Gulabkothari's Blog

अप्रैल 14, 2009

याद रखें…

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हो गया। भले ही मिठाइयां बांट लो। किसी को भी यह समझ में नहीं आया कि समझौता किस बात का हुआ। कौन हारा, कौन जीता। कागजों में भले ही गुर्जर आरक्षण का मुद्दा शान्त हो गया, किन्तु लोगों के दिलों में बडे गहरे घाव हो गए। काल का एक ऎसा अंश आया था कि लोकतंत्र ध्वस्त हो चला था। भारतीय दण्ड संहिता ने समर्पण कर दिया था और स्वतंत्रता के झण्डे के नीचे लोग अपने ही प्रदेश में कैद होकर रह गए थे। दूसरा कोई देश होता तो फंसे हुए लोगों को निकालने की व्यवस्था होती, खाद्य सामग्री और दवाएं उपलब्ध कराई जाती, बच्चों को परीक्षा केन्द्र तक पहुंचाने की व्यवस्था होती। यहां तो कुछ भी नहीं हुआ। मानो सरकार ने स्वेच्छा से समर्पण कर दिया हो। हिंसा के उस दौर में न किसी पर राजद्रोह का मुकदमा चला, न सरकारी सम्पत्ति के नुकसान का। पुलिस खुद नदारद थी। रक्षा की आवश्यकता पर रक्षक ही भाग खडा हो और किसी को शर्म तक न आए। शेष नेता और अघिकारी भी कायरों की तरह मौन थे।
इससे भी बडा अनर्थ किया हमारे जनप्रतिनिघियों ने। किसी ने भी जनप्रतिनिघि की भूमिका नहीं निभाई। न अपने क्षेत्र के मतदाता का सम्मान किया, न ही इनका प्रतिनिघित्व किया। बल्कि अघिकांश विधायक तो भीड को उकसाने में लगे थे, नेतृत्व कर रहे थे, अथवा मूकदर्शक बने खडे थे। अपने ही मतदाता के सामान को आग लगवा रहे थे। हिंसा को रोकने का प्रयास तो कोई कर ही नहीं रहा था। इसी का दूसरा पहलू यह भी है कि सरकार में बैठे मंत्रीगण व्यवस्था के खिलाफ आस्तीनें चढाए खडे थे। मंत्री का पहला दायित्व है कि मंत्रिमण्डल के फैसले को लागू करवाए। जनता के जान-माल की रक्षा करे। जो हुआ, सब कुछ उलटा हुआ। इन्होंने साधारण जनप्रतिनिघि तक की भूमिका भी नहीं निभाई। जनता के दुख में हाथ बंटाना तो दूर, अपनी जाति के लोगों को हिंसा के लिए लगातार उकसाते रहे। अघिकांश भाजपा विधायक (प्रभावित क्षेत्रों के) अपनी ही सरकार की नाक कटवाने में लगे रहे। जैसे इन्होंने अपनी ही जाति का उद्धार करने के लिए अवतार लिया हो। विधानसभा में ली गई शपथ किसी को भी याद नहीं रही। कांग्रेस के एक सांसद तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से गुर्जरों के पक्ष में गुहार करने जा पहुंचे। धरने की शुरूआत पर सांसद सचिन पायलट तो पूरे काफिले के साथ धरना स्थल पर पहुंच गए थे। खाद्य मंत्री किरोडी लाल मीणा सरकार पर बराबर दबाव बनाए हुए थे। इस्तीफे की पेशकश भी कर डाली थी। वे इसे अपने अस्तित्व का मामला मान बैठे थे। इसी प्रकार पंचायती राज मंत्री कालूलाल गुर्जर, वित्त राज्य मंत्री वीरेन्द्र मीणा, बयाना विधायक अतर सिंह भडाना उन जनप्रतिनिघियों में से थे जो अपने क्षेत्रों को जलते हुए देख रहे थे। सबसे ज्यादा आगजनी इन्हीं के क्षेत्रों में हुई थी। ये अपने मतदाता को, शक्तिदाता को, भस्मासुर की तरह जलाकर खाक कर देना चाह रहे थे। रामगंज मण्डी रेलवे स्टेशन जला, दरां का स्टेशन ध्वस्त हुआ और भी नुकसान हुआ। इसके चश्मदीद गवाह और लोगों में प्राण फूंकने वाले वहीं के विधायक प्रहलाद गुंजल थे। कामां, डीग, मांडल, नैनवा, बस्सी, सिकराय, बांदीकुई, करौली, सपोटरा, टोडाभीम जैसे क्षेत्रों के विधायकों का व्यवहार भी ऎसा ही था। सबने अपने आपको जातीय प्रतिनिघि ही प्रमाणित करने का प्रयास किया। जनप्रतिनिघि सिद्ध नहीं हो सके।
इसे कैसा लोकतंत्र कहा जाए जहां सभी राजनीतिक पार्टियां, सरकार सब अपने-अपने लोगों को जातीय संघर्ष में भस्म कर रही थीं। पुलिस और गृह विभाग मौन खडे थे। आंदोलनकारियों को खुली छूट मिली हुई थी। किसी को जातीय हित से ऊपर उठते नहीं देखा। न किसी पार्टी अध्यक्ष ने कोई कार्रवाई की। न किसी ने इस काल में जनता को सम्बोघित करके उसे विश्वास में लेने का प्रयास ही किया। केवल अपने-अपने वोटों की गणित लगा रहे थे।

प्रशासन ने पूरे प्रदेश को आंदोलनकारियों के भरोसे छोड दिया था। नागरिक अपने ही गांव में बंधक होकर रह गया था। जब-जब जातिगत आधार पर कोई आन्दोलन होता है, उस जाति के नेता और अघिकारी उसमें शरीक होने में गर्व महसूस करते हैं। इस बार भी यही हुआ। जातिगत समारोह, उत्सव आदि में भी जातिगत आधार पर ही मुख्य अतिथियों का चयन किया जाता है। ये उस लोकतंत्र की भाषा है जहां जातीय आधार पर मतदाता की सूची भी नहीं बन सकती। इस लोकतंत्र के रक्षक ही जातीय आधार पर इसके भक्षक हो गए। भावी चुनावों में हमें केवल “जन प्रतिनिघि” चुनना चाहिए। जातीय प्रतिनिघि तो कदापि नहीं।

गुलाब कोठारी

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