Gulabkothari's Blog

जुलाई 20, 2009

देववाणी संस्कृत

यह जयपुर अथवा छोटी काशी का ही सौभाग्य है कि यहां पर तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन हो रहा है। देश-विदेश के सभी विद्वानों का अभिनन्दन!
आज भी संस्कृत को देववाणी ही कहा जाता है, किन्तु इसकी दुर्दशा भी बहुत हो रही है। देश भर में संस्कृत के विश्वविद्यालय भी अनेक खुल चुके हैं। क्या लक्ष्य लेकर ऎसा हो रहा है, यह समझने की महती आवश्यकता है। यह भी बड़ा प्रश्न है कि क्या संस्कृत केवल भाषा ही है अथवा जीवन की डोर इसके साथ कहीं गहरे में जुड़ी हुई भी है। सारी भाषाओं को तो देववाणी नहीं कहा जाता। क्या संस्कृत पढ़े-लिखे लोग देवों की तरह व्यवहार करते दिखाई देते हैं क्या संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन के अलावा कहीं उपयोग किया जाता है आज संस्कृत का छात्र भी पढ़ाई के बाद संस्कृत पढ़ाने के अलावा क्या करता है

संस्कृत सृष्टि सूत्रों में बंधी भाषा है। जिन सिद्धान्तों पर सृष्टि का विकास होता है, उन्हीं सिद्धान्तों पर संस्कृत विकसित है। जिस प्रकार सृष्टि का आलम्बन अव्यय है, उसी प्रकार शब्द, वर्ण, पद आदि का आलम्बन भी स्फोट है। अक्षर से सृष्टि बनती है और अक्षर में ही लीन होती है। हमारी सम्पूर्ण वर्णमाला “अ” (स्वर) से निकलती है। संस्कृत की शोध सृष्टि के सभी प्राकृतिक रहस्यों को खोलती है। इसीलिए देववाणी है। इसीलिए शब्द को ब्राह् कहा है। आज की संस्कृत शिक्षा में कहीं इस क्षेत्र में कार्य होता नहीं दिखाई पड़ रहा। जो कार्य स्व. पं. मधुसूदन ओझा ने जयपुर में किया था, पथ्यास्वस्ति और वर्ण समीक्षा के रू प में, वह भी कहीं चर्चा में नहीं है।

संस्कृत भाषा की एक अन्य विशेषता यह भी है कि हर शब्द के अर्थ भी शब्द में ही निहित होते हैं। अत: वेदों का विश्लेषण करने की क्षमता अन्य भाषाओं में नहीं है। आज वेदों पर जो कार्य हो रहा है, उससे वेदों की वैज्ञानिकता विश्व के समक्ष नहीं पहुंच पा रही है। इस दृष्टि से भी स्व. मोतीलाल शास्त्री, स्व. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी जैसे मनीषियों ने खूब काम किया है। मैंने किसी शोध छात्र को इन पुस्तकों में डूबते हुए नहीं देखा। धूल ही खा रही हैं। हम शोधकर्ताओं को पत्रम्- पुष्पम् देने की व्यवस्था भी कर सकते हैं। आता कोई नहीं है। फिर संस्कृत को केवल भाषा रू प में प्रतिष्ठित करके हम विश्व के समक्ष क्या रख पाएंगे

कश्मीर की शैव परम्परा, ओझा जी की विज्ञान व्याख्याएं और पथ्यास्वस्ति का समानान्तर अध्ययन कराया जाए तो संस्कृत विद्वानों को नई दृष्टि प्राप्त हो सकती है। तब गीता भी हमें अलग तरह से दिखाई पड़ेगी। पुराणों के भी हम वैज्ञानिक अर्थ और सृष्टि तत्वों की विवेचना ग्रहण कर सकेंगे। इनके कथानक मात्र सांकेतिक भाषा है। संस्कृत सम्मेलन से अपेक्षा है कि संस्कृत के माध्यम से वेदों का पुन: आकलन करने का, आज के युग में व्यावहारिक बनाने का मार्ग प्रशस्त किया जाए। इसके बिना संस्कृत सीखने का भी कोई अर्थ नहीं है। इसे साध्य नहीं साधन रू प देखा जाए।

गुलाब कोठारी
[लेखक पत्रिका समूह के संपादक हैं]

2 टिप्पणियाँ »

  1. Aapke sabhi articles main jaroor parrhta hun, visheshkar sunday ko publish hone wale. mere har sunday ki shuruaat aapke article ke sath hi hoti hai. Parantu kuchh jigyasayein uthti hain man mein, jaise ki aapne likha hai “अक्षर से सृष्टि बनती है और अक्षर में ही लीन होती है।” Maine is vishay ko samajhne ke liye “Aksharyatra” ko bhi refer kiya parantu theek se samajh nahin saka.yadi aap vistaar se bata sakein anukampa hogi.

    Dhanyavaad.

    टिप्पणी द्वारा Vikas Sharma — जुलाई 21, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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