Gulabkothari's Blog

जुलाई 11, 2009

संगीत

हमारी सृष्टि आकाश से होती है। आकाश की तन्मात्रा नाद है। अत: सम्पूर्ण सृष्टि का विकास ही नाद से होता है। नाद से ही ध्वनि बनती है। ध्वनि तरंगों की लयबद्धता को ही संगीत कहते हैं। ध्वनि के क्रम विशेष को (लय को) स्पन्दनों के द्वारा ही अनुभव किया जाता है। सभी प्रकार की ध्वनियां स्पन्दन से ही प्रभाव डालती हैं, अत: संगीत का प्रभाव भी स्पन्दन रूप ही होता है।
ध्वनि, नाद, शब्द, स्वर आदि वाक् कहलाते हैं। सरस्वती को वाग्देवी के नाम से जाना जाता है। लक्ष्मी अर्थवाक् की देवी है। दोनों ही प्रकार की वाक् नाद से ही उत्पन्न होती हैं। हमारा शरीर भी नाद के स्पन्दनों से ही बनता है। शरीर, इन्द्रियां, बुद्धि, मन, आत्मा आदि सभी के मध्य ये ध्वनि स्पन्दन सेतु का कार्य करते हैं। अत: संगीत और हमारे अध्यात्म का सीधा संबंध है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में संगीत को उपासना और भक्ति का अभिन्न अंग माना गया है।
ध्वनि, गति, दिशा आदि को प्राकृतिक क्रम में लयबद्ध करके भारतीय संगीत का यह विकास देखा जाता है। संगीत श्रम भी है, शिल्प भी है और कला भी। खड़े होकर जब कोई बच्चा गाने लगता है, तब उसे श्रम कहा जाता है। उसे तो बस आज्ञा का पालन करने के लिए गाना है। जब संगीत का गठन किया जाए, सुर-ताल-लय में स्वरूप दिया जाए, तब यह शिल्प रूप होता है। लेकिन संगीत को जब मनोभावों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में काम लिया जाए, तब संगीत कला बन जाता है। कला रूप होने के बाद ही संगीत श्रोता के मन को छू सकता है। प्रभावित कर सकता है। तब गायक और श्रोता एकाकार हो जाते हैं। शरीर और बुद्धि शिथिल हो जाते हैं, मन खो जाता है। व्यक्ति कुछ समय के लिए आत्मस्थ हो जाता है। इसी का नाम भक्ति संगीत है। भारतीय संगीत में एकल गायन की परम्परा भक्ति संगीत की देन है। इसमें ऊर्जा है, उष्मा है, प्रकाश है। चेतना जागरण का मार्ग प्रशस्त होता है।
भारतीय संगीत सत्वगुण प्रधान है। रजो गुण इसको गति देता है। इससे ही प्राणों में स्पन्दन उठता है। आकाश का नाद संगीत में बदल जाता है। इसी आधार पर हमारी मंत्र जप की परम्परा चलती है। व्यक्ति वाचिक जप से शुरू होता है, उपांशु से होते हुए मानस जप में उतरता है। इसमें आकाश और ध्वनि घटते जाते हैं। आगे चलकर आकाश लुप्त हो जाता है और व्यक्ति बिंदु भाव में प्रवेश कर जाता है।
भारतीय संगीत में ध्वनि की निरन्तरता रहती है। इसी से मन तक पहुंचता है। आज के पाश्चात्य संगीत में निरन्तरता नहीं है। अत: वह शरीर और बुद्धि के आगे प्रभावित नहीं करता। समझने की बात यह है कि हमारा शरीर ध्वनि से बनता है। गर्भावस्था में शिशु ध्वनि के माध्यम से ही ज्ञान प्राप्त करता है। अभिमन्यु का उदाहरण हमारे सामने है। हमारे शरीर में जो ऊर्जा केन्द्र हैं, जिन्हें हम चक्र कहते हैं, वे भी स्पन्दन रूप में ही आकाश से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। इन पर हमारे भावों और विचारों के स्पन्दनों का भी प्रभाव पड़ता है। उसी तरह का शरीर बनता है। प्रकृति से जुड़ा रहता है। अत: संगीत जीवन को प्रभावी करने वाला शक्तिशाली माध्यम है। व्यक्तित्व में परिवर्तन लाने का सशक्त माध्यम है। आज तो संगीत केवल मनोरंजन का साधन बनकर रह गया। इसका भी शरीर पर प्रभाव तो पड़ेगा ही। आवश्यकता है संगीत के सकारात्मक उपयोग की। इसके लिए आस्था ही एकमात्र सूत्र है। इसके बिना नाद ब्रह्म की साधना संभव नहीं। इसी साधना से ऊर्जा को पदार्थ में बदला जा सकता है। वर्षा हो सकती है। प्राकृतिक शक्तियों का और भीतर के ईश्वरीय अंश का विकास हो सकता है। संगीत के स्पन्दन भीतर आत्मा को छूते रहें, यह आवश्यक है। जीवन यापन एक बात है, साधना दूसरा मार्ग है। इस मार्ग पर आपको कभी यह अभाव महसूस नहीं होगा कि आपके पास दृष्टि नहीं है। संगीत साधना में आपको जो नजर आएगा, अन्य किसी को नहीं आएगा।
गुलाब कोठारी

1 टिप्पणी »

  1. thik hai

    टिप्पणी द्वारा loksangharsha — जुलाई 12, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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