Gulabkothari's Blog

अप्रैल 14, 2009

ईश्वर सद्बुद्धि दे

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

तीन दिन तक राजस्थान में हिंसा और आगजनी की बेकाबू घटनाएं होने के बाद शुक्रवार को जो कुछ घटा, उसने राज्य को वर्षो पीछे धकेल दिया है। प्रदेश गृह युद्ध के मुहाने पर खडा है। स्वार्थी तत्व आतंक फैलाने में लगे हैं। जातीय हिंसा की लपटें कभी भी पूरे प्रदेश को अपनी चपेट में ले सकती हैं। आज कोई भी राजस्थान की बात नहीं कर रहा। जातीय संकीर्णता के स्वर उबाल लेने लगे हैं। प्रदेश धूं-धूं कर जल रहा है, और कुछ राजनेता ऎसे में भी लोगों को उकसा रहे हैं। ऎसे में विकास, विनियोजन जैसे मुद्दे तो दूर की बात है, राजस्थान और उसकी पहचान का सवाल खडा हो गया है। कोई गुर्जर और कोई मीणाओं की बोली बोल रहा है। राजस्थान की चिंता करने वाला कोई नहीं है। किसी को इस बात की चिंता नहीं कि राजस्थान में गुर्जर-मीणा के अलावा भी समुदाय और जातियां रहती हैं, जिनका जीवन आज अस्त-व्यस्त ही नहीं त्रस्त भी हो गया है। पक्ष-विपक्ष के नेता शांति की अपील तो कर रहे हैं, लेकिन सब मिलकर घटनास्थलों पर पहुंच कर समझाइश करने को तैयार नहीं हैं।
ऎसा लग रहा है मानों राजस्थान में दो ही समुदाय रहते हैं और इनके हितों की लडाई में पूरा राजस्थान झुलस रहा है। सही अर्थों में यह जन आंदोलन होता तो किसी जाति विशेष के हित की बात नहीं होती। ऎसे मुद्दे पर जन आंदोलन इसलिए भी नहीं हो सकता क्योंकि यह भी महसूस किया जाने लगा है कि आरक्षण का लाभ अब क्रीमीलेयर को नहीं दिया जाना चाहिए। राजस्थान में कुछ अरसे पूर्व तक जाटों और राजपूतों की भी यही हालत थी लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां बदल गई। जाति-समुदाय कोई भी हो, उन्हें अपने देश-प्रदेश का वातावरण विषाक्त नहीं करना चाहिए। ऎसा करके वे स्वयं अलग-थलग पड जाएंगे।

क्या बाकी समाज इन घटनाओं को भूल पाएगा। क्या गुर्जर और मीणा समाज को इन घटनाओं की भरपाई नहीं करनी पडेगीक् लडाई सरकार से है तो बाकी लोगों पर इसकी आंच क्यों आएक् दोनों समाज के मंत्रियों-विधायकों ने अपने समाज के आंदोलन के पक्ष में इस्तीफा देने की पेशकश की है। यह संकीर्णता का ही उदाहरण है। मंत्रियों और विधायकों को सबसे पहले राज्य का हित देखना चाहिए, फिर समुदाय का। मंत्री-विधायक की हैसियत से वे किसी समुदाय के प्रतिनिघि नहीं रह जाते। अच्छा होता वे पहले इस्तीफा देते, फिर अपने समाज के आंदोलन से जुडते।
आंदोलनकारियों की मांगें सही हैं या गलत, आज के हालात में इस पर चर्चा करना बेमानी है। अभी सबसे ज्यादा चिंता का विषय दो जातियों का आमने-सामने हो जाना है। इसे तुरंत नहीं रोका गया तो आने वाले दिनों में प्रदेश की क्या हालत होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज ये दो हैं कल और जुड गईं तो क्या होगाक् चार दिन से राजस्थान की जनता जिस तकलीफ को झेल रही है, वैसी स्थिति पहले कभी नहीं आई। राजधानी का सम्पर्क मुख्य सडकों से काटा जा चुका है। कोटा में बच्चे दूध को तरस रहे हैं। कई जगह पानी की लाइनें काट दी गई हैं। जिन बच्चों ने प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए वर्ष भर मेहनत की, वे परीक्षाएं ही नहीं दे पाए। क्या कोई उनकी इस वर्ष की परीक्षाएं दिलवा पाएगाक् उनको हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा। राज्य सरकार या आंदोलनकारी नेताक् बसें बंद पडी हैं। कई रेल मार्गो की पटरियां उखड चुकी है। वाहनों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। सडकों को काट दिया गया है। पुलिस थानों और चौकियों को आग लगाई जा रही है। दिनों-दिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। पुलिस या तो मौकों पर है ही नहीं, या चुपचाप बैठी है। सेना के भी हाथ बंधे हुए हैं।
अधिकांश प्रभावित क्षेत्रों में इतनी तबाही होने के बावजूद कफ्र्यू, गिरफ्तारी जैसे उपायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना आश्चर्यजनक है। राजस्थान का और नुकसान न हो, इसके लिए कानून का राज स्थापित होना, सबसे पहली आवश्यकता है। यह सही है कि बन्दूक और गोली आखिरी हथियार के रूप में ही इस्तेमाल होने चाहिए। लेकिन जब नेतृत्वहीन भीड मार-काट पर उतारू हो जाए तो उनमें राज के भय का संचार करना ही उचित उपाय है। अब और इंतजार नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार को अपनी मशीनरी को निर्देश देने चाहिए कि वह कानून का राज स्थापित करे। निर्णय में एक-एक क्षण की देरी भारी तबाही कर सकती है। ऎसी तबाही जिसका असर कई वर्षो और पीढियों तक रहने वाला है।

प्रदेश में बने अराजकता के माहौल को दूर कर भयमुक्त कानून का राज स्थापित करना राज की पहली जिम्मेदारी है। प्रदेश की जनता को भयमुक्त और शांति का वातावरण देने वाले शासन को ही राज करने का अघिकार है। सारे राज्य को ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि दोनों ही समुदायों के लोगों को शांतिपूर्ण आंदोलन करने की सद्बुद्धि दे। राज्य में तुरंत शांति स्थापित करने में दोनों समुदाय मदद करें तो राज्य उनका उपकार मानेगा।

गुलाब कोठारी

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