Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2009

सेवा

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

हमारे जीवन की व्यापार संज्ञा है। इसमें लेना-देना साथ चलता है। क्यों व्यक्ति स्वयं को इकाई मानकर जीता है। भले ही स्वयं को न जान पाए। जानते ही तो व्यापार समाप्त ही हो जाएगा। हमारे अध्यात्म में एक होता है आत्मा। एक होता है शरीर। शरीर का निर्माण माता-पिता करते हैं। आत्मा अमर है। यह तो आकर बस रहने लग जाता है। इस आत्मा को ही ईश्वर अंश कहा जाता है। शरीर नश्वर है। इसकी एक निश्चित उम्र होती है। इस उम्र के रहते-रहते आत्मा को अपने जीवन का लक्ष्य पूरा करना पडता है। सबसे पहले अपने स्वरूप को समझना पडता है। उसके बाद ही वह अन्य स्वरूपों को समझ सकता है। स्वयं को प्रकृति के साथ एकाकार करके जी सकता है। स्वयं को जानने वाले व्यक्ति अपने “स्व” के विस्तार में लग जाता है। पहले उसका विस्तार उसके परिवार, परिजन, सम्पत्ति तक ही सीमित था। अब वह दूसरों के दु:ख- सुख का अनुभव भी कर सकता है। दूसरों के प्रति दया- करूणा-प्रेम का भाव जाग्रत हो जाता है। वह स्वयं के साथ-साथ दूसरों के लिए भी जीने लगता है। उनके सुख से स्वयं को भी सुखी बनाता जाता है।
जब तक व्यक्ति स्वयं के लिए जीता है, उसका जीवन संकुचित रहता है। वह अपने शरीर के लिए जीता है। सेवा भी करता है, तो बुद्धि से करता है। तन और धन से करता है। तन भी निर्जीव है और धन भी निर्जीव। इनमें चेतना नहीं होती। इनसे की गई सेवा में व्यक्ति नहीं जुडता। जब मन साथ हो जाता है, तब व्यक्ति जुड जाता है। मन में सेवा की कामना पैदा होना ही मूल में सेवा का आधार है। तन और धन की सेवा लोक-व्यवहार का अंग अघिक होती है। इसमें अपेक्षा भाव जुडा रहता है। मन के भावों का प्रभाव सेवा को पूजा बना देता है। व्यक्ति स्वयं को भूल जाता है। केवल सेवा लेने वाला रह जाता है। उसी में सेवा करने वाला अपना प्रतिबिम्ब देखने लगता है। दोनों के बीच का भेद समाप्त हो जाता है। तब कोई अपेक्षा भी नहीं रहती। जब तक व्यक्ति स्वयं को याद रखता है, वह सेवा नहीं कर पाता।
सेवा एक तरह का दान ही है। तन का, मन का, धन का, ज्ञान का, प्रेम का किसी भी रूप में हो। दान का अर्थ है अपने अंश पर स्वयं का अघिकार छोडकर अन्य का अघिकार स्थापित कर देना। अब वह मेरा अंश दूसरे का हो गया। हमारे यहां कन्या-दान का यहीं अर्थ है। जो अंश दिया, वह अपनी आत्मा का अंश होता है। सम्पत्ति को भी आत्मा का अंश माना जाता है। प्रतिष्ठा को भी। इसलिए देने और लेने वाले श्रद्धा-सूत्र से जुड जाते हैं। दोनों की आत्मा का विस्तार हो जाता है। दोनों ही एक-दूसरे के प्रति अहंकार मुक्त हो जाते हैं। दोनों की वाणी में सरस्वती का मिठास प्रकट होता है। यही बाद में लक्ष्मी बनकर प्रकट होती है। इसीलिए परहित को सबसे बडा धर्म कहा गया है। व्यक्ति सेवा करता जाता है और सबकी आत्मा में अपना प्रतिबिम्ब देखता जाता है। सभी उसको अपने लगने लग जाते हैं। सभी में वही ईश्वर अंश दिखाई देने लग जाता है, जो अब तक स्वयं के भीतर ही जान पडता था। यही उस ईश्वरीय शक्ति का विकास माना गया है। इसीलिए दरिद्र नारायण की सेवा करने को नारायण बन जाने का मार्ग कहा बताया गया है।
सेवा भाव जिसके जीवन में प्रवेश कर जाता है, वह स्वयं की चिन्ता करना छोड देता है। मदर टेरेसा का उदाहरण हमारे सामने घटा है। तब पुरूषार्थ के अर्थ और काम भी धर्म के सहारे चलने लगते हैं। इसी को तो मोक्ष मार्ग कहा गया है और सेवा सही अर्थो में मोक्ष मार्ग ही है। न किसी शिक्षा की जरूरत, न ही किसी साधना की। केवल भावनाओं का विकास करना है। स्वयं का चिन्तन छोडकर जो दूसरों के चिन्तन में जीता है, वही ईश्वर कहलाता है। भीतर बैठा जीव किसी की योनि से आया हो, इस सेवा के वातावरण से शुद्ध मनुष्य रूप बन जाता है। अपने पंच महाभूतों के शरीर का उपयोग करता हुआ जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर निकल जाता है।
सेवा का वातावरण समाज द्वारा तैयार किया जाता है। कई बार अपनी व्यस्तताओं के कारण व्यक्ति का ध्यान इस ओर नहीं जा सकता। समाज में सेवा कार्यो से जुडी अनेक गतिविघियां चलती रहती हैं। व्यक्ति को समय निकालकर इन गतिविघियों से जुडना चाहिए। देखने में तो सेवा समाज और शरीर से ही की जाती है, किन्तु इसे भावनात्मक धरातल दे दिया जाए तो यही ईश्वर की भक्ति बन जाएगी। भक्ति में व्यक्ति भाव-पूजा ही तो करता है। स्वयं के भीतर ईश्वर को देखता है और स्वयं की ही पूजा करता है। यह व्यक्ति भाव है। स्वयं के साथ-साथ किसी अन्य की भी यही सोच कर सेवा करे तो यह व्यष्टि भाव सम्पूर्ण सृष्टि को अपना प्रतिबिम्ब बना देता है। कोई अपना-पराया नहीं रहता। किसी से कुछ अपेक्षा भी नहीं रहती। बस देना ही देना है। लेना कुछ नहीं है। आशीर्वाद की तरंगे सारे आत्मा के धरातल को स्पन्दित कर देती हैं। आत्मा भी संकोच छोडकर विस्तार पाने लगता है।
जीवन के चार आश्रमों को देखें तो भी हम समझ जाएंगे कि सेवा का महत्व क्या है। ब्रrायर्चाश्रम में व्यक्ति जीवन की तैयारी करता है। गृहस्थाश्रम में जीता है, सृष्टि को आगे भी बढाता है। माया व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करती है। वानप्रस्थ में माया निवृत्त हो चुकी होती है। व्यक्ति यहां स्वयं से बाहर निकलने लगता है। अर्थ और कामनाओं से बाहर निकलने का प्रयत्न करता है। धर्म का आधार बढने लगता है। सन्यासाश्रम में स्व की प्रवृत्तियां बदलकर निवृत्ति की ओर अग्रसर होता है। दूसरों के लिए जीना सन्यास का लक्ष्य है। इसी में से अपना निर्वाण मार्ग भी ढूंढ लेता है। इसके बिना न व्यक्ति कामनाओं से मुक्त होता है, न ही कर्म से। कर्म-फल के कारण ही तो जीव बार-बार जन्म लेता है। भावपूर्ण सेवा हर व्यक्ति को निर्वाण मार्ग उपलब्ध कराती है।

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: