Gulabkothari's Blog

जून 8, 2009

संकल्प-1

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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न जाने कितने
पर्याय होते हैं
जीवन के,
किन्तु एक पर्याय
होता है
सभी के केन्द्र में,
वह है संकल्प।
संकल्प
स्वीकृति है
कामना की,
दिशा है
भावना की,
सूचना है
क्रिया की
और लक्ष्य है
अनागत का,
अदृश्य का
अनियंत्रित का,
अंधकार में
प्रकाश पाने का,
खोजने को शक्ति
भीतर की,
कृष्ण के अंश की,
प्रस्फुटित करने को
जिसे
अपने संकल्प से।
सहारा है
जीवन का
एक ही,
जो चलता है
साथ उम्रभर,
वही साहस है,
शस्त्र है,
प्रकाश है
पथ का
जीवन यात्रा में।
संकल्प ही
बनाता है शक्तिमान
व्यक्ति को,
बनकर
इसकी शक्ति,
क्षुधा है
संकल्प,
रखने को गतिमान
जीवन चक्र को,
शेष नकली है
सहयात्री
नहीं देते साथ
वक्त आने पर
संकल्प की तरह,
इसी के बूते
काट देता है
पूरी उम्र आदमी।
नहीं होता मन
संकल्पित
आसानी से,
चंचल है
भगाती हैं इन्द्रियां
उसे यहां-वहां,
इधर-उधर
बहाने को
एक प्रवाह में,
भटकता रहता है
आदमी सौ साल,
नहीं मिलता
लक्ष्य कोई।
कौन करता
संकल्पित मन को
बड़ा प्रश्न है
कौन चलाता
जीवन व्यापार
माया
महामाया
यानी प्रकृति,
वही प्रवृत्ति है
निवृत्ति वही है
वही संकल्प है,
करने का भी,
न करने का
चलाती है
शक्तिमान को
भाख्य के द्वारा।
जैसे पत्नी
चलाती है
पति के जीवन को
विवाह के बाद।
वह भी तो
आती है
नए घर में
किसी संकल्प से
कौन आता है
जीने को
उसके साथ
इस घर में
संकल्प,
उसका अपना संकल्प!
वही होता है
आत्म-विश्वास
जीने को
हर हाल में।
चलता भी है
जीवन
समय के साथ,
और बदलता भी
कर्म अनुरूप ,
ज्ञान के द्वारा,
तब जूझता है
विकल्पों से
जीवन भर।
उसका जीवन
संकल्प है बस
वही परिचय
वही स्वरूप
उसका
वही बनाता है
पत्नी, माता
वही मांगता है
संतान
उस प्रभु से
वही मित्र बनकर
सदा साथ देता।
वही तो क्षुधा है
जीवन में नर की
वही शक्ति,
वही लक्ष्मी है
वही तृप्ति है,
तृष्णा वही है
वही तो धुरी है
हर परिजन की,
वही खूंटा है
पति देव का भी
बंधा है जो
स्त्रेह की पकड़ से
जरा सोचो क्या हो
हिले यदि खूंटा,
ढ़ह जाए घर
विकल्पों के मारे
टूट जाएं
जीवन सहारे।
संकल्प ही है
सपनों का जीवन,
उसी में छिपी है
गहनता
प्रेम रस की
वही करता प्रेरित
देने को सब कुछ
न चाहिए उसको
बदले में कुछ भी,
बनाना नहीं है
व्यापारी खुद को।
मनुज रहता
क्षुद्र
जन्म से ही,
आधा-अधूरा
चना-दाल जैसा,
उसे पूर्णता देता
संकल्प नारी का
पत्नी बनकर।
किसने सिखाया
उसको प्रेम करना
किसने जगाया
उसका पौरूष
किसने दिशा दी
जीवन को उसके,
चलाया उसे
नई जीवन ड़गर पर
प्रकाश बनकर
संकल्पित
माया भाव ने,
कर लिया उसको
आवरित चहुं ओर
बन्द कमरे-सा,
ड़ुबा दिया
प्रेम सागर में
उसको
भर गया मन
उसका भी
इसी प्रेम रस से,
जो मिलता नहीं
कभी
किसी विकल्प में।

गुलाब कोठारी

1 टिप्पणी »

  1. SPANDAN I CANNOT FORGET TO READ THIS AND AWAIT EVERY SUNDAY VERY EAGERLY. THIS REFLETS VERY TRUE PICTURE OF LIFE. WHENEVER I GET TIME IREADY REPEATEDLY. WITH MY ALL RESPECT TO YOUAND YOUR SUCH DEEP PENETRATING WRITING WHICH CAN CHANGE ONCE LIFE.N.M.SURANA

    टिप्पणी द्वारा n.m.surana — जुलाई 28, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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