Gulabkothari's Blog

जुलाई 20, 2009

संकल्प-3

जीवन चलाती है
माया ही
नर-नारी में,
किन्तु अलग हैं
धरातल उनके,
नर जीता है
बुद्धि से
जो आती है
सूर्य से, महत् से,
अहंकार से
उष्ण होती है
तोड़ती है अग्नि
स्वाभाव से,
शरीर अग्नि है,
ह्वदय प्राण
अग्नि हैं तीनों,
इन्हें चाहिए
संकल्प
शीतल रहने का
सहने का,
सहयोग चाहिए
सौम्या का,
स्त्रेह का
जो प्रेरित करे
मृदुता-माधुर्य
भीतर का।
अग्नि मांगती है
भोग-अन्न-सोम
चलने को
जीवन यज्ञ,
शरीर लेता है
अन्न
बनी रहे
जठराग्नि जिससे,
मन चाहता
शीतलता
मिठास की,
ह्वदय को चाहिए
सोम्य प्राण,
सभी त्रिगुणी हैं,
ढंके हैं
सत-रज-तम से,
अलग-अलग है
अन्न इनका,
अलग-अलग भाव
इन्द्रियों के,
अलग-अलग हैं
विषय भी,
आंख मे है
गहराई,
चमक-ज्योति
मन की,
करूणा है, दया है
अश्रु है
रंजन भी होता है
कटाक्ष भी
चपलता भी,
देखती नहीं खुद
उपकरण है
मन का,
जैसे शरीर है
उपकरण स्वयं
ईश्वर का,
जुड़े रहते हैं
एक-दूजे से
श्रद्धा सूत्र से
संकल्प से।
संकल्प ही
चमकता है
आंखों में,
प्रेम बनकर,
वही करता है
रक्तिम नेत्र
रौद्र बनकर,
यही तोड़ता है
आवरण भी
योगमाया के
माया भाव से।
नीति आती है
संकल्प से,
यही मार्ग है
चतुराई का,
वाणी संयम का
शब्द ब्राह् का,
इच्छा बनती है
प्रत्यक्ष, कार्य रूप
प्रवाहित करके
प्राणों को,
आकाश, वायु
अग्नि , जल
सभी चलते
संकल्प से,
करते हैं
सृष्टि विस्तार
और प्रलय भी
ईश्वर संकल्प से।

माया ही
तोड़ती है
संकल्प सारे
सम्मोहन से,
श्गार से
कटाक्ष से
काटने को सिर
मधु-कैटभ के,
सम्मोहन
अविद्या है,
अज्ञान है,
आसक्ति है,
राग-द्वेष है
अस्मिता है,
अभिनिवेश है
तोड़ते हैं ये
सारे शुभ संकल्प
सम्मोहन से।
माया ही है
विद्या रूप
ज्ञान रूप
धर्म-ज्ञान
वैराग्य-ऎश्वर्य
इनके सहारे
विजय पाता है
संकल्प
सम्मोहन से,
बदलता है
प्रिय को,
प्रवाह को
व्यसन को
अधोगति को,
यथार्थ में
सहजता में
प्रकृत रूप में
न कोई प्रिय,
न ही अप्रिय,
जो जैसा है
वैसा है।
संकल्प तोड़ता
बेडियां स्मृति की,
अतीत की
बाहर लाता है
निकालकर
श्मशान से
मरे हुए काल से,
संकल्प रोकता है
उड़ने से
आकाश में
बिना पंखों के,
अनागत की
कल्पनाओं में,
विकल्प है
स्मृतियां और
कल्पनाएं,
जीवन संकल्प है,
वर्तमान है।
संकल्प बनाता
व्यक्तित्व
फिर बनाता
हजारों को
संकल्पवान
निर्मित करता
राष्ट्र को,
नेतृत्व है
यह तो,
गुरू है
आधार है
शिखर है,
रोक लेता है
जाने से
रसातल में,
देता है साहस
चढ़ने का,
न थकने का,
शरीर की तरह
मन की तरह
कहां थकते हैं,
चांद-तारे,
अव्यय सारे,
निर्विकल्प है
जीवन इनका,
मानव थकता है
विकल्पों से,
भागता है दूर
अपने आप से,
ईश्वर से
जो बैठा है
उसके भीतर
और ढूंढ़ता है
विकल्प उसके
बाहरी जगत में,
जैसे दे रहा हो
ईश्वर धक्का
उसको
अपने से दूर।

गुलाब कोठारी

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