Gulabkothari's Blog

जून 22, 2009

राधा

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राधा-कृष्ण, प्रकाश और अधंकार इस सृष्टि के मूल तत्व हैं। दोनों ही देने वाले हैं। राधा की “राध साध सन्सिद्धौं से देने वाला तत्व है। सूर्य की रश्मियों को ही राधा नाम से जाना जाता है। स्वयं सूर्य कृष्ण है, काला है। इसका उदाहरण सूर्य मंत्र है, जिसकी शुरूआत में ही इसको कृष्ण संज्ञा दी गई है।

आकृष्णेन रजसा वर्तमानो
निवेशयन्नमृतं मत्र्यच
हिरण्ययेन सविता रथेना
देवो याति भुवनानि पश्यन्।

राधा देती भी है, लेती भी है। सूर्य से हमें आयु प्राप्त होती है और किरणें एक-एक दिन करके हमारी आयु को ले जाती हैं। वर्षा से हमको जल प्राप्त होता है। सूर्य किरणें उसे फिर से उठा ले जाती हैं। सम्पूर्ण आकाश पर राधा का अधिकार स्पष्ट दिखाई पड़ता है। आकाश की तन्मात्रा नाद है। आकाश ही कृष्ण की बंशी है। नाद से ही आगे की सृष्टि होती है। नाद से ही प्रकाश उत्पन्न होता है। रंग पैदा होते हैं। ये सभी ध्वनि तंरगों पर आधारित रहते हैं। ध्वनि के सात सुर ही इन्द्र धनुष के सात रंग बनते हैं। इन्हीं प्रकम्पनों या स्पन्दनों से प्राणियों का सप्त धातु युक्त शरीर बनता है।

सूर्य एवं रश्मियों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। राधा के ह्वदय में तो कृष्ण रहते हैं। कृष्ण तक पहुंचने का माध्यम भी राधा ही है। अन्य कोई माध्यम हो ही नहीं सकता। राधा से ही सृष्टि का संचालन होता है। औषधि वनस्पति, अन्न पैदा होता है। अन्न ही शरीर में जाकर शुक्र-रज का निर्माण करता है और सृष्टि विकास का निमित्त बनता है।

राधा ही ज्ञान रूपी प्रकाश भी है। यही अज्ञान को जलाती है। आत्मा को प्रकाशित करने वाली है। व्यक्ति को अपने आत्मा के पास पहुंचाती है। राधा का विपरीत शब्द है-धारा। प्रवाह की निरन्तरता को धारा को कहा जाता है। धारा का कार्य है- विषय को व्यक्ति से दूर-दूर ले जाना। जिस प्रकार गंगा की धारा पानी को गंगोत्री से ले जाकर समुद्र में छोड़ देती है। हमारा जीवन भी एक धारा की तरह चलता रहता है। कभी लौटता नहीं है-धारा की तरह। जो पानी एक घाट से निकल गया, वापिस उस घाट पर नहीं आता। इसीलिए शास्त्र कहते हैं कि प्रवाह में नहीं जीना है। व्यक्ति प्रवाह पतित हो जाता है। अपना नियंत्रण भूल जाता है। यह भी निश्चित है कि धारा का सहज रूप नीचे की ओर बहना होता है। नीचे गिरने को ही नरक कहते हैं। धारा का रूख आसानी से ऊपर नहीं मुड़ता। वहां तो राधा ही उसे उठाकर ऊपर ले जा सकती है। बातचीत में एक बार स्वामी गुर्वानन्द जी ने कहा था कि “राधा” शब्द अत्यन्त शक्तिशाली मंत्र रूप है। किसी को नींद नहीं आ रही हो, उसे राधा-राधा बोलना शुरू कर देना चाहिए। सात मिनट में उसे हर हाल में नींद आ जाएगी। दवाई तो लेनी ही नहीं पड़ेगी।

राधा ही कृष्ण की शक्ति है। कृष्ण की शक्तियों का परिचय भी राधा से ही मिलता है। जिन गौओं को कृष्ण चराते हैं वे भी तो सूर्य रश्मियों के माध्यम से ही पृथ्वी पर आ रही हैं। सूर्य से हमको ज्योति-आयु और गौ (विद्युत शक्ति) प्राप्त होती है। इसी विद्युत शक्ति के सहारे हमारी चेतना का विकास होता है। मूल में यह परमेष्ठी मण्डल में सविता के नाम से जानी जाती है। सविता के लिए लिखा है-सविता वै अस्माकम् प्रसविता। हमको,सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाली है। यही विद्युत सूर्य किरणों के द्वारा सम्पूर्ण चराचर में व्याप्त रहती है। सूर्य का आधार ऊपर के सोम लोक-परमेष्ठी का सोम है। यह भी सूर्य किरणों के द्वारा ही सूर्य तक पहुंचता है। इसी से सूर्य की ज्योति और ताप बना रहता है। यह सोम ही सूर्य किरणों में मरीचि रूप झिलमिल की तरह दिखाई पड़ता है।

राधा ही गायत्री रूप दिखाई पड़ती है। ब्राह् मूहुर्त में इसी गायत्री के पांच मुख (रंग) हमें दिखाई पड़ते हैं। शेष अहोरात्र में यह रंग दिखाई नहीं पड़ते। अत: इस काल में स्वाध्याय करना विशेष महत्व रखता है। इसको संध्या काल भी कहा जाता है। इस काल के लिए तो कहा गया है कि व्यक्ति चाहे तो अपने भविष्य का निर्माण इस काल में कर सकता है। अपना भविष्य बदल सकता है। अन्य संध्याओं में यह शक्ति नहीं है। गायत्री ही सूर्योदय के बाद सावित्री कहलाने लगती है। महर्षि अरविन्द ने सावित्री तत्व पर अच्छा शोध किया है।
अंधकार में भी कुछ प्रकाश अवश्य रहता है। यह परावर्तित प्रकाश होता है। प्रकाश और अंधकार को भी अलग नहीं कर सकते। राधा-कृष्ण जो ठहरे। श्रद्धेय बाबूसा. ने सात सैंकड़ा में लिखा है-

जो दीखे सो राधिका, न दीखे वो कृष्ण
कृष्ण-शुक्ल दोनों खड़े, बड़ो विकट छे प्रश्न ।

हमारे शरीर में पांच स्थूल प्राण होते हैं-प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। इनमें से तीन- प्राण-अपान-व्यान मुख्य होते हैं। ये तीनों हमारा ह्वदय बनाते हैं। प्राण यानी “द”, अपान ह्व और व्यान को यम् कहा है। अपान आहरण शक्ति देता है। केन्द्र की ओर अन्न लाता है। प्राण बचे हुए को, उच्छिष्ट को बाहर फेंकता है। व्यान केन्द्र में रहकर नियंत्रण करता है। जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों को नियंत्रित करता है। व्यान रूप में हमारे शरीर का ह्वदय रूप नियंता बनता है। प्रतिष्ठा बनता है। सौर रश्मियों का प्राणन-अपानन (आना-जाना) सूर्य के द्वारा नियंत्रित रहता है। प्रत्येक रश्मि पीछे हटती हुई आगे बढ़ती है। हमारे श्वास की तरह जान पड़ती है। इस आगे पीछे होने की क्रिया को सर्पण प्रक्रिया कहते हैं। धूप और छाया के बीच एक रेखा खींच दें तो दिखाई देगा कि प्रकाश पीछे हटते हुए आगे बढ़ता है। यही प्राणन-अपानन क्रिया हमारे स्थूल शरीर में भी कार्य करती है। प्रकाश और अधंकार के बीच इसी को राधा-कृष्ण का रास कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होती। प्राणायाम का लक्ष्य भी प्राणन-अपानन प्रक्रिया के माध्यम से, श्वास-प्रश्वास पर ध्यान केन्द्रित करते हुए व्यक्ति को आत्मा से एकाकार करना है।

गुलाब कोठारी

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