Gulabkothari's Blog

मई 13, 2009

दलों का दलदल

देश के लोकसभा चुनावों का आज अन्तिम चरण है। कल से दिल्ली में नेताओं की मण्डी शुरू हो जाएगी। मतदाता सारे घटनाक्रम को मूक दर्शक बनता देखता रहेगा। ये सब वे ही लोग होंगे जो मतदाता द्वारा अथवा उसके नाम से चुने जाकर दिल्ली पहुंचते रहे हैं। जो कुछ परिणाम आएंगे, उन्हें देखकर मतदाता के मन पर जो कुठाराघात होगा उसका अनुमान कौन कर पाएगा नेता तो हर्गिज नहीं कर सकेंगे।
इस देश में चुनाव, दल, मतदान जैसे शब्दों के द्वारा कुछ नियम कानून भी बने हुए हैं, किन्तु उनकी पालना करने की बात कौन करता है हमारा तो देश ही आश्वासनों के सहारे चल रहा है।
हमारे देश में आज सात राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं और 39 प्रान्तीय दल हैं। इनकी भी परिभाषा बनी हुई है। प्रान्तीय दलों की शर्त यह है कि वह राज्य की राजनीति में पांच साल से सक्रिय हो और पिछली विधानसभा के चुनाव में उसके पास चार प्रतिशत सीटें हों। या फिर पार्टी को पिछले विधानसभा चुनावों में कुल मतदान का छह प्रतिशत हिस्सा मिला हो। एक बार सदस्य बनने के बाद यदि सदस्य किसी अन्य दल से जुडता है, तो उसको मिले मत मूल पार्टी के ही माने जाएंगे। हमने यह भी देखा है कि सरकार नियम-कानून तो बनाती है, लेकिन उसमें गलियां भी छोड देती है। जैसे एक तरफ पांच वर्ष की सक्रियता की बाध्यता और दूसरी तरफ सीधे चुनाव में कूद कर छह प्रतिशत वोट हासिल करने
की छूट।
इससे भी बडे आश्चर्य की बात है राष्ट्रीय दलों के बारे में। एक राष्ट्रीय दल का कम से कम चार राज्यों में मतदान का छह प्रतिशत हिस्सा होना चाहिए। तभी उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा दिया जा सकता है। क्या किसी ने इस दृष्टि से इन आंकडों को देखा है “हाथ कंगन को आरसी क्या” की तर्ज पर पिछले दो चुनाव के आंकडे देखने से भी सारी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। लगभग सभी प्रादेशिक दलों को चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लडने की स्वीकृति किस आधार पर दे रखी है स्वाभाविक ही है कि ऎसी स्थिति में मतदाता भ्रमित होता है। जातिवादी या निहित स्वार्थी ठेकेदार पार्टियां बनाकर मैदान में उतर जाते हैं। मोल-भाव और दबाव का बाजार गर्म होता है। ऎसे में मतदाता का रूझान चुनावों के लिए घटेगा ही।
प्रादेशिक और राष्ट्रीय पार्टियों की भेद रेखा भी आज दिखाई नहीं दे रही। सभी प्रमुख प्रादेशिक पार्टियां लोकसभा के लिए भी चुनाव लडने को स्वतंत्र हैं। यदि उनका अस्तित्व अन्य तीन राज्यों में है ही नहीं, तो उन्हें राष्ट्रीय दलों की हैसियत क्यों मिल जानी चाहिए यही तो एक भेद है दोनों के बीच। इस भेद को जाने-अनजाने मिटा देना ही वह कारण है कि इतने सारे दलों के प्रत्याशी लोकसभा में पहुंच जाते हैं। तब कैसे जनता किसी एक दल को बहुमत दे सकेगी। इससे तो बहुमत की सरकार बनने का रास्ता ही सदा के लिए बन्द कर दिया। हर सरकार गठबन्धन की ही बनेगी। बेशक देश का संविधान हर नागरिक को चुनाव लडने की आजादी देता है। लेकिन इस अधिकार का विवेकपूर्ण उपयोग होना चाहिए। तभी राजनीति शुद्ध हो सकेगी, मोल-भाव के रास्ते बन्द होंगे।
आज जितनी पार्टियों के प्रत्याशी लोकसभा में पहुंचेंगे, उनमें कितने प्रत्याशी गैर राष्ट्रीय दलों से होंगे और वे देश के लिए कितने व्यापक दृष्टिकोण से कार्य कर पाएंगे! आज हर केन्द्रीय मंत्री अपने राज्य के लिए काम करके चला जाता है। राष्ट्र के प्रति समग्र दृष्टिकोण कहां से पैदा होगा देश में चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय, दो सक्षम संस्थाएं हैं, जिन्हें ऎसे मुद्दों पर तुरन्त निर्णय देने चाहिए, ताकि देश की बागडोर सक्षम हाथों में ही सुनिश्चित रह सके। वैसे चुनाव आयोग तो अपनी गलती मानने वाला नहीं है। कानून ही कुछ करे, तब है।
गुलाब कोठारी

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