Gulabkothari's Blog

अप्रैल 14, 2009

कठघरे में सरकार

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

नाकारा गृह विभाग, विपक्ष भी बरी नहीं शांति नहीं तो प्रदेश गर्त में

साठ साल के लोकतंत्र के इतिहास में राजस्थान के माथे पर इतना बडा काला टीका पहले कभी नहीं लगा। पिछले दो दिनों की घटनाओं से जनता स्तब्ध है। एक ही दिन में 14 लोगों की मृत्यु और ज्यादातर की पुलिस फायरिंग में- आश्चर्यजनक ही है। गुर्जर समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मंाग को लेकर कई जिलों में आग लगी हुई है। तमाम पूर्व सूचनाओं के बावजूद गृह विभाग ने जिस प्रकार अदूरदर्शिता दिखाई और हमेशा की तरह गंभीरता को कम करके आंका उसने पूरी सरकार को कठघरे में खडा कर दिया है।

रावला-घडसाना, सोहेला, कोटडा इत्यादि के बाद अब दौसा और बूंदी में गोली की जुबान में आंदोलनों से निपटने वाले गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया एक के बाद एक विफलता के बाद अब पद पर बने रहने का अघिकार खो चुके हैं। उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। खेद की बात है कि मुख्यमंत्री को उनके नकारेपन का एहसास तीन साल बाद भी नहीं हुआ। वे हर आंदोलन को गोलियों से कुचलना चाहते हैं। किसी की मौत पर सफाई देने का इनका अपना अंदाज है। इसी तरह गृह सचिव भी इस जिम्मेदारी वाले पद पर बने रहने की अयोग्यता सिद्ध कर चुके हैं। यह वही गृह विभाग है जिसके अफसरों ने मुख्यमंत्री को घडसाना जाने से रोका था।

गुर्जर समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए या नहीं, यह एक अलग सवाल है, लेकिन अब इससे बडा सवाल यह बन गया है कि देखते-देखते ऎसी स्थितियां कैसे बन गई, जिसने राजस्थान के सबसे भीषण उपद्रव का रास्ता खोल दिया। शांति और सद्भाव का गौरवशाली इतिहास एक दिन में ही ध्वस्त हो गया। इसके लिए निश्चित रूप से सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सरकार के स्तर पर रही अदूरदर्शिता की है। सब जानते हैं, घटनाएं अचानक नहीं घटी हैं। पिछले कई माह से आंदोलन चल रहा था, लेकिन तमाम सूचनाओं के बावजूद गृह विभाग के दम्भ, अविवेक और अतिविश्वास के कारण इससे निपटने की पर्याप्त तैयारी नहीं की गई। जो तैयारी की गई, वह केवल हिंसा के रास्ते की ओर ले जाने वाली थी। किसी भी लोकतंत्र में आंदोलन से निपटने के जो तरीके होते हैं वे बातचीत से शुरू होते हैं। गोलीबारी सबसे आखिरी उपाय होता है। लेकिन यहां बातचीत के रास्ते की पूरी तरह उपेक्षा कर दी गई। बल्कि एक दम्भी मंत्री ने यह बयान देकर चिंगारी को और हवा दे दी कि हमने किसी को बातचीत के लिए नहीं बुलाया, वे स्वयं आए थे। इसके बाद जो तैयारी की गई वह कुछ ऎसी थी, मानो जनता से नहीं, शत्रु से मुठभेड की तैयारी की जा रही हो। कब उग्रता बढे और कब बन्दूकों का मुंह खोला जाए। राजस्थान के इतिहास में ऎसा पहले कभी नहीं हुआ कि संघर्ष के रास्ते चल जन आंदोलनों से निपटा गया हो।

यह भी विचारणीय प्रश्न है कि गुर्जर जाति की मांग को लेकर बनाई गई मंत्रिमंडलीय सलाहकार समिति इतनी धीमी गति से काम क्यों कर रही थी। उनकी पहचान आवश्यक है जो इनके काम में आडे आ रहे थे। राज्य सरकार 32 में से 26 जिलों में सर्वे का काम पूरा कर चुकी थी। यदि समिति चाहती तो आंदोलन की रूपरेखा बनते ही शेष जिलों का काम युद्धस्तर पर निपट सकता था।

दूसरी ओर, आंदोलनकारी समुदाय का रवैया भी राज्य के हितों के लिए उचित नहीं माना जा सकता। गुर्जर समुदाय शांति और सहिष्णुता के लिए जाना जाता रहा है। राज्य के आर्थिक विकास में इसकी बडी भूमिका रही है। क्या उसे ये स्वीकार होगा कि आने वाली पीढियां उसे अपने ही हाथों लगाए हुए बगीचे को उजाडने के लिए याद करें। राज्य में अनेक आंदोलन हुए हैं, पर इस आंदोलन का स्तर किसी गृह युद्ध से कम नहीं है। उनके मुद्दे पर निर्णय आसान नहीं हैं। गुर्जरों के बाद अनेक जातियां आंदोलन की तैयारी में हैं। हमारे यहां आरक्षण ने समाज और जातियो का जितना विखण्डन कर दिया है, उतना न मुगल कर पाए और न अंग्रेज। आज वोटों की गणित हर आंदोलन के पीछे नजर आ रही है।
विपक्ष के रूप में कांग्रेस को भी बरी नहीं किया जा सकता। तीन साल तक निष्क्रिय पडी रहने के बाद अब उसकी भूमिका आंदोलन को भडका कर राजनीतिक रोटी सेंकने वाली नजर आ रही है। जबकि राजस्थान में आरक्षण के जिन्न को बाहर निकालने की जिम्मेदारी उसी की बनती है। आज भी गुर्जर आरक्षण के मुद्दे पर शायद ही कांग्रेस अपना रूख स्पष्ट कर पाए।

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने घटना हो जाने के बाद स्थिति अपने हाथ में ली है और वार्ता के द्वार खोले हैं। लेकिन उनके मंत्रिमंडल में शायद ही कोई दूसरा ऎसा होगा जो उनके पीछे से स्थितियां संभालने में सक्षम हो। कई मंत्रियों ने तो अपनी भूमिका तमाशबीन बने रहने तक सीमित कर रखी है। उन्तीस मई को काला दिन बनाने में बडी भूमिका मीडिया की भी रही। एक-दो टी.वी. चैनलों ने कुछ चुने हुए दृश्य इस तरह दिन में बार-बार दिखाए, जिनसे लोग ज्यादा से ज्यादा भडकते गए। इन चैनलों ने घटना के एक पक्ष को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। इस घटना ने साबित कर दिया कि मीडिया चाहे तो शांति कायम कर सकता है और चाहे तो आग लगा सकता है।

इतना सब कुछ हो जाने के बाद अब इन्हीं पक्षों पर निर्भर है कि उसे राजस्थान में लगी आग को भडका कर प्रदेश को गर्त में डालना है या शांति स्थापित करने में सहयोग करना है। शांति नहीं रही तो पर्यटन सहित अन्य क्षेत्रों में नुकसान तो तुरंत नजर आएगा। आज प्रदेश एक नाजुक मोड पर खडा है। मुद्दा जनभावनाओं का भी है और अतिसंवदेनशील भी। जिस तरह वार्ता के दरवाजे अब खोले गए हैं, ऎसा पहले किया होता तो स्थिति बिगडती नहीं। आंदोलनकारी नेताओं को सूझ-बूझ से काम लेना होगा। कहीं ऎसा न हो कि उनके स्वयं के हाथों से नियंत्रण निकल जाए। टीवी चैनलों को कम से कम वल्र्ड ट्रेड सेंटर की घटना से सबक लेना चाहिए जिसमें अमरीकी मीडिया ने भारी जनहानि के बावजूद भावनाओं से खिलवाड करने वाले दृश्यों से परहेज रखा था। राज्य की जनता और विभिन्न जातियों को भी ऎसे समय संयम से काम लेना चाहिए। एक छोटा सा अविवेकपूर्ण कदम राजस्थान को वर्षो पीछे धकेल देगा।

गुलाब कोठारी

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1 टिप्पणी »

  1. THIS IS VERY GOOD STEP FROM YOU—- THANK’S A LOT

    टिप्पणी द्वारा SANDEEP — जून 8, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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