Gulabkothari's Blog

अप्रैल 15, 2009

कहां तक गिरेंगे

Filed under: Stambh — gulabkothari @ 7:00

आपने किसी स्कूल में दो बच्चों को झगडा करते देखा हैक् इसने मेरी पेन्सिल छीन ली। इसने मेरे कपडों पर स्याही छिडक दी। पहले इसने मुझे पागल कहा था-वगैरह-वगैरह। न उनको यह ध्यान रहता कि आस-पास कौन खडे देख रहे हैं, न ही यह कि आचार्य के सामने क्या उत्तर देंगे। आगामी लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में हमारे देश के राजनेता इसी तरह आपस में गुत्थम्-गुत्था हो रहे हैं। एक वाक् युद्ध का-सा वातावरण पूरे देश में दिखाई पड रहा है। इस बार तो बडे-बडों ने भी अपनी मर्यादाएं तोडकर व्यक्तिगत आरोप-आक्षेप लगाने शुरू कर दिए। नरेन्द्र मोदी कांग्रेस को बुढिया कहते हैं, तो प्रियंका को लगता है कि मोदी उससे अघिक कैसे गिर सकते हैं। कह देती है कि मैं उनको 125 साल की बुढिया लगती हूं। आडवाणी और मनमोहन सिंह दोनों ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखे जा रहे हैं, किन्तु दोनों के ही बयान सडक छाप हो गए। कोई चुप रहकर अच्छा प्रमाणित करने को आतुर ही नहीं है। लगने तो यह लगा है कि राज्य स्तरों पर भी यह चुनाव वाक्युद्ध प्रतियोगिता से जीता जाएगा।

क्या यही हमारे लोकतंत्र की अवधारणा रही हैक् दोनों बडी पार्टियों के घोषणा-पत्रों को ध्यान से पढें तो इस बार के और पिछले चुनावों के घोषणा-पत्रों में मूलत: कोई नीतिगत अन्तर नहीं निकलेगा। ये तो अब रस्म अदायगी मात्र रह गई है। कौन नेता अपनी घोष्ाणाओं की चर्चा करता है। सभाओं में तो सामने वाली पार्टियों पर केवल प्रहार करते हैं। देश के ज्वलंत मुद्दों पर किसी घोषणा-पत्र में कोई संकल्प नहीं है। आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा, चिकित्सा-सारे घोडे-गधे एक समान नजर आते हैं। पिछले 15-20 साल में किस सरकार ने क्या-क्या राष्ट्रव्यापी घोषणाएं की थीं, सब गायब हैं। बोफोर्स, सत्यम्, सवाल के बदले धन, महिला-आरक्षण, पेयजल आदि सभी मुद्दे गायब हैं। ऊपर से वंशवाद, जातिवाद को सभी हवा देते नजर आ रहे हैं। जातिवाद को हटाना चाहते हैं, किन्तु आरक्षण रखना चाहते हैं। आश्चर्य ही है। टिकिट देने के नियम सब बदल गए। कार्यकर्ता होने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई। धनवान हो और जीतने लायक हो, भले ही पिछली बार का हारा हुआ हो। लगता है कि ईश्वर भी भारतवासियों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। नेताओं की कसरत तो मात्र कुर्सी हथियाने की दिख रही है। देश को नेतृत्व देने की नीयत किसी की नहीं है। तीसरा मोर्चा सबसे आगे उतावला हो रहा है। परिणाम में केवल छाछ ही हमारे हिस्से आएगी, मक्खन तो निकलता नजर नहीं आ रहा। जो कुछ उम्मीद है वह मतदाता के लोकतंत्र के प्रति संकल्प को बनाए रखने से पूरी होगी।

गुलाब कोठारी

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2 टिप्पणियाँ »

  1. हिन्दी ब्लोग जगत मे आप का स्वागत है. मैने ये ब्लोग कुछ देरी से पढा लेकिन पढ कर अच्छा लगा.
    आपने एकदम सही कहा है. बल्कि हालात ये आ गये है कि स्कूल के बच्चे हमारे राजनेताओ से अच्छा बर्ताव कर रहे है. चाहे सन्सद हो या विधानसभा या नगर पालिका. हर जगह शोर शराबा. यहा तक कि निम्न स्तरीय भाषा का प्रयोग हो रहा है.
    किसी का सुझाव ये भी आया था कि जिस तरह से फ़िल्मो को सेन्सर किया जाता है वैसे ही सन्सद और विधान सभा की कार्यवाही को भी सेन्सर किया जाये.
    एक मुहावरा ये भी प्रचलित हो गया है कि नेताओ की तरह मत झगडो.
    मैने एक शिक्षक के मुह से शोर मचाती कक्षा मे ये कह्ते सुना कि क्लास को सन्सद समझ रखा है क्या.
    वक्त आ गया है कि हालात बदलने चाहिये. अभी भी पूरी उम्मीद है.

    दीपक

    टिप्पणी द्वारा दीपक — जून 29, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • खुद के बजाये देश की चिन्ता करेंगे,तभी हालात बदल सकते हैं।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — जुलाई 10, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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