Gulabkothari's Blog

मई 24, 2009

विवाह-4

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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पथ्वी के सभी जीवों को पशु कहा जाता है। हमारी पृथ्वी की तरह सभी लोकों को भी पृथ्वी संज्ञा दी गई है। अत: सभी लोेकों में भी पशु ही रहते हैं। चाहे असंज्ञ हो, अन्त: संज्ञ हो, या फिर ससंज्ञ हो। मनुष्य की भी पशु संज्ञा है। प्रकृति के प्राणों में ऋषि, पितर, देव, गंधर्व प्राणों के बाद पशु प्राण आते हैं। ऋषि, पितर और देव प्राणों के कारण हमारे तीन ऋण बनते हैं। मानव जीवन का लक्ष्य है धर्मानुकूल अर्थ और काम के सहारे मोक्ष प्राप्ति। आ#काम हो जाना। मानव-रूप पशु की मोक्ष तक की यात्रा कोई साधारण घटना नहीं हो सकती। पशु को तो वैसे भी भोग योनि माना है।

अज्ञानवश मनुष्य भी भोग को ही प्रधान कर्म मानकर जीने लगता है। उसके कर्म में विद्या का अंश अल्प होता है। जीवन को दो ही तत्व चलाते हैं-विद्या और अविद्या। धर्म-ज्ञान-वैराख्य-ऎश्वर्य विद्या कहलाते हैं। अधर्म, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश को अविद्या कहते हैं। विद्या से बुद्धि प्रभावित होती है। अविद्या मन के प्रवाह से जुडती है। मनमानी करती है। विद्याभाव से ही मन पर अंकुश लगाया जाता है। पशु के पास अंकुश लगाने की क्षमता नहीं होती। वह तो प्रवाह पतित हो जाता है। मानव के पास यह क्षमता होती है।

इस भू पिण्ड पर औषधि, वनस्पति, कीट, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि सभी शरीर रहते हैं। सभी का अपना-अपना जीवन स्वतंत्र भी होता है और एक दूसरे पर निर्भर भी। ये सारे शरीर भू-पिण्ड के नभ्य (नाभि या केन्द्र) के द्वारा आकृष्ट भिन्न-भिन्न प्राणों से ही बनते हैं। अत: इन्हें पार्थिव या पृथ्वी के पशु कहा जाता है। जब तक इनका पृथ्वी केन्द्र से आदान-प्रदान रहता है, तब तक ही इनका जीवन रहता है। पृथ्वी के नष्ट होने पर भी ये सारे नष्ट हो जाते हैं।

पशु की एक अन्य व्याख्या यह भी है कि जो प्राणी पंच पाश से बंधा हो, वह पशु है। ये पांच पाश अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष और अभिनिवेश हैं। अज्ञान को अविद्या कहते हैं। ज्ञान को विद्या कहा है। एकोज्ञानं ज्ञानम् के अनुसार जिसको यह समझ में आ जाए कि सब प्राणियों में एक ही सत्ता रहती है, उसे ज्ञानी कहा जाता है।

पृथ्वी पिण्ड का पोषण करने वाले भी पशु कहे जाते हैं। अत: सभी असंज्ञ, ससंज्ञ और अन्त: संज्ञ पशु कहलाते हैं। सभी पृथ्वी के उपकरण हैं। जैसे मन, बुद्धि और शरीर आत्मा के उपकरण हैं। जो स्थान घेरते हैं, सीमायुक्त होते हैं, वे भी पशु हैं। अत: जीवों के अतिरिक्त अन्न, जल और अख्नि भी पशु हैं। लेकिन जिस जल और अख्नि से पृथ्वी का निर्माण होता है, वह पशु नहीं हैं। उनको प्राण पद कहते हैं। सभी पशु पृथ्वी की प्राण शक्ति के आधार पर स्थिरता पाते हैं। अन्न का अर्थ है-जिसको पाकर पिण्ड अपने स्वरूप में बना रहता है। शरीर, मन, बुद्धि जैसे उपकरणों से। सूर्य-परमेष्ठी आदि मण्डलों से जो रस पृथ्वी पर आते हैं, वे ही पशु रूप ग्रहण करते हैं। अन्त में जब पृथ्वी के मूल स्वरूप में जुड जाते हैं, तब इनका पशु भाव समाप्त हो जाता है। वर्षा का जल, नदी, तालाब का जल पशु रूप है। लकडी में छिपी हुई अख्नि पशु रूप है। पिण्ड शरीरों पर दिखाई देने वाला अख्नि भी पशु है। इसी प्रकार प्राणों के आधार हर लोक के अपने-अपने पशु होते हैं। प्राण के साथ मन और वाक् भी सदा जुडे रहते हैं। अविनाभाव होते हैं।

ये वाक् भी चार प्रकार की होती है। पृथ्वी की वाक् कारणभूत अग्नि में और जहां तक पृथ्वी दिखाई पडती है, उस रथन्तर साम में रहती है। अंतरिक्ष वाक् वायुमण्डल में, वाम देव्य साम में रहती है। सूर्य की वाक् केन्द्रस्थ इन्द्र में और सूर्य के वृहत साम में रहती है। इसमें अन्य सभी वाक् समाहित रहती हैं। चौथी वाक् लोक के सभी पशुओं में रहती है। इसके दो रूप होते हैं। प्राण रूप या प्राण गर्भिता वाक् रूप। एक को चित्य और दूसरी को चितेनिधेय कहते हैं। एक मत्र्य रूप, दूसरा अमृत रूप। पिण्ड रूप मत्र्य वाक् है। पिण्ड की स्थिति को बनाए रखने वाला चितेनिधेय कहलाता है। यह केन्द्रगत प्राण ही अगिA-सोम यज्ञ द्वारा पिण्ड को बनाता है। फिर उसी पर आरूढ हो जाता है। वही चारों और फैलता है। यह रस रूप यजु: है, पिण्ड भाग ऋक्। जहां तक पिण्ड दिखाई दे, वह साम कहा जाता है।

तीनों लोकों में अग्नि-वायु-आदित्य को अमृत कहा है। पृथ्वी अन्तरिक्ष द्यु लोक मत्र्य पिण्ड हैं। इनको लोक-मूर्ति-ऋक् भी कहते हैं। इनसे हमारी इन्द्रियों के विषय बनते हैं। रस रूप गंध आदि। साम बहिर्मण्डल कहलाते हैं। इनसे ही हमारी इन्द्रियों का सम्बन्ध बनता है। जो सदा दूसरों पर आश्रित रहते हैं, उनको भी पशु कहते हैं। इस प्रकार एक ही वाक् चार प्रकार से प्रकट होकर अन्न को प्रकट करती है। सूक्ष्म अवस्था की वाक् ही स्थूल अवस्था में अन्न कहलाती है। चौथा रूप ही स्थूल होता है। यही पशुभाव होता है। हम भी एक-दूसरे का अन्न बने रहते हैं।

पशु में भी अन्य प्राणियों की तरह वीर्य रहता है। ब्राह्, क्षत्र या विड वीर्य। चूंकि पशु की भी स्वतंत्र आत्मा होती है, अत: निर्वीर्य नहीं हो सकता। अल्पवीर्य कहलाता है। सूर्य-चन्द्र-पृथ्वी जैसे लोकों का आत्मा पूर्ण इन्द्र प्राण से बनता है। अत: इनकी पूर्ण संज्ञा है। पशु आत्मा अपूर्ण होता है। इनको पैदा करने वाले रस को केन्द्र प्राण एक ही दिशा में फेंकता है। अलग-अलग दिशा में अलग पशु पैदा होते हैं। आधे इन्द्र प्राण से उत्पन्न होने वाला पशु अर्धेन्द्र कहलाता है। इसमें जो रस सूर्य मण्डल की ओर फेंका जाता है, उससे आगAेय पुरूष और जो रस चान्द्र की सौम्य दिशा में जाता है, उससे स्त्री शरीर का निर्माण होता है। हर पशु एक भाग में बलवान रहता है। दूसरा भाग निर्बल होता है। वृक्ष ऊपर बढता है, नीचे नहीं। चेतन प्राणियों का शरीर नाभि से ऊपर-नीचे (लम्बा) होता है। दोनों पक्षों में नहीं बढता। स्त्री-पुरूष दोनों भाव ही अर्धेन्द्र होते हैं। अत: इनको पूर्णता की खोज रहती है।

यह भी तथ्य है कि अकेला प्राणी रमण नहीं कर सकता। ब्राह् भी चाह रहा था-एकोहं बहुस्याम। यह विनोद भाव गूढ में भी रहता है और अतिज्ञानी में भी (गूढ रूप से)। सभी पशु जीवात्मा अपूर्ण होते हैं। इच्छा का अभाव पूर्णता है। इसी प्रकार अपूर्ण कोई सृष्टि पैदा नहीं कर सकता। नया आत्मा आकृष्ट पूर्ण से ही होता है। अत: दो मिलकर पूर्ण बनते हैं। तब सृष्टि होती है। जाया प्राप्त करके पूर्ण होने के लिए विवाह किया जाता है। बिना पत्नी के पुरूष यज्ञ का अधिकारी नहीं होता। पूर्ण से सम्बन्ध बनाने के पहले स्वयं को पूर्ण बनना पडता है। यही मूल सिद्धान्त है। यज्ञ का फल भी तभी पूर्ण रूप में प्राप्त होगा। उसका आधे में समावेश नहीं हो सकता। विवाह एक संकल्प होता है। मन को एक निश्चित स्वरूप में मर्यादित करता है। संकल्प के टूट जाने पर व्यक्ति विकल्प तलाश करने लग जाता है।

जो इन्द्र प्राण पशु शरीर में रहता है, उसको “मनु” कहते हैं। सम्पूर्ण जगत का शासक, अणु से भी अणु, कान्तियुक्त, स्वप्न-सुषुप्ति में भी कार्य करने वाला, स्वपA में होने वाले ज्ञान से अनुमान करने योख्य जो प्राण रूप पुरूष है, सब भूतों का जो पर तत्व है, वह मनु है। चार मण्डल, स#लोक और 14 भुवनों के अपने-अपने मनु हैं। मनु और यम को सूर्य पुत्र कहा है। मनु को इस लोक का शासक कहा जाता है। यम को परलोक का। मनु ही अर्धेन्द्र है। “मैं हूं” इस अहं भाव को मनु ही प्रकट करता है। यही हमारा इन्द्र है।

इस पशु रूप मानव जीवन को दो अर्धेन्द्र मिलकर न केवल पूर्णता देते हैं, बल्कि पशु भाव से बाहर निकलने का प्रयास भी करते हैं। दोनों ही पूर्ण होकर पूर्णाकार बन जाते हैं। अकेला तो कभी पूर्णता प्राप्त ही नहीं कर सकता। धर्म, अर्थ, काम के बाद दोनों मोक्षगामी हो जाते हैं।

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. you are great sir.

    टिप्पणी द्वारा padam jain — फ़रवरी 27, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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