Gulabkothari's Blog

अप्रैल 22, 2009

निषेध

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

मानव मन की अपनी गति होती है। बहुत तेज गति। अच्छा करता तो भी बहुत तेजी से, गलत करता है तो भी बहुत तेजी से। मन की दूसरी विशेषता है कि यह नित नया चाहता है। पुरानापन सुहाता ही नहीं है। सुबह जो सब्जी अच्छी लगी, शाम को भी बनाई जाए तो खाने का मन नहीं होगा। आज जो कपडे अच्छे समझकर पहने, कल नहीं पहनेंगे। यह तो रोज की साधारण घटनाएं हैं। कोई वस्तु बहुत सुन्दर लगी, खरीद लाए। पांच साल बाद घर में भी है या नहीं, किसको पता। उसके बाद तो न जाने कितनी और वस्तुएं आ गइंü और विस्मृत हो गई। यह कह सकते हैं कि ये वास्तव में अच्छी नहीं थीं। क्षणिक प्रभाव में खरीदी गई थीं। हमारे गुरूजी कहा करते थे कि व्यक्ति जब जीवनसाथी अपनी मर्जी से चुनकर लाता है। इसलिए कि मन को बहुत प्रिय लगता है, तब निश्चित है कि एक दिन मन उससे ऊब भी जाएगा। यह उसका स्वभाव है। कारण में जाने से भी इसका उत्तर नहीं मिलता। मन को नया चाहिए। नहीं तो अपने मन पर व्यक्ति का पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। यथार्थ दृष्टि होनी चाहिए।
इसी तरह मन स्वच्छन्द भी रहना चाहता है। किसी का अंकुश इसे स्वीकार्य नहीं होता। मनमर्जी चलाना चाहता है। आप रोकने का प्रयास करके देख लीजिए, प्रतिक्रियावादी नजर आएगा। बच्चा हो, बडा हो, कोई अन्तर नहीं पडता। आप बच्चे को सिखाते हैं कि ऎसा करो, ऎसा मत करो। अवसर मिलते ही वह निषेध को तोडने का प्रयास करता है। पुरानी और नई पीढी में एक बडा अन्तर स्वच्छन्दता का ही है। इसको समझने के लिए किसी दादा-पोते को बात करते देख लेना चाहिए। विचारों में इतना अन्तर आ गया है कि एक ही संस्कृति/ परिवार के नहीं जान पडते। जिन-जिन मर्यादाओं के साथ दादाजी जीकर चले हैं, पोता किसी को भी मानने को तैयार नहीं होता। पोते की जो मंाग होती है, वह दादाजी के गले नहीं उतरती। दादाजी की मर्जी भी नहीं चलती। पोता अपनी मर्जी का करा लेता है। नहीं तो आप उसकी प्रतिक्रिया देखकर अनुमान लगा सकते हैं कि वह दादाजी के सम्मान के बजाए अपनी बात मनवाने के लिए क्या रूप बना सकता है।
आज आप अपने बच्चों को जैसे-तैसे मनाकर किसी धर्म गुरू के पास ले जाइए। देखिए, उसके सामने कितने प्रश्Aों की झड लग जाती है। क्या वह नित्य पूजा-पाठ करता है। माला जपता है। शास्त्र पढता है। मांस खाता है। मद्यपान करता है। एक तरह का लम्बा-चौडा साक्षात्कार झेलना पडता है। फिर झडी लगती है निषेध रूप आदेशों की। तुम्हें यह नहीं करना चाहिए, ऎसा नहीं रहना चाहिए, वगैरह-वगैरह। ब“ाा और कुछ करे या नहीं करे, यह संकल्प तो कर ही लेता है कि यहां दुबारा नहीं आना। इतने निषेध तो मां-बाप से भी स्वीकार नहीं कर सकता। स्कूल के अध्यापक से भी नहीं। उसके मन में प्रतिक्रियाओं का एक तूफान खडा हो जाता है। कैसे धर्म को निषेधात्मक बना दिया। वैज्ञानिक धरातल पर उसकी जिज्ञासाओं को शान्त नहीं किया जाता। धर्म को मुक्त होने का मार्ग भी कहते हैं, और चारों ओर से जकडने का प्रयास भी होता है। धर्म को प्रवृत्ति मार्ग पर चलाने के बजाए निषेधात्मक बना दिया जाए, तो किसी का मन निषेध स्वीकार नहीं कर पाएगा। एक ब“ाो को घर में, स्कूल में भी तो सिवाय निषेध के और क्या मिलता है सकारात्मक बोध तो स्वयं मां-बाप एवं अध्यापकों के पास भी नहीं है। अधिकांश संन्यासी भी अपनी चिन्ताओं से मुक्त नजर नहीं आते। इन सबके सामने भी कई प्रकार के निषेध होते हैं। भीतर मुक्त होने के लिए छटपटाते हैं। मन ने जिस मार्ग को कभी स्वीकार कर लिया था, वह भी ऊब जाता है। केवल लोक मर्यादा के कारण रस्म अदायगी करता रहता है। बाहर से भले ही शान्त बना रहे, भीतर एक तूफान बना रहता है। इसकी स्वीकारोक्ति से भय लगता है।
मानव मन इस भय से सदा त्रस्त रहता है। एक तो मृत्यु का भय उसका पीछा नहीं छोडता। फिर मर्यादा के कारण उसे भीतर कडवे घूंट पीने पडते हैं। मर्यादाओं को चुनौती देने का साहस भी नहीं। अत: भीतर एक ग्लानि सी सदा बनी रहती है। सुखी कहां हो सकता है। मर्यादा के नाम पर, निषेधों के साथ बंधकर एक विरोधाभास में, एक द्वन्द्व में जीना लाचारी हो जाती है। व्यक्ति जैसा चाहता है, वैसा जी नहीं सकता। फिर मानव जीवन की सार्थकता क्या
प्रश्न यह है कि क्या व्यक्ति केवल दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए पैदा होता हैं। क्या भीतरी भाव के विरूद्ध, जीने की लाचारी स्वीकार कर लेना उचित है क्या अपनी भावनाओं का विरोध करके जी सकते हैं कभी संभव ही नहीं है। आज हमारे देश में शिक्षा ने पश्चिम की स्वच्छन्दता को प्रश्रय देकर देश के साथ अन्याय ही नहीं विश्वासघात किया है। धर्म ग्रन्थों के स्वरूप भी निषेधात्मक होते जा रहे हैं। इसके कारण कट्टरवाद को बढावा मिला है। आज स्थिति यहां तक पहुंच गई कि मेरा ब“ाा मुझ से अहिंसा के बारे में पूछे, तो मेरे पास उत्तर नहीं होता। मैं उसको हिंसा अच्छी तरह समझा सकता हूं। फिर कहूंगा कि हिंसा से बचो और अहिंसक बन जाओ। परिग्रह से दूर रहो, अपरिग्रही बन जाओ। धर्म का स्वरूप जीवन में क्या है, कैसे काम करता है। मुझे समझ में नहीं आता। पर मुझे अपना धर्म बहुत ही उत्तम लगता है। बच्चों से कहता हूं कि अपने वाला श्रेष्ठ है। अन्य किसी के जाने की जरूरत नहीं है। यही निषेध कट्टरता लाने लगा है। मुझे यह भी पता नहीं कि जिसे मैं धर्म मान रहा हूं, वह भी धर्म है या नहीं। धर्म और सम्प्रदाय का भेद भी नहीं मालूम। पर निषेध जीवन में हावी हो गए। मन की प्रतिक्रियाएं थमने का नाम नहीं लेतीं। और मन में साहस भी नहीं दिखता कि मैं इनसे मुक्त हो जाऊं।
निषेध मानव मन के लिए बहुत बडी चुनौती है। इसे सहन कर लेना भी आसान नहीं है, और इसको तोडकर जीने का अभ्यास भी कठिन लगता है। तब व्यक्ति क्या करे अपने मन को समझें और उसे समझाएं। मन को पटु बनाएं। मन में उठने वाली कामनाओं का आकलन करें। उनको यथार्थ मूलक दृष्टि से समझने का प्रयास करें। अपनी इन्द्रियों की आसक्ति का आकलन करें। निषेधों को किस प्रकार सकारात्मक भाव में रूपान्तरित करके विकास में काम लें। जीवन के प्रति श्रद्धा का भाव कैसे पैदा किया जाए। विधार्थी दृष्टि का विकास कैसे हो। मन सदा अज्ञात के पीछे भागता है। ज्ञात उसे अधिक समय तक बांध नहीं सकता। क्या यह संभव है कि व्यक्ति ज्ञात को छोड दे। उसके प्रति आसक्त न रहे। उसके बिना मन कभी वर्तमान में टिक ही नहीं सकता। वर्तमान से ही मेरा भविष्य तय होता है। वर्तमान में स्थिर होते ही मेरा स्वयं पर नियंत्रण होने लग जाएगा। निषेधों के द्वन्द्व भी समाप्त हो जाएंगे।
गुलाब कोठारी

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