Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2009

अहंकार

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

br/>जीवन हमारा शब्दों से भरा है। अपने शब्द, महापुरूषों के शब्द, शास्त्रों के शब्द, मीडिया और शिक्षा के शब्द, समाज के शब्द। कहीं ओर-छोर दिखाई नहीं पडता शब्द जाल का। मार्ग मिले कैसे आगे जाने का। हम कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। हर शब्द का अवसर के हिसाब से अर्थ निकालते जाते हैं। चलते जाते हैं। हमारा अहंकार शब्दों के आगे जाने नहीं देता। कहेगे विनम्रता, झुकेंगे भी, हां में हां भी भरेंगे, किन्तु करने में अहंकार भी होगा, रूखापन भी होगा और जरूरत लगी तो टकराव भी हो जाएगा। विषय कोई भी हो, मनोदशा वही रहेगी। समर्पण तो बहुत दूर होगा। वैसे भी समर्पण जीवन का सबसे कठिन कार्य है।
जीवन के दो ही मुख्य पहलू हैं। एक है-लेने का भाव और दूसरा है-देने का भाव। देना ही जीवन का विस्तार कहलाता है और लेना संकुचन का भाव होता है। देना पुरूष का भाव, लेना प्रकृति का भाव। देना कठिन लगता है। लेने के लिए कुछ करना नहीं पडता। समर्पण का अर्थ है-सर्वस्व दे देना। स्वयं को भी दे देना। केवल लेने वाला ही बचे। देने वाला शेष ही न रहे। इसको तो सोच पाना भी कठिन है।
अहंकार आदमी को झुकने ही नहीं देता। यह तो खुद को ही बुद्धिमान मानता है। सामने वाले को मूर्ख साबित करने का प्रयास करता रहता है। झुकने के लिए विनयशीलता चाहिए। विनयशीलता के लिए आत्मबोध का होना जरूरी है। तब जाकर अहंकार का धरातल कुछ घटता है। अहंकार एक ऎसा शिखर है जिस पर चढने से धरती के सभी लोग छोटे दिखाई पडते हैं। अहंकारी को जब ठोकर लगती है, तब सीधा धरती पर ही गिरता है। तब उसे सब बराबरी के जान पडते हैं। शिखर पर पहुंचकर भी रहता अकेला ही है। साथ कौन दे!
अहंकार ऎसा द्वारपाल है जिसके रहते उत्थान भीतर प्रवेश ही नहीं कर सकता। काला भूत है। इसके रहते व्यक्ति स्वयं की किसी कमजोरी को जान ही नहीं सकता। अहंकार समूह में भी नहीं रहने देता। सामूहिक वातावरण में अहंकार नीचे रहता है। समझा जा सकता है। अकेले व्यक्ति का अहंकार बढता ही जाता है। उसकी अपेक्षाएं बढती ही जाती हैं। अपेक्षाएं पूरी नहीं हों, तो क्रोध बढता है। पूरी हो जाएं तो तृष्णा तैयार है। स्वयं की सफलता मानकर फूलने लग जाता है। सब कुछ होकर भी शान्ति का भाव रहता ही नहीं। यहां तो उग्रता, प्रतिक्रिया, आलोचना, आक्रमण जैसे विषयों का ही साम्राज्य रहता है। ऎसे व्यक्ति का मन भी चंचल ही रहेगा। वह भीतर की ओर देखना भी पसन्द नहीं करता। आत्मा पर विश्वास नहीं करता।
जीवन में कर्म की सीमा है। ज्ञान की सीमा है। ईश्वर की भी सीमा है। उसके ऊपर भी परमेश्वर और महेश्वर बैठे हैं। अहंकार की सीमा नहीं है। बुद्धि का निर्माण अहंकार से होता है। बुद्धि जितनी विकसित होगी, उतना अहंकार बढता जाएगा। मन कभी तुष्ट नहीं हो पाएगा।
प्रेम जीवन का रस है। ईश्वर का पर्यायवाची होता है। इसलिए इसमें केवल देना, चढाना, अर्पण करना, विनम्र भाव से रहना आदि जुडे होते हैं। लेना तो चर्चा का विष्ाय भी नहीं होता। अहंकार और प्रेम विरोधी भाव हैं। अहंकार मेें व्यक्ति बच्चों से भी बात करेगा, तो उनको अपनी सम्पत्ति मानकर करेगा। पत्नी से भी करेगा, तो अघिकार के रूप में करेगा। प्रेम रूप वहां ठहर ही नहीं सकता। अघिकार या सम्पत्ति मान लेना इस बात का संकेत है कि वह इनको निर्जीव मान रहा है। वस्तुओं की तरह इनसे व्यवहार कर रहा है। स्वयं के साथ बांधकर रखना चाहता है। मुक्त नहीं रखना चाहेगा। ये लोग भी भयभीत होकर व्यवहार करेंगे। अपना धर्म निभाएंगे। ताकि अनावश्यक डांट-डपट को टाला जा सके। इनके व्यवहार में मिठास नहीं हो सकता। फिर प्रेम कहां होगा आपस मेंक्
धर्म और प्रेम भी पर्याय हैं। दोनों ही मुक्ति के मार्ग हैं। बन्धन-मुक्त करते हैं। जहां बन्धन है, वहां न धर्म है, न प्रेम। दोनों तो भीतर रहने वाले तžव के नाम हंै। बाहर से जुडकर इन तक आसानी से नहीं पहुंच सकते। इनके आधार पर बाहर देखेंगे, तब धर्म या प्रेम दिखाई देगा। जीवन का अघिकांश समस्याएं बांधकर रखने के कारण होती हैं। बंधने वाला मुक्त होने के लिए छटपटाता है। बच्चों को मर्जी से जीने नहीं देते। जो हमें सही लगे, वही उनसे भी करवाना चाहते हैं।
ईश्वर का प्रसाद तो उनको मानते ही नहीं। किसको याद रहता है कि चार माह के बच्चे के भीतर भी आत्मा तो पुरानी है। वह मां-बाप के व्यवहार को देख रही है। समझ रही है। प्रतिक्रिया भी कर रही है। मां-बाप उसे छोटा समझकर नकार देते हैं। जब बालक पेट में रहकर भी अभिमन्यु की तरह सीख सकता है, तब पैदा होने के बाद नहीं सीखेगाक् वह तो मां-बाप के आपसी व्यवहार को भी देखता, समझता है। प्रेम और धर्म की भाषा जानता है। समझदार होने के बाद इन्हीं भावों की प्रतिक्रिया प्रकट होती है। मां-बाप से बच्चे इसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। व्यक्ति अपने कर्म ही भोगता है। बच्चे की छटपटाहट उसे मां-बाप से दूर ले जाती है।
पति-पत्नी के बीच भी मूल में झगडा अहंकार का ही होता है। अघिकारों का और बंधे रहने का ही होता है। एक-दूसरे की सम्पदा बन जाने का। यहां प्रारब्ध को हम भूल जाते हैं। पिछले कर्मो के फल भी हमें भोगने हैं, यह किसको याद रहता है। इसीलिए प्रेम को भूलकर बन्धन की बात करते हैं। बन्धन में प्रेम पैदा ही नहीं हो सकता। उसे तो मुक्त भाव से ही सींचना पडता है। उसमें तो केवल देना पडता है। लेने का अपेक्षा भाव तो निराशा के अलावा कुछ दे ही नहीं सकता। इससे क्रोध को हवा मिलती है। अहंकार पल्लवित होता है। प्रेम तो और घट जाता है। अपने बजाए दूसरे के कार्यो की समीक्षा होती है। जैसे आप अपने किसी कर्मचारी के काम की समीक्षा करते हंै। इस व्यवहार से सामने वाले को निश्चित ठेस पहुंचती है।
सुख का सूत्र है देना। हंसते हुए देना। लेने का भाव न रहे। तब व्यक्ति झुकता है। तब व्यक्ति को समझ में आता है कि जैसा मेरा व्यवहार होगा, वही लौटकर मुझको प्राप्त होगा। तब यह भी समझ आएगी कि प्रेम से दुनिया का हर प्राणी गला कटवा सकता है। इससे भी महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अपना व्यवहार ही दूसरे में परिलक्षित होता है। खोटे व्यवहार से मैं अपने साथी का व्यवहार भी खोटा करता हूं। साथी की खोट तो दिखाई पड जाती है। किन्तु अहंकार के कारण स्वयं की खोट दिखाई नहीं देती।
मां को सदा ब“ाा ही दिखाई देता है। वह स्वयं को भूल जाती है। शरीर का, वस्त्रों का किसी का भी ध्यान नहीं आता। यह भी तो प्रेम ही है। उसको प्रेम करना आता भी है। तब ऎसा ही प्रेम सबसे क्यों नहीं हो सकताक् अहंकार के कारण। बच्चे के आगे अहंकार नहीं ठहरता। उससे कुछ अपेक्षा भी नहीं रहती। प्रेम बस प्रेम। यानी, खुद को भूलो, तब प्रेम का पता चलेगा। जब तक खुद को नहीं भूलेंगे, तब तक अहंकार हावी रहेगा। जीवन के थपेडे, खाते-खाते एक स्थिति ऎसी बनती है कि व्यक्ति ईश्वर को या अपने से अलग किसी सत्ता को स्वीकार करने लगता है। तब तक उम्र का निर्माण काल बीत चुका होता है। जो कुछ निर्मित किया, वह भी किसी अन्य के काम नहीं आ सकता। यही अहंकार का फल है। व्यक्ति खाली हाथ ही लौटता है।

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