Gulabkothari's Blog

अप्रैल 22, 2009

कन्या

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

सचमुच माया को समझना टेढी खीर है। कहते हैं कि देवताओं के भी बस की बात नहीं है। शक्ति है, ऊर्जा रूप है, सृष्टि-विकास करती है, इसका पोषण करती है और संहार भी माया ही करती है। हम सब माया के हाथों में खिलौने हैं। मानें, चाहे न मानें। घर में एक कन्या का जन्म हुआ। नई पीढी को देखकर सब बहुत आनन्दित थे। सभी ने तय किया कि इसका जन्मोत्सव मनाएंगे। लडका होता तो पडदादी को सोने की सीढी चढाते। इस बार भी चढाएंगे। कुछ देर लगी समझने में, कि कौन बोल रहा है। कहां से आई यह सारी ऊर्जा! ध्यान माया की ओर गया और मन में हल्की-सी मुस्कान आ गई। पड बाबा की पुण्यतिथि और पिता की जन्म तिथि पर आई है। चमत्कार दिखाने शुरू कर दिए। उसी दिन टी.वी. पर इसके जन्म का भी समाचार आ गया। सेलेब्रेटी बन गई। इस सारी घटना ने मुझे माया के इस रूप पर नए सिरे से चिन्तन करने को विवश कर दिया। जितना सोचता गया, उतना ही नया विस्तार दिखाई देता गया। हारना तो था, किन्तु खाली नहीं लौटा। हो सकता है आगे कुछ नए मार्ग भी खुलें।
पहला शब्द मन में उठा-कन्या। आखिर क्या अर्थ है इसका और क्या भूमिका है जीवन में कन्या की। दो महत्वपूर्ण अनुष्ठान जुडे हैं, इस शब्द के साथ-कन्या पूजन और कन्यादान। शायद इन दो शब्दों में छिपा है मानव संस्कृति का स्रोत। भारत के बाहर कहीं भी ये शब्द सुनाई नहीं देते। इन शब्दों में व्यक्ति की आत्मा जुडी है। शायद इसीलिए कन्यादान के बाद में जब भी घर मेे कोई अनुष्ठान होता है, बहन-बेटी के हाथ से आरती कराई जाती है। घर की पवित्रतम सदस्य होती है। आशीर्वाद के अलावा उससे कुछ भी नहीं लिया जाता। क्षमता के अनुसार कुछ देने का ही प्रयास रहता है। “कन्या” शब्द में “क” शक्ति का सूचक है। “य” नियंत्रण का और “न” नाद रूप ऊर्जा का। सृष्टि का उद्भव (हमारी सृष्टि का) नाद अर्थात आकाश से होता है। नाद वायु रूप ऊर्जा है और आकाश पदार्थ रूप है। नाद को आकाश की तन्मात्रा (शक्ति) कहा जाता है। नाद से शब्द सृष्टि, अंगिरा प्राण से, सरस्वती का क्षेत्र होती है। आकाश भृगु प्राण से पदार्थ रूप लक्ष्मी के क्षेत्र का विस्तार करने वाला होता है।
शक्ति माया रूप है। ब्रrा की सम्पूर्ण सृष्टि के स्वरूप माया बनाती है। प्रकृति के नियमों के अनुसार कर्म फल भी माया देती है। प्रकृति माया ही है। प्रारब्ध माया लिखती है। वैसे ही कर्म भी कराती है। हमारे यहां सभी देवियों को कन्या रूप में पूजा जाता है। कुछ कामनाओं के लिए ही उनका पत्नी रूप पूजनीय होता है। आद्या काली को भी षोडशी कहा है। ऊर्जाओं का घनीभूत रूप। इसमें सृष्टि करने की क्षमता है। सृष्टि के संरक्षण और संवर्धन की क्षमता है। अत: कन्या को देवियों का प्रतिनिधि माना गया है। पृथ्वी के 240 तक मकर रेखा और 240 (अंश) पर कर्क रेेखा है। सूर्य और चन्द्रमा इन 480 के मध्य भ्रमण करते हैं। आकाश का आधा भाग सूर्य के प्रकाश में और आधा चन्द्रमा के प्रकाश में रहता है। चन्द्रमा हमारा पितर लोक भी है और मन का स्वामी भी है। चन्द्रमा सेाम लोक है। संकुचन इसका स्वभाव है। सोम अगिA में आहूत होकर जलता है और नई सृष्टि का निर्माण करता है। इसी चन्द्र भाग के आधे संवत्सर से कन्या का स्वरूप निर्माण होता है। सूर्य के अर्द्ध भाग से बालक का। सूर्य के अंश को बुद्धि कहते हैं। चन्द्रमा का अंश मन कहलाता है। पृथ्वी अंश शरीर है। सारे शरीर पुरूष कहलाते हैं। जहां बुद्धि का रूप विकास होता है, सूर्य खण्ड के कारण, वहां नर रूप उष्णता के साथ विकसित होता है। चन्द्रमा के कारण नारी भाव एवं मन का विकास होता है। दोनों के योग से ही अगिA-सोमात्मक सृष्टि निर्मित होती है।
कन्या का विकास किसी भी रूप में हुआ होगा, उसे विवाह के बाद पति के घर जाना है। अकेले। यह क्षमता नर में नहीं है। माता-पिता तन-मन-धन से कन्या का पालन-पोषण करते हैं। आपस में कर्मो का भोग करते हैं। माया भाव स्वयं को परिपूर्ण करता है। विवाह में “कन्यादान” के कारण उसके लौटने का मार्ग भी बन्द हो जाता है। जो कुछ उस पर समर्पित किया गया, उसे लेकर पति के घर को माया भाव से नया रूप देती है। उसे अगिA को समर्पित होना है। सौम्या है। कन्या के कारण मां-बाप उसके ससुराल वालों के लिए तपते हैं। पूर्ण निष्ठा के साथ। ऋण चुकाने के भाव से। कितना भी प्यार करें कन्या को, फिर भी लगता है वह जाएगी। कन्या के साथ परिवार की शक्तियों, यश, पितृ-प्राणों, देव-प्राणों का भी रूपान्तरण होता है। अब तक स्वयं को ध्यान में रखकर विकास पा रही थी। अब स्वयं को भूलने की पारी है। क्षुधा बनकर पति के जीवन में माया का यह प्रवेश, वानप्रस्थ आने तक रहता है। और फिर माया रूप छोड जाता है।
यह माया का क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, लज्ाा, लक्ष्मी और वृत्ति का काल है। पति का पौरूष जगाने से लेकर दाम्पत्य रति भाव को स्थाई रूप देने का कार्य करती है। किसी का सहारा नहीं लेती। सहारा मिलते ही कमजोर हो जाती है। चाहे मां-बाप का ही हो। माया भाव तो नर में भी काम करता है, किन्तु वह जीवन के इतने आयाम समझ ही नहीं पाता। परोक्षा वै देवा:। माया की भाषा भी परोक्ष ही रहती है। पूरी उम्र स्वयं को देव कोटि में बनाए रखती है। मां-बाप द्वारा दिए गए शरीर-मन-बुद्धि को पति के घर में लगाकर अपने आत्मभाव में जीती है। दया, तुष्टि और मातृभाव की त्रिवेणी बनती है। चन्द्रमा के प्रभाव से कन्या ही स्त्रैण बन सकती है। पुरूष का स्त्रैण बनना दुर्लभ है। हमारे सारे शास्त्रों का लक्ष्य इसी नर भाव को स्त्रैण बनाना है। अहंकार छूट जाए, समर्पण आ जाए। यह भी सच है कि नर कभी स्त्रैण बनने में सफल हुआ तो वह भी पत्नी के कारण ही हो पाता है। हां, उसके पास व्यवसायिका बुद्धि होनी चाहिए। नर-नारी के शरीरों में सात-सात पीढियों के अंश होते हैं। इन पितृ प्राणों को, देव प्राणों को मुक्त करने में सहायक होती है।
संस्कारवान कन्या पीछे मुडकर नहीं देखती। विवाह के बाद से ही उसका माया रूप दिखने लगता है। पति को प्रेम सिखाती है। अच्छी आत्मा का घर में प्रवेश हो, इसके लिए प्रार्थना करती है। जीव प्रवेश के बाद उसे अपने सपनों का अभिमन्यु बनाती है। अपने पंखों में समेटकर नहीं रखती। आकाश को नापने के लिए प्रेरित करती है। समाज के लिए यशस्वी संतान दे सकती है। बुद्धिमान पुरूष को स्त्रेह के साथ भावनात्मक धरातल पर लाती है। आस्था सिखाती है। सारा कार्य वही तो कर रही है। शिक्षित नारियों का तो भावनात्मक धरातल बहुत नीचे आ जाता है। वे पति से स्पर्द्धा में लगी होती हैं। अहंकार के कारण। दोनों ही पुरूष जैसे व्यवहार करते हैं। विवादों में चर्या चलती है। अत: दूर हो जाते हैं। विश्व भरा है ऎसे उदाहरणों से। यह कन्या का शक्ति रूप ही है जो विश्व को शान्ति की संस्कृति दे सकता है।
गुलाब कोठारी

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