Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2009

बसंत

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

बसंत आया
पर देर से,
कुछ और पहले
आता तो
बदल जाती
चमन की फिजां,
अब कहां है
बागबां
और वो
शोख-ए-चमन,
जो बह रहा
हर फूल में
हर पेड में।
दूर,
बहुत दूर
बनकर फरिश्ता
बादलों के बीच
बैठा ले रहा
खुशबू चमन की,
और मेरे हाथ
कांटे ही कांटे
किसको बांटे
यह धरोहर,
ये तो बस
उपयोगी हैं
मेरे लिए,
खोल सकता हूं
मैं परतें
देह की
खिडकियां
विचारों की,
सूक्ष्म आवरण
आत्मा के,
फल तो कुछ
आना नहीं
इस पेड पर,
हाँ, गंध है
थोडी बची
इस गात में,
इंतजार है
उस हवा के झौंके का,
फैला सके
इस गंध का
प्रसाद जग में
मेरे
मुरझाने से पहले,
समर्पित हो सकूं
हर चरण में,
जिसने दिया
उसको ही पहुंचूं।
कठिन है यात्रा
सारी,
बसंत कुछ
देर से आया,
पक चुके कांटे
उसके पहले ही,
फूल भी
नहीं काम आया,
धूप में तपता
बदन
गिन रहा है
वक्त जाने का,
बहुत कम है
हाथ में,
झड रहे पत्ते,
ऎ हवा,
ले उडों, इस गंध को
लेजा सको तो।
फूल का रिश्ता
बना
मधुमास से,
तुम्हारा प्रेम ही
मधुमास है।
भूल होती है
सभी से, पर
तुम्हारी बेरूखी
बनवास है।
कभी बनकर
कभी तनकर कहे
कुछ तुम्हारा अहंकार,
बेडियाँ सी
लगने लगती,
मानो
जीवन कारावास है।
इससे तो अच्छी
विरक्ति
जिसमें एक
संन्यास है
चीर देते शूल
देह सारी फूल की,
विष उगलते
फूल भी सब
जगत में
बस त्रास है।
नेह की वर्षा
सुगंधी प्रेम हो
उम्र भर, प्रिय तुमसे
एक यही आस है,
तुम्हारा प्रेम ही
मधुमास है।

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