Gulabkothari's Blog

मार्च 21, 2009

स्वयं में रहो

Filed under: Stambh — gulabkothari @ 7:00

नर-नारी पंच महाभूत से बने इस शरीर के नाम हैं। इसकी एक निश्चित उम्र भी होती है। इसका उपयोग भीतर बैठा जीव करता है, जिसकी उम्र का कोई पता नहीं और जिसका कोई लिंग भेद नहीं होता। शरीर जीवन का एक चौथाई अंश है। शेष तीन अंश (अंग) मन-बुद्धि और आत्मा हैं। शरीर के अंश की उपयोगिता (प्रकृति के अनुरू प) भी एक चौथाई, केवल गृहस्थाश्रम में ही होती है। यदि हमारे जीवन का आधार केवल शरीर और इससे जुड़े हुए सुख ही हैं, तो हम तीन चौथाई जीवन व्यर्थ कर देते हैं। पुरूष की शक्ति बुद्धि और शरीर में है। नारी की शक्ति मन में है। पुरूष का निर्माण स्त्री/पत्नी ही कर सकती है। न कोई नारी, न स्वयं पुरूष इसे सम्भव कर सकते हैं। पत्नी रू प स्त्री ही गृहस्थाश्रम में निर्माण करती है और आगे निर्वाण पथ पर चढ़ा देती है।

आज के अर्थ युग में सबकी एक ही तो महत्वाकांक्षा रहती है- धन कमाने की। इसका उपयोग भी शरीर ही करता है। व्यक्ति अपने और अपनी संतान के लिए ही करता है। शरीर का उपयोग आहार-निद्रा-भय और मैथुन रह जाता है। यह तो एक पशु के लक्षण हैं। मानव जीवन का लक्ष्य इसके आगे भी होना चाहिए। तभी सार्थक होगा।
हमारे जीवन को पुरूष और प्रकृति (माया) मिलकर चलाते हैं। नर-नारी दोनों में ही पुरूष भाव भी होता है और स्त्रैण (प्रकृति) भाव भी होता है। दोनों ही के निर्माण में अधिदेव, अधिभूत और अघ्यात्म की भूमिका रहती है। नर-नारी एक ही सौर संवत्सर (सूर्य-चन्द्रमा-पृथ्वी युक्त) के दो भाग हैं। न कोई छोटा, न कोई बड़ा। दोनों के ही अपने-अपने निर्धारित (प्रकृति दत्त) स्वरू प और कार्य हैं। पुरूष भाव अहंकार प्रधान होता है। स्त्रैण भाव मन की मृदुता और शीतलता पर आधारित है। वही पुरूष को 75 साल बांधकर रख सकता है। शरीर की सीमा बहुत थोड़ी होती है। पुरूष के साथ सृष्टि क्रम को बढ़ाने के लिए शुक्र होता है। नारी पृथ्वी की तरह उसका ग्रहण और पोषण करती है।

आज महिला स्वयं को आक्रान्त महसूस करती है। विश्व भर में कहीं भी वह सुखी नहीं है। विडम्बना यह है कि जिस पुरूष समाज से वह दु:खी है, वह भी एक नारी का ही ग्रहण और पोषित किया हुआ है। साथ ही जो उसे पीडि़त कर रहा है, उसी से उम्मीद कर रही है सहायता की। इससे भी आगे, वह स्वयं भी उसी की नकल करके उसी की तरह जीना चाहती है। जो आज अच्छी है, संस्कारवान है, वह भी खराब हो जाना चाहती है। हो क्या रहा है इस नकल में न तो वह पुरूष ही बन पा रही है, न ही वह नारी के गुणों का ही संरक्षण और पोषण कर पा रही है। वह शरीर से अपने को नारी मानकर जीवन की समग्रता को खण्डित कर रही है। जब शरीर एक चौथाई महत्व रखता है, तब उसकी तीन चौथाई जिन्दगी तो दु:ख के हवाले हो जाएगी। पुरूष की नकल में वह स्त्रैण नहीं बनी। अच्छी पत्नी और अच्छी मां बनना छूट गया। तब शरीर में क्या रह जाएगा, जो सुख देगा बुद्धि का अहंकार उसे पुरूष जैसा बनाएगा। इसी से शादी के बाद भी एक बनकर नहीं रह पाते, दो ही रहते हैं। दो पुरूष विवाह करके लम्बे काल तक सुख से नहीं रह सकते। संतान भी उसकी जैविक होगी। बिना किसी संस्कार के। अभिमन्यु तो कोई पैदा ही नहीं कर पाएगी। उसकी मां भी उसे नहीं सिखा रही। लड़के-लड़की की बराबरी की होड़ में लड़की भी उतना ही सीख पाती है, जितना कि लड़का। फिर लड़की का दोष कहां मां की विकासवादी अवधारणा ही तो बेटी को अंधे कुए में धकेलती है। भले ही आगे लड़की को दु:खी देखकर उनका बुढ़ापा खराब हो जाए

नारी को ईश्वर ने नर से हजार गुणा ज्यादा शक्तियां देकर, ज्यादा व्यावहारिक समझ देकर पैदा किया है। वह सृष्टि का एक गतिमान तत्व है। परिवार, समाज और संस्कृति का वह निर्माण करती है। नारी शरीर से नहीं, नारीत्व से करती है। स्त्रैण बनकर करती है। जब वह पुरूष से अच्छा पढ़ सकती है, उससे अच्छी नौकरी कर सकती है, तब उसकी नकल क्यों करना चाहती है। वह खूब आगे भी बढ़े और अपने प्राकृतिक स्वभाव को भी पूर्ण रू प से विकसित करती रहे। पुरूष स्वत: ही उसके आगे छोटा हो जाएगा। यदि वह स्त्री भाव को स्वीकार नहीं करती, तो यह भी तो प्रकृति को चुनौती देना ही है। फिर कुदरत की मार खाकर पुरूष को दोष क्यों देना चाहती है व्यक्ति अपने किए का ही फल भुगतता है। दूसरे के कर्मो का नहीं। आज भी बहुत बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। हम इस देश को नए सिरे से संस्कारवान बना सकते हैं, जहां नारी का फिर से सम्मान होगा। वह इस देश की शक्ति बनकर उभर सकती है। शक्ति तब नजर आएगी, जब पुरूष उसके चक्कर लगाएगा और वह छूने भी नहीं देगी। विवाह संकल्प है, शेष सब विकल्प हैं।

Advertisements

4 टिप्पणियाँ »

  1. swyam me raho . aam na to neem banane ki koshish karta our na hi neem aam banane ki sab swyam me hai is liye astiya me bhi hai our apne apne nam ,gun ke karan aadar bhi pa rahe hai jab vanspati ye kala jante hai to ham jo jab jante hai kyo nahi ye chhoti si bat jante hai .

    टिप्पणी द्वारा DR.PUSHPENDRA PRATAP — अक्टूबर 13, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. saadar prannam.aap ko net par kaafi din se search kar rha tha . ishvar kripa se ab aapke sundar vichaar yahan dekne ko mil paayenge.

    टिप्पणी द्वारा amit — मई 2, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: