Gulabkothari's Blog

अप्रैल 24, 2009

दमन

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
 हमारा आचरण घर-परिवार से संचालित होता है। हमारी बुद्धि पर बाहरी प्रभाव अघिक रहता है। स्कूल का, पुस्तकों का, मित्रों का, टी.वी. आदि का। ये सब मेरे जीवन व्यवहार को तो प्रभावित करते हैं ; किन्तु मन को प्रभावित नहीं करते। अत: मेरे व्यक्तित्व पर इनका विशेष प्रभाव नहीं पडता। यह भी सच है कि बाहरी विष्ायों में ही मेरे जीवन का अघिकतम समय लगता है। वे ही आकर्षित भी अघिक करते हैं। धीरे-धीरे मन भी बुद्धि के आगे समर्पित हो जाता है। इन्द्रियों के माध्यम से बाहर से जुडता जाता है। भीतर से दूर होता जाता है। मन में उठने वाली कामनाओं का सम्पर्क भी भीतर से टूट जाता है।<br/>कभी-कभी अकेले में या संयोगवश उसका चिन्तन भीतर की ओर मुडता भी है, तब उसकी बुद्धि का अहंकार उसे बाहर लौटा लाता है। इस कारण से जीवन के अनेक महत्वपूर्ण निर्णय भी गलत साबित हो जाते हैं। हमारी बुद्धि की पकड मन से आगे जाती ही नहीं है। क्योंकि यह भी प्रकृति के आवरण में रहती है और मन भी इसी आवरण में ढका रहता है। हम इस मन को ही अपने जीवन का केन्द्र मानकर जीते चले जाते हैं। मन का दायरा बहुत बडा हो जाता है। इसकी कहीं मर्जी नहीं चले तो छटपटाने लग जाता है। व्यक्ति को बेचैन कर देता है। इतनी स्वच्छन्दता मिलने पर कौन नहीं बिगड सकता। हमारा मन भी बिगड जाता है। कहना मानने को तैयार ही नहीं होता। हमारे जीवन का अंश होकर भी सर्वे-सर्वा बन जाता है। उस पर तुर्रा यह है कि मन स्थिर कभी रहता ही नहीं। हर क्षण बदलता ही रहता है। जीवन जब इसके हाथ में हो तब क्या उम्मीद की जा सकती है। इस मन के भरोसे सारा जीवन किसी प्रवाह में ही बीत जाएगा। शरीर और बुद्धि के आगे जीने की जरूरत ही नहीं पडेगी। आहार, निद्रा, भय और मैथुन में व्यस्त रहकर एक पशु बनकर रह जाएगा।<br/>मानव की तरह जीने के लिए मन को भी साधन की तरह काम में लेना पडता है। उस पर भी पूर्ण नियंत्रण बनाना पडता है। उसकी चंचलता पर भी अंकुश लगाना पडता है। मन में उठने वाली कामनाओं का आकलन करना होता है। जरूरत पडे तो कामनाओं की दिशा बदलने के प्रयास भी करने पड सकते हैं। ये कामनाएं ही कर्म में बदलकर मेरे जीवन का निर्माण करती हैं शरीर और बुद्धि के सहयोग से। अत: बुद्धि को ज्ञान में अवस्थित करना पहली जरूरत है। ज्ञान के सहारे कामनाओं का आकलन होगा। तब बुद्धि के निर्णय बदलकर निर्माण में सहायक होने लगेंगे। वरना, कामना को पूर्ण करने का आधार भी गलत हो सकता है, नकार देने का कारण भी गलत हो सकता है। दोनों के लिए ज्ञानयुक्त चिन्तन जरूरी है। साधारणतया व्यक्ति दोनों ही प्रकार के निर्णयों से बचने का प्रयास करता है। उसका निर्णय तीसरी दिशा में होता है। वह इच्छा को दबाने का प्रयास करता है। हमारी समाज व्यवस्था एवं धार्मिक अवधारणाएं ऎसे अनेक पहलू हमारे सामने रखते हैं कि हम हर बार मन को दबाने का प्रयास करने लग जाते हैं। मन में दबी इच्छा सबसे ज्यादा कष्टकारी होती है। न जाने कब अवसर पाकर फूट पडे। दबाने का अर्थ ही व्यक्ति की लाचारी है। दमन में “द” का अर्थ है क्षीण करना। अत: जो मन को निरन्तर क्षीण करता चला जाए, वह हुआ दमन। धर्म के नाम पर हमसे न जाने कितनी इच्छाओं का दमन कराया जाता है। जीवन के अघिकांश निषेध आगे चलकर दमन रूप में बदल जाते हैं। दमन का अर्थ है कि हमने अपनी खुशियों की, जीवन की, हत्या कर डाली। नए द्वन्द्व को जन्म दे दिया, जो कि मरते दम तक साथ रहेगा। पीछा नहीं छोडेगा। जब हम इच्छाओं को पैदा नहीं कर सकते, तब उनका दमन हमारे वश में कैसे हो सकता हैक् व्यक्ति इनके स्थान पर एक मुखौटा लगाकर जीने लग जाता है। अनेक अवसर आते हैं जीवन में, जब व्यक्ति पूरी ताकत लगाकर इन मुखौटों को दूर हटाने के लिए उतावला हो जाता है। उसका मन कई परिस्थितियों में तीव्र प्रतिक्रिया दिखाता है। जैसे कोई वैद्य अपनी दवा के साथ खट्टा-मीठा खाना बन्द करवा दे और सामने कोई ताजा मिठाई रखी हो ! अवसर मिलते ही व्यक्ति मुंह में डाल लेगा। भले ही बाद में पकडा जाए।<br/>इच्छाओं का दमन कभी नहीं होना चाहिए। जीवन की स्मृतियों में न जाने कितनी बातें दबी हुई दिखाई देती हैं। पूरी उम्र का चलचित्र देखा जा सकता है। हमारे स्वप्नों के आकलन से पता चल जाएगा कि मन में क्या-क्या दबा है। वास्तव में दमन जीवन का अभाव बन जाता है। दमन से ही अवचेतन का अघिकांश निर्माण होता है। इसी कारण हमारे व्यवहार में परिवर्तन और प्रतिक्रियाएं दिखाई देती हैं। हमारे विचारों में घृणा और द्वेष जैसे भाव पैदा होते हैं। हमारी अन्त:स्रावी ग्रंथियों के सारे रसायन बदल जाते हैं। शरीर व्याघियों का एक संग्रहालय बन जाता है। ऎसी व्याघियों की चिकित्सा केवल दमन मुक्त होकर ही कर पाना संभव है। फिर दमन क्यों करता है आदमीक्<br/>संस्कार विहीन व्यक्ति की जीवन के प्रति कोई अवधारणा या दिशा नहीं होती। वह बाहरी उपलब्ध ज्ञान के सहारे जीता रहता है। इस ज्ञान को भीतर से तोलने का अवसर कम ही आता है। क्योंकि बाहरी ज्ञान में ज्यादातर ऎसी सूचनाएं और जानकारियां रहती हैं, जो बदलती रहने वाली होती हैं। शाश्वत नहीं होतीं। आज तो बाहरी जानकारियां केवल धन कमाने से और मनोरंजन से ही जुडी जान पडती हैं। इनमें शाश्वत विषय होते ही नहीं। भावनात्मक धरातल या तो होता नहीं या समाज को दिशा देने वाला भी नहीं होता। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय नहीं होता। व्यक्ति सारी जानकारियां स्वयं के लिए बटोरता है। इनके सहारे अकेला जीना चाहता है। तब उसके “स्व” का विकास कैसे हो सकता है ! उसके मन में रह रहकर अनेक कामनाएं उठती हैं, वह उन्हें पूरा करने की स्थिति में नहीं होता। उन्हें दबाता चला जाता है।<br/>जो कामनाएं प्रारब्ध के कारण पैदा होती हैं, पिछले कर्मो के फलस्वरूप पैदा होती हैं, वे तो पूरी हो ही जाती हैं। प्रकृति अपनी व्यवस्था से पूरा करा लेती है। जो कामनाएं जीव के मन की हैं, उनको केवल ज्ञान के आधार पर समझा जा सकता है। पूरी न कर पाने की स्थिति में भी उन पर चिन्तन किया जाना जरूरी है। मन को समझाकर, अच्छे-बुरे, सही-गलत परिणामों पर मनन किया जाए और मन की स्वीकृति ली जाए कि वह इस कामना को पूरी करने के पक्ष में अब नहीं है। तब मन की वे ऊर्जाएं अन्यत्र काम आ सकेंगी और कामना का दमन भी नहीं होगा।<br/>मैं एक लडकी से शादी करना चाहता हूं। घरवाले किसी दूसरी लडकी से कराना चाहते हैं। मेरे सामने एक द्वन्द्व होगा। घर वालों के आगे मेरी चलेगी कितनी ! कोशिश भी करूंगा, तो हो सकता है घर छूट जाए। घर वालों की बात मानता हूं तो मेरी अपनी इच्छा का दमन करना पडेगा। मुझे मेरे मन को समझाना पडेगा कि मेरी इच्छा के पीछे केवल शरीर है, जीवन शैली है, संस्कार नहीं। घर वालों के चयन के पीछे मेरा सम्पूर्ण भावी जीवन और संतति भी है। ईश्वर ने शायद भावी कष्टों को बचाने के लिए मुझे प्रसाद में विकल्प दिया है। मुझे समर्पण कर देना चçाहए। और मन मान जाएगा। मैंने विकल्प के साथ मित्रता कर ली। दमन करने की कोई आवश्यकता नहीं पडी। न ही मेरी पसन्द मेरी स्मृति में प्रवेश कर पाई।<br/>

 

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