Gulabkothari's Blog

जुलाई 1, 2009

छटपटाहट

फूटती है जब
दबी हुई
प्रतिक्रिया
विस्फोट होता है
जीवन में
बंधक बनी
नारी
छटपटाने लगी
स्वतंत्र होने को
इस संघर्ष में
लड़ते-लड़ते
हो गई
आक्रामक अनायास,
झपट पड़ती है
अवसर मिलते ही
आदमी पर
लहूलुहान हो जाता है
आदमी
उसे नहीं आता
पलटवार
नई सदी की नार
आदमी को ठोकर मार
चल पड़ती है
अगले मुकाम को।
यहीं से हो जाता है
शुरू तांडव
उसके जीवन में
शिवजी की तरह
नाप लेती है
धरती
लक्ष्यहीन बनकर
प्यासी, अतृप्त सी,
सारी मृदुला
पथरा जाती है
सपने बुन नहीं पाती
किसी एक के सहारे
मृगतृष्णा
मिट नहीं पाती
बंद हो जाते हैं
ह्वदय कपाट
बंद हो जाता है
क्रंदन
भीतर ही।
क्या कहे
किससे कहे
लगाकर मुखौटा
तलाशती रहती है
उन आंखों को
जो
झांक सके भीतर
उसके मन तक
दुलार सके
उसकी भूलों को
बांट सके
दर्द उसका
कर सके हल्का
उसके जी को
वरना
यह प्यास
भटकाएगी उसे
फिर से
जनम-जनम।

गुलाब कोठारी

10 टिप्पणियाँ »

  1. mujhe apki sabhi poems bahut pasand ati hai aap hamesha practical jiven ke bare me likhte hai sir meri bhi literature me lekhan me bahut ruchi hai kripya mera margdarshan kare Thanks

    टिप्पणी द्वारा Bharti Sharma — अप्रैल 30, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. Pahali Bar Aapka Blog pada.Patrika mai har sunday aapki Lekhani ki taralta aur prawah maan ko santushti deti hai par is kavita mai to aapne mere jaise kaiyo ke jeevan ke katu saatya aur dard ko paribhashit kar diya.

    Dhanyavad kothaiji.

    टिप्पणी द्वारा anita sushil kumar — फ़रवरी 1, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  3. great shri kothari jee

    टिप्पणी द्वारा AMIT — जुलाई 8, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  4. उन आंखों को
    जो
    झांक सके भीतर
    उसके मन तक
    दुलार सके
    उसकी भूलों को
    बांट सके
    दर्द उसका
    कर सके हल्का
    उसके जी को

    बस यही तो नहीं होता तथाकथित पढ़े-लिखे अज्ञानी मनुष्य से, वर्ना समस्याएं पनपती ही क्यों.
    वस्तुतः अधिकांश समस्याएं लोभी, स्वार्थी, पथभ्रष्ट मनुष्य / समाज की ही देन है.

    एक उच्च स्तरीय गहन विचारों से भरी प्रस्तुति का आभार.

    हार्दिक बधाई.

    चन्द्र मोहन गुप्त

    टिप्पणी द्वारा Chandra Mohan Gupta — जुलाई 8, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  5. ati bhaav bhini kavita.. aaj ki naari ke badaltey parivesh aur ussey judi chunaotiyon sey sakhatkaar karaati hai aapki yeh rachna…

    टिप्पणी द्वारा Harsh Rai Puri — जुलाई 6, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  6. a brief but bitter over look on the woman that is abounding in our todays society, i render you a lots of thanks and ask for keep ongoing.

    टिप्पणी द्वारा shashibhushantamare — जुलाई 2, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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