। कुल 806 सीटों पर लड़कर वह केवल 4 सीटें जीत पाई। बधाई भाजपा नेतृत्व और चुनाव समिति को। इससे बुरी हालत और क्या होगी कि भाजपा के पास आज राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता तक नहीं है।

सारे परिणाम यह सिद्ध कर रहे हैं कि देश का विपक्ष अपनी क्षमता नहीं बढ़ा पा रहा है। जब सत्ता पक्ष के समक्ष इतनी बड़ी-बड़ी चुनौतियां हैं, इतने महाभ्रष्टाचार के आरोप हैं, जांचें चल रही हैं, उस हाल में विपक्षी भाजपा इन तीनों बड़े राज्यों में खाता न खोल पाई या स्थिति को सुदृढ़ नहीं कर पाई, तब निश्चित है कि वह कांग्रेस से भी बहुत कमजोर है। घर में भले ही वह मूंछों पर ताव देती रहे, लोक में उसका मान नहीं रहा। यदि आज मध्यावधि चुनाव हो जाएं तो भाजपा का कटोरा दिल्ली जैसे रीत जाएगा। जहां कुछ है, वह भी सिमट जाएगा। उसी दिन से देश में कांग्रेस का सामन्तवाद लागू हो जाएगा।
गुलाब कोठारी

मार्च 4, 2011

भ्रष्ट भी, धृष्ट भी

Filed under: Uncategorized — gulabkothari @ 7:00

सत्ता के व्यभिचार का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष उदाहरण है-पत्रकारों के लिए गठित किया जाने वाला वेतन आयोग। देश में किसी भी अन्य क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए कोई आयोग गठित नहीं किया जाता। दूसरी बात आयोग मूलत: पत्रकार संगठनों के जरिए सरकारी भाषा बोलता है। तीसरी बात जो कुछ मीडिया में हो रहा है, उसके व्यवहार पक्ष एवं बदलते परिवेश की परवाह कोई नहीं करता और चौथी बात- कोई भी सरकार इसको लागू करने का प्रयास भी नहीं करती। जब देश के 15-20 संस्थानों के सिवाय इसे कोई लागू करता ही नहीं है। तब क्या सार्थकता है आयोग के गठन की?

सरकार पत्रकारों को दत्तक पुत्र मानती है और अपनी कमाई का अंश भी उन तक पहुंचाने को कृत संकल्प है। बिना संविधान की स्वीकृति के मीडिया को चौथा पाया मान लिया। पत्रकारों को दिल खोलकर सुविधाएं देकर संस्थान के प्रति विश्वासघात करना सिखाया जाता है। पत्रकारिता के सिद्धान्तों के स्थान पर सरकार की स्वार्थपूर्ति का प्रशिक्षण दिया जाता है। वेतन भी आयोगों के माध्यम से दोगुना, उससे अधिक सरकारी जमीनें-मकान-यात्रा सुविधाएं-मौज मस्ती और व्यवहार सरकारी नीतियों के अनुकूल। किसी भी संस्थान के कर्मचारियों को भ्रष्ट करना, संस्थान के हितों के विरूद्ध कार्य करने के लिए रिश्वत देना क्या न्याय संगत है? हाल ही में आपने देखा कैसे पत्रकारों को स्मार्ट काड्र्स के जरिए नकद राशि बांटी गई। और न किसी को शर्म आई, न किसी की नाक कटी। पत्रकारों की हैसियत मांगने वालों जैसी बनकर रह गई। भले ही प्रेस क्लब के नाम से मांगते हों।

इन सबका प्रभाव दो धाराओं में बंट गया। जिन समाचार-पत्रों ने पत्रकारों पर पकड़ बनाने का प्रयास किया और स्वतंत्र लेखन की परम्परा को जारी रखने का प्रयास किया, वे किसी भी सरकार के साथ, विशेषकर अधिकारियों के साथ, मधुर सम्बन्ध नहीं बना पाए। सरकारों के विरोध में लिखते रहने से कोप भाजन भी बनना पड़ा। अनेक शत्रु भी पैदा हो गए। उनके साधारण कार्य भी करने को कोई तैयार नहीं होता।

इसके विपरीत जिन समाचार पत्रों ने इस नीति को स्वीकृति दे दी, उन पर सरकार की अनुकम्पा बढ़ गई। कुछ समाचार-पत्र मालिक भी मांगने वालों की लाइन में खड़े हो गए। किसी भी सरकार को इससे अच्छा रास्ता क्या मिल सकता है। किन्तु सरकार के इस प्रश्रय के कारण इनमें स्वच्छन्दता घर कर गई। ये समाचारों के बदले धन भी मांगने लगे और विज्ञापनों के लिए व्यापारियों और कमजोर अधिकारियों को धमकियां भी देने लगे। जनता से जुड़ने की इनकी आवश्यकता ही समाप्त हो गई। धन की बरसात में देश के अनेक बड़े-बड़े अखबार डूब गए। चस्का राज्यसभा में जाने और अन्य सरकारी पुरस्कार पाने का भी लग गया।

सरकारों ने अखबारों का, विज्ञापनों का भी राजनीतिकरण कर दिया। हर नेता ने अखबार खड़े कर लिए। आज 80 प्रतिशत से अधिक फर्जी अखबार सरकारी सूची में हैं। लोगों ने उनके नाम भी नहीं सुने। उनको करोड़ों रूपए के विज्ञापन हर साल जारी होते हैं। प्रसार संख्या भले सैकड़ों में हो बताते लाखों में हैं। उसी आधार पर मनमानी दरें लेते हैं। सरकारें कुछ देखती नहीं। दोनों, अखबार मालिक तथा सूचना और जनसम्पर्क निदेशालय तरबतर रहते हैं। इनके पत्रकारों को अधिस्वीकरण की सुविधाएं अलग मिल रही हैं। सरकारी मेहमान एवं रौब मारने वाले जनप्रतिनिधि की तरह व्यवहार करते हैं।

स्वयं सरकार इनको कानून के परे जाकर सिर पर बिठाती है। समाचार-पत्रों को निदेशालय द्वारा जारी विज्ञापनों पर स्वयं विभाग दलाली खाता है। यह दलाली सरकारी खजाने में नहीं जाती। अफसर खाते हैं। सरकारी दरों पर कमीशन का अवैधानिक कानून तक सरकार ने बना दिया है। कई प्रदेशों के उच्च न्यायालय इसके खिलाफ फैसला दे चुके हैं। हमारी सरकार इसकी परवाह नहीं करती। बल्कि इस सुख का फिर से लाभ उठाने के लिए सेवानिवृत्त अधिकारी को फिर से जिन्दा करके निदेशक पद पर बिठा दिया। कोई बात का उत्तर तो दे कि “संवाद” संस्था बनाने का सरकार का औचित्य क्या है। सरकार धन बचाना चाहती है तो विज्ञापनों की दरें कम कर सकती है। वो भी नहीं। सरकारी संस्था की आय सरकारी खाते में क्यों नहीं जाती।

यह सारे उदाहरण इस बात के सूचक हैं कि सरकारें स्वतंत्र प्रेस चाहती ही नहीं हैं। पत्रकारों को चेतना शून्य बनाए रखना चाहती हैं। ताकि कोई पत्रकार अपने संस्थान के प्रति निष्ठावान नहीं रह पाए। पीछे के दरवाजे से उन्हें भ्रष्ट करने में लगी रहती हैं। और यह सारा प्रयास केवल प्रेस और पत्रकारिता को खरीदने के लिए। इससे ज्यादा व्यभिचार और हो भी क्या सकता है। संस्थान से आयोग के जरिए दोगुना वेतन दिलाना और हडि्डयां डालकर संस्थान के विरूद्ध कार्य करवाना।
फिर भी आप इनको न भ्रष्ट कह सकते हैं, न ही धृष्ट!!
गुलाब कोठारी

मई 25, 2009

धन्य-धन्य भागीदारी

Filed under: Uncategorized — gulabkothari @ 7:00
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आपको याद होगा कि ठीक एक साल पहले हम कुछ सपने लेकर मध्यप्रदेश आए थे। एक वर्ष में वो सपने सच हुए। मध्यप्रदेश के लिए हम अपने हुए। और यह सारा हुआ ज्ञान और कर्म के सहारे। लोगों में आस्था का भाव पैदा कर पाए। हमारे अनुरोध पर लोग तपती दोपहर में “अमृतम् जलम्” के लिए श्रमदान करते रहे और आज तक कर रहे हैं। हमारे भी कोई पिछले पुण्य ही होंगे, जिनके कारण इतना आशीर्वाद मिला। यहां तक कि माननीय मुख्यमंत्री ने भी “अमृतम् जलम्” के जरिए अपना जन्मदिन मनाया।
यह जो पत्रिका आपके हाथ में है, वह तो पत्रिका का शरीर है। जो पढकर समझ रहे हैं, वह बुद्धि क्षेत्र का ज्ञान है। जिसे आप जीवन के साथ जुडा हुआ अनुभव करते हैं, वह पत्रिका की आत्मा है। केवल इसी का सम्बन्ध आपकी आत्मा से बना हुआ है। शरीर को पशु कहते हैं। इसका दुबला या मोटा होना अर्थहीन है। इसको आत्मा ही चलाता है। इसीलिए हमने पत्रिका को आत्मा का अखबार बनाना ही उचित समझा ताकि ज्ञान को प्रकाशित होने का अवसर मिल सके।

पिछले एक वर्ष के छोटे-से काल में जो वातावरण पत्रिका ने बनाया, आप सब उसके साक्षी हैं। पत्रिका ने हर पाठक के दिल को छुआ है। उसकी जिन्दगी के पास खडा रहने का प्रयास किया है। तभी लोगों ने हमारी बात में आस्था जताते हुए कडी धूप में श्रमदान करने का संकल्प किया और इतना बडा कार्य कर दिखाया। आत्मा के बुलावे पर आत्मा दौडी। धूप में पसीना बहाकर भी आनन्द की अनुभूति प्राप्त की।

इसी एक साल में हमने लोकतंत्र के दो महाकुंभ भी देखे। विधानसभा और लोकसभा के आम चुनाव। पत्रिका अपने आप पर चौथा पाया होने का गर्व करता है। बाजारू माल की तरह पत्रिका को कोई खरीद नहीं पाया। न ही पत्रिका ने किसी को भ्रमित किया। “जागो जनमत” और “प्रतिबद्धता पत्र” जैसे अभियान यहां के पाठकों को पहली बार देखने को मिले। हमारे आकलन आगे-से-आगे खरे उतरे और हर दृष्टि से निष्पक्ष भी रहे। दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दलों ने भी मुक्त कण्ठ से रिपोर्टिग और आकलन की प्रशंसा की।
पूरे वर्षभर पत्रिका सचाई उजागर करने के लिए चर्चा में रहा। सामाजिक मुद्दों पर तो सरकार ने भी तुरंत कार्रवाई कर दिखाई। व्यापार के साथ-साथ सामाजिक नेतृत्व का भी बोध बरकरार रहा। इसी का परिणाम रहा कि भोपाल में फिर से गंगा-जमुनी संस्कृति की लहरें उठने लगीं।

पंजाबी, सिंधी, मुसलमान आदि अल्पसंख्यकों ने तो पत्रिका के सम्मान में समारोह आयोजित किए। लोगों के इस जुडाव को देखकर ही शायद मुख्यमंत्री ने भोपाल की सभा में कहा था-”अकेली सरकार विकास नहीं कर सकती। समाज साथ होना जरूरी है। जल संरक्षण अभियान मे पत्रिका साथ है तो कुछ भी मुश्किल नहीं।”
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने तो एक से अधिक बार फोन करके पत्रिका को खरी-खरी समीक्षा के लिए बधाइयां दीं। उनको विश्वास ही नहीं था कि कोई अखबार इतना निष्पक्ष भी हो सकता है, कि पूरी तस्वीर आइने की तरह दिखा दे।

पत्रिका चूंकि पाठक को ही सब कुछ मानता है, अत: इसकी सामग्री की गुणवत्ता, मौलिकता और इसका सांस्कृतिक धरातल अपना एक मूल स्वरूप लिए रहता है। पत्रिका मूल लेखन और मूल्यपरक सामग्री को ही प्राथमिकता देता है। नकल नहीं करता। इसीलिए पाठकों के जीवन का अनिवार्य अंग बन जाता है। पत्रिका एवं अन्य अखबारों के पाठकों में यह वैचारिक अन्तर देखा जा सकता है। पत्रिका ने शिक्षा में छूट रही मानवीय संवेदनाओं को लोक शिक्षण के रूप में एक मशाल बनकर प्रयोग किया है।

अभी पत्रिका का यह पहला साल ही है और मध्यप्रदेश का बडा हिस्सा सामने भी है। हम आपको विश्वास दिला सकते हैं कि पत्रिका की पत्रकारिता का लोगों को अनुसरण करना होगा। नई पीढी तो बहुत जागरूक है। घटिया सामग्री पढकर स्वयं को अपमानित नहीं करेगी। पत्रिका की तरह हर अखबार को पहले पाठक के दिल से जुडना पडेगा, फिर धन से। इस दृष्टि से मध्यप्रदेश में भी एक नए युग की शुरूआत ही हुई है। इसका सभी ने ह्वदय से स्वागत भी किया है। पत्रिका के एजेण्ट और वितरकों का उत्साह इसका प्रमाण है। विज्ञापनदाता भी मानने लगा है कि अच्छे अखबार की साख ही माल को चोटी पर पहुंचा सकती है।

व्यापारिक क्षेत्र के लोगों को एक बात पर अवश्य चिन्तन करना चाहिए कि किस कारण से भोपाल और इन्दौर क्षेत्र के लाखों पाठकों ने दशकों से आ रहे अपने अखबारों को पढना बन्द कर दिया। और वह भी तब, जब कि पत्रिका के केवल दो संस्करण-भोपाल और इन्दौर ही शुरू हुए हैं। इसी में भविष्य की तस्वीर है।
विज्ञापन को पढ लेना ही काफी नहीं है, उसका प्रभाव मानस परिवर्तन में भी दिखना चाहिए। साख अच्छी हो तो अखबार भी बिकता है और विज्ञापनदाता का माल भी। वितरकों को तो राजस्थान का दौरा कर लेना चाहिए। सारा कुछ समझ में आ जाएगा।

पत्रिका ने एक साल में जो कुछ कर दिखाया है उसकी तो स्पर्द्धी अखबार भी नकल करते हैं। चाहे पुस्तक मेला हो, अमृतम् जलम् हो या फिर पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था। इसका एक ही अर्थ है-व्यापार में भले ही वे स्पर्द्धी हैं, किन्तु हमारे अच्छे कार्यो की सराहना वे भी करते हैं, और हमारा साथ देते हैं। हम तो उनके भी आभारी हैं।
पत्रिका अपनी कार्यशैली से भी सोते हुओं में जाग्रत रहने वाला है, यह उसने एक साल में यहां आकर भी सिद्ध कर दिया है। पत्रिका भोपाल की आवाज बन चुका है और इन्दौर की भी। बाकी क्षेत्र भी दूर नहीं हैं। आप लोगों का आशीर्वाद चाहिए। आप हमारे हाथ मजबूत रखें, हम आपके। भोपाल के ही बशीर बद्र साहिब का एक शेर है-

“तुम्हारे शहर के सारे दिये तो सो गए लेकिन,
हवा से पूछना दहलीज पर ये कौन जलता है।”
यही पत्रिका है।
आइए! ज्ञान की इस रोशनी में मिलकर एक नया प्रदेश बनाएं। बच्चों के भविष्य का मार्ग प्रशस्त करें। आप और हम कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढते जाएं। ईश्वर भी खुद साथ हो जाएगा।
नमस्कार!

गुलाब कोठारी

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