Gulabkothari's Blog

मई 18, 2009

विवाह-3

जीवन की पूर्णता का मूल आधार ही विवाह को माना गया है। इसके बिना पूर्ण पुरूष (ब्रrा) से मिल पाना लगभग असंभव माना गया है। अथवा इसके लिए एक से अधिक जन्मों तक अभ्यास करना पडेगा। इसका कारण प्रकृति का संचालन है। हमारी उत्पत्ति भी इन्हीं नियमों के अन्तर्गत होती है। प्रकृति के नियम जड-चेतन सभी वर्गो पर समान रूप से लागू होते हैं। इनकी जानकारी होते ही जीवन की अनेक गुत्थियां हल हो जाती हैं। भारतीय दर्शन में विवाह को एक सामाजिक रिवाज नहीं माना गया। इसको सम्पूर्ण संवत्सर का अंग मानकर विवाह संस्कार का निरूपण किया गया है। नर-नारी को एक ही सांवत्सरिक आत्मा का अंश माना गया है। भूतात्मा के रूप में इनका सहज समन्वय विवाह कहा गया है। इसको दो आत्माओं का मिलन कहा है। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं। कहा भी है-

1. पतिरेव गुरू: स्त्रीणाम्।
2. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते।

मानव का भी एक विकास क्रम रहा है। मानव को मनु का पुत्र कहा गया है। मनु विश्व की मूल प्रतिष्ठा का नित्य तत्व है। सम्पूर्ण सृष्टि ही मनु की संतान होती है, किन्तु मानव में मनु स्वतंत्र केन्द्र लक्षण के रूप में प्रतिष्ठित रहता है। परिपूर्णता स्पष्ट है। सृष्टि में तीन स्थूल पिण्ड हैं-सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी। चौथा भाव अव्यक्त रहता है- प्राण रूप में। चारों की समन्वित अवस्था मानव रूप लेती है। भू-पिण्ड से शरीर का निर्माण होता है। चन्द्रमा से मन का और सूर्य से बुद्धि का। अव्यक्त अंश मनु है-आत्म रूप है। जिनमें इन्द्रियों का विकास रहता है, वे चेतन कहलाते हैं। बाकी अन्य जड की श्रेणी में आते हैं।

केवल भू-पिण्ड से पत्थर आदि जड पदार्थो का निर्माण होता है। इसमें चन्द्र और सूर्य के अंश जुडने पर उसी मात्रा में मन और बुद्धि का विकास होता है। कृमि, कीट, पक्षी और पशुओं में। चन्द्रमा के प्रभाव के आठ सर्ग होते हैं। सूर्य के 33 सर्ग। इनके साथ-साथ जहां आत्मभाव का भी विकास हो वहां आत्मनिष्ठ मानव बनता है। जहां शरीर, मन, बुद्धि तीनों ही आत्मभाव से समन्वित रहते हैं। इन चारों के व्यवस्थित स्वरूप का नाम ही मानवता है। इस व्यवस्था के खण्डित होते ही मानव आक्रामक होने लगता है। एक वेद वाक्य है-

“न वै दैवा अतिक्रामन्ति, न पितर:, न पशव:,
नासुरा:। मनुष्या एवै के अतिक्रामन्ति।”

इसका सार यह है कि मानव के अलावा कोई भी प्राणी, देव आदि प्रकृति की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता।
हमारा प्राकृतिक स्वरूप क्या है। हम पार्थिव प्राणी हैं- पशु रूप हैं। जो पंच पाश से बंधा हो, उसे पशु कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ही पांच पाश हैं। हमारी पृथ्वी के मध्य में विषवत् रेखा या भूमध्य रेखा है।

इसके एक ओर 240 तक कर्क रेखा तथा दूसरी ओर मकर रेखा है। इन 480 के परिसर का क्रान्तिवृत्त ही हमारा संवत्सर कहलाता है। इसी को यज्ञाकाश कहते हैं। इसी में सूर्य और चन्द्रमा का भ्रमण होता है। इसमें दिन वाले आधे भाग का अधिपति सूर्य और रात्रिरूपी आधे आकाश का अधिपति चन्द्रमा होता है। सूर्य के अगिA प्रधान 240 भाग से मानव का (नर का) स्वरूप निर्माण होता है और चन्द्रमा के सौम्य आकाश के 240 से नारी के स्वरूप का विकास होता है। जिस प्रकार संवत्सर में सूर्य पति भाव और चन्द्रमा पत्नी भाव है, वही दाम्पत्य रूप-सम्बन्ध नर-नारी का होता है। एक ही प्रजापति दो सौर-चान्द्र रूपों में परिणत होते हुए प्रजा के उत्पादन में समर्थ बनें। दोनों ही अकेले अपूर्ण होते हैं। दाल की तरह एक भाग होते हैं। दोनों मिलकर सृष्टि यज्ञ के लिए पूर्णता ग्रहण करते हैं। शास्त्र कहते हैं-

“संवतसरो वै यज्ञ:, यज्ञो वै पुरूष:, पुरूषो वै यज्ञ:।”
जब नर-नारी एक-दूसरे के सम्मुख खडे होते हैं तब मेरूदण्ड ही भू-मध्य रेखा होता है। पूर्णवृत्त बन जाता है। दोनों की 24-24 पसलियां 480 के संवत्सर को पूर्णता देते हैं। जीवन का लक्ष्य चूंकि पुरूषार्थ है-मोक्ष है। उसके लिए पहले सांवत्सरिक पूर्णता प्राप्त करना पहली अनिवार्यता है। इसमें तत्व चिन्तन निष्ठा के माध्यम से आत्मरत बने रहना मानव की परिपूर्णता है। दाम्पत्य जीवन में विश्वास, विकासात्मक अगिA तत्व रूप में पुरूष से अनुगत रहता है और श्रद्धा, संकोचात्मक स्त्रेह तत्व रूप सौम्या स्त्री से अनुप्राणित रहता है। सोममयी श्रद्धा शक्ति तत्व है, स्त्री भाव है। अगिAमय विकास रूद्र/ शिव तत्व है। दोनों के सम-समन्वय से ही दोनों के स्वरूप की रक्षा संभव है। जहां भी समन्वय खण्डित हुआ, अतिक्रमण करने लगते हैं। हमारे यहां “सहधर्म चरताम्” को आदर्श कहा है। पूर्ण मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण नहीं करता।

इस दाम्पत्य भाव के कारण ही मन में स्त्रेह रूप तरल भाव रस पैदा होता है। इस रस प्रवाह वृत्ति का नाम ही प्रेम है। चूंकि सभी प्रवाह पंाच रूप में गति करते हैं, अत: प्रेम के प्रवाह की भी पांच ही गतियां होती हैं। ऊपर से नीचे, बडों का छोटों के प्रति वात्सल्य कहलाता है। नीचे से ऊपर, बडों के प्रति श्रद्धा रूप होता है। बराबरी में स्त्रेह रूप। जड पदार्थो के प्रति लगाव को “काम” कहते हैं। दाम्पत्य जीवन में इन चारों भावों का सम्मिश्रण होता है। इसको “रति” कहा गया है। यह दाम्पत्य रति ही कालान्तर में आत्मरति का रूप लेती है। पुरूषार्थ सिद्धि करती है।

समय के साथ ये सारे ही सिद्धान्त एक-एक करके लुप्त होते जा रहे हैं। शरीर मन-बुद्धि और आत्मा के समन्वय का विखण्डन होने लगा है। किसी भी परिस्थिति में मानव स्वयं को सुखी नहीं पाता। स्त्री भाव को आत्म बुद्धि साक्षिणी कहा है। आज सहकामचारिणी बनती जा रही है। कहीं-कहीं तो विनोद का, रंजन का विषय बन गई है। तब बलिष्ठ, महिष्ठ और यशस्वी संतान कैसे पैदा होंगीक् स्व. मोतीलाल शास्त्री ने लिखा है कि आज तो मर्यादाओं के अतिक्रमण को ही पौरूष मान लिया है। कल क्या होगाक् इसके उत्तर में स्व. शास्त्री लिखते हैं- “आज जैसे विधि-विधान निर्मित हो रहे हैं, इनसे कालान्तर में नारीत्व सर्वथा ही अभिभूत (परास्त) हो जाएगा। मानव का स्वरूप भी, मानवत्व भी विस्मृत हो जाएगा।”

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. बेहद ज्ञानवर्धक और प्रेरक !

    टिप्पणी द्वारा प्रियंकर — मई 20, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: