Gulabkothari's Blog

मई 8, 2009

बुद्धि और मन

Filed under: Manas-1 — gulabkothari @ 7:00
Tags: ,

हर व्यक्ति चार स्तर पर जीवन जीता है। ये स्तर हैं—शरीर, बुद्धि, मन और आत्मा। व्यवहार में इनको अलग-अलग नहीं देखा जाता। सब एकरस होकर कार्य करते हैं। मन और आत्मा का भी एक ही स्तर समझ में आ पाता है। जिसको हम मन समझते हैं वह सत्वगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी मन आत्मा नहीं है। यह मन जिसका प्रतिबिम्ब बनकर सामने आया है वह भीतर छिपे हुए मूल मन का बिम्ब-रूप है। वही आत्मा है। आनन्द-विज्ञान का वह सहचारी है, अत: व्यवहार में जीवन के तीन स्तर ही कार्यरत दिखाई देते हैं।
शरीर और बुद्धि का कार्यक्षेत्र बहुत सीमित है। शरीर यूं तो बुद्धि के निर्देश पर ही कार्य करता है, फिर भी मन अपनी इच्छाओं की अभिव्यक्ति शरीर के माध्यम से, इन्द्रियों के माध्यम से करता रहता है। शरीर का कार्य श्रम की श्रेणी में आता है। शरीर को यदि अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जाए तो उसका प्रभाव भी सामने वाले के शरीर तक देखा जा सकता है।
बुद्धि का प्रभाव भी बुद्धि तक ही होता है। बुद्धि का कार्य तर्क पैदा करना है। व्यक्ति एक-दूसरे की बात को तर्क में डालता है, अपने तर्क को सही साबित करने के लिए हठ करता है अथवा अन्य तर्क प्रस्तुत करता है। शुद्ध बुद्धि सामने वाले व्यक्ति के मन को प्रभावित नहीं कर सकती। केवल श्रम की श्रेष्ठता बढा सकती है। उसे कौशल/शिल्प का रूप दे सकती है।
मन का प्रभाव व्यापक होता है। उसको किसी भाषा की आवश्यकता नहीं है। उसका कार्य भाव प्रधान है, अत: मन के कार्यो में भावों की अभिव्यक्ति जुडी रहती है। ये भाव ही श्रम और शिल्प को कला का रूप देते हैं। कला मन के भावों की अभिव्यक्ति का ही दूसरा नाम है। चाहे गीत, संगीत, नृत्य, चित्रकारी, कोई भी भाषा दी जाए, यदि उसमें भाव जुडे हैं तो उसका प्रभाव मन पर होगा ही, यह निश्चित है।
आपकी अभिव्यक्ति के साथ यदि मन का जुडाव नहीं है तो मान कर चलिए कि उसका प्रभाव सामने वाले व्यक्ति के मन पर नहीं होगा। आप कितना ही कौशल दिखा लें, कितनी ही मेहनत कर लें, मन का जुडाव जितना बढेगा, प्रभावशीलता उतनी ही बढेगी। पूर्ण मनोयोग (होल-हार्टेडनेस) शत-प्रतिशत प्रभावी होता है। यही सफलता की पहली और अन्तिम कुंजी है।
मन चाहता है आनन्दमय रहना। रसयुक्त, निर्मल, स्वच्छ रहना। बिना मन के किया गया कार्य मन में रस पैदा नहीं करता, नीरस होता है। परिणाम भी वैसे भी आते हैं। मन से बनाया गया चित्र हजारों मील दूर बैठे दर्शकों का मन भी मोह लेगा। मन-युक्त संगीत मन को अवश्य छूता है। मन ही दूर बैठे व्यक्ति की याद दिलाता है। उसी क्षण हम भी उसे याद आते हैं। मूक भाषा में भी मन के सन्देश प्रेषित होते रहते हैं।
मन मूल्यवान है, व्यक्ति की पहचान है, अत: इसको साधना होता है। जीवन में सभी लक्ष्य मन से ही जुडते हैं। अन्तर्मन ईश्वर से जुडा है। यही ईश्वर में मिलता है। इसको साधने के लिए शरीर और बुद्धि का साधना आवश्यक है; क्योंकि इनको साथ तो रहना ही है। अत: सबकी एक भाषा होनी चाहिए। सब स्तरों में सन्तुलन होना चाहिए। आज शरीर और बुद्धि पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। मन कमजोर होता जा रहा है। जीवन-संघर्षो से जूझने की क्षमता घटती जा रही है। आज शिक्षा से भी मन निकल गया। विकसित देशों में मन की दयनीय हालत देखी जा सकती है। बात-बात में व्यक्ति टूटता दिखाई देता है। हम भी उधर ही जाने में लगे हैं।
इसका अर्थ है, सन्तुलन आवश्यक है। अलग-अलग धरातलों की अलग-अलग दिशाएं होना घातक है। ये व्यक्तित्व को नष्ट कर देती हैं। जीवन के सभी स्तर एक दिशा और एक ही गति से चलने वाले हों, तभी जीवन में समरसता आती है। यही तपस्या और साधना का मूल है। यही सुख का मूल आधार है।

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: