Gulabkothari's Blog

मई 19, 2009

भटकती भाजपा

इस बार लोकसभा चुनावों में भी भाजपा की वैसी ही स्थिति उभरकर सामने आई, जैसी कि पिछले लोकसभा चुनाव में आई थी। शायनिंग इण्डिया का नारा अंधेरे में दबकर रह गया था। अपनी इतनी बडी हार से भाजपा में बौखलाहट का बडा वातावरण भी दिखाई दिया। इस बार भी दावे तो आसमान से नीचे ही नहीं उतरे, किन्तु भाजपा चारों खाने चित्त हो गई। लालजी ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि यदि मैं पी.एम. नहीं बना तो घर लौट जाऊंगा। न पी.एम. ही बने, न घर ही लौटे। भाजपा की यह सबसे बडी भूल साबित हुई कि उनको इतना पहले से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस सम्मान को पचा सकना उनके लिए असंभव हो गया। इस पूरे काल में उनके तेवर भी प्रधानमंत्री जैसे ही रहे। अन्तत: जनता ने ही उनके नेतृत्व को नकार दिया। चुनाव प्रचार के दौरान ही एक और समझदार नेता ने अपने पिटारे से मोदी का नाम छोड दिया। इसका एक अर्थ यह था भाजपा के एक धडे को भी आडवाणी का नेतृत्व स्वीकार नहीं है और वह भी ऎन चुनाव के पहले। भाजपा का इससे बडा नुकसान तो कांग्रेस ने भी नहीं किया। इस घोषणा से नरेन्द्र मोदी भी फुफकारने लग गए। सभी नेताओं की वाणी से विष उगला जा रहा था। इसका परिणाम भी वही होना था। भाजपा के सहयोगी दलों ने भी मोदी को नकार दिया।
दिल्ली के गढ में भाजपा का एक संतरी भी नहीं बचा। उत्तराखण्ड में भी भाजपा को बैरंग लौटना पडा। राजस्थान में अकाल पड गया। मात्र चार सीटों पर संतोष करना पडा। चुनाव प्रचार में यहां भी बयानबाजी का बडा दौर चला था। गुलाब चन्द कटारिया की रथ यात्रा आगे बढती गई और पीछे-पीछे भाजपा की चादर सिमटती चली गई। पहले ही दिन से उदयपुर की पांच सीटें कांग्रेस को जाती दिखाई दे रही थीं, राजसमन्द को छोडकर। भाजपा के लोग इस बात को मानने को तैयार नहीं थे। राजस्थान में हम इन चुनावों के आंकडों को पिछले चुनाव के आंकडों से मिलाएं तो पता चल जाएगा कि भाजपा का मतदाता उदासीन होता जा रहा है। सन् 2003 में विधानसभा और सन् 2008 के विधानसभा में कांग्रेस के पक्ष का मतदान मात्र 1 प्रतिशत बढा था, जबकि भाजपा के पक्ष में लगभग 5 प्रतिशत मतदाता घटे थे। सन् 2004 के और सन् 2009 के लोकसभा चुनाव कहानी को और आगे ले गए। कांग्रेस के पक्ष में 5.75 प्रतिशत वोट बढे, किन्तु भाजपा के पक्ष में टूट 12.44 प्रतिशत की हुई। शेष मतदाता वोट डालने नहीं आए।
कांग्रेस के हारे हुए विधायक सी.पी. जोशी और लालचन्द कटारिया सांसद चुने गए, जबकि भाजपा के जीते हुए विधायक घनश्याम तिवाडी, किरण माहेश्वरी और राव राजेन्द्र सिंह चुनाव हार गए। एक बात और भी है कि गांवों में रोजगार गारण्टी योजना का प्रभाव भी दिखाई पडा। भाजपा की कई योजनाएं लागू ही नहीं हो पाई।
किसी की नहीं मानना भी भाजपा के लिए शान की बात हो गई है। चाहे राजनाथ सिंह हो, चाहे आडवाणी, सुषमा स्वराज या वसुन्धरा राजे। इनके लिए तो सही उतना ही है जो इनको सही लगता है। इस पर भी जातिवाद का भूत भीतर इतना उतर गया है कि लोगों को राष्ट्रवाद छोटा सा जान पडता है। लोग अपनी-अपनी जाति के बाहर नेतृत्व देने को ही तैयार नहीं है। प्रचार के दौरान भाजपा की छवि गिरती चली गई और किसी के भी कान खडे नहीं हुए। भ्रष्टाचार और अपराधियों को शरण देने में भी किसी पार्टी से पीछे नहीं रही। आज भी भाजपा अपनी साम्प्रदायिक छवि से उबर नहीं पाई है। नई पीढी का मतदाता शान्ति चाहता है।
राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या हो, इस पर वह सोचे। आज भाजपा से न कार्यकर्ता संतुष्ट है, न ही देश। भाजपा ही देश की दूसरी बडी राजनीतिक पार्टी भी है। हर बार इसी तरह मार खानी हो तो इसकी मर्जी, किन्तु कुछ करने लायक बनना है तो पार्टी का पुनर्गठन एवं नीतियों का आकलन करना होगा। सभी पुराने चेहरों को सलाहकार का दर्जा देकर पीछे की सीट पर बिठा देना चाहिए। कांग्रेस में भी ऎसे ही लोग “घुण” का कार्य कर रहे हैं। वहां तो नीचे पोल ही पोल है। भाजपा में तो ऎसा नहीं है। केवल अहंकार है।
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि दो बडे दलों में से एक पटरी से उतर गया है। वरना तीसरे मोर्चे की जरूरत ही देश को नहीं पडती। सब जानते हैं कि तीसरा और चौथा मोर्चा किन लोगों का गठबन्धन है और देश को क्या दे सकता है। भाजपा में यदि आवश्यक सुधार नहीं हुआ तो ये लोग ही लोकतंत्र के नायक होंगे।
गुलाब कोठारी

14 टिप्पणियाँ »

  1. बहुत सही विश्लेषण| भाजपा अंदरुनी कलह से निकल नहीं पर रही है| आपना घर तो सुरक्षित ही नहीं है दूसरे के घर पर पत्थर मारा जा रहा है|

    टिप्पणी द्वारा mantosh kumar singh — मई 24, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • आपकी कथनी और करनी के अन्तर को देखकर कौन देश की बागडोर आपके हाथ में देना चाहेगा

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — मई 29, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. सटीक आकलन .

    टिप्पणी द्वारा प्रियंकर — मई 20, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. सम्यक विवेचना। भाजपा, छोटे कद के बड़े नेताओं का जमावड़ा हो कर रह गई है। दूसरी पंक्त्ति के नेताओं के अहम्‌ उनके कद से कहीं बड़े सिद्ध हो रहे हैं। रही सही कसर भैंरोबाबा ने पूरी कर दी।

    टिप्पणी द्वारा sumant mishra — मई 19, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  4. I read you regularly.

    टिप्पणी द्वारा Rajendra Malviya — मई 19, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  5. लगता है भाजपा २८ साल की उम्र में मौत के करीब पहुच रही है

    टिप्पणी द्वारा dhirusingh — मई 19, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • कम से कम पांव तो कब्र में लटक ही गए हैं। जब तक ऊपर के 15-20 लोग कुर्सियां नहीं छोडेंगे, नई सांस नहीं आ सकती। ये ही इस नाव के बडे छेद हैं।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — मई 21, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  6. अगर संयोग से भाजपा जीत जाती तो आज सभी आडवाणीजी के गुणगान कर रहे होते। सब समय समय की बात है, खैर…
    गुलाब कोठारी जी आप राजस्थान पत्रिका के संपादक गुलाब जी ही हैं? मैं बचपन से राजस्थान पत्रिका पढ़ता रहा हूं। मैं मूल देवगढ़ मदारिया का हूं और अभी हैदराबाद में रहता हूं।
    आपने अपना ब्लॉग http://www.blogvani और http://www.chitthajagat.in पर पंजीकरण नहीं करवाया दिखता अब तक। तभी शायद यह ब्लॉग पाठकों तक नहीं पहुंचा।

    टिप्पणी द्वारा सागर नाहर — मई 19, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  7. बहुत सटीक लिखा आपने..

    टिप्पणी द्वारा Ranjan — मई 19, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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