Gulabkothari's Blog

मई 15, 2009

स्मृति

Filed under: Manas-1 — gulabkothari @ 7:00
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जीवन में तीन काल होते हैं—भूत, वर्तमान और भविष्य। हम भूतकाल से निकलकर वर्तमान से गुजरते हुए भविष्य की ओर जा रहे हैं। यह भी कह सकते हैं कि हमारा भविष्य वर्तमान से होकर भूतकाल में जा रहा है। इसी जीवनक्रम में भूतकाल की स्मृतियां और भविष्य की कल्पनाएं जुडती हैं। इन दोनों को यदि जीवन से निकाल दें तो ज्ञात होगा कि हमारे पास इतना अधिक समय होता है कि उसकी तुलना में करने हेतु उतना कार्य ही नहीं होता।
हमारे जीवन का जो भविष्य होना है वह तो जन्म के साथ ही तय हो गया। प्रश्न यह है कि जब वर्तमान बनता है तब हम उसे कैसे जीते हैं किस भाव से जीते हैं उसी कर्म के अनुसार वह हमारी स्मृति का अंग बनता है। वह स्मृति जीवनपर्यन्त हमारे साथ चलती है। छोटी-सी क्रिया भी एक लम्बी प्रतिक्रिया बनकर जीवन के कई अमूल्य क्षण हमारी स्मृतियों में खोकर गुजार देती है। हमें मिलता कुछ नहीं। आगे कहीं बढते नहीं। एक जगह खडे रह जाते हैं। समय के साथ न चलकर पीछे चले जाते हैं।
एक बात और भी है। यह स्मृति हमारे मानस पटल पर अंकित होकर हमारे व्यवहार और व्यक्तित्व को बनाती-बिगाडती भी है। इसी कारण हमसे कई बार अनेक ऎसे कार्य भी हो जाते हैं, जो हमारे नियमित व्यवहार के अंग नहीं होते। स्मृति हमारे अवचेतन मन को परिवर्तित करती रहती है। यही कर्म का बन्धन रूप भी है। जब पिछले कर्म फल देने लगते हैं तब अचानक हमारा व्यवहार बदल जाता है। यह भी होता है कि फल उचित वातावरण पाकर ही स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।
हम जीवन को अनेक मान्यताओं, धारणाओं और परम्पराओं के अनुसार जीते हुए अपना एक व्यक्तित्व तैयार करते हैं। वही व्यक्तित्व हमारी स्मृति में प्रतिबिम्बित होता है। और, स्मृति हमें वर्तमान में जीने नहीं देती। व्यक्ति वर्तमान को भूलकर भूतकाल में चला जाता है। उसका वर्तमान छिन जाता है। जीवन का एक महत्वपूर्ण काल बिना किसी परिणाम के निकल जाता है।
स्मृति ही व्यक्ति को प्रतिक्रियावादी बनाती है। वह उसे शान्त नहीं होने देती, तनावग्रस्त रखती है। राग-द्वेष की निरन्तरता का निमित भी वह स्मृति ही बनती है। बहुत सारी कल्पनाओं का आधार भी होती है। कल्पनाएं भी व्यक्ति को वर्तमान में नहीं जीने देतीं। किसी योजना के लिए विचार करना कल्पनातीत माना जाएगा। कोरी कल्पना भी स्मृति की तरह मन में आवेश, उतेजना या प्रतिक्रिया को जीवित बनाए रखती है।
व्यक्ति को वर्तमान मेंं जीना है। इसका एक ही मार्ग है कि स्मृति और मिथ्या कल्पना से जीवन को मुक्त किया जाए। स्मृति का विसर्जन किया जाए। एक-एक स्मृति के बारे में चिन्तन करना पडेगा, उसे संकल्प के साथ हटाना पडेगा। जिस व्यक्तित्व को बनाया है उसमें परिवर्तन लाना पडेगा। स्मृति के साथ-साथ मिथ्या कल्पना भी घटेगी। इससे आप अपने वर्तमान का समुचित उपयोग कर सकेंगे। उतना ही स्वभाव भी शांत होता जाएगा। प्रतिक्रियाएं घटती जाएंगी। दृष्टि से आवरण हटते चले जाएंगे।
स्मृति को घटाना ही कर्मफल से मुक्त होना है। स्मृति जागृत होते ही अनेक बातें आपके सामने उभरने लगेंगी। आपको अपनी छवि दिखाई देगी, उसे स्वीकार करना है। इस सच्चाई को स्वीकार करके ही आप उसे सुधार सकेंगे, अन्यथा नहीं। इसके अभाव में स्वयं की तस्वीर भी पराई लगेगी, मन में कई प्रकार की उथल-पुथल होगी, धैर्य के साथ उसे सहन करना होगा। समर्पित भाव से, चिन्तन करते हुए दृढ निश्चय के साथ ही आप स्मृति के जाल को तोड सकेंगे। स्मृति को पकडकर बैठने की आवश्यकता नहीं है। आप केवल तस्वीर देखते रहें और स्मृति को निकल जाने दें। किसी प्रकार की प्रतिक्रिया दिखाने की जरूरत नहीं है। आप नहीं पूछेंगे तो वह अपने आप चली जाएगी।
इस प्रक्रिया से आपको साम्यभाव मिलेगा, चिन्तन का नया अवसर मिलेगा और नए व्यक्तित्व के निर्माण का पथ निर्मित होगा। स्मृति के बोझ को उम्र भर सिर पर ढोने से आप बच सकेंगे। सार्थक जीवन जी सकेंगे।

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6 टिप्पणियाँ »

  1. स्मृति ही व्यक्ति को प्रतिक्रियावादी बनाती है।

    टिप्पणी द्वारा लोकेश Lokesh — मई 15, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. bilkul sahi kaha aapne ateet me ji kar ham vartman ko bhi sahi dhang se nahi jee pate abhar

    टिप्पणी द्वारा nirmla — मई 15, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. सार्थक जीवन जी जीने के बारे पड कर अच्छा लगा आपकी कलम की लेखनी से तराश कर निकले शब्द वाक्य बन जाते है और कई वक्यो का समूह लेख लोगो को सार्थक जीवन जीने कि तरफ प्रेरित करने वाला लेख बहुत ही अच्छा लगा

    टिप्पणी द्वारा sanjay tiwari — मई 15, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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