Gulabkothari's Blog

जुलाई 25, 2009

मन ही विश्वदर्शन

सबके मन में एक ही आत्मा जीवन का अवलम्बन रूप चेतनामय है। सारे विश्व का एक ही ईश्वर है। इसीलिए पूरा विश्व एक बड़ा परिवार है। इसीलिए सृष्टि का हर प्राणी, जड़-चेतन, एक-दूसरे से सम्बन्ध रखता है। सृष्टि का क्रम ऋणानुबन्ध के आधार पर चलता रहता है। इसमें मुख्य भूमिका आत्मा की होती है। व्यवहार में आत्मा और मन को अलग नहीं किया जा सकता। अत: मन ही जीवन में क्रियाकलापों एवं ऋणानुबन्ध का आधार है। मन क्या है जीवों में इसकी उपस्थिति कैसे सिद्ध होती है किस प्रकार यह मन ऋणानुबन्ध का कारण बनता है ये प्रश्न विचारणीय हैं।
मन के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने विस्तार से एक विशेष व्याख्या की है—अव्यय पुरूष वहां आत्मा रूप है। वह सापेक्ष ब्रह्म में सर्वप्रथम पुरूष भाव है। जिसके केन्द्र और परिधि हों, उसे “पुर” कहते हैं। “पुर” में निवास करने वाले को पुरूष कहते हैं। सृष्टि के अलग-अलग धरातलों पर पुरूष भी उसके अनुरूप अलग-अलग होते हैं। यह पुरभाव नर व मादा में सर्वत्र समान है। जिस अव्यय पुरूष को श्रीकृष्ण ने सृष्टि का आलम्बन् कहा है, निश्चय ही वह सृष्टि के आरम्भ काल का निरालम्ब आलम्ब है, वरना वह आलम्बन कैसे बन सकता है
हमारी सृष्टि में सप्त लोक माने गए हैं- भू, भूव:, स्व:, मह:, जन:, जप: और सत्यम्। इनमें भू हमारी धरती, अन्तिम लोक है और सत्यम् या स्वयंभू आरम्भ लोक है। स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी ये पंच पर्वो के नाम से जाने जाते हैं। स्वयंभू ऋषि प्राण का, परमेष्ठी ऋषि पितृ प्राण का और सूर्य पूर्व दो प्राणों सहित देव प्राणों का लोक है। इन्हीं के सामंजस्य से सृष्टि-क्रम का विकास चलता है, अत: ये ही हमारे तीन मूल ऋण रूप माने जाते हैं।
अव्यय पुरूष की सृष्टि ऋषि और पितृ प्राणों के सहयोग से होती है। माया उस योग की कारक बनती है। अव्यय पुरूष पंचकलात्मक होता हुआ सर्जन में प्रवृत्त होता है। पांच कलाओं में आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् हैं। केन्द्रीभूत मन जब माया रूप इच्छाशक्ति से प्रेरणा पाकर प्राण और वाक् से युक्त होता है तब प्राण क्रिया रूप में आ जाते हैं, फलत: सृष्टि का निर्माण होता है। मन, प्राण और वाक् अविनाभाव में रहते हैं। एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते, अत: सम्पूर्ण सृष्टि के केन्द्र में यह मन ही होता है। अव्यय पुरूष के इस मन को “श्वोवसीयस मन” के नाम से जाना जाता है, जो कि स्वयं में पूर्ण रूप से निर्गुण रहता हुआ भी सगुण सृष्टि का संचालक बनता है।
स्वयंभू लोक की माया पितृलोक में महामाया रूप में कार्य करती है। माया सृष्टि की ओर उन्मुख अवश्य है, जिसको इच्छा कहते हैं, परन्तु व्यक्त क्रिया-भाव में माया शक्ति कभी नहीं आती। सृष्टि का बिन्दु रूप में विस्तार करना महामाया का कार्य है। आगम शास्त्र में महामाया को बिन्दुमयी कहा जाता है। मन, प्राण, वाक् मिलकर सबसे पहले देव वर्ग की सृष्टि करते हैं, जिसे अक्षर पुरूष कहते हैं। सूर्यलोक देव सृष्टि का स्थान है। अक्षर पुरूष की पहचान इसकी पांच कलाओं से होती है—ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि और सोम। इससे आगे महामाया का स्वरूप प्रकृतिमय सत, रज, तम के रूप में व्यवह्वत होता है। मन, प्राण, वाक् शुरू की तीन कलाओं के साथ नित्य युक्त होकर यहां अग्नि-सोम पर त्रिगुणात्मक सृष्टि करते हैं। यहां से आगे भी सृष्टि को “अग्नि-सोमात्य जगत्” के नाम से जाना जाता है।
इस सृष्टि को क्षर पुरूष या क्षर-सृष्टि कहते हैं। यहां अक्षर की दस कलाओं के अलावा क्षर सृष्टि की पांच कलाएं भी होती हैं। प्राण, अप, वाक्, अन्न और अन्नाद। कुल पन्द्रह कलाएं क्षर सृष्टि में निहित होती है। इनके अतिरिक्त एक कला केन्द्रीभूत ब्रह्मा की मानी जाती है। इस प्रकार क्षर-सृष्टि का हर पुरूष षोडश कलायुक्त होता है। हर पुरूष के केन्द्र में एक ही ब्रह्म है, एक ही मन है।
जब व्यक्ति ब्रह्म की खोज में निकलता है, अन्तर्मुखी होता है तब उसे उपरोक्त श्वोवसीयस मन तक पहुंचने का लक्ष्य बनाना पड़ता है। षोडश कलाओं में मन केवल अव्यय पुरूष में ही कलारूपेण रहता है। आगे उसका अक्षर और क्षर की कलाओं में कहीं नाम नहीं होता। तीनों गुणों में फंसा हुआ हमारा मन उस अन्तर्मन का प्रतिबिम्ब मात्र है। ये तीनों गुण ही इसके आवरण बनते हैं, जिन गुणों की शाखा काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग-द्वेष आदि बनते हैं, इन आवरणों को हटाकर ही भीतरी मूल मन पर पहुंचा जा सकता है। उस पर जितने आवरण हैं, उनको हटाना होता है। मन को पकड़ने के बाद ही उसका मार्ग प्रशस्त हो सकता है। मन जब अन्तर्मुखी होगा, तभी वह प्राण और वाक् से हटकर आनन्द और विज्ञान की ओर मुड़ेगा। आनन्द मन का मूल स्वभाव है। इसी की चाह में मन सदा भटकता रहता है।
इसी मन को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और बुद्धियोग के मार्ग बताए हैं। मन को त्रिगुण से बाहर निकालने का उपदेश दिया है; क्योंकि इस मन में उठने वाली सभी कामनाएं माया के आधीन होती हैं। माया जब तक अपने आवरण को नहीं समेट ले तब तक व्यक्ति का ब्रह्म में प्रवेश करना सम्भव ही नहीं है।
शरीर इन्द्रियों का स्थान है। मन इन्द्रियों का राज्य है। मन को इन्द्रियों की ओर से समेटने का अर्थ है-स्थूल सृष्टि से विमुख होकर आन्तर-सृष्टि में प्रवेश, जो कि इस सृष्टि से बहुत बड़ी है। अत: जीवन की सभी गतिविधियों का आधार मन है। मन को जान लेना ही विश्वदर्शन है, क्योंकि सभी जड़-चेतन के केन्द्र में मन तो एक ही है।

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4 टिप्पणियाँ »

  1. I met you in Indore when you were felicitated by Swami Shri Shivomteerhji Maharaj. I also visited your office in Jaipur but could not meet you. I keep talking about you in context of keeping the great Vedic Tradition alive. It is amazing that in the modern world of cheaper values you keep the light of eternal knowledge kindled. Furthermore amazing is the extent of your assimilation of this knowledge inspite of your being “Jain” and not a so called “brahmin”!

    टिप्पणी द्वारा PD MISHRA — अगस्त 9, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. i am a great fan of your thoughts. want to join “patrika” mission for empowerment of human values.

    टिप्पणी द्वारा shyam rajpal — अगस्त 3, 2009 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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