Gulabkothari's Blog

अप्रैल 22, 2009

मैं और वह

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

मैं – आप क्या करती हैं
वह- अभी कुछ नहीं।
मैं- पहले क्या करती थीं
वह- पिताजी के मार्बल व्यवसाय में मदद। अब नहीं करती।
मैं- आजकल
वह- तीन मंजिले मकान को तैयार कर रही हूं। एक में रहती हूं। आय का जरिया भी तो होना चाहिए!
मैं- आप गृहिणी हैं
वह- नहीं।
मैं- तब क्या अकेली रहती हैं
वह- हां।
मैं- बच्चे कितने हैं
वह- शादी नहीं हुई।
मैं- कारण
वह- की ही नहीं।
मैं- क्या कोई लडका नहीं मिला।
वह- समझ में नहीं आया। कोई पढा-लिखा कम था, कोई असंवेदनशील।
मैं- लडकों का नजरिया आजकल कैसा है
वह- बहुत अच्छा नहीं है। वे सम्मान नहीं करते।
मैं- शादी तो करते ही हैं।
वह- करते हैं, किन्तु परिवार का सपना देखना कठिन है।
मैं- एक स्त्री एक आदमी को भी बांधकर नहीं रख सकती
वह- खुद भी बंधे रहना नहीं चाहती।
मैं- ईश्वर ने दोनों को आधा-आधा बनाया है। दो मिलकर ही पूर्ण होते हैं। अधूरा रहना कैसा लगता है
वह- लडका तो अच्छा होना ही चाहिए।
मैं- लडकियां भी तो बदल गई हैं।
वह- हां, अपने-आप जी सकती हैं। स्वतंत्र हैं।
मैं- समर्पण को तैयार हैं क्या घर-नौकरी छोडकर लडके के साथ रह सकती हैं क्या
वह- इससे सारी स्वतंत्रता चली जाएगी।
मैं- स्वतंत्रता और सुख में बडा किसे मानती हैं
वह- सुख बडा है, लेकिन गारण्टी नहीं है।
मैं- स्वयं पर भी तो भरोसा होना चाहिए।
वह- बडी रिस्क है। तैयारी नहीं होती।
मैं- क्या लडके बदल जाएंगे
वह- बहुत बदल चुके हैं। केवल कमाई की चिन्ता करते हैं। कमाई को स्वतंत्र रूप से भोगना चाहते हैं।
मैं- ऎसा तो हर युग में होता है।
वह- हां, किन्तु इतनी जल्दी-जल्दी जीवन साथी बदलने लगा है। बाद का समय बहुत कठिन हो जाता है।
मैं- भीतरी जुडाव क्यों नहीं संभव होता
वह- यही कारण है कष्टों का। लडकों में संवेदना नहीं है।
मैं- कौन सिखाता है आगे कौन सिखाएगा
वह- सिखाना तो मां को होता है।
मैं- तब मां ने सिखाना क्यों छोड दिया। इसीलिए तो उसकी संतानें दुख का कारण बन रही हैं।
वह- सही बात है। मां भी स्वतंत्र ही रहती है।
मैं- क्या आप मानती हैं कि मां बच्चे को पेट में सिखा सकती है
वह- कोई नहीं मानता। उस वक्त तो मौज-मस्ती का मूड होता है।
मैं- तब संतान भी मौज-मस्ती ही सीखती है। संस्कार कहां से आएंगे। संवेदना कैसे जागेगी
वह- क्या किया जा सकता है!
मैं- एक ही तो उपाय है। स्त्री ही आदमी को संवेदना का पाठ पढा सकती है।
वह- आजकल तो संभव नहीं है।
मैं- तब स्त्री को उसके हाथ में खिलौना बनकर रहना होगा।
वह- ऎसा ही दिखाई देता है। कष्ट में स्त्री ही रहती है।
मैं- क्योंकि वह स्त्री जैसी नहीं रही।
वह- क्या मतलब
मैं- वह भी लडकों जैसे जीना चाहती है। लडका भी लडके जैसे जीता है। वह लडकी जैसे जीना नहीं चाहता। शरीर अलग- अलग हैं, किन्तु भीतर दोनों लडके जैसे हो गए। फिर आकर्षण केवल शरीर का ही रह गया। यह भी समय के साथ कम होता ही है। साथ केवल भीतर की मिठास से चलता है। दोनों में ही नहीं रहेगा तो, टकराव होगा। आदमी में ईश्वर ने कर्म ही दिया है। आप लोगों को संतान पालना पडता है। घर के लोगों का ध्यान भी रखना होता है। लडके को भी बांधे रखना पडता है। मां-बाप को छोडकर आती हो। लडका भी छोड दे तो उसे भी मिठास से ही बांधकर रखा जा सकता है।
वह- मिठास होता तो है।
मैं- शब्दों का होता है। चतुराई का होता है। उसके जीवन का अंग बनकर व्यवहार करोगी, तब भीतर का मिठास जागेगा। दोनों अलग-अलग रहोगे तो भीतर का मिठास सोया रहेगा। भीतर के मिठास में सम्मान होता है। धैर्य होता है। अपनापन होता है। जैसा अपनी संतान के साथ दिखाई देता है।
वह- संतान के साथ सम्बन्ध अलग है।
मैं- वह भी जीव है। पति-पत्नी भी जीव हैं। सारे रिश्तेदार और मित्र भी जीव हैं। जिससे भी आप उस मिठास से बात करोगे, वह आपसे जुडा ही रहेगा। विश्वास बढेगा।
वह- उसे कैसे जगाया जाए
मैं- खुद के बजाए उसकी चिन्ता करो। हो सकता है कुछ दिन वह आपकी चिन्ता न करे, किन्तु जल्दी ही तस्वीर बदल जाएगी।
वह- कैसे बदल सकती है
मैं- आपके जुडाव से। शरीर सारे एक जैसे होते हैं। आप दस लडकों को चेहरा ढंककर खडा कर दीजिए, अब क्या अन्तर नजर आएगा। अन्तर तो चेहरे के आकार का ही था। शरीर रचना भी सब की एक सी होती है।
वह- समझ कैसे दिखेगी अन्तर उसमें ही होता है।
मैं- समझ का अन्तर गलत भी हो सकता है। अन्तर तो शरीर के भीतर रहने वाले का है। उसे कोई जानता नहीं है।
वह- फिर क्या मतलब निकला
मैं- उसे जानने के बजाए पहले समझना पडता है। घर में एक कुत्ता पालते हैं, तब कैसे व्यवहार करते हैं। इतना प्यार से हम उस व्यक्ति के साथ नहीं रहते। अपना अस्तित्व अलग मानते हैं। उसके कारण हमारा भी विकास होता है, कहां मानते हैं। इसीलिए उसमें गलतियां ही ढूंढते हैं। अच्छाइयां सारी छोटी लगती हैं। उसकी अच्छाइयां विकसित करने में मदद कहां करते हैं। आलोचना के कारण तो दूरियां जल्दी बढती हैं। यही तो हो रहा है।
वह- शुरूआत कैसे हो
मैं- शुरूआत स्त्री करती है। इसीलिए पीहर छोडकर आती है। भीतर के जीव को प्रेम में बांधती है। फिर उसके अच्छे गुणों का विकास करके अच्छा आदमी बनाती है। यही माया-भाव है। जीवन संचालन उसी के हाथ में है। पुरूष को भी वही ढालती है। प्रेम के मिठास से। यदि उसका जीव भी पशु भाव में है, तब उसका अहंकार इस तथ्य को स्वीकार नहीं करने देगा। स्वयं का अलग अस्तित्व मानकर चलेगी। पुरूष ठीक नहीं होगा। संतान भी पशुभाव से अहंकार-युक्त रहेगी।
वह – आपकी बात ठीक हो सकती है, किन्तु कठिन भी है।
मैं – पैदा हुए हैं, तो अण्डे से बाहर तो निकलना पडेगा। इसके बिना जीवन शुरू कैसे होगा। अण्डे में रहना तो मरने जैसा है। इस खोल को तो तोडना पडेगा।
वह – समझ में नहीं आया। हम तो जो बाहर दिखाई देता है, उतना ही समझते हैं। भीतर कैसे देखा जाए
मैं – जीवन को सार्थक बनाने का पहला सूत्र है कि हमारे सामने जीवन का लक्ष्य स्पष्ट हो। इसके बिना किस मार्ग पर चलना है, तय नहीं कर पाएंगे। शरीर को कौन चलाता है। इच्छा कहां और कैसे पैदा होती है। इसको पूरी करने का निर्णय कौन करता है। इच्छा को कब और कैसे दबाया जाता है। इस तरह के प्रश्नों पर विचार करें, तो एक दिन अपने मूल प्रश्नों का उत्तर भी मिल जाएगा।
वह – इसमें दूसरा कहां जुडा
मैं – किसी को अपना बनाने के लिए हमें भी किसी का होना पडेगा। अपने बन्द ह्वदय को खोलना पडेगा। अपना बूता तैयार करना पडेगा। अपने अलावा जिसे अपना बनाना है, उसके लिए भी जीने की तैयारी दिखानी पडेगी। यह मन की दुनिया है। दिमाग तो केवल कमियां ढूंढता है, अभाव ढूंढता है, टकराव ढूंढता है। प्रेम नहीं ढूंढता। न ही प्रेम करने देता है। ज्ञान को हम विषय के साथ ही देखते हैं। स्वयं से जोडकर नहीं देखते। ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता जहां साथ हैं, जीवन के हर प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। ज्ञाता बाहर क्यों रह जाता है
गुलाब कोठारी

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