Gulabkothari's Blog

जुलाई 13, 2009

तपन

जीवन के लिए शास्त्रों में अनेक विधान उपलब्ध कराए हैं। पुरूषार्थ एक है। ज्ञान मार्ग,कर्म मार्ग,भक्ति मार्ग, बुद्धि योग जैसे कई फार्मूले दिए हैं। साथ ही यह भी कहा है कि इस जीवन का पर्याय केवल कर्म है। इसी के सहारे भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। मन और प्राण इसमें सदा सहायक रहेंगे। कर्म शरीर करेगा। इसके बाद भी जीवन की चाबी ईश्वर ने अपने हाथ में रख ली। कर्म करने की इच्छा आप स्वयं पैदा नहीं कर सकते। यह ईश्वर के हाथ में ही रहेगी। सब कुछ करते हुए भी कर्ता वही है। मैं निमित्त मात्र ही हूं।

भारतीय शास्त्रों ने कर्म को दो भागों में श्रेणी बद्ध किया है- प्राकृतिक कर्म (आहार-निद्रा आदि) एवं मानव जनित कर्म। मानव के कर्म तीन प्रकार के कहे गए हैं-यज्ञ,तप और दान। कर्म का आधार इच्छा, कर्म का निर्णय बुद्धि(विद्या और अविद्या) से और कर्म का निष्पादन शरीर से। मन के साथ प्राण-वाक् का जुडे रहना ही कर्म है। शरीर स्वयं कर्म फल(प्राप्ति और भोग) का ही परिणाम है। चूंकि जीवन का लक्ष्य पुरूषार्थ पर आधारित मोक्ष है, अत: कर्म को मर्यादा में रखना और उसकी दिशा निर्धारित करना भी आवश्यक है। इसके बिना मनुष्य अविद्या के प्रवाह में आसानी से बहता चला जाता है। यज्ञ,तप और दान के माध्यम से जीवन की गति विद्या की ओर बनी रहती है। विज्ञान या प्रज्ञा की ओर बढ़ता है। सूक्ष्म धरातल से जुड़ जाता है। स्थूल और सूक्ष्म का संतुलन बना रहता है। ऎसी अवस्था में कर्म योग, ज्ञान योग आगे जाकर एक हो जाते हैं। संचित कर्मो को भी जला देते हैं।

यज्ञ का नाम सुनते ही लगता है कि यह तो जलाने वाला ही कार्य है। अग्नि में सोम की आहुति को यज्ञ कहते हैं। यह जीवन भी यज्ञ है। प्रकृति भी यज्ञ है। हर यज्ञ में सोम को तो जल जाना होता है। अग्नि ही शेष रहता है। अत: विश्व के सम्पूर्ण स्वरूप अग्नि रूप ही माने जाते हैं। वायु मण्डल के सोम के सहारे टिके रहते हैं। सबकी अपनी- अपनी आयु होती है। हमारा जीवन सौर संवत्सर पर आधारित है। एक वर्ष के काल को संवत्सर, छ: माह को अयन कहते हैं। ऋतुओं के चातुर्मास को आर्तव तथा पखवाड़े को पक्ष क हते हैं। यज्ञ कार्यों में अग्नि में अग्नि की आहुति देकर शरीर के आयतन को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है (अग्नि को)। इस अग्नि चित्या यज्ञ से देवात्मा बनता है। सूर्य देवराज है। इस कार्य के लिए पहले अग्नि होत्र, अग्नयाधान आदि से शरीर की अग्नि को यज्ञाग्नि में बदला जाता है। तब संस्कार रूप पांच प्रकार के यज्ञ किए जाते हैं। दैनिक, दर्शपूर्ण मासिक, चातुर्मास्य, पशुबन्ध और संवत्सर । इनका समापन ज्योतिष्टोम यज्ञ से होता है। ये सभी यज्ञ संस्कार रूप होते हैं। इनमें शरीर की वैश्वानर अग्नि पुष्ट होकर पांचों मार्गो से सूर्य तक जाती है। इसी को मोक्ष मार्ग कहा गया है।

आज यज्ञ परम्परा के ये आधार छूट चुके हैं। स्वयं यज्ञ तो कुछ ब्राह्मण ही करते होंगे। अन्य वर्णो में तो बन्द ही हो गए। किसी को बुलाकर करवाया जाए तो व्यापार दिखाई पड़ेगा। न तो यजमान कुछ जानता है, न ही आचार्य को यज्ञ की वैज्ञानिकता का पता होता है। मंत्रों के संगठनात्मक और ध्वन्यात्मक स्वरूप नहीं जानते। स्पन्दन की भूमिका, गति और प्रभाव से अनभिज्ञ होते हैं। पल्लवग्राही पांडित्य का युग है। इसीलिए लोगों का विश्वास उठता जा रहा है।

तप की भी कर्म संज्ञा है। इसका अर्थ सीधा-सीधा है- तपना। अर्थात अग्नि के साथ जुड़ना। अग्नि में कुछ जला डालना और हल्के हो जाना। यहां न तो स्थूल अग्नि का क्षेत्र है, न ही ज्वलनशील सामग्री का । अग्नि से हमारा स्वरूप बना है। अग्नि से हमारा अन्न पचता है और शरीर का पोषण करता है। अग्नि से ही विचार कार्य करते हैं। कार्य तो प्राणों का है, किन्तु ज्ञान का भाग, अंहकार के स्वरूप आग्नेय होते हैं। आत्मा के साथ कर्म संस्कार जुड़े रहते हैं, जिनके फल हम भोगते हैं। यहां तप का अर्थ है ज्ञानाग्नि के द्वारा कर्म संस्कारों को जला देना। इसके अलावा भी जब व्यक्ति कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त करना चाहता है, तब तप करता है। तपन सदा प्राणों का होता है। सूर्य तपता है, तब उसके भीतर जो ऋक्-यजु-साम प्राण हैं, उनका तपन होता है। उष्णता तो परिणाम है। हम श्रम करते हैं, तपते हैं, पसीना आता है। यह भी प्राणों का ही तपन है। तपन क्रिया है और यह प्राणों द्वारा ही चलती है। इससे सृष्टि की भूतमात्रा को कम किया जाता है। पशुभाव हटता है और इसका स्थान नया देवभाव लेता है। नए प्राणों का आना ही परिणाम है। तपन में दो क्रम होते हैं- याग और योग। हमारा सम्पूर्ण चिन्तन प्राणों का तपन ही है। इसी से नए- नए विचार पैदा होते हैं।

तप एक अभ्यास भी है। इससे शरीर पर नियंत्रण रखा जा सकता है। प्राण ही तो शरीर को क्रियाशील बनाते हैं। भूख-प्यास जैसी बाधाएं आपके ध्यान में न आएं, इस कार्य को तप के द्वारा साधा जाता है। जीवन स्वयं में एक तप ही है। संघर्ष भूमि है। हमें यदि सर्जन करना है, तो तपना ही होगा। किन्तु यह बाह्यान्तर तप है। इसमें यजु प्राण को गतिमान करके भाग्योदय किया जा सकता है। जबकि आभ्यान्तर तप शरीर की वैश्वानर को अन्तरिक्ष और द्यु-लोक की अग्नि से जोड़ता है। यहां प्रज्ञा तपन का माध्यम बनती है। व्यक्ति ऋत् में प्रवेश करता है। इन विभिन्न अग्नियों के संघर्ष से एक नया ज्ञानाग्नि पैदा होता है।

इसी के द्वारा कर्म संस्कारों को दग्ध किया जाता है। इसमें इतनी शक्ति होती है कि नए संस्कारों का प्रवेश ही नहीं हो सकता। आत्मा का अन्तरंग भाग हल्का होता जाता है। वहां विज्ञान और आनन्द भाव प्रतिष्ठित होने लगते हैं। हमारे यहां तप के अनन्त स्वरूप दिए गए हैं, किन्तु मुख्य रूप से ब्रह्मचर्य, सत्य भाषण और अनशन को विशेष महत्व दिया गया है। इनके कारण पशुभाव के आहार-निद्रा-भय, मैथुन पर विजय प्राप्त होती है। जिस प्रकार व्यायाम में प्राणों का तपन अधिक बल प्राप्ति के लिए किया जाता है, वैसे ही सत्य बल की प्राप्ति के लिए तप किया जाता है। तप में स्थूल दृष्टि नहीं रहती। भाव ही महत्वपूर्ण होते हैं। सारे परिणाम सूक्ष्म शरीर में आते हैं। तप वैसे तो त्याग के साथ ही जुड़ा रहता है। इसीलिए दान को भी त्याग रूप तप ही कहा गया है।

दान बाहरी संसार से जुड़ा रहता है। परिग्रह-मुक्ति का मार्ग है। जिन वस्तुओं के मोह ने मन पर अधिक आवरण डाल रखे हैं, मन की स्वतंत्रता को बन्धक बना लिया है, आत्मा को सुख की अनुभूति कराते हैं, जिनका अधिक अंश आत्मा पर छाया रहता है, उन प्रिय वस्तुओं को पूर्ण समर्पण भाव से किसी को दे देना। उस पर स्वयं का अधिकार छोड़कर, अन्य व्यक्ति का अधिकार स्थापित कर देना दान है। इससे नए बलों का सृजन होता है। शुभ कार्यों में, जनहित के कार्यो में किया गया व्यय भी आपूर्त दान कहलाता है। धन का नि:स्वार्थ उत्सर्ग करना। एक दान होता है जो पात्रता देखकर किया जाता है। संकल्प के साथ किया जाता है। एक दान है जो कुपात्र को भी दे सकते हैं। ये सारे बुद्धि के ही भेद हैं। दान भी मूलत: आत्मा का तपन ही है। सभी तप व्यक्ति को अविद्या से हटाकर, आवरण मुक्त करके अधिदेव की ओर मोड़ते हैं। ऊपर उठना है तो अग्नि रूपा होना पड़ेगा।

गुलाब कोठारी

3 टिप्पणियाँ »

  1. gr8 article………i was always big friend of your article sir

    टिप्पणी द्वारा abhishek sharma — अप्रैल 20, 2010 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. respected sir…….
    with humble submission……
    i am a die hard fan of all your write ups……i use to read all your write ups published in Rajasthan patrika on every sunday in regular basis…….without missing it……….
    and the human values you worship the most…..

    thank you sir………….

    yours
    bidisha biswas dubey……..

    टिप्पणी द्वारा Bidisha Biswas Dubey — जुलाई 14, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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