Gulabkothari's Blog

जून 15, 2009

देशहित में

लोकतंत्र की दो बड़ी पार्टियों में से यदि एक छिन्न-भिन्न हो जाती है, जैसा कि स्पष्ट दिखाई दे रहा है, तब देश में लोकतंत्र की सुगंध फीकी पड़ जाएगी। देश का हित दोनों दलों के सक्षम और सशक्त रहने में ही है। लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत तो चलती रहती है। वर्ष 1977 में कांग्रेस हारी है तो वर्ष 1984 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को महज दो सीटें मिलीं। लेकिन कोई भी पार्टी खत्म नहीं हुई। नेतृत्व खत्म नहीं हुआ। लेकिन आज स्थितियां चिन्ताजनक हैं। देशभर का मीडिया एक स्वर में उनमें से एक के विखण्ड़न का चित्रण कर रहा है। पार्टी में नीचे का कार्यकर्ता मूकदर्शक है और राष्ट्रीय पदाधिकारी ही कूद-फांद कर रहे हैं। जबकि पार्टी उनकी विरासत तो नहीं है।

देशवासियों के सामने आज महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि भाजपा नहीं तो कौन लेकिन कौन के जवाब में कोई नहीं दिखाई दे रहा। कहने को भाकपा, माकपा, राकांपा, बसपा कई राष्ट्रीय पार्टियां हैं, लेकिन सब क्षेत्रीय पार्टियों जैसी। किसी पर भी देश चलाने का भरोसा नहीं कर सकते।

जब अटलजी प्रधानमंत्री थे, तब मैंने विभिन्न यात्राओं के दौरान देश और पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल उठाए थे। उन लोगों के नाम भी लिए जो पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं, ड़ुबोने का कार्य कर रहे हैं। बेलगाम तो बोल ही रहे थे। वे इतना ही कहकर रह जाते कि देश का दुर्भाग्य है। आज सारे ही नाम पटल पर हैं और पूरा देश इन्हें टकटकी बांधे देख रहा है। नीचे कार्यकर्ता लज्जित भी महसूस कर रहा है। मोहन भागवत इस दर्द को समझ तो रहे हैं, किन्तु संघ को अचानक राजनीति से बाहर निकालने में हिचक रहे हैं। न वे यह कह पाते कि भविष्य में संघ भी राजनीति में रहेगा। अच्छा तो ये हो कि संघ अपनी सन् 1965 की भूमिका पर लौट आए और देश का गौरव बढ़ाए। भाजपा के अधिकांश राष्ट्रीय पदाधिकारी संघ की पृष्ठभूमि के हैं।

इतना ही नहीं, पिछले कुछ वर्षो में भाजपा के सहयोगी दल विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, शिव सेना आदि का भी जो व्यवहार देश के समक्ष दिखाई दिया, उसे भी गरिमापूर्ण नहीं कहा जा सकता। उसमें भी अधिकांशत: धर्म के नाम पर ही किया गया। बड़े नेताओं के अहंकार की चर्चाएं मीडिया में भरी पड़ी हैं। चुनाव में जनता द्वारा नकारे जाने पर भी इनकी हैंकड़ी कम नहीं हुई। देश को किसी दल की चिन्ता नहीं होती, यदि नकारा है तो। चिन्ता तो लोकतंत्र और देश की है। ऎसा भी नहीं कि कांग्रेस इन झगड़ों से बची हुई है। किन्तु वहां एक ड़ोर से बंधे हैं।

आज कांग्रेस की सरकार केन्द्र में है। उसे भी दो दलों पर आधारित लोकतंत्र के बारे में चिन्तन करना चाहिए। प्रादेशिक पार्टियों को प्रदेश तक ही सीमित करना उचित है। नए सिरे से चुनाव आयोग को निर्देश दिए जाएं। चुनाव में जातिगत विष प्रभावी न रहे और आरक्षण भी बना रहे, इस पर निर्णय करना भी आज की महती आवश्यकता है। देश खण्डित होने से बच जाएगा।

देश के आगे हर व्यक्ति गौण हो जाना चाहिए। यशवन्त सिन्हा के बाद उन अन्य नेताओं को भी पदों से इस्तीफे दे देने चाहिए, जिन पर सार्वजनिक रूप से अंगुलियां उठ रही हैं। आज की स्थिति में बाहर बैठकर भी उन्हें पार्टी के लिए सकारात्मक कार्य में सहयोग देना चाहिए। आखिर उनका भी वर्षो का दुख-सुख का साथ रहा है। आशा करनी चाहिए कि पार्टी और संघ मिलकर शीघ्र ही स्थिति में सुधार लाएंगे। नहीं तो लोकतंत्र अपनी करवट स्वयं बदलेगा।

गुलाब कोठारी

3 टिप्पणियाँ »

  1. कोठारी सा,

    सही लिखा है आपने.. अगर हम एक देश को मजाक बनते नहीं देखना चाहते तो कुछ करना होगा. दो दलीय व्‍यवस्‍था भले ही बेहतर विकल्‍प नहीं हो लेकिन कोई विकल्‍प तो तलाशना ही होगा. किशन पटनायक के शब्‍दों में ‘ विकल्‍पहीन तो नहीं है दुनिया’.

    दूसरी बात, आपके आलेख नेट पर ब्‍लाग के रूप में आना अच्‍छा है. इससे और अधिक लोग आपके सुविज्ञ विचारों को पढ सकेंगे. आप मार्गदर्शक की भूमिका में हैं…

    सादर

    टिप्पणी द्वारा prithvi — जून 21, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • हर देश और काल में जनता ही विकल्प होती है।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — जून 26, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

      • kothari saheb,
        mr.kapil sibbal ne madarso ko manayta dene ki baat kar rahen hai.kya ye tushtikaran ki niti nahi hai?in logo ke Bap ka desh hai jab ji chahe,jo chahe parivartan kar de.kya desh main sarkari school nahi hai?kya muslim samudye ke bachhe in schoolon main shikchha grahan nahi kar sakte?phir alag se in madarson ki kya avasyakta hai?
        kya ye desh hit main hai?
        aap ka,
        dilip kumar
        bharuch(gujarat)

        टिप्पणी द्वारा dilip kumar — जून 28, 2009 @ 7:00


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