Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2009

पुरूष

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

हीं होता नाम “स्त्री” किसी शरीर का। नहीं होता नाम “पुरूष” भी किसी शरीर का। ये तो लक्षण हैं प्रकृति और पुरूष के। शरीर होता है नर-नारी का, मानव-मानवी का। हर स्वरूप को ही पुरूष कहा जाता है। किसी का भी हो। चेतन हो अथवा जड हो। स्वरूप होने का अर्थ है कि कोई परिघि है। उसका केन्द्र भी होगा। केन्द्र के बिना परिघि नहीं बन सकती। जिसके केन्द्र होता है, परिघि होती है, उस केन्द्र में बैठा “ब्रrा” ही पुरूष कहलाता है। नर भी पुरूष है, नारी भी पुरूष है। सृष्टि का हर स्वरूप इस दृष्टि से पुरूष है।
पुरूष का ब्रrाभाव जाना जाता है उसके बृंहण तžव से। बृंहण है उफान, फैलाव। ब्रrा का दूसरा लक्षण है भरण-पोषण। फैलाव की दृष्टि से सम्पूर्ण सृष्टि ब्रrा का विवर्त कहलाती है। विवर्त में परिवर्तित होने की क्षमता होती है। पानी का बर्फ बन जाना विवर्त है। बर्फ फिर से पानी बन सकता है। दूध का दही जमना विवर्त नहीं, स्वरूप परिवर्तन है। दही से फिर दूध प्राप्त नहीं किया जा सकता। पंच महाभूतों से बना हमारा शरीर फिर से पंच महाभूतों में मिल जाता है। हम जिस नए शरीर को पैदा करते हैं, वह भी इसी सिद्धान्त पर कार्य करता है।
ब्रrा के अंश को लेकर ही माया स्वरूप निर्माण करती है। ब्रrा मैटर और माया ऊर्जा। ब्रrा को घेरे में लेकर माया बिन्दु भाव बनाती है। इसी को पुरूष कहा जाता है। आगे इसका कोई भी स्वरूप बने, किन्तु पुरूष तो रहेगा ही। नर बने, नारी बने, पेड-पौधा या पशु-पक्षी बने। सभी पुरूष होंगे। यही पुरूष माया के प्रकृति भाव से जुडकर हमारी सृष्टि को चलाते हैं। ब्रrा शक्ति मान रूप है। माया ब्रrा की शक्ति है। अत: मूल में दोनों एक हैं। माया सुप्त है, कार्य बन्द है, तब केवल ब्रrा है। माया जाग्रत होते ही सृष्टि क्रम में लग जाती है। गतिभाव पैदा हो जाता है। स्वरूप विकास होने लगता है। ठहरी हुई अंगुली में शक्ति तो होती है, किन्तु सुप्त रहती है। मन में कार्य की इच्छा पैदा होते ही शक्ति जाग्रत होगी और अंगुली हरकत में आ जाएगी। शक्ति को अंगुली से अलग नहीं देखा जा सकता।
ब्रrा के पास एक ही कामना रहती है। एकोहं बहुस्याम। मैं एक हूं, मुझे अनेक बनना है। माया इस कामना पूर्ति में सहायक होती है। जहां ब्रrा है, वहां माया सुप्त है। जहां माया क्रियाशील है, वहां ब्रrा उसके गर्भ में रहता है। दोनों में से एक ही दिखाई पडता है। संसार सारा माया के अधीन है। ब्रrा कहीं दिखाई नहीं पडता। जब ब्रrा को खोजने चलेंगे, तब एक-एक करके माया के आवरणों को हटाना पडेगा। जैसे ही माया के आवरण हटे, ब्रrा का साक्षात्कार हो जाता है। माया वहां नहीं रहती। एक को दूसरे में समर्पित होना पडता है। जहां दो रहते हैं, वहां व्यवधान ही रहते हैं। सृष्टि क्रम में व्यतिक्रम आ जाता है।
माया का कार्य है ब्रrा को अपने घेरे में बांधकर रखना। सम्पूर्ण सृष्टि में ब्रrा नहीं बदलता। माया सृष्टि के अनेक स्तरों पर अलग-अलग स्वरूपों में दिखाई पडती है। चाहे स्थूल सृष्टि हो, चाहे सूक्ष्म। हमारी सृष्टि अक्षर सृष्टि है। देव अथवा प्राण रूप है। सूर्य इसका राजा इन्द्र है। अत: हमारा भी पिता है। इसका ही पुरूष भाव भिन्न-भिन्न स्वरूपों में पृथ्वी पर आता है। स्वरूपों का निर्माण प्रकृति रूप में माया करती है। इसीलिए कहा जाता है कि पुरूष और प्रकृति मिलकर सृष्टि चलाते हैं। दोनों ही यहां सूक्ष्म रूप में कार्य करते हैं। पृथ्वी तक आते-आते पुरूष का निश्चित स्वरूप बनता चला जाता है। जड-चेतन रूप में। इसी क्रम में हमारा मानव-मानवी शरीर बनता है। शरीर जैविक क्रिया द्वारा निर्मित होता है। नर-नारी के योग से, जिसे प्रकृति यज्ञ रूप कहा है। शरीर निर्माण के तत्वों का उत्पादन अन्न के योग से होता है। कहा जाता है कि जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन। आत्मा रूप में पुरूष इस शरीर में आकर रहने लगता है। शरीर प्रकृति दत्त है। आत्मा ब्रrा का विवर्त भाव है। दोनों मिलकर सृष्टि चलाते हैं। नर-नारी, दोनों का स्वरूप एक जैसा होता है। कर्म क्षेत्र भिन्न होने से शरीर और धरातल भिन्न रहते हैं। मातृत्व कार्य सम्पादन के लिए वात्सल्य चाहिए। नारी मन से अघिक पुष्ट होती है। नर का मन उतना पुष्ट नहीं होता। समय के साथ नर रूप में बुद्धि का विकास होता है। मन और बुद्धि का विकास दोनों अपनी चित्त वृत्तियों के अनुसार करते हैं।
यह भी एक तथ्य है कि नर रूप में भी ब्रrा स्वच्छन्द अवस्था में रखना चाहता है। उसके साथ उसका “एकोहं बहुस्याम” रहता है। यहां माया उसे बांधती है। उसका स्वरूप निर्माण करती है। उसमें स्नेह की रसधार प्रवाहित करती है। उसे जीवन का मार्ग तय करना आता है। नव निर्मित ब्रrा का यह स्वरूप साधारण नर से भिन्न हो जाता है। इसी प्रक्रिया में माया का भी स्वरूप बदलता है। माया का रूप संकुचन है। ब्रrा फैलाव चाहता है। माया ग्रहण करती है। विस्तार के लिए संकल्पित होकर आगे आती है। ब्रrा की शक्ति बनकर ब्रrा का विस्तार करती है। उसका पोषण करती है। विस्तार को भी ब्रrा की प्रतिकृति बनाने का प्रयास माया ही करती है।
आत्मा जब शरीर में आता है, तब मानव रूप में संस्कार लेकर आया हो, यह आवश्यक नहीं है। मां की आत्मा के साथ भी कुछ कर्मो के फल भोगने आता है। माता के स्वभाव एवं विचारों में परिवर्तन लाता है। तब माया जान लेती है कि कौन से संस्कार लेकर आया है। वह उसी के अनुकूल मानव संस्कारों के शिक्षण का कार्य शुरू कर देती है। जन्म से पूर्व ही उसे मानव की तरह तैयार कर देती है। आत्मा का सम्पर्क पिता से हो ही नहीं पाता, जैसा कि माता के साथ होता है।
माया कामना है। नर के पौरूष को जाग्रत करने से लेकर उसमें विरक्ति भाव भरने तक का सारा कार्य माया करती है। इसी के लिए संकल्पित होकर नारी से पत्नी रूप लेती है। नारी यह कार्य नहीं कर सकती। पत्नी कर सकती है। पत्नी से विरक्ति ही भक्ति मार्ग का प्रवेश द्वार है। भक्ति मार्ग की पहली आवश्यकता है मन का द्रवण, श्रद्धा, समर्पण। सभी तो स्त्रैण गुण हैं। इसके लिए नर को भी इन्हें ग्रहण करना ही पडेगा। जीवन के शुरू में जहां दोनों में अहंकार की प्रधानता रहती है, संन्यास आश्रम आते-आते दोनों ही स्त्रैण गुणों में स्पर्घा करते जान पडते हैं। नर के पास यह स्त्रैण गुण पत्नी से ही आते हैं। इसी से नर की पूर्णता प्रतिष्ठित होती है। नारायण भाव में ब्रrा रूप का अर्थ है माया का ब्रrा में समाहित हो जाना। दोनों को ही समान फल प्राप्त होता है। यदि इस विरक्ति के कारण अन्यत्र आसक्ति हुई तो फिर नारी के माया भाव से जुडना पडेगा। वह पत्नी की तरह जीवन को संवार नहीं सकती। उजाड सकती है। उसके नारायण बनने के सपने को चूर-चूर कर देती है। वहां संकल्प नहीं है। वहां त्याग और स्नेह नहीं है। स्वार्थ है। दृष्टि की क्षुद्रता है। यह भी माया भाव ही है।
व्यक्ति के भाग्य और पाप/पुण्य की जीवन शैली ही दिशा तय करती है। अन्य नारी के साथ जुडते ही ब्रrा का फैलाव कुण्ठित हो जाता है। दोनों ही विस्तार नहीं चाहते। माया ऎसे मानवों को पिता सूर्य से विपरीत दिशा में ले जाती है। आत्मा पर माया के आवरण इतने अघिक हो जाते हैं कि ब्रrा कहीं दबकर रह जाता है। मुक्ति की अवधारणा अपना धरातल छोड जाती है। माया का साम्राज्य यथावत् बना रहता है। माया के ये सारे गुण स्त्रैण कहे गए हैं। नर-नारी दोनों में समान रूप से कार्य करते हैं। इस कारण नारी की स्त्री संज्ञा हो गई। नर को पुरूष कहा जाने लगा। वास्तव में दोनों ही लक्षण रूप हैं। शरीर रूप नहीं हो सकते।

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