Gulabkothari's Blog

जून 26, 2009

बेडियां

बहुत अच्छा
लग रहा था
वह
पहली ही मुलाकात में,
चंचल मन
चाह रहा था
लपकना
बाद में भी
किए थे प्रयास
मैंने ही
उसे रिझाने के
अपनी अदाओं से
अपने श्रृंगार से
हंसी-गाथाओं से
सिनेमा की तरह
अभिनेत्री बनकर।
प्रशंसा करती थी
उसकी, मुक्त-कंठ से
मानती थी
उसकी हर बात
पी लेती थी
एक-दो घूंट भी
उसके साथ।
मम्मी कहती थी
बदल रही हूं मैं
शायद कोई
मिल गया मुझको
टालती रही
हर जवाब को
जैसे कुछ हुआ न हो।
अनायास
एक दिन
आया वो
नशे में धुत
बांह से खींचा
कमरे की ओर
मैं चीखी
किंतु भीतर
एक द्वंद्व भी था
चाहती भी रही हूं
इसी कमबख्त को
इतने काल से,
प्रतीक्षा रही थी
इसी दिन की भी
ताकि बन सकूं
मां
उसके बच्चे की,
किंतु सोचा ना था
ऎसा भी आएगा
मनहूस दिन,
लड़ना भी चाहा
हाथ उठे नहीं
भवानी की तरह
रोक पाने को
उसकी बढ़त
आधी हां, आधी ना,
में ही फंसी
चीखने का प्रयास
काम नहीं आया
और कुछ करती
इसके पहले ही
किसी ने बंद किया
मेरा मुंह
और कर दिया
उसे काला।
आज मैं
सिहर जाती हूं
आदमी के नाम से,
सिनेमा की तरह
घूम जाती है
सारी घटना
मेरी आंखों के आगे
देखती हूं
सूनी आंखें
मां के चेहरे पर
रोती हूं
अपने इस
औरत होने पर।
बच सकती थी
शायद
यदि रहती
मर्यादा में
बताती रहती
मां को भी
हर दिन की दास्तान।
नहीं रहती
इतनी स्वच्छंद
लड़कों की तरह
प्रवाह में पड़कर
नहीं सौंपती
अपनी धरोहर
किसी निर्लज्ज को
रोक सकती यदि
अपने इशारे
नादानी के
उसे रिझाने के,
नहीं करती
दुरूपयोग
स्वतंत्रता का।
इतनी बड़ी सजा
कैसे कटेगी
पूरी उम्रभर
क्या होगा
कोसते रहने से
आदमी को,
जीना भी पड़ेगा
उसी के साथ
बच नहीं पाऊंगी
संभव नहीं लौटाना
जो सब चला गया
नहीं बन पाऊंगी
अल्हड़,
पहले जैसी
स्वच्छंदता ही
बन गई हैं
बेडियां मेरी
मुक्ति की तलाश में।

गुलाब कोठारी

10 टिप्पणियाँ »

  1. पहले जैसी
    स्वच्छंदता ही
    बन गई हैं
    बेडियां मेरी
    मुक्ति की तलाश में।

    सत्य वचन.

    चन्द्र मोहन गुप्त

    टिप्पणी द्वारा Chandra Mohan Gupta — जून 28, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. sach, magar duniya ko manjoor nahji.

    टिप्पणी द्वारा sa ty prakash singh — जून 26, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. कई बार पढ़ा…बहुत सुन्दर और गहरे भाव!

    टिप्पणी द्वारा समीर लाल — जून 26, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  4. किसी ने बंद किया
    मेरा मुंह
    और कर दिया
    उसे काला।
    आपके द्वन्द ने तो हलचल मचा दी. यह मज़बूरी कई सवाल खडे़ कर देती है.
    कितना खूबसूरती से बयान किया है आपने!!

    टिप्पणी द्वारा M Verma — जून 26, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • गल्तियां करने में सुंदर लगती हैं, परिणाम भोगने में नहीं।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — जुलाई 10, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  5. अपने मनोभावों को सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

    टिप्पणी द्वारा परमजीत बाली — जून 26, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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