Gulabkothari's Blog

जुलाई 17, 2009

नई संस्कृति

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00

किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। इसी कारण हजारों साल से भारत ऎसा दर्पण बना हुआ था जिसमें अन्य देश अपना चेहरा देखते रहे हैं। उसी देश की संस्कृति की आज जो दुर्गति हो रही है, उसे देखकर खून के आंसू भी टपकें तो कम है। क्योंकि जो कुछ नया होने लगा है, उसके कर्णधार भी आज के शिक्षित लोग ही हैं। अशिक्षित ऎसा मर्यादाहीन होकर किसी समाज में नहीं रह सकता।
राजस्थान विधानसभा का नजारा हमने तीन दिन तक देखा। जो सुना, उसका स्वरू प मूल रू प में व्यक्तिगत लांछन का था। मायावती और रीता बहुगुणा का प्रकरण भी व्यक्तिगत लांछन का ही है। और इस नए प्रयोग की शुरूआत भी चुनाव अभियान में दोनों बड़े राजनीतिक दलों के मुखियाओं- मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी ने ही की। फिर नीचे वाले सवाया क्यों नहीं करेंगे।
आज राजनीति में पहले ही आपराधिक तत्वों की अनिवार्यता दिखाई पड़ रही है। राजनीति का ज्ञान और क्षेत्र या समस्याओं पर इनकी पकड़ होना कोई अनिवार्यता नहीं हैं। दु:साहसी भी होते हैं। चलते हुए को धक्का मारने का काम करते हैं। मर्यादा की इनकी अपनी कोई अवधारणा नहीं होती। ये अपनी अन्य विशेषताओं के कारण ऊपर तो पहुंच जाते हैं, किन्तु इनके आचरण से हम मतदाता जरू र शर्मिन्दगी महसूस करते हैं। नया मतदाता जागरू क है। जब वह पानी-बिजली के लिए दफ्तरों का घेराव कर सकता है, पुलिस के सामने डटा रह सकता है, तब वह दिन दूर नहीं जब अपने जन प्रतिनिधि से भी हिसाब मांग बैठे। आज जिस प्रकार की भाषा संभ्रांत नेताओं के नाम से सुनी जा रही है, जो कुछ रीता बहुगुणा जैसी महिला नेता ने कहा, अथवा बड़े नेता जो-जो बोल चुके, वह इस बात का प्रमाण है कि ये लोग शिक्षित तो हैं, किन्तु उनके संस्कारवान होने पर प्रश्नचिन्ह दिखाई पड़ता है। देश की धरती के प्रति इनके मन में कोई सम्मान नहीं बचा है।
आज इतने तरह के शिक्षण-प्रशिक्षण विश्व में हो रहे हैं, किन्तु राजनेताओं के प्रशिक्षण और आचरण के आकलन की व्यवस्था भी नहीं है। आज के वातावरण को देखकर तो लगता है कि इन मुद्दों को भी कानून के घेरे में लाने की महती आवश्यकता है। हालांकि कानून भी जब बनते हैं कुछ मंशा लेकर बनते हैं। बाद में राजनेता ही स्वार्थ या राजनीति के कारण इनको बदल देते हैं। जैसे दल-बदल कानून। यह भी सही है कि कानून से ही सब कुछ नहीं हो जाता। दृढ़ इच्छाशक्ति पहली आवश्यकता है। जो भी नेता/प्रतिनिधि मर्यादाविहीन प्रदर्शन करे, उसे तत्काल दण्डित किया जाना चाहिए। बिना किसी लिहाज के। इसमें लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को भी एकजुटता दिखानी चाहिए। देश हित में किसी भी अनौपचारिक गठजोड़ का साथ नहीं दिया जाए। अब आवश्यकता यह भी है कि संसद की तरह विधानसभाओं की कार्यवाही का भी टीवी पर सीधा प्रसारण होना चाहिए। नागरिक देख सकें कि उनका प्रतिनिधि अपनी ओछी हरकतों से उनकी नाक तो नहीं कटवा रहा।
गुलाब कोठारी

3 टिप्पणियाँ »

  1. यह संस्‍कृति नहीं है, यह विकृति है। सत्ता का न
    शा आज इतना हावी हो चुका है कि मर्यादाएं समाप्‍त होती जा रही हैं। हमारे ॠषि कहते थे कि अपने अवगुण देखो और दूसरे के गुण देखो, लेकिन अब विपरीत हो गया है। दूसरे में हमें कोई गुण दिखायी देता ही नहीं, उसके चरित्र हनन के बारे में ह‍ी हम लामबन्‍द होकर सोचते हैं और स्‍वयं में अवगुण दिखायी नहीं देते। सम्‍पूर्ण समाज से संस्‍कार समाप्‍त हो रहे हैं। भोगवाद हम पर हावी हो चुका है अत: अब तो परिवारों से ही संस्‍कार की शुरुआत करनी होगी।

    टिप्पणी द्वारा ajit gupta — जुलाई 17, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • कौन मां अपने बच्चों को सिखा पाती है। पहले तो पेट में ही दे देती थी।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — अगस्त 4, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. कटवा तो रहे हैं..बस, पब्लिक देख का प्रबंध हो जायेगा आपके सुझाव से.🙂

    टिप्पणी द्वारा समीर लाल — जुलाई 17, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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