Gulabkothari's Blog

अप्रैल 14, 2009

साधुवाद!

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

आज प्रात: लद्दाख से दिल्ली आकर उतरा तो मन में एक ही प्रश्न था-क्या कार से जयपुर जाना उचित रहेगा। हवाई अड्डे से ही कार्यालय के वरिष्ठ सहयोगियों से चर्चा भी की। सबने अपने-अपने रक्षात्मक सुझाव भी दिए और साथ ही मेरी बात का समर्थन भी टाल गए। “शाम की फ्लाइट से आना ही उचित रहेगा।” सभी का एक-सा उत्तर था।

मेरे भीतर का पत्रकार किसी सुझाव को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। राजस्थान पत्रिका और पाठकों के बीच एक आत्मीयता का नाता है, उसे व्यापारिक दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। और अब तक के उदाहरण कुछ इंगित करते हैं तो मुझे मार्ग में किसी तरह की रूकावट नहीं आनी चाहिए। और मैं जयपुर के लिए रवाना हो गया।

आज सुबह से ही मेरे पास अनेक फोन आ रहे थे। सम्पादकीय लेख के बारे में। मैं रास्ते भर उनका ही विश्लेषण करता रहा। मोबाइल पर भी कई तरह के संदेश मिले। इन सबकी एक ही प्रतिक्रिया थी कि पत्रिका न्यायसंगत ढंग से अपना धर्म निभा रहा है। समाज एवं सरकार को मार्ग भी बताता रहा है। वैसे भी न्याय तो होता ही धर्म की रक्षा के लिए है। अन्तर यही है कि न्याय को मांगना पडता है और धर्म को साधा जाता है। पत्रिका एक साधक है।

पत्रिका के संदेश ने लोगों के दिल को छुआ, उनके दायित्व का बोध कराया वह एक बात है। किन्तु लोगों ने अपने आन्दोलित मन पर नियंत्रण करके शान्ति का वातावरण बनाने में जो वीरता और धीरता दिखाई, इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। आज प्रदेश भर में कहीं कोई बडी दुर्घटना, आगजनी या लूटमार नहीं हुई। चौबीस घण्टे से कम समय में यह कर दिखाना वंदनीय है। जैसे हर व्यक्ति भीष्म पितामह हो गया हो। पूरा राष्ट्र आज स्तब्ध रह गया होगा, कि यह क्या हुआ। सब शान्त कैसे हो गया। दोनों ही समुदाय के लोग इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने हमारे निवेदन को स्वीकारा। राज्य के उन सभी नागरिकों को भी साधुवाद जिन्होंने आज अपने-अपने इष्ट से प्रार्थना की है। शान्ति बनाए रखने की। कई लोगों ने सद्भावना उपवास भी किए हैं। मुझे आज भी लगता है कि सामूहिक प्रार्थना में बडी शक्ति है।

अघिकार के लिए संघर्ष करना भी हमारा धर्म है। न्यायसंगत भी है। किन्तु हमारे संघर्ष के कारण किसी अन्य के अघिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। तब वह नृशंसता की श्रेणी में आ जाता है। हमें कृष्ण के निर्देशानुसार नीति का सहारा लेना चाहिए। धर्म का यही व्यावहारिक स्वरूप है। सब लोग आपके संघर्ष में साथ हो जाएंगे। फिर तो सफलता निश्चित है।

राजस्थान में अभी कुछ और जातियां आरक्षण को लेकर आंदोलन की तैयारियां कर रही हैं। उन्हें इस घटना से सबक लेना चाहिए। धर्मगुरूओं को भी इस बात को अपने प्रवचन का एक निश्चित अंग बनाना चाहिए कि कोई भी समुदाय अपने स्वार्थ के लिए दूसरे समुदायों को नुकसान नहीं पहुंचाए।

हम सब प्रकृति द्वारा संचालित हैं। हममें से कोई अकेला रह कर सुखी नहीं हो सकता। जब हमारे चारों ओर के प्राणी सुखी होंगे तो व्यक्ति स्वयं सुखी हो जाएगा। अत: राष्ट्र के सुख में ही व्यक्ति का सुख निहित है। अलग से कोई व्यक्ति सुखी नहीं हो सकता।

कार्यालय पहुंच कर सबसे पहले श्रद्धेय बाबूसा. को प्रणाम किया। मन ही मन उनको बताया कि कल तक जहां रास्ते बंद थे आज एक व्यक्ति भी नहीं मिला। इससे अघिक गर्व की बात मेरे लिए हो ही क्या सकती थी। आपका और पाठकों का आशीर्वाद इसी तरह मेरी कलम में समाया रहा तो पत्रिका निश्चित रूप से प्रदेश एवं राष्ट्र के नीति-परक विकास में गहन भूमिका निभाएगा।

गुलाब कोठारी

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