Gulabkothari's Blog

मई 14, 2009

नेतृत्वविहीन चुनाव

लो, चुनाव भी हो गए हैं। अब क्या होगा खरीद-बेच का समय आएगा। मोल-तोल होंगे। यह सारा इस बात पर भी निर्भर करेगा कि बढत किस पार्टी को मिलती है। मोल भी खरीददार देखकर ही बताया जाता है। फिर राष्ट्रपति का रूख क्या कहता है, वह भी महत्वपूर्ण है। वह बडे गठबन्धन को भी बुला सकती हैं और बडी पार्टी को भी। उनके बुलावे के बाद भाव-ताव और बदल जाएंगे।
किसी भी दल को राष्ट्रपति द्वारा बडे दल के रूप में स्वीकृत करने के समय चुनाव पूर्व का गठबन्धन समझौता महत्वपूर्ण होता है। इस बार कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और झामुमो से सीमित गठबन्धन करके देशभर में अपने ही प्रत्याशी खडे किए हैं। इससे कांग्रेस को अपनी सही शक्ति का अनुमान भी हो जाएगा। कांग्रेस का ही एक खेमा राहुल गांधी को विपक्ष में बिठाकर प्रतिष्ठित कराना भी चाहता है। इससे मध्यावधि चुनाव की भी सम्भावना बढ जाएगी। मायावती के साथ एनडीए आसानी से पांच साल नहीं खींच पाएगा। तब राहुल के प्रधानमंत्री बनने के अवसर होंगे।
चुनावों में दोनों ही दल कमजोर साबित हुए। दोनों में ही नेतृत्व का अभाव रहा। इसी कारण मतदाता भी उदासीन दिखाई दे रहा था। हालात यहां तक हो गए कि कई प्रदेशों में तो मतदान आधा भी नहीं हुआ। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि लोगों के मन में लोकतंत्र के प्रति सम्मान कम हो गया है! हमने देखा है कि कहीं विरोधी पार्टी के मतदाताओं को धमकियां दी जाती हैं, तो कहीं मदिरापान कराया जाता है। कहीं जीतने पर उपहार देने के लिए टोकन बांटे जाते हैं। गोलियां तक चलाने से नहीं चूकते लोग। यही रह गया हमारे लोकतंत्र का यथार्थ रू प। यही हमारी साठ साल की उपलब्धि है। ऎसे चुनाव तो वैध भी नहीं माने जाने चाहिए। नेताओं को क्या फर्क पडता है! उन्हें कुर्सी के अलावा कुछ नहीं दिखाई पडता। जो रास्ते में आता जान पडे उससे तो गाली-गलौच कर बैठते हैं। संतुलन खो देते हैं। अब जो खरीद-फरोख्त होगी, तब पीछे रहने वाले कैसे विष उगलेंगे, सामने आ जाएगा। सारे नेताओं को तो कुर्सियां मिल नहीं पाएंगी। चुनावों में सार्वजनिक रूप से गालियां देने वाले भी तलुए चाटेंगे और प्रशस्ति गान करते दिखाई देंगे। जोड-तोडकर भानुमति का कुनबा बनेगा। वही हमारा भविष्य तय करेंगे। शायद अगले चुनावों में नई पीढी कुछ क्रांतिकारी परिणाम दिला सके।
सरकार बनाने का निमंत्रण वैसे तो तयशुदा नियमों के तहत ही दिया जाता है, फिर भी राष्ट्रपति का स्वविवेक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अटलजी को तत्कालीन राष्ट्रपति ने बडे दल के रूप में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। वहीं राष्ट्रपति के.आर. नारायण ने सबसे बडे गठबन्धन को आमंत्रित किया था। वर्तमान राष्ट्रपति का नजरिया समय आने पर सामने आएगा। वर्तमान स्थिति में यह तो तय है कि कांग्रेस और भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा। ज्यादा सीटें मिलने का दावा भी दोनों ही दल कर रहे हैं। दोनों के बीच अन्तर भी बहुत बडा रहने वाला नहीं है। कौन दल किन-किन पार्टियों के साथ गठबन्धन करता है और संख्या में भी आगे निकलता है, उसी पर निर्णय ठहरेगा।
सरकार किसी की भी बने, मुख्य प्रश्न यह है कि कौन पार्टी आगे बढकर देश को नेता देती है। सरकार चलाना नेतृत्व नहीं है। देश जिसके पीछे चलने को तैयार रहे, वैसा नेता होना चाहिए। अभी दो बडे नेताओं पर तो जूते फेंके जा चुके हैं। जब तक देश में कोई नेता नहीं उभरेगा, देश आगे नहीं बढेगा। यह दायित्व भी दोनों ही मुख्य दलों का है।
गुलाब कोठारी

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4 टिप्पणियाँ »

  1. राजस्थान पत्रिका एक ऐसा नाम है जो मरुभूमि में जन्म लेने वाला कोई भी व्यक्ति अपनी पूरी ज़िन्दगी भुला नहीं सकता..इसकी वजह रही है राजस्थान पत्रिका का सामाजिक सरोकार व खबरों की विश्वसनियता…आजतक जब किसी को खबरों की सच्चाई जाननि होती थी तो राजस्थान पत्रिका का ही सहारा लेता था…सरकार तक अपनी बात पहुचानी होती थी तो राजस्थान पत्रिका ही उसका जरिया बनता था…..पर अब ???? राजस्थान पत्रिका बदल गया है….यह बदलाव बेहतरी के लिए होता तो इतना दुःख नहीं होता पर यह बदलाव हो रहा है राजस्थान के जन जन के विश्वासपात्र बन चुके पत्रिका का सामाजिक सरोकारों से हट कर पत्तलकारिता की राह पर बढ़ने से….अब पैसो के लिए राजस्थान पत्रिका किसी के भी तलुए चाट सकता है…आप पैसे देकर किसी भी तरह का विज्ञापन या समाज की आने वाली पीढ़ी को दिग्भ्रमित करने वाले लेख, फोटो, सड़क छाप लूटेरो के बाज़ार लगवा सकते हो महज कुछ पैसे देकर….ये हाल शायद ख़राब नेत्रत्वा को लेकर हैं….के के कुलिश जो नहीं रहे….और जो मौजूदा हैं गुलाब कोठारी ( पर उपदेश कुशल ). पता नहीं किसी को भी किसी भी विषय पर दुनिया भर के उपदेश दे सकते हैं लिख सकते हैं…पर राजस्थान पत्रिका की गरिमा बचने के लिए ये महानुभाव कुछ नहीं करते… पता नहीं कहा कहा से बेवकूफ लोगो की भर्ती कर ये अख़बार चला रहे हैं…. जिस राजस्थान पत्रिका को सच्चाई का आइना मानते थे लोग ..जो राजस्थान पत्रिका विश्वस की एक मिसाल थी….बड़ा दुःख है अब मैंने वो पढना छोड़ दिया है… अब कुछ नहीं पढता क्यूंकि जो और अखबार हैं वो तो पहले से ही पत्तलकारिता कर रहे हैं…मैं यहाँ पर यही कहना चाहता हु… राजस्थान पत्रिका को भगवन के लिए वही बना रहने दो जिसके लिए ये जण जाता है…आपको पैसो की भूख है तो मांग लो…राजस्थानियो से बहुत भिक्षा मिल जाएगी ….यहाँ तो कुत्तो को भी रोज़ दो रोटी मिल जाती है …अपनी गरिमा को बचने राजस्थान वाले शायद कुछ ज्यादा दे दे… समझदार को इशारा काफी है. जय राजस्थान जय भारत

    आपका
    कुल्डाराम

    टिप्पणी द्वारा कुल्डाराम — अप्रैल 13, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • लगता है कि कई वर्षो से आपने पत्रिका बढ़ा ही नहीं हैं।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — मई 19, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. I’m regular reader of your articles published in my ‘patrika’. I appreciate your views and analysis. I have a humble request to you: Just like this blog, please use the translation technique in Patrika’s web pages.

    टिप्पणी द्वारा Sohan — मई 17, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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