Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2009

सुख-दु:ख

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

वन कभी एक-सा नहीं रहता। नदी की तरह बहता रहता है। कभी पहाडों से, कभी जंगलों से, तो कभी मैदान से। इन्हीं बदलती परिस्थितियों को हम सुख-दु:ख कहते हैं। ये दोनों तो नदी के किनारे हैं। कभी पानी एक ओर टकराता है, कभी दूसरे किनारे से। किनारे पास भी हो सकते हैं और दूर-दूर भी। नदी है तो किनारे रहेंगे जरूर। इनसे भाग तो सकते नहीं हैं। हमारा जीवन द्वैत पर आधारित है। अत: सुख से जीने का मार्ग इस द्वैत में अद्वैत को देखकर जीना है। सत्व गुणी अहंकार से इन्द्रियां पैदा होती हैं और तमोगुणी अहंकार से इन्द्रियों के विषय। अत: दोनों अलग-अलग जान पडते हैं। मूल में एक ही होते हैं। सुख और दु:ख भी मूल में एक ही होते हैं। हमारी दृष्टि का ही भेद है।
प्रकृति में भी अच्छा-बुरा, सुख-दु:ख जैसा कोई भाव नहीं होता। यह तो मात्र हमारी शब्दावली है। हमारे मन की अवधारणा है। प्रकृति हर कर्म का फल देती है। फल तो फल ही है। इसमें न कुछ अच्छा है, न ही कुछ बुरा होता है। एक व्यक्ति है। न वह अच्छा है, न बुरा है। बस व्यक्ति है। मेरे उसको अच्छा-बुरा कहने से वह बदलेगा तो नहीं। क्योंकि वह न अच्छा है, न बुरा। हां, किसी को अच्छा लग सकता है और किसी को बुरा। यह भी हो सकता है कि कुछ दिनों बाद उसके बारे में धारणा ही बदल जाए। मुझे वह व्यक्ति अच्छा लगेगा, तब मुझे उसके दोष दिखाई नहीं देंगे। बुरा लगेगा, तब उसके गुण दिखाई नहीं देंगे। इसका अर्थ हुआ कि मेरी अवधारणा ने मेरी ही दृष्टि को दूषित किया। मेरी आंखों पर एक रंग का चश्मा चढा दिया। मेरे आगे के सारे निर्णय गलत ही होंगे। कम से कम सही तो नहीं होंगे।
जब मैं व्यक्ति को अच्छा मानूंगा, तो उससे मिलकर सुख का अनुभव करूंगा। बुरा माना, तो उसे देखकर मन खिन्न होगा। यथार्थ यह है कि दोनों ही मार्ग सही नहीं हंै। हमारी स्थिति ऎसी हो गई है कि वर्तमान में जीना नहीं जानते। वर्तमान को भी अतीत और अनागत से जोडकर देखते हैं। जो व्यक्ति अच्छा या बुरा लग रहा है, वह अतीत के अनुभवों के कारण ही तो लगता है। वर्तमान का व्यवहार तो अभी किया ही नहीं है। बिना अभी का व्यवहार देखे हम उसे अच्छा या बुरा मानकर सुखी या दु:खी हो रहे हैं।
मुझे धन बहुत अच्छा लगता है। नोट देखते ही मेरे चेहरे पर प्रसन्नता छा जाती है। अभी-अभी किसी ने मेरे हाथ में एक हजार रूपए की गaी रख दी। मेरी प्रसन्नता का पार ही नहीं। उसको पकडे-पकडे मैं कितनी देर बैठा रह सकता हूं। आधा घण्टा, एक घण्टा। यदि मैं हाथ में रखने को बाध्य कर दिया जाऊं, तो मेरा सारा सुख काफूर हो जाएगा। दो-तीन घण्टों में तो लगने लगेगा कि इसे फेंक दूं। पहले ज्यादा सुखी था। यही जीवन की सचाई है। हर बात में सुख और दु:ख साथ रहते हैं। परिस्थितियों का भेद मात्र काम करता रहता है। एक व्यसनी को सबसे बडा सुख अपने व्यसन में लगता है। आगे जाकर वही दु:ख का कारण बन सकता है। आप किसी व्यक्ति, किसी घटना या परिस्थिति को देख लें। सब में सुख और दु:ख साथ दिखाई देंगे। यहां तक कि दुर्घटना के दु:ख में भी जान बच जाने का सुख होता है।
अच्छे-बुरे अथवा सुख-दु:ख जैसे भाव पैदा होने का कारण हमारा कत्ताü भाव है। हमारा अहंकार है। इसी से मन में छोटा-बडा जैसा भाव भी पैदा होता है। मेरे मान लेने से न तो कोई छोटा हो जाएगा, न ही बडा। मैं अपनी आत्म-संतुष्टि भले ही कर लूं। आलोचना भी तो व्यक्ति अहंकारवश ही करता है। हमारी सारी प्रतिक्रियाओं के मूल में यही अहंकार रहता है।
मुझे ईश्वर ने मनुष्य जीवन दिया। कई स्वजन और परिजन दिए। जीने के अनेक अवसर दिए और अहंकारवश मैं किसी का सम्मान नहीं कर पाया। किसी अवसर या व्यक्ति का अपने विकास में उपयोग नहीं कर पाया। तब मैंने ईश्वर का सम्मान किया अथवा अपमान। मेरा अहंकार और अज्ञान मुझे इतना घेर ले कि मुझे किसी में कोई अच्छाई दिखाई नहीं पडे और सबके बीच उम्र भर दु:खी होकर जीता रहूं, इसमें कहां तक मेरी बुद्धि की सार्थकता मानी जाएगी। इसके विपरीत, यदि मैं अपने जीवन को ईश्वर का प्रसाद मान लूं, सब लोगों को भी प्रसाद मान लूं तो सदा सुखी होकर भी जी सकता हूं। लोग तो वही रहेंगे। उनमें कोई बदलाव नहीं ला सकते। बदलाव मुझे अपने भीतर करना होगा। सचाई कडवी होती है। व्यक्ति सुखी और दु:खी केवल अपने सोच के कारण होता है। कोई व्यक्ति या फिर परिस्थिति उसे सुखी या दु:खी नहीं कर सकती। हमें यथार्थ दृष्टि विकसित करनी पडेगी। जो जैसा है, उसे वैसा ही देखना पडेगा। तब तो गलत कोे सुधारा भी जा सकता है। दूसरों के विकास में हम अपनी भागीदारी भी निभा सकते हैं। वरना, हमारे विकास में कौन भागीदारी निभाएगाक् वहीं पहुंचेंगे, जहां हमारा अहंकार ले जाएगा। और हम जीएंगे केवल अपने लिए, अकेले।
यथार्थ दृष्टि विकसित करने के लिए पहली आवश्यकता है, वर्तमान में जीने का अभ्यास। वर्तमान के कर्मो से ही भविष्य बनता है। हम वर्तमान में कर्म के साथ नहीं जुडेंगे, तब नया निर्माण जीवन का कैसे कर पाएंगे। भीतर और बाहर का संतुलन कैसे बनेगाक् जीव और शरीर का भेद कैसे समझ सकेंगेक् ज्ञान को कर्म के साथ कैसे जोडेंगे। कृष्ण की गीता झूठी हो जाएगी, जो कहती है कि जीवन ज्ञान और कर्म का संतुलन है। इसके बिना मुझे जो नहीं है वह दिखाई दे रहा है। उसी से मैं सुखी और दु:खी हो रहा हूं। जो है, वह दिखाई नहीं दे रहा है। अहंकार का अंधेरा है।
मुझे इस द्वैत को भीतर समझना है। बडी चूक रह जाएगी जीवन में। यदि मैं दु:ख को जीवन से बाहर करने का प्रयत्न करूंगा, तो सुख भी उसके साथ बाहर निकल जाएगा। दोनों साथ रहते हैं। यदि मैं घृणा को जीवन से बाहर करता रहूंगा, तो प्रेम भी बाहर चला जाएगा। जीवन के सारे द्वैत इसी प्रकार साथ रहते हैं। आवश्यकता है उनके स्वरूप को जान लेने की। एक ही पक्ष दूसरे पक्ष में बदलता है। दोनों अलग-अलग नहीं हैं। यथार्थ समझ में आते ही दोनों पक्ष मिट जाते हैं। पीछे केवल अद्वैत रह जाता है।

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2 टिप्पणियाँ »

  1. aap blog par shayad aapne apne paathko ke man ki baat sunli.. aur man ki shakti k baare me to aappse behtar koi jaan hi nahi sakta..

    टिप्पणी द्वारा amit — मई 2, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • चींटी के भी मन होता है और समुद्र के भी। उसका पार नहीं।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — मई 30, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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