Gulabkothari's Blog

अप्रैल 27, 2009

कन्या-2

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

सृष्टि में केवल माया काम करती है। ब्राह् तो निष्काम रहता है। इच्छा करता है, कर्म नहीं करता। नर-नारी में केवल शरीर की भिन्नता है। मन, बुद्धि और आत्मा का स्वरूप भिन्न नहीं है। दोनों ही माया के द्वारा संचालित होते हैं। किन्तु समाज व्यवस्था में केवल नारी ही गतिमान है। वही माता-पिता का घर छोडकर जाती है। नर अपना स्थान नहीं छोडता। वह केवल बीज संग्राहक के रूप में रहता है।

विस्तार की कामना मन में रखकर जीता है। माया भाव पुरूष में भी है, किन्तु बुद्धि के अहंकार से दबा रहता है। नर शुक्र में उसकी सात पीढियों के अंश रहते हैं। उनको आठवीं पीढी तक पहुंचाना चाहता है। किन्तु इस शुक्र से केवल शरीर का ही निर्माण होता है। इस शरीर में सात पीढियों के कुछ कर्माश भी रहते हैं, जिनको आनुवांशिक कहा जाता है। यह अंश जीव में नहीं होते। वह स्वतंत्र रूप से आकर शरीर में रहता है। इसके साथ पिछले जन्मों के संस्कार आते हैं। कर्म-फल आते हैं। नर-नारी में मूल अन्तर बुद्धि की उष्णता और मन की चंचलता एवं शीतलता का होता है। माया की गतिशीलता का होता है। जीवन का सारा संचालन माया करती है। संरक्षण, पोषण माया करती है। जो लडका मां-बाप की कभी सुनता ही नहीं, शादी के अगले दिन ही बदला-बदला नजर आने लगता है। यह केवल कन्या की ही शक्ति है कि वह अपने पुरूष का स्वरूप निर्माण कर सके। उसको बदल पाना पुरूष के वश की बात नहीं है। उसे हर हाल में जीना आता है। अपमान सहकर चुप रहना भी आता है।

समय आने पर उसका हिसाब करना भी आता है। वानप्रस्थ तक आते-आते सारा घर परिवार उसके नियंत्रण में आ जाता है। सारे महिषासुर और रक्तबीज मर चुके होते हैं। महिषासुर क्रोध सूचक है, अहंकार की वजह से बढता है। रक्त बीज लोभ सूचक है। यह कला पुरूष रूप में कहीं नहीं देखी जा सकती।
माया सृष्टि कर्ता है। अत: निर्माण कला में पारंगत होती है। जीवन की सूक्ष्मता और व्यवहार को समझती है। उसकी एक ही कमजोरी होती है, उसका संकुचन भाव। पुरूष विस्तारवादी होता है। अग्नि का स्वभाव ही फैलना है। स्त्री का निर्माण उसके प्रारब्ध और संस्कारों पर आधारित होता है। सम्पूर्ण निर्माण में उसका प्रेम-वात्सल्य भरा रहता है। जिसे निर्माण कला सिखाई गई हो, वह तो अपनी मर्जी की आत्मा को आकर्षित कर लेती है। वैसा ही जीव उसके घर में प्रवेश करता है। जीव के आ जाने पर उसे संस्कारित करना, यह समझ पाना कि किस शरीर को छोडकर आया है, उसके माया भाव की पराकाष्ठा है। फिर प्रसव पूर्व उसे श्रेष्ठ मानव बना देना, अभिमन्यु की तरह तैयार कर देना उसी के बूते का काम है।

वह घडा बनाती है, उसे पकाकर समाज को सौंपती है। उसके दायित्व का बडा अंश यहां पूरा हो जाता है। वह पशु रूप मानव के बजाए आत्म-भाव से परिपूर्ण मानव का निर्माण करती है। यही उसके जीवन का मूल लक्ष्य रहता है। उसे अपनी संतान की क्षमताओं की जानकारी रहती है। जो कन्या समर्पण भाव से आई थी, स्त्रैण भाव से सृष्टि का निमित्त बनने को तैयार हुई, उसी ने क्षुधा रूप माया की तरह प्रवेश किया, पुरूष के जीवन में। क्षुधा को तृप्त किया, छाया बनी, शक्तियों की वृद्धि की। होता यह है कि अहंकार के कारण तृप्ति का स्थान तृष्णा ले लेती है।

कन्या के शरीर में भी सात पीढियों के अंश रहते हैं, किन्तु मातृ पक्ष के। मां-नानी-पडनानी आदि के। अत: कन्या का आदान-प्रदान भी मां या बहन से अघिक रहता है। अच्छे परिवारों में हर पीढी की नारी का स्त्रेह और वात्सल्य एकत्र होकर कन्या में आता है। स्वत: ही वह देवी तुल्य हो जाती है। प्राण को देवता कहते हैं। यह कन्या देवी रूप होती है। सोम प्राणों की पितर और अग्नि प्राणों की देव संज्ञा है। गुण तो पुरूष में भी होते हैं, किन्तु उसका अहंकार बडा होता है।

विवाह से पूर्व कन्या भावी जीवन के सपने बुनने लग जाती है। लडका ऎसा नहीं करता। उसे कुछ बदलने की जरूरत नहीं लगती। कन्या का तो रूपान्तरण हो जाता है। पति को पूर्णता प्रदान करती है। सौम्या है, अग्नि में आहूत होती है। तभी सृष्टि यज्ञ चलता है। यह प्रकृति ही है कि अग्नि-धर्मा पुरूष का शुक्र सोम प्रधान होता है और सौम्या का रज अग्नि प्रधान। तभी अग्नि में सोम आहूत होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शरीर से जब अग्नि (वैश्वानर) निकल जाता है, तब शरीर ही ठण्डा (सोम) पड जाता है। अग्नि-सोम रूपी इस सृष्टि यज्ञ में सोम सदा काम आ जाता है। सोम के अनुरूप ही सृष्टि का विकास होता है। जो कुछ स्वरूप बनता है, अग्नि रूप ही होता है। इसीलिए भारतीय दर्शन में कन्या के देवी भाव को संरक्षित किया गया है। जीवन के अन्त में यही भाव पुरूष को स्त्रैण गुणों से ओत-प्रोत करने में सफल हो सकता है। इसी कारण पुरूष आप्त काम हो सकता है। स्त्रैण पुरूष ही मानवता की सेवा कर सकता है। भक्ति मार्ग पर आगे बढ सकता है। उसका अहंकार गल जाता है। इससे बडा कार्य जीवन में क्या हो सकता है।

इसी के लिए पूरी उम्र पत्नी तप और उपासना करती है। पति की आयु मांगती है। इससे उसे अपने प्रयासों के लिए कुछ समय और मिल जाता है। पति के रहते वह अपना कार्य पूरा कर जाना चाहती है। सुहागिन जाना चाहती है। हालांकि उसका माया भाव का सृष्टि कारक अंश गृहस्थाश्रम के साथ ही छूट जाता है। आगे जीवन को समेटने का काल होता है। यह उसका दूसरा रूप होता है। शरीर वही है, भाव बदल जाते हैं। पति को भी निर्माण छोडकर निर्वाण की ओर प्रेरित करती है। अब पति उसकी इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकता।

समय ने करवट बदली है। सदा ही परिवर्तनशील है। हम अपनी जिन्दगी जीना भूल रहे हैं। अपना विकास, अपने गुणों का विकास नहीं करते हैं। हम झूठी नकल में पड गए हैं। ईष्र्या और स्पर्द्धा प्रवेश कर गई है हमारे जीवन में। हम किसी और की तरह जीना चाहते हैं। आंख मूंदकर। प्रकृति ने तो हर एक को अद्धितीय बनाया है। कोई दो एक जैसे नहीं बनाए। तब हम नकल करके भी दूसरे जैसा नहीं बन सकते। हर एक में ईश्वर के अंश भिन्न हैं। क्यों नहीं हम उन्हीं को ढूंढकर, उनका विकास करें। नकल करने में हम अपने आप से दूर होते जाते हैं।

स्पर्द्धा में हम एक दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। चाहे स्कूल में नम्बर लाने हों, या फिर नौकरी की बात हो। हम अपनी ही शक्तियों का विकास करेंगे तो दूसरों से आगे निकल ही जाएंगे। हमारा ध्यान दूसरों से हटकर स्वयं पर आ जाएगा। नहीं तो हमें मनुष्य जीवन का लाभ नहीं मिल पाएगा।

इसका एक पहलू कन्या की आज की अवधारणा से ही समझा जा सकता है। मां-बाप गर्व से कहने लगे हैं कि हमारे घर में लडके और लडकी में अन्तर नहीं है। बहुत अच्छी बात है। लेकिन इस नकल में लडकी को अच्छी पत्नी, अच्छी माता बनना अब कोई नहीं सिखाता। लडकी की मां ने भी उसे अभिमन्यु की तरह से संस्कार नहीं दिए। जैसा जीव शरीर में आया, वैसा ही समाज को सौंप दिया। पश्चिम की नकल कर रहे हैं। वहां मानव शरीर में क्या संस्कारित मानव जी रहा है! अथवा शरीर को पशुवत् भोगा जा रहा है। आज कोई कन्या पूजन की बात नहीं कहता। किन्तु उसे ससम्मान संस्कारित तो करना पडेगा। वरना वह अपने कुल को क्या पहचान देगी! कैसे समाज का निर्माण होगा!

वैसे भी आज के बच्चे अपनी शैली में जी रहे हैं। संस्कार शब्द जीवन पर लागू ही नहीं होता। जो कुछ संस्कार टी.वी. या इण्टरनेट से मिल जाते अथवा मित्र मण्डली भर देती है, वही जीवन का स्वरूप होता है। इसमें बाच्चा अकेला रहना सीखता है। पढाई और कैरियर की मार से दबा रहता है। उसे स्वजन, परिजन अथवा समाज की चिन्ता होती ही नहीं है। घर पर भी कोई मिलने आ जाए तो स्वयं मां-बाप टाल देते हैं। तब समर्पण तो क्या, दूसरों के लिए जीना भी असंभव बात होगी। अपने पेट के आगे कौन चिन्तन करने वाला है!

बराबरी की अवधारणा का एक और विकृत रूप हमने पश्चिम से ओढना शुरू कर दिया। लडके-लडकियो में स्पर्द्धा का भाव बढ गया। अब लडकियों को अपने भावनात्मक पोषण के बजाए बौद्धिक स्तर को उठाने की चिन्ता लग गई है। लडकों की तरह उष्णता का और अहंकार का मार्ग पकडने लगी हैं। अब वह किसी के भी आगे झुकने को तैयार नहीं होने वाली। विवाह के बाद भी दो बनकर ही जीएंगे। एक बनकर जीने की संभावना पश्चिम से तो सिमट चुकी। हमारे यहां अभी शुरूआत है। जब नारी शरीर भी नर जैसा व्यवहार करेगा, तब विपरीत ध्रुव के आकर्षण का प्रश्न स्वत: ही समाप्त हो जाएगा। शरीर की पकड उम्र भर नहीं रहती। उनको दूर होना ही पडेगा। विधाता भी टाल नहीं सकता। उनके इस भविष्य की जिम्मेदारी उनकी नहीं, मां-बाप की है। आंख मूंदकर नकल करना हमारा बुढापा खराब ही करेगा। आज के इस वातावरण में कन्या के स्वरूप की, उसकी शिक्षा-दीक्षा की नए सिरे से व्याख्या होनी चाहिए। वही किसी देश की संस्कृति का निर्माण करती है। यथार्थ के प्रति यदि हम आंखें मूंद लेंगे तो भविष्य हम पर कोडे बरसाएगा। पश्चिम की तरह यहां भी कन्या भोग की वस्तु बनकर रह जाएगी, मानव समाज संवदेनाओं से शून्य हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

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8 टिप्पणियाँ »

  1. Sir,
    I read your article published in Rajasthan Patrika on 3rd May,2009. All the views expressed by you are very genuine and justified. This is the height of the modern time that a religious and pious ceremony has converted into a contract. Now a days marriage has become totally a contract of which money, property, gold, education, land, luxarious houses and all other monetary things are contract. Since,
    marriage was a relation of seven births this contract will sustain or not no one can say. Some time it is used to be seen during marriage
    ceremony that the marriage is not a marriage of two young persons but marriage of two persons having money, education, social obligations and other negotiable items usedful for each other. This is what we see only after few days there is no faith between two spouces and thousands of persons those who enjoyed the luxarious marriage never come forward to establish faith, because such marriage
    was never a marriage but contract.
    I hope people of all ages will understand the concept of marriage and will overcome such discripencies in marriage relations.
    Hope you will keep it continue to show path to the new generation.
    Thanks.
    Rajendra Singh Bakawat
    Jaipur

    टिप्पणी द्वारा Rajendra Singh Bakawat — मई 4, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. Aapka lekh her sunday ko patrika mein padtha rahtea hu. Hamesha ki tarah aap ke lekh main bahut hi acchi baatein hoti hai. Samany jo hamko kahi sunne ko nahi mil sakti. Bahut Hi accha lagta hai.

    Aap ko koti koti dhanywad.

    vishnu

    टिप्पणी द्वारा vishnu agarwal — मई 3, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. अख़बार में तो आपको लगातार पढ़ते ही हैं , ब्लॉग पर भी पढ़कर अच्छा लगा , लगातार पढेंगे, आप सदा मार्गदर्शक रहे है

    धन्यवाद ,
    मयूर

    अपनी अपनी डगर

    टिप्पणी द्वारा Mayur — मई 2, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  4. सदा की भांति आपका चिंतन पथ प्रदर्शक और संवेदनशील.

    टिप्पणी द्वारा kishore — मई 2, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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