Gulabkothari's Blog

अप्रैल 14, 2009

जागना तो पडेगा

Filed under: Gujjar Andolan — gulabkothari @ 7:00

आरक्षण आंदोलन तो ठहर गया किन्तु अनेक प्रश्न खडे कर गया। सबसे बडा प्रश्न तो यही है कि हर जाति यदि अपने हितों के लिए स्वतंत्र आंदोलन करने लग गई तो लोकतंत्र का स्वरू प क्या होगाक् क्या निर्वाचन क्षेत्र भी जातीय आधार पर तय होंगेक् क्या कोई भी जाति अपने आंदोलन के नाम पर अन्य जातियों का इतने सहज रू प से अहित कर सकती हैक् जो सम्पत्ति नष्ट हुई वह भी जनता की थी, तो जनता उसे बचाने को आगे क्यों नहीं आईक् पांच प्रतिशत लोगों के आगे 95 प्रतिशत लोगों ने क्यों घुटने टेक दिएक् क्या इस तरह की हिंसा एवं आगजनी के डर से लोग गांवों से पलायन नहीं कर जाएंगेक् क्या बहुमत के आधार पर कोई भी जाति अपने गांव की अन्य जातियों को स्वतंत्र रहने देगीक् जातिगत राजनीति करने वालों का क्या सामूहिक प्रतिकार नहीं होना चाहिएक् इनको अन्य जातियों के हितों की चिन्ता नहीं होती है। इनके भाषण भी भडकाऊ होते हैं और जाति के नाम पर अपराधी प्रवृति के लोगों को भी आगे आने का अवसर मिल जाता है। यह लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही है कि जातीय समूहों ने राजनीतिक ब्लैकमेल के रास्ते अपना लिए हैं। इनके आन्दोलनों का स्वरू प अब अहिंसात्मक और शान्तिपूर्ण नहीं रह गया है। पिछले कई आंदोलन उदाहरण के लिए सामने हैं। अन्य जातियों में विद्वेष का प्रसार ही बढ रहा है। राजनीतिक दल भी इस जातीय कमजोरी का लाभ उठा रहे हैं। चुनावों में टिकट वितरण सबसे बडा माध्यम होता है। जाति विशेष के लिए की जानी वाली घोषणाएं भी हो सकती हैं। कई लोग कहते मिल जाएंगे कि उनके लिए जाति का हित समाज से ऊपर है। क्या यह समाजद्रोह नहींक् ऎसे ही लोग जातीय भावना भडका कर तथा अपने ही लोगों को हिंसा के लिए उकसा कर मनमाने निर्णय कराने का दम्भ भरते रहते हैं। जनता के शेष वर्गों के हितों से इनका कोई लेना-देना नहीं होता।

मण्डल आयोग की सिफारिशों से शुरू हुआ जातीय विद्वेष देश को कहां ले जाएगा इसका अनुमान हाल ही का आंदोलन देखकर लोगों ने लगा लिया होगा। भीतर ही भीतर कई जातियों में द्वेष भाव बढ गया है।

आंदोलन में हिंसा, हथियारों का प्रदर्शन एवं उपयोग जिस तरह बढ रहा है, चिन्ताजनक है। इससे पूरे राज्य में दहशत और आतंक का एक वातावरण बन जाता है। बच्चों पर क्या बीतती होगीक् मार-काट की घटनाओं में घृणा का जो रूप दिखाई दिया वह साम्प्रदायिक दंगे से कम नहीं था। भीड ने यह भी समझा दिया कि उसकी कोई जाति, धर्म या समाज नहीं है। नेतृत्वहीन, अनियंत्रित भीड अराजकता का पर्याय बन गई।
यह भी एक गुत्थी ही है कि इस बार आन्दोलन रातों-रात कैसे इतना बडा हो गया। क्या पहले कभी आन्दोलन नहीं हुएक् हिंसा नहीं फैलीक् कौन लोग थे इसके पीछे जिन्होंने इतनी हवा दी। कल तो कोई भी आन्दोलनकारी किसी के भी घर में घुसकर ताण्डव कर सकता है। जैसा कि वैर की महिला उप जिला मजिस्ट्रेट के घर में घुसकर किया गया। ऎसे खून की होली खेलने वालों की तो समाज को भी सीमा तय करनी पडेगी। जरू रत पडे तो ऎसे लोगों को गांव से निकाला भी जाना अनुचित नहीं होगा।

एक बात स्पष्ट है। समाज को स्वयं को भी जागना पडेगा। कोई भी जातीय गुट सम्पूर्ण समाज से बडा नहीं होता। आंदोलन यदि शान्तिपूर्ण है, तो उसका साथ दिया जाए। न किसी को मारा जाए और न सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया जाए। आंदोलन हिंसक हो जाए तो तुरन्त उसका प्रतिकार करना होगा। जन-जीवन आए दिन अस्त-व्यस्त नहीं हो सकता। किसी एक जाति के हितों के कारण शेष समाज त्रस्त भी नहीं हो सकता। केवल सरकार और पुलिस के भरोसे बैठा नहीं जा सकता। पुलिस भी ऊपर से आदेश आने की प्रतीक्षा करती है। राज्य की शान्ति व्यवस्था पर हमारा पहला अधिकार होना चाहिए। वह हमारे नियंत्रण में रहे।

गुलाब कोठारी

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2 टिप्पणियाँ »

  1. With respectfully, I want to state that i like your articles very much. I want you to publish your article regarding a topic on “GURU AND SATGURU” in PATRIKA (INDORE) (M.P).

    APKE ARTICLE KA BADI BESABRI SE INTZAR RAHEGA.

    THANKS.

    टिप्पणी द्वारा Laxmandas Sawlani — अप्रैल 14, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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