Gulabkothari's Blog

जून 6, 2009

भावभूमि

Filed under: Manas-1 — gulabkothari @ 7:00
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भावना या इच्छा। जीवन के मूल में और कुछ नहीं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा पूरी करने के लिए जीता है, संघर्ष करता है। जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीनों अवस्थाओं में भी उसकी इच्छा या भाव ही कार्य करते हैं। ये भाव ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। ये भाव ही जीवन में व्यक्ति का धर्म बनते हैं। समाज में व्यक्ति के स्वभाव की प्रतिष्ठा करते हैं।
भाव मन के धरातल का विषय है। शरीर में इच्छा नहीं उठती। इच्छा के पूर्ण होने का आनन्द अथवा अपूर्ण रहने का दु:ख भी शरीर को नहीं होता। बुद्धि को इसका आभास मात्र हो सकता है, किन्तु मन का ही विषय है भाव। सभी इच्छाएं मन में उठती हैं। बुद्धि केवल तय करती है कि अमुक इच्छा पूरी होनी चाहिए या नहीं। पूरी हो तो कैसे और कबक् इच्छा स्वत: उठती है। इसे ईश्वरीय देन भी कह सकते हैं। कई प्रकार के संयोग भी इच्छा पैदा कर जाते हैं। दूसरी बात यह भी है कि जब तक मन में इच्छा पैदा नहीं हो, हम कुछ नहीं कर सकते। हमारी हर क्रिया पहले मन के धरातल पर होती है, फिर शरीर में।
व्यक्ति की प्रत्येक भावभूमि पहले मन में तैयार होती है। इससे उसके श्वास-प्रश्वास के प्रकम्पन बदलते दिखाई देते हैं। इसके बाद शरीर में हलचल दिखाई देती है। विभिन्न मुद्राएं प्रकट होती हैं, अत: हमारे दर्शन में भावभूमि पर ही सबसे अधिक जोर दिया गया है। भाव शुद्ध हैं, निर्मल हैं, शान्त हैं, तो आपका व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा। सारे धर्म, योग, तप, साधना आदि का पहला लक्ष्य भावभूमि तैयार करना ही है।
भाव जीवन की संजीवनी है। स्वस्थ वातावरण और स्वस्थ चिन्तन से अच्छे भाव पैदा होते हैं। अच्छे भाव बनाए रखने का अर्थ है कि पूरा जीवन संयम और साधना में ही गुजरे। अपनी सभी प्रकार की दिनचर्या में अनुशासन बना रहे। हर परिस्थिति का सामना कर सकें। विचलन नहीं हो, भय भी नहीं हो और एक आनन्द का आभास, सुख का आभास, निर्मलता का आभास बना रहे।
भावनाओं के प्रसंग में कृष्ण काल की एक कथा प्रसिद्ध है। रूक्मिणी कृष्ण के पांव दबा रही थी। अचानक उसको लगा कि कृष्ण के पांव में एक छाला हो रहा है। उसने पूछा कि आप तो कभी नंगे पैर चलते ही नहीं, आपके पांव में यह छाला कैसेक् कृष्ण सहज रूप से हंस दिए। धीरे से बोले-“यह तो तुम्हारे कारण हुआ है।” रूक्मिणी की समझ में कुछ नहीं आया। कृष्ण ने बताया कि अभी कुछ दिन पहले राधा यहां आई थी। उसके आतिथ्य का भार तुमने उठाया था। एक बार ड़ाह-वश तुमने उसको गर्म-गर्म दूध पिला दिया। उसका ह्वदय जल उठा। उसके ह्वदय में मेरे चरण रहते हैं, बस छाला पड़ गया।
चूंकि हमारा जीवन मन के धरातल से संचालित होता है तथा भाव ही प्रधान है, अत: हमें इसी को अनुशासित करके जीना है। मन च†चल है, हर क्षण परिवर्तित होता है, अनेक प्रकार की शक्तियों से घिरा रहता है। यह अनेक प्रकार के अनुभवों एवं वातावरण से गुजरता है। इसका भी अपना लक्ष्य होता है। स्वप्न भी होते हैं।
“विद्या ददाति विनयम्” का सूत्र हमें दिशा देता है। इससे हमारा ज्ञान क्षेत्र बढ़ता रहता है। अहंकार की गुरूता हावी नहीं होती। हम प्रमत्त नहीं होते। अहंकार का भाव आते ही विपरीत स्थिति हो जाती है। आहार बढ़ जाएगा, निद्रा बढ़ जाएगी। निद्रा बढ़ जाएगी तो मित्र छिटकने लगेंगे। गुरूता का भार बढ़ता जाएगा। व्यक्ति नीचे गिरता जाएगा। चेतना अधोमुखी हो जाएगी। विनयशीलता से व्यक्ति ऊध्र्वरेता होता है। उसकी शक्तियों का विकास होता रहता है। यह सब भाव-प्रक्रिया के संचालन से ही सम्भव है। व्यक्ति के भाव ही व्यक्ति को सुर अथवा असुर बनाते हैं। भाव से ही वह राग-द्वेष जैसी वृत्तियों से जुड़ता है। भाव ही तय करते हैं कि उसे आत्मसाधना की ओर बढ़ना चाहिए अथवा शक्ति, ऊर्जा और शरीर की ओर, या फिर बाह्य जगत् की कृतियों की ओर। व्यक्ति बीच में खड़ा होकर तय करता है कि किधर जाना है, उसी के अनुरूप वह अपनी भावभूमि तैयार करता है।
दैनन्दिन जीवन में यही भावभूमि व्यक्ति की चर्या, व्यवहार, कर्म आदि का निर्धारण करती है। सूक्ष्म प्राणों के माध्यम से शरीर में ये भाव परिलक्षित होते रहते हैं, अत: हमारा जीवन भावपूर्ण बने, शुद्ध व पवित्र भाव बने रहें, इसी के लिए शास्त्र हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

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1 टिप्पणी »

  1. उत्तम लेखन

    टिप्पणी द्वारा सुभाषितमञ्जरी — अगस्त 25, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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