Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2009

आद्या

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

आद्या,
नारी नहीं हो
पुरूष हो
तुम भी
हमारे जैसी,
पुरूष ही पुरूष
रहते भीतर तुम्हारे,
अक्षर भी, क्षर भी
और अव्यय,
बना रहे ह्वदय
भीतर तुम्हारा।
इसी में छिपा है
एक
अर्ध नारीश्वर
प्रकृति है वह
और है पुरूष भी,
कृष्ण नाम है
उस अव्यय पुरूष का,
और माया है
उसकी राधा रानी,
वही स्त्रैण है,
सहेली तुम्हारी,
वही होगी शक्ति
सदा ही तुम्हारी,
वही कराए भी
तुम्हारा मिलन भी
उस छलिया से,
जो छिपा बैठा है
तुम्हारे ही पीछे।
बिना शक्ति के
ठूंठ रहता है
शक्तिमान,
वही चेतना है
उस ठूंठ की,
धन तो जड है
जड विश्व सारा,
छिपा है कृष्ण भी
इसी जड के भीतर
सभी चेतना में,
ढूंढ लेना उसको
बनकर के राधा,
नचा लेना उसको
गोपियों की तरह,
नाच लेना तुम
उस बंशी की धुन पर,
भूल जाना
अस्तित्व अपना,
होकर समर्पित
उस शब्द ब्रrा को
घुल जाना उसमें
तुम
गीत बनकर
संगीत बनकर,
खो जाए
राधा
और
रह जाए कृष्ण
बस!
——-
तू रोई
आज
आद्या,
लगा मैं भी
रो रहा था,
पिघल रहा था
खून
मेरी नसों में,
देख रहा था
पत्थरों को भी।
तुम रोई
आद्या,
एक टीस लेकर
वही चुभ रही थी
शूल बनकर,
बींध डाला
चीत्कार ने,
मेरे मन को
विदीर्ण हो गए,
भाव सारे के सारे,
खो गया मैं भी
हवा बनकर,
व्याप्त हो गया
तुम्हारे रूदन में।
नहीं रोक पाया
कृष्ण की तरह से
दर्द को,
तुम्हारे
न पहुंचा ही पाया
तुम्हें
अंक में, मां के,
क्षमा करना
ऎसा ही
नि:सहाय हूं मैं।
———–
प्रेयसी हो
तुम मेरी,
आद्या!
कुछ कहती है,
तुम्हारी आंखें
मुझ से,
कुछ ढूंढती हैं
चारों ओर अपने।
आओ,
नृत्य करो
ह्वदयांगन में
कुचल दो
कोमल पैरों से
वे सारे भाव
जो रोकते हों
विकास
मेरे जीवन का,
भर दो स्पन्दन
सात सुरों के,
तुम्हारे नृत्य से
डोल उठें
रज और तम,
छोड जाएं
यह निवास
सूक्ष्म बनकर।
प्रवाह
तुम्हारी प्रीत का,
करा दें
गंगा स्नान,
उसी के सहारे
तुम भी
चढ जाओ
सिर पर
शंकर के
सहस्रार पर
प्रकाश बनकर।
————-
आद्या!
लोग कहेंगे
आदमी श्रेष्ठ है
प्राणियों में
और बन जाता है
जानवर
अगले जन्मों में।
जानवर
जीता है सदा
मर्यादा में
और बनता है
आदमी वही
नए चोले में।
देखना है
चारों ओर
इन पशुओं को
याद करने
अपने पिछले जन्म
वे कष्ट
जो भोगे
तुमने
और करना
संकल्पित
अपने मन को
“नहीं बनना है
जानवर, फिर से।”
बडा है यह
जन्तुआलय
संसार का,
आदमी भी है
बडा पाजी यहां
मारता है लाखों
सौ साल में
अपने लिए,
स्वार्थी है
नहीं चाहेगा
मुक्ति तुम्हारी,
एक कतार होगी
बन्धनों की
आसक्ति की
राग द्वेष की,
तुम्हें रहना है
बाहर इससे
दृष्टा बनकर,
साक्षी रहना
जीवन के
नहीं हो जाना
कर्ता, कभी
चलती नहीं मर्जी
यहां हमारी
चलाती है हमें
स्वयं कुदरत
हमें तो जीतना है
कुदरत को
तम-रज को
तब चलें
सत् मार्ग पर
करने को प्रसन्न
प्रकृति को।
प्रकृति उठा लेगी
अपनी गोद में
और सौंप देगी
हमें
पिता की गोद में।
तभी जानोगी
महत्व
मानव देह का
होकर
देहातीत!

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